Sunday, August 16, 2026

Breaking: डिजिटल मंच पर नागरिक समाज की हुंकार: RTI के जरिए सामाजिक बदलाव, पारदर्शिता और जवाबदेही पर मंथन

*Breaking: डिजिटल मंच पर नागरिक समाज की हुंकार: RTI के जरिए सामाजिक बदलाव, पारदर्शिता और जवाबदेही पर मंथन//*
दिनांक 16 अगस्त 2026:

रीवा मप्र: नागरिक समाज को सशक्त बनाने, शासन में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के उद्देश्य से एक विशेष वेबिनार का आयोजन किया गया। दिनांक 16 अगस्त 2026 को आयोजित इस वेबिनार में देशभर के समाजसेवियों, अधिवक्ताओं और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य विषय 'सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम: सामाजिक परिवर्तन, वकालत और जवाबदेही का सशक्त माध्यम' रहा।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर और अन्य वक्ताओं (जिसमें पूर्व सूचना आयुक्त आत्मादीप, सुनील खंडेलवाल, राज तिवारी, उत्तम चंद वशिष्ठ, हरीश सोलंकी और अधिवक्ता रोहित त्रिपाठी शामिल थे) ने आरटीआई के व्यावहारिक उपयोग, ग्रामीण विकास, शिक्षा, भूमि नीति और इसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।

*सामाजिक परिवर्तन और वकालत में एनजीओ की भूमिका*

मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने बताया कि गैर सरकारी संगठन (NGO) और नागरिक समाज केवल सूचना मांगने वाले नहीं, बल्कि 'वॉचडॉग' और नीतिगत बदलाव के उत्प्रेरक हैं। उन्होंने धारा 6 (सरल आवेदन प्रक्रिया) और धारा 8 (संकीर्ण रूप से परिभाषित छूट) का उल्लेख करते हुए नागरिकों को जागरूक करने पर जोर दिया।

*प्रक्रियात्मक साक्ष्य:* एनजीओ आवेदनों के माध्यम से प्रामाणिक आधिकारिक दस्तावेज जुटाते हैं, जिनका उपयोग जनहित याचिका (PIL) और नीतिगत संशोधनों के लिए किया जाता है।
सार्वजनिक वितरण (PDS), मनरेगा और भ्रष्टाचार पर प्रहार

वेबिनार में विभिन्न योजनाओं के सोशल ऑडिट में आरटीआई की सफलता के उदाहरण प्रस्तुत किए गए जिसमें राशन व मनरेगा: राशन दुकानों के स्टॉक रजिस्टर की जांच, फर्जी मस्टर रोल (फर्जी श्रमिकों) को बेनकाब करने और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पर्यावरण संरक्षण में भ्रष्टाचार उजागर करने में आरटीआई की भूमिका को रेखांकित किया गया। इसी प्रकार जनसुविधाओं में सुधार: पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप ने बताया कि पासपोर्ट प्रक्रिया और रेलवे टिकट बुकिंग में सुधार लाने में भी आरटीआई की बड़ी भूमिका रही है।

*ग्रामीण विकास, कृषि और स्थानीय समस्याएँ*

किसानों के मुद्दों पर आरटीआई एक्टिविस्ट राज तिवारी ने उर्वरक वितरण, फसल बीमा और मृदा परीक्षण कार्यक्रमों में आ रही समस्याओं को उठाया। इस पर वीरेंद्रकुमार ने विभागों, एनजीओ और किसानों के बीच समन्वय और पारदर्शी सूचना साझाकरण का सुझाव दिया। वहीं अतिक्रमण व स्थानीय मुद्दों को लेकर अवैध कब्जों, श्मशान घाटों की अव्यवस्था और सड़कों पर गिरे पेड़ों जैसे दैनिक नागरिक मुद्दों के समाधान के लिए कानूनी उपायों और पूर्व मामलों के संदर्भ के साथ बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी गई।
*कानूनी अधिकार, प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश और निजता*

वेबिनार में आरटीआई से जुड़ी प्रक्रियात्मक और कानूनी गलतफहमियों को दूर किया गया. जिसमें आवेदन की अस्वीकृति गलत किए जाने को लेकर कोई भी सरकारी अधिकारी 'मामला दूसरे विभाग का है' कहकर आवेदन खारिज नहीं कर सकता। वहीं व्यक्तिगत बनाम प्रक्रियात्मक मामलों को लेकर वीरेंद्रकुमार ठक्कर और हरीश सोलंकी के बीच हुई चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि आरटीआई आवेदन में किसी लोक सेवक को व्यक्तिगत रूप से लक्षित करने या उसकी योग्यता पूछने के बजाय, मांगी जा रही जानकारी और प्रक्रियात्मक खामियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अधिवक्ता और उनकी सीमाएँ विषय पर नागरिकों को कानूनी प्रतिनिधि (अधिवक्ताओं) की मदद लेने का पूरा अधिकार है। वहीं, देरी से दर्ज शिकायतों में कानूनी सीमाओं (Limitation Act) और निजता के अधिकारों के संतुलन पर भी चर्चा हुई।
*RTI पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियाँ*

