"One who is unattached to the fruits of his work and who works as he is obligated is in the renounced order of life, and he is the true mystic: not he who lights no fire and performs no work". - |||श्रीमद भगवद गीता, अध्याय 6, Verse 1|||
Thursday, January 9, 2020
(MP breaking) हाइकोर्ट की नोटिस बेअसर, प्रदेश में बढ़ रही पशु क्रूरता ( मामला एक जनहित याचिका का एवं जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत आने वाले बसहट पंचायत का जहां पर पिछले दिनों भीषण पशु क्रूरता की वारदातों में सैकड़ों मवेशियों के मरने के बाद जीवित रेस्क्यू सभी 8 मवेशी भी पशु चिकित्सा विभाग और प्रशासन की वजह से मर गए)
Monday, December 30, 2019
(MP News) काल बनकर आई ठंड ले रही गोवंशों की जान (मामला जिले और प्रदेश में गोवंशों की स्थिति पर जहाँ भीषण ठंड में अवैध बाड़ो में कैद मवेशी मर रहे बेमौत, किसान और गोवंश दोनो की स्थिति हुई दयनीय, 1000 गोशालाओं का सपना अभी भी अधूरा)
Friday, December 20, 2019
MP हाइकोर्ट नोटिस के बाद भी नही थम रही गोवंश प्रताड़ना, अवैध बाड़ों में भूंख प्यास ठंड से तड़प कर मर रहे गोवंश (मामला जिले में बनाये जा रहे अवैध बाड़ों का जहां एकबार शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते पुनः घुट घुट कर दम तोड़ रहे गोवंश)
Friday, January 4, 2019
चल-पशु तस्करी मामले में टी आई के विरुद्ध आई जी को की गयी शिकायत, पत्रकारों ने कार्यवाही की किया माग (बैकुंठपुर थाना क्षेत्र का है मामला जिसमे चल-पशु तस्करी पर पर्दा डालने पुलिश ने पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसाने की दी थी धमकी साथ ही पत्रकारों को टी आई मंगल सिंह ने बताया था फ़र्ज़ी)
दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।
बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब
बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।
चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे
सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है?
इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।
पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत
चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है।
बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।
बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।
सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।
पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।
संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
Saturday, June 30, 2018
किसानों की खेती के साथ फिर बढ़ जाएंगी गोप्रताड़ना, बनेंगे अवैध बाड़े, होगी पशु क्रूरता, शासन प्रशासन मौन, हिंदुत्ववादी संगठन बने रहेंगे तमाशबीन, मात्र होगी वोट बैंक की राजनीति, गोवंश न डाल पाएंगे वोट इसलिए नही सुनी जाएगी मूक बेजुबान की आवाज ( मामला देश प्रदेश में हो रहे पशु प्रताड़ना पर जहां मजबूर किसान खेती बचाने बनाते हैं अवैध बाड़े जहां घुट घुट कर मर जाते हैं मूक बेजुबान पशु)
दिनांक 30 जून 2018, गढ़, रीवा-मप्र,
(कैथा श्री हनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)
आज जब हम सब किसान एक बार फिर खरीफ धान की खेती प्रारम्भ करने वाले हैं हममें से कुछ गोवंश और पशु प्रेमी किसान यह बात जरूर सोच रहे होंगे की अब इस वर्ष क्या होगा? क्या हमारी सारी धान की फसलें आवारा पशुओं द्वारा चर ली जाएंगी या यह बच पाएगी? क्या सरकार आवारा पशुओं के लिए व्यवस्था करेगी य यूं ही हमारे स्वयं के द्वारा आवारा छोंड़ दिए गए इन पशुओं से हमारी स्वयं की फसलें तबाह हो जाएंगी?
शायद कुछ किसान अथवा गोवंश प्रेमी यह भी सोच रहे होंगे की एकबार फिर गायों की दुर्दशा देखने को मिलेगी जहां आवारा पशुओं को एकत्रित करके जबरन किसी बाड़े में ठूस दिया जाएगा जहां न तो इनके लिए चारा पानी की व्यवस्था होगी और न ही किसी छत्रछाया की. उन्ही अवैध रूप से ग्रामीणों द्वारा बनाये गए बाड़ों में यह बेजुबान पशु भूंख प्यास वर्षा सहते हुए कुछ सप्ताह अथवा महीनों में घुट घुट कर मर जाएंगे.
