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Tuesday, December 31, 2019

(Rewa, MP) पूर्वा 310 में ठंड में ही बांध दिए गए गोवंश (मामला जिला रीवा के गंगेव जनपद अन्तर्गत आने वाले पूर्वा 310 ग्राम पंचायत का जिंसमे की सरपंच अजय गुप्ता के द्वारा पिछले वर्षों की भांति मवेशियों को खुले में बांधकर छोड़ दिया गया, यद्यपि यदाकदा पैरा डाला जाता है लेकिन पानी और छाया की व्यवस्था का बना है अभाव, मवेशी ठंड में दे रहे जान)

दिनांक 31 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

  जैसे ही आप नए ईसवी वर्ष 2020 के आगोश में समा रहे होंगे शायद ही आपको पता होगा की मांसाहारी समाज के लिए कितनो जीवों को इस जश्न के लिए बलि चढ़ाया जा रहा होगा. विश्व की 8 अरब को छूती आबादी में से मात्र 5 प्रतिशत से भी कम आबादी शुद्ध शाकाहारी हो सकती है इसमें से यद्यपि अन्य 10 प्रतिशत के आसपास की आबादी शायद बीफ यानी गोवंश और भैंस -भैसों की मांस न खाती हो फिर भी विश्व की 85 प्रतिशत के आसपास की आवादी अभी भी ऐसी हो सकती है जो बीफ का सेवन करती है.

एशिया समेत यूरोप अमेरिका अफ्रीका और अरब देश बीफ पर आश्रित

  बताते चलें की एशिया समेत विश्व के बड़े महाद्वीपों जैसे ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, अरब देश और अफ्रीका यह सब देश ऐसे हैं जहां हिन्दू अथवा अन्य शाकाहारी भोजन को मान्यता देने वाले सम्प्रदाय के लोग कम ही रहते हैं. ऐसे में यहां पाए जाने वाले बहुतायत लोग बीफ अर्थात गोवंशों के मांस, बहिंसों के मांस और पोर्क अर्थात सुअर के मांस को खाना प्रेफर करते हैं. कारण यह अपनी संस्कृति बताते हैं और साथ में ठंडा क्लाइमेट का होना बताते हैं. लेकिंन सच्चाई यह है की इनकी संस्कृति ही पूरी इस प्रकार से मांसाहारी किश्म की है जो शायद ही पुराने सनातन धर्म को मानने वाले और जैन धर्म को मानने वालों को राश आये.

  गंगेव के पूर्वा 310 में भी सड़क के किनारे बांधा है गोवंशों को

   गंगेव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता धीरेंद्र शेखर पांडेय द्वारा प्राप्त जानकारी से पता चला की गंगेव से पूर्व की तरफ देवतालाब की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पुरवा 310 ग्राम पंचायत सरपंच द्वारा पूर्व की भांति इस वर्ष भी बिना किसी समुचित व्यवस्था के ही सड़क के किनारे रस्सी में बांधकर पशुओं को छोड़ दिया गया है. किसी प्रकार की छाया की व्यवस्था न होने से हाड़ गला देने वाली ठंड में पशु तड़प कर जान दे रहे हैं. यद्यपि लोगों ने बताया की पशुओं को खाने के लिए धान के पैरे की व्यवस्था समय समय पर की जाती है जिससे उनको खाने के लिए कुछ मिल पा रहा है. लोगों ने माग की है की इन्हों ठंड से बचाव के लिए भी शेड की व्यवस्था की जाए साथ में इनको समय समय पर पीने के पानी की भी व्यवस्था की जाय. लोगों ने माग की है की जल्द से जल्द गोशालाओं का कार्य समाप्त कर इसमे पशुओं के लिए व्यवस्था की जाय.

  गोशालाओं का कार्य अभी भी अधूरा

  बता दें की मप्र शासन की तरफ से प्रदेश में बनाई जाने वाली 900 गोशालाओं का कार्य अभी भी पूरा नही होने के चलते जगह जगह पशु क्रूरता का शिकार हो रहे हैं.
   इस विषय में बता दें की किसानों और पशु पलकों द्वारा बेसहारा छोड़ दिए गए गोवंशों को कोई ठिकाना नही मिलने से यह बेसहारा पशु जब भ्रमण करते हुए चारा पानी की तलास में खेतों में पहुचते हैं तो किसानों की खड़ी फसल को नुकासन पहुचा देते हैं जिससे क्रोधित होकर यह किसान न आव देखते न ताव बस झुंड के झुंड मवेशियों को पकड़कर तार की बाड़ियों में कैद कर देते हैं जिंसमे न तो समुचित छाया की व्यवस्था होती है और न ही चारा पैरा और पानी की व्यवस्था जिससे पशु तड़प कर जान दे देते हैं. 
  किसानों और गोवंशों दोनो का जीवन संकट

    इस प्रकार की पशु क्रूरता की घटनाएं आमतौर पर फसल के सीजन में ज्यादा देखने को मिल रही है. अब जब इस समय किसानों ने गेहूं और अन्य फसलों की बोवनी की हुई है वह उसको रात रात भर ठंड में सींचकर उगा रहे हैं ऐसे में स्वाभाविक है की जब यह बेसहारा गोवंश खेतों को नुकसान पहुचाते हैं तो किसान को गुस्सा आ जाता है. गुस्से में किसान अनर्थ कर डालते हैं. आज इसके लिए यदि कोई सबसे अधिक जिम्मेदार है तो वह हैं पशुपालक. क्योंकि पशुपालक गॉयों को तब तक रखते हैं जब तक वह दूध दे रही होती हैं और जैसे ही गायें दूध देना बन्द कीं अथवा उनके बछड़े पैदा हुए वैसे ही वह उन्हें छोड़कर फुरसत हो जाते हैं जिसका खामियाजा किसानों को बेसहारा पशुओं को भुगतना पड़ रहा है.

 हर जनपदों में बनेगी अतिरिक्त 12 गोशालाएं

   बता दें की मध्य प्रदेश के हर जनपद में इन 900 गोशालाओं के अतिरिक्त भी अन्य 12 नयी गोशालाओं को बनाये जाने का प्रावधान बन चुका है जिसके सिलसिले में पशु चिकित्सा विभाग से प्राप्त जानकारी अनुसार सभी ऐसी ग्राम पंचायतों को चिन्हित कर उनसे जानकारी माँगी जा रही है. इस जानकारी में ग्राम सभा का प्रस्ताव, सरकारी 6 एकड़ की खाली पड़ी जमीन प्रमुख है. यह जानकारी संबंधित ब्लॉक सीईओ के माध्यम से पशु चिकित्सा विभाग को प्रेषित किया जाना है जहां इसका निर्धारण होगा की किन 12 पंचायतों का चयन किया जाय. यद्यपि पशु चिकित्सा विभाग द्वारा यह भी जानकारी मिली है की अब सरकार हर ग्राम पंचायत से यह जानकारी माग रही है जिससे भविष्य में ऐसी समस्त ग्राम पंचायतों को इन कार्ययोजना में सम्मिलित किया जा सके. अब देखना यह होगा की पहले प्रथम चरण में निर्माणाधीन 900 गोशालाएं कब तक पूर्ण हो पाती हैं.
  संलग्न  - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें खुले में रखे हुए मवेशी जो बिना किसी समुचित व्यवस्था के ही हैं.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Friday, August 23, 2019

धड़ल्ले से दौड़ रहे ओवरलोड वाहनों की ठोकर से घायल हुई गाय, स्थिति गंभीर (मामला जिले के थाना गढ़ अन्तर्गत भठवा मार्केट के पास का, पशु संजीवनी 1962 को किया गया सूचित, डॉक्टर और सर्जनों की टीम ने किया इलाज)

दिनांक 23 अगस्त 2019, स्थान गढ़/गंगेव/भठवा, रीवा मप्र
  घोषणा वीरों की घोषणाओं के बाद भी धरातल स्तर पर गौशाला निर्माण कार्य जीरो
 स्थानीय पुलिस प्रशासन की मदद से धड़ल्ले से दौड़ रहे ओव्हर लोड वाहन
  शिवानन्द द्विवेदी एवं स्वतंत्र शुक्ला (रीवा मप्र)

