दिनांक 06 सितंबर 2026 | रीवा (मध्य प्रदेश)
पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत महायज्ञ एवं कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। 31 अगस्त से प्रारंभ हुआ यह पापविनाशक महायज्ञ 07 सितंबर दिन सोमवार को हवन एवं विशाल भंडारे के साथ पूर्ण आहुति देकर समाप्त होगा।
कथा व्यास ने छठे दिन नौवें और दसवें स्कंध का भावपूर्ण वर्णन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, भगवान परशुराम के तेजस्वी चरित्र तथा भारतीय संस्कृति और वर्ण व्यवस्था के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाला।
*श्रीमद भगवत कथा: भटकी मानवता का एकमात्र मार्गदर्शक*
कथा वाचक डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला ने कहा कि सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण भगवान नारायण के 24 अवतारों और उनकी दिव्य लीलाओं पर केंद्रित है। आज के भौतिकवादी दौर में, जहाँ मानव मूल्य घट रहे हैं, श्रीमद्भागवत महापुराण भटकी हुई मानवता के लिए एकमात्र सहारा और वरदान है। यह संसार रूपी घोर अंधकार में प्रकाश पुंज की तरह काम करती है। इसमें मानव जीवन प्रबंधन के सभी अमूल्य सूत्र मौजूद हैं।
कथा में इस बात पर बल दिया गया कि शास्त्रों के आदर्शों के बिना कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती। आज समाज भौतिक सुख-सुविधाओं को ही अपना आदर्श मान बैठा है, जबकि बिना त्याग और कठिन परिश्रम के जीवन का परिष्कार संभव नहीं है।
*परिश्रम से प्राप्त धन की तीन गतियाँ:*
नैतिक शास्त्रों का हवाला देते हुए बताया गया कि परिश्रम से अर्जित धन की केवल तीन गतियाँ होती हैं — दान, भोग और नाश। यदि धन का उपयोग दान या सात्विक उपभोग में न किया जाए, तो उसका नष्ट होना तय है। आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में भी समय पर बजट का उपयोग न होने पर उसके 'लैप्स' हो जाने का सिद्धांत इसी सनातन सत्य की पुष्टि करता है।
*श्रीराम और श्रीकृष्ण: भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ*
कथा के दौरान भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के अवतारों की तुलनात्मक एवं वैज्ञानिक विवेचना की गई जिसमें त्रेतायुग में मध्याह्न (दिन के 12 बजे) अवतरित हुए। इनका चरित्र अत्यंत शांत, सीधा, सरल और मर्यादा की प्रतिमूर्ति है। जबकि भगवान श्रीकृष्ण के विषय में उन्हें द्वापरयुग में अर्धरात्रि (रात के 12 बजे) अवतरित हुए बताया गया। इनका चरित्र अत्यंत रहस्यमयी, गूढ़ और लीलाओं से परिपूर्ण (लीला पुरुषोत्तम) है। कथा व्यास ने चिंता जताते हुए कहा कि आज माता-पिता अपने बच्चों का नामकरण पाश्चात्य संस्कृति के आधार पर कर रहे हैं। यदि अपनी संस्कृति के प्रति यही अंधानुकरण जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपने वास्तविक महापुरुषों और आदर्शों को भूल जाएँगी। उन्होंने शास्त्रों की अंधभक्ति के बजाय उनकी विज्ञान-संगत और समयानुकूल व्याख्या करने पर जोर दिया।
*महर्षि जमदग्नि, परशुराम और विश्वामित्र का प्रसंग*
नौवें स्कंध के अंतर्गत कथा व्यास ने 'संस्कार के सिद्धांत' की वैज्ञानिकता को समझाया जिसमें चारु परिवर्तन कथा में राजा गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह ऋचिक ऋषि से हुआ था। संतान प्राप्ति हेतु ऋचिक ऋषि ने ब्राह्मण और क्षत्रिय गुणों से युक्त दो अलग-अलग 'अभिमंत्रित चारु' तैयार किए। गुण-धर्म का हस्तांतरण विषय पर बताया गया कि भूलवश चारु के आपस में बदल जाने के कारण सत्यवती के गर्भ से क्षत्रिय स्वभाव वाले जमदग्नि (भगवान परशुराम के पिता) का जन्म हुआ, जबकि क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के बावजूद विश्वामित्र में ब्राह्मणीय सात्विक व तपस्वी गुण आए।
इस बीच भगवान परशुराम का अवतरण की कथा का वर्णन हुआ जिसमें बताया गया कि अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं और कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों द्वारा ऋषि जमदग्नि के वध का प्रतिशोध लेने तथा अधर्म का नाश करने हेतु भगवान विष्णु के रूप में परशुराम जी का अवतरण हुआ।
*वैदिक वर्ण व्यवस्था: जन्म नहीं, 'गुण-कर्म-स्वभाव' पर आधारित*
कथा में वैदिक वर्ण व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप पर गहरा चिंतन प्रस्तुत किया गया जिसमें बताया गया कि इसका एक वैज्ञानिक आधार है जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार वर्ण व्यवस्था व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित थी, न कि जन्म या जाति पर। परम पुरुष का रूपक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि ऋग्वेद में वर्णित 'परम पुरुष' के विभिन्न अंगों (शीर्ष से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और चरणों से शूद्र) से उत्पत्ति का अर्थ समाज के विभिन्न संभागों और उनके कार्यों का प्रतीकात्मक विभाजन था।
वहीं 'द्विज' का वास्तविक अर्थ का वर्णन करते हुए बताया गया कि बाल्यावस्था में हर मनुष्य अज्ञानता के कारण शूद्र समान होता है। शिक्षा, संस्कार और ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसका 'दूसरा जन्म' होता है, जिसे 'द्विज' कहा जाता है। इसे केवल बाहरी कर्मकांडों तक सीमित करना गलत व्याख्या है।
*सोमवार दिनांक 07 सितंबर को भंडारे का कार्यक्रम*
पावन यज्ञस्थली कैथा में चल रहे इस दिव्य आयोजन के अंतिम चरण में 07 सितंबर (सोमवार) को पूर्णाहुति, विशाल हवन एवं महा भंडारे का आयोजन किया जाएगा। आयोजन समिति ने क्षेत्र के समस्त धर्मप्रेमी बंधुओं से इस पापविनाशक महायज्ञ में सम्मिलित होकर पुण्य लाभ अर्जित करने की अपील की है।
*विशेष ब्यूरो रिपोर्ट — रीवा (मध्य प्रदेश)*
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