Showing posts with label 7869992139. Show all posts
Showing posts with label 7869992139. Show all posts

Wednesday, January 1, 2020

(MP News) जैविक खेती से लौटेगा गोवंशों का सम्मान - पद्मश्री बाबूलाल दाहिया (पद्मश्री बाबूलाल दाहिया द्वारा प्रश्नोत्तरी के रूप में लिखे गए जैविक खेती पर लेख का अंश)

दिनांक 01 जनवरी 2020, स्थान - रीवा मप्र

   बाबूलाल दाहिया आज एक ऐसा नाम है जिसे पूरा देश भलीभांति जानता है। 
   बाबूलाल दाहिया को उनके कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए और जैविक खेती के प्रोत्साहन और रिसर्च के लिए पद्मश्री अवार्ड से नवाजा जा चुका है। बाबूलाल दाहिया समय समय पर अपने लेख लिखते और प्रकाशित करते रहते हैं, स्टेज पर दाहिया जी को आमंत्रित किया जाता है जहाँ पर उनके कार्यक्रम होते हैं। 

     अभी हाल ही में उन्होंने जैविक खेती और किसानों गोवंसो की स्थिति पर प्रश्नोत्तरी के रूप में एक लेख लिखा है जिसे यहाँ पर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। 

प्रश्न न  1-  क्या जैविक खेती में कमाई के सुनहले  अवसर उपलब्ध है?

  उत्तर 1 - जैविक खेती में कमाई के अवसर नही है। वह मात्र आजीविका का साधन हो सकता है। क्यो कि उसका मूल्य जहर युक्त अनाज से मात्र दूना तिगुना हो सकता है। किंतु अनाज का मूल्य पहले से ही अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के मुकाबले 10 गुना घटा हुआ है।
   आइये हम 70 के दशक से आज की तुलना करते है जब हरित क्रांति शुरू हुई थी।
   अन्तरराष्ट्रीय मूल्य का मापदण्ड सोना है जो सत्तर के दशक में 200 रुपये का दश ग्राम था। 
       उन दिनों गाँव के एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी को बेतन भी  200 रुपये ही मिलता था। यानी कि उसे 10 ग्राम सोना प्रतिमाह पहले भी मिलता था और आज यदि 40 हजार रुपये उसका बेतन है तो आज भी 10 ग्राम सोना उसे  मिल रहा है।
     किन्तु किसान का कितना घट गया देखे?

    मेरे बड़े भाई ने 70 के दशक में अपना 5 मन यानी 2 क्विंटल चावल बेचा और एक तोला यानी की लगभग दश ग्राम सोना खरीद लिया। किन्तु यदि  आज मैं 10 ग्राम सोना खरीदना चाहू तो मुझे अपना 20 क्विंटल चावल और 25 क्विंटल गेंहू बेचना पड़े गा। यानी कि अनाज का रेट 10 गुना घट गया। जिसका आशय यह हुआ कि 70 के दशक के 1 रुपए की क्रय शक्ति घट कर 10 पैसे रह गई।
हरित क्रांति आने पर उत्पादन तिगुना बढ़ गया यानी 10 पैसा 30 पैसा हो गया ।
       पर किसान 70 के दशक के मुकाबले फिर भी 70 पैसे प्रति रुपया घाटे में है।
 अगर उसे जैविक खेती में दूना मूल्य मिला तो उसका 10 पैसा 20 पैसे के बराबर होगा और तिगुना हो गया तो 30 पैसे के बराबर ही। इससे अधिक लाभ आम किसान नही पाएगा।
       हाँ यह लाभ अवश्य होगा कि वह कर्ज के बोझ से मुक्त रहेगा। बाकी जो जैविक खेती को लाभ का धंधा बता रहे है वह भी वे ब्यापारी टाइप के लोग हैै जो अब रासायनिक खाद के स्थान पर अपना जैविक खाद बाजार में उतार किसानों को लूटना चाहते है।

हाँ यदि किसान के अनाज को जैविक प्रमाणीकरण के बाद विदेश भेजा जाए तो अवश्य उसमे अच्छा मूल्य मिलता है।
किन्तु सर्टीफिकेशन में इतना झाम है कि आम किसान उसे कर ही नही सकता।

पश्न न 2 - आप किस तरह जैविक खेती से जुड़े है।


उत्तर क्रमांक 2   - खेती हमारे परिवार का पैतृक धंधा था जो कई पीढ़ियो से जुड़ा था। और किसान बालक होने के नाते बहुत सारा खेती के जुताई कटाई गहाई ,मड़ाई, का ज्ञान उन दिनों किसान बालको को पढ़ाई के समय भी करने पड़ते थे इसलिए सारी जानकारी  यू ही हो जाती है।
       क्योंकि पचास साठ के दशक में दशहरे से दीपावली तक उन दिनों बकायदे फसली छुट्टी होती थी तब हम धान की गहाई ज्वार की तकाई आदि कार्यो में परिवार की मदद करते थे।

   जैविक खेती विरासत में मिली, जहरीली हुई हरित क्रांति के बाद

  रही बात जैविक की तो जो खेती हमे बिरासत में मिली वह पहले पूर्णतः जैविक ही थी। क्योकि जहरीली तो वह हरित क्रांति आने के बाद हुई।
      उन दिनों  गाय बैल हमारे परिवार के अंग थे। उनसे हमारा मूक समझौता सा था कि हम गायो को घास खिलाते वे हमें दूध देती। हमारे घास से वे तंदुरस्त होती उनके दूध से हम।
  गाय ने बछड़ा जना हमने उसे हल में चलाया। किन्तु जो उत्पादन हुआ उसमे अनाज हमारा और भूसा पुआल चुनी चोकर गाय बैल का।
   गाय बैल ने गोबर किया किसान ने कम्पोष्ट बनाया और गाड़ी में भरा जिसे खेत तक बैल ही खींच कर ले गए किन्तु अपने अपने हिस्से की वस्तु पाने के बराबर के अधिकारी।
और जीवन पर्यंत किसान से सेवा लेने के हकदार।
    किन्तु यह जैविक अजैविक की बात तो 1965-66 के आस पास तब शुरू हुई जब देश मे हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ।
     पर उसका कारण यह था कि आजादी के बाद हमारी स्वास्थ सेवाए बढ़ गई जिससे हैजा चेचक प्लेग जैसी तमाम जानलेवा बीमारी समाप्त हो गई उसके कारण जनसंख्या बढ़ी। पर उस अनुपात में हमारा अनाज का उत्पादन नही बढ़ा। फलस्वरूप नारा लगने लगा कि

रोटी कपड़ा और मकान।
मांग रहा है हिंदुस्तान।।

उसे तत्कालीन सरकार ने चुनौती के रूप में लिया और देश मे हरित क्रांति आई। किन्तु वह पहले तीन चीजो पर ही टिकी थी।
1 - उन्नत किस्म का बीज।
2-  रसायनिक उर्वरक।
3-  सिचाई के साधन।
 और फिर वही से  जैविक अजैविक खेती का विभाजन हुआ।

पश्न न 3 - किसानों को क्या सुझाव देना चाहते है ?

उत्तर 3 -  किसानों को मैं यह कहना चाहता हूं कि आप जितना  बाहरी बीज मंगाते जाएंगे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के रसायनिक कीटनासी नीदानासी आदि के चक्कर मे पड़ते जाएंगे। देखने मे आप का खेत खूब हरा भरा दिखेगा उपज भी होगी पर वह आप के लिए नही सेठो के लिए किसान को उसमे उतना ही मिलेगा जैसे भैस 10-12 लीटर दूध देती है किंतु उसके बच्चे के हिस्से में एक लीटर भी नही आता।
    इसलिए वह यहां के परम्परागत किस्मो को अपनाए जो यहां की परिस्थितिकी में हजारों साल से रचे बसे है।

  जैविक खेती से लौटेगा गोमाता का सम्मान

  वे कम वर्षा में पक जाते है, ओस में पक जाते है। आगे पीछे के बोये साथ साथ पक जाते है।इसलिये वर्तमान आसन्न संकट जलवायु परिवर्तन और भूमण्डलीय ऊष्मता रोकने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वे रोग और बीमारी सहन करने में सक्षम तना बड़ा होने के कारण घास उन्हें नही दबा पाती अस्तु नींदानाशक कीटनाशक डालने की जरूरत नही पड़ती। उत्पादन कम होगा किन्तु किसान कर्ज के बोझ से मुक्त रहेगा।
   साथ ही घर से बाहर की गई गाय का महत्व भी बढ़ेगा।
  साभार - बाबूलाल दाहिया, पद्मश्री की कलम से। विशेष आग्रह पर प्राप्त।

