Saturday, September 5, 2026

Breaking:// पावन यज्ञस्थली कैथा में पांचवें दिन भी चली भागवत कथा की बयार: अजामिल उद्धार और समुद्र मंथन के आध्यात्मिक - वैज्ञानिक दर्शन पर झूमे श्रद्धालु//

*Breaking:// पावन यज्ञस्थली कैथा में पांचवें दिन भी चली भागवत कथा की बयार: अजामिल उद्धार और समुद्र मंथन के आध्यात्मिक - वैज्ञानिक दर्शन पर झूमे श्रद्धालु//*

विशेष ब्यूरो रिपोर्ट | रीवा (मध्य प्रदेश)

रीवा: रीवा जिले की पावन स्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। पिछले कुछ दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश के बावजूद भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। आचार्य डॉ गौरी शंकर शुक्ला के मुखारविंद से प्रवाहित हो रही कथा धारा में छठे से नौवें स्कंध तक के मुख्य प्रसंगों का वर्णन किया जा रहा है।
*अजामिल के पतन और उद्धार की मार्मिक कथा*

कथा के दौरान छठे स्कंध से प्रसिद्ध अजामिल प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। आचार्य जी ने बताया कि अजामिल एक वेद-शास्त्रों का ज्ञाता और संस्कारी ब्राह्मण था, जो कुसंगत और काम के आवेग के कारण धर्म मार्ग से भटक कर पतित हो गया।
परंतु, उसके पूर्व जन्मों के सात्विक और धार्मिक कर्म निष्फल नहीं गए। संतों की कृपा से उसने अपने दसवें पुत्र का नाम 'नारायण' रखा। जीवन के अंतिम क्षणों में यमदूतों को देखकर जब अजामिल ने भयभीत होकर अपने पुत्र 'नारायण' को पुकारा, तो केवल 'नारायण' नाम के उच्चारण मात्र से भगवान के पार्षद (गण) प्रकट हो गए और यमदूतों से उसकी रक्षा की। इस प्रकार अजामिल को परमधाम और मोक्ष की प्राप्ति हुई।

*जीवन प्रबंधन और कर्म-फल का सिद्धांत*

कथा व्यास ने इस प्रसंग की आध्यात्मिक विवेचना करते हुए कहा कि ईश्वर की कृपा और नाम की महिमा पूर्व जन्मों के संचित शुभ कर्मों का परिणाम होती है। भागवत महापुराण कलिकाल में पतित से पतित मानव के उद्धार का मार्ग दिखाती है। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से ईश्वर की शरण में आता है, वह न केवल स्वयं का बल्कि अपने कुल की सात पीढ़ियों का उद्धार कर देता है।
*समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम और मोहिनी अवतार*

कथा के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, महर्षि दधीचि का अस्थिदान, भगवान विष्णु के कूर्म (कछुआ), वामन और मोहिनी अवतार का विस्तृत वर्णन किया गया। समुद्र मंथन से निकले घोर 'हलाहल' विष से जब तीनों लोकों में हाहाकार मचा, तब भगवान शिव ने जगत् कल्याण के लिए उसे अपने कंठ में धारण किया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। इसके बाद मोहिनी रूप धारण कर भगवान विष्णु ने असुरों से अमृत कलश लेकर देवताओं को पान कराया।

आचार्य जी ने बताया कि अमृत कलश की छीना-झपटी के दौरान जहाँ-जहाँ अमृत की बूंदें छलकीं—प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—उन चारों स्थानों पर आज भी कुंभ मेले का पावन आयोजन होता है।
*समुद्र मंथन का आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दर्शन*

कथा में समुद्र मंथन के मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक पहलू को रेखांकित करते हुए बताया गया कि हमारा मस्तिष्क ही 'समुद्र' है। जब हम चिंतन रूपी मंथन करते हैं, तो अच्छे और बुरे दोनों विचार (अमृत और विष) उत्पन्न होते हैं। देवासुर संग्राम हमारे भीतर चलने वाला द्वंद्व है। मानव का मूल उद्देश्य शिव रूपी धैर्य से नकारात्मक विचारों को समाप्त कर अमृत रूपी सद्विचारों और सत्कर्मों को अपनाना होना चाहिए। भारतीय शास्त्र ग्रंथ केवल धार्मिक कथाएं नहीं, बल्कि मानव जीवन के सटीक प्रबंधन का वैज्ञानिक आधार हैं।

*7 सितंबर दिन सोमवार तक चलेगा आयोजन*

कैथा के ऐतिहासिक हनुमान जी स्वामी मंदिर परिसर में 31 अगस्त से शुरू हुआ यह पापविनाशक श्रीमद्भागवत कथा आयोजन 07 सितंबर 2026 दिन सोमवार तक चलेगा। आयोजकों और धर्मप्रेमी बंधुओं ने समस्त क्षेत्रवासियों से इस अमृतमयी कथा का श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित करने की अपील की है।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Friday, September 4, 2026

ब्रेकिंग// कैथा में भागवत महापुराण कथा का चौथा दिन – श्रीमद भागवत के पांचवें, छठे, और सातवें स्कंध का चल रहा वर्णन// लोक कल्याणार्थ और धर्म रक्षा हेतु महर्षि दधीचि ने किया अपनी अस्थियों का दान//

*ब्रेकिंग// कैथा में भागवत महापुराण कथा का चौथा दिन – श्रीमद भागवत के पांचवें, छठे, और सातवें स्कंध का चल रहा वर्णन// लोक कल्याणार्थ और धर्म रक्षा हेतु महर्षि दधीचि ने किया अपनी अस्थियों का दान//*
 
दिनांक 04 सितंबर 2026 रीवा मप्र।

    पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत कथा के पांचवें, छठे, एवं सातवें स्कंध में आज चौथे दिन दिनांक 04 सितंबर 2026 दिन शुक्रवार को आचार्य डॉ गौरी शंकर शुक्ला के मुखारबिंद से जड़ भरत और दधीचि ऋषि के कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है।
श्रीमद भागवत महापुराण के पांचवें स्कंध को भगवान् विष्णु की नाभि, छठे को वक्षस्थल और सातवें तथा आठवें को जंघा बताया गया है.
पिछले तीन दिवस श्रीमद भागवत के प्रथम चार स्कंधों का वर्णन संपन्न हुआ. जिसमे श्रीमद भागवत का महात्म वर्णन, भगवान् विष्णु के चौबीस अवतारों की कथा, ब्रह्मा की उत्पत्ति, नारद के पूर्व जन्मों की कथा, राजा परीक्षित की कथा, शौनकादि ऋषियों तथा सुकदेव जी के संवाद, सृष्टि क्रम का वर्णन, बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद चरित्र सहित अन्य कई कथा प्रसंग सम्मिल्लित रहे.
*पांचवें स्कंध की कथा का वर्णन* - दिनांक 12 एवं 13 अगस्त की कथा प्रसंगों में पांचवें स्कंध की कथा में प्रियव्रत, राजा अग्रिघ्र, राजा नाभि, जड़ भरत, ऋषभ देव आदि चरित्रों का वर्णन हुआ. ध्यान देने योग्य है कि यहाँ पर जड़ भरत एक अन्य राजा थे और शकुंतला तथा दुष्यंत के पुत्र नहीं थे जिनके नाम से भारत वर्ष का नाम पड़ा. जड़ भरत की कथा इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है की श्रीमद भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा है की “हे अर्जुन जो व्यक्ति जिस भाव से मुझे पूजता है उसे मैं उसी भाव में मिलता हूँ” और यह भी उल्लेख आया है की “हे अर्जुन शरीर त्याग के समय जिस व्यक्ति के मन में जो भाव रहते हैं वह व्यक्ति उसी योनि/जन्म को प्राप्त होता है” इस सूक्ति/श्लोक का सीधा-सीधा तात्पर्य है की यदि हम शरीर त्याग के समय भगवान् के भक्ति भाव में हैं तो भगवान् की प्राप्ति होगी और यदि सांसारिक मोह-माया और घर-गृहस्थी सम्बन्धियों, संपत्ति-जायदाद को मन में रखकर मृत्यु को प्राप्त करते हैं तो हम पुनः उसी योनि में प्रवेश करते हैं और पुनः जन्म-मरण के चक्र में फंस जाते हैं. इस प्रकार जड़ भरत का कथानक भगवान् श्री कृष्ण के उसी श्लोक की पुष्टि करता है.
जड़ भरत का प्रसंग कुछ ऐसे है की भरत एक अत्यंत धर्मात्मा व्यक्ति थे. वह ईश्वर की भक्ति भाव और तपस्या में लगे रहते थे. इसी उद्येश्य की पूर्ति के लिए अरण्य में कुश की कुटिया बनाकर तपस्या किया करते थे. एक बार उसी वन में एक सिंह आया. उसी समय वहां पर सरोवर में जल ग्रहण करने एक गर्भवती हिरणी भी आई. सिंह ने स्वभाव अनुसार तेज गर्जना की. जैसे ही गर्जना की ध्वनि हिरणी के कानों में पड़ी, भय के मारे हिरणी का गर्भ वहीँ उसी स्थल पर गिर गया और वह मृत्यु को प्राप्त कर गयी. यह वाकया तपस्या में बैठे जड़ भरत देख रहे थे. जड़ भरत ने अपने तपोबल से कमंडल से जल लेकर सिंह पर छोंड दिया और सिंह वहीँ पर मुक्त हो गया. परन्तु हिरणी का बच्चा वहीँ पर पड़ा हुआ तड़प रहा था. यह देख कर संत ह्रदय में दया का भाव उत्पन्न हुआ, और सब कुछ त्याग कर आरण्य में तपश्या करने निकले जड़ भरत ने उस छोटे हिरणी के बच्चे को गोद ले लिया और अपने साथ रखकर पालन पोषण करने लगे. इस प्रकार देखें की कैसे जड़ भरत जो सब कुछ त्याग कर तपश्या करने आये थे और सात्विक कर्म में ही पड़कर, एक असहाय की सहायता हेतु ही सही परन्तु अंततः उस हिरणी के बच्चे के मोह में पड़ गए. यह मोह यद्यपि सात्विक कर्म दया-भाव से उत्पन्न हुआ परन्तु जड़ भरत को उनके त्याग-तपश्या के मार्ग से अंततः विचलित कर दिया. कहाँ जड़ भरत सब कुछ त्याग कर तपश्या करने निकले थे और कहाँ वह एक पशु के मोह में पड़कर भक्ति भाव त्याग तपश्या त्याग कर मृग का पालन पोषण करने लगे.      

