सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र मोब 9589152587, 7869992139
"One who is unattached to the fruits of his work and who works as he is obligated is in the renounced order of life, and he is the true mystic: not he who lights no fire and performs no work". - |||श्रीमद भगवद गीता, अध्याय 6, Verse 1|||
दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।
बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब
बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।
चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे
सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है?
इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।
पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत
चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है।
बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।
बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।
सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।
पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।
संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
दिनाँक 06 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
ज़िले के चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटी में हुए अब तक से सबसे भीषण गोहत्या और गोप्रताड़ना के बारदात में अब तक लगभग डेढ़ सैकड़ा गायों को घाट के ऊपर निकाला गया है. अभी भी कई सैकड़ा गोवंशों के घाटी में फंसे होने की सूचना है लेकिन घाटी इतनी गहरी और विस्तृत है की वहां तक पहुच पाना असंभव सा प्रतीत होता है. यह काम रेस्क्यू आपरेशन में ट्रेनिंग प्राप्त प्रोफेशनल के सहयोग एवं जंगली इलाकों में रहने वाले लोगों के सहयोग से ही पूरी तरह संभव है.
दिनाँक 06 दिसंबर को वेटेरिनरी कर्मचारियों ने किया इलाज, फंसी गायों के लिए पहुचा भूषा
दिनाँक 06 दिसंबर को एक बार फिर सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी के डायरेक्शन में चचाई की गहरी घाटियों में फंसे गोवंशों के लिए भूषा पहुचाया गया साथ ही वेटेरिनरी विभाग सिरमौर के प्रशिक्षु सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी रमेश सिंह, प्रतिबंधक संत कुमार साकेत एवं राष्ट्रीय किसान संगठन के मप्र मंत्री वंश गोपाल सिंह, कठमना निवासी विजय सिंह के सहयोग से हजारों फीट की चचाई जलप्रपात की गहरी घाटी में पहुचा गया जहां पर प्रारंभिक स्थल पर मात्र 10 गोवंश ही मिले. उम्मीद की गई की यह वही गोवंश थे जो रेस्क्यू के दौरान उसी स्थान पर छूट गए थे. साथ ही इनमे से वह गाय भी सम्मिलित थी जिसके पैर में चोट की वजह से कीड़े पड़ गए थे. पशु चिकित्सक के रूप में गए रमेश सिंह एवं संत कुमार साकेत ने गोवंशों का स्वास्थ्य चेक किया और आवश्यकतानुसार कमजोर गोवंशों को क्रमसः 9 एंटीबायोटिक, 9 मल्टी विटामिन इंजेक्शन लगाया. साथ ही 3 गायों को दर्द बुखार के इंजेक्शन लगाए, घाव वाली गाय के घाव को धोकर एकबार फिर मलहम पट्टी की गई. इनमे से एक बैल था जो स्वस्थ्य था जिसको कोई उपचार नही किया गया.
बांस के पत्ते तोड़कर खिलाये और भूसा डाला
इस बीच ऊपर चचाई रेस्ट हाउस के पास स्टोर किया गया एक बोरी भूषा ले जाया गया और सभी गोवंशों को थोड़ा थोड़ा दिया गया साथ ही वहां पर बांस के पत्ते भी तोड़कर खिलाये गए जिससे पशुओं के स्वास्थ में सुधार हो सके और उन्हें भी किसी प्रकार से चढ़ाकर घाट के ऊपर तक लाया जा सके.
गहरी घाटी में पहुचना था काफी मुश्किल
इस बीच दिनाँक 06 दिसंबर को शाम 5 बजने को थे और चचाई एवं पुरवा की गहरी और लगभग 20 किमी के विस्तार में फैली घाटी में पहुच पाना काफी मुश्किल था. पूरी घाटी में घुसने के लिए शुबह सूर्योदय से ही प्रवेश करते हुए दिन भर का समय देना पड़ेगा तभी जाकर कुछ सार्थक कार्य किया जा सकेगा.
सबसे बड़ी चुनौती रेस्क्यू किये गए पशुओं का रिहैबिलिटेशन
आज रीवा ज़िले में पशुओं के रखने के लिए कोई समुचित गोशाला नही है जहां इन्हें रखा जा सके. सबसे बड़ी चुनौती आज यह है की कैसे अधिक से अधिक गोशालाओं की व्यवस्था की जाए और कैसे इन गोवंशों का पुनर्वाश और पोषण किया जा सके. ज्ञातव्य है की रीवा में लक्ष्मण बाग गोशाला पहले से ही भस्ट्राचार की बलि चढ़ चुकी है जहां पर गोवंशों का पूरा खाना पशुओं को न दिया जाकर गोशाला प्रबंधन समिति के लोग खाये जा रहे हैं और गोवंश भूंखों मर रहे हैं.
बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमिता
अभी अभी खोली गई बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमितता देखने को मिल रही है. जब चचाई घाट से रेस्क्यू किये गए मवेशियों को बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में डालने की बात आई तो वहां का प्रबंधन संभाल रहे अरुण गौतम का कहना था की मीडिया में बात मत रखिये तो जितने चाहिए उतने लाकर डाल दीजिए. कुछ चचाई के लोगों द्वारा बताया गया की प्रति मवेशी 500 रुपये फिक्स किया हुआ है जो पैसा देता है उसके मवेशी डाल लेता है और जो नही देता उसे वापस कर देता है.
300 की क्षमता पर कैसे पहुच गए ढाई हजार?
सबसे बड़ी बात यह है जब मंत्री के पिए राजेश पांडेय से बात की गई तो उसका कहना था की हमारे पास बसामन मामा में जगह नही बची है और हमारी क्षमता मात्र 300 की है तब सवाल यह उठता है की गोवंशों की संख्या वन्य विहार केंद्र में ढाई हजार कैसे पहुच गई? निश्चित तौर पर जिस प्रकार लक्षमण बाग में इनकी दलाली और गोवंशों के नाम पर भ्रष्टाचार चल रहा था ठीक वही इन्होंने बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी प्रारम्भ कर दिया है.
घायल रेस्क्यू किये गए गोवंशों तक के लिए मना कर दिया
जब चचाई से रेस्क्यू किये गए गोवंशों को बसामन मामा में रखने की बात अरुण गौतम और मंत्री के पीए राजेश पांडेय के समक्ष रखी गई तो इनके लिए जगह नही थी लेकिन ढाई हजार के लिए जगह कहां से निकल आई? 500 रुपये प्रति मवेशी लेकर घुसेड़ने का धंधा इनका काफी पुराना है जो लक्षमण बाग में भी चलता था.
संलग्न - दिनाँक 06 दिसंबर 2018 को चचाई घाट के नीचे जाकर गोवंशों का इलाज किया गया एवं साथ ही उनके लिए भूसे चारे की भी व्यवस्था की गई. घाटी के नीचे पहुचे कार्यकर्ता की तस्वीर.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, 9589152587, 78699992139
दिनांक 26 नवंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा, मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
ज़िले की गहरी घाटियों और जलप्रपातों के अंदर से एक बार फिर बुरी खबर आई है. आवारा पशुओं से परेशान लोगों और किसानों ने एकबार फिर आवारा पशुओं के हज़ारों की संख्या के झुंड को गहरी घाटियों के नीचे धकेल दिया है जिनके लिए अब उनके जीवन का संकट उत्पन्न हो चुका.
चचाई जलप्रपात के अंदर का है मामला
पिछले दिनों मरहा घाट के नीचे जो गोवंशों को धकेले जाने का मामला सामने आया था उसी कड़ी में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा शोध करने पर ज्ञात हुआ की चचाई रेस्ट हाउस से लगे हुए और जलप्रपात के नीचे जाने के रास्ते से हज़ारों गोवंशों को समय समय पर हज़ारों फीट गहरी घाटियों के नीचे उतारा जा रहा है. जानकार सूत्रों से पता चला की यह घटनाक्रम कोई अकेला नही है और नियमित अंतराल में मवेशियों को घाट के नीची मौत के घाट उतारा जा रहा है.
पशुओं के लिए कालापानी की सजा
वास्तव में देखा जाय तो दिनांक 24 एवं 25 नवंबर 2018 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी एवं ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली के सदस्य विनोद सिंह द्वारा जो फ़ोटो और वीडियो डिटेल्स हज़ार फीट गहरी घाटी के नीचे से इकट्ठे किये गए वह आत्मा तक को भी दहला देने वाले हैं.
