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Thursday, January 9, 2020

(MP breaking) हाइकोर्ट की नोटिस बेअसर, प्रदेश में बढ़ रही पशु क्रूरता ( मामला एक जनहित याचिका का एवं जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत आने वाले बसहट पंचायत का जहां पर पिछले दिनों भीषण पशु क्रूरता की वारदातों में सैकड़ों मवेशियों के मरने के बाद जीवित रेस्क्यू सभी 8 मवेशी भी पशु चिकित्सा विभाग और प्रशासन की वजह से मर गए)

दिनांक 09 जनवरी 2020, स्थान - रीवा मप्र

   देश प्रदेश में चल रही पशु क्रूरता रुकने का नाम नही ले रही है. मांस भक्षक एवं दुग्ध उत्पाद खाने वाले लोगों के चलते जहां पशुओं की तादाद बढ़ती जा रही है वहीं अब उन्हें संभालने का संकट उत्पन्न हो चुका है. आखिर सवाल यह है की मानव को दुग्ध उत्पाद भी चाहिए और मीट भी चाहिए फिर कैसे पशुओं की संख्या नियंत्रित हो. लिहाजा दोनो की चाह में बढ़ती पशुओं की संख्या के चलते अब उन्हें संभालने का देशव्यापी संकट उत्पन्न हो चुका है. जहां सरकारी व्यवस्थाएं थीं वहां भी रखरखाव और भ्रष्टाचार के चलते अव्यवस्था फैल चुकी है. जहां तक सवाल वैकल्पिक व्यवस्था की हैं वहां भी समाज हाँथ खड़ा कर चुका है. ऐसे में जाहिर है आज गोवंशों की दशा और दिशा क्या होगी बड़े ही चिंता का विषय है.
   बसहट गोहत्याकांड का जिम्मेदार शासन  प्रशासन 

   बता दें की त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत बसहट ग्राम पंचायत में अभी हाल ही में हुए भीषण गोहत्याकांड में रेस्क्यू किये गए 8 गोवंशों को भी प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग बचा नही पाया है. सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी ने बताया की जबकि देखा जाए तो इसमे पूरी गलती प्रशासनिक अमले की ही है. सवाल यह है की जब कड़ी मसक्कत के बाद 8 गोवंशों को जीवित बचाया गया तो उन्हें सही पोषण एवं इलाज क्यों नही दिया गया. सच्चाई यह है की 5 जनवरी को रेस्क्यू किये गए गोवंशों के प्रति न तो पुलिश की कोई संवेदना थी न ही पशु चिकित्सा विभाग की. जहां तक प्रश्न सीईओ जनपद का है तो वह व्यक्ति आज तक लापता हैं. एसडीएम भी बीमारी का बहाना बनाकर मात्र नायब तहसीलदार अंकित मौर्य को ही मौके पर भेज दिया था.
   रेस्क्यू 8 गोवंश भी मरे

   रेस्क्यू किये गए 8 गोवंशों को 5 जनवरी रात को बाहर ठंड में तड़पते हुए छोड़ दिया गया था जिसके चलते वह कमजोर पड़ गए और तीन रातोंरात मर गए. अगले दिन 6 जनवरी को 5 गोवंशों को झोटिया गोशाला पहुचाने का प्रयास किया गया लेकिन उनमे से 2 ट्रेक्टर का दच्चा खाकर मर गए. शेष बचे 3 गोवंश 8 जनवरी शुबह तक इलाज और पोषण के अभाव में मर गए. इस प्रकार तीन बसहट में ही मर गए थे. शेष 5 अगले दिन मर गए.
   पशु चिकित्सा विभाग ने नही किया इलाज

   झोटिया गोशाला प्रबंधक अरिमर्दन सिंह द्वारा जानकारी दी गई की तीन गोवंशों को 6 जनवरी को झोटिया गोशाला पहुचाने के बाद पशु चिकित्सा विभाग और प्रशासन अपना पल्ला झाड़ लिया. डॉक्टर न तो इलाज करने आये और न ही कोई पोषण की जानकारी दी. गोशाला प्रबंधक ने बताया की झोटिया प्राइवेट गोशाला में कोई भी वेटरनरी डॉक्टर उपलब्ध नही है जिससे वह इलाज नही करवा पाएं. बताया गया की 7 जनवरी को पशु चिकित्सा विभाग के कुछ कम्पाउण्डर आये थे जिनके पास न तो सामग्री थी और न ही दवा. मात्र औपचारिकता पूरी करने आये थे. इस प्रकार गोशाला प्रबंधन ने स्वयं ही 2000 रुपये से अधिक कीमत की दवा खरीद कर इलाज करवाया. पशु डॉक्टर के पास कोई दवा तक नही थी.
   बोतल चढ़ाते ही एक और गाय मृत
  
   बताया गया की गायों में कमजोरी और ठंड की वजह से शरीर का तापमान 22 डिग्री सेल्सियस हो चुका था जिसके कारण नौशिखिये डॉक्टरों ने जैसे ही बोतल चढ़ाया वैसे ही एक गाय तुरंत मर गई. बताया गया की पहले उनके पोषण के लिए कुछ करना था एवं अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाना था जिससे यह मरने वाली स्थिति निर्मित नही होती. इसके बाद 2 और भी बची गायें इलाज और पोषण के अभाव में मर गईं. वास्तव में रेस्क्यू किये गोवंशों को रीवा के पशु चिकित्सालय में भर्ती किया जाना था और ऐसा नहीं हुआ जिससे सभी रेस्क्यू मवेशी मर गए।
   गोहत्याकांड के लिए पुलिश भी जिम्मेदार

   वास्तव में यदि देखा जाय तो जो घृणित दिल दहलाने वाली वारदात बसहट में देखने को मिली इसमे शासन प्रशासन की पोल खोल दी है. आखिर सवाल यह भी उठता है की जब प्रत्येक थाने क्षेत्र में एक बीट प्रभारी होता है जिसका कार्य ही होता है की अपने सूत्रों और स्वयं भी जाकर हर 24 घंटे के भीतर अपने बीट की घटनाक्रम की जानकारी ले तो यह कैसे संभव हुआ की 15 दिन से अधिक समय से बिना चारे, पानी, छाया के भीषण ठंड में बन्द गोवंश मरे और कोई पुलिश वाले को भनक तक नही पहुंची? जबकि यदि देखा जाए तो आज गांव गाँव गांजा और शराब की तस्करी कोरेक्स नशीली दवायें बिक रहीं हैं जिसकी पुलिश वालों को भरपूर जानकारी होती है और सब इन्ही की सह से बिक रही हैं.
  राजस्व विभाग भी उतना ही जिम्मेदार