यह सब काफी समय तक चलता रहा और एक दिन बड़े होने के बाद मृग वहीँ पर सरोवर में जल पीने आये हिरणों के झुण्ड के साथ पलायन कर गया. जड़ भरत उस हिरण के बच्चे में इतने आसक्त हो गए थे की उसके बिछड़ने के दुःख में व्यथित हो गए और इसी दुःख को लेकर अपना प्राण त्याग दिया. चूंकि मृत्यु के समय जड़ भरत के मन में पूर्णरूपेण मृग का भाव समाहित हो चुका था इस कारण अगले जन्म में उन्हें मृग की ही योनि मिली. मृग योनि में जड़ भरत गंडक नदी के किनारे रहने लगे. वह ज्ञानी थे और उनको पूर्ण एहसास था की पूर्व जन्म में वह जड़ भरत थे और कैसे मृग के मोह में पड़कर उन्हें मृग योनी प्राप्त हुई है. अब वह सब जानते हुए इस योनी से मुक्त होकर पुनः भगवत भक्ति में लीन होकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते थे.
यहाँ पर पुनः श्रीमद भगवद गीता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक है – इसमें अर्जुन योग-तप के कर्म से भटके हुए साधक के विषय में जानना चाहते हैं और श्री कृष्ण जी से प्रश्न पूंछते हैं कि “हे केशव! आपने योग, भक्ति, तप ज्ञान की तो महिमा का वखान किया है परन्तु मेरे मन में एक प्रश्न है जो मात्र आप ही इसका समाधान कर सकते हैं - कहीं ऐसा तो नहीं है कि योग-तप से भटके हुए ऋषि महात्मा की दशा उस वायु के तेज़ प्रवाह से भटके हुए बादल की तरह तो नहीं जो उसे आसमान से छिन्न-भिन्न कर देती है. कहीं योग-साधना में रत आपके भटके भक्त की दशा उसी छिन्न-भिन्न हुए बादल की तरह तो नहीं होगी”. इस पर श्री कृष्ण का कथन रहता है की “हे कौन्तेय! न ही इस लोक में और न ही परलोक में, मेरे भक्त का कुछ भी बुरा नहीं हो सकता. मेरा भक्त अपने इस जन्म के संचित शुभ कर्मों के अनुसार अगले जन्म में किसी योगी, तपस्वी, संत, महात्मा और उच्च कुल के समुदाय में जन्म लेता है और अपने पूर्व जन्मो के अच्छे संचित कर्म संस्कारों के प्रभाव से पुनः मोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ता है और वह उसे अंततः प्राप्त करता है”. तात्पर्य यह हुआ की, हमारे संचित कर्म बैंक बैलेंस की तरह हैं. यदि उनसे व्याज नहीं मिलता तो भी वह सुरक्षित तो रहते ही हैं. जैसे कर्म करेंगे वैसे ही अगले जन्म मिलेंगे और हमारे पूर्व संचित कर्म मिलकर हमे पुनः उसी मार्ग पर कर्म करने की दृश्य-अदृश्य प्रेरणा देंगे. और यही इस जड़ भरत का भी आख्यान है. इस आख्यान के माध्यम से हिन्दू-सनातन धर्म के पुनर्जन्म और कर्मफल के अवश्यम्भावी सिद्धांत को प्रबलता मिलती है.
अंत में मृग योनि से जड़ भरत को मुक्ति मिलती है और वह पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म लिया. उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण शिक्षा दीक्षा लेकर भगवत भजन में लीन रहने वाले जड़ भरत को एक बार कुछ भील पकड़ कर देवी के समक्ष बलि देने ले जाते है परन्तु जब देवी यह परिदृश्य देखती है तो स्वयं खडग हाथ में लेकर भील राजा की ही बलि दे देती है क्योंकि जड़ भरत एक धर्मात्मा ब्राह्मण थे और उनकी बलि धर्म के पूर्णतया विरुद्ध थी. तत्पश्चात एक बार एक अन्य राजा की पालकी ले जाने के लिए जड़ भरत को हृष्ट पुष्ट होने के कारण बुलाया जाता है और जैसे ही उनके पैरों के तले कोई एक छोटी चींटी भी आये वह तुरंत उचक जाते और यह वाकया देखकर पालकी पर बैठा राजा चकित होकर पूंछता है की आप हृष्ट-पुष्ट हैं फिर भी पालकी लेकर उचक क्यों जाते हैं. इस पर शांत स्वभाव और तत्वज्ञानी धर्मात्मा पंडित जड़ भरत ने राजा को अपने पूर्व जन्मों का पूरा वृत्तान्त बता देते हैं. यह सब जानकर राजा उनसे दीक्षा लेकर उनको अपना गुरु बनाते हैं और कुछ समय बीत जाने के बाद ब्राह्मण कुल में अपना अंतिम जन्म लेने वाले जड़ भरत मुक्ति और भगवान् को प्राप्त होते हैं.
पंचम स्कंध में ही आगे पुरंजनोपख्यान की तरह रूपक द्वारा संसार सागर से प्राणियों को कैसे पार मिलता है और क्या-क्या भोगना पड़ता है, रौरव आदि नरकों के माध्यम से रूपक द्वारा समझाया गया है. इसी स्कंध में गंगावतरण की कथा भी आती है.
*महर्षि दधीचि की कथा और जन कल्याण के लिए हड्डियों का दान* - भारतीय संस्कृति में ऐसे कई महान ऋषि-मुनि पैदा हुए हैं जिन्होंने हसते हुए अपने सर्वश्व का दान मात्र मानव एवं जीव जगत के कल्याण के लिए कर दिया. संत का तात्पर्य ही है की जीव कल्याण और परमार्थ के लिए जीने वाला. ऐसा कैसे हुआ की ऐसे महान पुरुष मात्र भारतीय संस्कृति में ही ज्यादातर जन्म लिए? कुछ तो है इस संस्कृति में जो भारत को अन्य संस्कृतियों से अलग करती है. यह “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु शुखिनः” पर आधारित संस्कृति है. विश्व की अन्य संस्कृतियाँ यदि मानव को ही प्रधानता देती हैं तो भारत की सनातन संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जो प्रत्येक चराचर में एक ही “एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति” का दर्शन करती है. और यही इसकी खासियत भी है. क्योंकि जैसे ही मानव यह समझ पायेगा की इस सृष्टि में उत्पन्न होने वाला प्रत्येक जीव उसी “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” की संतान है तो वह सबको समभाव से देखना प्रारंभ कर देगा अर्थात योगी हो जायेगा क्योंकि “समत्वं योग उच्चते” अर्थात समता का नाम ही योग है ऐसा श्रीमद भगद गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया है. सभी जीवों में वह अपने आप को ही पायेगा.
महर्षि दधीचि की कहानी भी कुछ ऐसी ही त्याग बलिदान और लोक कल्याण के उद्येश्य से अपने शरीर तक को दान में देने सम्बन्धी है.
श्रीमद भागवत महापुराण में दधीचि के अस्थिदान प्रसंग की भूमिका कुछ ऐसे प्रारंभ होती है. यद्यपि देवराज इंद्र देवताओं का राजा बताया गया है परन्तु यह सब मात्र रूपक हैं. इनके माध्यम से चरित्रों की व्याख्या की गयी है न की इन सभी को वास्तविक में लेने की आवश्यकता है. देवराज इंद्र भोग-विलास में डूबे एक ऐसे शासक की कहानी है जो अपनी इन्द्रियों के वश में रहता है और अपने तुक्ष कृत्यों से हमेशा उपहास का पात्र बनता है. आज भी समाज में ऐसे शासक और व्यक्ति मिल जाते हैं जो अपने मन और इन्द्रियों के वशीभूत होकर छोटे कार्य करते हैं और बदनामी उठाते हैं. कुल मिलाकर एक शासक-प्रशासक में जो गुण होने चाहिए वैसा देवराज इंद्र में नहीं थे.