आवारा पशुओं का क्या है समाधान
आज समाज और सरकार दोनो के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है की समाज द्वारा आवारा छोंड़ दिए गए इन पशुओं का क्या समाधान है? इनको कौन पाले? कौन इनकी व्यवस्था करे? जब तक गायें दूध देती हैं तब तक दूध बहुत प्रिय है. हमे चाय तो दूधवाली चाहिए, बच्चों को भी देशी गाय का ही दूध चाहिए, साथ ही मठ्ठा, दही, लस्सी, घी, मख्खन पनीर सब कुछ चाहिए. परंतु जैसे ही गाय दूध देना बन्द कर देती है वैसे ही वह आजकल के फैशन में बूढ़े माँ-बाप की तरह बेकाम हो जाती हैं और उन्हें मरने के लिए छोंड़ देते हैं. आज भारतीय समाज में जिस प्रकार से वृद्धाश्रम और अनाथाश्रम बढ़ रहे हैं उसी प्रकार आवारा छोंड़ दिए गए गायों के लिए भी कुछ गिने चुने बचे हुए गोप्रेमी लोगों द्वारा मिलजुलकर अथवा सरकार पर दबाब डालकर और अधिक बड़ी गोशालाएं बनाई जानी चाहिए. आने वाला भारतीय समाज और भी आधुनिक होगा जहां पर पुरानी परंपराओं और रीति रिवाजों के लिए कोई विशेष जगह नही बचेगी. यदि परंपराएं बड़ी मुश्किल से चलेंगी भी तो मात्र औपचारिकता के रूप में.
दशकों पूर्व थी पशुओं की अधिक उपयोगिता
आज गोवंशों के प्रति निरंतर हो रही क्रूरता और उपेक्षा के पीछे सबसे बड़ा कारण इनकी उपयोगिता का कम हो जाना है. शहरों में तो कभी भी दूध डेयरी के अतिरिक्त पशुपालन होता नही. कहें की हज़ारों में कोई एकाध गो प्रेमी हों जो अपने घर में एक गाय रखे हों वह अलग बात है. गायों और पशुओं की उपयोगिता सबसे अधिक ग्रामीण समाज में रहती थी. भारत में चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, इशाई हो या सिक्ख सभी धर्मों और सम्प्रदायों के ऐसे लोग जो ग्रामों में निवास करते थे और जिनके पास दो चार एकड़ अथवा अधिक की भूमि थी जब तक मशीन का ईजाद नही हुआ था तब तक अपने ग्रामों में पशुओं को पाल कर रखते थे. गाय से बैल उत्पन्न होता था और बैल हल में जोतने का कार्य करता था साथ ही गहाई मिजाई में भी काम आता था. पहले आज जैसे न तो मिटी का तेल पर्याप्त था और न ही गैस वगैरह अतः पशुओं से प्राप्त गोबर का प्रयोग ईंधन और खेत में उपयोग होने वाली खाद के रूप में किया जाता था.
मशीनीकरण और आधुनिकता है मुख्य वजह
पर आज जब पशुओं से लेकर आदमी तक की जगह मशीनें और रोबोट लेने लगे हैं स्वाभाविक रूप से पशुओं के साथ साथ आदमी की भी उपयोगिता कम होती जा रही है. अतः आज के इस कलयुगी समाज में यदि किसी को भी सम्मान पूर्वक जीवित बने रहना है तो इस स्वार्थी समाज के किसी न किसी उपयोग में आना होगा. धर्म कर्म और संस्कार की आज बात करना लगभग फालतू हो चुका है. जो धर्म की बात करते हैं उन्हें पागल और साम्प्रदायिक कहते हैं और जो कर्तव्य की बात करते हैं उन्हें यह तथाकथित आधुनिक समाज मूर्ख और 18 वीं सदी का बताता है. अतः बहुत से लोग इसके चलते आधुनिकता और मशीनीकरण के दौर में वह सब अनर्थ करते जा रहे हैं और वही सब अनर्थ आज उनके संस्कार बनते जा रहे हैं.
ट्रेक्टर, जेसीबी, थ्रेशर, और अन्य मशीनों ने पशुओं का कर दिया काम तमाम
गाय को माँ कहना भूल जाईये, आज का कुछ आधुनिक समाज अपनी माँ को भी माँ कहने में झिझकता है. यदि माँ-बाप बूढ़े और ग्रामीण कम पढ़े लिखे हैं तो आज का तथाकथित मॉडर्न व्यक्ति उन्हें अपना नौकर अथवा गांव वाला कहकर इंट्रोड्यूस करता है. इससे बढ़कर विडंबना और क्या हो सकती है.
गाय तो बहुत दूर की वस्तु है. गाय का देशी दूध सभी को चाहिए, दुग्ध उत्पाद सभी को चाहिए लेकिन गायों के प्रति संवेदनशील कोई नही होना चाहता. गाय के बच्चे अर्थात बैल को कोई देखना नही चाहता.
जब तक बैल हलों में चलते थे और उपयोगी थे तब तक वह सभी के लिए महत्व के थे अब मशीनों के चलते उनका महत्व समाप्त हो चुका है.