चर्चा के दौरान आरटीआई कार्यकर्ताओं ने प्रणालीगत बाधाओं पर चिंता व्यक्त की गई और आयोगों में रिक्तियाँ को लेकर केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों में खाली पड़े पदों के कारण अपीलों के निपटारे में देरी हो रही है विषय पर बात रखी गई। वहीं सुरक्षा और गैर-प्रतिक्रियात्मकता को लेकर आवेदकों के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा, सूचना अधिकारियों द्वारा समय पर जवाब न देना और सीआईसी (CIC) के आदेशों के बावजूद जानकारी न मिलने जैसे मुद्दों पर कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभव साझा किए। सुझाव के तौर पर सूचना का व्यापक डिजिटलीकरण, अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण और आरटीआई का उपयोग करने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई गई।

*संस्थागत पहल, शिक्षा और जन जागरूकता रणनीति*

जन सहभागिता बढ़ाने के उपाय पर उत्तम वशिष्ठ ने आरटीआई जागरूकता को गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए ऑनलाइन कार्यक्रमों को बड़ी स्क्रीन पर प्रसारित करने और ऑफ़लाइन सूचना केंद्र स्थापित करने का विचार रखा। वहीं न्याय समूह की सक्रियता पर वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने पिछले 6 वर्षों से लगातार सक्रिय आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप, 'फोरम फॉर फास्ट जस्टिस', 'नेशनल फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर फास्ट जस्टिस' और 'मिशन फ्री लीगल एजुकेशन' की गतिविधियों की जानकारी दी। शिक्षा व भूमि नीति के संबंध में यूजीसी और एआईसीटीई के पुनर्गठन, 1895 के सरकारी अनुदान अधिनियम के निरस्त होने और संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम के प्रभाव पर तकनीकी जानकारी साझा की गई।

*निष्कर्ष व आह्वान*

    वेबिनार का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि आरटीआई केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का हथियार है। इसके प्रभावकारी उपयोग के लिए जन-जन का क्षमता निर्माण (Capacity Building), व्हाट्सएप समूहों व रविवार की बैठकों के माध्यम से निरंतर मार्गदर्शन और आरटीआई कार्यकर्ताओं का परस्पर सहयोग अनिवार्य है।
  कार्यक्रम का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में से प्रचार प्रसार में पवन दुबे एवं कार्यक्रम के दौरान मॉडरेशन में छत्तीसगढ़ से आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र कुमार अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। 

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Sunday, August 9, 2026

Breaking: राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) की राह में चुनौतियाँ और सफलता की कहानियाँ: ज़मीनी स्तर पर बदलाव की एक झलक

*Breaking: राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) की राह में चुनौतियाँ और सफलता की कहानियाँ: ज़मीनी स्तर पर बदलाव की एक झलक//*

रीवा मप्र: सूचना का अधिकार (RTI) कानून न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत हथियार साबित हो रहा है, बल्कि यह आम नागरिकों को व्यवस्था में पारदर्शिता लाने और जवाबदेही तय करने का अधिकार भी देता है। हाल ही में दिनांक 09 अगस्त 2026 को आयोजित 320 वीं आरटीआई मीटिंग में इससे जुड़ी सफल कहानियों की चर्चा की गई जिसमें बड़ी संख्या में देश के विभिन्न कोनों से आरटीआई कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। आयोजित इस संवाद/बैठक के दौरान विभिन्न RTI कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों ने ज़मीनी स्तर पर RTI के उपयोग, इसके माध्यम से मिली सफलताओं और प्रशासनिक तंत्र से मिलने वाली चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।

*RTI की सफलता की कहानियाँ और ज़मीनी प्रभाव*

  बैठक में प्रतिभागियों ने बताया कि किस तरह सतत प्रयासों से RTI का उपयोग कर जनहित के मुद्दों को सुलझाया गया है:

झारखंड से आरटीआई एवं सोशल एक्टिविस्ट सुनील खंडेलवाल ने बताया कि RTI के माध्यम से बिजली चोरी के झूठे मामलों का पर्दाफाश किया गया। इसके अलावा, रेलवे सेवाओं और बुनियादी ढांचे में सुधार, स्थानीय शिकायतों का निवारण, और रेलवे बोर्ड द्वारा हिंदी भाषा में मांगी गई जानकारियों का जवाब हिंदी में ही देने से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित कराया गया।

ग्वालियर से आरटीआई एक्टिविस्ट राज तिवारी ने RTI आवेदनों के ऑनलाइन तरीकों, समय पर जवाब प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों और इसके लिए निरंतर प्रयास बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
छत्तीसगढ़ से आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र अग्रवाल ने अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से शुरुआत कर बड़े सामाजिक मुद्दों—जैसे ब्लड बैंकों की स्थिति में सुधार, स्कूलों की फीस नियंत्रण, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क/वाहन सुरक्षा (बस और ऑटो मानक)—पर आरटीआई के जरिए सफलता हासिल की।

मप्र बुरहानपुर से हरीश सोलंकी ने औद्योगिक अपशिष्ट से होने वाले जल प्रदूषण का मुद्दा उठाया और सोक-पिट जैसे स्थानीय जल प्रबंधन समाधानों की वकालत की जिसमें उनके विरुद्ध षड्यंत्र कर फर्जी मुकदमों में फंसाया गया और पुलिस द्वारा टॉर्चर कराया गया वह अनुभव भी उनके द्वारा साझा किए गए

*प्रशासनिक चुनौतियाँ और पारदर्शिता के मुद्दे*

RTI के कार्यान्वयन में आम जनता और कार्यकर्ताओं को कई तरह की व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है:

