Showing posts with label PMO. Show all posts
Showing posts with label PMO. Show all posts

Sunday, August 26, 2018

कैथा पंचायती पुलिया निर्माण में भष्ट्राचार - लाख की पुलिया निर्माण में सरपंच सचिव सब खा गया (मामला ज़िला रीवा अन्तर्गत गंगेव जनपद का जिंसमे कैथा पंचायत सरपंच संत कुमार ने लाखों की पुलिया निर्माण में किया भष्ट्रचार, कंक्रीट के स्थान पर पंचायत भवन के पत्थर और डस्ट से बन रही बृजबल्लभ पटेल के घर के पास की पुलिया, पाइप भी पुरानी डाली)

दिनांक 27 अगस्त 2018, स्थान - गंगेव/गढ़ रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  गंगेव जनपद में भष्ट्राचार अपने चरम पर चल रहा है. गंगेव जनपद पंचायत अन्तर्गत आने वाली लगभग ज्यादातर पंचायतों में शेयर का खेल चल रहा है. जनपद सीईओ एवं राजेश सोनी नामक बाबू के करामात निरंतर जारी हैं. चाहे कोई भी सीईओ आये गंगेव जनपद में मात्र राजेश सोनी की चल रही है. सोनी बाबू ने पूरी जनपद की ऐसी तैसी करके रखी हुई है जिस पर कलेक्टर कमिश्नर तक की कार्यवाही की हिम्मत नही. अभी पिछले कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री कन्यादान योजनान्तर्गत गरीब परिवारों की शादियाँ करवाई गई थी जिंसमे जमकर फर्ज़ीवाड़ा हुआ था जिसकी खबर प्रदेश के काफी समाचार पत्रों में छपी थी. ऐसे फ़र्ज़ी जोड़ों की शादियाँ हुईं जिनके कई बच्चे भी थे.

   कैथा पंचायत में सभी पुलिया निर्माण में हुई लीपापोती

   जनपदों के लगभग सभी पंचायतों में पञ्च परमेश्वर योजनान्तर्गत पुलिया एवं नाली साथ ही पीसीसी सड़क निर्माण का कार्य करवाया जा रहा है. इस बीच कैथा पंचायत में भी कई पुलिया निर्माण एवं पीसीसी निर्माण का कार्य किया जा रहा है.

    कैथा पंचायत की पुलिया निर्माण में कंक्रीट के स्थान पर पत्थर और डस्ट का प्रयोग हो रहा है. जबकि देखा जाए तो पुलिया निर्माण के लिए 89 हज़ार रुपये के बिल में अच्छी गुणवत्ता के बालू, गिट्टी एवं 55 बोरी सीमेंट की बात आई है. संलग्न रसीद से साफ स्पष्ट है जिस 89 हज़ार रुपये का फ़र्ज़ी बिल बाउचर बनाया हुआ बताया गया है उसमे किसी भी सामग्री का प्रयोग वास्तविक धरातल पर पुलिया निर्माण में नही हो रहा है.

बृजबल्लभ पटेल के घर के पास पुलिया निर्माण में भष्ट्राचार

  बृजबल्लभ पटेल के घर के पास नामक पुलिया निर्माण की राशि एक लाख रुपये सैंक्शन हुई बतायी गई थी जिंसमे किसी राजवीर ट्रेडर्स के द्वारा 89 हज़ार रुपये सामग्री का बिल बाउचर दिनाँक 04/05/2018 को पास किया गया है. पुलिया निर्माण के लिए राशि पंचायतीराज संचालनालय द्वारा पंच परमेश्वर योजनान्तर्गत दिनांक 02/10/2016 को सैंक्शन हुई. 

   राजवीर ट्रेडर्स द्वारा जारी किये गए बिल बाउचर में इस पुलिया निर्माण हेतु एक हाइवा बालू 24 हज़ार 500 रुपये के हिसाब से, 310 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से 55 बोरी सीमेंट कुल 17 हज़ार पचास रुपये, दो हाइवा 20 एमएम गिट्टी लागत 39 हज़ार रुपये, एवं ह्यूम पाइप 3 नग लागत 9 हज़ार रुपये की बतायी गई है. इस प्रकार कुल मटेरियल की कीमत 89 हज़ार रुपये बताया गया है जिंसमे यदि वास्तविक धरातल पर देखा जाए तो 8 से 10 बोरी तक घटिया क्वालिटी की राखड़ मिली सीमेंट, पुरानी कैथा पंचायत से निकाले हुए पत्थर, और थर्ड ग्रेड की डस्ट मिलाकर मात्र 10 से 15 हज़ार रुपये के खर्च में पुल बनाई जा रही है जिसकी की फ़ोटो भी संलग्न है. इस पुलिया निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी ही नही हो रही बल्कि सीधे सीधे आंखों में धूल झोंक दिया जा रहा है जिसमे सरकार प्रशासन अंधा हो चुका है. या यूं कहें की सीईओ, इंजीनियर और अन्य अधिकारियों को इतना माल मिल चुका है की सुपरवाईज़िंग  एजेंसी अपने आप आंख बन्द कर ली है.

जनपद और ज़िला स्तर से चलाया जा रहा भष्ट्राचार का धंधा

    जिन ग्राम पंचायतों में हो रहे कार्यों में अनियमितता और भष्ट्राचार की शिकायत जनपद और जिला स्तर पर की जा रही है आखिर उसमे कलेक्टर, कमिश्नर और सीईओ कार्यवाही क्यों नही कर रहे है. क्या वजह है? बात बहुत ही स्पष्ट है की चूंकि इसमे भष्ट्राचार की राशि उच्चस्तर तक जा रही है इसलिए पंचायती कार्यों में अनियमितता की शिकायत पर कोई भी उच्चाधिकारी कोई कार्यवाही नही करता. टीएस होने से लेकर कार्य तक सभी का शेयर फिक्स होने से शिकायतो पर मात्र लीपापोती की जाती है. यदि शिकायतें की जाती हैं तो मात्र उनमे फ़र्ज़ी पंचनामा और फ़र्ज़ी प्रतिवेदन बनाकर ऊपर प्रेषित कर दिया जाता है. इसी बात को पुख्ता करते हुए बता दें की सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा वर्ष 2016 के आसपास भोपाल मंत्रालय बल्लभ भवन से लेकर पीएमओ तक दर्जनों पुख्ता शिकायतें पूरे प्रूफ के साथ भेजी गईं थीं लेकिन जब दो साल बाद उनके निराकरण का प्रतिवेदन प्राप्त हुआ तो आश्चर्य हुआ क्योंकि पीएमओ में भेजी गई शिकायत के निराकरण में जिंसमे की उच्चधिकारियों और प्रतिस्पर्धी सक्षम टीम द्वारा जांच की माग की गई थी उसकी जांच प्रतिवेदन में जनपद स्तर के बाबू द्वारा उपलब्ध करवाये गए जांच प्रतिवेदन को ही आधार बनाकर सीईओ जनपद एवं ज़िला एवं कलेक्टर रीवा तक के हस्ताक्षर तो थे ही साथ ही प्रादेशिक स्तर पर बल्लभ भवन मंत्रालय के अधिकारियों के भी वही प्रतिवेदन थे. अर्थात मामला साफ स्पष्ट था की जिस जांच और हीलाहवाली से थककर आवेदक द्वारा मामला बल्लभ भवन मंत्रालय एवं पीएमओ को इस आशय के साथ भेजा गया था की इसमे कोई सार्थक कार्यवाही होगी और साथ ही जांच स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी द्वारा करवाई जाकर सही निराकरण होगा उसमे पीएमओ लेवल तक कहीं कुछ नही हुआ. 

   अब प्रश्न यह उठता है की कार्यपालिका में पीएमओ से बड़ा कौन सा विभाग हो सकता है. आवेदक शिकायतकर्ता जब ज़िला स्तर की हीलाहवाली से थकता है तो सीएमओ और पीएमओ को शिकायत भेजता है लेकिन वहां भी उसे गंभीरता से लेने की बजाय मात्र औपचारिकता पूर्वक निचले स्तर पर फॉरवर्ड कर दिया जाता है नतीज़ा वही मिलता है जो पहले मिल रहा था. जांच प्रतिवेदन मात्र बाबू लेवल के कर्मचारी का ही जाएगा जो पहले ही खा पीकर बैठा हुआ है. 

    भगवान मालिक है ऐसे सरकार प्रशासन का और ऐसे लोकतंन्त्र का.

संलग्न - रीवा ज़िले के गंगेेेे जनपद अन्तर्गत वघटितहै पंचायत केेई घााटीया तरीके से निर्माण की जा रही गुणवत्ताविहीन पुलिया की फ़ोटो साथ ही पञ्च परमेश्वर योजनान्तर्गत बनाई जा रही इस पुलिया के विषय में राजवीर ट्रेडर्स नामक दुकान से जारी किये गए फ़र्ज़ी बिल बाउचर की फ़ोटो भ संलग्न भी.

-------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139

Monday, July 9, 2018

अब तक रीवा में सूखा जैसे हालात, कहाँ गए फसल बीमा करवाने वाले विभाग? (मामला ज़िले में अऋणी किसानों की प्रधानमंत्री फसल बीमा की दयनीय स्थिति की जहां अब तक न तो ग्राम सेवक, कृषि विभाग और न ही सहकारिता विभाग का है कोई रता पता, ज़िले में सूखा जैसे हालात, यदि अऋणी किसानों की फसल बीमा नही हुई तो होगी भीषण समस्या)

दिनांक 09 जुलाई 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  रीवा ज़िले में बारिस की स्थिति अब तक चिंतनीय बनी हुई है. औसत से काफी कम बारिस होने की वजह से किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें स्वाभाविक है. जहां एक तरफ बोवनी लेट हो रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान उहापोह में झुरिया धान का ही छिटाव शुरू किये हुए हैं. पर यदि बारिस नही होती अथवा कम बारिस होती है दोनो ही स्थितियों में विशेषकर असिंचित क्षेत्रों में किसानों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है.

