Sunday, September 27, 2026

Breaking:// आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 4 और व्यावहारिक चुनौतियों पर व्यापक मंथन: कानूनी प्रावधानों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर//

*Breaking:// आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 4 और व्यावहारिक चुनौतियों पर व्यापक मंथन: कानूनी प्रावधानों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर//*

विशेष रिपोर्ट दिनांक 27 सितंबर 2026 रीवा मप्र 
सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 की धारा 4 के कार्यान्वयन, पारदर्शी शासन और इसके क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक चुनौतियों को लेकर हाल ही में दिनांक 27 सितंबर 2026 को समय 11 बजे सुबह से लेकर 2 बजे दोपहर तक एक उच्चस्तरीय ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिभागियों ने आरटीआई कानून के प्रभावी इस्तेमाल, सार्वजनिक प्राधिकरणों की जवाबदेही तथा सूचना आयोगों की वर्तमान स्थिति पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक में मुख्य वक्ता वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के तहत आने वाले 'सक्रिय प्रकटीकरण' (Proactive Disclosure) की आवश्यकताओं का बारीक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कानून की मंशा सरकारी विभागों द्वारा स्वतः सूचनाएं सार्वजनिक करने की थी, ताकि आम जनता को बार-बार आरटीआई न लगानी पड़े, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके ठीक उलट है।
*धारा 4 का कार्यान्वयन: कानूनी प्रावधान बनाम जमीनी हकीकत*

बैठक के दौरान कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) द्वारा अनुशंसित 25 विस्तारित प्रकटीकरण बिंदुओं और आरटीआई कानून में शामिल मूल 17 बिंदुओं के बीच के अंतर पर विस्तृत चर्चा हुई। जिसमें कमजोर अनुपालन और सीआईसी ऑडिट के विषय में वीरेंद्र कुमार ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के ऑडिट आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 838 सार्वजनिक प्राधिकरणों में से केवल 19 ही पारदर्शिता के निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं। वेबसाइटों की दुर्दशा के विषय में बताया गया कि अधिकांश सरकारी विभागों द्वारा दी गई जानकारी पुरानी होती है, संपर्क विवरण अपडेट नहीं होते और दस्तावेज़ खराब तरीके से स्कैन किए गए पीडीएफ प्रारूप में अपलोड किए जाते हैं, जिससे सूचना तक पहुँच बेहद कठिन हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विषय में बताया गया कि हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अनिवार्य 'थर्ड पार्टी ऑडिट' और सख्त प्रवर्तन तंत्र के स्पष्ट निर्देश दिए हैं, लेकिन सार्वजनिक प्राधिकरणों में उदासीनता और निष्पक्षता की भारी कमी बनी हुई है। संघीय ढांचा के विषय में प्रकाश डालते हुए बताया गया कि DoPT और कार्मिक मंत्रालय की 25 सूत्रीय विस्तारित सिफारिशों को लागू करने में राज्यों के संघीय ढांचे से जुड़ी कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं, जिसके कारण कई राज्य सरकारें इन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं कर रही हैं।

 *सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और संवैधानिक पहलू*

बैठक में सत्येंद्र सिंह, सुनील खंडेलवाल, जयपाल सिंह खींची, फतेह चंद्र गुलेरिया, देवेंद्र अग्रवाल, राज तिवारी एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी और अन्य प्रतिभागियों ने मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में सूचना आयोगों की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई। बताया गया कि नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद बना हुआ है। चर्चा के दौरान यह मुद्दा उठा कि मुख्यमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता की समिति द्वारा की जाने वाली सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का रुख महत्वपूर्ण रहा है और इस तरह के संवैधानिक मामलों पर विचार किया जा रहा है। वहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता पर प्रतिभागियों ने जोर देकर कहा कि आयोगों में आयुक्तों के पद खाली रहने या नियुक्तियों में देरी से आरटीआई अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। इसके लिए ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति और सरकार व सूचना आयोगों के बीच समान सहयोग आवश्यक है।
*विभिन्न राज्यों से जुड़े मामले और शिकायतें*

बैठक के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं और आरटीआई के उपयोग पर विशेषज्ञ की सलाह ली:

*नरेगा फंड का दुरुपयोग और पुलिस जांच*

डॉ. सिंह ने मनरेगा (नरेगा) निधि में हुए भ्रष्टाचार और शिकायत के बावजूद पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने का मुद्दा उठाया। वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने स्पष्ट किया कि जब पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं करती, तो केवल सूचना आयोग के भरोसे रहने के बजाय संबंधित साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सीधे अपराधिक न्यायालय (मजिस्ट्रेट कोर्ट) में शिकायत दर्ज की जानी चाहिए, क्योंकि सूचना आयोग के पास आपराधिक मामलों जैसी शक्तियां नहीं होतीं।

*सुनील खंडेलवाल द्वारा प्रस्तुत झारखंड सूचना आयोग की स्थिति*

झारखंड में सूचना आयोग के निष्क्रयात्मक होने पर चर्चा हुई। विशेषज्ञ ने सलाह दी कि सबसे पहले आयोग के कामकाज और मुख्य सूचना आयुक्त की कार्यप्रणाली को सत्यापित किया जाए। यदि आयोग पूरी तरह ठप है, तो इस स्थिति को चुनौती देने के लिए उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का रुख किया जा सकता है।

*निर्माण कार्य की सामग्री और भौतिक सत्यापन*

नगर परिषद की नाली निर्माण परियोजना में इस्तेमाल घटिया सामग्री की जांच के संबंध में पूछे गए सवाल पर बताया गया कि आरटीआई के तहत रिकॉर्ड का निरीक्षण (Inspection) कोई भी नागरिक कर सकता है, लेकिन निजी सामग्री या बिना सक्षम आदेश के किसी परिसर से भौतिक नमूने लेने के लिए उचित कानूनी अधिकार की आवश्यकता होती है। इसके लिए किसी अन्य विभाग से स्वतंत्र इंजीनियर द्वारा निरीक्षण की मांग की जा सकती है।