*अधिकारियों की देरी और गलत जानकारी:* सरकारी अधिकारियों द्वारा जानबूझकर जवाब में देरी करना या अधूरी/गलत जानकारी देना एक बड़ी बाधा बताया गया।

*कानूनी अड़चनें और प्रतिशोध:* आरटीआई कार्यकर्ताओं को अक्सर कानूनी अड़चनों, अपील प्रक्रियाओं की जटिलता और यहां तक कि व्यक्तिगत प्रतिशोध का सामना करना पड़ता है।
*सज़ा और रिकवरी का क्रियान्वयन:* नियम उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर जुर्माना लगाने और उस जुर्माने की वसूली की प्रक्रिया में भी नौकरशाही की सुस्ती देखी गई है।

*मध्य प्रदेश में RTI का सफल मॉडल: राहुल सिंह का नेतृत्व*

बैठक में मध्य प्रदेश में आरटीआई के जरिए आए क्रांतिकारी सुधारों की विशेष चर्चा हुई:

राहुल सिंह के नेतृत्व में रीवा संभाग से शुरू हुए आरटीआई-आधारित भुगतान ट्रैकिंग सिस्टम' का पूरे मध्य प्रदेश में विस्तार किया गया।

इस प्रणाली के ज़रिए मप्र की 23000 से अधिक पंचायतों में राशन भुगतान से जुड़े भ्रष्टाचार और धांधली का खुलासा हुआ।

उपस्थित प्रतिनिधियों ने माना कि पारदर्शिता और शासन सुधार का यह मॉडल पूरे देश में लागू किया जा सकता है।

*सर्कुलर इकोनॉमी और अन्य प्रक्रियात्मक मुद्दे*

*रेलवे और सर्कुलर इकोनॉमी:* गिरिडीह झारखंड से सुनील खंडेलवाल ने सर्कुलर इकोनॉमी की पहल, विलफुल डिफॉल्टर्स के मामलों और कोविड-19 के बाद रेलवे स्टेशनों और परिवहन सेवाओं में आई कमियों पर भी ध्यान आकर्षित किया और उनके द्वारा किए गए सुधारात्मक प्रयासों की चर्चाएं की।

*तकनीकी व संचार विकल्प:* ऑनलाइन बैठकों (जैसे WebEx या Google Meet) में आने वाली तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए व्हाट्सएप वीडियो या ऑडियो कॉल जैसे वैकल्पिक संचार माध्यमों के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई।

*निष्कर्ष*

बैठक के अंत में सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि आरटीआई के माध्यम से वास्तविक सामाजिक बदलाव लाने के लिए:

व्यावहारिक और यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करने होंगे।

निरंतर और सस्टेन्ड प्रयास जारी रखने होंगे।

कार्यकर्ताओं को एक-दूसरे के अनुभवों से सीखकर और मीडिया व न्यायपालिका के सहयोग से आगे बढ़ना होगा।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

Sunday, August 2, 2026

Breaking:आरटीआई अधिनियम सुदृढ़ीकरण पर 319वीं बैठक: मुख्य बिंदु और सिफारिशें

*Breaking:आरटीआई अधिनियम सुदृढ़ीकरण पर 319वीं बैठक: मुख्य बिंदु और सिफारिशें*

हाल ही में दिनांक 02 जुलाई 2026 को प्रत्येक रविवार को आयोजित होने वाले सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम को मजबूत करने और भारत में पारदर्शिता ढांचे को बेहतर बनाने के लिए 319वीं बैठक का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने की। इस प्रस्तुति और चर्चा में देश में आरटीआई ढांचे के सामने आ रही प्रमुख चुनौतियों, कार्यान्वयन की कमियों और आवश्यक सुधारों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
*मुख्य चुनौतियाँ और वर्तमान स्थिति*

*दंड प्रावधानों का कमजोर कार्यान्वयन:* बैठक में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, केवल लगभग 0.5% आरटीआई आवेदनों में ही दोषी अधिकारियों पर जुर्माना लगाया जाता है, जबकि 99.5% मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती।

*लंबित मामले और स्टाफ की कमी:* सूचना आयोगों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या, केंद्रीय और राज्य स्तर पर जन सूचना अधिकारियों (PIOs) का अपर्याप्त प्रशिक्षण और स्टाफ की कमी मुख्य चिंता का विषय बनी हुई है।

*छूट का अनुचित प्रयोग:* लोक प्राधिकारियों द्वारा आरटीआई अधिनियम की छूट धाराओं का व्यापक और असंगत उपयोग किया जा रहा है।

*डिजिटल और सुरक्षा बाधाएं:* दूरदराज के क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी और आरटीआई कार्यकर्ताओं/उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा व संरक्षण के लिए मजबूत तंत्र का न होना।
*सुधार हेतु प्रमुख सिफारिशें*

*धारा 4 के तहत स्वतः प्रकटीकरण (Proactive Disclosure):* सरकारी निकायों द्वारा धारा 4 का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि नागरिकों को आरटीआई दायर किए बिना ही अधिकांश जानकारी मिल सके। इससे आवेदनों का बोझ कम होगा।

*एकीकृत डिजिटल पोर्टल:* सभी राज्य सूचना आयोगों को बहुभाषी सहायता वाले एक केंद्रीकृत और एकीकृत ऑनलाइन पोर्टल से जोड़ा जाए।