      प्रदेश सरकार के द्वारा गौशाला निर्माण कार्य की घोषणा करने के बाद भी अब तक धरातल स्तर में कार्य किसी प्रकार से आरंभ होने का नाम नहीं ले रहा है। आपको बता दें कि आज दिनांक 23 अगस्त 2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की गोमाता भठवा मार्केट के बस स्टैंड में अज्ञात वाहन से दुर्घटना ग्रस्त होकर अपनी अंतिम सांस गिन रही है। घटना की जानकारी शहर वाशियों द्वारा गौरक्षक शिवानंद द्विवेदी को दी गई जिससे हाल ही में घटना स्थल पर पहुंच कर प्राथमिक उपचार कराया गया, साथ ही पशु संजीवनी एम्बुलेंस 1962 को सूचना प्रेषित की गई, लेकिन अब तक 3 घन्टे बाद भी संजीवनी उपस्थित नहीं हो पाई। अंत मे शाम 4 बजे पशु संजीवनी को लेकर गंगेव वेटेरिनरी एक्सटेंशन अधिकारी उपस्थित हुए जिनके साथ आये सर्जनों ने गाय का इलाज किया।
   सुबह लगभग 11 बजे यद्यपि कम्पाउण्डर और ड्रेसर संतलाल साहू एवं रामानुज कोल के द्वारा प्राथमिक उपचार तो किया गया है लेकिन सर्जन के आने के बाद ही प्लास्टर हो पाया, वहीं घटना स्थल पर  उपस्थित लोगों का कहना था कि, गाय के पेट में लगभग 5 माह के गर्भ में बच्चा था जो ठोकर लगने से सम्भवतः मर चुका था लेकिन जिस प्रकार गाय जीवित बची हुई थी इससे डॉक्टरों का कहना था कि गाय के पेट मे बच्चा तब तक मरा नही था।
क्या कहना है इनका
गौरव शुक्ला निवासी भठवा - "गौरक्षक श्री शिवानंद द्विवेदी जी के द्वारा हमें गाय एक्सीडेंट होने की  सूचना मिली तो हमनें संबंधित अधिकारियों को इस विषय पर अवगत कराया, साथ ही प्राथमिक उपचार करा के ट्रेक्टर ट्राली  के माध्यम से गाय को परिजनों के घर पहुंचा दिया "
 गिरीश पटेल निवासी बांस-  "जब से यह रोड हाइवे बनी है तब से ओव्हर लोड बहनों की निकशी के चलते लगातार इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं।"
ओम शुक्ला निवासी भठवा - "पशुओं की तो गिनती नहीं की एक दिन में कितने दुर्घटना के शिकार होते हैं आए दिन लोगों के साथ भी यही होता है। स्थानीय पुलिस प्रशासन की सह से ओव्हर लोड बहनों की धड़ल्ले से निकासी होती है। इसका विरोध भी किया गया लेकिन कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है।"
 शिवानंद द्विवेदी, गौरक्षक सामाजिक कार्यकर्ता - "यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी बड़े बड़े ट्रक घरों में घुस चुके हैं। पता नहीं कितने व्यक्ति व मवेशी दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं। इसलिए साशन प्रशासन संदर्भित विषय को संज्ञान में ले ओव्हर लोडेड व भारी वाहनों के निकासी में प्रतिबंध लगाएं। साथ ही क्षेत्र में बनाएं जाने वाली गौशाला के निर्माण कार्य में भी तीव्रता आए जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।"
   गोशालाएं न बनने से बेसहारा मवेशियों की हालत खराब
     मप्र में वर्तमान सरकार द्वारा 1000 गोशालाओं को बनाये जाने हेतु प्रस्ताव लाया गया है जिनमे से काफी गोशालाओं को बनाये जाने हेतु जगह भी चिन्हित कर ली गयी हैं। जिला रीवा में ही अकेले 33 गोशालाएं खोली जानी हैं जिनमे से 30 गोशालाओं के निर्माण  हेतु टीएस भी जारी किए जा चुके हैं लेकिन ग्राउंड वर्क न होने से स्थिति दयनीय बनी हुई है।
  हिनौती और बांस ग्राम पंचायत में मात्र खोदे गए गड्ढे
    बता दें कि गंगेव ब्लॉक के हिनौती एवं बांस ग्राम पंचायत में गोशाला निर्माण के नाम पर अब तक मात्र गड्ढे ही खोदे गए हैं। कुछ गड्ढे खोदे जाने के बबाद बाहर के मजदूरों द्वारा कार्य अधूरा छोंड़कर भाग जाने के कारण मनरेगा का कार्य पूर्णतया बन्द हो चुका है। ज्ञात हो कि मनरेगा के कार्य बाहरी मजदूरों नही बल्कि पंचायत और आसपास के मजदूरों के द्वारा करवाये जाते हैं। जबकि उक्त पंचायतों में गोशाला निर्माण के प्रारम्भ से ही धांधली प्रारम्भ होगयी है जिसकी निगरानी शासन प्रशासन को करना अत्यंत आवश्यक है।
  वाहनों की स्पीड पर लगे रोक, ऐरा प्रथा पर भी लगे लगाम
    आज सबसे ज्यादा मवेशी वैष्णो6 और सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं।सतना से बेला, क्योटी से कलवारी, मनगवां से चाकघाट एवं मनगवां से हनुमना अथवा शहरी रोड कोई भी सड़कें हो, इनमे बेतरतीब और रेलमपेल दौड़ने वाले ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों की वजह से रोज सैकड़ों ऐरा मवेशी इसका शिकार हो रहे हैं। सामान्य तौर पर फसल नुकसानी बचाने के लिए होने वाली पशु क्रूरता तो है ही लेकिन उससे कहीं भयावह स्थिति सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने वाले मवेशियों की है। इस कारण जब तक ऐरा प्रथा में रोक नही लगती और ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों पर नियत्रण और कार्यवाही नही होती तब तक कुछ भी कह पाना मुश्किल है। भठवा मार्केट के पास की घटना उसका एक पहलू मात्र है।
संलग्न - कृपया दुर्घटना से बुरी तरह घायल गाय की स्थिति एवं तत्पश्चात सर्जनों एवं डॉक्टर द्वारा किया गया इलाज की फ़ोटो।
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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587





Thursday, August 22, 2019

1000 गोशालाओं के इंतज़ार में मप्र के बेसहारा गोवंश (मामला प्रदेश के बेसहारा गोवंशों का जिनका खरीफ सीजन आने से एकबार फिर जीवन संकट में दिख रहा है, रीवा में बननी हैं 33 गोशालाएं, 30 के टीएस जारी प्रत्येक की 27 लाख 62 हज़ार है लागत, पर धरातल पर नही बनी एक भी गोशाला)

दिनांक 23 अगस्त 2019, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र
   (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
    प्रदेश में बनाई जाने वाली 1000 गोशालाओं की कहीं भी भौतिक धरातल में कोई रता पता नही है जिससे एकबार फिर प्रदेश के लाखों बेसहारा मवेशियों का जीवन संकट में दिख रहा है।

    वर्ष 2012 से एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी एवं अन्य गोवंश प्रेमियों के सामाजिक प्रयाशों एवं मुद्दे को सतत मीडिया और समाज के समक्ष उठाये जाते रहने से बेसहारा गोवंशों के अधिकारों को लेकर एवं असामाजिक तत्वों द्वारा गोवंशों की प्रताड़ना किये जाने, अवैध बाड़ों में बिना समुचित व्यवस्था के कैद किये जाने, इनकी ट्रैफिकिंग, चल-पशु तस्करी किये जाने, चचाई क्योटी बहुती भलघटी अष्टभुजी भैंसहटी आदि जलप्रपातों में धकेले जाने, बकिया वराज नहर सहित अन्य नहरों में धकेले जाने आदि मामले केंद्रीय मंत्रालय श्रीमती मेनका गांधी पीएफए अध्यक्षा सहित मप्र एवं भारत शासन प्रशासन के समक्ष निरंतर उठाये गए हैं जिसका नतीजा ही है सत्ताधारी और विपक्षी दलों, समाज के हर वर्ग, प्रदेश एवं देश के मीडिआ के एक बहुत बड़े हिस्से में यह बात सतत बनी रही।
   किसानों और पशुओं दोनो की समस्या को आखिर समझा गया और जो कार्य तथाकथित हिंदूवादी पार्टी बीजेपी नही कर पाई उसे विपक्ष में बैठी कॉंग्रेस पार्टी ने कर डाला। आख़िरकार अपने आपको सत्ता में लाने के उद्देश्य से ही सही लेकिन प्रदेश में 1000 गोशालाओं को खोले जाने हेतु घोषणा किया। घोषणा तो किया लेकिन आज वर्ष भर का समय व्यतीत होने वाला है पर इनका प्रशासनिक अमला गोशालाओं के निर्माण में हीलाहवाली कर रहा है।
   जिले में बनाई जानी थी 33 गोशालाएं
   मध्य प्रदेश में तो अभी तक 900 गोशालाएं बनाये जाने हेतु जगह चिन्हित हुआ है लेकिन रीवा में ही अकेले 33 गोशालाएं खोले जाने हेतु टीएस हुआ है। रीवा की उन सभी 33 ग्राम पंचायतों को भी चिन्हित कर लिया गया है जिनमे से 30 गोशालाएं सामान्य प्रकृति की रहेंगी जबकि शेष तीन गोशालाएं वृहद किश्म की रहेंगी।

    जिन तीन ग्राम पंचायतों में वृहद गोशालाएं बनाई जानी थीं उनमे रीवा ब्लॉक की टीकर में 26 एकड़, गंगेव ब्लॉक की पनगड़ी कला पंचायत में 59 एकड़, एवं जवा ब्लॉक की कोनी कला पंचायत में 39 एकड़ भूमि का आवंटन किया गया है।
  टीएस जारी, प्रत्येक गोशाला 27 लाख 62 हज़ार में बनेगी
   प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले की वर्तमान समय मे बनाई जा रही 30 गोशालाओं के लिए टीएस जारी हो चुका है जिंसमे इन सभी 30 गोशालाओं की लागत राशि 27 लाख 62 हज़ार रुपये बतायी गयी है।
     टीएस जारी होने के साथ ही उन चिन्हित 30 ग्राम पंचायतों में जगह का ले आउट भी कर लिया गया है जिसमे आर ई एस के सहायक यंत्री, ब्लॉक के सीईओ और राजस्व एवं वेटेरिनरी अमले के साथ स्थानों को चिन्हित कर नींव डालने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
  कई पंचायतों में मात्र खोदे गए गड्ढे
   हिनौती पंचायत के गदही ग्राम में बनाई जा रही लगभग 20 एकड़ भूभाग में गोशाला की स्थिति यह है यहां मात्र गड्ढे खोदे जाने तक ही कार्य सीमित होकर रह गया है। गैर पंचायती मजदूरों द्वारा कार्य कराए जाने की प्रक्रिया चल रही है। यहाँ स्थिति यह है कि नौ दिन चले अढ़ाई कोश।

    यही स्थिति पास ही स्थित बांस पंचायत की भी है। यहाँ गोशाला बनाये जाने के पहले ही गोशाला कार्य रोक दिया गया है। यह समाज कल तक पशुओं को आवारा छोड़ दिया करता था फिर उनका रोना रोता था। अब जब सरकार इनके लिए गोशालाओं की व्यवस्था कर रही है तो यह समाज ही इसमे रोड़ा बन रहा है। बताया तो यह भी जा रहा है कि गोशाला तालाब में बनाई जा रही थी जिसका कुछ ग्रामीणों द्वारा विरोध किया गया लेकिन राजस्व विभाग से प्राप्त जानकारी में बताया गया कि ग्रामीणों द्वारा शासकीय भूमि पर बेजा कब्जा किया गया था जो अतिक्रमण हटाकर अब गोशाला बनाई जा रही है तो कुछ ग्रामीन उसका विरोध कर रहे हैं जबकि गोशालाओं के निर्माण में बाधा उत्पन्न करना सर्वथा गलत है।
  यदि गोशालाएं नही बनी तो होगी फजीहत
   सवाल यह है कि सिर्फ घोषणाएं भर कर देने से कुछ नही होने वाला। घोषणाएं करके उनमे कार्य परिणीति तक अमल करना ज्यादा आवश्यक है। आज जिस प्रकार पंचायती और मनरेगा के क्रियाकलाप चल रहे हैं उसके तौर पर देखा जाय तो यदि पंचायतों पर नकेल नही कसी गयी तो आवंटित 27 लाख 62 हज़ार रुपये हवा में उड़ जाएंगे और सीईओ सरपंच सचिव सब हजम कर लेंगे और किसी को भनक तक नही लगेगी। इसलिए कार्य और उसकी गुणवत्ता पर निगरानी अत्यंत आवश्यक है। यह कार्य जितना आवश्यक प्रशासनिक दृष्टि से है उससे कहीं अधिक सामाजिक दृष्टि से भी है।

    अब अगला सवाल यह है कि घोषणाओं के बाद आखिर यह गोशालाएं बनकर कब पूरी होंगी? क्या इस खरीफ वर्ष 2019 के लिए यह गोशालाएं बनकर पूरी हो जाएंगी? अथवा फिर वही हालात निर्मित होंगे जब इन्हें लाठी डंडे, टांगे कुल्हाड़ी से ही स्वागत होने वाला है क्योंकि इस क्रूर समाज से जहाँकी गोवंश समाज से पूरी तरह से वहिष्कृत हो चुके हैं कोई मानवता की अपेक्षा करना बेमतलब है।
संलग्न - कृपया संलग्न देखें जिले में बनने वाली 30 वर्तमान गोशालाओं का जारी हुआ टीएस। साथ मे गोशालाओं और आसरे का इंतज़ार करते हुए आवारा गोवंश।
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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587



Tuesday, January 15, 2019

पावर प्लांट चचाई में जंगल बीच करंट लगाकर चीतल एवं भैंसों का हुआ शिकार, वन विभाग पल्ला झाड़ रहा, पुलिश को कुछ फर्क नही पड़ता (मामला जिले में बढ़े वन अपराधों का जहाँ एमपीईबी पावर प्लांट चचाई के पास जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर अखंड प्रताप सिंह की 5 भैंसों को मार डाला गया, लंबे अरसे से करंट लगाकर चीतल का किया जा रहा था शिकार, बदकिस्मती से लाखों की फंस गयीं भैंसें)

दिनाँक 15 जनवरी 2019, स्थान - चचाई पावर प्लांट, सिरमौर, रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    प्रदेश एवं जिले में निरंतर बढ़ रहे बेलगाम वन अपराधों की श्रेणी में एक और अध्याय जुड़ चुका है. अभी तक तो नहरों, घाटियों, जलप्रपातों के बीच में मवेशियों को जीवित धकेले जाने की वारदातें सामने आईं थीं लेकिन अब तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे पूरे जंगल विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने वाला है. जी हाँ यहां कोई पहेलियां नही बुझाई जा रही बल्कि सच्चाई के समाज को अवगत कराया जा रहा है.

    जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर किया जाता रहा शिकार

    यह मामला है चचाई जलप्रपात से होकर जाने वाले जंगल का जहां से होते हुए लगभग 7 से 8 किमी दूर जंगल के रास्ते बकिया-बीहर नहर पावर प्लांट चचाई से अतरैला वन परिक्षेत्र के जंगल तक जाती है. अभी पिछले दिनों ही इसी नहर में इंटेक प्लांट के पास दर्ज़नों गोवंशों के उतराते हुए शव मिले थे जो मीडिया में और समाज में हलचल पैदा कर दिए थे. अभी एक और मामला सामने आया है जो महीनों पुराना बताया गया है जिंसमे पीड़ित अखंड प्रताप सिंह निवासी मरैला ने लिखित तौर पर पुलिश एवं वन विभाग को शिकायत भी की लेकिन कार्यवाही नही हुई है.

    मामला है 5 भैंसों और एक चीतल का जंगल के बीच करंट से फंसकर मौत का

   सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की जंगल के बीचोंबीच आखिर करंट आया कहां से लेकिन चकित मत होइये बता दें की चचाई पावर प्लांट बस नजदीक ही स्थित है जो 315 मेगावाट की बिजली उत्पन्न करता है. यह पावर प्लांट सरकार के ऐसे नियमों के अन्तर्गत बनाया गया है जो जंगल भूमि का भी उपयोग कर रहा है यद्यपि इस पावर प्लांट का कर्ताधर्ता एमपीईबी विभाग है.

   दिसंबर दूसरे सप्ताह की है वारदात  

    दिनाँक 12-13 दिसंबर के आसपास मरैला निवासी अखंड प्रताप सिंह उम्र लगभग 65 वर्ष की चार भैंसें एवं एक भैसा भैंसहटी नामक चचाई घाट  के नीचे चरने के लिए उतारे गए थे. बताया गया की यहीं एमपीईबी पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली का दुरुपयोग करके अर्जुन केवट नामक जवा निवासी उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए करंट लगाया था जिसमे अखंड प्रताप सिंह की 4 नग जीवित पजाने योग्य भैंसें एवं एक नग भैंसा सब मिलाकर लगभग 4 से 5 लाख कीमत की फंसकर मारे गए।

   अतरैला थाने एवं वन विभाग में लिखित दी सूचना

    अखंड प्रताप सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर घटना की सूचना  तत्काल अतरैला थाना एवं वन परिक्षेत्र अतरैला में दी गई लेकिन न तो वन विभाग द्वारा और न ही पुलिश विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज की गई. जबकि देखा जाए तो दोनों ही दृष्टि से करंट लगाकर जंगल के अंदर शिकार और मवेशियों का उसमे फंसकर मारना एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे वन विभाग को पीओआर और पुलिश विभाग को बकायदे एफआईआर दर्ज करना चाहिए.

   वेटेरिनरी अधिकारी ने शव न मिलने का बनाया बहाना

     बता दें की इस घटना के विषय में जब जवा वेटेरिनरी अधिकारी आर पी गौतम मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने पूरा दोष वन विभाग और पुलिश विभाग पर मढ़ दिया और बताया की हमे मृत भैंसों का कोई भी अंग नही मिला. जबकि पीड़ित अखंड प्रताप दवारा बताया गया को मृत भैंसों के कुछ पैर वगैरह अंग अभी भी वहीं जंगल में पड़े हुए हैं जिनको आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर फेंक दिया था जिससे यह पता न चले की घटना करंट लगाकर कारित हुई है. जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो ही जाती है की जीव केई मृत्यु के क्या कारण थे.

 क्या कहा अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने

    जब प्राथमिकी दर्ज न किये जाने के विषय में अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की वह मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं जबकि मेडिकल रिपोर्ट इसलिए नही बनी की वेटेरिनरी अधिकारी को मवेशियों के शव ही नही मिले.

    चश्मदीख गवाह भी है पुख्ता प्रमाण 

    यद्यपि इस पूरे मामले में एक चश्मदीख गवाह भी मौजूद है. चश्मदीख प्रदीप कुमार कोल उर्फ विधायक पिता चंद्रशेखर कोल उर्फ बेसहना निवासी मरैला उम्र लगभग 20 वर्ष के द्वारा पूरी घटना की जानकारी बतायी जा चुकी है लेकिन थाना प्रभारी अतरैला प्रदीप सिंह का अब यह कहना है की जब तक आरोपी अर्जुन केवट को पुलिश पकड़ कर पूंछताछ नही करेगी तब तक प्राथमिकी दर्ज नही होगी. वहरहाल अभी तक पुलिश ने आरोपी को ढूंढने तक का प्रयाश नही किया है जबकि घटना कारित हुए एक माह से ऊपर बीत चुके हैं. 

   रेंज अफसर अतरैला का वीडियो वायरल

    बता दें की रेंज अफसर अतरैला का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमे रेंज अफसर स्वयं भी घटना कारित होने की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं और बता रहे हैं की करंट से न केवल भैसों की मौत हुई हैं बल्कि चीतल की भी मौत हुई है. पर अब सवाल यह उठता है की आखिर जंगली संरक्षित क्षेत्र में एमपीईबी पावर प्लांट के करंट द्वारा असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार जैसे संगीन अपराध के लिए अब तक रेंज के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया? आखिर पूरे मामले में एमपीईबी की भी तो जबाबदेही तय है की आखिर उनके द्वारा पावर प्लांट में उत्पन्न की जाने वाली बिजली का दुरुपयोग आपराधिक किस्म के लोग कैसे कर रहे हैं?

 संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें पीड़ित अखंड प्रताप सिंह दवारा लिखित दिया गया आवेदन एवं साथ में करंट में मृत हुई भैंसों के कंकाल आदि जिन्हें बताया गया की आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर वहीं नदी में फेंक दिया था.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, December 10, 2018

MP - गोवंशों को चचाई जलप्रपात से बचाने मानवता की पेश की मिशाल - हिंदुओ ने मौत के घाट धकेला तो मुस्लिमों ने जीवित बचाया

दिनांक 10 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    संभाग के अब तक के सबसे भीषण पशु क्रूरता के मामले में चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटियों के नीचे धकेले गए सैकड़ों गोवंशों को अभी भी रेस्क्यू किये जाने का कार्य चल रहा है और अभी भी सैकड़ों गोवंशों का 20 किमी की हजारों फीट गहरी घाटी में फंसे होने की संभावना बनी हुई है. यद्यपि ध्यान फाउंडेशन ने तो पूरे मामले में पूरा सहयोग दिया लेकिन आइए इस बीच पिछले दो सप्ताह से अधिक के रेस्क्यू आपरेशन में कुछ मानवीय पहलुओं पर चर्चा करते हैं जहां भारतीय संस्कृति की माता गोमाता को बचाने के लिए मात्र हिन्दू ही नही बल्कि मुस्लिमों ने भी कोई कोर कसर नही छोड़ी.  

 संकल्प फाउंडेशन - द एनिमल रेस्क्यू टीम का सराहनीय कार्य

    रीवा ज़िले में कार्य करने वाले एवं श्रीमती नजमा बेगम के द्वारा आधारित संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों द्वारा चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों से गोवंशों को जीवित सुरक्षित निकालने में अतुलनीय योगदान रहा है. श्रीमती मेनका गांधी की एनजीओ संस्था पीपल फ़ॉर एनिमल की मप्र टीम द्वारा एक रीवा जिले का भी व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया हुआ है जिंसमे इस प्रकार पशुओं से प्रेम रखने वाले और उनके रेस्क्यू के लिए कार्य करने वाले युवाओं को जोड़कर रखा हुआ है. उसी ग्रुप में प्रियांशु जैन, रूपा द्विवेदी, विनय श्रीवास्तव, असद उल्लाह उर्फ आरिफ आदि कई सदस्य जुड़े हुए हैं. जब भी मवेशियों और पशुओं के पीड़ा और कष्ट में होने की कोई सूचना आती है तो यह सभी सदस्य अपने स्तर से एक दूसरे को सूचित करते हुए उन्हें रेस्क्यू किये जाने के प्रयास करते हैं.

मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम का महत्वपूर्ण योगदान

   इस बीच जब पिछले सप्ताह चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों में हजारों गोवंशों को घाट के नीचे जबरन धकेल दिए जाने की खबर अखबारों और सोशल मीडिया में आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की अगुआई में सभी टीम मेंम्बर को सूचना दी गई जिस पर संकल्प फाउंडेशन के आरिफ ने अपने टीम के सदस्यों समीर अंसारी, पारस सोंधिया, फैजल खान, विक्की शर्मा, जीशान राईन, सूर्य रॉय एवं मोहम्मद असद उल्लाह ने अगले दिन मोर्चा संभाला और न केवल रीवा से बाइकिंग करते हुए पूरे टीम मेंबर के साथ उपस्थित हुए बल्कि आवश्यकता अनुरूप घायल और बीमार गोवंशों के लिए दवाईयां भी खरीद कर लाये.