  प्रधानमंत्री फसल बीमा की स्थिति दयनीय

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रारम्भ से लेकर अब तक रीवा संभाग में फसल बीमा की स्थिति दयनीय बनी हुई है. या यूं कहें की प्रधानमंत्री फसल बीमा ने किसानों की स्थिति ही दयनीय बना दी है. पिछले कुछ सालों में रीवा संभाग में मात्र किसानों से फसल बीमा के नाम पर प्रीमियम की उगाही की गई है उसके एवज में उन्हें मिला कुछ नही है अथवा यदि कुछ तहसीलों में मिला भी है तो बहुत कम जिंसमे किसान की लॉगत तक नही निकल पायी है. रीवा ज़िले के मनगवां तहसील में प्रधानमंत्री फसल बीमा के आने के अब तक मात्र किसानों को अंगूठा ही दिखाया गया है.

90 प्रतिशत किसानों को पता ही नही फसल बीमा क्या है?

   बड़े ही आश्चर्य की बात है की ग्रामीण अंचलों के बहुत से किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कोई विशेष जानकारी नही है. जब कभी टीवी अथवा रेडियो के माध्यम से सुन देख लिया उसके अतिरिक्त न तो समिति प्रबंधकों का कोई रता पता है और न ही ग्राम सेवकों का. कृषि और सहकारिता विभाग के ऊपर फसल बीमा कराने और जानकारी देने का ज्यादा से ज्यादा दारोमदार होता है लेकिन आज भी यदि गंगेव ब्लॉक अथवा किसी भी ब्लॉक के कृषि कार्यालय में जाया जाए तो वहां बहुतायत में पुराने पड़े पैम्फलेट और पोस्टर मिल जाएंगे जो पिछले 3 वर्षों से ब्लॉक कृषि विभाग के गोदाम और कमरों अलमारियों में धूल फांक रहे होंगे. वैसे यह सभी योजनाओं के पोस्टर बैनर और पैम्फलेट किसानों और ग्रामीणों को वितरित करने जन जागरूकता फैलाने के लिए आये हैं. 

आरएईओ और ग्राम सेवकों का नही कोई रता पता कौन कराए अऋणी किसानों की फसल बीमा

    कृषि विभाग द्वारा प्रत्येक 4 से 5  ग्राम पंचायतों के बीच एक ग्राम सेवक अथवा आरएईओ रखा जाता है जिसका काम होता है की किसानों के हित संबंधी सभी योजनाओं की जानकारी गांव गांव जाकर उपलब्ध कराना, किसानों को फसल बीमा योजना के बारे में अवगत कराना, उन्हें फॉर्म भरवाकर प्रीमियम जमा करवाकर फसल बीमा का फॉर्म भरना, समय समय पर खरीफ और रवी सीजन में आने वाले खाद बीज कीटनाशक एवं अन्य जानकारी उपलब्ध कराना. परंतु यहां तो पूरा उल्टा होता है और ग्राम सेवकों का कोई रता पता ही नही रहता है. यदि कोई जल क्षमता प्रमाण पत्र अथवा कृषि से संबंधित कोई जरूरी कागज़ात में ग्राम सेवकों के हस्ताक्षर करवाने होते हैं तो ग्राम सेवक को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है. 

समिति प्रबंधक बोलते हैं फसल बीमा का फॉर्म ही नही

  किसान के पास तो बस दो ही विकल्प बचते हैं. एक ग्राम सेवक को ढूंढे और दूसरा समिति सेवक को. न तो ग्राम सेवक फसल बीमा कराने में सहयोग कर रहा और न ही समिति सेवक. यह दोनो ही सेवक अब सेवक से मालिक बन चुके हैं और आम जनता स्वयं नौकर बनकर इन मालिको को ढूंढे.

  जहां ग्राम सेवक का कोई पता ही नही वहीं समिति सेवक के पास कृषि विभाग के फॉर्म ही उपलब्ध नही. समिति सेवक बोलता है की उसके पास फसल बीमा कराने के लिए कोई जानकारी नही आई है और न ही कोई अऋणी किसानों के फॉर्म ही उपलब्ध हैं.

   स्वाभाविक रूप से किसान ऐसे में कहाँ जाए और क्या करे. कृषि विभाग के ग्राम सेवकों और सहकारिता विभाग के समिति सेवकों ने गरीब किसान की धुरचट बिगाड़ कर रख दिया है.

95 प्रतिशत आऋणी किसानों की नही हुई फसल बीमा

    मनगवां तहसील के 95 प्रतिशत के आसपास किसानों की फसल बीमा खरीफ 2018 में अब तक नही हो पायी है. न तो इसमे सहकारिता विभाग कोई रुचि ले रहा है और न ही कृषि विभाग. 

    ऐसे में यह स्प्ष्ट दिख रहा है की यदि इस वर्ष खरीफ 2018 में सूखा पड़ता है अथवा कम बारिस होती है तो किसानों के लिए एक बार फिर भारी मुश्किल होने वाली है. क्योंकि फसल बीमा के अभाव में और समय पर फसल बीमा न करवा पाने की स्थिति में उन्हें अपने फसलों की नुकसानी की कोई भरपाई नही हो पाएगी और एकबार फिर किसान इस सरकारी योजना का समुचित लाभ न ले पाने के कारण ठगा सा रह जाएगा. 

  संलग्न - मनगवां तहसील ज़िला रीवा क्षेत्र के कैथा और उसके आसपास के क्षेत्र में बारिस न होने से मायूस किसान और खाली पड़े खेतों की तस्वीरें. साथ मे सूखे पड़े कुएं जो बता रहे क्षेत्र के जलस्तर को।

-----

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Friday, May 4, 2018

डेडलाइन 30 अप्रैल, पर काम 25% भी नही (मामला ज़िले के मऊगंज पीएम सड़क परियोजना अन्तर्गत कैथा से अगडाल 9.4 किमी पीएम सड़क मार्ग का जिसे नियमानुसार 24 जनवरी 2018 को पूर्ण होना था,कैथा से अगडाल पीएम सड़क में भ्रष्ट्राचार और मनमानी का बोलबाला)

दिनांक 04 मई 2018, स्थान - गढ़, गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   ज़िले के मऊगंज पीएम परियोजना सेक्टर अन्तर्गत आने वाली गंगेव ब्लॉक की सभी पीएम सड़कें भ्रष्ट्राचार की भेंट चढ़ रही हैं. प्रधानमंत्री सड़क परियोजना के अधिकारियों और पीएम सड़क के ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों की परियोजना में चुना लगाया जा रहा है. यह बात आयके दिन निरंतर मीडिया में रहती है फिर भी पीएम सड़क के अधिकारियों की नीद नही खुल रही है.

कैथा से आगडाल 9.4 किमी सड़क को 24 जनवरी को होना था पूर्ण

  बता दें की बहुचर्चित कैथा से अगडाल प्रधानमंत्री सड़क का कार्य 24 जनवरी को पूर्ण होना था मगर अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से इसमे लेटलतीफी की जा रही है. जबकि यह बात दर्जनों मर्तबा संबंधित पीएम सड़क के अधिकारियों के समक्ष रखी जा चुकी है.

जांच के नाम पर करते हैं कोरम पूर्ती

  जब भी पीएम सड़क में मनमानी और घटिया गुणवत्ता की शिकायत संबंधित अधिकारियों के समक्ष की जाती है तो मात्र जांच के नाम पर कोरम पूर्ति की जाती है. यही सिलसिला पिछले कई महीनों से चल रहा है.

   पुलो का हुआ घटिया निर्माण 

   कैथा से अगडाल प्रधानमंत्री सड़क मार्ग की पुलो का घटिया निर्माण किया गया है जिसकी शिकायत समय समय पर सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा संबंधित पीएम सड़क के अधिकारियों के समक्ष की गई है लेकिन जांच के नाम पर मात्र कोरम पूर्ति ही हुई है और ठेकेदार से मिल बांटकर मामला रफा दफा करने का प्रयाश किया गया है.

 पिछले साल भर में मऊगंज के 3 जीएम बदले

  पिछले साल भर में मऊगंज पीएम सड़क परियोजना के 3 जीएम और ए एम बदले हैं लेकिन स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है. जो जीएम आता है वही पुरानी प्रक्रिया अपनाता है. ऐसा लगता है पहले से ही अब कुछ फिक्स्ड है. 

वर्तमान जीएम नरवरिया देते हैं मात्र आश्वासन 

   वर्तमान समय में मऊगंज प्रधानमंत्री सड़क परियोजना में पदस्थ जनरल मैनेजर नरवरिया को गंगेव ब्लॉक अंतर्गत बनाई जा रही घटिया गुणवत्ता की सड़कों की जनकारी दी गई है और सही जांच कर ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट करने की माग की गई है लेकिन जीएम नरवरिया मात्र डेट देते हैं, जब भी उन्हें मौके पर जांच करने के लिए बुलाया जाता है तो उनका कहना होता है की कल आ रहा हूँ और आज महीने हर हो रहे हैं कभी भी भौतिक सत्यापन करने नही आये.

उपयंत्री अमित गुप्ता और टीएल करते हैं मात्र खानापूर्ति

   मऊगंज पीएम सड़क के उपयंत्री अमित गुप्ता और टीम लीडर जांच के नाम पर मात्र खानापूर्ति कर रहे हैं. ऐसा लगता है की यह दोनो अधिकारी मात्र तमाशा करने के लिए ग्राउंड पर आते हैं. पिछली लगभग आधा दर्ज़न से अधिक जांचों में अमित गुप्ता और टीम लीडर आये मगर इनकी जांचों से कहीं कुछ हुआ ही नही. जो स्थिति बनी हुई थी वही अभी भी है. पुलो का घटिया निर्माण हुआ, लौरी नंबर 3 में सड़क उखड़ी, घटिया सामग्री का उपयोग हुआ यह सब कुछ यह अपनी आंखों से देखकर गए लेकिन कुछ नही किया. इससे साफ जाहिर है की इन सबकी ठेकेदारों से मिलीभगत है जिसका की परिणाम है घटिया किश्म की सड़क और समय पर न बन पाना.