*फसल बीमा और मुआवजे का दावा*

फसल बीमा पॉलिसियों की जानकारी देने से इनकार करने पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने तथा सूचना मिलने में हुई अनावश्यक देरी के कारण हुए वित्तीय नुकसान के सबूत के साथ सूचना आयोग में मुआवजा मांगने की रणनीति पर चर्चा की गई।

*भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता*

सरकारी भर्तियों (अनुच्छेद 309 के तहत शक्तियों) में पारदर्शिता पर चर्चा करते हुए सलाह दी गई कि सभी आवेदन पत्रों और भर्ती विज्ञापनों का रिकॉर्ड आरटीआई से मांगा जा सकता है। डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के लिए ऑनलाइन विज्ञापनों के स्क्रीनशॉट या फोटो ले लेना चाहिए।

बैठक के अंत में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि आरटीआई कानून को प्रभावी बनाने के लिए तीसरे पक्ष के नियमित ऑडिट, लोक सूचना अधिकारियों (PIOs) के प्रशिक्षण, नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी और कड़े प्रशासनिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। यदि सरकारी विभाग धारा 4 का ईमानदारी से पालन करते हुए स्वतः जानकारी सार्वजनिक करें, तो आम नागरिकों को आरटीआई आवेदनों और लंबी अपीलों के चक्रव्यूह से राहत मिल सकती है। इस महत्वपूर्ण विषय पर आगे की रणनीति और प्रगति की समीक्षा अगले रविवार आयोजित होने वाली बैठक में की जाएगी।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

Tuesday, September 15, 2026

Breaking:// झिरिया शिव एवं देवी मंदिर सेदहा में गरिमामय माहौल में संपन्न हुआ सुंदरकांड पाठ व सूक्ष्म भंडारा//

*Breaking:// झिरिया शिव एवं देवी मंदिर सेदहा में गरिमामय माहौल में संपन्न हुआ सुंदरकांड पाठ व सूक्ष्म भंडारा//*
दिनाँक 16 सितंबर 2026 रीवा मप्र।

    ग्राम सेदहा स्थित झिरिया शिव एवं देवी मंदिर प्रांगण में मंगलवार (15 सितंबर 2026) को भव्य सुंदरकांड पाठ एवं सूक्ष्म भंडारे का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस मंगलवार का कार्यक्रम हनुमान जी स्वामी मंदिर प्रांगण कैथा के तत्वावधान में आयोजित हुआ जो शाम 07:00 बजे से शुरू होकर देर रात तक भक्तिमय वातावरण में चलता रहा।
सुंदरकांड पाठ के समापन के उपरांत सूक्ष्म भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ महाप्रसाद ग्रहण किया।
सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने जानकारी देते हुए बताया कि परंपरा अनुसार प्रत्येक मंगलवार की शाम झिरिया मंदिर प्रांगण में सुंदरकांड और भंडारे का कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किया जाता है। इस विशेष धार्मिक अनुष्ठान को सफल बनाने में आसपास के ग्रामवासियों एवं गणमान्य नागरिकों का सराहनीय सहयोग और योगदान रहता है। समस्त ग्रामवासियों के सहयोग से यह कार्यक्रम निरंतर आयोजित हो रहा है।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Saturday, September 12, 2026

Breaking// यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्रीमद् शारदा देवी मंदिर में भंडारे का आयोजन, श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया प्रसाद//

*Breaking// यज्ञों की पावन स्थली कैथा के श्रीमद् शारदा देवी मंदिर में भंडारे का आयोजन, श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया प्रसाद//*
रीवा (विशेष ब्यूरो रिपोर्ट): यज्ञों की पावन एवं पुनीत स्थली कैथा स्थित श्रीमद् शारदा देवी मंदिर प्रांगण में विगत शुक्रवार, 11 सितंबर को विशाल भंडारे का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस धार्मिक आयोजन में क्षेत्र के बड़ी संख्या में भक्त श्रद्धालुओं ने सहभागिता की और माता रानी का प्रसाद ग्रहण किया।
कैथा की प्राचीन परम्परानुसार, हनुमान मंदिर प्रांगण में मुख्य कार्यक्रम संपन्न होने के उपरांत देवी मंदिर प्रांगण में भंडारे का आयोजन किया जाता है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए शुक्रवार को सर्वप्रथम भगवान सत्यनारायण की कथा हुई, तत्पश्चात श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से दुर्गा चालीसा का पाठ किया। पूजन और आरती के उपरांत महाप्रसाद का वितरण प्रारंभ हुआ।
कार्यक्रम के संयोजक शिवानंद द्विवेदी ने जानकारी देते हुए बताया कि इन समस्त धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन श्रीमद् भागवत कथा धर्मार्थ समिति भारत के तत्वावधान में किया जाता है। आयोजन को सफल बनाने में समिति के पदाधिकारियों और स्थानीय ग्रामीणों का सराहनीय योगदान रहा।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Tuesday, September 8, 2026

Breaking:// हनुमान जी स्वामी मंदिर कैथा में भागवत महायज्ञ का हुआ समापन, विशाल भंडारे में उमड़ा जनसैलाब//

*Breaking:// हनुमान जी स्वामी मंदिर कैथा में भागवत महायज्ञ का हुआ समापन, विशाल भंडारे में उमड़ा जनसैलाब//*
दिनांक 8 सितंबर दिन मंगलवार रीवा मध्य प्रदेश://