संलग्न - बाबूलाल दाहिया जी की फ़ोटो आदि।

------------
शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Wednesday, December 18, 2019

एक्टिविज्म पेशा या जुनून? समस्या है सरकारी पारदर्शिता की || यदि सरकार होगी पारदर्शी और जबाबदेह तो एक्टिविस्टों का कार्य भी होगा सीमित

दिनांक 18 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

   लोकतांत्रिक परंपरा में वैचारिक अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आवश्यक अंग होता है जिसके चलते हम अपनी बातों को समाज और शासन प्रशासन के समक्ष रखकर उसके विषय मे निष्कर्ष निकालते हैं। 

आरटीआई एक्टिविस्ट कौन हैं? प्रश्न खड़ा करके देश की अपेक्स कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने यद्यपि इस विषय पर नयी चर्चा प्रारम्भ कर दिया है लेकिन इसके बाबजूद भी सही मायनों में आरटीआई एक्टिविस्ट अथवा सिविल एक्टिविस्ट होना अपने आप मे काफी चुनौतीपूर्ण और जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है। माननीय जजों ने यद्यपि प्रश्न किया कि क्या यह कोई पेशा हो सकता है? निश्चित ही यह पेमेंट प्राप्त करने वाला पेशा भले ही न हो जिसमें की सरकार अथवा कोई कंपनी/संस्था  किसी को काम के बदले पैसा पे करे लेकिन समाज के उद्धार, भ्रष्टाचार के निरोधन, पारदर्शिता लाने में मदद करने वाले जुनूनी लोगों के लिए यह किसी बिना पेमेंट वाले पेशे से बिल्कुल ही कम नहीं।

  एक्टिविस्ट जुनूनी होते हैं

    एक्टिविस्ट चाहे जो भी हों ज्यादातर जुनूनी होते हैं। एक्टिविस्टों को उस कार्य को पूरा करने का जुनून होता है। शायद माननीय लोग इसे न समझ पाएं क्योंकि उनकी कानून की किताबों में जुनून की परिभाषा हो अथवा न हो। 
     एक्टिविस्ट का कार्य असंभव को संभव करने जैसा होता है। जिसे कल तक समाज यह कहता है कि अरे छोड़ो यह तो हो ही नही सकता, समाज की नजरों में उसी कभी न हो सकने वाले कार्य को ही एक्टिविस्ट और जुनूनी सम्भव कर दिखाते हैं और फिर आने वाले भविष्य में वही असंभव सम्भव होकर नया नियम अथवा समाज का आधार बन जाता है। ऐसा ज्यादातर देखा गया है।

   आरटीआई एक्टिविस्ट होना चुनौतीपूर्ण

   सभी प्रकार के एक्टिविस्ट की तरह आरटीआई एक्टिविस्ट होना भी काफी चुनौतीपूर्ण है। अपने जेब और मेहनत के पैसे से आरटीआई फ़ाइल करना, जबाब न मिलने पर उसकी प्रथम और द्वितीय अपील करना, शासन प्रशासन के साथ माफियाओं और समाज से लड़ना यह सब चुनौतीपूर्ण कार्य आरटीआई एक्टिविस्ट ही करते हैं।
   माननीयों ने तो कह दिया कि आरटीआई एक्टिविस्ट ब्लैकमेलिंग के माध्यम हैं अथवा आरटीआई एक्टिविस्ट लिखना आपराधिक धमकी जैसा है पर आरटीआई एक्टिविस्ट माननीयों से अनुरोध करेंगे कि आप थोड़ा आरटीआई के लिए कार्य करने वाले एक्टिविस्टों की स्थिति और उनकी स्थिति पर भी गौर करें कि उन्हें कौन सी सुरक्षा और कौन सी तनख्वाह मिलती है। 

   एक्टिविस्टों का पारदर्शिता लाने में अभूतपूर्व सहयोग

    शायद सरकार अथवा न्यायपालिका यदि अकेले ही देश, तंत्र और समाज मे पारदर्शिता ला पाती तो चौथे स्तंभ मीडिया की जरूरत ही न पड़ती। ठीक वैसे ही एक्टिविस्ट भी वही रोल आज समाज मे अदा कर रहे हैं। मीडिया की ही तरह अपनी जान जोखिम में डालकर समाज के उत्थान के लिए सतत प्रयत्नशील हैं। सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, सिविल राइट्स एक्टिविस्ट, एनिमल राइट्स वर्कर सभी का कहीं न कहीं एक ही उद्देश्य होता है कि कैसे वह अपने दायित्यों को पूर्ण करते हुए समाज के बेहतरी सासन प्रशासन में जबाबदेही और पारदर्शिता के लिए कार्य करते रहें।

   उच्चशिक्षित होते हैं बहुतायत एक्टिविस्ट 

   ज्यादातर एक्टिविस्ट अंगूठा और झोलाछाप न होकर काफी शिक्षित और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझने वाले होते हैं। कुछ तो हाई लेवल की शिक्षा दीक्षा प्राप्तकर जब सरकारी कामकाज और सामाजिक ढांचों में व्याप्त बुराइयों को देखते हैं तो वह समाज के लिए कुछ न कुछ अच्छा ठानकर कार्य करते हैं। कोई सामाजिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार देखकर सामाजिक कार्यकर्ता बन जाता है तो कोई बेजुबानों की दुर्दशा देख एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट बन जाता है। तो कोई प्रशासनिक और सरकारी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार को देख आरटीआई के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर समाज के समक्ष भ्रष्टाचार उजागर करने में मदद करता है। 

   ऐसे महत्वपूर्ण और त्याग वाले कार्य करने के लिए कोई दमदार त्यागी व्यक्ति ही चाहिए होता है। यह न तो सबके बलबूते की बात है और न ही इसे हर कोई समझ ही सकता है। क्योंकि यदि कोई समझ पाता तो उच्चतम न्यायिक पदों पर बैठे हुए माननीय कभी भी एक जनरलाइज़्ड टिप्पणी नहीं करते। काश माननीय समझ पाते कि कितना मुश्किल है एक्टिविस्ट होना। कभी एक्टिविस्टों की जिंदगी में भी झांकने का प्रयाश होता तो शायद एक्टिविस्टों को धमकी देने वाला न समझा जाता।

   एक्टिविस्ट के नाम का दुरुपयोग संभव
 
    फिर ऐसा भी नही की सभी एक्टिविस्ट सामाजिक चिंतन वाले और अपनी जिम्मेदारियों को समझने वाले ही हों। यह बिल्कुल माना जा सकता है कि कई लोग आरटीआई एक्टिविस्टों का चोला पहनकर कुछ अनैतिक भी कर रहे हों पर उसके लिए शासन प्रशासन को देखने की जरूरत है। यदि ऐसे लोग हों तो उन विशेष लोगों के ऊपर यथोचित कार्यवाही की जा सकती है लेकिन इसके बदले में यह कह देना की सभी आरटीआई एक्टिविस्ट यदि अपने नाम के आगे टाइटल लगाएं वह अपराध है तो यह बात इस लोकतंत्र के लिए काफी दुःखद होगी। 

   सरकार पारदर्शिता लाएं, एक्टिविस्ट अपना काम छोड़ देंगे

    शासन प्रशासन से एक ही माग है की वह अपने सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाये। पारदर्शिता इतनी की स्वच्छ जल जैसे जिसमे कुछ भी देखना हो, एक गिरा हुआ तिनका अथवा पत्थर का छोटा टुकड़ा तो वह स्पष्ट और दूर से ही दिख जाए तब मानेंगे की अब समाज मे एक्टिविस्टों की जरूरत नही है और फिर माननीयों की मंशा के अनुरूप एक्टिविस्ट लोग अपने कार्य से सन्यास ले सकेंगे।
    पर जब तक समाज और सरकार के कार्यों में स्वयं ही प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है और सरकार का कार्य पानी जितना स्वच्छ नहीं होता तब तक अपनी संस्कृति, अपने अधिकारों, अपने आपको अस्तित्व में रखने के लिए, हमारे स्वयं के समाज मे जुड़े हुए अपने लोगों के साथ उनके दुःखों में साथ साथ खड़ा रहने के लिए उस समाज के कुछ अग्रणी लोगों की जरूरत पड़ती ही रहेगी अतः यह इस तंत्र की महती आवश्यकता ही है कि हम न चाहते हुए भी मजबूरन हमे एक्टिविस्ट बनना पड़ रहा है वरना किसे पड़ी थी एक्टिविस्ट बनने की। क्योंकि किसे नही अच्छी लगती शांतिप्रिय और बिना चकल्लस की जिंदगी।
   