   बसहट पशु क्रूरता मामले में पुलिश के साथ राजस्व विभाग भी बराबर का जिम्मेदार है. ज्ञातव्य हो की हर गांव और हल्के में पटवारी और आरआई नियुक्त होते हैं जहां उन्हें नियमित दौरा करके गांव की गतिविधि की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों और प्रशासन को पहुचानी होती है. सवाल यहां भी वही है की क्या पूरे एक पखवाड़े से अधिक समय तक पटवारी गांव का दौरा नही किया था? क्या आरआई ने पटवारी से जानकारी नही माँगी थी की बसहट ग्राम में इस बीच क्या चल रहा है? क्या नायब तहसीलदार अंकित मौर्य अपनी साप्ताहिक मीटिंग में ग्रामों की गतिविधि की जानकारी नही मांगते?
   घटना दिनाँक एसडीएम ने बताया बीमार हूँ

   त्योंथर एसडीएम ने घटना दिनांक 5 जनवरी को कहा की वह बीमार हैं और घटना स्थल पर नायब तहसीलदार को भेज दिया. क्या इसके लिए एसडीएम त्योंथर बराबर के जिम्मेदार नही हैं? आखिर त्योंथर एसडीएम और तहसीलदार के विरुद्ध भी कार्यवाही क्यों न की जाए इस पर भी शासन को विचार करना चाहिए क्योंकि अनुभाग के सभी उच्चाधिकारी इसके बराबर के जिम्मेदार हैं.
  एसडीओपी त्योंथर का होगा दायित्व 

    अपने थाना क्षेत्र के थाना प्रभारियों की नियमित बैठक बुलाकर अथवा दूरभाष से जानकारी लेना क्या एसडीओपी का दायित्व नही होता? यदि बीट प्रभारी और सिपाही जिम्मेदारी का निर्वहन नही कर रहे तो क्या एसडीओपी इसका जायज़ा नही लेता की उसके अनुभाग में क्या कुछ चल रहा है. अथवा एसडीओपी और अधीक्षक को मात्र इस बात पर ही रुचि है की कहाँ से माल फंसाया जाय और कैसे घृणित कार्य करते हुए फर्जी मुकदमे लगाए जाएं? कैसे फर्जी मामलों में फंसाकर मनगढ़ंत आरोप लगवाकर फिर समाजसेवियों को टॉर्चर किया जाय? कैसे दारू, गांजा, कोरेक्स और नशीली दवाओं, रेत का भंडारण और उत्खनन करवाया जाए? कैसे ओवरलोडिंग से उगाही की जाय? क्या यही सब कार्य पुलिश कर सकती है अथवा कुछ अच्छा भी करते हुए अपनी जिम्मेदारी भी समझ सकती है?
   आखिर सीईओ जनपद और जिला पंचायत ने क्या किया?

    सवाल यह भी है की आज मप्र की वर्तमान कांग्रेस सरकार द्वारा जो जिले में 30 स्थानों पर सरकारी गोशालाओं को खोले जाने की कवायद और कार्य चल रहा है उसके प्रति पंचायत विभाग की क्या जिम्मेदारी है? क्या मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद एवं जिला पंचायत द्वारा कार्यों में तेजी लाकर बेसहारा गोवंशों और किसानों के हित के लिए प्रारम्भ हुई इन योजनाओं का जल्दी क्रियान्वयन हो ऐसा नही करना चाहिए? क्या सीईओ जनपद पंचायत त्योंथर संजय सिंह यह बता पाएंगे की आखिर उनके पंचायती क्षेत्र बसहट में जब उन्ही के सरपंच सचिव और रोजगार सहायक के अधीन रहे सरकारी काजी हाउस में महीनों से गोवंशों को बिना समुचित व्यवस्था, बिना चारा बिना भूषा अथवा पानी के बांधा जा रहा था तो क्या उनके विभाग को यह जानकारी नही थी? क्या जिस चौराहे और जिस भुरतिया परिवार के मकान के पीछे खुलेआम काजी हाउस बना था तो क्या उन्हें इसकी जानकारी नही थी? क्या जिस चौराहे पर सैकड़ों लोग रोज इकठ्ठा हो रहे हों ऐसे में कोई ग्राम प्रधान, सचिव अथवा सीईओ गोहत्या की अपनी जिम्मेदारियों से बच पायेगा?
  कलेक्टर कमिश्नर के फरमान से क्या होगा?

     आईये अब एक नजर डालते हैं संभाग और जिले के उच्चाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर. पिछले दशक भर से गोवंशों और पशुओं के अधिकारों संरक्षण संवर्धन और किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी ने सीधे कलेक्टर और कमिश्नर पर निशाना साधते हुए इन्हें ही सबसे बड़ा जिम्मेदार बताया है. द्विवेदी ने कहा है की उन्होंने पिछले कई वर्षों से निरंतर गोवंशों के प्रति सम्पूर्ण जिले एवं प्रदेश में हो रही क्रूरता पर आवाज बुलंद की है जिसे मीडिया और शिकायतों के माध्यमों से निरंतर उच्च से उच्च अधिकारियों और मंत्रियों मिनिस्टर और पशु अधिकारों के लिए कार्य करने वाले लोगों एवं संस्थाओं के पास तक बातें रखी गयी हैं. लेकिन इसके बाबजूद भी जिला संभाग और प्रदेश के शासन प्रशासन ने मात्र समस्या को निरंतर नजरअंदाज किया है और उपेक्षा की है जिसका नतीजा है की आज पशु क्रूरता प्रदेश और संभाग में अपने चरम पर है.
  हाइकोर्ट में शिवानन्द द्विवेदी ने लगा दी जनहित याचिका