(विशेष संवाददाता) यज्ञों की पावन स्थली हनुमान जी स्वामी मंदिर प्रांगण, कैथा में आयोजित श्रीमद्भागवत भक्ति ज्ञान महायज्ञ का सोमवार 7 सितंबर 2026 को पूर्णाहुति एवं विशाल भंडारे के साथ भव्य समापन हुआ। 31 अगस्त से प्रारंभ हुए इस 07 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान के अंतिम दिन मंदिर प्रांगण में महाप्रसाद (भंडारे) का आयोजन किया गया जिसमें हजारों की संख्या में भक्त श्रद्धालुगण उपस्थित होकर महा-भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया।
भंडारे में कैथा सहित आसपास के दर्जनों ग्राम क्षेत्रों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने पंगत में बैठकर सात्विक प्रसाद ग्रहण किया और हनुमान जी स्वामी का आशीर्वाद प्राप्त किया। सुबह से शुरू हुआ भंडारा देर शाम तक अनवरत चलता रहा, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल से सराबोर नजर आया।
कार्यक्रम के सफल आयोजन पर संयोजक एवं प्रचारक शिवानंद द्विवेदी ने मंदिर समिति, सेवादारों और क्षेत्र की सभी जनता जनार्दन का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं के सहयोग और अपार श्रद्धा के कारण ही यह महायज्ञ व भंडारा निर्विघ्न रूप से संपन्न हो सका।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Sunday, September 6, 2026

Breaking// कैथा में श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिन: श्रीराम और परशुराम के अनुकरणीय चरित्र का ओजस्वी वर्णन// श्रीमद भगवत कथा: भटकी मानवता का एकमात्र मार्गदर्शक// श्रीराम और श्रीकृष्ण: भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ//

*Breaking// कैथा में श्रीमद्भागवत कथा का छठा दिन: श्रीराम और परशुराम के अनुकरणीय चरित्र का ओजस्वी वर्णन// श्रीमद भगवत कथा: भटकी मानवता का एकमात्र मार्गदर्शक// श्रीराम और श्रीकृष्ण: भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ//*


दिनांक 06 सितंबर 2026 | रीवा (मध्य प्रदेश)

  पावन यज्ञस्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत महायज्ञ एवं कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। 31 अगस्त से प्रारंभ हुआ यह पापविनाशक महायज्ञ 07 सितंबर दिन सोमवार को हवन एवं विशाल भंडारे के साथ पूर्ण आहुति देकर समाप्त होगा।

कथा व्यास ने छठे दिन नौवें और दसवें स्कंध का भावपूर्ण वर्णन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, भगवान परशुराम के तेजस्वी चरित्र तथा भारतीय संस्कृति और वर्ण व्यवस्था के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाला।
*श्रीमद भगवत कथा: भटकी मानवता का एकमात्र मार्गदर्शक*

कथा वाचक डॉक्टर गौरीशंकर शुक्ला ने कहा कि सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण भगवान नारायण के 24 अवतारों और उनकी दिव्य लीलाओं पर केंद्रित है। आज के भौतिकवादी दौर में, जहाँ मानव मूल्य घट रहे हैं, श्रीमद्भागवत महापुराण भटकी हुई मानवता के लिए एकमात्र सहारा और वरदान है। यह संसार रूपी घोर अंधकार में प्रकाश पुंज की तरह काम करती है। इसमें मानव जीवन प्रबंधन के सभी अमूल्य सूत्र मौजूद हैं।

कथा में इस बात पर बल दिया गया कि शास्त्रों के आदर्शों के बिना कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती। आज समाज भौतिक सुख-सुविधाओं को ही अपना आदर्श मान बैठा है, जबकि बिना त्याग और कठिन परिश्रम के जीवन का परिष्कार संभव नहीं है।
*परिश्रम से प्राप्त धन की तीन गतियाँ:*

नैतिक शास्त्रों का हवाला देते हुए बताया गया कि परिश्रम से अर्जित धन की केवल तीन गतियाँ होती हैं — दान, भोग और नाश। यदि धन का उपयोग दान या सात्विक उपभोग में न किया जाए, तो उसका नष्ट होना तय है। आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में भी समय पर बजट का उपयोग न होने पर उसके 'लैप्स' हो जाने का सिद्धांत इसी सनातन सत्य की पुष्टि करता है।
*श्रीराम और श्रीकृष्ण: भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ*

कथा के दौरान भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के अवतारों की तुलनात्मक एवं वैज्ञानिक विवेचना की गई जिसमें त्रेतायुग में मध्याह्न (दिन के 12 बजे) अवतरित हुए। इनका चरित्र अत्यंत शांत, सीधा, सरल और मर्यादा की प्रतिमूर्ति है। जबकि भगवान श्रीकृष्ण के विषय में उन्हें द्वापरयुग में अर्धरात्रि (रात के 12 बजे) अवतरित हुए बताया गया। इनका चरित्र अत्यंत रहस्यमयी, गूढ़ और लीलाओं से परिपूर्ण (लीला पुरुषोत्तम) है। कथा व्यास ने चिंता जताते हुए कहा कि आज माता-पिता अपने बच्चों का नामकरण पाश्चात्य संस्कृति के आधार पर कर रहे हैं। यदि अपनी संस्कृति के प्रति यही अंधानुकरण जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ अपने वास्तविक महापुरुषों और आदर्शों को भूल जाएँगी। उन्होंने शास्त्रों की अंधभक्ति के बजाय उनकी विज्ञान-संगत और समयानुकूल व्याख्या करने पर जोर दिया।
*महर्षि जमदग्नि, परशुराम और विश्वामित्र का प्रसंग*

नौवें स्कंध के अंतर्गत कथा व्यास ने 'संस्कार के सिद्धांत' की वैज्ञानिकता को समझाया जिसमें चारु परिवर्तन कथा में राजा गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह ऋचिक ऋषि से हुआ था। संतान प्राप्ति हेतु ऋचिक ऋषि ने ब्राह्मण और क्षत्रिय गुणों से युक्त दो अलग-अलग 'अभिमंत्रित चारु' तैयार किए। गुण-धर्म का हस्तांतरण विषय पर बताया गया कि भूलवश चारु के आपस में बदल जाने के कारण सत्यवती के गर्भ से क्षत्रिय स्वभाव वाले जमदग्नि (भगवान परशुराम के पिता) का जन्म हुआ, जबकि क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के बावजूद विश्वामित्र में ब्राह्मणीय सात्विक व तपस्वी गुण आए।