    एक्टिविस्टों की समस्या पर भी गौर करें माननीय कोर्ट

    यह बात तो स्वयं माननीयों ने ही कह दिया है कि एक्टिविस्ट होना कोई पेशा नही है। पर क्या गैरसरकारी एक्टिविस्टों को सामान्य नागरिक के बराबर तो अधिकार कम से कम मिलें ही। आज इतने बड़े सिस्टम से, सरकार से, दंड से नौकरशाहों को कोई भय नहीं लग रहा है तो भला बिना विशेष अधिकार प्राप्त आरटीआई एक्टिविस्टों से आज शासन प्रशासन भला क्यों इतना भयभीत होने लगे? भय उसे लगता है जिसमे कोई कमी हो, गलती हो। अतः बेहतर यह होगा कि पूरे सिस्टम और सरकार को कई मोर्चों पर ज्यादा बेहतर और पारदर्शी बनाया जाए जिससे ऐसी कम स्थिति निर्मित हो जिसमें आरटीआई लगाकर जानकारी निकालना पड़े। सरकारों की स्वयं ही ज्यादा से ज्यादा ऐसी व्यवस्था हो जाएं कि अधिकतर कार्य पारदर्शी रहें जिससे न तो आम जनता परेशान हो और न ही शासन प्रशासन पर बैठे अधिकारी कर्मचारी।

-------------------------------
शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587

Saturday, December 14, 2019

मुझसे मिलिए मैं हूँ टिकुरी-खरहना पीडब्ल्यूडी सड़क (मामला जिले की बहुचर्चित दो जनपदों के बीच फंसी टिकुरी 37 नईगढ़ी एवं खरहना गंगेव ब्लॉक पीडब्ल्यूडी सड़क का, डेढ़ करोड़ के आसपास राशि स्वीकृत होने के बाद भी नही हुआ कोई निर्माण कार्य, पीडब्ल्यूडी विभाग एकबार पुनः कटघरे में)

