दिनांक 21 जून 2026 रीवा मप्र।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना जहां हरियाणा के एक मामले में RTI लगाने वाले आवेदकों के एक अग्रिम जमानत याचिका मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए RTI कानून को लेकर ही सवाल खड़े कर दिए। जजों ने कुछ इस प्रकार कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म एक किस्म का नया बिजनेस बन गया है और उन आवेदकों को यह भी कहा कि सड़क निर्माण की निगरानी करने वाले वह कौन होते हैं? हालांकि सामान्य तौर पर जिस प्रकार सुनवाई के दौरान अक्सर जजों द्वारा या कि अधिकारियों को हड़का दिया जाता है अथवा वकीलों के भी विषय में टिप्पणी कर दी जाती है अथवा फिर अन्य मामलों जैसे कई बार टिप्पणियां प्रकाश में आती रहती हैं ठीक यह टिप्पणी भी वैसे ही है न कि यह उनके ऑर्डर में कहीं लिखा गया है। अतः कई विश्लेषकों का यह मानना है कि इन टिप्पणियों के कानूनी पक्ष को ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन विश्लेषकों का यह भी मानना है कि जिस प्रकार कुछ समय से एपेक्स कोर्ट के निर्णयों अथवा सुनवाई के दौरान बयानबाजी हो रही हैं उससे कहीं न कहीं कोर्ट की गरिमा और गंभीरता पर भी सवालिया निशान उठने लगे हैं और चर्चा का बाजार गरम हो रहा है। गौरतलब है कि अभी कुछ सप्ताह पहले ही वकीलों, आरटीआई एक्टिविस्ट और बेरोजगार युवाओं को लेकर भी इसी प्रकार के कमेंट किए गए थे जिसको लेकर कॉकरोच जनता पार्टी अथवा अन्य संगठनों के प्रदर्शन आज भी हो रहे हैं।
*कोर्ट के कमेंट प्रकरण आधारित और इसका सामान्यीकरण किया जाना उचित नहीं - जस्टिस आदित्य नाथ मित्तल*
कार्यक्रम में पधारे इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आदित्य नाथ मित्तल ने बताया कि वह राकेश बहल मामले में यह नहीं जानते कि बहल ने कौन से आरटीआई के सवाल पूछें थे अथवा किस मामले में उनके द्वारा सड़क निर्माण कार्य का निरीक्षण किया जा रहा था अतः उसके अभाव में कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन कई बार आरटीआई और पीआईएल के नाम पर दुरुपयोग होता है जिसके कारण कोर्ट को ऐसा कमेंट करना पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान कई बार ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी जाती हैं जहां आरटीआई अथवा अपने सामाजिक स्टेटस का दबाव बनाकर कोर्ट में बाते रखीं जाती हैं जिस पर कई बार कोर्ट यह सवाल कर देते हैं लेकिन इस मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील द्वारा ऐसा क्या कहा गया जिससे कोर्ट पर नकारात्मक कमेंट करने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा यह अलग विषय है जिसकी जानकारी होना जरूरी है। श्री जस्टिस मित्तल ने बताया कि पीआईएल एवं आरटीआई दोनों का दुरुपयोग बंद होना चाहिए। राकेश बहल के मामले में कार्य ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है जबकि मात्र अग्रिम जमानत याचिका खारिज हुई है इसलिए इसे इतना गंभीरता से भी लेने की आवश्यकता नहीं है। अग्रिम जमानत देना कोर्ट के स्वयं के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है अतः कई बार अग्रिम जमानत दे दी जाती है तो कई बार खारिज कर दी जाती है।