इस बीच भगवान परशुराम का अवतरण की कथा का वर्णन हुआ जिसमें बताया गया कि अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं और कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों द्वारा ऋषि जमदग्नि के वध का प्रतिशोध लेने तथा अधर्म का नाश करने हेतु भगवान विष्णु के रूप में परशुराम जी का अवतरण हुआ।
*वैदिक वर्ण व्यवस्था: जन्म नहीं, 'गुण-कर्म-स्वभाव' पर आधारित*

कथा में वैदिक वर्ण व्यवस्था के वास्तविक स्वरूप पर गहरा चिंतन प्रस्तुत किया गया जिसमें बताया गया कि इसका एक वैज्ञानिक आधार है जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार वर्ण व्यवस्था व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित थी, न कि जन्म या जाति पर। परम पुरुष का रूपक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि ऋग्वेद में वर्णित 'परम पुरुष' के विभिन्न अंगों (शीर्ष से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य और चरणों से शूद्र) से उत्पत्ति का अर्थ समाज के विभिन्न संभागों और उनके कार्यों का प्रतीकात्मक विभाजन था।

वहीं 'द्विज' का वास्तविक अर्थ का वर्णन करते हुए बताया गया कि बाल्यावस्था में हर मनुष्य अज्ञानता के कारण शूद्र समान होता है। शिक्षा, संस्कार और ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसका 'दूसरा जन्म' होता है, जिसे 'द्विज' कहा जाता है। इसे केवल बाहरी कर्मकांडों तक सीमित करना गलत व्याख्या है।
 *सोमवार दिनांक 07 सितंबर को भंडारे का कार्यक्रम*

     पावन यज्ञस्थली कैथा में चल रहे इस दिव्य आयोजन के अंतिम चरण में 07 सितंबर (सोमवार) को पूर्णाहुति, विशाल हवन एवं महा भंडारे का आयोजन किया जाएगा। आयोजन समिति ने क्षेत्र के समस्त धर्मप्रेमी बंधुओं से इस पापविनाशक महायज्ञ में सम्मिलित होकर पुण्य लाभ अर्जित करने की अपील की है।
*विशेष ब्यूरो रिपोर्ट — रीवा (मध्य प्रदेश)*

Saturday, September 5, 2026

Breaking:// पावन यज्ञस्थली कैथा में पांचवें दिन भी चली भागवत कथा की बयार: अजामिल उद्धार और समुद्र मंथन के आध्यात्मिक - वैज्ञानिक दर्शन पर झूमे श्रद्धालु//

*Breaking:// पावन यज्ञस्थली कैथा में पांचवें दिन भी चली भागवत कथा की बयार: अजामिल उद्धार और समुद्र मंथन के आध्यात्मिक - वैज्ञानिक दर्शन पर झूमे श्रद्धालु//*

विशेष ब्यूरो रिपोर्ट | रीवा (मध्य प्रदेश)

रीवा: रीवा जिले की पावन स्थली कैथा स्थित अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। पिछले कुछ दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश के बावजूद भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। आचार्य डॉ गौरी शंकर शुक्ला के मुखारविंद से प्रवाहित हो रही कथा धारा में छठे से नौवें स्कंध तक के मुख्य प्रसंगों का वर्णन किया जा रहा है।
*अजामिल के पतन और उद्धार की मार्मिक कथा*

कथा के दौरान छठे स्कंध से प्रसिद्ध अजामिल प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। आचार्य जी ने बताया कि अजामिल एक वेद-शास्त्रों का ज्ञाता और संस्कारी ब्राह्मण था, जो कुसंगत और काम के आवेग के कारण धर्म मार्ग से भटक कर पतित हो गया।
परंतु, उसके पूर्व जन्मों के सात्विक और धार्मिक कर्म निष्फल नहीं गए। संतों की कृपा से उसने अपने दसवें पुत्र का नाम 'नारायण' रखा। जीवन के अंतिम क्षणों में यमदूतों को देखकर जब अजामिल ने भयभीत होकर अपने पुत्र 'नारायण' को पुकारा, तो केवल 'नारायण' नाम के उच्चारण मात्र से भगवान के पार्षद (गण) प्रकट हो गए और यमदूतों से उसकी रक्षा की। इस प्रकार अजामिल को परमधाम और मोक्ष की प्राप्ति हुई।

*जीवन प्रबंधन और कर्म-फल का सिद्धांत*

कथा व्यास ने इस प्रसंग की आध्यात्मिक विवेचना करते हुए कहा कि ईश्वर की कृपा और नाम की महिमा पूर्व जन्मों के संचित शुभ कर्मों का परिणाम होती है। भागवत महापुराण कलिकाल में पतित से पतित मानव के उद्धार का मार्ग दिखाती है। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से ईश्वर की शरण में आता है, वह न केवल स्वयं का बल्कि अपने कुल की सात पीढ़ियों का उद्धार कर देता है।
*समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम और मोहिनी अवतार*

कथा के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन, देवासुर संग्राम, महर्षि दधीचि का अस्थिदान, भगवान विष्णु के कूर्म (कछुआ), वामन और मोहिनी अवतार का विस्तृत वर्णन किया गया। समुद्र मंथन से निकले घोर 'हलाहल' विष से जब तीनों लोकों में हाहाकार मचा, तब भगवान शिव ने जगत् कल्याण के लिए उसे अपने कंठ में धारण किया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। इसके बाद मोहिनी रूप धारण कर भगवान विष्णु ने असुरों से अमृत कलश लेकर देवताओं को पान कराया।