ऐसे ही एक कथा-प्रसंग में इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति को अपमानित करता है. अपमान न सहन कर पाने के कारण देवगुरु बृहस्पति स्वर्गलोक से बहिर्गमन कर अदृश्य हो जाते हैं और इंद्र को चेतावनी दे जाते हैं तुम्हे अपने गुरु के अपमान का फल चुकाना पड़ेगा. इंद्र अपने कृत्य पर शर्मिंदा होता है और देवगुरु को बहुत तलाशने का प्रयास करता है परन्तु देवगुरु नहीं मिल पाते हैं.
यह मौका देख असुर-दैत्य गुरु शुक्राचार्य दैत्यों को मौके का फायदा लेकर स्वर्गलोक में आक्रमण कर इंद्र को सत्ताविहीन करने और स्वर्गलोक को हन्थियाने के लिए प्रेरित करते हैं. दैत्यगण इंद्र को गुरु विहीन पाकर अमरावती में आक्रमण कर मार-काट मचाकर इंद्र को इन्द्रासन छोंड़ने के लिए विवास कर देते हैं. इंद्र भटकता हुआ जान बचाकर ब्रह्मा जी के पास पंहुचता है और उनसे अपनी करनी और व्यथा दोनों बयां करता है. ब्रह्मा कहते हैं की इंद्र तुमने अपने गुरु का अपमान किया है इसलिए तुम्हे इसका दंड तो भुगतना ही पड़ेगा. इंद्र के बारम्बार प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बताते हैं की इस समय मात्र एक ही ऋषि है जो तुम्हे इस घोर संकट से उबार सकता है. महर्षि त्वष्टा का महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप को यदि तुम अपना पुरोहित बनाओगे और यज्ञ करवाओगे तो वह तुम्हे संकट से मुक्त करेगे.

यह सुनकर इंद्र महर्षि त्वष्टा पुत्र विश्वरूप के पास पंहुचता है और उनसे बारम्बार प्रार्थना करता है तब विश्वरूप इंद्र का पुरोहित बनना स्वीकारते हैं. परन्तु विश्वरूप को जैसे ही पता चलता है की वह जिस राक्षस वंश को समाप्त करने हेतु इंद्र का सहयोग दे रहे हैं वह मातृपक्ष से स्वयं भी राक्षस कुल से ही जुड़े हुए हैं तब वह आहुतियों में देव-दानव दोनों को आवाहित करते हैं इस प्रकार सम्पूर्ण यज्ञ का फल शून्य हो जाता है. यह जानकर इंद्र को क्रोध आता है और तीन मुख वाले महर्षि पुत्र विश्वरूप के तीनों शिरों को काट देता है. इस प्रकार इंद्र क्रोधवश ब्रह्म हत्या कर सबकी आलोचना का भागीदार बनता है. जैसे ही अपने पुत्र के वध की सूचना महर्षि त्वष्टा को मिलती है वह क्रोध में आग बबूला होकर अपने तपोबल से महायज्ञ कर वृत्तासुर नामक महाशक्तिशाली असुर-दैत्य को उत्पन्न कर उसे आदेश देते हैं की जाकर इंद्र को मार इन्द्रासन पर कब्ज़ा कर ले.
वृत्तासुर ब्राह्मण शक्ति से उत्पन्न इंद्र की ब्रह्म हत्या का परिणाम था इसलिए इंद्र की कोई शक्ति यहाँ तक की आग्नेयास्त्र, बज्र आदि विफल हो गए. इंद्र के बज्र और धनुष को वृत्तासुर ने बच्चों का खिलौना समझकर तोड़कर फेंक दिया. यह सब देख भयग्रस्त हो इंद्र युध्स्थल से पलायन कर सीधे विष्णु जी के पास पंहुचा. श्री नारायण ने भी ब्रह्म हत्या के लिए इंद्र की अतिसय अवहेलना की और कहा की वृत्तासुर से तुम्हारी रक्षा ब्रह्मा विष्णु शिव कोई त्रिदेव नहीं कर सकते और मात्र एक ही व्यक्ति है इस सृष्टि में जो तुम्हे वृत्तासुर के प्रकोप से बचा सकता है और वह हैं महर्षि दधीचि. महर्षि दधीचि से निवेदन करो की लोक कल्याण के लिए यदि वह अपनी अस्थियों का दान देवें तब उनके अस्थियों से बना हुआ बज्र ही वृत्तासुर को नष्ट कर सकता है अन्यत्र कोई रास्ता नहीं है.   

 भगवान् नारायण की बात सुन इंद्र महर्षि दधीचि के आश्रम जाकर उनके चरण कमलों में गिरकर सारी बात बताता है और लोक कल्याण के लिए जीवन यापन करने वाले महान मुनि दधीचि अपनी अस्थियों को दान देने के लिए तत्पर हो जाते है परन्तु इसके पूर्व उनकी भारतवर्ष की समस्त नदियों में स्नान करने की ईक्षा प्रबल होती है. यह जानकार की भारतवर्ष की समस्त नदियों में स्नान करने के उपरांत अस्थियों का दान देने में तो बहुत अधिक समय व्यतीत हो जायेगा. समस्त देवतागण अपनी शक्तियों से वहीँ दधीचि आश्रम के पास नैमिष आरण्य में सभी नदियों को एकत्रित कर देते हैं और दधीचि मुनि स्नान कर अपने शरीर में मिष्ठान का लेप करते हैं और उनकी वहीँ पर बंधी हुई कामधेनु गाय द्वारा चाट-चाट कर जैसे ही उनकी त्वचा और मज्जा शरीर छोड़ देती हैं इंद्र आदि देवतागण उनकी रीढ़ की हड्डी लेकर बज्र का निर्माण करते हैं और उसी बज्र के प्रहार से वृत्तासुर का वध करते हैं ऐसा कथा प्रसंग आता है.
कुछ टीकाकारों की मान्यता है की दधीचि की अस्थियों से तीन अस्त्रों का निर्माण हुआ था जिसमे की एक इंद्र का बज्र, दूसरा भगवान् शिव का त्रिशूल और तीसरा अर्जुन का गांडीव धनुष था. यद्यपि इस पर भी अलग-अलग टीकाकारों के अलग-अलग मत हैं.
*दधीचि के अस्थिदान का सिद्धांत*– महर्षि दधीचि भारतीय ऋषि-मुनि परंपरा के एक ऐसे महानतम संत हैं जिहोने मानव कल्याण के लिए अपना सर्वश्व दान कर दिया. इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति का अपमान किया तत्पश्चात महर्षि त्वष्टा पुत्र विश्वरूप का भी वध किया. इंद्र के कई अक्षम्य अपराध हैं फिर भी वह जब शरणागत हुआ तो उसे क्षमा कर ऋषियों ने उसके उद्धार का मार्ग खोजा. विश्वरूप एक ब्राह्मण था ब्रह्म हत्या के वध के पाप से इंद्र को कोई देव, दानव, ब्रह्म-विष्णु-महेश त्रिदेव नहीं बचा सकते थे. ऐसे जघन्य अपराध से मात्र एक ब्राह्मण तपश्वी की शक्ति ही बचा सकती थी. फलस्वरूप ऐसा विचार कर नारायण ने इंद्र को उसके मुक्ति का मार्ग दिखाया की मात्र महर्षि दधीचि का तपोबल और निःस्वार्थ लोक कल्याणकारी कृत्य ही है इस सृष्टि में जो इंद्र को बचा सकता है. इस प्रकार एक ब्राह्मण के तपोबल से वृत्तासुर नामक उत्पन्न मारक शक्ति से दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि दधीचि की लोक-कल्याणकारी श्जक्ति ही रक्षा कर सकती थी. शायद इंद्र के सम्पूर्ण युध्यों और इतिहास में मात्र वृत्तासुर दैत्य का ही एक ऐसा उल्लेख है जब क्रोधित ब्राह्मण की शक्ति को सर्वत्यागी ब्राह्मण की शक्ति से रोका गया है.

यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 अगस्त से 07 सितंबर तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Thursday, September 3, 2026

Breaking// (रीवा, म.प्र.) कैथा में भागवत महापुराण कथा का तीसरा दिन – बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद की अटल भक्ति और ईश्वर प्रेम का वर्णन//

Breaking// (रीवा, म.प्र.) कैथा में भागवत महापुराण कथा का तीसरा दिन – बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद की अटल भक्ति और ईश्वर प्रेम का वर्णन// 
दिनांक 03 सितंबर 2026 रीवा मप्र।

 यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन आज तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध की कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है. आचार्य डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला जी के मुखारबिंद से प्रहलाद, ध्रुव और भगवान विष्णु के छठे अवतार कपिलमुनि के चरित्र का वर्णन किया जा रहा है

ज्ञानिओं एवं मुनिओं द्वारा श्रीमद भागवत महापुराण की कथा में स्कंधों का वर्णन करते हुए बताया जाता है कि इस महापुराण का प्रथम और द्वितीय स्कंध की भगवान् विष्णु के चरण (पाद) हैं, तृतीय और चतुर्थ स्कंध को भगवान् की जंघा बताया गया है, पंचम स्कंध भगवान् की नाभि, छठा वक्षस्थल, सप्तम और आठवा स्कंध प्रभु की बांह, नौवां स्कंध कंठ, दसवां मुख, ग्यारहवां ललाट, और बारहवां तथा अंतिम स्कंध मूर्धा बताया गया है. इस प्रकार समझा जा सकता है की प्रभु की प्राप्ति हेतु श्रीमद भागवत की शरण में जाना ही पड़ेगा. क्योंकि जिस प्रकार से श्रीमद भागवत महापुराण के प्रत्येक स्कंध और अध्याओं को भगवान् विष्णु के नख से शिख तक के प्रत्येक अंग से तुलना की गयी है उसी प्रकार जब भक्त पूर्णरूपेण श्रीमद भगवद कथा में नख से शिख तक डूब जाता है तो वह उसी प्रकार भगवानमय हो जाता है और भगवान् स्वयं उसके हो जाते हैं. श्रीमद भागवत आज कलयुग में मानव मुक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण और संभवतः एक मात्र साधन है. श्रीमद भागवत के सतत स्वाध्याय और चिंतन-मनन से जीव के पाप और संचित प्रारब्ध कर्म विलीन हो जाते हैं और जीव मोक्ष को प्राप्त करता है ऐसा श्रीमद भागवत कथा के प्रसगों में बारम्बार वर्णन आता है. चारों श्रुति ग्रन्थ वेद, 18 पुराणों में भक्ति, ज्ञान वैराग्य और त्याग समाहित होने से इस महान ग्रन्थ श्रीमद भागवत महापुराण का इतना अधिक महत्व है की आज सर्वसम्मति से इसे पंचम वेद माना गया है.  

श्रीमद भागवत महापुराण भक्ति ज्ञान महायज्ञ की कथा प्रसगों के पहले और दूसरे दिवस प्रथम और द्वितीय स्कंध के वर्णन के पश्चात तीसरे दिन दिनांक 03 सितंबर 2026 को तृतीय एवं चतुर्थ स्कंध का वर्णन चल रहा है.

*तृतीय स्कंध की कथा प्रसंगों का वर्णन* - तृतीय स्कंध उद्धव और विदुर के भेंट से प्रारंभ होता है. उद्धव द्वारा श्रीकृष्ण जी के बाललीला चरित्रों का वर्णन, विदुर और मात्रेय ऋषि की भेंट, सृष्टि की उत्पत्ति और उसके क्रम का वर्णन, ब्रह्मा जी की उत्पत्ति, चारों युगों का काल विभाजन, सृष्टि-विस्तार का उल्लेख, वाराह अवतार के कथा प्रसंग, दिति द्वारा आग्रह पर और ऋषि कश्यप के साथ सहवास से उत्पन्न दो अमांगलिक राक्षस पुत्रों की कहानी, जय-विजय का ऋषि सनतकुमार द्वारा शापित होकर विष्णुलोक से पतित होकर दिति के गर्भ में हिरणाक्ष एवं हिरणकश्यपू के रूप में जन्म लेना, ववाराह अवतार द्वारा हिरणाक्ष और नृसिंह अवतार द्वारा हिरणकश्यपू का वध, कपिलमुनि के रूप में भगवान् विष्णु का छठा अवतार लेना और सांख्यदर्शन की शिक्षा देना आदि कथा प्रसंग तृतीय स्कंध में आते हैं. इसी स्कंध में कपिल गीता का भी वर्णन आता है और भक्ति के गूढ़ रहस्यों का वर्णन भी आता है.

 *चतुर्थ स्कंध की कथा*- चतुर्थ स्कंध के कथा प्रसंगों में बालक ध्रुव की भक्ति की कथा का विशेष महत्व है. इसमें बताया गया है की यदि भक्ति सच्ची है तो उम्र का कोई बंधन नहीं होता. आगे “पुरंजनोपख्यान” का वर्णन आता है जिसमे इन्द्रियों की प्रबलता की चर्चना की गयी है. “पुरंजनोपाख्यान” में वर्णन आता है की राजा पुरंजन एक कन्या के प्रेम में पड़कर उससे भोग-विलास की मनसा से नौ द्वार वाले नगर में प्रवेश परता है और यवनों और गन्धर्वों के द्वारा मारा जाता है.

यहाँ पर ज्ञानिओं ने इसे विभिन्न उपमाओं / रूपको के माध्यम से वखान किया है. श्री नारद मुनि ने वर्णन करते हुए कहा है की राजा पुरंजन यह जीव है जो इस नौ द्वारों वाले शरीर में अपनी युवावस्था में विचरण करता है और काल-कन्या रुपी वृद्धावस्था की चपेट में आकर मारा जाता है. नौ द्वार वाला यह शरीर दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, एक गुदा, एक लिंग है. अज्ञान और अविद्या की यह कन्या रुपी माया जीवरुपी उस राजा पुरंजन को अपने वशीभूत किये हुए है. पुरंजन रुपी जीव अपनी यौवन अवस्था के आनंद में अपना कीमती मानव शरीर अज्ञानता से उत्पन्न भोग-विलाश में नष्ट कर रहा होता है. अंत में जब काल जीव के समक्ष यवन और गन्धर्व रूप में आता है तो जीव को परास्त होना पड़ता है और मृत्यु को प्राप्त होता है. यही “पुरंजनोपाख्यान” का सन्देश है. “पुरंजनोपाख्यान” से मानव को यही शिक्षा लेनी चाहिए की अपना अमूल्य मानव तन लौकिक इन्द्रियों के भोग-विलाश और अज्ञानता में न नष्ट करे और भगवत-भक्ति और ज्ञान-वैराग्य का मार्ग ग्रहण कर मानव जीवन को सफल बनाकर मोक्ष की तरफ अग्रसर होवे अन्यथा स्थिति कुछ “पुरंजनोपाख्यान” जैसी होगी और अंत में मात्र पछतावा और हाँथ मलना ही शेष बचेगा जब वृद्धावस्था में शक्ति क्षीण होने के बाद मानव तन रोग, ज्वर और आधि-व्याधि से नष्ट हो जाता है और सम्बन्धी परिजन अंत में श्मशानघाट जाकर मृतक शरीर को आग को समर्पित कर देते है.     

*कपिलमुनि रूप में भगवान विष्णु के छठे अवतार का वृतांत और सांख्य दर्शन* –

श्रीमद भागवत महापुराण के तृतीय स्कंध में भगवान् विष्णु के छठे अवतार के रूप में कपिलमुनि का वृत्तान्त आता है. कपिलमुनि की माता का नाम देवहुति तथा पिता कर्दम ऋषि थे. देवहुति को ब्रह्मा की पुत्री बताया गया है. ऐसे माना जाता है की कपिलमुनि ने बाल्यावस्था में ही सांख्यदर्शन का ज्ञान प्राप्त कर सर्वप्रथम इसे अपनी माता देवहुति को दिया था. कपिलमुनि ने बाल्यावस्था में ही आगे अपनी माता को सृष्टि व प्रकृति के चौबीस तत्वों का ज्ञान प्रदान किया था. ऐसी भी मान्यता है की कपिलमुनि ने संख्यादर्शन का जो ज्ञान अपनी माता देवहुति को प्रदान किया था आगे श्री कृष्ण जी ने वही ज्ञान कुछ श्लोकों के माध्यम से अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता में भी दिया है.