    एक्टिविस्ट दविवेदी द्वारा बताया गया की उन्होंने अभी पिछले वर्ष 2018 में जनहित याचिका उच्च न्यायालय जबलपुर में दायर की है जिसमे जिले संभाग और प्रदेश में गोवंशों की दयनीय स्थिति पर कार्यवाही की माग की है. इन गोवंशों के संरक्षण संवर्धन, अधिनियमों के अन्तर्गत पशु क्रूरता करने वालों पर सख्त कार्यवाही, एवं किसानों का संरक्षण होकर ज्यादा से ज्यादा गोशालाएं और गो अभ्यारण्य बने इसके लिए माग की गई है. 
   शासन प्रशासन ने नही दिया हाई कोर्ट की नोटिस का जबाब

   द्विवेदी ने बताया की अब तक हाई कोर्ट जबलपुर से इस विषय में कई बार संबंधितों पुलिश एसपी, डीजीपी, चीफ सेक्रेटरी, वेटरनरी विभाग, पंचायत और कलेक्टर को नोटिस भी जारी हो चुकी है लेकिन अब तक इनमे से किसी ने हाई कोर्ट को जबाब नही दिया है और सभी अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाह रहे हैं. बात जबाब देने तक ही नही है बल्कि हालात इतने बुरे हो चुके हैं लग रहा है प्रशासन की अनदेखी के चलते पशु क्रूरता निरंतर बढ़ती जा रही है जबकि कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इसे कम होना चाहिए था.
  क्या होगा गोवंशों का भविष्य मंथन का समय

   इस बीच समाजिक कार्यकर्ता ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है की गोवंशों का भविष्य अब प्रश्न के दायरे में आ चुका है. आज समाज इन गोवंशों को पूरी तरह से बहिष्कृत कर चुका है. ऐसा लगता है जैसे गोवंशों को किसी को जरूरत ही नही बची है. मसीनों और ट्रेक्टर के ईजाद होने के बाद कृषि क्षेत्र में पशुओं और गोवंशों की उपयोगिता पूर्णतया शून्य के तुल्य हो चुकी है. जहां कभी बैलों को हल दमरी मिजाई गहाई, कोल्हू गोबर कंडे खाद के लिए प्रयोग किया जाता था आज वह सब बन्द होकर गॉयों को मात्र दुग्ध उत्पाद तक ही सीमित कर दिया गया है. सवाल यह है दुग्ध उत्पाद तो सभी को चाहिए लेकिन मवेशी कोई फूटी आंख देखना नही चाह रहा है. ऐसे में किसान भी इनको बेशहारा छोड़ देते हैं जिससे फसलों को नुकसान करने पर इन्हें क्रूरता का शिकार होना पड़ रहा है. 
   दुग्ध उत्पाद खाने वाले भी बराबर के जिम्मेदार

   एक्टिविस्ट द्विवेदी ने कहा की चाहे भले ही हम मानव अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से खूब भागने का प्रयास करें,  तर्क दें, बहाने बनाये कुछ भी कहें लेकिन सबसे कड़वी सच्चाई यह भी है की गोवंशों के प्रति बढ़ रही क्रूरता, इनकी हत्या, बीफ उद्योग के पीछे कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार हैं. हम यह अवश्य कह सकते हैं की हम अपने हाथों से पशु क्रूरता नही कर रहे अतः हम सीधे जिम्मेदार नही हैं लेकिन सच्चाई यह है अपरोक्ष रूप से तो हम भी इसमे भागीदार हैं. मानाकि हम अपने पैसों के दम पर सब कुछ खरीद सकते हैं और हमे दुग्ध उत्पाद के लिए पशु पालना न पड़ता हो लेकिन फिर भी हम भी कहीं न कहीं किसी पशु का ही दुग्ध उत्पाद खा रहे हैं. तो सवाल यह है जब कल वह पशु कष्ट में होगा तो जिम्मेदारी तो हमारी भी तय होगी की यदि उस गोमाता का दूध हमने भी खाया तो उसकी रक्षा सुरक्षा में आगे आएं.
   नसबंदी होकर दुग्ध उत्पाद का हो परित्याग

    मानाकि यह काफी विवादास्पद बयान हो सकता है लेकिन देश प्रदेश में बढ़ती पशु क्रूरता और हिंसा के चलते सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी का कहना है की आज बुद्धिजीवी और विशुद्ध शाकाहारी समाज दुग्ध उत्पादों का परित्याग करते हुए वेगन बनता जा रहा है. वेगन वह सामाजिक समूह कहलाता है जो अपना नैतिक दायित्व मानता है की यदि वह दुग्ध और दुध से बनी हुई वस्तुएं खाता है तो इसका मतलब यह है की वह कहीं न कहीं पशुओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा में भी जिम्मेदार है क्योंकि दूध पीने में सबसे पहला आधिकार गाय के बछड़े का होता है, बच्चे का अपनी मा पर होता है. अतः आज वेगन समूह यह मानता है की यदि दुग्ध उत्पाद को त्याग दिया जाय तो पशुओं की संख्या नियंत्रित हो जाएगी और हमारी आवश्यकताएं कम होने से पशु भी अत्याचार से बचेंगे साथ में मीट उद्योग पर भी प्रभाव पड़ेगा और कहीं न कहीं पशुओं के प्रति हिंसा काफी हद तक कम होगी.
   संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरें देखें जहां जगह जगह पशु पीड़ित परेशान हैं लेकिन कोई देखने वाला नही है.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक कार्यकर्ता 
जिला रीवा मप्र
मोबाइल 9589152587

Monday, December 30, 2019

(MP News) काल बनकर आई ठंड ले रही गोवंशों की जान (मामला जिले और प्रदेश में गोवंशों की स्थिति पर जहाँ भीषण ठंड में अवैध बाड़ो में कैद मवेशी मर रहे बेमौत, किसान और गोवंश दोनो की स्थिति हुई दयनीय, 1000 गोशालाओं का सपना अभी भी अधूरा)

दिनांक 30 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

   प्रदेश में निर्माणाधीन 900 सरकारी गोशालाओं का कार्य पूरा न होने से गोवंशों की स्थिति दयनीय बनी हुई है.
   जगह जगह बेसहारा मवेशी दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं, अवैध बाड़ो में चारा पानी, छाया बिना दम तोड़ रहे हैं तो कहीं नहरों घाटियों और जलप्रपातों में जीवित ही झुंडों में फेंके जा रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे घोर कलयुग आ चुका है जब गोवंशों को पूरी तरह से समाज से बहिष्कृत किया जा चुका है. 