चचाई घाट के नीचे से बड़ी मुश्किल से उतरकर देखा गया तो पाया गया की यह रास्ता मानव के ही चलने योग्य नही तो भला इसमे चारपाये डोमेस्टिक मवेशी कैसे निकल सकते थे. यह घटना वाकई पशु क्रूरता की बेइंतेहा और हद पर करने वाली घटना थी जिंसमे इन मवेशियों को जबरन मार मारकर घाट के नीचे उतारा गया था. काफी मवेशियों के चोट के निशान भी पाए गए हैं.
टेढ़ा मेढ़ा खाइयों से भरा पथरीला दुर्गम है रास्ता
हज़ारों फीट नीचे घाट में पहुचने से पहले ही मात्र सौ दो सौ फीट गहराई से ही मवेशियों और जानवरों के मरे और सड़ी हुई दुर्गंध आने लगी थी. जिस स्थान पर चचाई वाटरफॉल में ज्यादा पानी भरा हुआ दीखता है वहां ऊपर से देखने पर कुछ समझ नही आ रहा था. यह रास्ता भी इतना फिसलन भरा था की इससे नीचे उतर पाना बहुत कठिन कार्य था. लेकिन किसी तरह से पेड़ों और झाड़ियो को पकड़ पकड़कर नीचे उतरा गया. एक स्थान पर यह रास्ता ब्लॉक भी दिखा जिंसमे वहीं आसपास के छोटे पत्थर लगाकर रास्ता को ब्लॉक कर दिया गया था. आसपास लकड़ी काटने वाले लकड़हारों से जानकारी मिली की जो लोग इन पशुओं को घाट के नीचे उतार देते हैं वह इन रास्तों को बाद में बन्द किये हैं जिससे यह गोवंश वापस न पलट पाएं और यहीं अपनी जान गवां दें जिससे लोगों को आवारा पशुओं से हमेशा के लिए निजात मिल जाए.
रास्ते में मिले दर्ज़नों मृत मवेशी और उनके कंकाल
इस बीच घाट के नीचे बड़ी मुश्किल से उतरते हुए कई मवेशियों के मृत कंकाल और बदबू मारती हुई डेड बॉडी भी मिली जिनको की सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया गया. यह सबूत पर्याप्त थे जो इस बात की गवाही दे रहे थे की पशु क्रूरता के चलते ही इन मवेशियों की मौतें हुईं हैं.
यहां तक की घाट के ऊपर से ही एक मवेशी एक बड़े पेंड के नीचे मृत देखा जा सकता था जिसकी की ऊपर से फ़ोटो भी लेने के प्रयास किये गए थे. वह अभी भी मौजूद है.
रेतीले भाग में पाए गए सैकड़ों जीवित गोवंश
इस बीच पेड़ों और झाड़ियों को पकड़ पकड़कर उतरते हुए जब कुछ समतल भाग में पहुचा गया तो वहां पर काफी रेत दिखी जिंसमे पैर धस रहा था. वहीं पर बगल में वाटरफॉल का पानी भी जमा हुआ था जिंसमे बहाव नही था. ऐसा लगा की यहां पर आकर मवेशी इसीलिए इकठ्ठे हुए थे क्योंकि यहां पर पानी का स्रोत उपलब्ध था. आसपास देखने पर पता चला की जंगली पेड़ों की ऐसी पत्तियां जिन्हें यह घरेलू पशु नही खाते इसके अतिरिक्त और कोई भी चारा अथवा पशुओं के खाने योग्य वहां पर कुछ नही पाया गया. कुछ आसपास हरे बांस के पौधे पाए गए लेकिन बांस की जो पत्तियां नजदीक थीं उनको तो पहले ही यह पशु खा चुके थे परंतु अब बांस की पत्तियां भी उपलब्ध नही थीं जो काफी ऊंचाई में थीं.
पशु ज्यादा भागने में असमर्थ, काफी बैठ चुके थे
इन पशुओं को थोड़ा और भी करीब से देखा गया तो पाया गया की यह पशु चल फिर पाने में पूरी तरह से असमर्थ थे. कुछ अभी जो चल फिर पा रहे थे वह कुछ यंग थे. जो गोवंश ज्यादा उम्र वाले थे वह अब बैठ चुके थे. एक दो मवेशी ऐसे भी दिखे जिनके शरीर में गहरे चोट के निशान थे और खून बह रहा था. चूंकि वहां पर वेटेरिनरी फैसिलिटी उपलब्ध नही थी अतः उसके लिए कुछ नही किया जा सका.
सबसे बड़ा प्रश्न - वन विभाग के अंदर पशु क्रूरता का जिम्मेदार कौन?