*कपिलमुनि का श्रीमद भगवद गीता में वर्णन कुछ इस प्रकार भी आता है*–


अक्षत्थ: अश्रृत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद:।
गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि:॥

अर्थात इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण जी अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं की - “हे अर्जुन सुन! समस्त वृक्षों में सबसे उत्तम वृक्ष पीपल मैं ही हूँ, देव ऋषिओं में नारद मैं हूँ, और सिद्धों में कपिलमुनि मैं ही हूँ. अर्थात इन सबको तू मेरा ही स्वरुप जान.”
कपिलमुनि ने बताया कि मानव और देवताओं के शरीर सामान होते हैं परन्तु ज्ञान ऐसा तत्त्व है जो मानव को देवताओं से भी श्रेष्ठ बनाता है. भक्ति, योग, यज्ञ, दान, तीर्थ और व्रत आदि को सभी धर्मों से श्रेष्ठ समझना चाहिए. सांसारिक तृष्णा के त्याग से ही भक्ति योग की प्राप्ति संभव है. भक्ति और ज्ञान मात्र ईश्वर की ही कृपा से प्राप्त हो सकते हैं. कपिलमुनि का सांख्यदर्शन सनातन भारतीय संस्कृति के छह दर्शन ग्रंथों में अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रन्थ है. इस ग्रन्थ में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और निष्क्रिय ऊर्जा की अवधारणा को स्पष्ट किया गया है. आधुनिक काल के ऋषि मुनिओं में स्वामी विवेकानंद ने संख्यदर्शन के माध्यम से उस समय के वैज्ञानिक सिद्धांतों को अध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़कर तथ्यपरक व्याख्या कर आज के वर्त्तमान समय में भी भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों को अत्यंत वैज्ञानिक और तथ्यपूर्ण सिद्ध किया है. भागवत और अन्य शास्त्र ग्रंथो में यह भी आख्यान आता है की कपिलमुनि के द्वारा ही उपाय बताने पर राजा अन्शुमान, दिलीप, और भागीरथ ने हज़ारों वर्ष कठिन तप कर राजा सगर के पुत्रों के उद्धार हेतु गंगाजी का पृथ्वी पर अवतरण करवाया. 

*राक्षसराज हिरन्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद का कथा प्रसंग* – प्रहलाद हिरन्यकश्यप एवं कयाधू का पुत्र था. वैसे तो प्रहलाद एक राक्षस पुत्र था परन्तु यह एक विचारणीय प्रश्न है की प्रहलाद कैसे धर्मात्मा हुआ? प्रहलाद को ऐसे कौन से संस्कार बचपन में या की उसके पूर्वजन्म के मिले जिससे वह अपने पिता और कुल के अन्य राक्षसों की तरह घोर अन्यायी अत्याचारी न होकर कैसे एक धर्मात्मा और भगवान् के प्रति प्रेम भाव रखने वाला पैदा हुआ?

भागवत महापुराण में ऐसा आख्यान आता है की संस्कार का अपना एक विशेष महत्व है. यह बात हमारे चरों वेदों में भी कही गयी है. इसीलिए भारतीय संस्कृति के सोलह संस्कारों का आज भी हिन्दू सनातन संस्कृति में उतना ही महत्व बना हुआ है. इन संस्कारों के माध्यम से बाल्यावस्था और यहाँ तक की गर्भधारण से ही व्यक्तित्व विकाश प्रारंभ होता है. इसीलिए आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो यह बात बताई जाती है की माता-पिता के सहवास से लेकर माता के गर्भधारण और उसके उपरांत माता को गर्भधारण किये हुए अच्छे धार्मिक, तनाव-मुक्त और शुभ वातावरण में रखा जाना चाहिए, माता को अच्छे और पौष्टिक तत्वों का आहार दिया जाना चाहिए जिससे अच्छे हिष्ट-पुष्ट और बल-बुद्धिशाली प्रतिभावान संतान का जन्म होवे. भारतीय संस्कृति के सोलह संस्कारों और उनका अनुप्रयोग एक तथ्यपरक तर्कसंगत और वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

आइये अब आते हैं प्रहलाद के कथा प्रसंग में. प्रहलाद यद्यपि एक अत्यंत दुष्ट, अत्याचारी और ईश्वर विरोधी राक्षसराज हिरन्यकश्यप का पुत्र था परन्तु प्रहलाद की माता कयाधू एक धर्मात्मा और ईश्वर में आस्था रखने वाली थी. ऐसा बताया गया है की प्रहलाद की माता कयाधू प्रह्लाद जब गर्भ में था तब प्रतिदिन सत्संग करने ऋषिओं-मुनियों की शरण में जाया करती थी. इस प्रकार प्रह्लाद गर्भ में ही माता द्वारा सुना गया भगवत-सत्संग सीधे ग्रहण कर लेता था. तात्पर्य यह है की माता पक्ष के धार्मिक और आस्थावान होने से पितृ पक्ष का प्रभाव उतना राक्षसी और व्यापक नहीं बन पाया और इसीलिए राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रहलाद धर्मात्मा और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम रखने वाला पैदा हुआ. 

आगे के कथा प्रसंग में आता है कि किस प्रकार हिरन्यकश्यप ने प्रहलाद को ईश्वर पर आस्था त्यागने और स्वयं हिरन्यकश्यप को ही ईश्वर और शक्तिशाली मानने के लिए बहुत वाध्य करने के उपरांत और यहाँ तक की पहाड़ से धकेलने, होलिका के साथ दहन करवाने आदि असफल प्रयाशों के वावजूद भी भक्त प्रहलाद अपने विश्वास में अडिग रहा. अंत में जब स्वयं हिरन्यकश्यप हाँथ में खडग लेकर खम्भे के पास खड़े होकर जब प्रह्लाद को मृत्यु के घाट उतारने के लिए यह कहता है की बताओ तुम्हारा भगवान् कहाँ–कहाँ है. क्या तुम्हारा विष्णु इस खम्भे में ही है? तब प्रहलाद का जबाब रहता है की हाँ वह तो कण कण में व्याप्त है अतः वह इस खम्भे में ही है. तब हिरन्यकश्यप जैसे ही अपनी तलवार से भक्त प्रहलाद को मारने के लिए प्रयाश करता है वैसे ही भगवान का नृसिंह अवतार प्रकट होता है और हिरन्यकश्यप को मुक्त करते हैं. नृसिंह का तात्पर्य है आधा नर और आधा सिंह का रूप. चूंकि हिरन्यकश्यप को वरदान था की वह नर, देव, दानव, गन्धर्व किसी के हाथ नहीं मरेगा और न दिन में न रात में, न घर के अन्दर और न ही घर के बाहर. अतः प्रभु को आतताई राक्षस को मारने के लिए नृसिंह का अवतार लेना पड़ा.

प्रह्लाद-हिरन्यकश्यप की कथा आज बच्चा बच्चा जनता है. हर एक बालक को भारतीय नैतिक शिक्षा की पुस्तकों, कॉमिक्स की किताबों, कार्टून शो, और टीवी शो में आज यह दिखाया जाता है. ध्रुव और प्रहलाद पर बहुत पहले भी काफी कुछ लिखा गया है. परन्तु इसके सारतत्व पर जाना चाहिए और उनके “अटूट अनन्य विश्वास” और “संस्कार” के सिद्धांत को समझना चाहिए की कैसे प्रह्लाद पैदा हुए और कैसे उनमे इतनी अनन्य अटूट-भक्ति और ईश्वर-प्रेम जागृत हो पाया. और किस प्रकार यदि व्यक्ति में अटूट आस्था और अपने तथा ईश्वर के प्रति विश्वास हो तो असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. 

*बालक ध्रुव की अटूट भक्ति और भगवत-कृपा की प्राप्ति* – श्रीमद भागवत महापुराण के चौथे स्कंध में मनु-सतरूपा के पुत्र राजा उत्तानपाद और सुनीति से उत्पन्न बालक ध्रुव की कथा का उल्लेख आया. उत्तानपाद के दो भार्या थीं सुनीति और सुरुचि. सुनीति के पुत्र ध्रुव और सुरुचि के पुत्र उत्तम उत्पन्न हुए. राजा उत्तानपाद का सुरुचि के प्रति ज्यादा आसक्ति थी जिसके कारण वह चाहते हुए भी ध्रुव को उतना पस्नेह-प्रेम नहीं दे पाते थे जितना कि उत्तम को. इस प्रकार एक आख्यान में यह आता है की राजा उत्तानपाद ध्रुव को अपनी गोद में लेकर बैठे थे तभी ध्रुव की सौतेली माँ सुरुचि वहां पर उपस्थित हुई और ऐसा देख ईर्ष्यावश ध्रुव को उत्तानपाद की गोद से उठाकर कहा की तू मेरा पुत्र नहीं है जा पहले भगवान की तपश्या कर और मेरी कोख से जन्म लेगा तभी अपने पिता के प्रेम का अधिकारी बनेगा. क्योंकि यह मेरे पुत्र उत्तम का स्थान है और वही आगे राजगद्दी भी संभालेगा. इस प्रकार व्यथित होकर ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास जाकर रोने लगा और कहा की उसके पिता उससे प्यार नहीं करते और सौतेली माँ भी अच्छा व्यवहार नहीं करती.