  लड़कों ने हजारों फीट गहरे चचाई घाट के नीचे उतरकर गाय को पानी से निकाला

    दिनाँक 30 नवंबर का दिन था जब संकल्प फाउंडेशन के यह सभी सदस्य दोपहर तक चचाई घाट के नीचे उतर चुके थे जहां इन्हें प्रपात के पानी में गिरी हुई एक गाय मिली जिसे सभी ने मिलकर बाहर निकाला और वहीं जंगल से खर पतवार निकालकर आग लगाकर गाय को ऊष्मा दिया. इतने में ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली से आये गोशेवक विनोद सिंह उपस्थित हुए जो पहले से सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य साथियों के साथ चचाई घाट के नीचे थे, इस प्रकार विनोद सिंह ने गाय को एंटीबायोटिक, दर्द बुखार के इंजेक्शन और साथ में डी-टेन का बॉटल चढ़ाया. चूंकि गाय उठ पाने और चल पाने में पूरी तरह से असमर्थ थी अतः उसका जीवन मुश्किल समझ आया. 

 मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने पूरा दिन रेस्क्यू में किया सहयोग

   इस बीच दिनाँक 30 नवंबर को चचाई घाट की हजारों फीट गहरी घाटी में चले सबसे महत्वपूर्ण रेस्क्यू आपरेशन में मोहम्मद असद उल्लाह और उनके संकल्प फाउंडेशन के साथियों द्वारा अभूतपूर्व योगदान देते हुए पूरे दिन भर रेस्क्यू आपरेशन में सहयोग प्रदान किया. जहां मरैला, कुइयां-मटीमा और अन्य आसपास के आये ग्रामवाशियों और वन विभाग के कर्मचारी मात्र तमाशबीन बने रहे वहीं लगभग 130 गोवंशों को हजारों फीट गहरी चचाई की घाटी से बाहर निकालने में मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने एड़ी चोटी की ताकत लगा दी और तब तक शांत नही हुए जब तक 130 गोवंश सुरक्षित घाट के ऊपर निकाल नही दिए गए.

   दया और मानवता का नही कोई जाति-धर्म 

   इस प्रकार इन दो सप्ताह अर्थात 15 दिन के लगभग किये गए रेस्क्यू आपरेशन के कई मानवीय पहलू सामने आये हैं जिनसे जाति, धर्म और आस्था के आधार पर यह बिल्कुल नही कहा जा सकता मानवीयता और दया धर्म अथवा जाति देखकर आती है.

   देखा जाय तो जिस चचाई और पुरवा जलप्रपात क्षेत्र में पशुओं और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ क्रूरता बढ़ी है वह कोई अन्य धर्म सम्प्रदाय का क्षेत्र नही है बल्कि उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है जिंसमे उच्चवर्गीय हिंदुओं के सहयोग से ऐसी भीषण पशु क्रूरता और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ प्रताड़ना और हत्या हुई है. तो क्या यह कहा जाय की आज हिंदुओं का वह समूह जो गोवंशों और गोमाता को पूजता था आज स्वयं ही पथभ्रष्ट्र हो कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल चुका है? क्या यह माना जाए की इन तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदुओं से श्रेष्ठ तो हमारे वह मुस्लिम भाई हैं जिनके ऊपर गोहत्या के आरोप लगते रहे हैं? मानाकि की हर धर्म में हर व्यक्ति एक जैसा नही होता उसमे अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. अतः यह बिल्कुल कहना उचित नही की मानवीयता और दया कोई धर्म और जाति देखकर आती है. यदि ऐसा होता तो चचाई और रीवा में होने वाले ज्यादातर गोवंशों के साथ क्रूरता के मामलों में हिन्दू सम्मिलित नही होते क्योंकि धर्म से तो गोमाता और गोवंश हिंदुओ के पूज्य हैं और गाय में तो 84 करोड़ देवी देवताओं का निवास माना गया है.

   समय था जब 1857 की क्रांति का आधार ही गोमाता थीं 

  इस प्रकार यदि इतिहास को उठाकर देखा जाए तो लगता नही की यह वही भारत देश है जिंसमे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मात्र गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस के कारण हुआ था. तो फिर ऐसे में भारत जैसे देश के इतिहास और वर्तमान के लिए क्यों किसी धर्म और क्यों किसी विदेशी शक्ति अथवा अंग्रेजों को दोषी ठहराया जाय. वास्तव में अब देखकर और अनुभव करके तो यही लगता है की बाप बड़ा न मैया सबसे बड़ा रुपैया. पेट और रुपये की अंधी दौड़ के पीछे धर्म, मानवता और इंसानियत तुच्छ साबित हो रही है. 

    वरना यदि ऐसा नही होता तो भारत का हिन्दू किसान भूंखों मरना उचित समझता लेकिन कभी भी अपनी गोमाता को आंच नही आने देता लेकिन क्या समय आ चुका है की आवश्यकता और भौतिकतावादी दौड़ के चलते कहीं कुछ नही बचा है मात्र पेट और पेट बचा है जिसका पोषण पहले होना चाहिए बांकी दया, मानवता रहे अथवा न रहे, इसे किसी को फिक्र नही.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में कुछ वह तस्वीरें हैं जिनमे संकल्प फाउंडेशन के लड़के जिनमे मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम सामिल हैं और उन लड़कों ने गोवंशों को बचाकर जीता जागता नमूना प्रस्तुत कर रीवा जिला क्या देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Sunday, November 11, 2018

रीवा मप्र - कशियारी स्कूल के पीछे थाना अतरैला में अवैध बाड़े में दर्ज़नों गायों की खौफनाक मौत (मामला ज़िला रीवा अन्तर्गत जवा ब्लॉक एवं अतरैला थाना का जहां पर कशियारी शासकीय प्राथमिक पाठशाला हरिजन बस्ती में मर रही बेजुबान गायें, सरपंच पति अखिलेश तिवारी एवं पंचायत द्वारा बनाया गया अवैध बाड़ा, न चारा न पानी और न ही किसी छाया की व्यवस्था, प्रशासन बना अनजान)


दिनाँक 12 नवंबर 2018, स्थान - अतरैला थाना, ब्लॉक जवा, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    ज़िले में ठंड बढ़ते ही एक बार फिर पशु प्रताड़ना बढ़ने लगी है. आवारा पशुओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर ज़िले में बनाये जाने वाले अवैध बाड़ों में बिना किसी समुचित व्यवस्था के चलते एक बार फिर गोवंश मौत के घाट उतारे जा रहे हैं. जाहिर है इनमे दोषी वही हैं जिन्होंने मवेशियों को आवारा छोड़ा और वह जिन्होंने यह अवैध बाड़ा बनाये जाने में सहयोग दिया है. 

   जवा ब्लॉक अतरैला थाने का है मामला 

   यह मामला अतरैला थाना अन्तर्गत कशियारी ग्राम पंचायत का है जहां पर शासकीय प्राथमिक पाठशाला हरिजन बस्ती कशियारी के पीछे स्कूल की दीवाल से सटाकर यह अवैध बाड़ा बनाया गया है. ग्रामीणों और अन्य गोवंश प्रेमियों द्वारा बताया गया की इस बाड़े के निर्माण में ग्राम पंचायत कशियारी के सरपंच पति, सचिव, एवं उनके सहयोगियों का हाँथ है. बताया गया की स्कूल परिसर में मीटिंग बुलाकर सरपंच पति अखिलेश तिवारी द्वारा यह अवैध बाड़ा बनवाया गया था जिंसमे न तो चारा, न पानी और न ही किसी प्रकार के पशुसेड की व्यवस्था थी. आसपास के चश्मदीखों द्वारा बताया गया की कई दिनों तक पशु बाड़े में कैद रहते थे जिन्हें न तो चारा पानी मिलता था और न ही बीमार होने पर इलाज इसलिए भूंख प्यास से तड़प कर मर जाते थे.

11 नवंबर को मिलीं 5 मृत गायें

   जब यह जानकारी सोशल मीडिया और अन्य माध्यमो से सामने आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं पीएफए इंदौर यूनिट के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रयास किये गए जिंसमे दिनांक 11 नवंबर को सीधे जवा ब्लॉक अन्तर्गत थाना अतरैला में ग्राम पंचायत कशियारी पहुचा गया और फिर जो खौफनाक वाकया देखा गया वह किसी भी कमजोर दिल को दहला देने वाला था.

   11 नवंबर को सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं डाढ़ निवासी गोवंश प्रेमी पुष्पराज तिवारी ने पूरे वाकये का वीडियो बनाया और साथ में फ़ोटो प्रूफ भी इकट्ठा किये. उसी दौरान गांव के कुछ लोग भी इकठ्ठा हुए जिन्होंने अवैध बाड़े का समर्थन किया और बताया की फसल नुकसानी बचाने के लिए बाड़ा सभी के सहयोग से बनाया गया है. नाम पूंछने पर कोई व्यक्तिगत नाम नही बताया और कहा की 100 से 150 लोगों की सहमति से बाड़ा बनाया गया है.

मतलब गायों को बाड़े में बन्द कर मारने में पूरा गांव ही सहमत

   जिस प्रकार से कुछ व्यक्तियों द्वारा जानकारी दी गई उससे यही पता चला की आज गोवंश अथवा गाय की समाज में उपयोगिता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. आज भारतीय समाज का वह हिस्सा जो अपनी माँ को माँ कहने को तैयार नही और अपने बूढ़े मां बाप की रखवाली एवं देखभाल नही कर सकता वह भला पशुओं की क्या कद्र करेगा. मसीनों ट्रेक्टर आदि के ईजाद के पहले वह तो मानव का स्वार्थ था जिसके कारण वह गाय बैल पालता था जिससे हल में चलने, दूध घी खाने एवं गोबर का खाद कंडे आदि के रूप में इस्तेमाल करने में मदद मिले वरना गाय की क्या कद्र इस भारतीय समाज में. जबकि यदि देखा जाए तो जहां पर पशु प्रताड़ना बढ़ी है यह कोई मुस्लिम अथवा इशाई बाहुल्य क्षेत्र नही जबकि हिन्दू और वह भी उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है. तो कहना यही पड़ेगा की गाय बड़ी न मैया सबसे बड़ा रुपैया.

 सरपंच पति अखिलेश तिवारी को दी गई जानकारी

   इस बीच समय निकालकर कशियारी ग्राम के सरपंच पति अखिलेश तिवारी को भी सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा अवगत कराया गया और जानकारी चाही गई की यह कार्य किसने किया. इस पर सरपंच ने कुछ जिम्मेदारी ली और पहले पहल बांकी ग्रामवासियों पर थोप दी. बता दें की कशियारी ग्राम पंचायत की सरपंच विमला तिवारी हैं. सरपंच का पति अखिलेश तिवारी पंचायत का पूरा काम धाम देखता है. बताया गया की अखिलेश तिवारी किसी कुष्ठ रोग विभाग में शासकीय कर्मचारी भी है लेकिन काम धाम छोड़कर मात्र नेतागिरी में ही लगा रहता है. अवैध बाड़ा इसी के द्वारा पंचायत के अन्य सदस्यों पर दबाब देकर बनवाया गया है. अखिलेश तिवारी द्वारा स्वयं भी बताया गया की उसके पास 200 एकड़ से अधिक की काश्त योग्य जमीन है साथ ही उसका पूरा परिवार वहां का जिमीदार परिवार है.

