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Monday, December 10, 2018

MP - गोवंशों को चचाई जलप्रपात से बचाने मानवता की पेश की मिशाल - हिंदुओ ने मौत के घाट धकेला तो मुस्लिमों ने जीवित बचाया

दिनांक 10 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    संभाग के अब तक के सबसे भीषण पशु क्रूरता के मामले में चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटियों के नीचे धकेले गए सैकड़ों गोवंशों को अभी भी रेस्क्यू किये जाने का कार्य चल रहा है और अभी भी सैकड़ों गोवंशों का 20 किमी की हजारों फीट गहरी घाटी में फंसे होने की संभावना बनी हुई है. यद्यपि ध्यान फाउंडेशन ने तो पूरे मामले में पूरा सहयोग दिया लेकिन आइए इस बीच पिछले दो सप्ताह से अधिक के रेस्क्यू आपरेशन में कुछ मानवीय पहलुओं पर चर्चा करते हैं जहां भारतीय संस्कृति की माता गोमाता को बचाने के लिए मात्र हिन्दू ही नही बल्कि मुस्लिमों ने भी कोई कोर कसर नही छोड़ी.  

 संकल्प फाउंडेशन - द एनिमल रेस्क्यू टीम का सराहनीय कार्य

    रीवा ज़िले में कार्य करने वाले एवं श्रीमती नजमा बेगम के द्वारा आधारित संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों द्वारा चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों से गोवंशों को जीवित सुरक्षित निकालने में अतुलनीय योगदान रहा है. श्रीमती मेनका गांधी की एनजीओ संस्था पीपल फ़ॉर एनिमल की मप्र टीम द्वारा एक रीवा जिले का भी व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया हुआ है जिंसमे इस प्रकार पशुओं से प्रेम रखने वाले और उनके रेस्क्यू के लिए कार्य करने वाले युवाओं को जोड़कर रखा हुआ है. उसी ग्रुप में प्रियांशु जैन, रूपा द्विवेदी, विनय श्रीवास्तव, असद उल्लाह उर्फ आरिफ आदि कई सदस्य जुड़े हुए हैं. जब भी मवेशियों और पशुओं के पीड़ा और कष्ट में होने की कोई सूचना आती है तो यह सभी सदस्य अपने स्तर से एक दूसरे को सूचित करते हुए उन्हें रेस्क्यू किये जाने के प्रयास करते हैं.

मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम का महत्वपूर्ण योगदान

   इस बीच जब पिछले सप्ताह चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों में हजारों गोवंशों को घाट के नीचे जबरन धकेल दिए जाने की खबर अखबारों और सोशल मीडिया में आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की अगुआई में सभी टीम मेंम्बर को सूचना दी गई जिस पर संकल्प फाउंडेशन के आरिफ ने अपने टीम के सदस्यों समीर अंसारी, पारस सोंधिया, फैजल खान, विक्की शर्मा, जीशान राईन, सूर्य रॉय एवं मोहम्मद असद उल्लाह ने अगले दिन मोर्चा संभाला और न केवल रीवा से बाइकिंग करते हुए पूरे टीम मेंबर के साथ उपस्थित हुए बल्कि आवश्यकता अनुरूप घायल और बीमार गोवंशों के लिए दवाईयां भी खरीद कर लाये.

  लड़कों ने हजारों फीट गहरे चचाई घाट के नीचे उतरकर गाय को पानी से निकाला

    दिनाँक 30 नवंबर का दिन था जब संकल्प फाउंडेशन के यह सभी सदस्य दोपहर तक चचाई घाट के नीचे उतर चुके थे जहां इन्हें प्रपात के पानी में गिरी हुई एक गाय मिली जिसे सभी ने मिलकर बाहर निकाला और वहीं जंगल से खर पतवार निकालकर आग लगाकर गाय को ऊष्मा दिया. इतने में ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली से आये गोशेवक विनोद सिंह उपस्थित हुए जो पहले से सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य साथियों के साथ चचाई घाट के नीचे थे, इस प्रकार विनोद सिंह ने गाय को एंटीबायोटिक, दर्द बुखार के इंजेक्शन और साथ में डी-टेन का बॉटल चढ़ाया. चूंकि गाय उठ पाने और चल पाने में पूरी तरह से असमर्थ थी अतः उसका जीवन मुश्किल समझ आया. 

 मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने पूरा दिन रेस्क्यू में किया सहयोग

   इस बीच दिनाँक 30 नवंबर को चचाई घाट की हजारों फीट गहरी घाटी में चले सबसे महत्वपूर्ण रेस्क्यू आपरेशन में मोहम्मद असद उल्लाह और उनके संकल्प फाउंडेशन के साथियों द्वारा अभूतपूर्व योगदान देते हुए पूरे दिन भर रेस्क्यू आपरेशन में सहयोग प्रदान किया. जहां मरैला, कुइयां-मटीमा और अन्य आसपास के आये ग्रामवाशियों और वन विभाग के कर्मचारी मात्र तमाशबीन बने रहे वहीं लगभग 130 गोवंशों को हजारों फीट गहरी चचाई की घाटी से बाहर निकालने में मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने एड़ी चोटी की ताकत लगा दी और तब तक शांत नही हुए जब तक 130 गोवंश सुरक्षित घाट के ऊपर निकाल नही दिए गए.

   दया और मानवता का नही कोई जाति-धर्म 

   इस प्रकार इन दो सप्ताह अर्थात 15 दिन के लगभग किये गए रेस्क्यू आपरेशन के कई मानवीय पहलू सामने आये हैं जिनसे जाति, धर्म और आस्था के आधार पर यह बिल्कुल नही कहा जा सकता मानवीयता और दया धर्म अथवा जाति देखकर आती है.

   देखा जाय तो जिस चचाई और पुरवा जलप्रपात क्षेत्र में पशुओं और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ क्रूरता बढ़ी है वह कोई अन्य धर्म सम्प्रदाय का क्षेत्र नही है बल्कि उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है जिंसमे उच्चवर्गीय हिंदुओं के सहयोग से ऐसी भीषण पशु क्रूरता और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ प्रताड़ना और हत्या हुई है. तो क्या यह कहा जाय की आज हिंदुओं का वह समूह जो गोवंशों और गोमाता को पूजता था आज स्वयं ही पथभ्रष्ट्र हो कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल चुका है? क्या यह माना जाए की इन तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदुओं से श्रेष्ठ तो हमारे वह मुस्लिम भाई हैं जिनके ऊपर गोहत्या के आरोप लगते रहे हैं? मानाकि की हर धर्म में हर व्यक्ति एक जैसा नही होता उसमे अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. अतः यह बिल्कुल कहना उचित नही की मानवीयता और दया कोई धर्म और जाति देखकर आती है. यदि ऐसा होता तो चचाई और रीवा में होने वाले ज्यादातर गोवंशों के साथ क्रूरता के मामलों में हिन्दू सम्मिलित नही होते क्योंकि धर्म से तो गोमाता और गोवंश हिंदुओ के पूज्य हैं और गाय में तो 84 करोड़ देवी देवताओं का निवास माना गया है.

   समय था जब 1857 की क्रांति का आधार ही गोमाता थीं 

  इस प्रकार यदि इतिहास को उठाकर देखा जाए तो लगता नही की यह वही भारत देश है जिंसमे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मात्र गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस के कारण हुआ था. तो फिर ऐसे में भारत जैसे देश के इतिहास और वर्तमान के लिए क्यों किसी धर्म और क्यों किसी विदेशी शक्ति अथवा अंग्रेजों को दोषी ठहराया जाय. वास्तव में अब देखकर और अनुभव करके तो यही लगता है की बाप बड़ा न मैया सबसे बड़ा रुपैया. पेट और रुपये की अंधी दौड़ के पीछे धर्म, मानवता और इंसानियत तुच्छ साबित हो रही है. 