इस प्रकार सुनीति ने ध्रुव को भगवान विष्णु की तपस्चर्या करने के लिए प्रेरित करती है और कहती है की भगवान का प्रेम ही श्रेष्ठ है और वही सबके पिता हैं. ऐसा सुनकर बालमन ध्रुव घर से निकलकर आरण्य की तरफ प्रस्थान करता है. रास्ते में नारद मुनि मिलते है और सब वाकया समझते हैं और बालक ध्रुव को सलाह देते हैं की पांच साल की उम्र अभी तपस्या करने के लिए बहुत छोटी है और ध्रुव को माता के पास घर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं. परन्तु बालमन और हठीला ध्रुव अपनी माता की बात पर अडिग रहता है. ध्रुव के हठीले और दृढ मन को समझकर श्री नारद मुनि बालक ध्रुव को “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” महामंत्र की दीक्षा देते हैं और मन ही मन भगवान् से उस भक्त बालक के सफलता की प्रार्थना करते है.

इस प्रकार थोड़े समय उपरांत भगवान् विष्णु बालक ध्रुव के समक्ष प्रकट होते हैं और उसे अटल आकाश में तारे की तरह चमकने का वरदान देते हैं. आज भी हम नानी-दादी के किस्से कहानियों में ध्रुव तारे का जो बखान सुनते हैं वह वही ध्रुव तारे का कथा प्रसंग है जो श्रीमद भागवत में आता है.

      भक्त बालक ध्रुव के कथा प्रसंग आज हर एक हिन्दू बालक-बालिकाओं को पढाया शिखाया जाता विश्वास है की कैसे मात्र पांच वर्ष का भक्त बालक ध्रुव अपने अटल और हठीले स्वभाव के कारण भगवत कृपा की प्राप्ति किया. ध्रुव और प्रहलाद के चरित्र आज सभी भारतीय बालक-बालिकाओं के अच्छे चरित्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान निभा रहे हैं. हमारी भारतीय संस्कृति बहुत ही व्यापक और समृद्ध है जिसका परिणाम है कि आज इस तथाकथित भूमंडलीकरण और पश्चिमी सभ्यताओं के प्रकोप में भी यह काफी हद तक जीवित है. भारतीय संस्कृति और संस्कारों को जीवित रखने और फलने-फूलने की जिम्मेदारी मात्र धर्म-प्रचारकों और गुरुओं-आचार्यों की ही नहीं बल्कि यह सबकी सामूहिक भागीदारी है. आज आवश्यकता है सबको इस पर चिंतन मनन की. बदलते परिवर्तनशील परिवेश में अपनी संस्कृति की सुरक्षा आज सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है.       
यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 अगस्त से 07 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Wednesday, September 2, 2026

Breaking: कैथा में भागवत महापुराण महायज्ञ कथा का द्वितीय दिवस – प्रथम एवं द्वितीय स्कन्द का चल रहा वर्णन//यथा पिंडे स ब्रह्मांडे, यथा ब्रह्मांडे सः पिंडे” अर्थात जो इस पिंड (या शरीर) में है वही इस ब्रह्माण्ड में भी है और जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इस पिंड (शरीर) में भी है//

*Breaking: कैथा में भागवत महापुराण कथा का द्वितीय दिवस – प्रथम एवं द्वितीय स्कन्द का चल रहा वर्णन//यथा पिंडे स ब्रह्मांडे, यथा ब्रह्मांडे सः पिंडे” अर्थात जो इस पिंड (या शरीर) में है वही इस ब्रह्माण्ड में भी है और जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इस पिंड (शरीर) में भी है//*

(दिनांक 02 सितंबर 2026 रीवा मप्र) 


    यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही भागवत कथा के दूसरे दिवश आचार्य डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला जी ने बताया की श्रीमद भागवत महापुराण हिन्दू पुराणों में अत्यंत लोकप्रिय ग्रन्थ है. वैसे पुराणों में श्रीमद भगवद महापुराण का स्थान चौथा आता है परन्तु लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक लोकप्रिय ग्रन्थ है.

आज के कथा प्रसंगों में 12 स्कंधों 335 अध्यायों एवं 18 हज़ार श्लोकों वाले इस महान भागवत ग्रन्थ में भगवान् विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन चल रहा है. साथ ही नारद जी के भी कई जन्मों के प्रसंग का वर्णन आया.


प्रथम स्कन्द -  श्रीमद भागवत महापुराण के प्रथम दो दिवस प्रथम तथा द्वितीय स्कन्द का परायण एवं प्रवचन का कार्य चल रहा है. प्रथम स्कन्द में कुल उन्नीस अध्याय आते हैं. इनमे शुकदेव जी के द्वारा ईश्वर भक्ति एवं उससे प्राप्त ज्ञान एवं वैराग्य का वर्णन तथा उस वैराग्य को कैसे यथावत बनाये रखा जाए अर्थात उस ईश्वरीय भाव में कैसे दृढ रहा जाये इसका वर्णन आता है. इसी स्कंध में भगवान् के अनेक अवतारों का भी वर्णन, अश्वथामा द्वारा पांडव वंश को नष्ट करने वाले कायर एवं निंदनीय कृत्य और साथ ही अपने स्वार्थ और अहंकार की पुष्टि के लिए, बहुत ही विरले तथा मात्र धर्म की रक्षा के लिए उपयोग होने वाले, “ब्रह्मास्त्र” (या आज की वैज्ञानिक भाषा में कहा जाये तो परमाणु बम) के उपयोग सम्बन्धी कृत्य का वर्णन आता है. देवर्षि नारद जी के जन्मों का वृतांत, महाराज परीक्षित के जीवन और मोक्ष का वर्णन, भीष्म पितामह का प्राणत्याग कर स्वर्गलोक गमन, श्रीकृष्ण जी का द्वारिका गमन, विदुर के अत्यंत महत्वपूर्ण नीति उपदेशों का वर्णन तथा साथ ही पांडवों का स्वर्ग हेतु हिमालय के लिए प्रस्थान का वर्णन आता है.


द्वितीय स्कंध – श्रीमद भगवद कथा के प्रसंगों में आगे भगवान् विष्णु के विराट स्वरुप का वर्णन आता है. श्रीमद भागवत महापुराण एक ऐसा कालजयी ग्रन्थ है जिसमे चारों वेदों के गूढ़ रहस्य, उपनिषदों का तत्त्व ज्ञान, एवं श्रीमद भगवद गीता भी स्वयं ही समाहित है. श्रीमद भगवद गीता के विश्वरूप दर्शन योग वाले अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण जी के द्वारा अर्जुन के विषाद और मोह वश उत्पन्न अज्ञान और संदेह को नष्ट करने की दृष्टि से अपना विराट स्वरुप दिखाना पड़ा था तब जाकर अर्जुन को भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त हुआ अन्यथा अर्जुन श्रीकृष्ण जी को अपना मित्र और एक महान योध्या मात्र ही समझ रहे थे. श्रीमद भागवत महापुराण कथा में भी दूसरे स्कंध में इसी भगवान् श्रीकृष्ण जी के विराट स्वरुप का वर्णन आता है. इसी तारतम्य में इसी द्वितीय स्कंध में भगवान् श्रीकृष्ण जी के अर्जुन को दिए गए गीता के उपदेश का भी वर्णन आता है. यह सब श्रीमद भागवत महापुराण ग्रन्थ के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है. श्रीमद भगवद गीता पूर्णरूपेण श्रीमद भागवत महापुराण के इसी भीष्म पर्व में विद्यमान है. बाद में ज्ञानिओं और मुनिओं ने श्रीमद भगवद गीता को भागवत महापुराण से पृथक कर श्रीमद भगवद गीता काव्य ग्रन्थ का रूप प्रदान किया. वैसे कुछ विद्वानों का यह भी मत है की प्रथमतः श्रीमद भगवद गीता का अभ्युदय हुआ और तत्पश्चात श्रीमद भागवत महापुराण का. हम यहाँ पर मत-मतान्तर में नहीं उलझेंगे पर जो भी हो एक बात भली भांति स्पष्ट है कि श्रीमद भगवद गीता तथा श्रीमद भागवत महापुराण दोनों ही महानतम कालजयी ग्रन्थ हैं और दोनों का अपना अलग-अलग महत्व है. जो भक्त और वैष्णव श्रद्धालु कथा प्रसगों और उपमाओं के आधार पर ईश्वर के प्रति भक्ति-ज्ञान-वैराग्य जागृत करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद भागवत महापुराण एक अत्यंत सुन्दर और अमूल्य धर्म ग्रन्थ है और जो भक्त और ज्ञानीगण सीधे तत्त्व और परमात्म ज्ञान ग्रहण कर परमात्मज्ञान का रसास्वादन करना चाहते हैं करना चाहते हैं उनके लिए श्रीमद भगवद गीता एक अत्यंत अमूल्य उपनिषद् ग्रन्थ है.