दिनांक 14 दिसंबर 2019, स्थान गंगेव/नईगढ़ी, रीवा MP
   आज स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से लेकर सात दशक बीत जाएं और आपके गांव में चलने लायक सड़क न हो तो आप इसे क्या कहेंगे? विकास कहेंगे, लोकतंत्र कहेंगे या कुछ और? जी हां कुछ ऐसा ही हाल है नईगढ़ी ब्लॉक में टिकुरी 37 में प्रणामी मंदिर ट्रस्ट के पास से होते हुए सथनी प्रधानमंत्री सड़क की तरफ न मुड़कर वहां से बाएं हाँथ मुड़ने पर आपको टिकुरी नंबर 37 की ग्राम बस्तियों जिनमे से कुसवाहा बस्ती, दुबे बस्ती, यादव बस्ती, कंहार बस्ती, गौतमान बस्ती, यादव बस्ती, प्राथमिक पाठशाला कहरान टोला (टिकुरी नंबर 37) से होते हुए पकड़ियार नदी, बाणसागर नहर पुल से होते हुए खरहना ग्राम के पहले पुल क्रासिंग से होते हुए पुनः बाणसागर के पास खरहना में रामनिहोर गौतम, रामसजीवन गौतम के घर से होते हुए श्यामलाल जगदीश, तीर्थ प्रसाद, सच्चीदानंद पांडेय, रमेश गौतम से होते हुए प्राथमिक एवं माध्यमिक पाठशाला ग्राम खरहना (मढ़ी खुर्द पंचायत) से होते हुए झिरिया नाला, हरिजन बस्ती से आते हुए दिवाकर सिंह ग्राम नीबी तहसील नईगढ़ी की पट्टे की लगभग 650 मीटर की अराजी जिसमे मेढ़ से होकर रास्ता गुजरता है इस प्रकार लगभग 7.2 किमी लंबा यह मार्ग है जिसमे दिवाकर सिंह की जामीन मेढ़ को छोंड़कर सब शासकीय है और वर्ष 2008 से पीडब्ल्यूडी के शिकंजे में है जिसके निर्माण बाबत करोड़ों रुपये निकल भी चुके हैं लेकिन अब तक इस रास्ते का कोई विधिवत जीएसबी और डामर डालकर निर्माण नही कराया गया है.
 क्या कहना है ग्रामवासियों का 
    जब इस विषय में ग्रामवासियों से संपर्क किया गया और उनसे कीचड़ से सनी हुई सड़क के विषय में जायज़ा लिया गया तो यह कहना था ग्रामीणों का-
  1-”आज जब से हमारा जन्म हुआ है हमारे ग्राम में पक्की सड़क नसीब नही हुई है. हमारा पूरा जीवन इसी कीचड़ में सनते हुए निकल रहा है. पता नही टिकुरी नंबर 37 से लेकर खरहना तक की यह सड़क कब तक बनेगी.”- ददन कुसवाहा, कुसवाहा बस्ती टिकुरी नं 37 नईगढ़ी.
  2-”मैं पेशे से लाइनमैन हूँ. चाहे बरसात के 4 महीने हों अथवा बीच में असमय बारिश यहां टिकुरी नंबर 37 से लेकर खरहना और उधर प्रणामी मंदिर तक घर से निकलना दूभर हो जाता है. पूरी पगडंडी कीचड़ से सराबोर हो जाती है. यदि कोई बीमार हो जाए अथवा कोई डिलीवरी केस आ जाए तो सिर पर उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है.”- अमृतलाल दुबे, दुबे बस्ती टिकुरी नंबर 37 नईगढ़ी.
 3-”हमारा जॉब सहकारी बैंक में है और हमे कार्य के सिलसिले में हर मौसम में आना जाना पड़ता है. शुबह 9 बजे खरहना से निकलते हैं और शाम को 7 या 8 बजे आते हैं. अब गौर करिए की बरसात के चार महीनों में हमारी सबकी क्या दुर्दशा होती होगी. हम कीचड़ में सनकर बाहर निकलते हैं. यह हालात बचपन से है. लगभग साढ़े सात किमी सड़क निर्माण का जिम्मा पीडब्ल्यूडी को वर्ष 2008 में मिला था लेकिन इस सड़क पर एक मुठ्ठी गिट्टी तक नही पड़ी है. पता नही करोड़ों रुपये कहां चले गए.’ -गौतम जी, ग्राम खरहना ब्लॉक गंगेव.
4-”हम अब उम्मीद छोड़ चुके हैं की इस रोड को कोई बनाएगा. कई बार सीएम हेल्पलाइन में लोगों द्वारा शिकायत भी की गयी है लेकिन पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा भ्रामक और गलत निराकरण करके छोड़ दिया जाता है. सीएम हेल्पलाइन से ही पता चला था की इस सड़क का टेंडर और राशि 2008 में स्वीकृत की गई थी लेकिन साढ़े सात किमी के आसपास सड़क पर कोई कार्य नही हुआ और करोड़ों के प्रोजेक्ट का क्या हुआ आपके सामने है. हम आज भी कीचड़ पर चलने को मजबूर हैं.”- राघव शरण गौतम, भूतपूर्व सरपंच.
5-”हमारी यही माग है की सरकार हमारी टिकुरी 37 से लेकर खरहना तक की सड़क को जल्दी बनवाये जिससे हमे राहत मिल सके. हमारे छोटे छोटे बच्चे कीचड़ में सनकर स्कूल जाते हैं. एम्बुलेंस और जननी की गाड़ियां यहां घुस नही सकतीं. कोई बीमार हो जाए तो सिर में उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है. यह सब अच्छा नही है. हमे तो अब लगता है जैसे शासन प्रशासन सब मर चुके हैं कोई देखने सुनने वाला नही है. हमारी समस्या का कोई तो समाधान करवा दे. हमे पक्की सड़क बनवा दे.”- शिवबालक यादव, टिकुरी 37.
  सीएम हेल्पलाइन में ऐसे शुरू हुआ खोज का सिलसिला 
   चूंकि टिकुरी 37 ग्राम पंचायत नईगढ़ी ब्लॉक में आती है और खरहना ग्राम गंगेव ब्लॉक में आता है इसलिए यह किसी को पता नही चल रहा था की आखिर इस सड़क को बना कौन रहा है और अंतरब्लोकीय सड़क का जिम्मेदार है कौन. इस बाबत एक शिकायत सीएम हेल्पलाइन में दिनांक 22/05/2019 को खरहना पंचायत मढ़ी खुर्द निवासी प्रमोद गौतम द्वारा क्रमांक 8387450 से दर्ज कराई गई. इस शिकायत में सभी बातों को स्पष्टतः रखा गया लेकिन सड़क कौन बना रहा था इसकी जानकारी किसी को नही थी. 
   सीएम हेल्पलाइन में चालू हुआ स्थानांतरण का खेल
     इस शिकायत क्रमांक 8387450 को दर्ज होने के बाद पहले इसे ग्रामीण यांत्रिकी सेवा को भेजा गया. वहां से जबाब आया की यह सड़क आरईएस द्वारा नही बनाई जा रही है. अतः यह दूसरे विभाग को भेजी जाए. इसके बाद शिकायत को पीएम सड़क विभाग को भेजा गया जिसमे इसे बताया गया की पीएमजीएसवाई यूनिट 2 मऊगंज द्वारा बनाई जा रही होगी अतः वहां स्थानांतरित किया जाय. वहां से भी जबाब मिला की यह सड़क पीएमजीएसवाई द्वारा नही बनायी जा रही है.
  इस प्रकार यह शिकायत के स्थानांतरण का खेल पूरे 27 नवंबर तक अर्थात 6 माह तक चलता रहा लेकिन यह पता नही कर पाया प्रशासन की आखिर इस सड़क का मालिक कौन था जो अपने आप में सीएम हेल्पलाइन की कार्यप्रणाली को दर्शाता है.
  27 मई को पीडब्ल्यूडी का आया जबाब
   अंततः पूरे 6 माह अंदर ही अंदर विभागीय चक्कर लगाने के बाद पीडब्ल्यूडी को जब शिकायत पहुची तो उनका जबाब आया जो अक्षरसः नीचे है - “ कार्यपालन यंत्री से प्राप्त जानकारी अनुसार शिकायतकर्ता से दिनांक 28.11.2019 को दोपहर 1.10 बजे दूरभाष पर संपर्क किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा वर्णित गंगेव टिकुरी मार्ग लंबाई 7.20 किमी. लागत 136.85 लाख की स्वीकृति प्रमुख अभियन्ता लो.नि.वि. भोपाल के पत्र क्रमांक 1454-55/842/19/यो./2008 भोपाल दिनांक 06.3.2008 के द्वारा नावार्ड योजना के तहत प्राप्त हुई थी। उपरोक्त मार्ग में 650 मीटर पर निजी आराजी होने तथा भू-अर्जन की स्वीकृति न होने के कारण एवं मान्नीय न्यायालय द्वारा स्टे दिये जाने से 650 मीटर में तत्कालीन मार्ग निर्माण नहीं हो सका था। वर्तमान में अब शिकायतकर्ता के द्वारा मार्ग निर्माण की मांग की जा रही है। वर्तमान में उक्त मार्ग निर्माण की कोई स्वीकृति विभाग को प्राप्त नहीं है। मार्ग निर्माण की स्वीकृति शासन स्तर से संबंधित है। शिकायतकर्ता को जानकारी दे दी गई है। अतः शिकायत विलोपन योग्य है।
एक करोड़ 36 लाख 85 हज़ार कहाँ गए?
   जिस प्रकार से उपरोक्त शिकायत में देखा जा सकता है की पीडब्ल्यूडी के कर्यपालन यंत्री द्वारा निराकरण में यह स्वीकार किया गया की 1 करोड़ 36 लाख और 85 हज़ार रुपये की स्वीकृत हुई थी लेकिन विवादित 650 मीटर दिवाकर सिंह ग्राम नीबी की जमीन का भूअर्जन न हो पाने के चलते सड़क निर्माण पूरा नही हो पाया.
    यह बात तो ठीक है की 650 मीटर भूमि का भूअर्जन नही हो पाया पर क्या प्रशासन और पीडब्ल्यूडी विभाग यह बताएगा की 7 किमी और 200 मीटर स्वीकृत मार्ग में से यदि 650 मीटर विवादित मार्ग को हटा दिया जाए तो शेष उसका निर्माण क्यों नही किया गया? और मात्र इस सड़क के कुछ ही भाग में मात्र कुछ गिट्टी मोरम डालकर ही क्यों पीडब्ल्यूडी विभाग फुरसत हो गया।
  सच्चाई यह की पीडब्ल्यूडी विभाग सब खा गए
     खरहना और टिकुरी 37 ग्राम के ग्रामीण बताते हैं की सच्चाई यह है की यह राशि 2008 में मप्र शासन द्वारा स्वीकृत हुई थी जिसमे विवादित 650 मीटर के अतिरिक्त पीडब्ल्यूडी विभाग ने सड़क बनी हुई है इस प्रकार दर्शा कर अन्य सड़कों की भांति पूरी राशि हजम कर ली. और शायद यह भी जानकारी नही मिलती पर चूंकि ग्रामीण निरंतर परेशान होते रहे और आवाजें उठाई, सरकार भी इस बीच बदल गयी तो पीडब्ल्यूडी विभाग को जबाब देना पड़ा.
    अब ग्रामीण चाहते हैं की पीडब्ल्यूडी बताये की आखिर 1 करोड़ 36 लाख और 85 हज़ार की स्वीकृत राशि आखिर गई तो गई कहाँ?
   सड़क की जांच नही हुई तो ग्रामीण बैठेंगे आमरण अनशन पर, करेंगे कलेक्टर बंगले का घेराव
    इस बीच दोनो ब्लॉकों गंगेव एवं जुड़े हुए नईगढ़ी ब्लॉक से मढ़ी खुर्द स्थित खरहना और टिकुरी 37 नईगढ़ी के ग्रामीणों ददन कुसवाहा, प्रमोद गौतम , अमृतलाल दुबे, शिवबालक यादव, लोकनाथ गौतम, भूतपूर्व सरपंच राघवशरण गौतम, रामनिहोर गौतम, तीरथ प्रसाद गौतम, सच्चीदानंद, जगदीश, रमेश गौतम आदि ने बताया की यदि इस सड़क घोटाले की विधिवत कमेटी बनाकर जांच कर पीडब्ल्यूडी से जुड़े भ्रष्टाचारी अधिकारियों और इंजीनियर के ऊपर रिकवरी की कार्यवाही नही होती तो सभी ग्रामीण कलेक्टर के बंगले का घेराव करेंगे और वहीं पर आमरण अनशन करेंगे।
   सड़क है समाज का मानवाधिकार
   वास्तव में यूएनएचआरसी, एनएचआरसी, एमपीएचआरसी के परिपेक्ष्य में देखा जाय तो बिजली पानी सड़क स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक देश की सिविल सोसाइटी की जनता के मूलभूत मानव अधिकारों में से एक हैं. अतः इन मानवाधिकारों की सुरक्षा करना किसी भी देश और प्रदेश की लोकतांत्रिक चुनी हुई सरकार का संवैधानिक दायित्व है।
   आज भारत और इसके विभिन्न राज्यों में जिस प्रकार से आम और ग्रामीण जनता को इन सभी मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित किया जा रहा है यह काफी विचारणीय मुद्दा है जिसे हरहाल में शासन सत्ता पर बैठी सरकारों को देखना पड़ेगा. आखिर उस माँ का क्या दोष जिसे बरसात में डिलीवरी हो जाए, कैसे जाएगी वह अस्पताल? आखिर उन बुजुर्गों का क्या दोष जिन्हें बरसात के समय बीमार होने पर एम्बुलेंस गांव तक नही पहुच सकती? आखिर उन स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों का क्या दोष जो कीचड़ में सनकर स्कूल जाते हैं?
  आखिर आज 21 वीं सदी में जब की मॉनव चंद्रमा और मंगल एवं अंतरिक्ष में घर बनाने, पानी खोजने, रास्ता बनाने की सोच रहा है ऐसे में क्या इस धरती में इन मूलभूत मानवाधिकारों के लिए कोई जगह नही है? इससे बेहतर तो कह सकते हैं की स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व की स्थिति रही होगी जब जगह जगह ट्रांसपोर्टेशन के लिए रेल की पटरियों का ईजाद कर लिया गया था. आखिर स्वतंत्रता प्राप्ति के 7 दशकों के बाद भी यदि आमजन और ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की चलने योग्य सड़कें न बन पाएं तो भला इस लोकतंत्र के लिए उससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।
   उम्मीद है शासन प्रशासन जल्द ही पक्की सड़क बनवायेगा
    यद्यपि मायूसी और लाचारी के बीच अभी भी खरहना और टिकुरी 37 के ग्रामीणों का मन टूटा नही है और उन्हें उम्मीद है की सरकार बदलने के साथ ही मप्र में शायद सड़क बनाने की प्रक्रिया में तेजी आये और उनके ग्राम में भी पक्की सड़क बन पाए. लोगों का मानना है की ग्रामीणों ने दिवाकर सिंह निवासी नीबी से भी निवेदन किया है और वह भी अब चाहते हैं की जो 650 मीटर रुकी हुई सड़क का भूअर्जन नही हुआ है वह अब हो जाए क्योंकि दिवाकर सिंह के परिवार के सदस्यों से बात करने पर यह पता चला की यह रास्ता दसकों से चल रहा है और इस सड़क के अधूरे पड़े रहने से उनकी फसल का भी नुकसान हो रहा है जिससे अब वह भी चाहते हैं की यह छूटी हुई 650 मीटर जमीन का भूअर्जन होकर पक्की सड़क बन जाए जिससे वह भी अपनी जमीन का सदुपयोग कर पाएं. क्योंकि कहीं न कहीं पक्की सड़क से जुड़ने के बाद उसी जमीन की कीमत भी कई गुना बढ़ जाती है.
  संलग्न - दिनांक 14 दिसंबर 2019 दिन शनिवार की स्थिति में ओला और बारिश होने के बाद सड़क की कीचड़ से सनी हुई स्थिति.
----------------------
शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587