सबसे प्रथम बात तो यह है की चचाई जलप्रपात के नीचे पूरी तरह से एक आरक्षित क्षेत्र है जहां वन विभाग और शाशन की निगाह रहती है. बताया गया की यहाँ पर एक परमानेंट बीट गॉर्ड भी है लेकिन वह कभी भी अपनी ड्यूटी देने नही आता. इस बीच पिछले तीन चार दिनों में घाटी के नीचे टांगी और कुल्हाड़ी लिए हुए काफी लकड़हारे भी मिले जो बेहिचक और बेरोकटोक लकड़ियां काट रहे थे और पूंछने पर बताया की यहां उनका रोज का धंधा है कोई कुछ नही बोलता.
इससे स्पष्ट है की सबसे जिम्मेदार वन एवं पर्यावरण विभाग ही है जिसने इस प्रकार की पशु क्रूरता होने दिया और इसमे कोई रोंक नही लगाई. सूत्रों और ग्रामीणों ने यहां तक बताया की यह सब वन विभाग की सह से ही किया जा रहा है. बताया गया की वन विभाग के कर्मचारी ग्रामीणों से पैसे लेते हैं और पशुओं को घाट के नीचे उतरवाते हैं. लकड़हारों ने बताया की जब कोई मुंसी और बीट गार्ड यहां पर आता है वह हमसे पैसे ले लेता है और हमे छोंड़ देता है.
अब क्या है आगे का रास्ता?
अब सबसे बड़ी बात यह है की हज़ारों की संख्या में फंसे हुए इन गोवंशों को निकालने के लिए क्या किया जाए? क्या इस चचाई घाट की दुर्दान्त पहाड़ियों और घाटियों के बीच से इन गोवंशों को निकाला जाना संभव है? चूंकि मानव तक को उतरने और चढ़ने में भारी मुश्किल का सामना करना पड़ता है ऐसे में घाट के नीचे हज़ारों फीट गहरी खाई में उतार दिए गए इन गोवंशों को ऊपर कैसे लाया जाय यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है.
आसपास के ग्रामीणों से जानकारी मिली की यही पथरीले और कठिन रास्ते हैं जिनसे एक एक करके इनको ऊपर लाया जा सकता है अन्यथा फिर घाट के नीचे ही नीचे लगभग 20 किमी दूरी पथरीले भाग से होते हुए इन्हें आगे निकाल दिया जाय. यद्यपि दोनो ही स्थितियों में कार्य बहुत मुश्किल है.
पुलिश प्रशासन, वन एवं ज़िला प्रशासन का मिले सहयोग
इस रेस्क्यू अभियान में पुलिश, वन एवं अन्य ज़िला प्रशासन का सहयोग चाहिए होगा वरना यह कार्य इतना आसान नही होगा. संभव है इसमे एक सप्ताह के आसपास का समय लग जाए. क्योंकि झुंड में इन मवेशियों को निकालने का कार्य संभव नही होगा. इन्हें एक एक करके ही निकाला जा सकेगा.
इस बीच पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं और उच्चस्तरीय मंत्रालयों और विभागों के हस्तक्षेप से काम में आसानी होगी.
संपर्क - डीएफओ रीवा श्री विपिन पटेल - 9424793326
सीसीएफ रीवा संभाग श्री अतुल खेड़ा - 9424793325
कलेक्टर रीवा श्रीमती प्रीति मैथिल नायक
- 9977742118,
कमिश्नर रीवा संभाग - 9425088190
संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें चचाई वाटरफॉल के नीचे धकेले गए हज़ारों की संख्या में हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे फंसे गोवंश.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
दिनाँक 17 नवंबर 2018, स्थान - भठवा/गढ़/गंगेव रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेद, रीवा मप्र)
विकाश और भ्रष्टाचार तो एक ऐसा मुद्दा है ही जिनमे काफी लोग मतदान के बहिष्कार और नोटा दबाने की बातें करते रहते हैं, इसके अतिरिक्त भी कई ऐसे इशू हैं जिनके चलते मतदाता चुनाव बहिष्कार की बातें कर रहे हैं.
हाई टेंशन लाइन ने मतदाताओं की बढ़ाई टेंशन
मामला है ज़िले के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र 73 के मतदान केंद्र क्रमांक 15 का जहां पर पताई पंचायत अन्तर्गत अतरैला शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने वाले स्कूली बच्चों के अभिभावकों ने हाई टेंशन लाइन न हटाये जाने की स्थिति में सामूहिक तौर पर मतदान से बाहिष्कार करने की बातें कही हैं.