सीजीएम यू वी सिंह ने कहा हम आपके नीचे नही हैं जो आपके हर बात का जबाब देंगे

   यहां जनता के टैक्स पर पलने बढ़ने वाले आज जनता के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री सड़क विभाग का सबसे बड़ा संभागीय अधिकारी गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कर रहा है। जब मुख्य महाप्रबंधक ज़िला रीवा यू वी सिंह से संपर्क किया गया तो उसके द्वारा वताया गया कि आप व्हाट्सएप्प अथवा ईमेल अथवा लिखित तौर पर कंप्लेन दर्ज कराए तब कार्यवाही करेंगे। अभी उसे व्हाट्सएप्प के माध्यम से सभी न्यूज़पेपर की कटिंग के साथ डिटेल भेज दिया गया फिर भी घुमा फिरा कर बात कर रहा है। जब बात कार्यवाही की आती है तब अपना पल्ला झाड़ रहे हैं, बात आई ठेकेदार का ठेका निरस्त करने एवं उसे ब्लैक लिस्ट करने की तब बोला कि हम आपके नीचे नही हैं जो हर चीज़ का जबाब देंगे। पर इन नौकरों को पता होना चाहिए कि ये जनता के नौकर ही हैं उसके मालिक नही अन्यथा लोकतंत्र चल नही पायेगा। क्योंकि फिर हर कोई मालिक बनने का प्रयास करने लगेगा। यू वी सिंह एक जिम्मेदार पोस्ट पर बैठा संभागीय अधिकारी है इसे ऐसे बात करना इसके अखड़पन को दर्शाता है।

रीवा और मऊगंज पीएम सड़क विभाग की मिलीभगत का परिणाम पीएम सड़कों का सत्यानाश

   इन रीवा और मऊगंज पीएम सड़क अधिकारियों ने ठेकेदारों से मिलकर पूरी पीएम सड़कों का सत्यानाश कर दिया है। इनकी मिलीभगत से घटिया सड़कों का निर्माण किया जा रहा। जांच के नाम पर मात्र ये कोरम पूर्ति करते हैं। ठेकेदारों से इनकी कमीशन बंधी रहती है। पूरा कमीशन का खेल चल रहा है।

ठेकेदार इन सब पीएम सड़क के अधिकारियों को खरीद लेते हैं और फिर मनमुताबिक जो चाहते हैं वही करते हैं। नतीजा यह है कि जो सड़कें कई वर्षों पहले बनकर तैयार हो जानी चाहिए थी वह आजतक कम्पलीट नही हुई हैं। निरंतर निम्न दर्ज़े की निर्माण सामग्री का प्रयोग कर घटिया गुणवत्ता की सड़कें बनाई जा रही है। पुलों के निर्माण में भी दोयम और निम्न दर्ज़े की सामग्री उपयोग की गयी है जिससे पुलें बनते ही टूट गयी हैं उनमें दरारें आ गयी हैं।

कई डेडलाइन जारी, पर काम में नही हुई कोई प्रगति

   कैथा से अगडाल 9.4 किमी पीएम सड़क को पूर्ण करने वास्ते रीवा पीएम सड़क विभाग के माध्यम से कई डेडलाइन जारी की जा चुकी हैं. जीएम मऊगंज नरवरिया, एएम सुजीत कुमार निगम और उपयंत्री अमित गुप्ता द्वारा जानकारी दी गई की प्रारंभिक तौर पर सोनभद्र कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड का इस पीएम सड़क को पूर्ण करने का ठेका मात्र 24 जनवरी 2018 तक ही था इसके वावजूद भी ठेकेदार को कई नोटिस जारी की जा चुकी हैं जिसमे 7 अप्रैल, 30 अप्रैल और 15 मई की नोटिस परंतु कार्य में 33 प्रतिशत भी प्रगति नही हुई है, तथा जो 3 किमी सड़क बनाई भी गई है वह भी उखड़ने लगी है. इस प्रकार समझ में आता है पीएम सड़क विभाग के मौखिक और कागज़ी फरमानों का भी इन ठेकेदारों पर कोई प्रभाव नही पड़ रहा है तो इसका मतलब एक ही है की इनका ठेका पूरी तरह से निरस्त किया जाकर पुनः नए शिरे से टेंडर प्रक्रिया होनी चाहिए.

समयसीमा पर नही बन पायी पीएम सड़क, अब ठेका हो निरस्त

   जिस प्रकार 3 करोड़ 33 लाख की लॉगत से बनाई जा रही कैथा से अगडाल 9.4 किमी पीएम सड़क को घटिया तरीके से बनाया जा रहा है और गुणवत्ता का कोई ध्यान नही दिया जा रहा है ऐसे में मापदंडों की अनदेखी करने के कारण सोनभद्र कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड का ठेका निरस्त होना चाहिए और घटिया काम की पूरी रिकवरी होनी चाहिए. इस बाबत सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा पीएम सड़क के अधिकारियों जीएम नरवरिया, सीजीएम यू वी सिंह, और सीईओ पीएम सड़क भोपाल सेअहित दिल्ली एनएनआरडीए विभाग तक कंप्लेन दर्ज करवायी जा चुकी है. अब तक इस विषय के कार्यवाही समझ नही आई है परंतु कार्य में कोई प्रगति समझ नही आ रही है जबकि सरकारें निरंतर घोषणाएं कर रही हैं की सभी अपूर्ण कार्य समयसीमा में पूरे किये जाएं. पर इन घोषणाओं का कहीं कुछ भी प्रभाव नही पड़ता दिख रहा.

संलग्न - संलग्न तस्वीर में देखें कैथा से अगडाल पीएम सड़क मार्ग की घटिया स्थिति जहां आज तक मोरम तक नही डाली गई है. पिछले दिनों रीवा में हुई तूफानी बारिस की वजह से रोड की दुर्दशा.

------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 90589152587

Sunday, April 22, 2018

झोलाछाप का बोलबाला, एक का ग्यारह देने पर भी जान से हाँथ धो रहे, न दवा और न ही जीवन की कोई गारंटी, सुप्रीम कोर्ट तक के निर्देशों की कोई कीमत नही (मामला ज़िले की हज़ारों प्राइवेट क्लिनिक और झोलाछाप डक्टरों का)

दिनांक 22 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी) 

    कहते हैं सबसे सुखी निरोगी काया, पर इस मॉनव तन में रोग व्याधि भी समय समय पर आते ही रहते हैं. कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनका इलाज करवाने से राहत मिल जाती है और कुछ ऐसी व्याधियां लग जाती हैं जो शरीर के अंत के साथ ही समाप्त होती हैं.

    पुराने समय में बीमारी की स्थिति में गांव के वैद्य की दवा काफी कारगढ़ साबित होती थी. तब आयुर्वेद और जड़ी बूटियों में काफी ताकत होती थी और तब की जड़ी बूटियां स्वच्छ वातावरण में पैदा होती थीं. तब का खान पान भी इतना प्रदूषित नही था जितना आज का हो गया है. आज तो हर एक पदार्थ में दवा और प्रिजरवेटिव मिले रहते हैं. दूध में सोड़ा और यूरिया मिला रहता है, अनाज की बुवाई से कटाई और घर में स्टोर करने तक यूरिया, डीएपी, कीटनाशक, सल्फास और पता नही क्या क्या डाला रहता है. ऐसे में आज जब हम यह भोजन करते हैं तो यह जहर हमारे शरीर में प्रवेश कर हमारे शरीर के रोग प्रतिरोधक शक्ति को कमजोर कर विभिन्न प्रकार की साध्य और असाध्य बीमारी का तोहफा दे जाता है जिससे लड़ने के लिए हमारा जीवन पर्याप्त नही हो पाता.

   बीमारी तो होना आजकल एक आम बात हो गई है, और मौसमी से लेकर विभिन्न बीमारियां, पर यदि उसका अच्छे डॉक्टर से समय पर इलाज हो जाए तो निजात मिल जाती है. पर आज ग्रामों कस्बों में अच्छे डॉक्टरों का अभाव है जिससे झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला हो गया है. आज फार्मेसी की डिग्री और मेडिकल स्टोर खोल पाने की डिग्री धारक भी एम बी बी एस, एम डी, और सर्जरी का काम कर रहे हैं. अभी पिछले दिनों थाना गढ़ अंतर्गत इटहा ग्राम के हीरालाल पटेल ने बताया की उसकी पत्नी को डायबिटीज की समस्या थी और उसका इलाज चल रहा था इसी बीच उसकी तबियत अचानक खराब हो गई और वह पास ही स्थित गढ़ कस्बा के किसी डॉक्टर के पास गया और अपनी पत्नी का इलाज करवाया. इन बंगाली और बनारसी किश्म के डक्टरों ने कुछ ऐसा इलाज कर दिया की बिना जांच पड़ताल के 50 का ग्लूकोस बोतल 500 में चढ़ा दिया और हीरालाल की औरत का शुगर लेवल अचानक बढ़ कर कंट्रोल से बाहर हो गया. जब वह पूरी तरह से मरने लायक हो गई तो डॉक्टर साहब ने कहा की अब आप इन्हें रीवा या अन्यत्र लेकर चले जाएं हमारे बस की बीमारी नही है. रीवा जाते जाते और भर्ती कराते कराते उसकी पत्नी ने अंतिम सांस ले ली. हीरालाल ने बताया की उनकी अभी बेटी भी शादी करने योग्य है. उसकी पत्नी के अकस्मात मरने से उसका जीवन नीरस हो गया है।

     इसी प्रकार पिछले दो वर्ष पहले कैथा निवासी अम्बिका मिश्रा भी किसी हिनौती के झोलाछाप डॉक्टर के चक्कर मे पड़कर अपनी जान गवां बैठे। मामला जब अंतिम स्थित में आया तो गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया जहाँ बीच रास्ते मे ही अम्बिका की मृत्यु हो गयी।

गढ़, गंगेव, हिनौती, कटरा, कलवारी, भठवा और लालगांव में चलता है झोलाछाप का बोलबाला 

    वैसे तो पूरे ही ज़िले और संभवतः प्रदेश में ही आज फ़र्ज़ी किश्म की डिग्री लिए हुए, फार्मेसी और मेडिकल की दुकान खोलने की डिग्री लिए हुए फ़र्ज़ी डॉक्टर सर्जरी और मेडिसिन जैसे बड़े डॉक्टरों का काम कर रहे हैं परंतु सबसे ताजुब्ब की बात यह है की इस सबको सीएमएचओ और फूड्स एंड ड्रग्स डिपार्टमेंट के अधिकारी जानते हैं लेकिन सबकी मासिक बंधी होने के चलते कोई कार्यवाही नही होती. 