Friday, August 23, 2019

धड़ल्ले से दौड़ रहे ओवरलोड वाहनों की ठोकर से घायल हुई गाय, स्थिति गंभीर (मामला जिले के थाना गढ़ अन्तर्गत भठवा मार्केट के पास का, पशु संजीवनी 1962 को किया गया सूचित, डॉक्टर और सर्जनों की टीम ने किया इलाज)

दिनांक 23 अगस्त 2019, स्थान गढ़/गंगेव/भठवा, रीवा मप्र
  घोषणा वीरों की घोषणाओं के बाद भी धरातल स्तर पर गौशाला निर्माण कार्य जीरो
 स्थानीय पुलिस प्रशासन की मदद से धड़ल्ले से दौड़ रहे ओव्हर लोड वाहन
  शिवानन्द द्विवेदी एवं स्वतंत्र शुक्ला (रीवा मप्र)

      प्रदेश सरकार के द्वारा गौशाला निर्माण कार्य की घोषणा करने के बाद भी अब तक धरातल स्तर में कार्य किसी प्रकार से आरंभ होने का नाम नहीं ले रहा है। आपको बता दें कि आज दिनांक 23 अगस्त 2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की गोमाता भठवा मार्केट के बस स्टैंड में अज्ञात वाहन से दुर्घटना ग्रस्त होकर अपनी अंतिम सांस गिन रही है। घटना की जानकारी शहर वाशियों द्वारा गौरक्षक शिवानंद द्विवेदी को दी गई जिससे हाल ही में घटना स्थल पर पहुंच कर प्राथमिक उपचार कराया गया, साथ ही पशु संजीवनी एम्बुलेंस 1962 को सूचना प्रेषित की गई, लेकिन अब तक 3 घन्टे बाद भी संजीवनी उपस्थित नहीं हो पाई। अंत मे शाम 4 बजे पशु संजीवनी को लेकर गंगेव वेटेरिनरी एक्सटेंशन अधिकारी उपस्थित हुए जिनके साथ आये सर्जनों ने गाय का इलाज किया।
   सुबह लगभग 11 बजे यद्यपि कम्पाउण्डर और ड्रेसर संतलाल साहू एवं रामानुज कोल के द्वारा प्राथमिक उपचार तो किया गया है लेकिन सर्जन के आने के बाद ही प्लास्टर हो पाया, वहीं घटना स्थल पर  उपस्थित लोगों का कहना था कि, गाय के पेट में लगभग 5 माह के गर्भ में बच्चा था जो ठोकर लगने से सम्भवतः मर चुका था लेकिन जिस प्रकार गाय जीवित बची हुई थी इससे डॉक्टरों का कहना था कि गाय के पेट मे बच्चा तब तक मरा नही था।
क्या कहना है इनका
गौरव शुक्ला निवासी भठवा - "गौरक्षक श्री शिवानंद द्विवेदी जी के द्वारा हमें गाय एक्सीडेंट होने की  सूचना मिली तो हमनें संबंधित अधिकारियों को इस विषय पर अवगत कराया, साथ ही प्राथमिक उपचार करा के ट्रेक्टर ट्राली  के माध्यम से गाय को परिजनों के घर पहुंचा दिया "
 गिरीश पटेल निवासी बांस-  "जब से यह रोड हाइवे बनी है तब से ओव्हर लोड बहनों की निकशी के चलते लगातार इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं।"
ओम शुक्ला निवासी भठवा - "पशुओं की तो गिनती नहीं की एक दिन में कितने दुर्घटना के शिकार होते हैं आए दिन लोगों के साथ भी यही होता है। स्थानीय पुलिस प्रशासन की सह से ओव्हर लोड बहनों की धड़ल्ले से निकासी होती है। इसका विरोध भी किया गया लेकिन कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है।"
 शिवानंद द्विवेदी, गौरक्षक सामाजिक कार्यकर्ता - "यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी बड़े बड़े ट्रक घरों में घुस चुके हैं। पता नहीं कितने व्यक्ति व मवेशी दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं। इसलिए साशन प्रशासन संदर्भित विषय को संज्ञान में ले ओव्हर लोडेड व भारी वाहनों के निकासी में प्रतिबंध लगाएं। साथ ही क्षेत्र में बनाएं जाने वाली गौशाला के निर्माण कार्य में भी तीव्रता आए जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।"
   गोशालाएं न बनने से बेसहारा मवेशियों की हालत खराब
     मप्र में वर्तमान सरकार द्वारा 1000 गोशालाओं को बनाये जाने हेतु प्रस्ताव लाया गया है जिनमे से काफी गोशालाओं को बनाये जाने हेतु जगह भी चिन्हित कर ली गयी हैं। जिला रीवा में ही अकेले 33 गोशालाएं खोली जानी हैं जिनमे से 30 गोशालाओं के निर्माण  हेतु टीएस भी जारी किए जा चुके हैं लेकिन ग्राउंड वर्क न होने से स्थिति दयनीय बनी हुई है।
  हिनौती और बांस ग्राम पंचायत में मात्र खोदे गए गड्ढे
    बता दें कि गंगेव ब्लॉक के हिनौती एवं बांस ग्राम पंचायत में गोशाला निर्माण के नाम पर अब तक मात्र गड्ढे ही खोदे गए हैं। कुछ गड्ढे खोदे जाने के बबाद बाहर के मजदूरों द्वारा कार्य अधूरा छोंड़कर भाग जाने के कारण मनरेगा का कार्य पूर्णतया बन्द हो चुका है। ज्ञात हो कि मनरेगा के कार्य बाहरी मजदूरों नही बल्कि पंचायत और आसपास के मजदूरों के द्वारा करवाये जाते हैं। जबकि उक्त पंचायतों में गोशाला निर्माण के प्रारम्भ से ही धांधली प्रारम्भ होगयी है जिसकी निगरानी शासन प्रशासन को करना अत्यंत आवश्यक है।
  वाहनों की स्पीड पर लगे रोक, ऐरा प्रथा पर भी लगे लगाम
    आज सबसे ज्यादा मवेशी वैष्णो6 और सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं।सतना से बेला, क्योटी से कलवारी, मनगवां से चाकघाट एवं मनगवां से हनुमना अथवा शहरी रोड कोई भी सड़कें हो, इनमे बेतरतीब और रेलमपेल दौड़ने वाले ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों की वजह से रोज सैकड़ों ऐरा मवेशी इसका शिकार हो रहे हैं। सामान्य तौर पर फसल नुकसानी बचाने के लिए होने वाली पशु क्रूरता तो है ही लेकिन उससे कहीं भयावह स्थिति सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने वाले मवेशियों की है। इस कारण जब तक ऐरा प्रथा में रोक नही लगती और ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों पर नियत्रण और कार्यवाही नही होती तब तक कुछ भी कह पाना मुश्किल है। भठवा मार्केट के पास की घटना उसका एक पहलू मात्र है।
संलग्न - कृपया दुर्घटना से बुरी तरह घायल गाय की स्थिति एवं तत्पश्चात सर्जनों एवं डॉक्टर द्वारा किया गया इलाज की फ़ोटो।
------------------

शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587





Thursday, August 22, 2019

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा निर्माण एवं मरम्मत में 82 लाख के घोटाले की असंका - शिवानन्द द्विवेदी (मामला जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का जिनमे सिरमौर, गंगेव, लौआ,रंगोली स्वास्थ्य केंद्रों के लिए स्वीकृत राशि रुपये 82 लाख दस हज़ार की बंदरबाट की असंका, कहीं किसी अस्पताल में नही हुआ कोई विशेष कार्य, मानवाधिकार आयोग की शिकायत में हुआ खुलासा)