थाना अतरैला को भी लिखित की शिकायत

   इस बीच जब ग्राम पंचायत कशियारी में बनाये गए अवैध बाड़े में मरे हुए गायों के सबूत और प्रूफ इकठ्ठा कर लिए गए तब जाकर थाना अतरैला में लिखित तौर पर सूचित किया गया और दंडात्मक कार्यवाही की माग की गई. 

   शिवानंद द्विवेदी एवं पुष्पराज तिवारी द्वारा की गई लिखित शिकायत में पूरे वाकये को लिखा गया और भारतीय दंड संहिता की धारा 429 सहित पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1860 की धारा 11 एवं मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम अमेंडमेंट के अन्तर्गत कार्यवाही की माग की गई.

  थाना प्रभारी अतरैला द्वारा मामले पर लीपापोती

    इस बीच जब मोबाइल फ़ोन से अतरैला थाना प्रभारी को गोवंश प्रताड़ना के बारे में अवगत कराया गया तो थाना प्रभारी द्वारा बताया गया की डीएम कलेक्टर, एसडीएम एवं अन्य अधिकारियों को बता दें। ऐसी कोई बारदात नही है और कोई अवैध बाड़ा नही मिला है. जबकि थाना प्रभारी को पूरे मामले की फ़ोटो, लिखित शिकायत की प्रति, एवं बनाया गया वीडियो भी व्हाट्सएप्प के माध्यम से भी भेज दिया गया है.

दुर्गंध का रोजगार सहायक के विरोध करने पर जान से मारने और नौकरी से निकालने की धमकी

   ग्रामीणों द्वारा जो जानकारी सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमो से शेयर की गई थी उसमे कशियारी ग्राम पंचायत के रोजगार सहायक पर संदेह करते हुए सरपंच पति और उसके परिवार द्वारा रोजगार सहायक अंकित तिवारी को नौकरी से निकाले जाने एवं उनकी माँ को आंगनवाड़ी से निकाले जाने की धमकी दी गई है. स्वयं सरपंच पति अखिलेश तिवारी ने कहा की रोजगार सहायक अंकित तिवारी एवं उसकी माँ की आंगनवाड़ी की नौकरी मेरे हाँथ में है जब चाहूं तब निकाल सकता हूँ.

सरपंच पति ने कहा हम बाड़ा नही हटाएँगे

   इस बीच चर्चा के दौरान कशियारी सरपंच पति एवं कुष्ठरोग विभाग में कार्य करने वाले अखिलेश तिवारी ने कहा की बाड़ा हम नही हटाएँगे चाहे कुछ भी हो जाए. उसने आगे कहा की इन आवारा पशुओं से हमारी फसलों को नुकसान होता है इसलिए हमने बाड़ा बनवाया है. यदि स्कूल के पास से हटवा भी दिया गया तो अन्य जगहों पर बनाया जाएगा.

    अखिलेश तिवारी द्वारा यह भी कहा गया की अंकित तिवारी रोजगार सहायक का घर स्कूल और बाड़े के पास है अतः हमने जानबूझकर बाड़ा वहीं पर बनवाया है जिससे जब मवेशी मरें तो उसकी दुर्गंध से यह परेशान हों क्योंकि इन्होंने अपनी मा को हमारे विरुद्ध चुनाव में खड़ा किया था और हमारे विरोधी है. वहरहाल सरपंच पति और अन्य गोवंश प्रताड़ना में संलिप्त लोगों की वॉइस रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर मौजूद हैं.

यदि बाड़ा नही हटा तो मरेंगे सभी गोवंश

   अब देखना यह है की यदि अगले कुछ दिनों में स्कूल के पीछे से बाड़ा नही हटाया गया तो शेष बचे हुए गोवंश भी ठंड और भूंख प्यास से काल के गाल में समाहित हो जायँगे. अतः प्रशासन के लिए यह अति आवश्यक है की या की विधिवत पशुओं के सुरक्षा और रहने के इंतज़ामात किये जाएं नही तो वहां से इस अवैध बाड़े को जितना जल्दी संभव  हो हटवाया जाए.

प्रशासन निष्क्रिय मात्र एक्टिविस्टों के दम पर है गोवंशों की सुरक्षा

   निश्चित तौर पर पुलिश प्रशासन और जिला प्रशासन का नजरिया तो पशुओं के लिए बिल्कुल पशु जैसा ही है लेकिन पशु आधिकारों के लिए लड़ने और कार्य करने वाले संगठनों के लिए आगामी ठंड ऋतु एक बार फिर चुनौतियां लेकर आ रही है जिंसमे जगह जगह गांव गांव अवैध अनाधिकृत पशु बाड़े बनाये जाएंगे और पिछले वर्षों की ही भांति एकबार फिर गोवंश जिनमे बहुतायत में गायें होंगी भूंख प्यास और ठंड से तड़प तड़प कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देंगी.

संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखें रीवा जिला एवं थाना अतरैला स्थित ग्राम पंचायत कशियारी शासकीय प्राथमिक पाठशाला एवं हरिजन बस्ती के पीछे बनाये गए अवैध बाड़े में मृत पड़ी गायें एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं सहयोगियों दवारा थाना अतरैला को लिखित दी गई शिकायत की प्रति.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 786992139

Monday, October 29, 2018

मप्र- बकिया बराज नहर में धकेली सैकड़ों गायों पर हो रहीं राजनीति, क्रेडिट लेने का चल पड़ा दौर (मामला सतना जिले में रामपुर थाना अन्तर्गत बकिया बराज नहर में धकेले गए गोवंशों का जहां पर वास्तविक समस्या और उसके समाधान के स्थान पर हो रही राजनीति)

दिनांक 30 अक्टूबर 2018, स्थान - सतना-रीवा बॉर्डर बकिया बराज से करहिया चचाई गेट, मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, ग्राउंड जीरो से)

   पिछले दो कई दिनों से सतना ज़िला एवं रामपुर थाना क्षेत्र अन्तर्गत आने वाले बकिया बराज नहर के अंदर सैकड़ों गोवंशों को धकेल दिए जाने का जो मामला प्रकाश में आया था उसमे कर कराकर कार्यवाही तो हुई और गोवंशों को काफी मसक्कत के बाद निकाला भी गया लेकिन चुनाव को देखते हुए कुछ राजनीतिक किश्म के लोग उन्ही गोवंशों पर अब राजनीतिक रोटी सेंकना भी प्रारम्भ कर दिए हैं. गोवंशों को सुरक्षित निकालने में किसका कितना योगदान रहा और कैसे निकाले गए इन बातों से हटकर गौ संवर्धन बोर्ड रीवा के सदस्य और उपाध्यक्ष और कुछ अन्य संगठन अपना नाम चमकाने के उद्देश्य से जमकर क्रेडिट लेने के प्रयाश कर रहे हैं.

   तटस्थता के उद्देश्य और समाज के सामने वास्तविक सच्चाई लाने के लिए आइए प्रकाश डालते हैं इस पूरे प्रकरण पर. जानते हैं क्या है सच्चाई और हंगामा है क्यों बरपा.

गोवंशों को सुरक्षित निकलने में मदद क्या है कोई एहसान? गौसंवर्धन बोर्ड का काम ही हैं गायों की सुरक्षा

  वास्तव में देखा जाए तो मप्र में विशेष तौर पर गौसंवर्धन बोर्ड का गठन कर उसके अध्यक्ष को एक राज्यमंत्री का दर्जा और एवन क्लास की सुविधा प्रदान किये जाने के पीछे का यही उद्देश्य है की मप्र में निरंतर कई वर्षों से गोवंशों के साथ हो रही प्रताड़ना को कम किया जाकर इनके पोषण एवं पुनर्वाश हेतु सार्थक और दूरगामी प्रयास किये जाएं और इन गोवंशों की सुरक्षा की जाए लेकिन इसके उलट पिछले कई वर्षों से यह देखा गया है मप्र गोसंवर्धन बोर्ड अपने कार्य में पूरी तरह से असफल रहा है. मप्र सरकार ने गायों की सुरक्षा को राजनीतिक आधार बनाकर चुनाव आते ही गो मंत्रालय तक बनाये जाने की घोषणा तो कर डाली है लेकिन इसके वाबजूद भी पूरे प्रदेश में गोवंशों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नही हुआ है.

मीडिया में खबर आते ही प्रशासन की टूटी निद्रा

   पिछले कई दिनों से लोकल पब्लिक द्वारा बकिया बराज नहर में असमाजिक आपराधिक तत्वों द्वारा डम्पर और ट्रेक्टर के माध्यम से सैकड़ों गोवंशों को सूखी नहर में डंप किये जाने का मामला चल रहा था. गांववालों ने यह जानकारी संबंधित थाना रामपुर में भी पहुचाई थी लेकिन आम आदमी की इस वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में न तो कोई सुनवाई है और न ही को कीमत इसलिए कोई कार्यवाही नही हो रही थी. इस बीच जब खबर व्हाट्सएप्प एवं सोशल मीडिया के मॉध्यम से दिनाँक 26 एवं 27 अक्टूबर को प्रकाश में आई तो सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं पशुओं के अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों द्वारा भी प्रयाश प्रारम्भ किये गए. 

फंसी गायों की जानकारी उच्चस्तर तक भेजी गई 

  इस बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट द्वारा बकिया बराज नहर की घटना की जानकारी सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया आदि के माध्यम से होते हुए गौ संवर्धन बोर्ड मप्र के अध्यक्ष अखिलेश्वरानंद, एनिमल वेलफेयर बोर्ड के अध्यक्ष एसपी गुप्ता, मप्र से एनिमल वेलफेयर बोर्ड के सदस्य राम रघुवंशी, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया के समिति में जुड़े हुए दर्जनों सदस्यों जिंसमे मोहन सिंह अहलूवालिया सहित पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली विभिन्न संस्थाएं जैसे पीपल फ़ॉर एनिमल्स, ध्यान फाउंडेशन के सुदर्शन कौशिक, ज़िला सतना के एसपी एवं रामपुर थाना टी आई, ट्विटर के माध्यम से मुख्यमंत्री मप्र शासन, प्रधानमंत्री भारत सरकार सहित अन्य संबंधित जिम्मेदारों के समक्ष रखी गई जिस पर लगभग हर स्थान से प्रेशर लगाया गया और जितनी प्रशासनिक स्तर की मशीनरी सतना एवं रीवा जिले में पशुओं के लिए उपलब्ध थी सभी एक्टिव हुए जिंसमे पशु चिकित्सा विभाग का ज़िला एवं संभागीय दस्ता, नगर निगम रीवा का पशुओं को पकड़ने वाला दस्ता, बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के प्रबंधक सहित अन्य कई स्वयंसेवी संगठन और उनके लोगों ने भी अपना अपना योगदान दिया. 