*मानकीकृत प्रशिक्षण:* पीआईओ (PIOs) के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित पाठ्यक्रम और अनिवार्य मानकीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू किए जाएं।

*स्वतंत्रता और स्वायत्तता की बहाली:* सूचना आयुक्तों की निष्पक्षता और प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए उनकी नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और वैधानिक कार्यकाल/सुरक्षा तंत्र को बहाल किया जाए।

*सुरक्षा ढांचा:* आरटीआई उपयोगकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स के खिलाफ धमकियों और उत्पीड़न से निपटने के लिए एक समर्पित ढांचा तैयार किया जाए।

*चर्चा के अन्य पहलू*

बैठक के दौरान प्रतिभागियों ने धारा 2 के तहत प्रमाणित प्रतियों को प्राप्त करने की कानूनी प्रक्रिया, आवेदनों के हस्तांतरण (Transfer Procedures), द्वितीय अपील, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की वित्तीय रिपोर्टिंग की अनुपालन आवश्यकताओं और गोपनीयता बनाम जनहित के संतुलन जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर प्रश्न पूछे और कानूनी समाधानों पर मार्गदर्शन प्राप्त किया।
*अगले कदम (Next Steps)*

*बैठक की सामग्री साझा करना:* सभी प्रतिभागियों के साथ बैठक की प्रस्तुति स्लाइड (Presentation Slides) और रिकॉर्डिंग साझा की जाएगी।

*प्रशिक्षण संसाधन*: पीआईओ के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और आरटीआई प्रशिक्षण कार्यक्रमों से संबंधित संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।

*प्रश्नों का समाधान:* प्रतिभागियों द्वारा उठाए गए विशिष्ट आरटीआई मामलों और कानूनी प्रश्नों पर व्यक्तिगत मार्गदर्शन दिया जाएगा

कार्यक्रम का सफल संचालन सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी देवेंद्र अग्रवाल द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। जबकि पवन दुबे का प्रचार प्रसार ए महत्वपूर्व योगदान रहा। प्रतिभागियों में जयपाल सिंह खींची, फतेह चंद्र गुलेरिया, राज तिवारी, नरेश सैनी सुरेश मौर्य आदि सम्मिलित हुए।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

Saturday, August 1, 2026

Breaking: रीवा में Tata परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने को लेकर कलेक्टर कार्यालय ने PMO को भेजा ज्ञापन// सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी सहित अन्य लोगों ने सौंपा था ज्ञापन// कमिश्नर के बाद कलेक्टर कार्यालय ने भी लिया संज्ञान//

*Breaking: रीवा में Tata परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने को लेकर कलेक्टर कार्यालय ने PMO को भेजा ज्ञापन// सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी सहित अन्य लोगों ने सौंपा था ज्ञापन// कमिश्नर के बाद कलेक्टर कार्यालय ने भी लिया संज्ञान//*
दिनांक 01 अगस्त 2026 रीवा मप्र

रीवा (मध्य प्रदेश)। रीवा जिले में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plant) को पर्यावरण सुरक्षा के दृष्टिकोण से अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं अन्य स्थानीय नागरिकों द्वारा प्रस्तुत किए गए ज्ञापन को रीवा कलेक्टर कार्यालय ने विचार-विमर्श एवं अग्रिम कार्यवाही हेतु सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), नई दिल्ली को प्रेषित कर दिया है।

*क्या है पूरा मामला?*

कलेक्टर कार्यालय रीवा द्वारा जारी पत्र (क्रमांक 614/व.लि.-1/2026, दिनांक 30/07/2026) के अनुसार, सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी (निवासी ग्राम कैठा, तहसील मनगवां, जिला रीवा) तथा अन्य नागरिकों ने एक ज्ञापन सौंपकर जिले में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र की स्थापना पर गंभीर आपत्ति जताई थी।

*ज्ञापन में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि:*
पर्यावरण एवं स्थानीय जनजीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रीवा जिले में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित न किया जाए।

इस परियोजना को किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित (Shift) किया जाए।

*प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा गया मूल ज्ञापन*

रीवा के डिप्टी कलेक्टर सुधीर कुमार बेक द्वारा हस्ताक्षरित इस आधिकारिक पत्र में उल्लेख किया गया है कि प्राप्त ज्ञापन में उठाई गई मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के लिए इसे मूल रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय (नई दिल्ली) को प्रेषित (सम्पेक्षित) किया जा रहा है। इसकी एक प्रतिलिपि संबंधित आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को भी सूचनार्थ भेजी गई है।

पर्यावरण सुरक्षा पर गहराया मंथन
रीवा में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लेकर स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों में चिंता का माहौल है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र से पर्यावरण, जल स्रोतों और आसपास की घनी आबादी पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा इस ज्ञापन पर क्या रुख अपनाया जाता है।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

Saturday, July 18, 2026

Breaking: हिनौती सरकारी स्कूल में भवन क्षतिग्रस्त, 700 बच्चों का भविष्य खतरे में// प्राचार्य प्रमोद कुमार पांडेय ने दी जानकारी, कहा जल्द करवाया जाय मरम्मत कार्य// पंचायत विभाग का 25 लाख का टीएस अधर में अटका// कलेक्टर कमिश्नर से लगाया मरम्मत का गुहार// पंचायत विभाग ने बताया फंड नहीं मिलने से नहीं कराया काम // गौरतलब है, जिला खनिज मद से किया जाना था निर्माण कार्य// बाबूगिरी के चक्कर एवं संजय सिंह की लापरवाही के चलते मामला कहां अटका किसी को नहीं पता//

