दिनांक 24 मई 2026 रीवा मप्र।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के बेरोजगार युवकों को लेकर की गई टिप्पणी जिसमें उनके द्वारा ऐसे बेरोजगार जिनको काम नहीं मिल पा रहा है और सोशल मीडिया, मीडिया ज्वाइन कर लेते हैं और साथ में आरटीआई एक्टिविस्ट बन जाते हैं वह एक कॉकरोच और परजीवी की तरह हैं, को लेकर आलोचनाओं का बाजार निरंतर गर्म है। बताया गया की देखा जाय तो यह स्वाभाविक भी है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के द्वारा ऐसी टिप्पणी किया जाना काफी दुर्भाग्यपूर्ण भी है जिसको लेकर 309 वें सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय वेबीनार में उपस्थित विशेषज्ञों ने अपनी चिंताएं जाहिर की और इसे काफी दुर्भाग्यपूर्ण बताया। 309 वें वेबीनार में जहां मुख्य न्यायाधीश के बयान पर भी चर्चा हुई वहीं लोकायुक्त मध्य प्रदेश बनाम पूर्व पुलिस निरीक्षक कामता प्रसाद मिश्रा के प्रकरण को लेकर अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया के द्वारा 14 मई 2026 को दिए गए एक आदेश और ऐतिहासिक टिप्पणी पर भी चर्चा हुई जिसमें सुप्रीम कोर्ट की दो बैंच के जजों के द्वारा कहा गया था कि क्या मध्यप्रदेश लोकायुक्त कोई खुफिया एजेंसी है जिसके द्वारा आरटीआई से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी जा रही है और क्या इनको इस तरह की जानकारी न देने के लिए कोई विशेष छूट है? दोनों ही मामलों को लेकर देश के विभिन्न कोनों से सूचना के अधिकार के क्षेत्र से जुड़े हुए लोग और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी बातें रखी और विचार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा सुबह है 11:00 बजे से लेकर दोपहर 2:00 बजे तक 3 घंटे के लिए किया गया।
*युवाओं को कॉकरोच अथवा पैरासाइट कहना अनुचित, इससे मनोभवना आहत होती है - पंक्ति जोग*
गुजरात से माहिती अधिकार पहल गुजरात एवं आरटीआई हेल्पलाइन की कार्यकर्ता एवं समाजसेवी पंक्ति जोग ने बताया की सीजेआई के कथन जिसमें उनके द्वारा कॉकरोच और परजीवी की संज्ञा बेरोजगार युवकों के लिए दी गई वह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे देश की एक बहुतायत युवा आबादी आहत होती है। देश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को ऐसे कथनों से परहेज करना चाहिए। लोकायुक्त मध्य प्रदेश बनाम कामता प्रसाद मिश्रा मामले में पंक्ति जोग ने बताया कि यह मामला काफी गंभीर है और लोकायुक्त को ऐसी जानकारियां साझा करनी चाहिए। बताया गया कि 20 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद हुए अगले आदेश पर टिकी हुई है।
*लोकायुक्त से संबंधित जानकारी देने के कई आदेश दिए - सूचना आयुक्त राहुल सिंह*
कार्यक्रम में पधारे मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में लोकायुक्त से जुड़े हुए कई प्रकरणों में जानकारी दिए जाने के आदेश दिए हैं और उनके द्वारा कई मामलों में जुर्माना भी लगाए गए हैं। राहुल सिंह ने कहा कि लोकायुक्त निश्चित तौर पर एक संगठन है जिसमें कुछ विशेष जानकारी को छोड़कर शेष सभी जानकारी दिए जाने का प्रावधान रहता है और इसमें किसी भी प्रकार से छूट का प्रावधान नहीं है और ऐसे संगठनों को पारदर्शिता एवं जवाबदेही के लिए जानकारी देनी चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत के कॉकरोच और परजीवी के बयान को लेकर उन्होंने भी चिंता जाहिर की और कहा कि इस प्रकार के बयान से देश की बहुतायत जनता आहत होती है और लोकतंत्र कमजोर होता है। वरिष्ठ संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को ऐसे बयानों से बचना चाहिए।
*देश में 6 करोड़ की न्यायिक मामलों पर कार्यवाही पहली जरूरत, बयानवाजी से नहीं सुलझेंगे मामले - प्रवीण पटेल*
कार्यक्रम में पधारे गुजरात एवं वर्तमान में रह रहे छत्तीसगढ़ से समाजसेवी एवं फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के कन्वीनर एवं ट्रस्टी प्रवीण पटेल ने बताया कि देश में इस समय लगभग 6 करोड़ के आसपास न्यायिक पेंडेंसी बढ़ती जा रही है जो काफी चिंता का विषय है और गंभीर मामला है। सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया और सभी हाई कोर्ट को मिलकर इस विषय पर कार्य करने की जरूरत है कि कैसे मामलों का जल्दी निराकरण हो और लोगों को न्याय मिले। न्याय में देरी एक समस्या है और ऐसे में परजीवी और काकरोच जैसे बयान से न्याय व्यवस्था कमजोर होती है और कहीं न कहीं इसकी कमियां उजागर होती है जिस पर ज्यादा चिंतन और मनन किया जाने की जरूरत है।
*मेरा शोषण हुआ, गलत तरीके से ट्रैप में फसाया गया और लोकायुक्त से जानकारी मागी तो देने से मना किया - पूर्व टीआई कमाता मिश्रा*
लोकायुक्त प्रकरण के ट्रैप की कार्यवाही में तत्समय कटनी में पदस्थ रहे पुलिस निरीक्षक कामता प्रसाद मिश्र ने बताया कि उनके द्वारा शराब माफिया और अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही की गई थी जिसके बाद उन्हें ट्रैप की कार्यवाही में फंसा दिया गया और अब तक कोई चालान तक पेश नहीं कर पाई जबकि 7 साल का समय व्यतीत हुआ है जिसको लेकर उन्होंने आरटीआई लगाकर अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिए जानकारी मांगी थी लेकिन लोकायुक्त के द्वारा जानकारी देने से मना किया गया। जिसके बाद उन्होंने सूचना आयोग में अपील की। सूचना आयुक्त ने भी जानकारी नहीं दिलवाई तो हाईकोर्ट गए जिसमें जानकारी देने के आदेश हुए और 5 हजार रुपए का जुर्माना भी संबंधितों के विरुद्ध लगाया गया। इसके बाद लोकायुक्त स्वयं इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गया और सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में सुनवाई पूरी की है और आदेश सुरक्षित रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त को कहा है कि क्या लोकायुक्त कोई खुफिया ऑर्गनाइजेशन है जो इस प्रकार की महत्वपूर्ण देने योग्य जानकारी रोक रहे हैं अथवा उन्हें क्या धारा 24 के तहत ऐसी कोई छूट मिली हुई है? इसका जवाब लोकायुक्त से मांगा था।
मामले में उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने भी अपने 15 पेज के पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन में देश की पूरी न्यायिक व्यवस्था और लोकायुक्त एस्टेब्लिशमेंट एक्ट एवं आरटीआई के विषय में उपस्थित पार्टिसिपेंट्स को जानकारी दी।
कार्यक्रम में पूरे देश के सैकड़ो आरटीआई एक्टिविस्ट सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*