आचार्य जी ने बताया कि अमृत कलश की छीना-झपटी के दौरान जहाँ-जहाँ अमृत की बूंदें छलकीं—प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—उन चारों स्थानों पर आज भी कुंभ मेले का पावन आयोजन होता है।
*समुद्र मंथन का आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दर्शन*

कथा में समुद्र मंथन के मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक पहलू को रेखांकित करते हुए बताया गया कि हमारा मस्तिष्क ही 'समुद्र' है। जब हम चिंतन रूपी मंथन करते हैं, तो अच्छे और बुरे दोनों विचार (अमृत और विष) उत्पन्न होते हैं। देवासुर संग्राम हमारे भीतर चलने वाला द्वंद्व है। मानव का मूल उद्देश्य शिव रूपी धैर्य से नकारात्मक विचारों को समाप्त कर अमृत रूपी सद्विचारों और सत्कर्मों को अपनाना होना चाहिए। भारतीय शास्त्र ग्रंथ केवल धार्मिक कथाएं नहीं, बल्कि मानव जीवन के सटीक प्रबंधन का वैज्ञानिक आधार हैं।

*7 सितंबर दिन सोमवार तक चलेगा आयोजन*

कैथा के ऐतिहासिक हनुमान जी स्वामी मंदिर परिसर में 31 अगस्त से शुरू हुआ यह पापविनाशक श्रीमद्भागवत कथा आयोजन 07 सितंबर 2026 दिन सोमवार तक चलेगा। आयोजकों और धर्मप्रेमी बंधुओं ने समस्त क्षेत्रवासियों से इस अमृतमयी कथा का श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित करने की अपील की है।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*

Friday, September 4, 2026

ब्रेकिंग// कैथा में भागवत महापुराण कथा का चौथा दिन – श्रीमद भागवत के पांचवें, छठे, और सातवें स्कंध का चल रहा वर्णन// लोक कल्याणार्थ और धर्म रक्षा हेतु महर्षि दधीचि ने किया अपनी अस्थियों का दान//

*ब्रेकिंग// कैथा में भागवत महापुराण कथा का चौथा दिन – श्रीमद भागवत के पांचवें, छठे, और सातवें स्कंध का चल रहा वर्णन// लोक कल्याणार्थ और धर्म रक्षा हेतु महर्षि दधीचि ने किया अपनी अस्थियों का दान//*
 
दिनांक 04 सितंबर 2026 रीवा मप्र।

    पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद भागवत कथा के पांचवें, छठे, एवं सातवें स्कंध में आज चौथे दिन दिनांक 04 सितंबर 2026 दिन शुक्रवार को आचार्य डॉ गौरी शंकर शुक्ला के मुखारबिंद से जड़ भरत और दधीचि ऋषि के कथा प्रसंगों का वर्णन चल रहा है।
श्रीमद भागवत महापुराण के पांचवें स्कंध को भगवान् विष्णु की नाभि, छठे को वक्षस्थल और सातवें तथा आठवें को जंघा बताया गया है.
पिछले तीन दिवस श्रीमद भागवत के प्रथम चार स्कंधों का वर्णन संपन्न हुआ. जिसमे श्रीमद भागवत का महात्म वर्णन, भगवान् विष्णु के चौबीस अवतारों की कथा, ब्रह्मा की उत्पत्ति, नारद के पूर्व जन्मों की कथा, राजा परीक्षित की कथा, शौनकादि ऋषियों तथा सुकदेव जी के संवाद, सृष्टि क्रम का वर्णन, बालक भक्त ध्रुव और प्रहलाद चरित्र सहित अन्य कई कथा प्रसंग सम्मिल्लित रहे.
*पांचवें स्कंध की कथा का वर्णन* - दिनांक 12 एवं 13 अगस्त की कथा प्रसंगों में पांचवें स्कंध की कथा में प्रियव्रत, राजा अग्रिघ्र, राजा नाभि, जड़ भरत, ऋषभ देव आदि चरित्रों का वर्णन हुआ. ध्यान देने योग्य है कि यहाँ पर जड़ भरत एक अन्य राजा थे और शकुंतला तथा दुष्यंत के पुत्र नहीं थे जिनके नाम से भारत वर्ष का नाम पड़ा. जड़ भरत की कथा इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है की श्रीमद भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा है की “हे अर्जुन जो व्यक्ति जिस भाव से मुझे पूजता है उसे मैं उसी भाव में मिलता हूँ” और यह भी उल्लेख आया है की “हे अर्जुन शरीर त्याग के समय जिस व्यक्ति के मन में जो भाव रहते हैं वह व्यक्ति उसी योनि/जन्म को प्राप्त होता है” इस सूक्ति/श्लोक का सीधा-सीधा तात्पर्य है की यदि हम शरीर त्याग के समय भगवान् के भक्ति भाव में हैं तो भगवान् की प्राप्ति होगी और यदि सांसारिक मोह-माया और घर-गृहस्थी सम्बन्धियों, संपत्ति-जायदाद को मन में रखकर मृत्यु को प्राप्त करते हैं तो हम पुनः उसी योनि में प्रवेश करते हैं और पुनः जन्म-मरण के चक्र में फंस जाते हैं. इस प्रकार जड़ भरत का कथानक भगवान् श्री कृष्ण के उसी श्लोक की पुष्टि करता है.
जड़ भरत का प्रसंग कुछ ऐसे है की भरत एक अत्यंत धर्मात्मा व्यक्ति थे. वह ईश्वर की भक्ति भाव और तपस्या में लगे रहते थे. इसी उद्येश्य की पूर्ति के लिए अरण्य में कुश की कुटिया बनाकर तपस्या किया करते थे. एक बार उसी वन में एक सिंह आया. उसी समय वहां पर सरोवर में जल ग्रहण करने एक गर्भवती हिरणी भी आई. सिंह ने स्वभाव अनुसार तेज गर्जना की. जैसे ही गर्जना की ध्वनि हिरणी के कानों में पड़ी, भय के मारे हिरणी का गर्भ वहीँ उसी स्थल पर गिर गया और वह मृत्यु को प्राप्त कर गयी. यह वाकया तपस्या में बैठे जड़ भरत देख रहे थे. जड़ भरत ने अपने तपोबल से कमंडल से जल लेकर सिंह पर छोंड दिया और सिंह वहीँ पर मुक्त हो गया. परन्तु हिरणी का बच्चा वहीँ पर पड़ा हुआ तड़प रहा था. यह देख कर संत ह्रदय में दया का भाव उत्पन्न हुआ, और सब कुछ त्याग कर आरण्य में तपश्या करने निकले जड़ भरत ने उस छोटे हिरणी के बच्चे को गोद ले लिया और अपने साथ रखकर पालन पोषण करने लगे. इस प्रकार देखें की कैसे जड़ भरत जो सब कुछ त्याग कर तपश्या करने आये थे और सात्विक कर्म में ही पड़कर, एक असहाय की सहायता हेतु ही सही परन्तु अंततः उस हिरणी के बच्चे के मोह में पड़ गए. यह मोह यद्यपि सात्विक कर्म दया-भाव से उत्पन्न हुआ परन्तु जड़ भरत को उनके त्याग-तपश्या के मार्ग से अंततः विचलित कर दिया. कहाँ जड़ भरत सब कुछ त्याग कर तपश्या करने निकले थे और कहाँ वह एक पशु के मोह में पड़कर भक्ति भाव त्याग तपश्या त्याग कर मृग का पालन पोषण करने लगे.      