  खा रहे लाठी डंडे, कुल्हाड़ी से हो रहा स्वागत

   गोवंशों को यत्रतत्र क्रूरता का शिकार होना पड़ रहा है. अवैध बांडे तो आज आम बात हो चुके हैं, इसके साथ साथ गोवंशों को धारदार हथियारों से नुकसान पहुचाया जा रहा है. उनके पैरों और मुह जीभ को भी निर्दयी लोग तार से बांध देते हैं जिससे खानापानी न ले पाने के चलते मर जाते हैं. घाव में कीड़े पड़ जाते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है. लाठी डंडे कुल्हाड़ी से पैर और शरीर में घाव कर दिया जाता है. यह वाकया आजकल आम हो चला है. ऐसा लगता है जैसे मानवता समाप्त हो चुकी है.

 जगह जगह हो रहे दुर्घटना का शिकार 

  मवेशी सड़कों में भी झुंड लगाकर बैठ जाते हैं जिससे आने जाने वाले वाहनों से टकराकर भी दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं. यह एक बड़ी समस्या है. अमूमन वाहनों की गर्मी और प्रकाश के चलते मवेशी सड़कों पर आ जाते हैं जिससे दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं.

  अवैध बाड़ो का लग गया अंबार

   फसल नुकसानी को बचाने के लिए किसान अवैध तरीके से बाड़ो का निर्माण करते हैं जहां न तो समुचित छाया की व्यवस्था होती है और न ही पानी भूषा की व्यवस्था, जिसके चलते मवेशी अवैध बाड़ो में मरने लगते हैं. यह एक बड़ी समस्या है जिसको देखने वाला कोई नही है. इन बाड़ो में ठंड के मौसम में सबसे अधिक तकलीफ का सामना करना पड़ता है क्योंकि न तो इनके खाने के लिए कुछ होता है और न ही छाया होती है.

  नहरों में फेंक रहे जीवित गोवंशों को

   बकिया बराज नहर और उसके आसपास के ग्रामों से लगे क्षेत्र में निर्दयी तत्व मवेशियों को लाकर नहरों में धकेल देते हैं जिसके कारण 40 से 50 फीट गहरी नहर से बाहर न आ पाने के कारण यह मवेशी झुंड में वहीं नहर के बीचोंबीच ठंड और भूंख से तड़प कर मर जाते हैं. रीवा के टीएचपी और चचाई पावर प्लांट में लगे छन्ने में प्रतिदिन ऐसे दर्जनों मृत मवेशियों को देखा जा सकता है.
  सरकार तो बस वादा करती है

   जहां तक गोवंशों के प्रति दया की बात है तो सरकार से दया की अपेक्षा करना ही बेमानी है क्योंकि आज दया होती तो शायद भारत विश्व के सबसे अग्रणी बीफ या गोमांश उत्पादक देशों की श्रेणी में नही होता. पर फिर भी यदि सरकार के वादे की बात करें तो कम से कम मप्र सरकार को तो 1000 गोशालाओं को पूर्ण कर ही देना चाहिए था मगर अब तक गोशालाओं का निर्माण कार्य अधर में लटके रहने के कारण हालात यह हैं की न तो किसान खुश है और न ही गोवंशों को राहत है. दोनो का ही जीवन संकट बरकरार है.
  गांव गांव बने गोशालाएं

   वास्तव में देखा जाए तो आज एक ब्लॉक में मात्र 3 या 4 गोशालाएं बनाने से कुछ खास नही होने वाला है क्योंकि जिस तरह से गोवंशों का झुंड बेसहारा गांव गांव घूम रहा है इससे साफ जाहिर है की यहाँ गांव गांव गोशालाएं बनाये जाने की आवश्यकता है.
  हर ब्लॉक में 12 अन्य गोशालाएं बनेगी

  अभी हाल ही में मप्र सरकार द्वारा पुनः एकबार हर एक ब्लॉक में 12 अन्य गोशालाएं खोले जाने सम्बन्धी प्रपोजल लांच किया गया है जिसमे संबंधित पंचायतों से जानकारी माँगी जा रही है. जिसके तहत हर एक ऐसी पंचायतों से ग्राम सभा का प्रस्ताव मंगवाया गया है और साथ में उन सभी पंचायतों से जमीन के कागजात भी चाहे गए हैं. बताया गया है की जिन पंचायतों को गोशालाएं चाहिए उन्हें कम से से 6 एकड़ जमीन देनी पड़ेगी.
  हिनौती गोशाला का काम अधूरा

   गंगेव ब्लॉक की हिनौती ग्राम पंचायत अन्तर्गत आने वाली गदही ग्राम की निर्माणाधीन 27 लाख और 62 हजार की लागत से बनाई जा रही गोशाला का कार्य अभी भी अधूरा है. दिनांक 30 दिसंबर 2019 की स्थिति में हिनौती गोशाला मात्र दीवाल स्तर तक ही पूर्ण हो पायी है. वहां पर उपस्थित रोजगार सहायक प्रकाश उपाध्याय ने बताया की 5 जनवरी 2020 को गोशाला का लोकार्पण किया जाना है इसके संबंध में अभी हाल ही में जिला पंचायत सीईओ अर्पित वर्मा द्वारा नईगढ़ी ब्लॉक में विजिट के दौरान सभी जनपद सीईओ को कारण बताओं नोटिस भी जारी की जा चुकी है. अब देखना यह होगा की कारण बताओ नोटिस का कोई प्रभाव पड़ता है की नही. ज्ञातव्य है कि पूरे जिले में प्रथम फेज में 33 गोशालाए बनाई जानी हैं जबकि पूरे प्रदेश में इनकी संख्या 900 के पार जानी है।
  संलग्न -  सड़कों और बाड़ो में अपनी मौत की बारी का इंतजार करते गोवंश.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Friday, December 20, 2019

MP हाइकोर्ट नोटिस के बाद भी नही थम रही गोवंश प्रताड़ना, अवैध बाड़ों में भूंख प्यास ठंड से तड़प कर मर रहे गोवंश (मामला जिले में बनाये जा रहे अवैध बाड़ों का जहां एकबार शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते पुनः घुट घुट कर दम तोड़ रहे गोवंश)

दिनांक 20 दिसंबर 2019, स्थान - कटरा/नईगढ़ी, रीवा मप्र

     जिले एवं प्रदेश में सरकार द्वारा बनाई जा रही गोशालाओं के निर्माण में देरी होने के एक बार फिर गोवंशों का जीवन संकट बना हुआ है.