  किन लोगों ने नहर से गोवंशों को चलकर सुरक्षित निकाला

    इस सम्पूर्ण अभियान में बकिया बराज नहर से लेकर करहिया चचाई गेट तक का लगभग 14 किमी के आसपास का सफर जिन लोगों ने पूरा किया और गोवंशों को चलाकर नहर के बीचोंबीच से चचाई गेट तक पहुचाया उनमे से नगर निगम के ड्राइवर, बैकुंठपुर से गोरक्षक  नितिन गौतम एवं विनीत गौतम, खुलासा न्यूज़ लाइव से ज़िला ब्यूरो आनंद द्विवेदी, कैथा से कार्यकर्ता संतोष केवट, एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी सहित एक दो अन्य गोवंश प्रेमी नहर के बीचोंबीच पूरे 14 किमी पैदल सफर तय करते हुए चचाई गेट के पास तक पहुचे जहां पर चचाई नहर के पास स्थित गेट को खोला गया और लगभग साढ़े तीन सौ की संख्या में गोवंशों की निकाला गया.

गो संवर्धन बोर्ड का पूरी रेस्क्यू प्रकिया में कितना रहा रोल

   सही मायनों में यदि देखा जाए तो मात्र चुनाव कहें की आचार संहिता का डंडा जिसकी वजह से कुछ हद तक इस बार गो संवर्धन बोर्ड के सदस्य कुछ रुचि लिए वरना आज पिछले कई वर्षों से पूरे रीवा में गोवंशों के साथ निरंतर हो रही अतिशय क्रूरता को रोकने में गोसंवर्धन बोर्ड का न तो कोई पता था और न ही कोई किसी प्रकार का योगदान. 

    चूंकि इस मर्तबा अगले कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और आदर्श आचार संहिता भी लगाए हुई है अतः जब कोई भी घटना जो की संवेदनशीलता की दृष्टि से इतनी व्यापक हो उस पर मीडिया और तमाम उछलने पर स्वाभाविक तौर पर इनको कार्यवाही करने मजबूर होना पड़ा. वरना जब थाना गढ़ क्षेत्र में पनगड़ी-भलघटी, लौंगा, क्योटी, रेहवा एवं नांदघाट के जंगली क्षेत्रों एवं हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे ज़रीन गोवंशों को जीवित धकेल दिया गया था तब यह गौसंवर्धन बोर्ड और गायों के नाम पर माल ऐंठेने वाले संगठन सब कहां थे? तब तो दिल्ली और चेन्नई से टीमें आईं और गोवंशों की सुरक्षा की तब रीवा प्रशासन और मप्र में गौसंवर्धन बोर्ड और गोरक्षक दलों का कोई रता पता नही था. पर चूंकि अब जाना की चुनाव भी नजदीक है तो मामले को भुनाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी.

गोसंवर्धन बोर्ड के नाम पर कुछ सदस्यों ने गाय पर किया राजनीति

   अभी हाल ही में बकिया बराज नहर से लेकर चचाई गेट तक नहर के बीचोंबीच से गोवंशों को निकाले जाने का जो सार्थक प्रयाश सभी के सहयोग से हुआ उसमे अब गौसंवर्धन बोर्ड के कुछ सदस्य और उपाध्यक्ष मात्र अपने नाम से क्रेडिट लेने का प्रयास कर हैं.

 यदि गौसंवर्धन बोर्ड ने थोड़ा बहुत योगदान कर ही दिया तो कौन सा बहुत बड़ा कमाल कर दिया. गौसंवर्धन बोर्ड का तो काम ही है गायों की सुरक्षा करना. लेकिन वास्तव में देखा जाए तो बकिया बराज नहर की घटना के अतिरिक्त गौसंवर्धन बोर्ड का कोई रता पता कभी नही चला. गौसंवर्धन बोर्ड ने गायों के नाम पर रीवा में क्या किया यह कभी समझ नही आया जबकि सभी प्रताड़ना की वारदातें हमेशा से ही गौसंवर्धन बोर्ड के पास तक पहुचाई जाती रही हैं. पोषण की दृष्टि से देखा जाए तो लक्षमनबाग गोशाला में गायों की दुर्दशा किसी से छुपी नही है जबकि हर वर्ष लाखों करोड़ों का बजट दिया जाता है. 

    पर आज जब चुनाव नजदीक है और बोर्ड के कुछ सदस्य जो राजनीतिक दृश्टि से लाभ लेना चाह रहे हैं बकिया बराज नहर की घटना को राजनीतिक रंग देकर अपना स्वयं का महिमा मंडन कर रहे हैं, गलत भ्रामक प्रेस रिलीज के माध्यम से अपने नाम की बड़ाई बता रहे हैं. टीवी में इंटरव्यू और प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर बता रहे हैं की मात्र इन्होंने ने ही इतना सब कार्य किया है बांकी सारे ग्राउंड पर नहर के अंदर मेहनत करने वाले समाजसेवी और वास्तविक गोभक्तों का जैसे कोई योगदान ही नही रहा. यह काफी दुखद तो है ही साथ ही गोवंशों के अधिकार के लिए स्वतंत्र तौर पर कार्य करने वाले गोसेवकों के भी मनोबल को गिराने का प्रयाश है.

सूचना पर 27 अक्टूबर को क्या कहा सतना एसपी ने

    जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की सतना एसपी से मोबाइल फ़ोन पर बात हुई तो उन्होंने घटना की जानकारी न होने की बात स्वीकारी पर उन्होंने बताया की वह हर संभव मदद करेंगे और आवश्यकता पड़ी तो क्रेन भी भेजकर गोवंशों को निकलवाने का प्रयाश करेंगे. आखिर जब गोसंवर्धन बोर्ड और अन्य संगठन एक्टिव बता रहे हैं तो एसपी को ऐसी भीषण वारदात को सूचना इसके पहले क्यों नही थी?

क्या कहा रामपुर थाना प्रभारी टी आई द्विवेदी ने

   जब कोई भी आपराधिक घटना जो की लॉ एंड आर्डर से सम्बन्धित हो घटित होती है तो उसमे सबसे पहले जानकारी पुलिश विभाग और संबंधित थाने को ही दी जाती है. इस पर जब रामपुर थाना प्रभारी श्री द्विवेदी से पूंछा गया तो उन्होंने घटना घटित होने की बात स्वीकारी और यह भी बताया की पिछले दो तीन दिन से बकिया बराज नहर में गोवंशों के धकेले जाने और उनके फंसे होने की खबर उन्हें कुछ नजदीकी गांववालों से मिली है. थानेदार ने आगे बताया की बीतेकल राजस्व तहसीलदार, पटवारी, आर आई, और नहर मंडल का दस्ता घटना का मौका मुआयना करने गए थे जिंसमे उनके थाने से भी कर्मचारी मौजूद थे. थाना प्रभारी रामपुर ने लगभग ढाई सौ गोवंशों के फंसे होने की वारदात स्वीकारी और बताया था की इन्हें नहर के अदंर ही चचाई गेट की तरफ से निकाले जाने का प्रयास चल रहा था लेकिन कहीं मजदूरों के साथ आसपास के ग्राम के किसानों ने मारपीट कर दी जिसके कारण गोवंशों को निकाला नही जा सका था.

क्या बकिया बराज नहर में यह गोवंशों को धकेलने की एकमात्र घटना है?

    बकिया बराज नहर में घटित हुई यह गोवंश प्रताड़ना की घटना कोई एकमात्र नही है. जब ग्राउंड जीरो पर जाकर वहां के आसपास के राहवाशियों और ग्रामीणों से समाजिक कार्यकर्ता द्वारा जानकारी लेने का प्रयाश किया गया तो वहीं बीड़ा, सेमरिया, बकिया और आसपास के अन्य ग्रामों के लोगों ने बताया की यहां नहर के अंदर इस प्रकार की वारदातें अक्सर ही होती रहती हैं जब कुछ ऐसे ही असमाजिक और आपराधिक तत्व जीवित गोवंशों को डम्पर और ट्रेक्टर ट्राली में भरकर नहर में डंप कर देते हैं. जिससे अत्यंत फिसलन भरी और गहरी नहर से अपने आप निकल पाने में असमर्थ यह गोवंश फंसे रहकर भूंख प्यास से अपनी जान गवां बैठते हैं और न तो इन्हें कोई देखने वाला होता और न ही बचाने वाला. ग्रामीणों द्वारा बताया की इसके पहले भी कई मर्तबा ऐसी वारदातें होती रही हैं जिंसमे शाशन प्रशासन का कोई रता पता नही रहता था. लेकिन इस बार खबर सोशल मीडिया, मीडिया और उच्चस्तर के अधिकारी और गोसेवकों के बीच पहुचने के कारण इस स्तर की कार्यवाही हुई.

खतरनाक स्तर से खुली है नहर, नही है कोई फेंसिंग

   जब ग्राउंड जीरो में जाकर स्थिति का शोध किया गया तो पाया गया की ऐसे आपराधिक तत्वों के लिए यह कार्य और भी आसान था क्योंकि नहर के फैलाव के दोनो तरफ कोई भी फेंसिंग और प्रोटेक्शन वाल नही होने से न केवल मवेशियों के लिए जबकि आम नागरिक और चलते फिरते लोगों के लिए भी नहर के दोनो छोरों में खतरा बना हुआ था. यह भी जानकारी ग्रामीणों द्वारा दी गई की भले ही आपराधिक तत्व रोज मवेशियों को भरकर नहर में न फेंकते हों लेकिन यहां आमतौर कुछ मवेशी और व्यक्ति भी स्वयं भी नहर के दोनो तरफ के छोरों में फिसल कर गिर जाते हैं जिसकी वजह से अपनी जान गवां बैठते हैं अथवा शरीर के अंग टूट कर अपाहिज हो जाते हैं.

    सबसे बड़ी बात यह है जब 35 से 40 फीट वर्टिकल गहरी नहर बनाई गई थी तो क्या इस नहर के दोनो छोरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग की व्यवस्था के लिए जल संसाधन विभाग ने बजट नही दिया था? मानाकि हर नहर के दोनो छोरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग लगाना थोड़ा मंहगा पड़ सकता है लेकिन जब बात इतनी गहरी और खतरनाक नहर की हो जहां पर एक बार फिसलने के बाद नहर से सुरक्षित निकल पाना आसान न हो तो ऐसे में क्या शासन स्तर से ऐसी खुली हुई समस्त नहरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग क्यों न लगायी जानी चाहिए थी?