*Breaking: हिनौती सरकारी स्कूल में भवन क्षतिग्रस्त, 700 बच्चों का भविष्य खतरे में// प्राचार्य प्रमोद कुमार पांडेय ने दी जानकारी, कहा जल्द करवाया जाय मरम्मत कार्य// पंचायत विभाग का 25 लाख का टीएस अधर में अटका// कलेक्टर कमिश्नर से लगाया मरम्मत का गुहार// पंचायत विभाग ने बताया फंड नहीं मिलने से नहीं कराया काम // गौरतलब है, जिला खनिज मद से किया जाना था निर्माण कार्य// बाबूगिरी के चक्कर एवं संजय सिंह की लापरवाही के चलते मामला कहां अटका किसी को नहीं पता//*
दिनांक 18 जुलाई 2026 रीवा मप्र।

    रीवा मप्र के गंगेव जनपद की हिनौती उच्चतर माध्यमिक विद्यालय एक बार पुनः चर्चा के केंद्र में है। वजह यहाँ के क्षतिग्रस्त भवन हैं जहां 700 से अधिक कक्षा 01 से 12 तक के बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं। ताजा अपडेट सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के स्कूल परिसर में प्राचार्य के साथ वार्तालाप में सामने आया जहां पालक शिक्षक संघ एवं गणमान्य नागरिकों के साथ बैठक में बातें रखीं गईं। मौके पर चर्चा के दौरान हालिया रीवा संभागीय आयुक्त शीलेन्द्र सिंह एवं रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के निर्देशों की भी चर्चा हुई जहां ऐसे जर्जर भवनों में कक्षा संचालित न करने की सख्त मनाही की गई है। 
   
   *क्षतिग्रस्त भवनों की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक प्रेषित - प्राचार्य प्रमोद कुमार पांडेय*
 
    चर्चा के दौरान हिनौती सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य प्रमोद कुमार पांडेय ने बताया कि पिछले वर्ष से ही क्षतिग्रत भवनों के नवनिर्माण एवं मरम्मत कार्यों की कवायद की जा रही है और समय समय पर शासन स्तर से गूगल शीट आदि गूगल मीट आदि के माध्यम से चाही गई जानकारियां प्रेषित की जाती रहती हैं। यदि प्राचार्य की मानें तो क्षतिग्रस्त भवनों की समस्त जानकारी अधोसंरचना निर्माण की जानकारी में प्रतिवर्ष प्रेषित की जाती रहती है। 
    लिखित तौर पर भी प्रस्ताव एवं अन्य पत्राचार पंचायत विभाग एवं सरपंच को दिए गए हैं।
  *25 लाख रुपए की कार्यपालन यंत्री द्वारा अनुमोदित तकनीकी स्वीकृति वर्षों से अधर में - सरपंच पूनम सिंह*

   यदि ग्राम पंचायत सेदहा सरपंच श्रीमती पूनम सिंह की मानें तो स्कूल के क्षतिग्रस्त पड़े कमरों एवं भवनों की पूरी जानकारी ग्राम सभा के प्रस्ताव सहित पहले ही पंचायत विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और इंजीनियर को भेजी जा चुकी है। सरपंच प्रतिनिधि पुष्पराज सिंह ने बताया कि ग्राम पंचायत द्वारा विधिवत ग्राम सभा का प्रस्ताव पारित किया जाकर कार्यपालन यंत्री, उपयंत्री एवं सहायक यंत्री द्वारा हिनौती स्कूल भवन में क्षतिग्रस्त भवनों के मरम्मत एवं पेवर ब्लॉक के कार्य के लिए पत्र क्रमांक 1252 दिनांक 17/11/2025 के माध्यम से तकनीकी स्वीकृति आदेश जारी किया गया था जो कि 25 लाख की सीमा के अंतर्गत है। लेकिन यह जिला खनिज मद से जारी किया जाना था जो कि आज दिनांक तक कार्ययोजना में ही शामिल नहीं कराया गया है जिसकी वजह से अभी प्रशासकीय स्वीकृति आदेश जारी न होने और फंड के अभाव की वजह से काम रुका है।
  *तो क्या इस बाबूगिरी और लालफीताशाही के चक्कर में फंसा रहेगा 700 छात्रों का भविष्य संकट में?*

    यदि प्राचार्य और सरपंच की मानें तो यहां स्थानीय निकाय स्तर एवं स्कूल ने अपना दायित्व पूरा कर दिया है। अब बड़ा सवाल यह है जब स्कूल के 700 से अधिक छात्रों एवं दर्जनों शिक्षकों का जीवन संकट में बना हुआ है ऐसे में आखिर लगभग 8 माह पूर्व वर्ष 2025 में जारी की गई तकनीकी स्वीकृति अभी तक कैसे जिला माईनिंग कार्यालय के प्रमुख संजय सिंह की टेबल में धूल फांक रही है। गौरतलब है कि जिला माईनिंग फंड कार्यालय पहले भी काफी बदनाम रहा है जहां काम वही होते हैं जब कुछ चढ़ावा चढ़ जाता है बाकी यह कोई देखने वाला नहीं है कि कार्य की अर्जेंसी और प्राथमिकता का स्तर क्या है। इसके पहले भी कई ऐसी ग्रेवल सड़कें हैं जिनके लिए गांववालों ने वर्षों पूर्व से आंदोलन किया था लेकिन वह सभी कार्य आज भी चढ़ावा के अभाव में लटके पड़े हैं जबकि अन्य बाद के कार्यों के लिए राशि जारी की जा चुकी हैं। 
  *क्या जिला कलेक्टर और संभाग आयुक्त जिला माईनिंग फंड के ओआईसी संजय सिंह पर करेंगे कार्यवाही?*

  सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि उन्होंने डीएमएफ विभाग को संजय सिंह से हटाकर किसी अन्य अधिकारी को आवंटित किए जाने के लिए पहले भी कमिश्नर को ज्ञापन दिया था लेकिन उस पर कार्यवाही मात्र पत्राचार तक ही सीमित रह गई है। उनका मानना है जब तक जिला माईनिंग फंड का ओआईसी नहीं बदला जाता तब तक कार्यों की प्राथमिकता और सही जानकारी कभी भी जिला कलेक्टर के समक्ष पेश नहीं की जा सकेगी। हालांकि उन्होंने वर्तमान जिला कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी पर भरोसा जताया है और जल्दी कार्यवाही किया जाकर जल्द से जल्द हिनौती स्कूल के क्षतिग्रस्त भवन परिसर के मरम्मत और निर्माण की आशा व्यक्त की है।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

Sunday, July 12, 2026

Breaking: आरटीआई (सूचना का अधिकार) बैठक: प्रणालीगत चुनौतियाँ, संशोधन और नागरिक सहभागिता// पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने प्रतिभागियों के सवालों का दिया जवाब// उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने दिया स्लाइड प्रस्तुति// गुजरात माहिति अधिकार पहल से पंक्ति जोग भी कार्यक्रम में हुई शामिल//

*Breaking: आरटीआई (सूचना का अधिकार) बैठक: प्रणालीगत चुनौतियाँ, संशोधन और नागरिक सहभागिता// पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने प्रतिभागियों के सवालों का दिया जवाब// उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने दिया स्लाइड प्रस्तुति// गुजरात माहिति अधिकार पहल से पंक्ति जोग भी कार्यक्रम में हुई शामिल//*
दिनांक 12 जुलाई रविवार को राष्ट्रीय स्तर पर 316 वें आरटीआई वेबिनार का आयोजन किया गया। हाल ही में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में देश में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की वर्तमान स्थिति, इसके क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं और व्यवस्था में सुधार के उपायों पर गहन चर्चा की गई। बैठक में आरटीआई कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों से जुड़े विभिन्न पहलुओं को रेखांकित किया गया।

*आरटीआई संशोधन अधिनियम 2019 और स्वायत्तता पर संकट*

बैठक के मुख्य सत्र में आरटीआई संशोधन अधिनियम 2019 और सूचना आयोगों की स्वतंत्रता पर इसके प्रभाव को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई।

*शक्तियों का हस्तांतरण:* चर्चा में यह बात सामने आई कि इस संशोधन के माध्यम से नियम बनाने की शक्तियां संसद के बजाय केंद्र सरकार के पास चली गई हैं, जिससे सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन संरचना में बदलाव आया है।

*स्वायत्तता से समझौता:* विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि इस कदम से आयोगों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है, जबकि मूल रूप से इनकी संरचना को चुनाव आयोग के समान स्वायत्त रखने की परिकल्पना की गई थी।

*लंबित याचिकाएं:* इस दौरान जयराम रमेश बनाम भारत संघ जैसे सर्वोच्च न्यायालय के मामलों का भी उल्लेख किया गया, जिसमें इन संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है और जो फिलहाल अदालत में लंबित हैं।

*क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और व्यवस्था का भय*

प्रतिभागियों ने जमीन स्तर पर आरटीआई कानून को लागू करने में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को साझा किया:

*प्रतिशोध का डर:* आरटीआई का उपयोग करने वाले लोगों में सुरक्षा को लेकर भय का माहौल है। यहाँ तक कि उच्च न्यायालय के वकीलों को भी आरटीआई मामलों को आगे बढ़ाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

*प्रशासनिक भ्रष्टाचार:* भोपाल से लेकर दिल्ली तक, सरपंच से लेकर उच्च अधिकारियों तक विभिन्न स्तरों पर कमीशनखोरी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के मामलों पर चर्चा हुई। एक उदाहरण भी सामने आया जहाँ निरीक्षण के दौरान बंदूक ले जाने पर एक सरकारी इंजीनियर को निलंबित कर दिया गया था।

*प्रणालीगत सुधार और तकनीकी मुद्दे
पंक्ति जोग, सुदीप साहू और राज तिवारी जैसे प्रतिभागियों ने आरटीआई प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया:

*प्रशासनिक सुधार*: पंक्ति जोग ने प्रशासन के लिए "तेरापका" (Terapka) नामक प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया, ताकि जवाबदेही बढ़ाई जा सके।

*कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण:* राजनीतिक नियुक्तियों और भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आरटीआई कार्यकर्ताओं को उचित प्रशिक्षण और सहायता देने की मांग उठाई गई।

*तकनीकी बाधाएं:* ऑनलाइन शिक्षण और सरकारी प्रणालियों के बीच कनेक्टिविटी की समस्याओं पर भी बात की गई, जो सूचना के प्रवाह को बाधित करती हैं।
*कानूनी प्रक्रियाएं, गैर-अनुपालन और अपील रणनीति*

जब सूचना आयोग के आदेशों का पालन नहीं होता है, तो नागरिकों के पास क्या विकल्प हैं, इस पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया गया.