    यद्यपि मप्र की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने अपने चुनावी एजेंडे में बेसहारा गोवंशों और फसल नुकसानी बचाने के लिए 1000 गोशालाएं बनाए जाने के दावे किये थे लेकिन आज साल भर बाद भी इस को जमीनी स्तर पर पूरा नही किया गया लिहाजा गोवंशों और किसानों दोनो की दुर्दशा बनी हुई है.
  
   पुरानी गोशालाएं बनी नहीं, आ गए नए प्रपोजल

    अभी हाल ही में रीवा जिले में 33 गोशालाएं और पूरे प्रदेश में लगभग 900 गोशालाएं खोले जाने के लिए कार्ययोजना बनाई गई थी और यह कार्य मनरेगा योजना द्वारा किया जाना था जिसके बाद कार्य तो प्रारम्भ हुआ लेकिन पूरा न हो सका. अभी रीवा में 33 में से मात्र 2 ही गोशालाओं का लोकार्पण हो पाया है जबकि विदित हो की तत्कालीन रीवा कलेक्टर ओम प्रकाश श्रीवास्तव द्वारा इन्हें 30 नवंबर तक पूरे करने के निर्देश दिए गए थे.
     जहां 28 सामान्य और 3 वृहद गोशालाएं अभी भी पूरी नही हो पायी हैं शासन प्रशासन से प्राप्त जानकारी से पता चला है की सरकार सभी पंचायतें जिनके पास की सरकारी 6 एकड़ तक का भूभाग है उनसे प्रपोजल मंगाया जा रहा है. 

  रीवा जिले के प्रत्येक ब्लॉक में बननी हैं अन्य 12 गोशालाएं

   इसके अतिरिक्त रीवा जिले के प्रत्येक ब्लॉक में 12 अतिरिक्त गोशालाओं का प्रपोजल मागा गया है जिनके लिए प्रत्येक जनपद पंचायत सीईओ को इस कार्य के लिए बोला गया है साथ ही संबंधित वेटेरिनरी विभाग के वीईओ को डेटा और प्रपोजल कलेक्ट करके शासन तक पहुचाने का जिम्मा दिया गया है.
   बतौर वेटेरिनरी एक्सटेंशन अफसर गंगेव एसके पांडेय एवं वीईओ त्योंथर पी के मिश्रा उन्होंने अपने अपने ब्लॉक में सीईओ और सरपंचों से गोशाला का प्रपोजल कलेक्ट कर शासन तक पहचाने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी है. इस प्रपोजल में बताया गया है कि पंचायत के पास कम से कम 6 एकड़ की सरकारी जमीन होनी अनिवार्य है साथ ही उस जमीन का नक्सा, खसरा एवं बी1 ग्रामसभा के प्रस्ताव के साथ देना अनिवार्य है।

   पनगड़ी में बनेगी 1 करोड़ लागत की गोशाला

    जिले के गंगेव ब्लॉक एवं सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाले पनगड़ी कला पंचायत में लगभग 60 एकड़ के सरकारी भूभाग में एक करोड़ रुपये की लागत से गोशाला निर्माण किये जाने का प्रावधान है जिसके लिए प्राप्त जानकारी अनुसार टेंडर प्रक्रिया भी चल रही है. बताया जा रहा है की जिले एवं प्रदेश की वृहद किश्म की बनाई जा रही कुछ गोशालाएं टेंडर प्रक्रिया से बनाई जाएंगी न की मनरेगा योजना द्वारा. ज्ञातव्य हो की सामान्य गोशालाएं जिनका प्रत्येक का टीएस 27 लाख 62 हज़ार का हुआ है यह सभी गोशालाएं मनरेगा और पंचायत द्वारा बनाई जा रही है.


  गोवंश प्रताड़ना पर हाईकोर्ट की नोटिस का नही दिया जबाब

    सूत्रों से जानकारी मिली है की सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश के अधिकारों के लिए लड़ने वाले शिवानन्द द्विवेदी द्वारा अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा के माध्यम से हाई कोर्ट जबलपुर में लगाई गई जनहित याचिका का जबाब अभी भी कई संबंधित विभागों ने नही दिया है. पशु चिकित्सा विभाग को हाईकोर्ट की नोटिस जारी हुई थी जिसमे जिले और प्रदेश में अवैध बाड़ों और घाटियों जलप्रपातों में हो रही पशु क्रूरता के विषय में जबाब देना था लेकिन अभी तक कई नोटिस जारी करने के बाबजूद भी इन विभागों ने कोर्ट के समक्ष जबाब प्रस्तुत नही किया है.

  अभी भी नही रुक रही पशु क्रूरता

   वैसे जिले एवं प्रदेश में पशु क्रूरता रुकने का नाम नही ले रही है. जहां तहां अवैध बाड़ों में कैद गोवंश अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे हैं. लोग अवैध बांडे तो बना देते हैं लेकिन इस भीषण ठंड में उनके लिए कोई समुचित व्यवस्था नही करते हैं जिससे उनका जीवन संकट बना हुआ है.
   
    जिले की शायद ही कोई ऐसी पंचायत हो जहां बिना किसी समुचित व्यवस्था, बिना शेड के अवैध किश्म के बाड़े न बने हों. इन बाड़ों में मवेशी ठंड में तड़प कर मर रहे हैं लेकिन कोई देखने वाला नही है.

  बाड़ा बनाने किसान बताते हैं मजबूरी

     इसके दूसरे पहलू पर नजर डालें तो उधर से भी बड़ी दुखद और भयानक स्थिति नजर आती है. किसानों और पशुपॉलकों द्वारा गांव गांव में बेसहारा छोड़ दिए गए मवेशियों की स्थिति यह है की जब इनको भूख प्यास लगती है तब यह मवेशी किसी न किसी किसान की हरी भरी फसल को देखकर टूट पड़ते हैं और चट कर जाते हैं. स्वाभाविक है सैकड़ों भूखे प्यासे मवेशी जिस किसी भी खेत में पड़ेंगे तो नुकसान पहुचाना तो निश्चित ही है. ऐसे में मौसम और सरकार की मार झेल रहे किसान भी न आव देखते हैं न ताव बस मवेशियों को समेटा और ठूस दिया कटीले तारों से बनाये अवैध बाड़ों में जहां स्वाभाविक तौर पर बिना किसी समुचित व्यवस्था में ठंड में भूख प्यास से घुट घुट कर यह सब काल के गाल समा जाते हैं.