दिनांक 23 अगस्त 2019, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र
   (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
  सामाजिक एवं मनावाधिकार एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर अध्यक्ष मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग अरेरा हिल्स भोपाल को लिखे गए पत्र के जबाब में लगभग एक वर्ष बाद एक लेटर प्राप्त हुआ है जिंसमे गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के साथ साथ जिले के अन्य चार ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों सिरमौर, गंगेव, लौआ,रंगोली के विषय मे निर्माण कार्यों उन्नयन एवं मरम्मत विषय मे संचालनालय स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा जानकारी भेजी गई है जिसमे बताया गया है कि कुल 82 लाख दस हज़ार रुपये विभिन्न निर्माण कार्यों के लिए सैंक्शन हुए थे परंतु अब तक कार्य पूर्ण नही किया जा सका है।
  ह्यूमन राइट्स कमीशन भोपाल से आया पत्र
    मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल द्वारा एक्टिविस्ट द्विवेदी को दिनाँक 29 जून 2019 को भेजे गए पत्र क्रमांक 19290/7300/रीवा/18 में यद्यपि यह कहा गया है कि राशि आवंटन एवं निर्माण कार्य में कोई बाधा उत्पन्न होना सम्भव नही है और प्रकरण को नस्तीबद्ध कर दिया गया है लेकिन वास्तव में धरातल पर आज दिनांक तक गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कोई भी कार्य सम्पादित नही हुआ है।
  संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं भोपाल ने आयोग को दिया यह जबाब
    एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी की आयोग के समक्ष याचिका पर जब मानवाधिकार आयोग ने संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं मप्र भोपाल को प्रकरण क्रमांक/9870/7300/रीवा/2018 दिनांक 28 मार्च 2019 के माध्यम से लिखा तब संचालनालय ने अपने पत्र क्रमांक/5/भवन/सेल-1/2019-20/879/ दिनांक 3.5.2019 का हवाला देकर आयोग को बताया कि सियाराम साहू अवर सचिव लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग मप्र शासन भोपाल द्वारा आयुक्त स्वास्थ्य सेवाएं मप्र शासन को दिनांक 01.08.2013 को पत्र क्रमांक एफ 16 -1/2013/सत्रह/मेडि -3 भोपाल लिखकर सामान्य क्षेत्र के अंतर्गत ग्रामीण स्वास्थ्य संस्थाओं में विभिन्न निर्माण कार्यों हेतु प्रशासकीय स्वीकृति हेतु पत्र जारी किया गया था। जिसमे रीवा जिले के चार ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों जिसमे सिरमौर, गंगेव, लौआ,रंगोली एवं शाजापुर जिला में तिलावद मैना सम्मिलित है इनके लिए राशि क्रमसः 42 लाख 26 हज़ार रुपये,  24 लाख 89 हज़ार रुपये, तीन लाख 70 हज़ार रुपये, 6 लाख 83 हज़ार रुपये एवं 4 लाख 42 हज़ार रुपये की स्वीकृति हुई थी इस प्रकार कुल 82 लाख 10 हज़ार रुपये स्वीकृत होने के बाबजूद भी उक्त किसी भी स्वास्थ्य केंद्र में नियमानुसार कार्य का होना नही पाया गया है।
    गंगेव स्वास्थ्य केंद्र विषयक अपर संचालक वित्त मप्र शासन का चीफ इंजीनियर पीडब्ल्यूडी को पत्र
    एक्टिविस्ट द्विवेदी की शिकायत एवं ह्यूमन राइट्स कमीशन के पत्र को आधार बनाकर दिनांक 29 मार्च 2019 को अपर संचालक वित्त संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं मप्र शासन भोपाल द्वारा प्रमुख अभियंता लोक निर्माण विभाग अरेरा हिल्स भोपाल के नाम पत्र क्रमांक/5/भवन/2018-19/676 जारी किया गया जिसमें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गंगेव जिला रीवा के अधूरे/जर्जर भवन हेतु आवंटन उपलब्ध कराए जाने विषयक लेख लिखा गया जिसमें अवर सचिव मप्र शासन लोक निर्माण विभाग के पत्र क्रमांक/127/99/2018/19/यो भोपाल दिनांक 24 जनवरी 2019 एवं मॉनव अधिकार आयोग भोपाल के पत्र क्रमांक 1333/3154/होशंगाबाद/18 दिनाँक 11 जनवरी 2019 का हवाला दिया गया जिसमें लेख किया गया कि व्यय राशि की जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
  82 लाख से अधिक राशि व्यय लेकिन कार्य का पता नही
    बता दें कि उपरोक्त सभी कार्यों के लिए संचालनालय स्वास्थ्य सेवाओं मप्र शासन द्वारा पीडब्ल्यूडी सहित जो भी जानकारी एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी की शिकायत पर मॉनव अधिकार आयोग भोपाल को उपलब्ध कराई गई है उससे एक बात भलीभांति स्पष्ट हो चुका है कि यद्यपि राशि का आवंटन और आहरण तो कर लिया गया है लेकिन भौतिक धरातल पर कहीं भी नियमानुसार कार्य का होना नही पाया गया है।
  गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हेतु 24 लाख 89 हज़ार रुपये आवंटित
   उक्त आदेश में जहां 82 लाख 10 हज़ार के कार्य मे जिला रीवा के 4 अस्पताल सम्मिलित थे वहीं सबसे ज्यादा राशि का आवंटन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिरमौर के लिए 20 बिस्तरीय वार्ड के निर्मान के लिए 42 लाख 26 हज़ार आवंटित हुए थे वहीं गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जीर्णशीर्ण भवन के सुधार कार्य के लिए 24 लाख 89 हज़ार आवंटित हुए थे। लेकिन जहां आवंटित राशि के हिसाब से जहां सिरमौर अस्पताल में भी 20 वार्डों का उन्नयन ठीक से नही हो पाया वहीं गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की जीर्णशीर्ण स्थिति यथावत बनी हुई है जिसमे मालमवेसी बांधने और पशुओं को रखने जैसी स्थिति अभी भी बनी हुई है।
  गंगेव स्वास्थ्य केंद्र का पिछले वर्षों उठा मुद्दा
    वर्ष 2017 में गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के जीर्णशीर्ण होने का मुद्दा सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा उठाया गया जब गर्मियों में अकस्मात विजिट में पाया गया कि न तो पानी पीने के लिए कोई व्यवस्था थी और न ही दवा स्टोर रूम। इसी प्रकार जब बरसात आयी तो पता चला कि जो दवा रूम था उसमें छत से पानी टपक रहा था। जब तत्कालीन बीएमओ देवव्रत पांडेय से जानकारी चाही गयी तो उन्होंने बताया कि यह कार्य पीडब्ल्यूडी विभाग को सौंपा गया था जिसमे कोई हिनौती पंचायत का ठेकेदार सुरेश चतुर्वेदी कार्य कर रहा है। लेकिन बीच मे ही पैसा हजम करके भाग गया है। अंदर देखने पर पाया गया कि जहां वार्ड बना हुआ था वह भवन भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त था जहाँ पर मरीजों को बैठने तक के लिए जगह नही थी।
   मीडिया में उठा था मामला
    गंगेव सामुदायिक स्वस्थ्य केंद्र में अव्यवस्था का मामला उस समय मीडिया में भी उठा था। जिसके बाद रीवा में हड़कंप मच गया था जिससे सीएमओ और बीएमओ एवं संवंधित ठेकेदार एवं पीडब्ल्यूडी विभाग को जबाब देने की स्थिति पैदा हुई थी। इसके बाद न्यूज़पेपर का हवाला देकर सामाजिक कार्यकर्ता द्विवेदी द्वारा मामला ट्विटर एवं ईमेल आदि के माध्यम से उच्चाधिकारियों एवं भोपाल नई दिल्ली तक रखा गया था। साथ ही मामले को मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल को भी लिखा गया था जिस पर उपरोक्त जबाबी कार्यवाही की गई है।
   जनहित के मामलों में आयोग की नही है गंभीरता - शिवानन्द द्विवेदी
    यद्यपि गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र वाले मामले को गौर से देखा जाय तो आयोग को लिखे जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग मप्र भोपाल एवं पीडब्ल्यूडी विभाग भोपाल के कानों में जूं तो रेंगी और कुछ कागज़ी कार्यवाही तो की गई है लेकिन यह अपर्याप्त है क्योंकि मात्र कागज़ी कार्यवाही हो जाने और पत्रों के आदान प्रदान हो जाने भर से कुछ नही होता। वास्तव में आयोग को यह भी देखना था कि आखिर जितनी राशि स्वास्थ्य विभाग द्वारा उक्त सभी स्वस्थ्य केंद्रों के उन्नयन और मरम्मत आदि के लिए जारी किए गए उनका उपयोग हुआ है कि नही। मात्र संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं भोपाल एवं पीडब्ल्यूडी भोपाल के पत्राचार के आधार पर पूरे प्रकरण को नस्तीबद्ध कर देना उचित नही है। इससे मानवाधिकार के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले एक्टिविस्टों शिवानन्द द्विवेदी जैसे जुझारू लोगों के लिए भी कार्य के बोझ को बढ़ाना ही है। इसमे आयोग से और भी निगरानी की उम्मीद की जाती है।
संलग्न - कृपया मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल द्वारा भेजे गए वह समस्त कागज़ात, पत्राचार के दौरान संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं एवं पीडब्लूडी भोपाल,  लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के पत्र एवं जांच प्रतिवेदन आदि की फ़ोटो भी देखें।
-------------------------

शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587











Tuesday, February 12, 2019

रीवा ब्रेकिंग- मजदूरी के स्थान पर मिली जेल, मजदूरों के मानवाधिकार का हुआ घोर हनन (मामला जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत डाढ़ पंचायत का जहाँ सैकड़ों मजदूर मजदूरी न मिलने को लेकर कर रहे थे अनसन, गढ़ पुलिश आयी और उठाकर ले गयी, अनसन में महिलाएं बुजुर्ग भी थे सम्मिलित)

दिनांक 12 फरवरी 2019, स्थान - गढ़/कटरा, रीवा मप्र
  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
    लोकतंन्त्र की हत्या कर पुलिसिया राज कैसे स्थापित हो रहा है इसका एक जीता जागता उदाहरण दिखा रीवा जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत आने वाली घाट के ऊपर स्थित डाढ़ पंचायत में।
   मजदूरी न मिलने पर सौंपा था ज्ञापन
    विंध्य किसान परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता पुष्पराज तिवारी, डाढ़ निवासी गीता साकेत एवं ममता साकेत द्वारा बताया गया कि वह सभी अपने गांव के सैकड़ों मजदूरों के साथ 42 मजदूरों के मनरेगा में मेढ़ बंधान में मिट्टीकरण के किये गए कार्य के पैसे की माग कर रहे थे जिसके लिए पिछले सप्ताह मजदूरों ने त्योंथर सीईओ, एसडीएम, एवं जिला कलेक्टर को विधिवत लिखित ज्ञापन सौंपा था जिसके लिए माग की थी कि यदि 10 फरवरी 2019 तक यदि डाढ़ पंचायत के पंच परमेश्वर एवं मनरेगा के कार्यों की विधिवत जांच होकर 42 मजदूरों को उनकी मजदूरी नही दी जाती तो सभी मजदूर 11 फरवरी से अनसन प्रदर्शन करेंगे। 
      मनरेगा मजदूरी न मिलने पर कर रहे थे अनसन, पुलिश आयी और भर ले गयी थाने
    इस बीच कोई प्रशासनिक सुनवाई न होने पर सभी मजदूर पूर्व सूचना के आधार पर डाढ़ पंचायत भवन के सामने उपस्थित होकर प्रदर्शन कर रहे थे। दिनाँक 12 फरवरी को अनसन का दूसरा दिन था तभी सुबह 11 बजे के लगभग गढ़ पुलिश टी आई सीके तिवारी, एवं मनगवां एसडीओपी के निर्देश पर एसआई शैलेन्द्र सिंह अपने बल के साथ आये और शिवकुमार साकेत सहित अन्य मजदूरों को गाड़ी में भरकर गढ़ थाने ले गए।
    क्या लोकतंन्त्र में अनसन करना है अपराध?
    जिस प्रकार से लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण ढंग से अपने पंचायत भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे मनरेगा के मजदूरों को गढ़ पुलिश उठाकर थाना ले गयी उससे साफ जाहिर है कि लोकतंन्त्र की हत्या कर मजदूरों और आम नागरिकों के मानवाधिकार का अच्छा खासा उल्लंघन किया जा रहा है।
   पुलिश ने क्यों नही की मामले की जांच?
   सवाल यह भी है कि आखिर गढ़ पुलिश टी आई सीके तिवारी द्वारा वास्तविकता जानने का प्रयाश क्यों नही किया गया? क्या यह पुलिश विभाग को नही पता था कि आखिर मजदूर इकठ्ठा होकर किस बात के लिए प्रदर्शन कर रहे थे? क्या सबसे पहले अपराध ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव एवं सीईओ त्योंथर के खिलाफ नही बनता? आखिर मजदूरों ने जब मनरेगा में कार्य किया है तो उनकी मजदूरी किस आधार पर नही दी जा रही क्या सीईओ अथवा पंचायत विभाग ने लिखित तौर पर मजदूरों को अवगत कराया था?
   हिटलरवादी तंत्र में कमजोर का जीना दूभर
   इन सब प्रश्नों के जबाब यह हिटलरवादी तंत्र नही दे सकता क्योंकि यह तो अंग्रेजों के समय की पुलिश है जो अपनी अकल कम लगाती है और नेताओं रसूखदारों की ज्यादा सुनती है। आज गढ़ पुलिश के यह हाल हैं कि यहाँ अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है और अपराधियों पर लगाम नही लग पा रहा है जबकि अपनी नाकामी छुपाने के लिए गढ़ पुलिश निर्दोषों कमजोरों और मजदूरों को निशाना बनाकर उन्हें जबरन कठघरे में खड़े कर रही है।
   वास्तव में देखा जाय तो गढ़ पुलिश इस मामले को पंचायत विभाग पर दबाब डालकर मजदूरों की मजदूरी दिलवाने में एवं पंचायती भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती थी लेकिन उल्टे अपने नाकामी छुपाने के लिए पुलिश ने एक कमजोर बेरोजगार मजदूर के मानवाधिकार को खत्म करते हुए मजदूर को ही सलाखों के पीछे पहुचा दिया। 
    अब देखना यह होगा कि मजदूरों की इस शिकायत पर गढ़ पुलिश एवं पंचायत सरपंच सचिव के विरुद्ध क्या कार्यवाही होती है?
संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखें अनसन प्रदर्शन करते डाढ़ पंचायत के मजदूर एवं दिए गए ज्ञापन की फ़ोटो।
--------------------------
शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा, मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, February 11, 2019

ग्राम पंचायत भवन डाढ़ में मजदूरों ने किया तालाबंदी,अधिकारियों ने नही ली सुध, जारी रहेगा धरना प्रदर्शन

दिनाँक 11 फरवरी 2019, स्थान - कटरा, रीवा मप्र
  जिले के जनपद पंचायत त्योंथर अन्तर्गत ग्राम पंचायत डाढ़ में मजदूरों ने पंचायत विभाग और जिला प्रशासन को लिखित सूचना के उपरांत पंचायत भवन में तालाबंदी कर दिया।
  लिखित ज्ञापन के बाद भी दिनाँक 11 फरवरी को पूरे दिन पंचायत भवन में कोई अधिकारी सुध लेने नही पहुचा। आलम यह था कि पंचायत भवन में पूरे दिन पंचायत भवन में पंचायत कर्मचारियों द्वारा लगाया गया ताला लटकता रहा इस पर जब कोई अधिकारी नही पहुचा तो मजदूरों ने दूसरा ताला भी लगा दिया और अगले 14 फरवरी तक आंदोलन करते रहने की चेतावनी दी है।
 इन मुद्दों को लेकर किया तालाबंदी
  डाढ़ पंचायत के मजदूर एवं विंध्य किसान परिषद के सक्रिय सदस्य पुष्पराज तिवारी, शिवकुमार साकेत, इंद्रलाल साकेत, लालबहादुर साकेत, दीनदयाल, मुन्नी, संगीता, पुरुषोत्तम आदि सैकड़ों मजदूरों ने बताया कि ग्राम पंचायत डाढ़ में पिछले कई वर्षों से मनरेगा के कार्यों में व्यापक भ्रष्टाचार किया जा रहा है जिसको लेकर मजदूरों ने दर्जनों मर्तबा पंचायत विभाग एवं प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है लेकिन न तो कोई जांच हुई और न ही कोई सुनवाई जिसके चलते मजदूरों ने कई बार तहसील एवं सीईओ कार्यालय त्योंथर में धरना प्रदर्शन किया हुआ है।
  इस बार 4 दिवशीय तालाबंदी एवं धरना प्रदर्शन पंचायत कार्यालय डाढ़ में करने का निश्चय किया गया है।
 माग नही पूरी हुई तो लंबा चलेगा आंदोलन
   विंध्य किसान परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता पुष्पराज तिवारी ने बताया कि यदि मजदूरों को मजदुरी और उनके मागों को नही माना गया तो यह आंदोलन चलता रहेगा।
कलवारी मोड़ राष्ट्रीय राजमार्ग में होगा चक्का जाम
  पुष्पराज तिवारी ने बताया कि यदि मजदूरों की मांगें नही मानी गयी तो दिनांक 14 फरवरी 2019 को कलवारी मोड़ राष्ट्रीय राजमार्ग 27 में चक्का जाम किया जाएगा। इस बीच बताया गया कि मजदूरों के मुद्दों के साथ साथ कलवारी से क्योटी मार्ग पर ओवरलोडेड वाहनों की फर्राटा दौड़ और इससे आमजन को होने वाली असुविधा को लेकर एवं कटरा बाजार की बदहाल सड़क की स्थिति को लेकर भी चक्का जाम किया जाएगा।
संलग्न - दिनांक 11 फरवरी को मजदूरों द्वारा किये गए धरना प्रदर्शन एवं आन्दोलन की फ़ोटो एवं ज्ञापन की फ़ोटो संलग्न हैं।
--------------
शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र मोब 9589152587, 7869992139