फिर बनेंगे अवैध बाड़े, फिर बढ़ेगी पशु क्रूरता
खरीफ वर्ष 2018 की फसल के साथ ही आवारा छोंड़ दिए गए गोवंशों की प्रताड़ना फिर बढ़ने वाली हैं. जगह जगह गांव गांव में किसानों काश्तकारों की लाठियां और डंडे के साथ साथ टांगा और कुल्हाड़ी खाते हुए यह गोवंश घायल अवस्था में भूंखे प्याशे फिर मरेंगे, गांव गांव इनके लिए नाज़ी युग में यहूदियों के लिए बनाये गए गैस चैम्बर और डिटेंशन कैम्प की तरह बांस बल्ली और कटीले तारों के बनाये गए अवैध बाड़ें होंगे जहां इन्हें अपर्याप्त व्यवस्था के साथ रखा जाएगा. न तो वहां पर कोई किसी प्रकार की छाया होगी और न ही पैरा भूषा की. ऐसे में कुछ दिनों बाद यह पशु प्रताड़ित होकर मरेंगे यही इनकी किस्मत में हर वर्ष लिखा रहता है.
जनकहाई और गदही के गो अभ्यारण्य का क्या हुआ?
सिरमौर क्षेत्र रीवा में पिछले कई वर्षों से गोवंश प्रताड़ना के केस सामने आये हैं जिनमे सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा पशुओं के साथ हो रही क्रूरता को सोशल मीडिया एवं मीडिया के माध्यम से निरंतर उठाया जाता रहा है साथ ही ऐसे दर्जनों प्रकरणों में पूरे सबूत के साथ घटनास्थल पर जाकर उच्चधिकारियों द्वारा कार्यवाही भी करवाई गई है, अवैध बाड़े तोड़वाकर पशुओं को आज़ाद करवाया गया है, उनकी जाने बचाई गई हैं और साथ ही दोषियों को दंडित करवाने का भी प्रयाश किया गया है.
पिछले वर्षों समाजिक कार्यकर्ता के इन्ही प्रयाशों के चलते रीवा ज़िले में गोअभ्यारण्य बनाये जाने की पहल की गई हैं जिनमे जनकहाई में प्रपोजल का डीपीआर हुआ था और साथ ही हिनौती के गदही में हज़ार एकड़ से अधिक शासकीय भूभाग में भी गोअभ्यारण्य बनाये जाने के लिए प्रपोजल ज़िला कलेक्टर रीवा एवं केंद्रीय मंत्रालय के निर्देश पर एसडीएम केपी पांडेय की जांच के दौरान उठा था. लेकिन जनकहाई एवं गदही के प्रपोजल का क्या हुआ इसकी कोई जानकारी नही है. एकबार फिर अकस्मात शासन चौंक पड़ेगा जब नित नए रोज गोप्रताड़ना के किस्से सोशल मीडिया एवं मीडिया में छाए रहेंगे.
गदही में गो अभयारण्य बनाया जाना अति आवश्यक
यदि गढ़ थाना क्षेत्र में गोवंश प्रताड़ना पर रोक लगाना है तो या की ऐसा कृत्य करने वालों के ऊपर सीधे एफआईआर दर्ज हो अथवा गोवंशों की समुचित व्यवस्था की जाए जिससे किसानों की फसल नुकसानी पर रोक लगे. उसके लिए आवश्यक है की गंगेव ब्लॉक एवं सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाला गदही ग्राम पर हज़ार एकड़ से अधिक के शासकीय भूभाग पर गोअभ्यारण्य बनाया जाए.
गो अभ्यारण्य से स्थापित होगा उद्योग
यदि थाना गढ़ क्षेत्र एवं सिरमौर तहसील के अन्तर्गत आने वाले गदही ग्राम के शासकीय राजस्व के भूभाग में गो अभ्यारण्य बनाये जाने की पहल शासन प्रशासन करता है तो इससे न केवल गोवंशों की सुरक्षा होगी बल्कि गोवंश जनित उद्योग की भी एक प्रकार से स्थापना हो जाएगी. गोवंशों के गोबर से जैविक खाद, गोबर की खाद, गोबर गैस, गोमूत्र से दवा का निर्माण, पंचगव्य का निर्माण, दूध से दुग्ध उत्पाद आधारित सामग्री आदि का निर्माण किया जाकर कई लोगों को इस रोजगार से भी जोड़ा जा सकता है.
गोहत्या पर सीधी हो फांसी की सजा का प्रावधान
वास्तव में जब तक गाय को संरक्षित राष्ट्रीय पशु की संज्ञा में नही लाया जाता तब तक गाय की रक्षा सुरक्षा हो पाना काफी मुश्किल बात है. सबसे पहले सरकार को चाहिए देश से बीफ उत्पाद के निर्यात पर पूरी तरह से बैन लगा देना चाहिए. साथ ही जानबूझकर गाय की हत्या करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा और यहां तक की फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए.