*धारा 18 के तहत अपील:* पूर्व5मप्र सूचना आयुक्तराहुल सिंह और परवीन ने चिकित्सा रिकॉर्ड से जुड़े मामलों का उदाहरण देते हुए कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notices) को संभालने और सूचना आयोग में धारा 18 के तहत शिकायत करने की प्रक्रिया समझाई।

*आदेशों की नाफरमानी:* कोर्ट और आयोग के आदेशों का पालन न होने पर पंक्ति जोग ने सुझाव दिया कि विभागीय सेवा नियमों के तहत संबंधित विभाग के प्रमुख से संपर्क किया जाना चाहिए, भले ही यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो।

*दबाव समूहों का गठन:* आयोगों द्वारा गलत या अधूरे आदेश जारी करने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए एक 'दबाव समूह' (Pressure Group) बनाने का प्रस्ताव रखा गया, जो स्वतः संज्ञान (Proactive Disclosures) और पारदर्शिता के लिए पैरवी कर सके।

*नागरिक सहभागिता और गिरता ग्राफ*

सड़क निर्माण जैसे सकारात्मक बदलावों में आरटीआई की सफलता को स्वीकार करते हुए, प्रतिभागियों ने देश में गिरते सामाजिक सक्रियता के स्तर पर चिंता जताई.

*मीडिया की स्वतंत्रता पर नियंत्रण:* सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया पर बढ़ते नियंत्रण के कारण नागरिक सहभागिता कमजोर हो रही है, जिससे राष्ट्रीय मामलों में बाहरी ताकतों का प्रभाव बढ़ने का खतरा है।

*ब्लॉक स्तर पर प्रेरणा की कमी:* रोहित त्रिपाठी और नरेंद्र जैन ने जमीनी स्तर (ब्लॉक स्तर) पर लोगों को आरटीआई दाखिल करने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता पर बल दिया। नरेंद्र ने एक मेडिकल कॉलेज में भुगतान संबंधी विसंगतियों के खिलाफ आरटीआई और अदालती कार्यवाही का अपना अनुभव भी साझा किया।

*निष्कर्ष व मुख्य सुझाव:*

बैठक के अंत में सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि नौकरशाही की प्रतिगामी (पीछे ले जाने वाली) मानसिकता को बदलने की जरूरत है। साथ ही, आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के अनुपालन और सरकारी विभागों द्वारा स्वतः जानकारी साझा करने (Proactive Disclosure) को अनिवार्य बनाकर ही इस कानून की मूल भावना को जीवित रखा जा सकता है।
कार्यक्रम का संचालन हमेशा की भांति सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि अन्य लोगों में देवेंद्र अग्रवाल, आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर, सुनील खंडेलवाल, राज तिवारी आदि सैकड़ों प्रतिभागी सम्मिलित हुए।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

Sunday, July 5, 2026

Breaking: 315वां आरटीआई और कानूनी वेबिनार: लोकतांत्रिक जवाबदेही और पारदर्शिता को मजबूत करने पर विशेष चर्चा

*Breaking: 315वां आरटीआई और कानूनी वेबिनार: लोकतांत्रिक जवाबदेही और पारदर्शिता को मजबूत करने पर विशेष चर्चा*
रीवा मप्र: हाल ही में 'आरटीआई और लोकतांत्रिक जवाबदेही' (RTI & Democratic Accountability) विषय पर 315वें आरटीआई एवं कानूनी वेबिनार का आयोजन किया गया। इस बैठक में मुख्य वक्ता आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्रकुमार ठक्कर, मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह एवं आत्मदीप सहित कई कानूनी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। वेबिनार में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 के संवैधानिक महत्व, इसके प्रभावी कार्यान्वयन और जमीनी स्तर पर आने वाली चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की गई।

नीचे इस वेबिनार से जुड़ी मुख्य बातें और विभिन्न मामलों में दिए गए कानूनी परामर्श की विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:

1. *आरटीआई का संवैधानिक आधार और विकास* 

मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने स्पष्ट किया कि आरटीआई केवल एक वैधानिक कानून नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में निहित है।

उन्होंने इसके विकासक्रम को रेखांकित करते हुए बताया कि कैसे 1996 के जन आंदोलनों (जैसे राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन की जनसुनवाई) से होते हुए अक्टूबर 2005 में यह एक राष्ट्रव्यापी सशक्त कानून बना। आरटीआई मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर काम करता है:

*सक्रिय प्रकटीकरण (धारा 4):* सरकारी विभागों द्वारा स्वतः जानकारी सार्वजनिक करना।

*मांग पर पहुंच:* नागरिकों द्वारा आवेदन करने पर 30 दिनों के भीतर सूचना देना।

*प्रवर्तन तंत्र:* सूचना न देने पर अपील प्रक्रिया और लोक सूचना अधिकारियों (PIO) पर दंड का प्रावधान।

2. *आरटीआई कार्यान्वयन में मुख्य चुनौतियां*

वेबिनार में देश भर में आरटीआई के क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई:

*सूचना आयोगों में बैकलॉग:* अदालतों और आयोगों में लंबित मामलों और आयुक्तों के खाली पदों के कारण फैसलों में देरी हो रही है।