Tuesday, January 15, 2019

पावर प्लांट चचाई में जंगल बीच करंट लगाकर चीतल एवं भैंसों का हुआ शिकार, वन विभाग पल्ला झाड़ रहा, पुलिश को कुछ फर्क नही पड़ता (मामला जिले में बढ़े वन अपराधों का जहाँ एमपीईबी पावर प्लांट चचाई के पास जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर अखंड प्रताप सिंह की 5 भैंसों को मार डाला गया, लंबे अरसे से करंट लगाकर चीतल का किया जा रहा था शिकार, बदकिस्मती से लाखों की फंस गयीं भैंसें)

दिनाँक 15 जनवरी 2019, स्थान - चचाई पावर प्लांट, सिरमौर, रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    प्रदेश एवं जिले में निरंतर बढ़ रहे बेलगाम वन अपराधों की श्रेणी में एक और अध्याय जुड़ चुका है. अभी तक तो नहरों, घाटियों, जलप्रपातों के बीच में मवेशियों को जीवित धकेले जाने की वारदातें सामने आईं थीं लेकिन अब तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे पूरे जंगल विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने वाला है. जी हाँ यहां कोई पहेलियां नही बुझाई जा रही बल्कि सच्चाई के समाज को अवगत कराया जा रहा है.

    जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर किया जाता रहा शिकार

    यह मामला है चचाई जलप्रपात से होकर जाने वाले जंगल का जहां से होते हुए लगभग 7 से 8 किमी दूर जंगल के रास्ते बकिया-बीहर नहर पावर प्लांट चचाई से अतरैला वन परिक्षेत्र के जंगल तक जाती है. अभी पिछले दिनों ही इसी नहर में इंटेक प्लांट के पास दर्ज़नों गोवंशों के उतराते हुए शव मिले थे जो मीडिया में और समाज में हलचल पैदा कर दिए थे. अभी एक और मामला सामने आया है जो महीनों पुराना बताया गया है जिंसमे पीड़ित अखंड प्रताप सिंह निवासी मरैला ने लिखित तौर पर पुलिश एवं वन विभाग को शिकायत भी की लेकिन कार्यवाही नही हुई है.

    मामला है 5 भैंसों और एक चीतल का जंगल के बीच करंट से फंसकर मौत का

   सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की जंगल के बीचोंबीच आखिर करंट आया कहां से लेकिन चकित मत होइये बता दें की चचाई पावर प्लांट बस नजदीक ही स्थित है जो 315 मेगावाट की बिजली उत्पन्न करता है. यह पावर प्लांट सरकार के ऐसे नियमों के अन्तर्गत बनाया गया है जो जंगल भूमि का भी उपयोग कर रहा है यद्यपि इस पावर प्लांट का कर्ताधर्ता एमपीईबी विभाग है.

   दिसंबर दूसरे सप्ताह की है वारदात  

    दिनाँक 12-13 दिसंबर के आसपास मरैला निवासी अखंड प्रताप सिंह उम्र लगभग 65 वर्ष की चार भैंसें एवं एक भैसा भैंसहटी नामक चचाई घाट  के नीचे चरने के लिए उतारे गए थे. बताया गया की यहीं एमपीईबी पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली का दुरुपयोग करके अर्जुन केवट नामक जवा निवासी उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए करंट लगाया था जिसमे अखंड प्रताप सिंह की 4 नग जीवित पजाने योग्य भैंसें एवं एक नग भैंसा सब मिलाकर लगभग 4 से 5 लाख कीमत की फंसकर मारे गए।

   अतरैला थाने एवं वन विभाग में लिखित दी सूचना

    अखंड प्रताप सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर घटना की सूचना  तत्काल अतरैला थाना एवं वन परिक्षेत्र अतरैला में दी गई लेकिन न तो वन विभाग द्वारा और न ही पुलिश विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज की गई. जबकि देखा जाए तो दोनों ही दृष्टि से करंट लगाकर जंगल के अंदर शिकार और मवेशियों का उसमे फंसकर मारना एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे वन विभाग को पीओआर और पुलिश विभाग को बकायदे एफआईआर दर्ज करना चाहिए.

   वेटेरिनरी अधिकारी ने शव न मिलने का बनाया बहाना

     बता दें की इस घटना के विषय में जब जवा वेटेरिनरी अधिकारी आर पी गौतम मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने पूरा दोष वन विभाग और पुलिश विभाग पर मढ़ दिया और बताया की हमे मृत भैंसों का कोई भी अंग नही मिला. जबकि पीड़ित अखंड प्रताप दवारा बताया गया को मृत भैंसों के कुछ पैर वगैरह अंग अभी भी वहीं जंगल में पड़े हुए हैं जिनको आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर फेंक दिया था जिससे यह पता न चले की घटना करंट लगाकर कारित हुई है. जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो ही जाती है की जीव केई मृत्यु के क्या कारण थे.

 क्या कहा अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने

    जब प्राथमिकी दर्ज न किये जाने के विषय में अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की वह मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं जबकि मेडिकल रिपोर्ट इसलिए नही बनी की वेटेरिनरी अधिकारी को मवेशियों के शव ही नही मिले.

    चश्मदीख गवाह भी है पुख्ता प्रमाण 

    यद्यपि इस पूरे मामले में एक चश्मदीख गवाह भी मौजूद है. चश्मदीख प्रदीप कुमार कोल उर्फ विधायक पिता चंद्रशेखर कोल उर्फ बेसहना निवासी मरैला उम्र लगभग 20 वर्ष के द्वारा पूरी घटना की जानकारी बतायी जा चुकी है लेकिन थाना प्रभारी अतरैला प्रदीप सिंह का अब यह कहना है की जब तक आरोपी अर्जुन केवट को पुलिश पकड़ कर पूंछताछ नही करेगी तब तक प्राथमिकी दर्ज नही होगी. वहरहाल अभी तक पुलिश ने आरोपी को ढूंढने तक का प्रयाश नही किया है जबकि घटना कारित हुए एक माह से ऊपर बीत चुके हैं. 

   रेंज अफसर अतरैला का वीडियो वायरल

    बता दें की रेंज अफसर अतरैला का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमे रेंज अफसर स्वयं भी घटना कारित होने की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं और बता रहे हैं की करंट से न केवल भैसों की मौत हुई हैं बल्कि चीतल की भी मौत हुई है. पर अब सवाल यह उठता है की आखिर जंगली संरक्षित क्षेत्र में एमपीईबी पावर प्लांट के करंट द्वारा असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार जैसे संगीन अपराध के लिए अब तक रेंज के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया? आखिर पूरे मामले में एमपीईबी की भी तो जबाबदेही तय है की आखिर उनके द्वारा पावर प्लांट में उत्पन्न की जाने वाली बिजली का दुरुपयोग आपराधिक किस्म के लोग कैसे कर रहे हैं?

 संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें पीड़ित अखंड प्रताप सिंह दवारा लिखित दिया गया आवेदन एवं साथ में करंट में मृत हुई भैंसों के कंकाल आदि जिन्हें बताया गया की आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर वहीं नदी में फेंक दिया था.

------------------------

शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Friday, January 4, 2019

चल-पशु तस्करी मामले में टी आई के विरुद्ध आई जी को की गयी शिकायत, पत्रकारों ने कार्यवाही की किया माग (बैकुंठपुर थाना क्षेत्र का है मामला जिसमे चल-पशु तस्करी पर पर्दा डालने पुलिश ने पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसाने की दी थी धमकी साथ ही पत्रकारों को टी आई मंगल सिंह ने बताया था फ़र्ज़ी)

दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।

   बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब

   बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।

चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे

   सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है? 

    इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।

    पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत

    चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है। 

    बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।

   बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।  

     सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।

     पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।

संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।

--------------------------------

शिवानन्द द्विवेदी

 सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139