दिनाँक 16 नवंबर 2018 को समाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी से चर्चा के दौरान यूट्यूब चैनल के लिए दिए गए अपने लगभग 12 मिनट के इंटरव्यू में उपस्थित दर्ज़नों अभिभावकों ने पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया की पिछले कई वर्षों से स्कूल परिसर के भीतर माध्यमिक भवन के ठीक ऊपर से छूती हुई गुजरी हाई टेंशन लाइन के खुले खतरनाक तारों की वजह से गांव वालों को काफी टेंशन है.
इस विषय में अभिभावकों ने कई मर्तबा स्कूल शिक्षा विभाग से लेकर बिजली विभाग के स्थानीय एवं ज़िले के अधिकारियों तक बातें पहुचाई है लेकिन अब तक मात्र कागज़ी कार्यवाही ही चलती रही है, जबकि धरातल पर स्थिति वैसे ही बनी हुई है.
हाई टेंशन लाइन हटाएं वरना करेंगे मतदान का बहिष्कार
उपस्थित अभिभावकों प्रमोद सिंह, सूर्यपाल सिंह, राजाराम कोरी, रामलाल विश्वकर्मा, रामबहोर कोरी, चंद्रिका कोरी आदि ने बताया की हमारे बच्चों के जीवन में बराबर संकट मंडरा रहा है और कभी भी कोई भीषण हादसा हो सकता है. कई बार स्कूल एवं विजली विभाग को अवगत कराए जाने के बाबजूद भी कार्यवाही न होना बच्चों के जीवन के प्रति प्रशासनिक निर्दयता को दर्शाता है. यदि ऐसा है तो हम भी वोट नही करेंगे चाहे जो जाए. सबसे पहले यहां स्कूल परिसर से हाई टेंशन लाइन हटाये तभी मतदान करेंगे वरना हम सब गांव वाले 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा के चुनाव का खुले तौर पर बहिष्कार करेंगे यह कहना था अभिभावकों का.
11 केवी लाइन की वजह से मतदान के दिन भी हो सकती है दुर्घटना
वास्तव में देखा जाए तो जिस प्रकार से हाई टेंशन लाइन के तार छत को छूते हुए निकले हुए हैं उससे मतदान के दिन भी भीड़भाड़ में कोई भी अप्रिय दुर्घटना हो सकती है. अमूमन बताया जाता है की यदि बारिश का मौसम है और शरीर गीला है ऐसे में लगभग ढाई से तीन मीटर दूरी से भी हाई टेंशन लाइन के तार शॉक दे देते हैं. इसके पूर्व भी हाई टेंशन लाइन की वजह से कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमे पीड़ित का बचना मुश्किल हो जाता है.
जेई एवं डीई ने बताया एस्टीमेट जारी हुआ
इस बीच जब सामाजिक कार्यकर्ता ने संबंधित बिजली विभाग के अधिकारियों से जानकारी चाही तो त्योंथर डिविजनल इंजीनियर रामचरण पटेल एवं लालगांव कनिष्ठ यंत्री उमाशंकर द्विवेदी द्वारा बताया गया की स्कूल परिसर अथवा कहीं की भी लाइन शिफ्ट करवाने के लिए विभाग के पास कोई बजट नही होता. संबंधित पीड़ित पक्ष जब संबंधित एस्टिमटेड राशि को बिजली विभाग को प्रदान करता है तो लाइन शिफ्ट करने का कार्य विभाग द्वारा कराया जाता है. यह पूँछे जाने पर की जब स्कूल बनी हुई थी तो हाई टेंशन की लाइन परिसर के भीतर से क्यों खींची गई. इस पर जबाब मिला की लाइन पहले से थी और स्कूल भवन का निर्माण बाद में कराया गया अतः जिम्मेदारी और गलती बिजली विभाग की नही बल्कि स्कूल शिक्षा विभाग की है.