    ज़िले के सभी छोटे बड़े कस्बों में इन झोलाछाप का बोलबाला है परंतु यह सब जानते हुए भी शासन प्रशासन कार्यवाही से कतरा रहा है. थाना गढ़ और लालगांव चौकी क्षेत्र में ही अकेले गढ़, तेंदुआ, परासी, कलवारी, कटरा, हिनौती, लालगांव, भठवा सहित अन्य जगहों पर इन झोलाछाप डॉक्टरों ने अपनी दुकानें खोल कर रखी हैं. इनमे ज्यादातर मेडिकल स्टोर में संचालित होते हैं. मेडिकल स्टोर के नाम पर अपना आला पाला रखे हुए यह झोलाछाप डॉक्टर आम जनता की खूब जमकर लूटाई कर रहे हैं. 

   बेचारे गांव के लोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अभाव और साथ ही जहां भी ऐसे केंद्र बने हुए भी हैं वहां उचित तरीके से संचालित न होने के कारण इन झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में पड़ने को मजबूर हो जाते हैं. छोटी बीमारी की स्थिति में भी मेडिकल दुकान में जाएंगे और मेडिकल दुकान पर बैठे झोलाछाप के चंगुल में पड़ जाएंगे. 2 रुपये का इंजेक्शन 200 रुपये में और 40 रुपये का बॉटल 800 रुपये में चढ़ाएंगे. 

फ़र्ज़ी क्लिनिक तक हैं संचालित, बिना साइन पर्ची, एक्सपायरी डेट की दवाईयां 

   बात मात्र 1 का 11 बसूलने तक ही सीमित नही है. यहां तो बहुत सी समस्याएं हैं जिन्हें गौर किया जाना चाहिए

  --- चूंकि क्लिनिक फ़र्ज़ी होती हैं अतः दवा पर्ची में कौन डॉक्टर इलाज किया इसका कोई सबूत नही छोड़ा जाता. किसी भी पर्ची में डॉक्टर के हस्ताक्षर नही होते. इन दवा पर्चियों में मरीजों के नाम भी नही लिखे रहते.

 --- इन फ़र्ज़ी क्लीनिकों पर कोई ओ पी डी रजिस्टर नही होता. जिससे इस बात की कोई जनकारी नही होती की कौन से मरीज कहाँ से कब आया किसका इलाज किया गया और उसको क्या बीमारी डायग्नोज़ की गई. यह सब इसलिए होता है क्योंकि यदि कहीं भूल से ओ पी डी रजिस्टर बनाया गया तो उससे इन फ़र्ज़ी क्लीनिक पर कार्यवाही हो अक्ति है.

 --- जिस प्रकार एक एम बी बी एस अथवा एम डी डिग्री धारक डॉक्टर अंग्रेज़ी दवा से इलाज करते समय उसका उचित डोज़ और उसके रिएक्शन के होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के लिए दूसरी दवाईयों की पुख्ता जानकारी रखता है उसके विपरीत इन झोलाछाप डॉक्टरों के पास इसकी कोई जानकारी नही होती. ज्यादातर देखा गया है की मर्ज़ के इलाज के वक्त पहले से ही यह झोलाछाप डॉक्टर एक दो एविल की टेबलेट खिला दिया करते हैं जिससे रिएक्शन ही न हो. पर बिना रिएक्शन हुए ही एविल की गोली खिलाना भी उचित नही. रिएक्शन और दुष्प्रभाव से होने वाली मौत बढ़ रही हैं. जब झोलाछाप के बस में नही रह जाता तो आनन फानन में मरीज को रिलीव करके कट लेते हैं.

 --- क्योंकि मरीज के नाम पर कोई पुख्ता रशीद नही होती इसलिए जी एस टी और अन्य टैक्सेशन से बचे रहते हैं जिससे सरकार के खजाने में चूना लगता रहता है. 

 --- संबंधित ग्रामीण अंचलों में यह झोलाछाप डॉक्टर अपने आपको शांतिदूत बताकर इलाज करते हैं. इनका कहना होता है की यदि आप शहर में जाएंगे तो वहां डॉक्टर आपसे भारी भरकम 500 रुपये की फीस लेगा और दुनिया भर की तकलीफें होंगी. हमारी कोई फीस नही है. इस प्रकार झांसा देकर यह झोलाछाप गरीब और अनपढ़ ग्रामीणों को अपने चंगुल में फंसा लेंगे और उस फीस की वशूली इंजेक्शन, गोली दवा और बॉटल में कर लेंगे. 2 रुपये के इंजेक्शन की कीमत 200 रुपये और 2 रुपये की गोली की कीमत 20 रुपये लेते हैं. इसी प्रकार बिना किसी बीमारी के ही दनादन बोतल चढ़ाते जाएँगे जिस पर जमकर वशूली करेंगे.

रीवा हार्ट स्पेशलिस्ट के डी सिंह ने कहा इस मृत को अब यहां लेकर क्यों आये हो फेंक दो इसे रोड में

अभी हाल ही में कैथा निवासी रामखेलावन द्विवेदी पिता स्व. लोकनाथ द्विवेदी भी इन झोलाछाप और अधूरे ज्ञान वाले डॉक्टरों के चंगुल में फंस गए. गनीमत तो यह थी की आनन फानन में रामखेलावन को रीवा रेफेर किया गया जहां से उनकी स्थिति में सुधार न होने पर भोपाल के चिरायु अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनका हफ्तों इलाज चला  और तब जाकर राहत मिली. 

   मामला यूं था की रामखेलावन द्विवेदी को डायबिटीज और हार्ट की तकलीफ बतायी गई थी जिसका पहले से रीवा स्थित हार्ट विशेषज्ञ के डी सिंह से इलाज चल रहा था. फिर दवा खत्म होने के कारण गांव में उन्हें तकलीफ बढ़ गई जिस पर उन्होंने कटरा स्थित किसी अधूरी डिग्री और अधूरे ज्ञान वाले झोलाछाप डॉक्टर को दिखा दिया. उस डॉक्टर महाशय ने रामखेलावन को बॉटल ठोंक दिया जिससे ग्लूकोस अधिक हो जाने से शुगर लेवल हाई हो गया. हार्ट में अचानक दर्द बढ़ गया, फेंफड़े में पानी भर गया. जब स्थिति कंट्रोल से बाहर दिखी तो डॉक्टर महाशय ने जबाब दे दिया. रामखेलावन को उहापोह में रीवा लेजाकर संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके पहले वाले डॉक्टर के डी सिंह को बुलाया गया. के डी सिंह ने जब मरीज को इस स्थिति में देखा तो यहां तक कह दिया की इस मृत शरीर को मेरे पास लेकर क्यों आये हो जाकर फेंक दो रोड में. मतलब यह था की स्थिति 80 प्रतिशत कंट्रोल से बाहर थी. बताया गया की रामखेलावन का हार्ट 80 प्रतिशत डैमेज हो चुका था और बचने के चांस नही थे. इस पर उनके परिजनों ने उन्हें चिरायु अस्पताल में भर्ती कराया जहां किसी दिल्ली से आये हार्ट विशेषज्ञ आर के सिंह ने जाकर हफ्तों इलाज किया और रामखेलावन को मृत्युशैया से वापस लाया. तो यह कहानी है हमारे देश की मेडिकल फैसिलिटी और चिकित्सकीय अव्यवस्था की. इस पर ध्यान देने वाला कोई नही है जबकि लगभग रोज ही इन झोलाछाप डॉक्टरों के काले कारनामे किसी न किसी मीडिया ग्रुप और न्यूज़पेपर में उजागर होते रहते हैं. इस विषय मे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी गाइड लाइन जारी कर रखी है लेकिन कोई अमल नही हो रहा।

संलग्न - ऐसे ही झोलाछाप डक्टरों की लिखी कुछ दवा पर्चियां जो ग्रामीण मरीजों को दी गईं थी जो वह लाकर सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दिखाए हैं यहां पर संलग्न हैं.

---------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र

 मोबाइल - 7869992139, 9589152587

Sunday, January 28, 2018

पावन यज्ञस्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 जनवरी से 13 फरवरी तक आयोजित होगा महाशिवरात्रि महोत्सव 2018

दिनांक 28 फरवरी 2018, स्थान - गढ़ गंगेव रीवा मप्र।

(शिवानंद द्विवेदी रीवा मप्र) 

        पावन यज्ञस्थली कैथा में परंपरागत रूप से प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के पुनीत अवसर पर आयोजित होने वाला श्रीरामचरितमानस एवं श्रीशिवमहापुराण दोनो का कार्यक्रम महाशिवरात्रि महोत्सव 2018 में दिनांक 31 जनवरी से 13 फरवरी तक आयोजित होगा।

       दिनांक 31 जनवरी से 1 फरवरी तक संगीतमय श्रीरामचरितमानस का आयोजन, दिनांक 2 फरवरी को कलस यात्रा एवं दिनांक 3 फरवरी से 13 फरवरी तक श्री शिवमहापुराण का आयोजन होगा। दिनांक 13 फरवरी महाशिवरात्रि के दिन सम्पूर्ण महोत्सव का विसर्जन हवन एवं विशाल भंडारे के साथ होगा।

       बता दें कि पावन यज्ञस्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में सभी सार्वजनिक आयोजन एनजीओ श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत के तत्वावधान एवं  कलयुग के देवता पवन पुत्र श्री बजरंग बली जी के संरक्षण में सम्पन्न होते हैं।

         इस विशेष कार्यक्रम की अध्यक्षता भी पवन पुत्र हनुमान ही करेंगे।

         महोत्सव के प्रमुख कार्यकर्ताओं में भैयालाल द्विवेदी, सिद्धमुनि द्विवेदी, विशेषर केवट, बृजभान केवट, नन्दलाल केवट, संतोष केवट, रोहित मिश्रा, अरुणेंद्र पटेल, राजबहोर पटेल, गणेश पटेल, मतिगेंद पटेल, शिवेंद्र सिंह, मुनेंद्र सिंह, संपूर्णानंद द्विवेदी, उग्रभान केवट, शैलेन्द्र पटेल, लाल बहादुर पटेल सहित अन्य भक्त श्रद्धालु रहेंगे।

       अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 जनवरी से 13 फरवरी तक आयोजित होने वाले महाशिवरात्रि महोत्सव 2018 में सभी भक्त श्रद्धालुओं को सादर आमंत्रित किया जाता है।

    संलग्न - कृपया संलग्न अति प्राचीन श्री बजरंग बली जी की प्रतिमा देखने का कष्ट करें।

  - शिवानंद द्विवेदी सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं राष्ट्रीय संयोजक श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति भारत

Wednesday, January 24, 2018

Rewa, MP - बिजली विभाग का बिल नही फतवा, जारी हुआ तो भरना ही पड़ेगा

दिनांक 25 जनवरी 2018, रीवा/कटरा मप्र
(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र) ज़िले में बिजली विभाग का कहर निरंतर जारी है। कटरा डीसी सहित अन्य वितरण केंद्रों में बिना कनेक्शन और मीटर बैठाए ही औसत बिलिंग की जा रही है। हफ्ते की तरह उपभोक्ताओं से उगाही की जा रही है।
    अभी हाल ही में सूचना मिलने पर त्योंथर तहसील एवं ब्लॉक के जमुई पंचायत में पहुचा गया तो पाया गया कि जमुई ग्राम के हरिजन आदिवासी बिजली विभाग के औसत बिलिंग से परेशान थे। सभी ने अपना बिजली का बिल दिखाया और बताया कि राजीव गांधी विद्युतीकरण मिशन के तहत उनके घरों में बकायदे मीटर लगाकर बिजली कनेक्शन दिया जाना था लेकिन बिजली ठेकेदार द्वारा उल्टा सभी से 100 रुपये प्रत्येक के हिसाब से लिये गए और केवल कुछ घरों में खराब मीटर का डिब्बा तो बिठा दिया गया लेकिन उन्हें कोई कनेक्शन नही दिया गया।
     आज 6 माह से ऊपर हो रहे हैं और औसत बिलिंग की जा रही है लेकिन किसी भी घर मे मीटर से लाइन सप्लाई नही हो रही है।
     अब यदि देखा जाए तो यह किस्सा मात्र कटरा डीसी अथवा जमुई ग्राम का ही नही है बल्कि रीवा के बिजली विभाग में आम व्यक्ति का निरंतर शोषण चल रहा है। लगभग सभी ग्रामों में निवासरत गरीबों के यहां मुश्किल से 1 य 2 एल ई डी बल्ब और वह भी रात में जलते हैं, साथ ही ग्रामों में बड़े ही मुश्किल से 6 से 8 घंटे भी लाइन नही दी जाती ऐसे में लाइन लॉस और औसत बिलिंग के नाम पर गरीबों के नाम हज़ारों का फतवा जारी करना कहां तक उचित है।
     कटरा डीसी में पूरे जिले के ग्रामों की ही तरह 90 प्रतिशत से अधिक घरों में मीटर नही लगाए गए हैं और मात्र औसत बिलिंग की जा रही है। केबलिकरन, फीडर सेपरेशन और मीटर बैठाने की पूरी राशि हजम कर ली गई है।
     जहां तक जमुई ग्राम के हरिजन अदिवशिओं का मामला था उनका कहना था कि उन्होंने तो अब तक कोई बिजली ही नही जलाई है फिर भी उनके नाम पर कैसे बिजली बिल भेजे जा रहे हैं
    हरिजन  बस्ती के लालमणि, रामसखा, रमेश, उमेश, दिलराज, सूर्यभान, रामावतार, रामकरण आदि ने बताया कि वह सभी बिना मीटर रीडिंग के औसत बिलिंग से पीड़ित है  और सभी ने यह बात कटरा डीसी में उठाई है लेकिन कोई नही सुन रहा और बस मनमाना बिल भेजे जा रहे है। सभी ने एक स्वर में सभी घरों में मीटर लगाकर रीडिंग के आधार पर बिलिंग की माग की है।
संलग्न - हरिजन बस्ती जमुई के हरिजनों की सामूहिक फ़ोटो जो बिजली बिल से प्रताड़ित है।
    - शिवानंद द्विवेदी सामाजिक आर टी आई कार्यकर्ता रीवा मप्र। 7869992139








Tuesday, January 23, 2018

Rewa, MP -लौरी अगडाल कैथा प्रधानमंत्री सड़क में की जा रही गुणवत्ता की अनदेखी, घटिया पुल निर्माण के बाद अब सड़क पर अमानक सामग्री का हो रहा प्रयोग

दिनांक 23 जनवरी 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र
    (शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र) 
         ज़िले के मऊगंज प्रधानमंत्री सड़कों पर ध्यान नही दिया जा रहा है।  निर्माण की जा चुकी सड़कें पहले से ही उखड़ रही हैं और जो निर्माणाधीन हैं उनकी गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है।
          पुलों के निर्माण से लेकर सड़क में निर्माण सामग्री बिछाने तक के कार्य मे मापदंडों की निरंतर अनदेखी हो रही है।
          प्रधानमंत्री सड़क के जिम्मेदारों के समक्ष इस बात को रखा गया है लेकिन कोई सार्थक कार्यवाही नही हुई है। अभी हाल ही में प्रदेश में इस बात को उठाया गया और पीएम सड़क के प्रभारी जे एस सिकरवार को अवगत कराया गया है। सिकरवार का कहना था कि जीएम मऊगंज से संपर्क कर जानकारी चाही गयी है। दिनांक 21 एवं 22 जनवरी को "मेरी सड़क" नामक ऐप्प की मदद से प्रतिक्रिया प्रेषित की गई थी जिस पर कार्यवाही होना शेष है।
         मऊगंज प्रधानमंत्री सड़कों की स्थितियां सबसे खराब है, जिनमे से कई सड़कें जो पिछले वर्षों बनाई गई थीं वह उखड़ चुकी हैं। जो सड़कें वर्तमान में बनाई जा रही हैं उनमे मापदंडों की अनदेखी चल रही है जबकि देखा जाय तो समस्या को विभाग के संज्ञान में निरंतर रखा जाता रहा है। अब सवाल यह उठता है कि विभाग और संबंधित ठेकेदार को निरंतर सूचित किये जाने के वावजूद भी यदि कोई सार्थक कार्यवाही नही हो रही है तो संदेह विभाग की संलिप्तता पर ही जाता है।
   देखिए जब जीएम प्रधानमंत्री सड़क श्री निगम से इस संदर्भ में बात की गई तो जनका क्या कहना था।
    "जी हम स्वयं ही इस विषय मे आपसे बात करना चाह रहे थे, अच्छा हुआ आपका काल आ गया, देखिए मैं लौरी-गढ़ से कैथा वाली पीएम सड़क देखने गया था और ठेकेदार को अनियमितता में रिमाइंडर दिया है और साथ ही सही सामग्री उपयोग किये जाने के लिए कहा गया है । मैं आपके क्षेत्र में आऊंगा और फिर देखूंगा की कैसा काम चल रहा है। हैमर और कोर कटिंग टेस्ट के लिए कुछ पुलों का सैंपल भेजा है लेकिन आपके क्षेत्र की सड़क इसमे अभी शामिल नही है।" - जीएम, मऊगंज प्रधानमंत्री सड़क श्री निगम।
 संलग्न - कृपया लौरी-गढ़ से कैथा प्रधानमंत्री सड़क की वर्तमान तस्वीरें देखें जिनमे अमानक निर्माण सामग्री गलत अनुपात में उपयोग की जा रही है। इसी प्रकार कार्यवाही की डर से पुलों के ऊपर सफेद छुही चढ़ाई जा रही है।
    - शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक आर टी आई कार्यकर्ता रीवा मप्र। 7869992139





Friday, July 15, 2016

(रीवा/भोपाल) PMO- प्रधानमंत्री जी के नाम PG Portal में दर्ज प्रकरण जिसमे की तत्काल दस किमी हिनौती-कैथा-लौरी-गढ़ मार्ग (गंगेव ब्लाक) को प्रधानमंत्री सड़क से जोड़ने की माग की गयी है

नमस्कार भारत!

      जिला रीवा अंतर्गत गंगेव ब्लाक के लगभग दस किलोमीटर हिनौती से लौरी-गढ़ मार्ग को प्रधानमंत्री सड़क योजना अंतर्गत जोड़ने विषयक प्रपत्र दिनांक 31 मई सन २०१६ को दिया गया है. इस प्रकरण में प्रधानमंत्री जी से माग की गयी है की जन हित को ध्यान में रखते हुए इस रूट को तत्काल पक्का करने के प्रयास किये जाने चाहिए ...वैसे प्राप्त सूचना के अनुसार यह मार्ग अब सर्वे के बाद प्रक्रिया में आ चुका है और जल्द ही प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत जोड़ा जायगा ऐसी सूचना मिली है....