इसी दूसरे स्कंध में “श्री कृष्णार्पणमस्तु” के भाव से कैसे अपनी भक्ति को दृढ बनाया जाये और कैसे उसी “श्री कृष्णार्पणमस्तु” भाव में स्वयं को स्थित बनाये रखा जाए इसका वर्णन यहाँ पर आता है. आगे बताया गया है की सभी जीवों में “आत्मस्वरूप” एक वही परम ब्रह्म परमेश्वर विराजमान है और वही सृष्टि की उत्पत्ति के समय एक से अनेक होता है और इस दृश्य अदृश्य सृष्टि का उत्पत्तिकर्ता है. अंत में प्रलयकाल में वही परम ब्रह्म परमेश्वर अनेक से एक हो जाता है अर्थात सब कुछ उसी में समाहित हो जाता है. इसीलिए संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है की “यथा पिंडे स ब्रह्मांडे, यथा ब्रह्मांडे सः पिंडे” अर्थात जो इस पिंड (या शरीर) में है वही इस ब्रह्माण्ड में भी है और जो इस ब्रह्माण्ड में है वही इस पिंड (शरीर) में भी है. यह सम्पूर्ण सृष्टि उसी “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” की लीला का खेल है. आगे इसी स्कंध में सृष्टि उत्पत्ति का उल्लेख भी आता है.

     यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 अगस्त से 07 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.

संलग्न - कार्यक्रम से लिए गए कुछ फोटोग्राफ्स.

|||धन्यवाद|||

 

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शिवानन्द द्विवेदी

(प्रचारक, प्रवक्ता, एवं राष्ट्रीय संयोजक)

श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत)

ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़,

जिला रीवा  (म.प्र.) पिन ४८६११७

मोबाइल नंबर – 9589152587 





Tuesday, September 1, 2026

Breaking: यज्ञों की पावन स्थली कैथा हनुमान मंदिर प्रांगण में भगवत महायज्ञ प्रारंभ// दिनांक 31 अगस्त को कलश यात्रा के साथ कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ// दिनांक 1 सितंबर 2026 को संपन्न हुआ भागवत कथा बैठकी का कार्यक्रम// दिनांक 7 सितंबर 2026 दिन सोमवार को हवन और विशाल भंडारे के साथ कार्यक्रम का होगा विसर्जन// पावन यज्ञस्थल कैथा में सार्वजनिक तौर पर आयोजित होते हैं कार्यक्रम// जीव कल्याणार्थ एवं विश्व शांति हेतु आयोजित हो रहे हैं कार्यक्रम// आयोजक मंडल ने समस्त भक्त श्रद्धालुओं को किया आमंत्रित//

*Breaking: यज्ञों की पावन स्थली कैथा हनुमान मंदिर प्रांगण में भगवत महायज्ञ प्रारंभ// दिनांक 31 अगस्त को कलश यात्रा के साथ कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ// दिनांक 1 सितंबर 2026 को संपन्न हुआ भागवत कथा बैठकी का कार्यक्रम// दिनांक 7 सितंबर 2026 दिन सोमवार को हवन और विशाल भंडारे के साथ कार्यक्रम का होगा विसर्जन// पावन यज्ञस्थल कैथा में सार्वजनिक तौर पर आयोजित होते हैं कार्यक्रम// जीव कल्याणार्थ एवं विश्व शांति हेतु आयोजित हो रहे हैं कार्यक्रम// आयोजक मंडल ने समस्त भक्त श्रद्धालुओं को किया आमंत्रित//*
दिनांक 1 सितंबर 2026 रीवा मध्य प्रदेश 

  यज्ञों की पावनस्थली कैथा हनुमान स्वामी मंदिर प्रांगण में परंपरागत रूप से वार्षिक तौर पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं श्रावण-भादों के पवित्र अवसर पर आयोजित होने वाले श्रीमद भगवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ का आयोजन दिनांक 31 अगस्त 2026 को कलश यात्रा के साथ प्रारंभ हुआ। जिसमें दिनांक 1 सितंबर को श्रीमद् भागवत कथा की बैठेकी का कार्यक्रम रखा गया। 
   इस बीच बैठकी और कलश यात्रा के दिन भक्तों और श्रद्धालुओं का ताता लगा रहा। आयोजक मंडल की तरफ से सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने बताया कि यह एक सार्वजनिक कार्यक्रम है जो समस्त क्षेत्रवासियों के सहयोग से आयोजित किया जाता है जिसमें कथा का पारायण एवं प्रवचन का कार्य प्रसिद्ध ज्योतिष एवं कर्मकांड के विद्वान डॉक्टर आचार्य गौरी शंकर शुक्ला जी के मुखारविंद से किया जाता है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का विसर्जन 7 सितंबर 2026 को हवन एवं विशाल भंडारे के साथ दिन सोमवार को किया जाएगा जिसमें समस्त भक्त श्रद्धालुओं को सादर आमंत्रित किया गया है। 
*संलग्न*- फोटोग्राफ 

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*


Sunday, August 30, 2026

Breaking:// युवा और आरटीआई: जवाबदेही की संस्कृति का निर्माण विषय पर वेबिनार आयोजित// 323 वें आरटीआई वेबिनार में पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा भी पार्टिसिपेंट्स के प्रश्नों का किया गया समाधान// युवा वर्ग में सूचना के अधिकार के प्रचार प्रसार को लेकर आयोजित हुआ विशेष वेबिनार// उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन द्वारा साझा की विशेष जानकारी// सामाजिक आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया कार्यक्रम का संचालन// देश के विभिन्न राज्यों से आरटीआई एक्टिविस्टों ने लिया हिस्सा और रखें अपने विचार //

*Breaking:// युवा और आरटीआई: जवाबदेही की संस्कृति का निर्माण विषय पर वेबिनार आयोजित// 323 वें आरटीआई वेबिनार में पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा भी पार्टिसिपेंट्स के प्रश्नों का किया गया समाधान// युवा वर्ग में सूचना के अधिकार के प्रचार प्रसार को लेकर आयोजित हुआ विशेष वेबिनार// उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन द्वारा साझा की विशेष जानकारी// सामाजिक आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया कार्यक्रम का संचालन// देश के विभिन्न राज्यों से आरटीआई एक्टिविस्टों ने लिया हिस्सा और रखें अपने विचार //*
दिनांक 30 अगस्त 2026 रीवा मप्र।

रीवा मप्र: भारत के जाने-माने आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप के बैनर तले लगातार 323 वें रविवार को आयोजित होने वाला राष्ट्रीय स्तर का बेबीनार आयोजित किया गया जिसमें देश प्रदेश के जाने-माने सूचना आयुक्त आरटीआई एक्टिविस्ट, आरटीआई रिसोर्स पर्सन और सामाजिक कार्यकर्ता एवं सिविल राइट्स एक्टिविस्ट ने भाग लिया। इस बीच जीबीपीआईईटी (GBPIET) कॉलेज, पौड़ी गढ़वाल के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर वीरेंद्रकुमार ठक्कर द्वारा "युवा और आरटीआई: जवाबदेही की संस्कृति का निर्माण" विषय पर एक विशेष वेबिनार में अपना विशेष पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन दिया गया। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य युवाओं को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के प्रति जागरूक करना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना था। इस बीच पूर्व सूचना आयुक्त मध्य प्रदेश श्री राहुल सिंह द्वारा भी उपस्थित पार्टिसिपेंट्स और आरटीआई एक्टिविस्टों के सवालों के जवाब दिए गए और युवा और आरटीआई विषय पर अपने विचार रखे गए। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से सैकड़ो प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और अपने प्रश्न पूछे तथा विचार भी रखे।
*पारदर्शिता और युवाओं के लिए आरटीआई का महत्व*