*कार्यकर्ताओं की सुरक्षा:* उत्तराखंड जैसे राज्यों का हवाला देते हुए आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ बढ़ती धमकियों और हिंसा पर चिंता जताई गई।

*गोपनीयता बनाम जनहित:* आरटीआई अधिनियम की धारा 8 के तहत दी गई छूट और नए डेटा संरक्षण कानूनों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया, ताकि व्यक्तिगत गोपनीयता की आड़ में महत्वपूर्ण जनहित की सूचनाओं को दबाया न जा सके।

*प्रशासनिक शिथिलता:* गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में जन सूचना अधिकारियों द्वारा जानकारी देने में की जा रही देरी और मनमाने आदेशों की आलोचना की गई।

3. *नए श्रम कानूनों और ईपीएफ (EPF) पर चर्चा*

वेबिनार में 21 नवंबर, 2025 से लागू हुए नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) पर भी चर्चा हुई। वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने बताया कि इन सुधारों ने 29 पुराने कानूनों को समाहित कर लिया है, जिससे इसका दायरा 18 करोड़ से बढ़कर 50 करोड़ कामगारों (जिसमें प्लेटफॉर्म वर्कर्स भी शामिल हैं) तक पहुंच गया है। कर्मचारियों द्वारा भविष्य निधि (PF) कटौती की 1800 रुपये की नई सीमा पर जताई गई चिंताओं पर उन्होंने सलाह दी कि किसी भी प्रकार के उल्लंघन के खिलाफ श्रम अदालतों और आरटीआई के माध्यम से कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

*विभिन्न मामलों में विशेषज्ञों द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश (Action Items)*

बैठक के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े कानूनी और प्रशासनिक मामलों पर विशेषज्ञों ने निम्नलिखित रणनीतिक सुझाव दिए:

*छत्तीसगढ़ पर्यावरण मामला:* छत्तीसगढ़ पर्यावरण विभाग को व्यापक जानकारी मांगने के बजाय केंद्रीय/राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB/SPCB) की विशिष्ट और मौजूदा रिपोर्टों पर केंद्रित आरटीआई आवेदन दोबारा तैयार करने की सलाह दी गई।

*राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत:* सेवा मामलों में महिलाओं के अधिकारों के उल्लंघन को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) में शिकायत दर्ज कराने और यह स्पष्ट घोषणा करने को कहा गया कि यह मामला किसी अन्य अदालत में लंबित नहीं है।

*बिजली चोरी और जुर्माना मामला:* बिजली विभाग में मीटरिंग की समस्या के बावजूद चोरी का जुर्माना लगाने के खिलाफ नियमानुसार 50% राशि जमा कर अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer) के समक्ष अपील दायर करने का निर्देश दिया गया।

*उत्तर प्रदेश सूचना आयोग का नियम:* यूपी के उस नियम को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का सुझाव दिया गया जो आयोग को अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार (Review) की अनुमति देता है, क्योंकि यह मूल आरटीआई अधिनियम की भावना के विपरीत हो सकता है। इसके अलावा, झूठे हलफनामों के मामले में आरटीआई के जरिए तारीखें साबित कर कानूनी कार्रवाई करने की बात कही गई।

*सीएम हेल्पलाइन शिकायत:* शिकायत को बिना उचित समाधान के बंद करने के कारणों को जानने के लिए संबंधित विभाग में नया आरटीआई आवेदन दायर करने की सलाह दी गई।

*प्रथम अपील में देरी:* प्रथम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा समय पर निर्णय न लेने के खिलाफ राज्य सूचना आयोग (SIC) में दूसरी अपील करने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ सामान्य प्रशासन विभाग में शिकायत दर्ज कराने की रणनीति सुझाई गई।

*महाराष्ट्र सरकार के नियमों को चुनौती:* आरटीआई के संबंध में महाराष्ट्र सरकार के कुछ नियमों को 'अल्ट्रा वायर्स' (मूल कानून के दायरे से बाहर) होने के आधार पर उच्च न्यायालय में चुनौती देने का परामर्श दिया गया।

*पारिवारिक पेंशन मामला:* बच्चे की आजीविका से जुड़े इस संवेदनशील मामले में त्वरित समाधान के लिए संबंधित सूचना आयुक्त से व्यक्तिगत मुलाकात कर अनुरोध करने की सलाह दी गई।

*पर्यावरणीय उल्लंघन:* नदी के पास औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण के खिलाफ उचित दस्तावेजों के साथ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में 'पत्र याचिका' (Letter Petition) दायर करने का सुझाव दिया गया।

*निष्कर्ष और आगे की राह*

विशेषज्ञ आत्मदीप ने सत्र का समापन करते हुए प्रतिभागियों को सलाह दी कि वे केवल शिकायतें दर्ज कराने के बजाय 'अपील मार्ग' का अधिक उपयोग करें, क्योंकि अपीलीय प्राधिकारियों के पास व्यापक अधिकार क्षेत्र होता है और वे जुर्माना भी लगा सकते हैं। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया कि आरटीआई को सूचना प्राप्त करने का एकमात्र जरिया न मानकर अन्य वैकल्पिक कानूनी रास्तों का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए भविष्य में ऐसे आरटीआई चर्चा कार्यक्रमों में आम जनता की भागीदारी को बड़े पैमाने पर बढ़ाना अनिवार्य है।