   पशु क्रूरता है कानूनन अपराध, है दंड का प्रावधान

   बता दें की पशु क्रूरता करना अपराध की श्रेणी में आता है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार से किसी भी पशु को नुकसान पहचाने के उद्देश्य से उसे मारता पीटता है अथवा उसका अंग प्रत्यंग बांधता है या तोड़ता है तो उसके विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करके कार्यवाही होगी. इसी प्रकार मप्र के प्रावधानों के अनुसार मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम के तहत गोवंशों जिसमे की बैल भी सम्मिलित हैं यदि उनका वध किया जाता है तब इसके लिए अर्थदंड के साथ साथ अधिकतम 10 वर्ष के कारावास का भी प्रावधान है.

   इसके साथ भारतीय दंड विधान में पशु अतिचार निवारण अधिनियम एवं पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत भी यह अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे हैवी जुर्माना के साथ साथ जेल तक का प्रावधान है. 

  संलग्न - कृपया बाड़ों में कैद बेजुबान मवेशियों को देखने का कष्ट करें.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Friday, January 4, 2019

चल-पशु तस्करी मामले में टी आई के विरुद्ध आई जी को की गयी शिकायत, पत्रकारों ने कार्यवाही की किया माग (बैकुंठपुर थाना क्षेत्र का है मामला जिसमे चल-पशु तस्करी पर पर्दा डालने पुलिश ने पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसाने की दी थी धमकी साथ ही पत्रकारों को टी आई मंगल सिंह ने बताया था फ़र्ज़ी)

दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।

   बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब

   बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।

चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे

   सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है? 

    इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।

    पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत

    चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है। 

    बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।

   बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।  

     सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।

     पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।

संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।

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शिवानन्द द्विवेदी

 सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Saturday, June 30, 2018

किसानों की खेती के साथ फिर बढ़ जाएंगी गोप्रताड़ना, बनेंगे अवैध बाड़े, होगी पशु क्रूरता, शासन प्रशासन मौन, हिंदुत्ववादी संगठन बने रहेंगे तमाशबीन, मात्र होगी वोट बैंक की राजनीति, गोवंश न डाल पाएंगे वोट इसलिए नही सुनी जाएगी मूक बेजुबान की आवाज ( मामला देश प्रदेश में हो रहे पशु प्रताड़ना पर जहां मजबूर किसान खेती बचाने बनाते हैं अवैध बाड़े जहां घुट घुट कर मर जाते हैं मूक बेजुबान पशु)

दिनांक 30 जून 2018, गढ़, रीवा-मप्र,

(कैथा श्री हनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)

     आज जब हम सब किसान एक बार फिर खरीफ धान की खेती प्रारम्भ करने वाले हैं हममें से कुछ गोवंश और पशु प्रेमी किसान यह बात जरूर सोच रहे होंगे की अब इस वर्ष क्या होगा? क्या हमारी सारी धान की फसलें आवारा पशुओं द्वारा चर ली जाएंगी या यह बच पाएगी? क्या सरकार आवारा पशुओं के लिए व्यवस्था करेगी य यूं ही हमारे स्वयं के द्वारा आवारा छोंड़ दिए गए इन पशुओं से हमारी स्वयं की फसलें तबाह हो जाएंगी?

    शायद कुछ किसान अथवा गोवंश प्रेमी यह भी सोच रहे होंगे की एकबार फिर गायों की दुर्दशा देखने को मिलेगी जहां आवारा पशुओं को एकत्रित करके जबरन किसी बाड़े में ठूस दिया जाएगा जहां न तो इनके लिए चारा पानी की व्यवस्था होगी और न ही किसी छत्रछाया की. उन्ही अवैध रूप से ग्रामीणों द्वारा बनाये गए बाड़ों में यह बेजुबान पशु भूंख प्यास वर्षा सहते हुए कुछ सप्ताह अथवा महीनों में घुट घुट कर मर जाएंगे.

  आवारा पशुओं का क्या है समाधान 

    आज समाज और सरकार दोनो के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है की समाज द्वारा आवारा छोंड़ दिए गए इन पशुओं का क्या समाधान है? इनको कौन पाले? कौन इनकी व्यवस्था करे? जब तक गायें दूध देती हैं तब तक दूध बहुत प्रिय है. हमे चाय तो दूधवाली चाहिए, बच्चों को भी देशी गाय का ही दूध चाहिए, साथ ही मठ्ठा, दही, लस्सी, घी, मख्खन पनीर सब कुछ चाहिए. परंतु जैसे ही गाय दूध देना बन्द कर देती है वैसे ही वह आजकल के फैशन में बूढ़े माँ-बाप की तरह बेकाम हो जाती हैं और उन्हें मरने के लिए छोंड़ देते हैं. आज भारतीय समाज में जिस प्रकार से वृद्धाश्रम और अनाथाश्रम बढ़ रहे हैं उसी प्रकार आवारा छोंड़ दिए गए गायों के लिए भी कुछ गिने चुने बचे हुए गोप्रेमी लोगों द्वारा मिलजुलकर अथवा सरकार पर दबाब डालकर और अधिक बड़ी गोशालाएं बनाई जानी चाहिए. आने वाला भारतीय समाज और भी आधुनिक होगा जहां पर पुरानी परंपराओं और रीति रिवाजों के लिए कोई विशेष जगह नही बचेगी. यदि परंपराएं बड़ी मुश्किल से चलेंगी भी तो मात्र औपचारिकता के रूप में.