यह सब काफी समय तक चलता रहा और एक दिन बड़े होने के बाद मृग वहीँ पर सरोवर में जल पीने आये हिरणों के झुण्ड के साथ पलायन कर गया. जड़ भरत उस हिरण के बच्चे में इतने आसक्त हो गए थे की उसके बिछड़ने के दुःख में व्यथित हो गए और इसी दुःख को लेकर अपना प्राण त्याग दिया. चूंकि मृत्यु के समय जड़ भरत के मन में पूर्णरूपेण मृग का भाव समाहित हो चुका था इस कारण अगले जन्म में उन्हें मृग की ही योनि मिली. मृग योनि में जड़ भरत गंडक नदी के किनारे रहने लगे. वह ज्ञानी थे और उनको पूर्ण एहसास था की पूर्व जन्म में वह जड़ भरत थे और कैसे मृग के मोह में पड़कर उन्हें मृग योनी प्राप्त हुई है. अब वह सब जानते हुए इस योनी से मुक्त होकर पुनः भगवत भक्ति में लीन होकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते थे.
यहाँ पर पुनः श्रीमद भगवद गीता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक है – इसमें अर्जुन योग-तप के कर्म से भटके हुए साधक के विषय में जानना चाहते हैं और श्री कृष्ण जी से प्रश्न पूंछते हैं कि “हे केशव! आपने योग, भक्ति, तप ज्ञान की तो महिमा का वखान किया है परन्तु मेरे मन में एक प्रश्न है जो मात्र आप ही इसका समाधान कर सकते हैं - कहीं ऐसा तो नहीं है कि योग-तप से भटके हुए ऋषि महात्मा की दशा उस वायु के तेज़ प्रवाह से भटके हुए बादल की तरह तो नहीं जो उसे आसमान से छिन्न-भिन्न कर देती है. कहीं योग-साधना में रत आपके भटके भक्त की दशा उसी छिन्न-भिन्न हुए बादल की तरह तो नहीं होगी”. इस पर श्री कृष्ण का कथन रहता है की “हे कौन्तेय! न ही इस लोक में और न ही परलोक में, मेरे भक्त का कुछ भी बुरा नहीं हो सकता. मेरा भक्त अपने इस जन्म के संचित शुभ कर्मों के अनुसार अगले जन्म में किसी योगी, तपस्वी, संत, महात्मा और उच्च कुल के समुदाय में जन्म लेता है और अपने पूर्व जन्मो के अच्छे संचित कर्म संस्कारों के प्रभाव से पुनः मोक्ष प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ता है और वह उसे अंततः प्राप्त करता है”. तात्पर्य यह हुआ की, हमारे संचित कर्म बैंक बैलेंस की तरह हैं. यदि उनसे व्याज नहीं मिलता तो भी वह सुरक्षित तो रहते ही हैं. जैसे कर्म करेंगे वैसे ही अगले जन्म मिलेंगे और हमारे पूर्व संचित कर्म मिलकर हमे पुनः उसी मार्ग पर कर्म करने की दृश्य-अदृश्य प्रेरणा देंगे. और यही इस जड़ भरत का भी आख्यान है. इस आख्यान के माध्यम से हिन्दू-सनातन धर्म के पुनर्जन्म और कर्मफल के अवश्यम्भावी सिद्धांत को प्रबलता मिलती है.
अंत में मृग योनि से जड़ भरत को मुक्ति मिलती है और वह पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म लिया. उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण शिक्षा दीक्षा लेकर भगवत भजन में लीन रहने वाले जड़ भरत को एक बार कुछ भील पकड़ कर देवी के समक्ष बलि देने ले जाते है परन्तु जब देवी यह परिदृश्य देखती है तो स्वयं खडग हाथ में लेकर भील राजा की ही बलि दे देती है क्योंकि जड़ भरत एक धर्मात्मा ब्राह्मण थे और उनकी बलि धर्म के पूर्णतया विरुद्ध थी. तत्पश्चात एक बार एक अन्य राजा की पालकी ले जाने के लिए जड़ भरत को हृष्ट पुष्ट होने के कारण बुलाया जाता है और जैसे ही उनके पैरों के तले कोई एक छोटी चींटी भी आये वह तुरंत उचक जाते और यह वाकया देखकर पालकी पर बैठा राजा चकित होकर पूंछता है की आप हृष्ट-पुष्ट हैं फिर भी पालकी लेकर उचक क्यों जाते हैं. इस पर शांत स्वभाव और तत्वज्ञानी धर्मात्मा पंडित जड़ भरत ने राजा को अपने पूर्व जन्मों का पूरा वृत्तान्त बता देते हैं. यह सब जानकर राजा उनसे दीक्षा लेकर उनको अपना गुरु बनाते हैं और कुछ समय बीत जाने के बाद ब्राह्मण कुल में अपना अंतिम जन्म लेने वाले जड़ भरत मुक्ति और भगवान् को प्राप्त होते हैं.
पंचम स्कंध में ही आगे पुरंजनोपख्यान की तरह रूपक द्वारा संसार सागर से प्राणियों को कैसे पार मिलता है और क्या-क्या भोगना पड़ता है, रौरव आदि नरकों के माध्यम से रूपक द्वारा समझाया गया है. इसी स्कंध में गंगावतरण की कथा भी आती है.
*महर्षि दधीचि की कथा और जन कल्याण के लिए हड्डियों का दान* - भारतीय संस्कृति में ऐसे कई महान ऋषि-मुनि पैदा हुए हैं जिन्होंने हसते हुए अपने सर्वश्व का दान मात्र मानव एवं जीव जगत के कल्याण के लिए कर दिया. संत का तात्पर्य ही है की जीव कल्याण और परमार्थ के लिए जीने वाला. ऐसा कैसे हुआ की ऐसे महान पुरुष मात्र भारतीय संस्कृति में ही ज्यादातर जन्म लिए? कुछ तो है इस संस्कृति में जो भारत को अन्य संस्कृतियों से अलग करती है. यह “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु शुखिनः” पर आधारित संस्कृति है. विश्व की अन्य संस्कृतियाँ यदि मानव को ही प्रधानता देती हैं तो भारत की सनातन संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जो प्रत्येक चराचर में एक ही “एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति” का दर्शन करती है. और यही इसकी खासियत भी है. क्योंकि जैसे ही मानव यह समझ पायेगा की इस सृष्टि में उत्पन्न होने वाला प्रत्येक जीव उसी “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” की संतान है तो वह सबको समभाव से देखना प्रारंभ कर देगा अर्थात योगी हो जायेगा क्योंकि “समत्वं योग उच्चते” अर्थात समता का नाम ही योग है ऐसा श्रीमद भगद गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया है. सभी जीवों में वह अपने आप को ही पायेगा.
महर्षि दधीचि की कहानी भी कुछ ऐसी ही त्याग बलिदान और लोक कल्याण के उद्येश्य से अपने शरीर तक को दान में देने सम्बन्धी है.
श्रीमद भागवत महापुराण में दधीचि के अस्थिदान प्रसंग की भूमिका कुछ ऐसे प्रारंभ होती है. यद्यपि देवराज इंद्र देवताओं का राजा बताया गया है परन्तु यह सब मात्र रूपक हैं. इनके माध्यम से चरित्रों की व्याख्या की गयी है न की इन सभी को वास्तविक में लेने की आवश्यकता है. देवराज इंद्र भोग-विलास में डूबे एक ऐसे शासक की कहानी है जो अपनी इन्द्रियों के वश में रहता है और अपने तुक्ष कृत्यों से हमेशा उपहास का पात्र बनता है. आज भी समाज में ऐसे शासक और व्यक्ति मिल जाते हैं जो अपने मन और इन्द्रियों के वशीभूत होकर छोटे कार्य करते हैं और बदनामी उठाते हैं. कुल मिलाकर एक शासक-प्रशासक में जो गुण होने चाहिए वैसा देवराज इंद्र में नहीं थे.

