दिनांक 16 अगस्त 2026:
रीवा मप्र: नागरिक समाज को सशक्त बनाने, शासन में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के उद्देश्य से एक विशेष वेबिनार का आयोजन किया गया। दिनांक 16 अगस्त 2026 को आयोजित इस वेबिनार में देशभर के समाजसेवियों, अधिवक्ताओं और नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य विषय 'सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम: सामाजिक परिवर्तन, वकालत और जवाबदेही का सशक्त माध्यम' रहा।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर और अन्य वक्ताओं (जिसमें पूर्व सूचना आयुक्त आत्मादीप, सुनील खंडेलवाल, राज तिवारी, उत्तम चंद वशिष्ठ, हरीश सोलंकी और अधिवक्ता रोहित त्रिपाठी शामिल थे) ने आरटीआई के व्यावहारिक उपयोग, ग्रामीण विकास, शिक्षा, भूमि नीति और इसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।
*सामाजिक परिवर्तन और वकालत में एनजीओ की भूमिका*
मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने बताया कि गैर सरकारी संगठन (NGO) और नागरिक समाज केवल सूचना मांगने वाले नहीं, बल्कि 'वॉचडॉग' और नीतिगत बदलाव के उत्प्रेरक हैं। उन्होंने धारा 6 (सरल आवेदन प्रक्रिया) और धारा 8 (संकीर्ण रूप से परिभाषित छूट) का उल्लेख करते हुए नागरिकों को जागरूक करने पर जोर दिया।
*प्रक्रियात्मक साक्ष्य:* एनजीओ आवेदनों के माध्यम से प्रामाणिक आधिकारिक दस्तावेज जुटाते हैं, जिनका उपयोग जनहित याचिका (PIL) और नीतिगत संशोधनों के लिए किया जाता है।
सार्वजनिक वितरण (PDS), मनरेगा और भ्रष्टाचार पर प्रहार
वेबिनार में विभिन्न योजनाओं के सोशल ऑडिट में आरटीआई की सफलता के उदाहरण प्रस्तुत किए गए जिसमें राशन व मनरेगा: राशन दुकानों के स्टॉक रजिस्टर की जांच, फर्जी मस्टर रोल (फर्जी श्रमिकों) को बेनकाब करने और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पर्यावरण संरक्षण में भ्रष्टाचार उजागर करने में आरटीआई की भूमिका को रेखांकित किया गया। इसी प्रकार जनसुविधाओं में सुधार: पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप ने बताया कि पासपोर्ट प्रक्रिया और रेलवे टिकट बुकिंग में सुधार लाने में भी आरटीआई की बड़ी भूमिका रही है।
*ग्रामीण विकास, कृषि और स्थानीय समस्याएँ*
किसानों के मुद्दों पर आरटीआई एक्टिविस्ट राज तिवारी ने उर्वरक वितरण, फसल बीमा और मृदा परीक्षण कार्यक्रमों में आ रही समस्याओं को उठाया। इस पर वीरेंद्रकुमार ने विभागों, एनजीओ और किसानों के बीच समन्वय और पारदर्शी सूचना साझाकरण का सुझाव दिया। वहीं अतिक्रमण व स्थानीय मुद्दों को लेकर अवैध कब्जों, श्मशान घाटों की अव्यवस्था और सड़कों पर गिरे पेड़ों जैसे दैनिक नागरिक मुद्दों के समाधान के लिए कानूनी उपायों और पूर्व मामलों के संदर्भ के साथ बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी गई।
*कानूनी अधिकार, प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश और निजता*
वेबिनार में आरटीआई से जुड़ी प्रक्रियात्मक और कानूनी गलतफहमियों को दूर किया गया. जिसमें आवेदन की अस्वीकृति गलत किए जाने को लेकर कोई भी सरकारी अधिकारी 'मामला दूसरे विभाग का है' कहकर आवेदन खारिज नहीं कर सकता। वहीं व्यक्तिगत बनाम प्रक्रियात्मक मामलों को लेकर वीरेंद्रकुमार ठक्कर और हरीश सोलंकी के बीच हुई चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि आरटीआई आवेदन में किसी लोक सेवक को व्यक्तिगत रूप से लक्षित करने या उसकी योग्यता पूछने के बजाय, मांगी जा रही जानकारी और प्रक्रियात्मक खामियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अधिवक्ता और उनकी सीमाएँ विषय पर नागरिकों को कानूनी प्रतिनिधि (अधिवक्ताओं) की मदद लेने का पूरा अधिकार है। वहीं, देरी से दर्ज शिकायतों में कानूनी सीमाओं (Limitation Act) और निजता के अधिकारों के संतुलन पर भी चर्चा हुई।
*RTI पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियाँ*
चर्चा के दौरान आरटीआई कार्यकर्ताओं ने प्रणालीगत बाधाओं पर चिंता व्यक्त की गई और आयोगों में रिक्तियाँ को लेकर केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयोगों में खाली पड़े पदों के कारण अपीलों के निपटारे में देरी हो रही है विषय पर बात रखी गई। वहीं सुरक्षा और गैर-प्रतिक्रियात्मकता को लेकर आवेदकों के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा, सूचना अधिकारियों द्वारा समय पर जवाब न देना और सीआईसी (CIC) के आदेशों के बावजूद जानकारी न मिलने जैसे मुद्दों पर कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभव साझा किए। सुझाव के तौर पर सूचना का व्यापक डिजिटलीकरण, अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण और आरटीआई का उपयोग करने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई गई।
*संस्थागत पहल, शिक्षा और जन जागरूकता रणनीति*
जन सहभागिता बढ़ाने के उपाय पर उत्तम वशिष्ठ ने आरटीआई जागरूकता को गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए ऑनलाइन कार्यक्रमों को बड़ी स्क्रीन पर प्रसारित करने और ऑफ़लाइन सूचना केंद्र स्थापित करने का विचार रखा। वहीं न्याय समूह की सक्रियता पर वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने पिछले 6 वर्षों से लगातार सक्रिय आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप, 'फोरम फॉर फास्ट जस्टिस', 'नेशनल फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर फास्ट जस्टिस' और 'मिशन फ्री लीगल एजुकेशन' की गतिविधियों की जानकारी दी। शिक्षा व भूमि नीति के संबंध में यूजीसी और एआईसीटीई के पुनर्गठन, 1895 के सरकारी अनुदान अधिनियम के निरस्त होने और संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम के प्रभाव पर तकनीकी जानकारी साझा की गई।
*निष्कर्ष व आह्वान*
वेबिनार का समापन इस साझा संकल्प के साथ हुआ कि आरटीआई केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का हथियार है। इसके प्रभावकारी उपयोग के लिए जन-जन का क्षमता निर्माण (Capacity Building), व्हाट्सएप समूहों व रविवार की बैठकों के माध्यम से निरंतर मार्गदर्शन और आरटीआई कार्यकर्ताओं का परस्पर सहयोग अनिवार्य है।
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी के द्वारा किया गया जबकि सहयोगियों में से प्रचार प्रसार में पवन दुबे एवं कार्यक्रम के दौरान मॉडरेशन में छत्तीसगढ़ से आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र कुमार अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मध्य प्रदेश*
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