देखें मूल प्रकरण की कॉपी नीचे ......शिवानन्द द्विवेदी (सामाजिक कार्यकर्ता)


Status as on 15 Jul 2016
Registration Number:PMOPG/E/2016/0185179
Name Of Complainant:Shivanand Dwivedi
Date of Receipt:31 May 2016
Received by:Prime Ministers Office
Forwarded to:PS Panchayat Rural Dev
Officer name:us
Officer Designation:us
Contact Address:Mantralaya Bhopal
Grievance Description:Date: 31/05/2016, Place: REWA (MP). --------------- To, The Prime Minsiter of India, Gov of India, New Delhi. INDIA. --------------- Subject- Regarding delay in PMGSY road project of LAURI-KAITHA route (road) in Gangev-block REWA (MP) that to be constructed under Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana (PMGSY). -------------- Ref. – Application submitted to PMGSY AGM Mr. Gupta of Mauganj REWA (MP) singed by more than thousands of local villagers of the LAURI-KAITHA region with NOC and application provided by the SARPANCH of the LAURI and KAITHA panchayat. -------------- Sir/Madam, I would like to bring your kind attention to the problems of a public path of more than 100 years of old at HINAUTI-LAURI via KAITHA and ITEHA in Gangev block. The specific details of HINAUTI-LAURI route is as the following: 1) HINAUTI, LAURI, KAITHA are the three panchayat that falls under Police station GARH in REWA district of Madhya Pradesh. 2) HINAUTI-LAURI route is about 9 KM long. It comprises HINAUTI, KARAHIYA, BADOKHAR, SORAHWA, KAITHA, ITEHA, AKALSI, LAURI 1, LAURI 2 villages near to this route. 3) This HINAUTI-LAURI route is more than 100 years old and about 20,000 of the people resides nearby this route. Besides HINAUTI, LAURI and KAITHA panchayats, the other panchayats that falls under and near this route are: LOTANI, SEDAHA, BANS, PANDUA, DARH, DUVGAMA, KANKAR, MADARI PANGADI. 4) About 30 villages of all these panchayats are directly connected to this route HINAUTI-LAURI. 5) HINAUTI-LAURI is the shortest route to pass from HINAUTI area to LAURI/GARH and vice versa. 6) The present condition of this HINAUTI-LAURI route is very bad. This is a KACHCHA route at present and it’s very difficult even to pedestrian to pass in rainy season, what to say about vehicles then. 7) If somebody’s near and dear got into trouble such as illness or accidents, it would be extremely hard to enter any ambulance or 4 wheeler vehicles in rainy period. 8) Women suffering in pregnancy period are carried by hand in rainy season to the nearest hospital since NO way to enter any vehicles. 9) Students can NOT even drive bicycle in rainy season. They get much trouble to reach to the school in rainy season. There are only two higher secondary schools in HINAUTI and in GARH which are average 5 KM away from the villages. 10) Shri HANUMAN temple in Kaitha village is also a place for local devotees and many religious and cultural programs being organized timely in premises of Shri Hanuman temple in SHRAVAN months including JANMASTMANI, NAG PANCHAMI, RAM NAUMI, HOLI, DEEWALI, MAHA SHIVRATRI etc., but as the road is not in good condition it’s very difficult for the devotees and local people to gather in temple area, especially in rainy season it’s just disaster. 11) HINAUTI-LAURI route via KAITHA and ITEHA is the shortest path to connect to HINAUTI and GARH and considering this project fast means connecting thousands of the people from both sides to save their time and energy to travel. ------------------- Some Facts:- As mentioned in the subject line, a letter from SHRIMAD BHAGAVAD KATHA DHARMARTH SAMITI signed along with the thousands of local villagers residing nearby the HINAUTI-LAURI route has been already given to the General Manager Mr. DAVE in his REWA office and also to the AGM Mauganj Mr. Gupta along with the NOC letter from KAITHA and LAURI sarpanch. As enquired from AGM PMGSY Mr. Gupta is told that this application/letter has already been submitted to the HEAD OFFICE of PMGSY in New Delhi. Now my request, in public interest, to the Prime Minister of India is that to order the PMGSY dept of New Delhi to process fast this project of PMGSY project of HINAUTI-LAURI under GANGEV block in REWA district of Madhya Pradesh. ----------------- Sincerely SHIVANAND DWIVEDI (Social, Scientific, and RTI activist) Village KAITHA, Post AMILIYA, Police Station GARH, Tehsil MANGAWAN, District REWA, Madhya Pradesh. PIN – 486117 Mob. +917869992139
Date of Action:20 Jun 2016

Shivanand Dwivedi
(Social, Scientific, Environmental and RTI activists)
National Coordinator – Shrimad Bhagavad Katha Dharmarth Samiti
(an NGO). Work also as Human Rights Activist, Freelance Reporter, Environmental and Animal Rights Activists.
Educational Qualifications - M.Sc in Mathematics (IIT Bombay), PhD Research & TA (Mathematics) – 1. TU-Darmstadt GERMANY, 2. Ulm University GERMANY, 3. Milan University ITALY. Research visits in FRANCE, SPAIN, and PORTUGAL.
Mob.07869992139. Email:- Shivanand.Dwivedi@Gmail.com




Monday, July 11, 2016

प्रधानमंत्री भारत सरकार के नाम खुला पत्र - रीवा के किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, के.सी.सी. का सही लाभ मिले और फसलों को सही-सही फसलवार अधिसूचित किया जाये

Dated: 11/07/2016. Place: Rewa (MP)
--------------------------------------
प्रति,             
श्रीमान प्रधानमंत्री महोदय,
प्रधानमत्री कार्यालय, नई दिल्ली.
भारत सरकार, भारत.
--------------------------------

विषय – रीवा जिले की फसल बीमा के लाभ, किसान क्रेडिट कार्ड, एवं ओला-पाला-सूखा आदि मुआबजा वितारानार्थ अधिसूचित की जाने वाली फसलों का पुनर्सर्वेक्षण करने हेतु तथा यह सर्वेक्षण फसलवार छमाही आधारित करने हेतु.


सन्दर्भ १) अधिसूचित फसलों का छमाही आधारित फसलावर (रवी और खरीफ में अलग-अलग) सही सर्वे न होने से फसल बीमा एवं किसान क्रेडिट कार्ड का सही लाभ किसानों को नहीं मिलने सम्बन्धी २) ओला-पाला-सूखा आदि के मुआबजा वितरण में भी वास्तविक फसल अधिसूचित रिकॉर्ड में दर्ज न होने के कारण सही एवं न्यायपूर्ण मुआबजा कृषकों को न मिल पाने सम्बन्धी ३) सम्पूर्ण रीवा जिले में कौन सी फसल सिंचित है और कौन सी असिंचित इस विषय में भी पटवारी तहसीलदार द्वारा सही सूचना न लिखने के कारण के.सी.सी. एवं प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के सही लाभ कृषकों न मिलने सम्बन्धी.

महोदय,

     कृपया उपरोक्त विषयान्तर्गत एवं संदर्भित प्रकरणों का अवलोकन करने का कष्ट करें. उपरोक्त सभी बिन्दुओ में मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा और मांग करूंगा की रीवा जिले के किसानों के हित में यहाँ की सभी तहसीलों में छमाही फसल आधारित फसलों को अधिसूचित किया जाये और वहां पर वास्तविक लोकेशन पर पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार द्वारा जाकर देखा जाये की किस ग्राम में ज्यादातर कौन सी फसल की बुवाई हुई है और फिर वास्तविक परिश्थिति को देखकर ही फसलों को अधिसूचित किया जाये जिससे सभी कृषकों को उनकी बोई हुई फसलों का उचित फसल बीमा लाभ, ओला-पाला-सूखा मुआबजा तथा साथ ही साथ उनके के.सी.सी. में भी उचित और सही ऋण उपलब्ध करवाया जा सके.
       सम्पूर्ण रीवा जिले में कृषकों की फसल बीमा, ओला-पाला-सूखा और के.सी.सी. से सम्बंधित निम्नलिखित मूल समस्याएं देखी गयी हैं.

अधिसूचित फसलों का छमाही फसलावर (रवी और खरीफ में अलग अलग) सही सर्वे न होने से फसल बीमा एवं किसान क्रेडिट कार्ड (के.सी.सी.) का सही लाभ कृषकों को नहीं मिलने सम्बन्धी