   दशकों पूर्व थी पशुओं की अधिक उपयोगिता 

   आज गोवंशों के प्रति निरंतर हो रही क्रूरता और उपेक्षा के पीछे सबसे बड़ा कारण इनकी उपयोगिता का कम हो जाना है. शहरों में तो कभी भी दूध डेयरी के अतिरिक्त पशुपालन होता नही. कहें की हज़ारों में कोई एकाध गो प्रेमी हों जो अपने घर में एक गाय रखे हों वह अलग बात है. गायों और पशुओं की उपयोगिता सबसे अधिक ग्रामीण समाज में रहती थी. भारत में चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, इशाई हो या सिक्ख सभी धर्मों और सम्प्रदायों के ऐसे लोग जो ग्रामों में निवास करते थे और जिनके पास दो चार एकड़ अथवा अधिक की भूमि थी जब तक मशीन का ईजाद नही हुआ था तब तक अपने ग्रामों में पशुओं को पाल कर रखते थे. गाय से बैल उत्पन्न होता था और बैल हल में जोतने का कार्य करता था साथ ही गहाई मिजाई में भी काम आता था. पहले आज जैसे न तो मिटी का तेल पर्याप्त था और न ही गैस वगैरह अतः पशुओं से प्राप्त गोबर का प्रयोग ईंधन और खेत में उपयोग होने वाली खाद के रूप में किया जाता था.

मशीनीकरण और आधुनिकता है मुख्य वजह

   पर आज जब पशुओं से लेकर आदमी तक की जगह मशीनें और रोबोट लेने लगे हैं स्वाभाविक रूप से पशुओं के साथ साथ आदमी की भी उपयोगिता कम होती जा रही है. अतः आज के इस कलयुगी समाज में यदि किसी को भी सम्मान पूर्वक जीवित बने रहना है तो इस स्वार्थी समाज के किसी न किसी उपयोग में आना होगा. धर्म कर्म और संस्कार की आज बात करना लगभग फालतू हो चुका है. जो धर्म की बात करते हैं उन्हें पागल और साम्प्रदायिक कहते हैं और जो कर्तव्य की बात करते हैं उन्हें यह तथाकथित आधुनिक समाज मूर्ख और 18 वीं सदी का बताता है. अतः बहुत से लोग इसके चलते आधुनिकता और मशीनीकरण के दौर में वह सब अनर्थ करते जा रहे हैं और वही सब अनर्थ आज उनके संस्कार बनते जा रहे हैं.

  ट्रेक्टर, जेसीबी, थ्रेशर, और अन्य मशीनों ने पशुओं का कर दिया काम तमाम

   गाय को माँ कहना भूल जाईये, आज का कुछ आधुनिक समाज अपनी माँ को भी माँ कहने में झिझकता है. यदि माँ-बाप बूढ़े और ग्रामीण कम पढ़े लिखे हैं तो आज का तथाकथित मॉडर्न व्यक्ति उन्हें अपना नौकर अथवा गांव वाला कहकर इंट्रोड्यूस करता है. इससे बढ़कर विडंबना और क्या हो सकती है.

    गाय तो बहुत दूर की वस्तु है. गाय का देशी दूध सभी को चाहिए, दुग्ध उत्पाद सभी को चाहिए लेकिन गायों के प्रति संवेदनशील कोई नही होना चाहता. गाय के बच्चे अर्थात बैल को कोई देखना नही चाहता.

    जब तक बैल हलों में चलते थे और उपयोगी थे तब तक वह सभी के लिए महत्व के थे अब मशीनों के चलते उनका महत्व समाप्त हो चुका है.

  फिर बनेंगे अवैध बाड़े, फिर बढ़ेगी पशु क्रूरता

     खरीफ वर्ष 2018 की फसल के साथ ही आवारा छोंड़ दिए गए गोवंशों की प्रताड़ना फिर बढ़ने वाली हैं. जगह जगह गांव गांव में किसानों काश्तकारों की लाठियां और डंडे के साथ साथ टांगा और कुल्हाड़ी खाते हुए यह गोवंश घायल अवस्था में भूंखे प्याशे फिर मरेंगे, गांव गांव इनके लिए नाज़ी युग में यहूदियों के लिए बनाये गए गैस चैम्बर और डिटेंशन कैम्प की तरह बांस बल्ली और कटीले तारों के बनाये गए अवैध बाड़ें होंगे जहां इन्हें अपर्याप्त व्यवस्था के साथ रखा जाएगा. न तो वहां पर कोई किसी प्रकार की छाया होगी और न ही पैरा भूषा की. ऐसे में कुछ दिनों बाद यह पशु प्रताड़ित होकर मरेंगे यही इनकी किस्मत में हर वर्ष लिखा रहता है. 

  जनकहाई और गदही के गो अभ्यारण्य का क्या हुआ?

    सिरमौर क्षेत्र रीवा में पिछले कई वर्षों से गोवंश प्रताड़ना के केस सामने आये हैं जिनमे सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा पशुओं के साथ हो रही क्रूरता को सोशल मीडिया एवं मीडिया के माध्यम से निरंतर उठाया जाता रहा है साथ ही ऐसे दर्जनों प्रकरणों में पूरे सबूत के साथ घटनास्थल पर जाकर उच्चधिकारियों द्वारा कार्यवाही भी करवाई गई है, अवैध बाड़े तोड़वाकर पशुओं को आज़ाद करवाया गया है, उनकी जाने बचाई गई हैं और साथ ही दोषियों को दंडित करवाने का भी प्रयाश किया गया है.

      पिछले वर्षों समाजिक कार्यकर्ता के इन्ही प्रयाशों के चलते रीवा ज़िले में गोअभ्यारण्य बनाये जाने की पहल की गई हैं जिनमे जनकहाई में प्रपोजल का डीपीआर हुआ था और साथ ही हिनौती के गदही में हज़ार एकड़ से अधिक शासकीय भूभाग में भी गोअभ्यारण्य बनाये जाने के लिए प्रपोजल ज़िला कलेक्टर रीवा एवं केंद्रीय मंत्रालय के निर्देश पर एसडीएम केपी पांडेय की जांच के दौरान उठा था. लेकिन जनकहाई एवं गदही के प्रपोजल का क्या हुआ इसकी कोई जानकारी नही है. एकबार फिर अकस्मात शासन चौंक पड़ेगा जब नित नए रोज गोप्रताड़ना के किस्से सोशल मीडिया एवं मीडिया में छाए रहेंगे.