यदि नहर फेंसिंग होती तो ऐसी वारदातें रोकी जा सकती थी

   सबसे बड़ा प्रश्न यही है जब इतनी गहरी और चौड़ी नहर ग्रामों के बीचोंबीच है तो उसमे प्रोटेक्शन और सुरक्षा की दृष्टि से व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण थीं. खुली नहर छोड़ने का कोई औचित्य नही समझ आता. आज यदि इस नहर के दोनो छोरो में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग जाली लगाई हुई होती तो संभवतः ऐसे आपराधिक एवं असमाजिक तत्वों के लिए बकिया बराज नहर में गोवंश प्रताड़ना जैसे घृणित कारनामे करने में इतनी आसानी नही होती. 4 से 5 फीट ऊंची प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग निश्चित तौर पर ऐसी वारदात करने वालों के पीछे एक बार आड़े आ जाती और इतना आसान नही होता नहर के बीचोंबीच इन मवेशियों को ऐसे डंप किया जाना.

बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र बताया गया ओवरलोडेड 

   अभी इसी बकिया बराज गोवंश प्रताड़ना वाली घटना के समय ही जब बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के प्रबंधक अरुण गौतम से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया की वर्तमान में उनके केंद्र में 1750 की संख्या में गोवंश दाखिल हैं और इन लगभग साढ़े तीन सौ गोवंशों के साथ संख्या 2 हज़ार के पार चली जाएगी. जब गोवंश विहार केंद्र की क्षमता के विषय में जानकारी चाही गई तो उन्होंने कोई स्पष्ट जानकारी नही दी और बताया की वैसे वर्तमान में ही गोवंश विहार केंद्र ओवरलोडेड चल रहा है तात्पर्य यह हुआ की जितने गोवंश बसामन मामा में रखे गए हैं उनकी देखरेख पर भी एक तरह से प्रश्नचिन्ह ही है क्योंकि जब क्षमता ही नही है तो उनकी व्यवस्था कैसे होगी.

    वैसे अभी कुछ समय से बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के विषय में नकारात्मक समाचार आती रही हैं जिंसमे कुछ सूत्रों द्वारा बताया जाता रहा है की बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र तो बना दिया गया है लेकिन व्यवस्था के तौर पर स्थिति चिंताजनक है. सोशल मीडिया में तो कुछ लोगों ने वहां भी गोवंशों के मरने की बातें कहीं है. वहरहाल सच्चाई क्या है वह तो बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र सेमरिया में जाकर ही पता लगाया जा सकता है.

मप्र सहित पूरे भारतवर्ष में गोवंशों की स्थित चिंताजनक

   वाकया मात्र मप्र अथवा रीवा जिला तक ही सीमित नही रह गया है. यहां तो पूरे देश में ही गोवंशों को लेकर घमासान मचा हुआ है. आज समाज इतना अधिक स्वार्थी हो चुका है की उसे गोवंशों की जरूरत नही बची है. उसका एक सबसे बड़ा कारण है कृषि उपकरणों और मसीनों का ईजाद और दुग्ध उत्पाद प्राप्ति के अन्य साधन. कभी भारत कृषि प्रधान देश कहलाता था और कृषि को सबसे उत्तम माना जाता था और नौकरी पेशा आदि को कृषि के बाद रखा जाता था. लेकिन अब समय पूरी तरह से बदल चुका है. कृषि सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है और नौकरी पेशा सबसे ऊपर. जहां कभी बैलों को हलों में चलाकर खेती की जाकर गोबर और जैविक खादों का उपयोग होता था आज वहां पर मसीनों ट्रेक्टर, थ्रेसर से खेती होकर रासायनिक उर्वरक का प्रयोग चल पड़ा है. कभी ग्रामीण क्षेत्रों में जहां गोबर के कंडों और लकड़ी से भोजन बनाये जाने का प्रचलन था आज वहां पर गैस सिलिंडर की बहुतायत होने से गोबर के कंडों की भी उपयोगिता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. अब देखा जाए तो गोवंशों का उपयोग मात्र दुग्ध उत्पाद तक ही सीमित रह चुका है और वहां भी अब दूसरे विकल्प सामने आ रहे हैं जिंसमे सोयाबीन, गेहूं और अन्य जैविक माध्यमो से भी दूध और दुग्ध उत्पाद बनाये जाने की तकनीकी प्रक्रिया निकल चुकी है अतः रही सही गोवंशों की उपयोगिता भी अब पूरी तरह से समाप्ति की कगार पर है. अतः जब तक गायें दूध देती हैं तब तक तो लोग  किसी कदर अपने घरों में रखते हैं लेकिन जैसे ही दूध देना बन्द कर देेती हैं अथवा बूढ़ी हो चलती हैं उन्हें घर से बाहर कर दिया जाता है. बछड़ों और बैलों की तो और भी अधिक दुर्दशा हो रही है. आज शहर एवं ग्राम तमाम जाएं तो सड़कों गलियों के किनारों पर घूमते लाठी खाते हुए बैलों का झुंड दिख जाएगा. कहीं कूड़े करकट के ढेर से कचरा खाते हुए तो कहीं जहरीली पॉलिथीन खाते हुए. इस प्रकार हमेशा ही इनके जीवन को संकट बना रहता है. कई बार शहरों की गलियों में आवारा घूमते हुए पशुओं के पेट में मरने के बाद कई किलो पन्नियां निकाली जाती हैं. आज शिवजी का नंदी इस भारतीय समाज के लिए बोझ और गोमाता माता न रहकर मात्र उपभोग की सामग्री बन कर रह गई है जब तक दूध दिया तो ठीक नही दिया तो छोड़ दिया.

गोवंश प्रताड़ना और अवहेलना आज एक राष्ट्रव्यापी समस्या

    अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है जब कोई समस्या समाज तक सीमित रहे घर गांव शहर तक सीमित रहे तो ठीक है लेकिन जब वह यहां से निकलकर प्रदेश और देश स्तर की बन जाए तो आखिर उसका क्या समाधान है? क्या इसमे अकेले समाज कुछ कर पायेगा अथवा अकेले सरकार कुछ कर पाएगी? समाज की स्थिति तो पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है और समाज ने तो गोवंशों को अब लगभग पूरी तरह से ही बहिष्कृत कर दिया है लेकिन जब समस्या इस लेवल की हो जाए तो शासन स्तर से क्या कुछ व्यापक और सार्थक प्रयास किये जाने चाहिए. आज मप्र में इसी समस्या को देखते हुए शासन स्तर से चुनाव को देखते हुए और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से वर्तमान सत्ताधारी सरकार ने तो गोसंवर्धन बोर्ड के बाद गो मंत्रालय तक बनाये जाने की घोषणा कर दी लेकिन क्या घोषणा मात्र करने से कुछ हो पायेगा? आखिर क्या है भारतीय समाज में इन गोवंशों का भावी स्थान? क्या भारतीय समाज में गोवंशों का अस्तित्व बना रहेगा अथवा पश्चिमी सभ्यता की तरह ही भारत में भी आगे चलकर मवेशियों को आहार ही समझा जाएगा और आने वाले समय क्या इन्हें मात्र बूचड़खानों का ही रास्ता दिखाया जाएगा अथवा कोई ऐसा प्रयाश किया जाएगा जिससे भारतीय संस्कृति का अस्तित्व और साथ ही गोवंशों का भी अस्तित्व बना रहे? 

  यह सब अनुत्तरित प्रश्न आज हम सबसे जबाब माग रहे हैं जिनका समाधान करना आज हर एक भारतवाशी का दायित्व है. - (शिवानन्द द्विवेदी की कलाम से)

  संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें, बकिया बराज नहर से करहिया चचाई नहर गेट की तरफ लगभग 14 किमी का सफर नहर के बीचोंबीच तय करते हुए लगभग साढ़े तीन सौ गोवंशों को सुरक्षित निकाले जाने की प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा स्वयं उपस्थित रहकर अपने मोबाइल कैमरे से तस्वीरें.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Saturday, October 27, 2018

बकिया नहर में फंसी हैं लगभग ढाई सौ गायें, धकेले जाने का आरोप (मामला सतना एवं रीवा के बॉर्डर का जहां पर रामपुर थाना क्षेत्र में बकिया नामक ग्राम एवं नहर के गहराई में सैकड़ों गोवंशों को धकेले जाने की सूचना है जिन्हें निकाल पाने शासन असमर्थ साबित हुआ है)

दिनांक 27 अक्टूबर 2018, स्थान - रामपुर थाना, सतना, मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी) 

     आवारा छोड़ दिए गए गोवंशों की बढ़ी हुई संख्या के चलते पशु प्रताड़ना अब और भी अधिक जोर पकड़ रही है. दिन प्रतिदिन देश प्रदेश के अनेक हिस्सों से गोवंश प्रताड़ना के किस्से सामने आते रहते हैं. अभी हाल ही में रीवा ज़िले के रेहवा घाटी में पचासों गोवंशों को जीवित धकेल दिए जाने का मामला ज्यादा पुराना नही हुआ है और सतना ज़िले में इसी तरह की एक और वारदात सामने आ गई है.

सतना के रामपुर थाना क्षेत्र बकिया ग्राम का है मामला 

    प्राप्त जानकारी के अनुसार सतना ज़िले के रामपुर थाना क्षेत्र अन्तर्गत बकिया ग्राम में सैकड़ों गोवंशों को नहर के बीचोंबीच धकेल दिया गया है जिससे सभी गोवंश जिनमे बहुतायत में गायें हैं उसी सूखी नहर में फंसी हुई हैं.

   ग्रामीणों द्वारा बताया गया की कुछ असमाजिक तत्व फसलों की नुकसानी को बचाने के उद्देश्य से गोवंशों के साथ निरंतर अत्याचार कर रहे हैं जिनमे कभी उन्हें नहर के बहाव में धकेल दिया जाता है तो कई स्थानों पर अवैध संचालित बाड़ों में भूखों प्यासा मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. लोगों द्वारा आरोप लगाया गया की शासन प्रशासन तमाशबीन बना बैठा हुआ है और न तो फसल नुकसानी के लिए कुछ कर रहा है और न ही गोवंशों की हो रही निरंतर क्रूरता को रोंक पा रहा है.

   सतना एसपी को दी गई सूचना

   इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा सतना एसपी को उनके मोबाइल फ़ोन में सूचित किया गया जिसकी जानकारी एसपी सतना को पहले से नही थी. इस बीच एसपी सतना ने आश्वासन दिया की वह गायों को सुरक्षित निकालने में हर संभव मदद करेंगे और यदि आवश्यकता पड़ी तो क्रेन का भी सहारा लिया जाएगा. लेकिन अभी तक गायों को निकाला नही जा सका है.