 मनगवां तहसील में विशेषकर और सम्पूर्ण रीवा जिले में ज्यादातर ग्रामीण अंचल के किसानों को न तो किसान क्रेडिट कार्ड का ही सही लाभ मिल पा रहा है और न ही फसल बीमा का. जिला रीवा के मनगवां, गुढ़, त्योंथर, जवा, सिरमौर, मऊगंज आदि तहसीलों में लगभग प्रत्येक राजस्व क्षेत्र में किसानों की फसलों को पटवारियों, राजस्य निरीक्षकों, और तहसीलदारों द्वारा अपने तहसील कार्यालय में ही बैठ कर अधिसूचित कर लिया जाता है. अधिकतर पटवारी और राजस्व निरीक्षक अपने फील्ड में नहीं पंहुचते है. किसानों और ग्रामीणों को इन कर्मचारियों को दर-दर ढूँढना पड़ता है. उदहारण के लिए मनगवां तहसील, इटहा हल्का, और गढ़ सर्किल के अंतर्गत आने वाले ग्रामों में पिछले वर्ष 2014-2016 के मध्य सूखा अकाल की स्थिति थी. इस दौरान पटवारियों द्वारा सही फसल सर्वे नहीं किया गया जिससे किसानों को फसल बीमा का भी लाभ नहीं मिला है. जो फसल बीमा आयी है वह औसत से बहुत नीचे है और कुछ ही किसानों को मिली है. क्योंकि फसल का वास्तविक धरातल पर जाकर कभी भी सही निरीक्षण और सर्वे नहीं किया जाता है इसलिए जो फसल रिकॉर्ड और कागजों में आज से दस साल से पहले से दर्ज है वही आज भी दर्ज है. जबकि वास्तविकता यह है की प्रति वर्ष आज का किसान मौसम के हिसाब से अपने फसल का चयन करता है. जब ज्यादा बारिस की गुंजाईश होती है तो धान की खरीफ में ज्यादा बोवाई और जब कम बारिश या सूखे जैसी स्थिति रही है तो फसल का चुनाव किसान उस हिसाब से करते हैं और फसलों में सोयाबीन, अरहर, मूग, उरद आदि फसलें चुनते हैं जबकि गर्मियों में रवी के मौसम में ज्यादातर रीवा के किसान प्याज की फसल का उत्पादन करते हैं. जैसे उदहारण के तौर पर इसी वर्ष पूरे रीवा जिले में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मध्य भारत में सूखा-अकाल को देखते हुए किसानों ने प्याज की फसल की बहुतायत में खेती की. अब क्योंकि प्याज बहुतायत में हो गयी इस कारण प्याज़ को खरीदने वाला कोई ग्राहक नहीं मिला जिससे किसानों की टनों प्याज नष्ट हो गयी और उसे फ़ेंक दिया गया. यह एक सामान्य प्रश्न हो सकता है कि क्या भोपाल और दिल्ली में बैठी हुई सरकारें मात्र तमाशा देखने के लिए है? जब किसानों की ऐसी दुर्दशा हो रही है तो सरकार किस लिए बैठी है? क्या सरकारी राजस्व के कर्मचारी और अन्य कृषि और अन्य विभागों के क्षेत्रीय कर्मचारी/अधिकारी और विभिन्न अन्य संस्थान सो रहे होते हैं? सरकारों को तो यह भली भांति पता होना चाहिए की किस ग्राम में, किस तहसील में और किस जिले में किस समय कौन सी फसल किसानों मने बो रखी है, और उसकी क्या स्थिति है? मानाकि यदि किसानों ने बहुतायत में प्याज़ की बोवनी की है तो इस स्थिति में सरकारों को तो चाहिए की अपने तंत्र की मदद से पहले से ही यह आंकलन कर लें की जब यह प्याज अथवा कोई भी अन्य फसल का उत्पादन होगा तो किसानों का खरीददार कौन बनेगा? क्या साहूकार, व्यापारी वर्ग पहले से तैयार है इतनी प्याज़ अथवा कोई भी फसल को उचित और सही मूल्य पर लेने के लिए? व्यापारी इन फसलों का क्या मूल्य देगा? यदि व्यापारी कम मूल्य देगा तो सरकार को किसानों गरीबों और इन रात दिन ग्रामों में मेहनत करने वालों के लिए क्या तरीके ढूंढें जाने चाहिए जिससे किसानों के हितों की रक्षा हो सके? यदि इन प्रश्नों को गंभीरता से लिया जाये तो आम गरीब किसानों के हितों की रक्षा करने वाली कोई भी सरकार के लिए उत्तर ढूँढने में ज्यादा कठिनाई नहीं होनी चाहिए.
  समस्या इस बात की है कागजों में जो नतीजे और विवरण सरकारी कर्मचारियों एजेंसियों और विभागों द्वारा दिए जा रहे हैं वह असत्य और निराधार हैं. उनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है. यदि सम्पूर्ण रीवा जिले में रिकॉर्ड प्याज का उत्पादन हुआ तो इससे साफ़ जाहिर है की अकाल और सूखा में भी किसानों के पास सिंचाई की सुविधा तो थी तब ऐसा हुआ? यदि घर में सिंचाई न होती तो कैसे प्याज जैसी फसल जो की पानी की इतनी अधिक मांग करती है बची रहती, सब नष्ट हो न हो जाती? पर दुर्भाग्य देखिये देश का कि सम्पूर्ण रीवा जिले में आज के दिनांक में आप स्वतंत्र सर्वेक्षण करवा लें और आप पाएंगे की रिकॉर्ड और कागजों में दर्ज सिंचाई सम्बन्धी जानकारी आज से दश वस्ढ़ से भी अधिक पुरानी है. ऐसा क्यों है? ऐसा मात्र तहसीलदार, राजस्व निरीक्षकों और पटवारियों की निष्क्रियता और भ्रष्ट होने की वजह से है. सामान्य तौर पर यदि सरकारें चाहें तो बड़ी आसानी से पता लगा सकती हैं की विजली विभाग द्वारा किन किन कृषकों को सिंचाई के लिए दो हार्स पॉवर या उससे अधिक का कनेक्शन प्रत्येक वितरण केंद्र में दिया गया है. इस सूचना के आधार पर और तहसील कार्यालय से जानकारी लेकर यह बड़ी आसानी से अपडेट किया जा सकता है कि कौन कौन किसानों के कितने रकबे सिंचित है. कभी कभी ऐसा भी होता है की ग्रामों में एक किसान के पास यदि सिच्न्हाई सुविधा है तो अन्य भी कुछ आसपास के किसान इसका कुछ किराया देकर लाभ ले लिया करते हैं. पर यह सिंचित अथवा असिंचित होने का आधार नहीं बनाया जा सकता है. क्योंकि वही फसल और रकबे सिंचित की श्रेणी में आने चाहिए जीने पास या तो तालाब की सुविधा है, सिच्न्हाई के लिए मोटर पंप का कनेक्शन है अथवा आसपास ग्रामों में नहर की सुविधा है. ऐसे ही कृषकों को सिंचित की श्रेणी में रखा जाना चाहिए. और यह काम ज्यादा कठिन नहीं है. मात्र पंचायती क्षेत्र के पटवारी, ग्राम सेवक, समिति सेवक, और पंचायत सचिव के माध्यम से यह जानकारी पूर्ण कर फीड की जा सकती है. पर रीवा जिले के किसों का दुर्भाग्य ही है की उनके खून पसीने की कमाई मौज से खाने वाले यह सरकारी कर्मचारी किसानों, मजदूरों और गरीबों के हित में कोई कार्य नहीं कर सकते. पर प्रश्न यह भी उठता है की क्या एस.डी.एम., कलेक्टर, और अन्य सम्बंधित जिला और प्रदेश स्तर के अधिकारी सो रहे होते हैं की इतनी सी.एफ.टी, ग्राम संसद, ग्रामोदय से भारतोदय, आदि पता नहीं कितने कार्यक्रम हुए पर हुआ कहीं कुछ नहीं. किसानों ग्रामीणों की स्थितियां यथावत बरक़रार हैं.

सम्पूर्ण मनगवां तहसील में मात्र 15 प्रतिशत से भी कम सिंचित की श्रेणी में –

यदि हम बात करें अपने क्षेत्र की मनगवां तहसील की तो पाएंगे की यहाँ अधिकतम पंद्रह प्रतिशत भी किसानों को सिंचित की श्रेणी में नहीं रखा गया है. सूखा क्षेत्रों की बात तो अलग है मनगवां और गंगेव के मध्य से जो बाणसागर नहर निकली है उसके भी किनारों के कृषकों को अशिंचित दर्शाया गया है. यह कैसे हो सकता है की जहाँ से नहर गुजरे वह भूमि असिंचित हो? क्या नहर में पिछले ४-५ सालों से पानी नहीं छोड़ा गया? अथवा बाँध ही सूखा था? इसी प्रकार अन्य भी क्षेत्र जहाँ नहर नहीं भी है जैसे की गढ़, लालगांव सर्किल और इसी प्रकार चकघाट सर्किल अंतर्गत जमुई कला हल्का तथा आसपास के अन्य पटवारी हल्कों में भी यही स्थिति है. हमारी यही मांग है की तत्काल ऐसे सभी कृषकों को सिंचित की श्रेणी में रखा जाये जिनके पास मोटर कनेक्शन, तालाब, आसपास नहर आदि की सिंचाई सुविधाएँ है. इससे सबसे बड़ा फायदा तो के.सी.सी. में होगा जहाँ इनके ऋण लेने की सीमा में बढ़ोत्तरी होगी और साथ ही सही जानकारी सरकार के पास तक पंहुचेगी जिससे योजनायें बनाने और उनके क्रियान्वयन में भी मदद मिल सके. शायद एक स्थान हो सकता है जहाँ किसानों को नुक्सान होगा और वह है फसल बीमा की राशि मिलने में. क्योंकि यदि कमतर सिंचित क्षेत्र भी पूर्ण सिंचित चिन्हित हो गए तब किसानो को फसल बीमा का शायद उतना अधिक लाभ न मिल पाए. पर यह भी एक गलत ही धरना है. क्योंकि आज जो भी सर्वे होगा और जो भी फसल बीमा सम्बंधित जानकारी संप्रेषित की जाएगी वह जी.पी.एस. रीडिंग और फोटोग्राफ्स आदि लेकर की जाएगी. अतः ऐसी स्थति में यदि योजनायों का क्रियान्वयन सही तरीके से हुआ तो संदेह की कम स्थति रहेगी. 

जब वास्तविक कृषकों के नाम ही शूखा सर्वे सूची में नहीं जोड़े गए तब फसलों को छमाही और रवी-खरीफ के आधार पर ग्रामवार/कृषकवार अधिसूचित कैसे किया जायेगा?