कैसे बढ़ाई जाए गोवंशों की उपयोगिता
आज तथाकथित आधुनिक मॉडर्न समाज में गाय की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है. गोवंश की उपयोगिता मात्र दूध खाने तक ही सीमित रह गई है. आज न तो हल में बैल की जरूरत है न ही बैलगाड़ी में, इसी प्रकार कोल्हू में भी बैल नही लगता, मिजाई, गहाई, दमरी आदि में बैल की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है अतः यह आवश्यक है की बूढ़े और कमजोर हो चुके बैलों से लेकर सभी प्रकार के गोवंशों की उपयोगिता पर पुनर्विचार किया जाए.
कृत्रिम और रासायनिक खादों से बढ़ रही बीमारियां, समाप्त हो रही उर्वराशक्ति
कृत्रिम और रासायनिक खादों के उपयोग से बीमारियां बढ़ रही हैं और साथ ही जमीन की उर्वराशक्ति भी समाप्त होती जा रही है जिससे वैज्ञानिकों द्वारा निरंतर जैविक खेती पर बल दिया जा रहा है. जैविक खेती करने के लिए सरकारें भी प्रोत्साहित कर सब्सिडी दे रही हैं लेकिन अभी भी हरित क्रांति के बाद से इतना अधिक रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाने लगा है की जैविक और गोबर की खाद के विषय में कोई सोच ही नही रहा है. अब जब इस प्रदूषित खान पान और केमिकल से नित नई बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं ऐसे में वैज्ञानिक और डॉक्टर भी चिंतित हो रहे हैं की ऐसे में उत्पादन से अधिक सरकार का खर्च तो बीमारियों के इलाज में खर्च हो रहा है ऐसे में वैज्ञानिक और सरकारें कम से कम रासायनिक खाद के प्रयोग पर बल दे रही हैं साथ ही जैविक खाद और जैविक खेती का प्रचार प्रसार कर रही हैं. यह बात तो आज आम है की हरित क्रांति के बाद ज्यादा उत्पादन की होड़ में हो रही बेतरतीब रासायनिक खाद के प्रयोग से हमारी इतनी उर्वर धरती भी बंजर होकर रेगिस्तान में बदलती जा रही है. शायद इस विषय में आम किसान और नागरिक आज विचार न कर रहा होगा परंतु जब तक विचार करेगा शायद तब तक काफी देर हो चुकी होगी अतः आज आवश्यकता है एकबार पुनः वैदिक खेती की जिंसमे न तो जीवों की हत्या होती और न ही गोवंशों की. इन्ही गोवंशों के सहारे अधिक से आधिक उत्पादन प्राप्त कर लाभ कमाया जाकर जीवन यापन किया जा सकता है. हाँ एक बात जरूर है की गोवंशों और पशु आधारिक वैदिक खेती में एक व्यक्ति को फुलटाइम समय देना पड़ता है जिंसमे माल मवेशियों की देखभाल से लेकर खेती किसानी करना. परंतु चूंकि आज के इस भागते दौड़ते जीवन में किसी को समय ही नही है अतः हर कोई चाहता है की ट्रेक्टर से 2 घंटे में जोतबोकर फुरसत हुआ जाए और जाकर आगे का पैसा कमाया जाए, क्यो पूरा समय खेती किसानी के ही चक्कर में पड़ा रहा जाए.
दोषारोपण बन्द कर समस्या का निकले मानवीय समाधान
इस प्रकार इस विश्लेषण से यह भलीभांति समझा जा सकता है की गोवंशों की उपयोगिता इस मसीनी युग में ढूंढ पाना एक टेढ़ी खीर ही है. ऐसे में तो बस यही लगता है की आने वाले समय में कहीं इन गोवंशों की और अधिक दुर्दशा न बढ़े. आखिर किसी भी प्रकार के वृहद और सर्वांगीड़ परिवर्तन के लिए पूरे देश और समाज को सामने आना पड़ेगा, इसका रास्ता ढूंढना पड़ेगा अन्यथा समाज का सरकार को दोष देना और सरकार का समाज को दोष देने का सिलसिला चलता रहेगा और गोवंशों की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जाएगी.
संलग्न - संलग्न चित्र में देखा जा सकता है रीवा ज़िले में गर्मियों के समय ऐरा चरते हुए मवेशी जो अभी कुछ सप्ताह बाद अवैध बाड़ों में ठूस दिए जाएंगे और अपने जीवन के अंतिम दिन गिनना प्रारम्भ कर देंगे.
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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट
ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587