टी आई रामपुर को दी सूचना

   इस बीच जानकारी टी आई रामपुर को भी उनके मोबाइल नंबर पर दी गई क्योंकि मामला थाना रामपुर के अन्तर्गत आता है. टी आई रामपुर द्वारा अवगत कराया गया की उन्हें पहले से घटना की जानकारी थी और दिनांक 26 अक्टूबर को राजस्व अमला जिंसमे तहसीलदार एवं पटवारी एवं साथ ही नहर मंडल के अधिकारी मौका मुआयना करने पहुचे थे और गायों को नहर से बाहर निकालने का प्रयास किया है. आगे बताया गया की बकिया ग्राम से प्रारम्भ होकर लगभग 12 से 14 किलोमीटर तक मवेशियों को मजदूरों की मदद से नहर के बीचोंबीच से हांककर ले जाया गया लेकिन जैसे ही मजदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पहुचें वहां पर ग्रामीणों ने मजदूरों के साथ मारपीट करके भगा दिया जिससे मवेशी पुनः उसी स्थिति में आ गए हैं. 

   यह पूँछे जाने पर की जब मवेशियों को हांका जा रहा था तब राजस्व और पुलिश अमला कहां था तो बताया गया की तहसीलदार आईडिया बता कर वापस चले गए थे और इसी प्रकार पुलिश भी अपने दूसरे कार्यों में लग गई थी जिसकी वजह से मजदूर अकेले पड़ने के कारण ग्रामीण लोगों के कोपभाजन बने.

  कितने मवेशी अभी फंसे हैं और कैसे निकलेंगे ?

  टी आई रामपुर द्वारा जानकारी उपलब्ध कराई गई की अभी भी कुल ढाई सौ से अधिक गायें अथवा गोवंश फंसी हुई हैं जिन्हें एक दो दिन में बाहर निकाला जाना अनिवार्य है अन्यथा समस्या पैदा होगी और गोवंश मर जाएंगे. जबकि आम ग्रामीण सूत्रों द्वारा बताया गया कि ढाई सौ नही बल्कि हज़ारों गोवंश नहर के बीचोंबीच फंसे हुए हैं।

   टी आई रामपुर ने अपनी यथासंभव मदद उपलब्ध कराने की बात तो कही है लेकिन अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए बताया है की आगे जहां से मवेशियों को बाहर निकाला जाना है वह सतना क्षेत्र में न होकर सिरमौर एवं सेमरिया थाना क्षेत्र में आता है. अतः एसडीएम सिरमौर थाना सिरमौर एवं कलेक्टर रीवा से ही मदद ली जाकर मामले को सुलझाया जा सकेगा.

संलग्न - बकिया नहर में फंसी हुई गायों की तस्वीर जिनमे से पचासों मर भी चुकी हैं।

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शिवनांद द्विवेदी

सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता

रीवा मप्र 9589152587, 7869992139

Thursday, September 20, 2018

"बाद"/एफएमडी ने मवेशियों की तोड़ी कमर, महामारी की तरह रहा फैल (मामला ज़िले के गंगेव ब्लॉक एवं गढ़-लालगांव क्षेत्र में मवेशियों में फैलने वाले फुट एंड माउथ डिजीज का जिसने पूरे ज़िले में महामारी का ले रखा रूप, ज्यादातर मवेशी आये इसकी चपेट में, वेटेरिनरी विभाग बना तमाशबीन)

दिनाँक 20 सितंबर 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र

(कैथा श्रीहनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)

   बरसात के मौसम में आमतौर पर मवेशियों में कई बीमारियां फैल जाती हैं. जिस प्रकार से इंसानों में मौसमी बुखार, वायरल इन्फेक्शन, मलेरिया एवं टॉयफायड, मस्तिष्क ज्वर आदि बीमारियां फैल जाती हैं उसी प्रकार पशुओं में भी कई बीमारियां आ जाती हैं. ज्यादातर मवेशी बाद अर्थात फुट एंड माउथ डिजीज एफएमडी की चपेट में आते हैं. बाद के नाम से जानी जाने वाली यह बीमारी एक प्रकार से महामारी की तरह है क्योंकि बाद के आने के बाद मवेशियों का मुँह और पैर बुरी तरह से सड़ने लगता है या उसमे जब मक्खियां बैठती हैं तो इन्फेक्शन से कीड़े पड़कर घाव सड़न लेने लगता है. बाद या एफएमडी एक प्रकार की संक्रामक बीमारी होती है जिंसमे यदि एक प्रभावित हुआ तो शेष सभी जो भी उसके संपर्क में आते हैं सब प्रभावित होने लगते हैं.

   बाद या एफएमडी की तरह ही गलघोंटू, परपरहवा आदि बीमारियां भी पशुओं में फैलती हैं जिनकी वजह से पशु मर जाया करते हैं.

समय रहते टीकाकरण है समस्या का समाधान

   पशुओं में बरसात के मौसम के बाद होने वाली ज्यादातर बीमारियों की रोकथाम के लिए समय पर टीकाकरण की व्यवस्था ही एकमात्र समाधान है. एक बार बीमारी होने के बाद उससे निजात पाना काफी मुश्किल होता है अतः बेहतर यही होता है जिन जिन बीमारियों के टीके उपलब्ध हैं किसान और पशु पालक समय रहते मई जून से लेकर जुलाई अगस्त के बीच लगने वाले टीके लगवातें रहें जिससे इन बीमारियों के प्रति पशुओं में रोगप्रतिरोधक शक्ति निर्मित होने से मवेशी स्वस्थ्य रहते हैं.

गंगेव ब्लॉक में  वर्षों से नही लगे एफएमडी के टीके

   गंगेव ब्लॉक अन्तर्गत आने वाले कई क्षेतों जैसे गढ़ एवं लालगांव अन्तर्गत आने वाले ग्रामों में पशुओं को टीके नही लगाए गए जिसकी वजह से आज यह समस्या पैदा हुई है. वैसे कागजों में सरकार ने बहुत ज्यादा अभियान चलाया हुआ है जिंसमे गोकुल अभियान काफी मुख्य रहा जिंसमे गांव गांव कैम्प लगाकर पशुओं का इलाज करना, उनका पोषण की जानकारी इकठ्ठा करना, पशुओं को विभिन्न प्रकार की संक्रामक बीमारियों से बचाव के टीके लगाना आदि. लेकिन दुर्भाग्य से भारत में जिस प्रकार से ज्यादातर योजनाएं मात्र कागजों पर ही संचालित होती हैं उसी तरह टीकाकरण ड्राइव एवं गोकुल महोत्सव भी मात्र कागजों तक ही सीमित रहा. पशु चिकित्सा विभाग ने ज्यादातर फ़र्ज़ी पंचनामा बनवाकर सरकार को पेश कर दिए और बता दिए की टीकाकरण हो गया जिसकी वजह से स्थिति यह हो गई की सरकार की नजर में तो टीकाकरण हो गया लेकिन ग्रामों में ग्राउंड में स्थितियां यथावत ही बनी रह गईं.

  लोगों का सहयोग भी नकारात्मक

  यदि देखा जाए तो सरकार की योजनाओं और टीकाकरण आदि में मात्र पशु चिकित्सा विभाग ही मात्र जिम्मेदार नही है. इसके लिए विभाग के साथ साथ समाज भी जिम्मेदार है. अमूमन यह देखा गया है की जब भी कोई टीकाकरण करने के लिए डॉक्टर आता है तो गांव के लोग भी सहयोग नही देते. यदि 2 अथवा 5 रुपये प्रति टीकाकरण राशि ली जाती है तो लोग कहते हैं की चलो जाओ हम टीका नही लगवाएंगे. ऐसे में कई बार ऐसा होता है की पशु चिकित्सा विभाग के कर्मचारी गांव गांव जाकर कई बार खाली लौट आते हैं और टीकाकरण नही हो पाता. टीकाकरण के लिए गांव गांव जाकर एक सप्ताह पूर्व से जानकारी भी नही दी जाती. विज्ञापन के अभाव के कारण लोगों को पहले से जानकारी भी नही हो पाती.

हिनौती, रवार, गदही, सन्नसिया डांडी में पड़े हैं इन्फेक्टेड पशु

   अभी हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी एवं साथ में बड़ोखर निवासी शिवेंद्र सिंह सहित जंगली क्षेत्रों एवं उसके आसपास के ग्रामों में जाकर भ्रमण किया गया तो पाया गया की सैकड़ों आवारा और घरेलू गोवंश एफएमडी से संक्रमित हो चुके हैं. जगह जगह पड़े मिले इन गोवंशों की स्थिति काफी दयनीय बनी हुई है. लोगों द्वारा प्राप्त जानकारी से पता चला की पिछले कई दिनों से मवेशी मर भी रहे हैं. एफएमडी के संक्रमण में आने के बाद मवेशियों के मुँह और पैर काम करना बन्द कर देते हैं जिससे उनके मुँह पैर में घाव की वजह से कीड़े पड़ने लगते हैं और निरंतर सड़कर खून मवाद बहता रहता है. 

     लगभग दो दर्ज़न ऐसे मवेशी मिले हैं जो पूरी तरह से चल पाने में निःशक्त थे वजह मात्र उनके पैरों का काम न करना था. 

पूरी जानकारी वेटेरिनरी विभाग को दी गई

     यह समस्त वाकया गढ़ पशु चिकित्सा विभाग के सहायक पशु सर्जन विवेक मिश्रा एवं हिनौती औषधालय में कार्यरत समयलाल साहू को दी गई. जिस पर अगले दिन प्रभावित क्षेत्र में जाकर टीकाकरण करने की बात कही गई है.

रेहवा घाटी में फंसे दर्ज़नों गोवंश अभी भी नही निकल पाए

   पिछले दिनों असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा सिरमौर वन परिक्षेत्र के जंगली क्षेत्र एवं रेहवा घाटी में धकेल दिए गए दर्ज़नों मवेशियों को निकालने का प्रयाश कुछ सामाजिक सहयोग से सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं ग्रामीणों के सहयोग से किया गया था जिंसमे दो तीन दिन की जद्दोजहद के बाद मात्र एक गाय और उसके पांच दिन के जन्मे बछड़े को निकाला जा सका था. अभी भी 1000 फीट गहरी घाटी में ऐसे दर्ज़नों गोवंश हैं जो उतार दिए गए थे और अभी तक घाट के ऊपर नही चढ़ाए जा सके थे. 

   कुछ जंगली क्षेत्रों में भ्रमण करने वाले लोगों का कहना था यह मवेशी संभवतः घाट के नीचे नीचे चलकर दूसरे ग्रामों में नीचे से ही चले जाएंगे. लेकिन जिस प्रकार से घाट के तलहटी क्षेत्र में कोई स्पष्ट रास्ता नही देखा गया इससे स्पष्ट है की फंसे हुए पचासों मवेशियों के लिए अंदर ही अंदर बाहर निकल पाना कठिन नही असंभव भी होगा.

संलग्न -  संलग्न फ़ोटो में देखें सामाजिक कार्यकर्ता की उपस्थिति में मवेशियों में एफएमडी का सर्वे किया गया जिंसमे बहुतायत में आवारा पशुओं में बाद अर्थात एफएमडी की समस्या पायी गई .

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587.