उत्तराखंड से आरटीआई रिसोर्स पर्सन और कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने बताया कि आरटीआई पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक सशक्त माध्यम है। भारत की 65% से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, ऐसे में युवाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यह कानून छात्रों और युवा पेशेवरों को शिक्षा, नौकरियों, छात्रवृत्ति, परीक्षा मूल्यांकन और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़ी सटीक जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है।
*कानूनी रूपरेखा और आवेदन की प्रक्रिया*

   वेबिनार में आरटीआई अधिनियम के संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 19), आवेदन प्रक्रिया, स्पष्ट और सटीक भाषा का प्रयोग, निर्धारित शुल्क, समय-सीमा और छूट के प्रावधानों पर विस्तृत जानकारी दी गई। उन्होंने सार्वजनिक प्राधिकारियों द्वारा स्वप्रेरित प्रकटीकरण और सूचना आयोग में प्रथम व द्वितीय अपील की प्रक्रियाओं को भी समझाया।
*शिक्षा और रोजगार क्षेत्र में आरटीआई का प्रभाव*

  जाने माने आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने स्पष्ट किया कि आरटीआई छात्रों को केवल मूकदर्शक न बनाकर एक सक्रिय नागरिक बनाती है। इसका उपयोग शैक्षणिक संस्थानों में संकाय पदों की रिक्तियों, बुनियादी ढांचे पर खर्च, प्लेसमेंट रिकॉर्ड, छात्रवृत्ति और परीक्षा पुनर्मूल्यांकन में गड़बड़ी को ठीक करने के लिए किया जा सकता है। डिजिटल टूल्स और सोशल मीडिया के माध्यम से आरटीआई से प्राप्त निष्कर्षों को साझा कर सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है।
*चुनौतियां और कानूनी बारीकियां*

323 वें विशेष वेबीनार सत्र के दौरान युवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा हुई, जिनमें कम जागरूकता, प्रशासनिक देरी और प्रतिकूल परिणामों का डर शामिल है। इसके अतिरिक्त, वेबिनार में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को स्पष्ट किया गया:

*राजनीतिक प्रतिनिधि और दल:* सांसद और विधायक व्यक्तिगत रूप से आरटीआई के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकारी' नहीं हैं। उनके आधिकारिक वेतन, भत्ते और विधायी रिकॉर्ड संबंधित विधानसभा या संसद सचिवालय से प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन उनका व्यक्तिगत पत्राचार और राजनीतिक दल इसके दायरे से बाहर हैं।
*कॉर्पोरेट और विधिक संस्थाएं:* आरटीआई के तहत कृत्रिम विधिक व्यक्ति (कंपनी/संस्था) आवेदन कर सकते हैं, लेकिन उन्हें आवेदक के बजाय मुख्य रूप से एक पते के रूप में माना जाता है।

*सेवा एवं सेवानिवृत्ति लाभ:* सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के हवाले से सेवा निरंतरता, ब्रेक-इन-सर्विस, नियमित भर्ती प्रक्रिया और बैकडोर नियुक्तियों के अंतर पर चर्चा की गई।
*पाठ्यक्रम में आरटीआई को शामिल करने की पहल* 

कॉलेज के पाठ्यक्रमों में आरटीआई के बुनियादी सिद्धांतों को शामिल करने, प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए विधिक साक्षरता कार्यशालाएं आयोजित करने और आरटीआई क्लब स्थापित करने का सुझाव दिया गया।

वेबिनार में नरेश कुमार सैनी, राज तिवारी, प्रेम झांसी, सुरेश मौर्य, अधिवक्ता रोहित त्रिपाठी, आरटीआई एक्टिविस्ट उत्तम चंद्र वशिष्ठ, एक्टिविस्ट देवेंद्र अग्रवाल एवं सुनील खंडेलवाल सहित अन्य प्रतिभागियों ने आरटीआई प्रक्रियाओं में होने वाली देरी, बीमा दावों और वर्चुअल सुनवाई से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम का समापन अगले रविवार को पुनः एक नए विषय पर चर्चा के संकल्प के साथ हुआ।
कार्यक्रम का संचालन आरटीआई एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया इसमें प्रचार प्रसार में आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप के प्रचार प्रसार प्रकोष्ठ के प्रभारी पवन दुबे का विशेष योगदान रहा।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश* 

संपर्क 9589152587

Sunday, August 23, 2026

Breaking: 322वीं राष्ट्रीय आरटीआई ज़ूम मीटिंग आयोजित: सूचना में देरी, इनकार और अपील पर विशेषज्ञों का मंथन//

*Breaking: 322वीं राष्ट्रीय आरटीआई ज़ूम मीटिंग आयोजित: सूचना में देरी, इनकार और अपील पर विशेषज्ञों का मंथन//*
रीवा मप्र: 23 अगस्त 2026 को पारंपरिक साप्ताहिक आरटीआई वेबिनार की 322वीं राष्ट्रीय ज़ूम बैठक आयोजित की गई। सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक चली इस बैठक में देशभर के नागरिकों और आरटीआई कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सूचना मिलने में होने वाली देरी, पीआईओ (PIO) द्वारा आवेदनों को खारिज करने की प्रवृत्ति और अपीलीय प्रक्रियाओं में आ रही बाधाओं का समाधान खोजना था।

उत्तराखंड के प्रोफेसर व आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने बैठक में एक विस्तृत पीपीटी (PPT) प्रस्तुति के माध्यम से प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।
*बैठक के प्रमुख बिंदु और विशेषज्ञ सुझाव*

*सूचना में रणनीतिक देरी और जनहित परीक्षण:* वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने बताया कि लोक सूचना अधिकारी अक्सर छूट वाले प्रावधानों का दुरुपयोग कर आवेदनों को टालते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सूचना अधिकारी को छूट लागू करने से पहले 'जनहित परीक्षण' (Public Interest Test) करना अनिवार्य है।
*अपील प्रक्रिया और रिकॉर्ड प्रबंधन:* आरटीआई आवेदनों में स्पष्टता, सही रिकॉर्ड विनिर्देशों और सटीक प्रलेखन (Documentation) की आवश्यकता पर बल दिया गया। प्रथम और द्वितीय अपील के सही प्रारूप और साक्ष्यों के रख-रखाव के गुर साझा किए गए।

*सूचना आयोग की सीमाएं:* यह रेखांकित किया गया कि सूचना आयोग केवल सूचना दिला सकता है और जुर्माना (जो सरकारी खजाने में जाता है) लगा सकता है। भ्रष्टाचार पर सीधी दंडात्मक कार्रवाई के लिए अन्य कानूनी मंचों का रुख करना होता है। आवेदक आयोग से मुआवजा (Compensation) की मांग भी कर सकते हैं।
*डिजिटल आरटीआई और आईटी अधिनियम:* श्री ठक्कर द्वारा आईटी अधिनियम के तहत इलेक्ट्रॉनिक पोर्टलों के कार्यान्वयन पर चर्चा हुई। वर्तमान प्रशासनिक चुनौतियों को देखते हुए माना गया कि 2027 तक यह व्यवस्था पूरी तरह सुचारू हो पाएगी।

*रिक्त पदों का मुद्दा:* झारखंड में मुख्य सूचना आयुक्त और हिमाचल प्रदेश में राज्य सूचना आयोग (SIC) के निष्क्रिय होने पर चिंता व्यक्त की गई। इसके समाधान के लिए अंजलि भारद्वाज के सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों का संदर्भ देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की रणनीति पर सहमति बनी।
*व्यावहारिक समस्याओं पर हुआ मार्गदर्शन*

चर्चा के दौरान रीवा में सड़क बुनियादी ढांचे और हाइड्रोलिक डेटा, निरीक्षण के दौरान दस्तावेजों की फोटोग्राफी की अनुमति, और शिक्षा व स्वास्थ्य विभागों में निजता के अधिकारों (विशेषकर बच्चों की जानकारी) के साथ पारदर्शिता के संतुलन जैसे विषयों पर विस्तृत जवाब दिए गए। इसके अतिरिक्त, सरकारी विभागों—विशेषकर पुलिस और पीडब्ल्यूडी—में तबादले के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए आरटीआई के प्रभावी उपयोग पर प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि प्रतिभागियों में देश के विभिन्न कोनों से कार्यकर्ता जैसे राज तिवारी, जयपाल सिंह खींची, फतेह चंद्र गुलेरिया, उत्तम चंद्र वशिष्ठ, सुनील खंडेलवाल, सुरेश प्रसाद मौर्या, देवेंद्र अग्रवाल आदि सैकड़ों आरटीआई एक्टिविस्ट सम्मिलित हुए।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*