    वरना यदि ऐसा नही होता तो भारत का हिन्दू किसान भूंखों मरना उचित समझता लेकिन कभी भी अपनी गोमाता को आंच नही आने देता लेकिन क्या समय आ चुका है की आवश्यकता और भौतिकतावादी दौड़ के चलते कहीं कुछ नही बचा है मात्र पेट और पेट बचा है जिसका पोषण पहले होना चाहिए बांकी दया, मानवता रहे अथवा न रहे, इसे किसी को फिक्र नही.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में कुछ वह तस्वीरें हैं जिनमे संकल्प फाउंडेशन के लड़के जिनमे मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम सामिल हैं और उन लड़कों ने गोवंशों को बचाकर जीता जागता नमूना प्रस्तुत कर रीवा जिला क्या देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Thursday, December 6, 2018

चचाई कालापानी में नौ गायों का फिर हुआ इलाज, पहुचाया चारा-भूषा (मामला ज़िले के अब तक के सबसे भीषण गो प्रताड़ना के किस्से का जिंसमे डेढ़ सौ से अधिक गोवंशों के रेस्क्यू के बाद अभी भी हजारों फीट गहरी घाटी में फंसी है गायें)

दिनाँक 06 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    ज़िले के चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटी में हुए अब तक से सबसे भीषण गोहत्या और गोप्रताड़ना के बारदात में अब तक लगभग डेढ़ सैकड़ा गायों को घाट के ऊपर निकाला गया है. अभी भी कई सैकड़ा गोवंशों के घाटी में फंसे होने की सूचना है लेकिन घाटी इतनी गहरी और विस्तृत है की वहां तक पहुच पाना असंभव सा प्रतीत होता है. यह काम रेस्क्यू आपरेशन में ट्रेनिंग प्राप्त प्रोफेशनल के सहयोग एवं जंगली इलाकों में रहने वाले लोगों के सहयोग से ही पूरी तरह संभव है.

 दिनाँक 06 दिसंबर को वेटेरिनरी कर्मचारियों ने किया इलाज, फंसी गायों के लिए पहुचा भूषा

    दिनाँक 06 दिसंबर को एक बार फिर सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी के डायरेक्शन में चचाई की गहरी घाटियों में फंसे गोवंशों के लिए भूषा पहुचाया गया साथ ही वेटेरिनरी विभाग सिरमौर के प्रशिक्षु सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी रमेश सिंह, प्रतिबंधक संत कुमार साकेत एवं राष्ट्रीय किसान संगठन के मप्र मंत्री वंश गोपाल सिंह, कठमना निवासी विजय सिंह के सहयोग से हजारों फीट की चचाई जलप्रपात की गहरी घाटी में पहुचा गया जहां पर प्रारंभिक स्थल पर मात्र 10 गोवंश ही मिले. उम्मीद की गई की यह वही गोवंश थे जो रेस्क्यू के दौरान उसी स्थान पर छूट गए थे. साथ ही इनमे से वह गाय भी सम्मिलित थी जिसके पैर में चोट की वजह से कीड़े पड़ गए थे. पशु चिकित्सक के रूप में गए रमेश सिंह एवं संत कुमार साकेत ने गोवंशों का स्वास्थ्य चेक किया और आवश्यकतानुसार कमजोर गोवंशों को क्रमसः 9 एंटीबायोटिक, 9 मल्टी विटामिन इंजेक्शन लगाया. साथ ही 3 गायों को दर्द बुखार के इंजेक्शन लगाए, घाव वाली गाय के घाव को धोकर एकबार फिर मलहम पट्टी की गई. इनमे से एक बैल था जो स्वस्थ्य था जिसको कोई उपचार नही किया गया. 