ऐसे ही एक कथा-प्रसंग में इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति को अपमानित करता है. अपमान न सहन कर पाने के कारण देवगुरु बृहस्पति स्वर्गलोक से बहिर्गमन कर अदृश्य हो जाते हैं और इंद्र को चेतावनी दे जाते हैं तुम्हे अपने गुरु के अपमान का फल चुकाना पड़ेगा. इंद्र अपने कृत्य पर शर्मिंदा होता है और देवगुरु को बहुत तलाशने का प्रयास करता है परन्तु देवगुरु नहीं मिल पाते हैं.
यह मौका देख असुर-दैत्य गुरु शुक्राचार्य दैत्यों को मौके का फायदा लेकर स्वर्गलोक में आक्रमण कर इंद्र को सत्ताविहीन करने और स्वर्गलोक को हन्थियाने के लिए प्रेरित करते हैं. दैत्यगण इंद्र को गुरु विहीन पाकर अमरावती में आक्रमण कर मार-काट मचाकर इंद्र को इन्द्रासन छोंड़ने के लिए विवास कर देते हैं. इंद्र भटकता हुआ जान बचाकर ब्रह्मा जी के पास पंहुचता है और उनसे अपनी करनी और व्यथा दोनों बयां करता है. ब्रह्मा कहते हैं की इंद्र तुमने अपने गुरु का अपमान किया है इसलिए तुम्हे इसका दंड तो भुगतना ही पड़ेगा. इंद्र के बारम्बार प्रार्थना करने पर ब्रह्मा जी बताते हैं की इस समय मात्र एक ही ऋषि है जो तुम्हे इस घोर संकट से उबार सकता है. महर्षि त्वष्टा का महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप को यदि तुम अपना पुरोहित बनाओगे और यज्ञ करवाओगे तो वह तुम्हे संकट से मुक्त करेगे.