*जजों को मामले में सुनवाई के दौरान किसी भी प्रकार की बयानबाजी से बचना चाहिए, कलम की ताकत पर दिया जाय ध्यान- जस्टिस कमलेश्वरनाथ*
वहीं मामले पर अपना पक्ष रखते हुए इलाहाबाद के वरिष्ठ रिटायर्ड जस्टिस कमलेश्वरनाथ ने बताया कि आज कल कोर्ट में सुनवाई के दौरान बयानबाजी हो रही हैं जिससे मीडिया में बातें आ जाती हैं। यह चर्चा का विषय बन जाता है। उन्होंने दो बातों पर जोर दिया। पहला बताया गया कि जजों को बयानबाजी से बचना चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिका को स्वीकार करना है अथवा खारिज करना है कर दें लेकिन बयानबाजी न करें यह उचित नहीं है। साथ ही कोर्ट की गरिमा भी प्रभावित होती है। दूसरा जस्टिस कमलेश्वरनाथ ने बताया कि सड़क निर्माण में गड़बड़ियां हैं। जैसे बरसात होती है वैसे ही सड़कें खराब हो जाती है उनमें गड्ढे हो जाते हैं। ग्रामों में कोई निगरानी नहीं होती उससे भी स्थितियां खराब रहती हैं इसलिए संविधान की कंडिका 19 एवं आरटीआई कानून में आम जनता को इसकी शक्ति मिली है कि वह सवाल करें। साथ ही उन्होंने बताया जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों का भी दायित्व है कि वह इस प्रकार के विकास कार्यों की निगरानी करें और सवाल उठाये लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहे इसलिए आमजनता यदि सवाल कर रही है तो सवाल करना उसका संवैधानिक अधिकार है जिससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर जस्टिस कमलेश्वरनाथ ने सड़क निर्माण और मूलभूत संरचनाओं में भ्रष्टाचार को स्वीकार किया और जनता के सवाल और जानने के अधिकार का पक्ष रखा।
*आरटीआई भ्रष्टाचार उजागर करने का टूल है लेकिन भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग रही यह चिंता का विषय - जस्टिस सुधीर सक्सेना*
आरटीआई एक्टिविज्म है अथवा बिजनेस एवं सुप्रीम कोर्ट के अभी हालिया फैसले एवं सुनवाई कर रहे जजों के कमेंट पर अपना पक्ष रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस सुधीर सक्सेना ने कहा कि आरटीआई कानून आम जनता का एक सशक्त अधिकार है। इस कानून के आने के बाद भ्रष्टाचार के मामले सामने आये हैं लेकिन ऐसे कई मामलों में कोई बड़ी कार्यवाही देखने को नहीं मिल रही है। इसलिए भ्रष्टाचार पर कार्यवाही हो इस विषय पर मंथन किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई बार अच्छे और निर्दोष अधिकारी भी प्रताड़ित हो जाते हैं जिसमें यूपी के आईएएस अधिकारी श्रीवास्तव का उदाहरण दिया गया। उन्होंने वेबिनार के टॉपिक पर कहा कि यह भ्रष्टाचार और आरटीआई जैसे टॉपिक पर भी आयोजित किया जाना चाहिए। जस्टिस सक्सेना ने बताया कि आरटीआई कार्यकर्ता आरटीआई लगाकर कई बार जानकारी प्राप्त करते हैं और उसमें भ्रष्टाचार सामने आता है इसलिए आरटीआई कार्यकर्ता समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के हालिया विवादित कमेंट मामले पर उन्होंने भी कहा कि यह व्यक्तिगत मामले हैं जिसका जनरलाइजेशन नहीं किया जाना चाहिए। कई बार जज सुनवाई के दौरान ऐसे कमेंट पास कर देते हैं जो उतने गंभीरता से नहीं लिए जा सकतें यह उस केस और परिस्थिति पर निर्भर करता है जिसका ऑर्डर में उल्लेख नहीं होता। उन्होंने कहा कि कानून के दुरुपयोग भी होते हैं लेकिन काफी कम हैं इसलिए आरटीआई एक्टिविस्ट को ब्लैक मेलर कहना भी उचित नहीं। वह इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि आरटीआई एक्टिविस्ट ब्लेकमेल करते हैं। आरटीआई एक्टिविस्टों ने शासन प्रशासन के बड़े मामले उजागर किए हीं इसलिए योगदान महत्वपूर्ण है।