   बांस के पत्ते तोड़कर खिलाये और भूसा डाला

  इस बीच ऊपर चचाई रेस्ट हाउस के पास स्टोर किया गया एक बोरी भूषा ले जाया गया और सभी गोवंशों को थोड़ा थोड़ा दिया गया साथ ही वहां पर बांस के पत्ते भी तोड़कर खिलाये गए जिससे पशुओं के स्वास्थ में सुधार हो सके और उन्हें भी किसी प्रकार से चढ़ाकर घाट के ऊपर तक लाया जा सके.

   गहरी घाटी में पहुचना था काफी मुश्किल

   इस बीच दिनाँक 06 दिसंबर को शाम 5 बजने को थे और चचाई एवं पुरवा की गहरी और लगभग 20 किमी के विस्तार में फैली घाटी में पहुच पाना काफी मुश्किल था. पूरी घाटी में घुसने के लिए शुबह सूर्योदय से ही प्रवेश करते हुए दिन भर का समय देना पड़ेगा तभी जाकर कुछ सार्थक कार्य किया जा सकेगा.

   सबसे बड़ी चुनौती रेस्क्यू किये गए पशुओं का रिहैबिलिटेशन

     आज रीवा ज़िले में पशुओं के रखने के लिए कोई समुचित गोशाला नही है जहां इन्हें रखा जा सके. सबसे बड़ी चुनौती आज यह है की कैसे अधिक से अधिक गोशालाओं की व्यवस्था की जाए और कैसे इन गोवंशों का पुनर्वाश और पोषण किया जा सके. ज्ञातव्य है की रीवा में लक्ष्मण बाग गोशाला पहले से ही भस्ट्राचार की बलि चढ़ चुकी है जहां पर गोवंशों का पूरा खाना पशुओं को न दिया जाकर गोशाला प्रबंधन समिति के लोग खाये जा रहे हैं और गोवंश भूंखों मर रहे हैं.

  बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमिता

    अभी अभी खोली गई बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमितता देखने को मिल रही है. जब चचाई घाट से रेस्क्यू किये गए मवेशियों को बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में डालने की बात आई तो वहां का प्रबंधन संभाल रहे अरुण गौतम का कहना था की मीडिया में बात मत रखिये तो जितने चाहिए उतने लाकर डाल दीजिए. कुछ चचाई के लोगों द्वारा बताया गया की प्रति मवेशी 500 रुपये फिक्स किया हुआ है जो पैसा देता है उसके मवेशी डाल लेता है और जो नही देता उसे वापस कर देता है.

   300 की क्षमता पर कैसे पहुच गए ढाई हजार?

   सबसे बड़ी बात यह है जब मंत्री के पिए राजेश पांडेय से बात की गई तो उसका कहना था की हमारे पास बसामन मामा में जगह नही बची है और हमारी क्षमता मात्र 300 की है तब सवाल यह उठता है की गोवंशों की संख्या वन्य विहार केंद्र में ढाई हजार कैसे पहुच गई? निश्चित तौर पर जिस प्रकार लक्षमण बाग में इनकी दलाली और गोवंशों के नाम पर भ्रष्टाचार चल रहा था ठीक वही इन्होंने बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी प्रारम्भ कर दिया है. 

  घायल रेस्क्यू किये गए गोवंशों तक के लिए मना कर दिया 

    जब चचाई से रेस्क्यू किये गए गोवंशों को बसामन मामा में रखने की बात अरुण गौतम और मंत्री के पीए राजेश पांडेय के समक्ष रखी गई तो इनके लिए जगह नही थी लेकिन ढाई हजार के लिए जगह कहां से निकल आई? 500 रुपये प्रति मवेशी लेकर घुसेड़ने का धंधा इनका काफी पुराना है जो लक्षमण बाग में भी चलता था.