यह सुनकर इंद्र महर्षि त्वष्टा पुत्र विश्वरूप के पास पंहुचता है और उनसे बारम्बार प्रार्थना करता है तब विश्वरूप इंद्र का पुरोहित बनना स्वीकारते हैं. परन्तु विश्वरूप को जैसे ही पता चलता है की वह जिस राक्षस वंश को समाप्त करने हेतु इंद्र का सहयोग दे रहे हैं वह मातृपक्ष से स्वयं भी राक्षस कुल से ही जुड़े हुए हैं तब वह आहुतियों में देव-दानव दोनों को आवाहित करते हैं इस प्रकार सम्पूर्ण यज्ञ का फल शून्य हो जाता है. यह जानकर इंद्र को क्रोध आता है और तीन मुख वाले महर्षि पुत्र विश्वरूप के तीनों शिरों को काट देता है. इस प्रकार इंद्र क्रोधवश ब्रह्म हत्या कर सबकी आलोचना का भागीदार बनता है. जैसे ही अपने पुत्र के वध की सूचना महर्षि त्वष्टा को मिलती है वह क्रोध में आग बबूला होकर अपने तपोबल से महायज्ञ कर वृत्तासुर नामक महाशक्तिशाली असुर-दैत्य को उत्पन्न कर उसे आदेश देते हैं की जाकर इंद्र को मार इन्द्रासन पर कब्ज़ा कर ले.
वृत्तासुर ब्राह्मण शक्ति से उत्पन्न इंद्र की ब्रह्म हत्या का परिणाम था इसलिए इंद्र की कोई शक्ति यहाँ तक की आग्नेयास्त्र, बज्र आदि विफल हो गए. इंद्र के बज्र और धनुष को वृत्तासुर ने बच्चों का खिलौना समझकर तोड़कर फेंक दिया. यह सब देख भयग्रस्त हो इंद्र युध्स्थल से पलायन कर सीधे विष्णु जी के पास पंहुचा. श्री नारायण ने भी ब्रह्म हत्या के लिए इंद्र की अतिसय अवहेलना की और कहा की वृत्तासुर से तुम्हारी रक्षा ब्रह्मा विष्णु शिव कोई त्रिदेव नहीं कर सकते और मात्र एक ही व्यक्ति है इस सृष्टि में जो तुम्हे वृत्तासुर के प्रकोप से बचा सकता है और वह हैं महर्षि दधीचि. महर्षि दधीचि से निवेदन करो की लोक कल्याण के लिए यदि वह अपनी अस्थियों का दान देवें तब उनके अस्थियों से बना हुआ बज्र ही वृत्तासुर को नष्ट कर सकता है अन्यत्र कोई रास्ता नहीं है.   

 भगवान् नारायण की बात सुन इंद्र महर्षि दधीचि के आश्रम जाकर उनके चरण कमलों में गिरकर सारी बात बताता है और लोक कल्याण के लिए जीवन यापन करने वाले महान मुनि दधीचि अपनी अस्थियों को दान देने के लिए तत्पर हो जाते है परन्तु इसके पूर्व उनकी भारतवर्ष की समस्त नदियों में स्नान करने की ईक्षा प्रबल होती है. यह जानकार की भारतवर्ष की समस्त नदियों में स्नान करने के उपरांत अस्थियों का दान देने में तो बहुत अधिक समय व्यतीत हो जायेगा. समस्त देवतागण अपनी शक्तियों से वहीँ दधीचि आश्रम के पास नैमिष आरण्य में सभी नदियों को एकत्रित कर देते हैं और दधीचि मुनि स्नान कर अपने शरीर में मिष्ठान का लेप करते हैं और उनकी वहीँ पर बंधी हुई कामधेनु गाय द्वारा चाट-चाट कर जैसे ही उनकी त्वचा और मज्जा शरीर छोड़ देती हैं इंद्र आदि देवतागण उनकी रीढ़ की हड्डी लेकर बज्र का निर्माण करते हैं और उसी बज्र के प्रहार से वृत्तासुर का वध करते हैं ऐसा कथा प्रसंग आता है.
कुछ टीकाकारों की मान्यता है की दधीचि की अस्थियों से तीन अस्त्रों का निर्माण हुआ था जिसमे की एक इंद्र का बज्र, दूसरा भगवान् शिव का त्रिशूल और तीसरा अर्जुन का गांडीव धनुष था. यद्यपि इस पर भी अलग-अलग टीकाकारों के अलग-अलग मत हैं.
*दधीचि के अस्थिदान का सिद्धांत*– महर्षि दधीचि भारतीय ऋषि-मुनि परंपरा के एक ऐसे महानतम संत हैं जिहोने मानव कल्याण के लिए अपना सर्वश्व दान कर दिया. इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति का अपमान किया तत्पश्चात महर्षि त्वष्टा पुत्र विश्वरूप का भी वध किया. इंद्र के कई अक्षम्य अपराध हैं फिर भी वह जब शरणागत हुआ तो उसे क्षमा कर ऋषियों ने उसके उद्धार का मार्ग खोजा. विश्वरूप एक ब्राह्मण था ब्रह्म हत्या के वध के पाप से इंद्र को कोई देव, दानव, ब्रह्म-विष्णु-महेश त्रिदेव नहीं बचा सकते थे. ऐसे जघन्य अपराध से मात्र एक ब्राह्मण तपश्वी की शक्ति ही बचा सकती थी. फलस्वरूप ऐसा विचार कर नारायण ने इंद्र को उसके मुक्ति का मार्ग दिखाया की मात्र महर्षि दधीचि का तपोबल और निःस्वार्थ लोक कल्याणकारी कृत्य ही है इस सृष्टि में जो इंद्र को बचा सकता है. इस प्रकार एक ब्राह्मण के तपोबल से वृत्तासुर नामक उत्पन्न मारक शक्ति से दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि दधीचि की लोक-कल्याणकारी श्जक्ति ही रक्षा कर सकती थी. शायद इंद्र के सम्पूर्ण युध्यों और इतिहास में मात्र वृत्तासुर दैत्य का ही एक ऐसा उल्लेख है जब क्रोधित ब्राह्मण की शक्ति को सर्वत्यागी ब्राह्मण की शक्ति से रोका गया है.

यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में दिनांक 31 अगस्त से 07 सितंबर तक आयोजित होने वाली पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद भगवद कथा का श्रवणपान करने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*