*आरटीआई एक्टिविस्टों के लिए धरातल चुनौतियों से भरा हुआ - संतोष सिंह राठौर*
गुजरात में MDM और राशन आदि मामलों से लेकर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्य करने वाले एक्टिविस्ट संतोष कुमार राठौर ने बताया कि वास्तविक धरातल पर आरटीआई लगाने वाले लोगों के लिए जिंदगी चुनौतियों से भरी हुई होती हैं। यह सब इतना आसान नहीं होता है। कई बार आरटीआई लगाने के बाद आवेदनों को बार बार इस कार्यालय से उस कार्यालय में घुमाया जाता है। जानकारी न मिलने पर अपील शिकायत और रिट याचिकाएं लगानी पड़ती है फिर भी जानकारियां नहीं मिलती हैं। आरटीआई एक्टिविज्म कोई बिजनेस नहीं है और कोर्ट को ऐसे बयान नहीं देने चाहिए इससे आरटीआई के लिए काम करने वाले लोगों का मनोबल घटता है एवं जानकारी रोकने वाले लोगों का बढ़ता है। उन्होंने बताया कि आरटीआई ब्लैकमेल करने का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार उजागर करने एवं पारदर्शिता जवाबदेही लाने का बढ़िया साधन है।
*आरटीआई में ब्लैकमेल नहीं होते बल्कि भ्रष्टाचार दबाने के प्रयास किए जाते हैं इसलिए जानकारी रोकते हैं - वीरेंद्र ठक्कर*
उत्तराखंड के प्रोफेसर एवं आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने पूरे मामले को लेकर अपना पीपीटी प्रेजेंटेशन तैयार कर प्रस्तुत किया जिसमें सभी पहलुओं पर चर्चा की। प्रस्तुति के दौरान उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों का भी हवाला दिया। बताया गया कि आरटीआई कानून से दर्जनों देश स्तर के भ्रष्टाचार उजागर हुए हैं और इसी प्रकार लोकल स्तर में भी अनगिनत भ्रष्टाचार सामने आये और यह सब आरटीआई कानून के माध्यम से ही हुआ है। श्री ठक्कर ने कहा कि आज तक के किसी भी कोर्ट ऑर्डर में यह बात सिद्ध नहीं हो पाई है कि आरटीआई कानून का दुरुपयोग कर किसी को ब्लैक मेल किया गया है। यह सिर्फ एक धारणा हो सकती है और पूर्वाग्रह हो सकता है लेकिन किसी कोर्ट ने आरटीआई से बैकमेल होना सिद्ध नहीं किया है।
मामले को लेकर फोरम फॉर फास्ट जस्टिस एवं सोसाइटी फॉर फेडरेशन ऑफ फास्ट जस्टिस के संयोजक प्रवीण पटेल ने भी आरटीआई से उजागर हुए भ्रष्टाचार को लेकर अपने विचार रखे और अपेक्स कोर्ट ने बयानबाजी को लेकर चिंता जाहिर किम श्री पटेल ने कहा कि कोर्ट को और जिम्मेदार और संयमित होने की आवश्यकता है। नेता और अधिकारी क्या कहते हैं वह इतना मायने नहीं रखता लेकिन जब माननीय जस्टिस कोई बात कहते हैं तो उसे पूरा देश बड़े ध्यान से सुनता है।। इसलिए कोर्ट के आदेश हमेशा रेफर किए जाते हैं।
वेबिनार कार्यक्रम का संचालन सोशल एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ से देवेंद्र अग्रवाल, बुरहानपुर से हरीश सोलंकी, मप्र से सत्येंद्र सिंह चौहान एवं जयपाल सिंह खींची सहित कई कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे और आरटीआई से जुड़े सवाल जवाब किए।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट मप्र*