  संलग्न - दिनाँक 06 दिसंबर 2018 को चचाई घाट के नीचे जाकर गोवंशों का इलाज किया गया एवं साथ ही उनके लिए भूसे चारे की भी व्यवस्था की गई. घाटी के नीचे पहुचे कार्यकर्ता की तस्वीर.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, 9589152587, 78699992139

Sunday, November 11, 2018

रीवा मप्र - कशियारी स्कूल के पीछे थाना अतरैला में अवैध बाड़े में दर्ज़नों गायों की खौफनाक मौत (मामला ज़िला रीवा अन्तर्गत जवा ब्लॉक एवं अतरैला थाना का जहां पर कशियारी शासकीय प्राथमिक पाठशाला हरिजन बस्ती में मर रही बेजुबान गायें, सरपंच पति अखिलेश तिवारी एवं पंचायत द्वारा बनाया गया अवैध बाड़ा, न चारा न पानी और न ही किसी छाया की व्यवस्था, प्रशासन बना अनजान)


दिनाँक 12 नवंबर 2018, स्थान - अतरैला थाना, ब्लॉक जवा, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    ज़िले में ठंड बढ़ते ही एक बार फिर पशु प्रताड़ना बढ़ने लगी है. आवारा पशुओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर ज़िले में बनाये जाने वाले अवैध बाड़ों में बिना किसी समुचित व्यवस्था के चलते एक बार फिर गोवंश मौत के घाट उतारे जा रहे हैं. जाहिर है इनमे दोषी वही हैं जिन्होंने मवेशियों को आवारा छोड़ा और वह जिन्होंने यह अवैध बाड़ा बनाये जाने में सहयोग दिया है. 

   जवा ब्लॉक अतरैला थाने का है मामला 

   यह मामला अतरैला थाना अन्तर्गत कशियारी ग्राम पंचायत का है जहां पर शासकीय प्राथमिक पाठशाला हरिजन बस्ती कशियारी के पीछे स्कूल की दीवाल से सटाकर यह अवैध बाड़ा बनाया गया है. ग्रामीणों और अन्य गोवंश प्रेमियों द्वारा बताया गया की इस बाड़े के निर्माण में ग्राम पंचायत कशियारी के सरपंच पति, सचिव, एवं उनके सहयोगियों का हाँथ है. बताया गया की स्कूल परिसर में मीटिंग बुलाकर सरपंच पति अखिलेश तिवारी द्वारा यह अवैध बाड़ा बनवाया गया था जिंसमे न तो चारा, न पानी और न ही किसी प्रकार के पशुसेड की व्यवस्था थी. आसपास के चश्मदीखों द्वारा बताया गया की कई दिनों तक पशु बाड़े में कैद रहते थे जिन्हें न तो चारा पानी मिलता था और न ही बीमार होने पर इलाज इसलिए भूंख प्यास से तड़प कर मर जाते थे.

11 नवंबर को मिलीं 5 मृत गायें

   जब यह जानकारी सोशल मीडिया और अन्य माध्यमो से सामने आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं पीएफए इंदौर यूनिट के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रयास किये गए जिंसमे दिनांक 11 नवंबर को सीधे जवा ब्लॉक अन्तर्गत थाना अतरैला में ग्राम पंचायत कशियारी पहुचा गया और फिर जो खौफनाक वाकया देखा गया वह किसी भी कमजोर दिल को दहला देने वाला था.

   11 नवंबर को सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं डाढ़ निवासी गोवंश प्रेमी पुष्पराज तिवारी ने पूरे वाकये का वीडियो बनाया और साथ में फ़ोटो प्रूफ भी इकट्ठा किये. उसी दौरान गांव के कुछ लोग भी इकठ्ठा हुए जिन्होंने अवैध बाड़े का समर्थन किया और बताया की फसल नुकसानी बचाने के लिए बाड़ा सभी के सहयोग से बनाया गया है. नाम पूंछने पर कोई व्यक्तिगत नाम नही बताया और कहा की 100 से 150 लोगों की सहमति से बाड़ा बनाया गया है.

