*Breaking: स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट: रीवा के रोझौही में प्रस्तावित टाटा न्यूक्लियर प्लांट — विकास की उम्मीद या तबाही का आसन्न खतरा?//*
*रीवा में टाटा का न्यूक्लियर प्लांट: विकास की आस या नरोरा-काकरापार जैसी आपदाओं का आसन्न खतरा?//*
*स्पेशल रिपोर्ट: रोझौही में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र से मंडराया बड़ा खतरा, देश के पुराने हादसों से सहमे ग्रामीण!//*
*क्या रीवा बनेगा अगला परमाणु त्रासदी का शिकार? रोझौही प्रोजेक्ट के विरोध और डरावने इतिहास की पूरी सच्चाई।//*
*टाटा का न्यूक्लियर प्रोजेक्ट बनाम स्थानीय सुरक्षा: इतिहास के पन्नों में दबी परमाणु दुर्घटनाएं दे रहीं गंभीर चेतावनी।//*
*रीवा के रोझौही में परमाणु ऊर्जा संयंत्र: 28,000 करोड़ के निवेश के बीच सुरक्षा मानकों पर उठते बड़े सवाल।//*
*विकास बनाम विनाश: नरोरा और कैगा के हादसों से क्या सबक लेगा रीवा का प्रस्तावित टाटा प्लांट?//*
*रोझौही न्यूक्लियर प्लांट: विकास की उम्मीद या तबाही का खतरा?//*
*रीवा में टाटा का परमाणु संयंत्र: कितना सुरक्षित, कितना खतरनाक?//*
*परमाणु हादसों का काला इतिहास और रोझौही का सुलगता सवाल!//*
विशेष ब्यूरो रिपोर्ट
रीवा, मध्य प्रदेश
दिनांक: 30 अक्टूबर 2026
मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में ऊर्जा के मोर्चे पर एक नया अध्याय लिखने की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर देश के इतिहास में परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा और दुर्घटनाओं के डरावने आंकड़े स्थानीय आबादी की रातों की नींद उड़ाए हुए हैं। रीवा जिले की सिरमौर तहसील के अंतर्गत क्योंटी के पास रोझौही गांव में टाटा एनर्जी द्वारा देश के पहले निजी न्यूक्लियर पावर प्लांट (28,000 करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश) की स्थापना का प्रस्ताव है। हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को औद्योगिक और आर्थिक विकास का मील का पत्थर बताया जा रहा है, लेकिन यदि वैश्विक स्तर पर बात करें तो चेर्नोबिल, फुकुशिमा, थ्री माइल्स आयलैंड, एसएल-1 एवं टोकाईमुरा जैसी परमाणु संयंत्रों की भयावह दुर्घटनाएं तो हैं ही वहीं भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के अब तक के सुरक्षा इतिहास और दुर्घटनाओं के दस्तावेजों ने भी बड़े गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*भारत के परमाणु इतिहास के वे सबक, जो रोझौही के लिए चेतावनी हैं*
प्रस्तुत आधिकारिक सुरक्षा रिपोर्ट्स और एईआरबी (AERB) तथा एनपीसीआईएल (NPCIL) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि देश के विभिन्न परमाणु संयंत्रों में तकनीकी विफलताएं, आग लगने की घटनाएं, भारी पानी का रिसाव और रेडिएशन एक्सपोजर आम बात रहे हैं। यदि रोझौही में टाटा का यह न्यूक्लियर प्लांट स्थापित होता है, तो क्षेत्रवासियों को निम्नलिखित ऐतिहासिक त्रासदियों से सबक लेने की आवश्यकता है:
*1993 नरोरा परमाणु दुर्घटना (INES स्तर 3):* भारत के इतिहास की सबसे भयावह दुर्घटना उत्तर प्रदेश के नरोरा में हुई थी, जहां स्टीम टरबाइन के ब्लेड टूटने से भीषण आग लग गई थी और पूरा स्टेशन ब्लैकआउट हो गया था। कूलिंग पंप बंद होने से कोर पिघलने (Core Meltdown) यानी चेरनोबिल जैसी महाआपदा का गंभीर खतरा पैदा हो गया था। ऐसे में रोझौही जैसे ग्रामीण और संभाग क्षेत्र में इस स्तर के संयंत्र का आना कितनी बड़ी चुनौती साबित हो सकता है, यह सोचने का विषय है।
*2016 काकरापार संयंत्र दुर्घटना (INES स्तर 2):* गुजरात के काकरापार में कूलेंट पाइप क्रैकिंग और भारी पानी के भारी रिसाव के कारण रिएक्टर का दबाव तेजी से गिर गया था। इस तकनीकी चूक के कारण संयंत्र महीनों तक बंद रहा था।
*2009 कैगा का साबाटोज और पेयजल संदूषण:* कर्नाटक के कैगा परमाणु संयंत्र में अंदरूनी अपसधिक शरारत (Sabotage) के चलते अज्ञात व्यक्ति द्वारा भारी पानी में रेडियोधर्मी ट्रिटियम मिला दिया गया था, जिससे दर्जनों कर्मचारी और ऑपरेटर रेडियोधर्मी विषमता से गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे बाद में बीमारी के चलते कई की मृत्यु भी हो गई थी।
*रावतभाटा (राजस्थान) और कल्पक्कम (तमिलनाडु) के हादसे:* राजस्थान (RAPS) और मद्रास (MAPS) परमाणु संयंत्रों में समय-समय पर आग लगने, भारी पानी लीक होने (जैसे 1999 में 42 टन भारी पानी का रिसाव) और रखरखाव के दौरान कर्मचारियों के ट्रिटियम विकिरण की चपेट में आने की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
*रोझौही के ग्रामीणों में खौफ और विरोध के स्वर*
इन ऐतिहासिक आपदाओं और सुरक्षा चूकों के दस्तावेजों के सामने आने के बाद रीवा के रोझौही गांव के स्थानीय नागरिकों और किसानों में भारी रोष और डर का माहौल है। पिछले दिनों साइट पर सर्वे और ड्रिलिंग का काम शुरू होते ही हजारों ग्रामीण सड़कों पर उतर आए और काम को रोक दिया था। बाद में जल सत्याग्रह और आमरण अनशन जिसमें एक महिला आदिवासी विमला कोल की मृत्यु भी हुई थी। ग्रामीणों का तर्क है कि यदि किसी भी तकनीकी खराबी के चलते रेडियोधर्मी रिसाव या ट्रिटियम संदूषण जैसी घटना रीवा जैसी उपजाऊ और घनी आबादी वाले क्षेत्र में होती है, तो यहाँ का जनजीवन, जल स्रोत और कृषि भूमि हमेशा के लिए तबाह हो जाएगी।
*रोझौही न्यूक्लियर पावर प्लांट निरस्त करने की माग*
टाटा एनर्जी का यह प्रोजेक्ट भले ही क्षेत्र को ऊर्जा हब बनाने और हजारों रोजगार के दावे कर रहा हो, परंतु सुरक्षा मानकों, न्यूक्लियर वेस्ट मैनेजमेंट और ऐतिहासिक दुर्घटनाओं (जैसे नरोरा और काकरापार) के तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और कंपनी को पहले स्थानीय जनता को विश्वास में लेना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि रोझौही की जनता की सुरक्षा के साथ कोई खिलवाड़ न हो, अन्यथा यह विकास रीवा के लिए अभिशाप साबित हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ इस आंदोलन को शुरू से दिशा देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि न केवल रोझौही सरई के लोग बल्कि आसपास के सैकड़ो ग्रामों के रहवासी टाटा के प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रोजेक्ट को रोझौही से वापस लेने एवं निरस्त करने को लेकर अड़े हुए हैं और निरंतर आंदोलनरत हैं।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*