क्या कहा रीवा डीईओ अंजनी त्रिपाठी ने
जब इस विषय में रीवा जिला शिक्षा अधिकारी अंजनी कुमार त्रिपाठी से उनके मोबाइल फ़ोन में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा जानकारी चाही गई तो पहले डीईओ रीवा ने जानकारी नही होने की बात कही. बाद में जैसे ही उन्हें बताया गया की अतरैला स्कूल एवं हिनौती शंकुल केंद्र के प्राचार्य द्वारा एस्टीमेट डीईओ कार्यालय रीवा भेज दिया गया है तब उनका कहना था की यह माध्यमिक शिक्षा विभाग का मामला होने से रमसा द्वारा नही बल्कि डीपीसी द्वारा सुलझाया जाएगा. इस प्रकार डीईओ रीवा ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया.
बिजली एवं स्कूल शिक्षा विभाग में मामले को लेकर मचा है हड़कंप
इस बीच जानकारी मिली है की जिस प्रकार से पताई और उसके आसपास अतरैला आदि ग्रामों मतदाताओं और अभिभावकों ने 28 नवंबर के मतदान के बहिष्कार की बात की है उससे बिजली विभाग सहित स्कूल शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है. स्वयं अतरैला स्कूल माध्यमिक शाला एवं प्राथमिक शाला के हेड भी काफी चिंतित और परेशान नजर आये साथ ही डीईओ रीवा की भी बोलती बन्द दिखी. यद्यपि डीईओ ने डीपीसी पर मामला थोपने की कोशिश की लेकिन कहा की हम मामले को दिखवा रहे हैं.
हिनौती शंकुल केंद्र के प्राचार्य सबसे अधिक जिम्मेदार
वास्तव में देखा जाए तो स्थानीय स्तर पर दर्ज़नों शंकुल स्कूलों की जिम्मेदारी मात्र शंकुल केंद्र के प्राचार्य पर हुआ करती है. शंकुल केंद्र का प्राचार्य ही स्थानीय स्तर पर सर्वेसर्वा हुआ करता है. जो जानकारी शंकुल केंद्र के प्राचार्य द्वारा डीईओ एवं डीपीसी को भेजवाई जाती है और जिस तन्मयता के साथ लगकर कार्य करवाया जाता है कार्य उसी हिसाब से हो पाता है.
अतरैला शासकीय पूर्व माध्यमिक पाठशाला के मामले में शंकुल केंद्र हिनौती के प्रभारी प्राचार्य रमाकांत चतुर्वेदी को कई मर्तबा फ़ोन से लेकर व्यक्तिगत एवं आवेदनों के माध्यम से अभिभावकों एवं सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा भी सूचित किया गया है लेकिन स्कूली बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करते हुए हिनौती स्कूल शानुल प्राचार्य ने मामले को गम्भीरता से लिया ही नही जिसका की परिणाम है शंकुल के अंदर आने वाली स्कूलों में रमसा और डीपीसी के पास फण्ड होने के वाबजूद भी समय पर विद्युत लाइनें शिफ्ट न किया जाना. जिसका की परिणाम यह हुआ की व्यथित अभिभावकों ने लोकतंन्त्र के सबसे पड़े पर्व मतदान दिवस को भी मतदान से बहिष्कार करने का फैसला लिया है. जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्कूल शिक्षा विभाग की बनती है.
देखना होगा चुनाव आयोग क्या एक्शन लेता है
अब देखना यह होगा की मतदान के बहिष्कार के इस मामले में केंद्रीय एवं मप्र चुनाव आयोग क्या एक्शन लेता है. इस बीच अतरैला स्कूल परिसर में हाई टेंशन लाइन के सम्पूर्ण मामले सहित अभिभावकों के यूट्यूब इंटरव्यू को मप्र राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त सहित भारत निर्वाचन आयोग नई दिल्ली के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ओपी रावत को भी सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा ट्विटर एवं ईमेल के मॉध्यम से भेज दी गई है और ग्रामीण अभिभावकों की पीड़ा व्यथा को समझते हुए मामले पर तत्काल संज्ञन लेते हुए हाई टेंशन लाइन तत्काल शिफ्ट करवाकर भय रहित वातावरण में मतदान कराए जाने की माग की गई है.
संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें किस तरह से अतरैला स्कूल परिसर में छत को छूते हुए हाई टेंशन लाइन 11 केवी के खुले तार झूल रहे हैं साथ ही स्कूल परिसर में उपस्थित छात्र, शिक्षक और अभिभावक. ट्विटर एवं ईमेल के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त भारत निर्वाचन आयोग सहित अन्य विभागों को भेजे गए ईमेल की प्रतियां के स्क्रीनशॉट.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139