   गदही में गो अभयारण्य बनाया जाना अति आवश्यक

    यदि गढ़ थाना क्षेत्र में गोवंश प्रताड़ना पर रोक लगाना है तो या की ऐसा कृत्य करने वालों के ऊपर सीधे एफआईआर दर्ज हो अथवा गोवंशों की समुचित व्यवस्था की जाए जिससे किसानों की फसल नुकसानी पर रोक लगे. उसके लिए आवश्यक है की गंगेव ब्लॉक एवं सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाला गदही ग्राम पर हज़ार एकड़ से अधिक के शासकीय भूभाग पर गोअभ्यारण्य बनाया जाए.

गो अभ्यारण्य से स्थापित होगा उद्योग

   यदि थाना गढ़ क्षेत्र एवं सिरमौर तहसील के अन्तर्गत आने वाले गदही ग्राम के शासकीय राजस्व के भूभाग में गो अभ्यारण्य बनाये जाने की पहल शासन प्रशासन करता है तो इससे न केवल गोवंशों की सुरक्षा होगी बल्कि गोवंश जनित उद्योग की भी एक प्रकार से स्थापना हो जाएगी. गोवंशों के गोबर से जैविक खाद, गोबर की खाद, गोबर गैस, गोमूत्र से दवा का निर्माण, पंचगव्य का निर्माण, दूध से दुग्ध उत्पाद आधारित सामग्री आदि का निर्माण किया जाकर कई लोगों को इस रोजगार से भी जोड़ा जा सकता है.

गोहत्या पर सीधी हो फांसी की सजा का प्रावधान 

    वास्तव में जब तक गाय को संरक्षित राष्ट्रीय पशु की संज्ञा में नही लाया जाता तब तक गाय की रक्षा सुरक्षा हो पाना काफी मुश्किल बात है.  सबसे पहले सरकार को चाहिए देश से बीफ उत्पाद के निर्यात पर पूरी तरह से बैन लगा देना चाहिए. साथ ही जानबूझकर गाय की हत्या करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा और यहां तक की फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए. 

कैसे बढ़ाई जाए गोवंशों की उपयोगिता

    आज तथाकथित आधुनिक मॉडर्न समाज में गाय की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है. गोवंश की उपयोगिता मात्र दूध खाने तक ही सीमित रह गई है. आज न तो हल में बैल की जरूरत है न ही बैलगाड़ी में, इसी प्रकार कोल्हू में भी बैल नही लगता, मिजाई, गहाई, दमरी आदि में बैल की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है अतः यह आवश्यक है की बूढ़े और कमजोर हो चुके बैलों से लेकर सभी प्रकार के गोवंशों की उपयोगिता पर पुनर्विचार किया जाए. 

   कृत्रिम और रासायनिक खादों से बढ़ रही बीमारियां, समाप्त हो रही उर्वराशक्ति

   कृत्रिम और रासायनिक खादों के उपयोग से बीमारियां बढ़ रही हैं और साथ ही जमीन की उर्वराशक्ति भी समाप्त होती जा रही है जिससे वैज्ञानिकों द्वारा निरंतर जैविक खेती पर बल दिया जा रहा है. जैविक खेती करने के लिए सरकारें भी प्रोत्साहित कर सब्सिडी दे रही हैं लेकिन अभी भी हरित क्रांति के बाद से इतना अधिक रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाने लगा है की जैविक और गोबर की खाद के विषय में कोई सोच ही नही रहा है. अब जब इस प्रदूषित खान पान और केमिकल से नित नई बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं ऐसे में वैज्ञानिक और डॉक्टर भी चिंतित हो रहे हैं की ऐसे में उत्पादन से अधिक सरकार का खर्च तो बीमारियों के इलाज में खर्च हो रहा है ऐसे में वैज्ञानिक और सरकारें कम से कम रासायनिक खाद के प्रयोग पर बल दे रही हैं साथ ही जैविक खाद और जैविक खेती का प्रचार प्रसार कर रही हैं. यह बात तो आज आम है की हरित क्रांति के बाद ज्यादा उत्पादन की होड़ में हो रही बेतरतीब रासायनिक खाद के प्रयोग से हमारी इतनी उर्वर धरती भी बंजर होकर रेगिस्तान में बदलती जा रही है. शायद इस विषय में आम किसान और नागरिक आज विचार न कर रहा होगा परंतु जब तक विचार करेगा शायद तब तक काफी देर हो चुकी होगी अतः आज आवश्यकता है एकबार पुनः वैदिक खेती की जिंसमे न तो जीवों की हत्या होती और न ही गोवंशों की. इन्ही गोवंशों के सहारे अधिक से आधिक उत्पादन प्राप्त कर लाभ कमाया जाकर जीवन यापन किया जा सकता है. हाँ एक बात जरूर है की गोवंशों और पशु आधारिक वैदिक खेती में एक व्यक्ति को फुलटाइम समय देना पड़ता है जिंसमे माल मवेशियों की देखभाल से लेकर खेती किसानी करना. परंतु चूंकि आज के इस भागते दौड़ते जीवन में किसी को समय ही नही है अतः हर कोई चाहता है की ट्रेक्टर से 2 घंटे में जोतबोकर फुरसत हुआ जाए और जाकर आगे का पैसा कमाया जाए, क्यो पूरा समय खेती किसानी के ही चक्कर में पड़ा रहा जाए. 

दोषारोपण बन्द कर समस्या का निकले मानवीय समाधान 

    इस प्रकार इस विश्लेषण से यह भलीभांति समझा जा सकता है की गोवंशों की उपयोगिता इस मसीनी युग में ढूंढ पाना एक टेढ़ी खीर ही है. ऐसे में तो बस यही लगता है की आने वाले समय में कहीं इन गोवंशों की और अधिक दुर्दशा न बढ़े. आखिर किसी भी प्रकार के वृहद और सर्वांगीड़ परिवर्तन के लिए पूरे देश और समाज को सामने आना पड़ेगा, इसका रास्ता ढूंढना पड़ेगा अन्यथा समाज का सरकार को दोष देना और सरकार का समाज को दोष देने का सिलसिला चलता रहेगा और गोवंशों की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जाएगी. 

संलग्न - संलग्न चित्र में देखा जा सकता है रीवा ज़िले में गर्मियों के समय ऐरा चरते हुए मवेशी जो अभी कुछ सप्ताह बाद अवैध बाड़ों में ठूस दिए जाएंगे और अपने जीवन के अंतिम दिन गिनना प्रारम्भ कर देंगे.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587