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है की फसलों को अधिसूचित किस प्रकार किया जा रहा है? क्या तहसील कार्यालय में बैठकर फसलों को अधिसूचित किया जा सकता है? कम से कम रीवा में तो ऐसा ही चल रहा है. आप प्रत्येक हल्के में जाएँ और देखें कि उस हल्के में किसानों ने पिछले दो सालों में कौन-कौन सी फसलों की बुवाई की है. यह आंकड़ा मिलने पर आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे कि फिर तहसील कार्यालय और पटवारी कानूनगो के रिकॉर्ड में अधिसूचित फसलें पिछले दशक की क्यों दर्शाई जा रही हैं? अभी हाल ही में पिछले वर्ष २०१४-१६ में पड़े भीषण सूखे में हमने तीनों तहसीलों मनगवां, त्योथर और सिरमौर का वाकया देखा. मैं स्वयं प्रत्यक्ष उदहारण हूँ की दर्ज़नों सी.एम. हेल्पलाइन में शिकायतें की गंयीं (शिकायत क्र. 1403875, 1404035, 1404296, 1405821, 1405974, 1409259, 1409286, 1409324, 1409692, 1471423, 1450846, 1516382, 1516433, 1579576, 1597835, 1625395 आदि) और तहसीलदार एस.डी.एम. को लिखित भी दिया गया कि हिनौती हल्का 39, जमुई कला हल्का 31 के जिन किसानों का सूखा सर्वे में नाम छूट गया है उन किसानों के नाम जोड़े जांयें. परन्तु पटवारी, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार, एस.डी.एम, से लेकर कलेक्टर रीवा तक बात रखी गयी पर कोई समाधान न निकला. कलेक्टर रीवा श्री राहुल जैन का कहना था की जब प्रथम सर्वे सूची वनकर आ जाएगी और पंचायतों में नोटिस बोर्ड में चस्पा होगी तो दावा आपत्ति के अंतर्गत नाम जोड़ने के लिए आवेदन दें. सबसे बड़ी बात तो यह की सूची कब आयी और कब नोटिस बोर्ड में लगी इसकी भी कोई जानकारी कृषकों को नहीं हुई, और जिनको जानकारी हुई उन्होंने जब दावा आपत्ति के अंतर्गत आवेदन दिया तो उनके नाम भी पटवारी तहसीलदार द्वारा यह कहकर नहीं जोड़े गए की अब जो होना था वह हो गया, सरकार के पास फण्ड नहीं है और अब और अधिक नाम नहीं जोड़े जांयेंगे. सबसे बड़ी बात तो यह है की नाम ही कब जोड़े गए थे तो और अधिक नाम नहीं जोड़े जायेंगे? कब सर्वे हुआ और किन कृषकों को सर्वे के दौरान उनके खेत में बुलाया गया क्या इसकी जानकारी पटवारी तहसीलदार दे सकते हैं? क्या उन कृषकों के हस्ताक्षर, फोटोग्राफ्स या विडियो तहसीलदार कलेक्टर के पास उपलब्ध हैं जब सर्वे हो रहा था? सबसे दुर्भाग्य पूर्ण रवैया सिरमौर तहसीलदार मुनीन्द्र तिवारी और त्योंथर तहसीलदार देवांगन का था. सैकड़ो में से मात्र दश-बीस के नाम जोड़े गए शेष के नाम छोंड दिए गए. वास्तव में हुआ यह की इन हलकों में पटवारी ग्रामसेवक सर्वे करने ही नहीं आये. हिनौती हल्का 39 लालगांव सर्किल एवं सिरमौर तहसील के अंतर्गत आता है वहां का पटवारी प्रमोद पाण्डेय है. यह व्यक्ति प्रमोद पाण्डेय चौबीस घंटों में अठारह घंटे बराबर शराब के नशे में धुत्त रहता है. यह कभी भी हल्का में नहीं रहता. कई बार इसकी शिकायतें दर्ज़नों लोगों ने की पर कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं हुई. सिरमौर का तहसीलदार मुनीन्द्र तिवारी कई बार स्वयं भी इसका पक्ष लिया. मुनिद्र तिवारी के समक्ष ही पटवारी प्रमोद पाण्डेय ने चार-पांच अन्य हिनौती के हितग्राही ब्रिजेश उपाध्याय, अखिलेश उपाध्याय, और दिनेश सिंह निवासी लोटनी और मेरी उपस्थिति में सभी से बदतमीजी सिरमौर तहसील कार्यालय के अन्दर किया. परन्तु इस तहसीलदार मुनीन्द्र तिवारी ने न ही कोई इस पटवारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की और न ही कोई दंडात्मक कार्यवाही की अनुशंसा. इस बात को बाद में मध्य प्रदेश शासन की पूरी तरह से फ्लॉप हो चुकी सी.एम. हेल्पलाइन (डायल 181) में भी रखा गया था. और उसमे भी मात्र प्रथम लेवल से चौथे लेवल तक का ही खेल चलता रहा और कुछ नहीं हुआ.   
 इसी प्रकार त्योंथर तहसील जिला रीवा अंतर्गत चाकघाट सर्किल में आने वाले जमुई कला 31 के पटवारी कमलेश पाण्डेय का भी यही हाल रहा. कमलेश पाण्डेय ने जमुई हल्का 31 में सही सर्वे नहीं किया. प्रमोद पाण्डेय की तरह कमलेश पाण्डेय ने भी हितग्राहियों से पैसे रुपये लेकर बिना नुकसानी और बिना कृषि योग्य जमीन का ही मुआबजा बना दिया और जिन हितग्राहियों जैसे करहिया के दर्ज़नों लोनिया लोगों का जिनका की वास्तविक नुक्सान हुआ था और इसी प्रकार कैथा निवासी कुछ केवट समुदाय और चौबे, पाण्डेय, द्विवेदी लोगों की जो जमीन करहिया ग्राम अंतर्गत थी उनमे से भारी नुकसान के वावजूद भी कोई मुआबजा नहीं बनाया गया. सभी लिखित शिकायतों की पावती और सी.एम. हेल्पलाइन की शिकायतें इस बात को प्रत्यक्ष बयां करती हैं की किस तरह से तहसील कार्यालयों में पटवारी, कानूनगो, नायब तहसीलदार और तहसीलदार फर्जीवाडा कर रहे हैं काले धंधे में संलिप्त हैं और इसको सुनने देखने वाला कोई मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री नहीं है. ऐसे पटवारी, तहसीलदारों को तत्काल प्रभाव के साथ निलंबित कर देना चाहिए और जुर्माने के तौर पर पांच-पांच साल की इनकी तनख्वाह काट लेनी चाहिए और इस कटी तनख्वाह को उस तहसील और पटवारी हल्के क्षेत्र के गरीब किसानों को बरावर-बराबर वांट देना चाहिए. तब जाकर सही न्याय कहलायेगा.

हम चर्चा कर रहे थे किसानों की फसलवार होने वाले सर्वे की. तो हम देख सकते हैं की कभी-कभी पड़ने वाले सूखे-अकाल जैसी स्थति में यदि पटवारी तहसीलदारों के यह रवैये हैं कि किसानों की फसलों का सही मुआबजा तक नहीं बनाया जा रहा है तो भला ऐसे पटवारी तहसीलदार क्या ख़ाक फसलवार फसलों को अधिसूचित करेंगे? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है. और जब तक फसलों को सही तरीके से अधिसूचित नहीं किया जाता और कौन सी भूमि सिंचित है और कौन सी असिंचित इसकी सही-सही जानकारी नहीं भरी जाती तब तक चाहे प्रधानमंत्री फसल बीमा हो या राष्ट्रपति फसल बीमा इनमे से किसी भी बीमा योजना अथवा के.सी.सी. का कोई सही लाभ वास्तविक हितग्राही किसानों को भारतीय भ्रष्ट्राचार युक्त अव्यवस्था में नहीं मिल सकता. यह बात अब लगभग निश्चित हो चुकी है. सब कुछ मात्र कागजों पर ही रह जायेगा. हाँ जिन किसानों या हितग्राहियों के पास पहले से घूस-रिश्वत के रूप में इन चोरों को खिलाने के लिए पैसे हैं तो जरूर ऐसे लोगों के नाम बिना किसी जमीन जायदाद के ही मुआबजा भी बन जायेगा और उनके मन मुताबिक के.सी.सी और अन्य लाभ भी प्राप्त हो जायेंगे जैसा की हर जगह चल रहा है. अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्या इस पूरे सिस्टम में सीधे-सीधे दिखने वाले इस घोटाले को देखने वाला कोई नहीं बचा? कलेक्टर, कमिश्नर यह सब अधिकारी जिले और संभाग में क्या करते हैं? क्यों ये सीधे-सीधे दिखने वाली इन समस्याओं को ध्यान नहीं देते? कलेक्टर, एस.डी.एम आदि अपने सी.एफ.टी. और ग्रामोदय से भारतोदय, ग्राम संसद आदि यात्राओं और मीटिंग में क्या करने जाते हैं? क्या यह ग्रामीण और कृषकों की समस्याएँ देखने सुनने नहीं जाते? क्या उस पंचायत और ग्राम में जाकर यह अधिकारी सीधे ग्राम बस्ती के लोगों के बीच में जाकर संवाद स्थापित नहीं कर सकते, उनकी समस्याओं से रूबरू नहीं होते?
सम्पूर्ण मनगवां तहसील जिला रीवा के ग्रामीण क्षेत्रों की सिंचित असिंचित भूमि की जानकारी में पिछले दश वर्षों में कोई अपडेट नहीं –

 किसानों की कौन सी भूमि सिंचित है और कौन सी असिंचित इसका फसल बीमा और के.सी.सी. के लाभ में सीधा सीधा प्रभाव पड़ता है. क्योंकि जैसा पहले भी चर्चा मेंन आया कि कृषकों के के.सी.सी. के थ्रेशहोल्ड में सिंचित भूमि का सीधे प्रभाव पड़ता है. जिन कृषकों की भूमि सिंचित है उनको असिंचित वाले कृषकों की तुलना में ज्यादा ऋण उपलब्ध हो पाता है. साथ ही यदि उस भूमि पर सही-सही फसलों को अधिसूचित किया गया है अर्थात यदि महगी फसलें बोई गयी ऐसा पटवारी द्वारा बताया जाता है तो उन कृषकों को तीन-चार गुना ज्यादा ऋण मिल सकता है. जैसे उदहारण के लिए किसी कृषक ने मात्र धान की फसल एक एकड़ के रकबे में बोई है और उतने ही रकबे में किसी अन्य कृषक ने सोयाबीन अथवा मसाले की फसल बोई है तो सोयाबीन अथवा मसाले की फसल वाले कृषक को मात्र धान बोने वाले कृषक की तुलना में के.सी.सी. में ज्यादा ऋण मिलता है. परन्तु पटवारी और तहसीलदार यह सब जानकारी अपडेट नहीं करते जिससे किसानों को वास्तविक और सही लाभ नहीं मिल पा रहा है.

समस्याओं के समाधान की दिशा में कठोर कदम उठाने होंगे, ईमानदार और लोकहित चिन्तक कर्मचारियों अधिकारियों की आवश्यकता –

       शासन प्रशासन को उपरोक्त सभी समस्याओं का समाधान निकालना होगा. और यदि ये सरकारें वास्तव में गरीब, किसान और मज्दूरों का भला चाहती हैं तो बड़े कठोर कदम उठाने होंगे. बिना दंड दिए प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार नहीं हो सकता, यह भी एक अकाट्य सत्य है. जो दोषी है उसे दंड मिलना ही चाहिए. जब ऐसा होगा तो सभी अधिकारियों कर्मचारियों की आँखें खुल जाएँगी. तब जाकर इनको समझ में आयेगा की जनता के एक-एक पैसे जो टैक्स के रूप में तनख्वाह में इन्हें दिए जा रहे हैं वह कुर्सी तोड़ने के लिए नहीं है. उसके एवज़ में इन निकम्मों को काम करना पड़ेगा नहीं तो नौकरी छोंड दें. कोई भी लोकतान्त्रिक सरकारें जनता की बनाई जनता के लिए हैं और यह सभी सरकारी कर्मचारी जनता के नौकर हैं जनता के अधिकारी नहीं. यह जनता का पैसा खा रहे हैं तो इनको जनता के लिए कार्य करना पड़ेगा.
-----------------
SHIVANAND DWIVEDI
(Social, Scientific, and RTI activist)
Village KAITHA, Post  AMILIYA,
Police Station GARH, Tehsil  MANGAWAN,
District REWA, Madhya Pradesh. PIN – 486117
Mob. +917869992139