मतलब गायों को बाड़े में बन्द कर मारने में पूरा गांव ही सहमत

   जिस प्रकार से कुछ व्यक्तियों द्वारा जानकारी दी गई उससे यही पता चला की आज गोवंश अथवा गाय की समाज में उपयोगिता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. आज भारतीय समाज का वह हिस्सा जो अपनी माँ को माँ कहने को तैयार नही और अपने बूढ़े मां बाप की रखवाली एवं देखभाल नही कर सकता वह भला पशुओं की क्या कद्र करेगा. मसीनों ट्रेक्टर आदि के ईजाद के पहले वह तो मानव का स्वार्थ था जिसके कारण वह गाय बैल पालता था जिससे हल में चलने, दूध घी खाने एवं गोबर का खाद कंडे आदि के रूप में इस्तेमाल करने में मदद मिले वरना गाय की क्या कद्र इस भारतीय समाज में. जबकि यदि देखा जाए तो जहां पर पशु प्रताड़ना बढ़ी है यह कोई मुस्लिम अथवा इशाई बाहुल्य क्षेत्र नही जबकि हिन्दू और वह भी उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है. तो कहना यही पड़ेगा की गाय बड़ी न मैया सबसे बड़ा रुपैया.

 सरपंच पति अखिलेश तिवारी को दी गई जानकारी

   इस बीच समय निकालकर कशियारी ग्राम के सरपंच पति अखिलेश तिवारी को भी सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा अवगत कराया गया और जानकारी चाही गई की यह कार्य किसने किया. इस पर सरपंच ने कुछ जिम्मेदारी ली और पहले पहल बांकी ग्रामवासियों पर थोप दी. बता दें की कशियारी ग्राम पंचायत की सरपंच विमला तिवारी हैं. सरपंच का पति अखिलेश तिवारी पंचायत का पूरा काम धाम देखता है. बताया गया की अखिलेश तिवारी किसी कुष्ठ रोग विभाग में शासकीय कर्मचारी भी है लेकिन काम धाम छोड़कर मात्र नेतागिरी में ही लगा रहता है. अवैध बाड़ा इसी के द्वारा पंचायत के अन्य सदस्यों पर दबाब देकर बनवाया गया है. अखिलेश तिवारी द्वारा स्वयं भी बताया गया की उसके पास 200 एकड़ से अधिक की काश्त योग्य जमीन है साथ ही उसका पूरा परिवार वहां का जिमीदार परिवार है.

थाना अतरैला को भी लिखित की शिकायत

   इस बीच जब ग्राम पंचायत कशियारी में बनाये गए अवैध बाड़े में मरे हुए गायों के सबूत और प्रूफ इकठ्ठा कर लिए गए तब जाकर थाना अतरैला में लिखित तौर पर सूचित किया गया और दंडात्मक कार्यवाही की माग की गई. 

   शिवानंद द्विवेदी एवं पुष्पराज तिवारी द्वारा की गई लिखित शिकायत में पूरे वाकये को लिखा गया और भारतीय दंड संहिता की धारा 429 सहित पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1860 की धारा 11 एवं मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम अमेंडमेंट के अन्तर्गत कार्यवाही की माग की गई.

  थाना प्रभारी अतरैला द्वारा मामले पर लीपापोती

    इस बीच जब मोबाइल फ़ोन से अतरैला थाना प्रभारी को गोवंश प्रताड़ना के बारे में अवगत कराया गया तो थाना प्रभारी द्वारा बताया गया की डीएम कलेक्टर, एसडीएम एवं अन्य अधिकारियों को बता दें। ऐसी कोई बारदात नही है और कोई अवैध बाड़ा नही मिला है. जबकि थाना प्रभारी को पूरे मामले की फ़ोटो, लिखित शिकायत की प्रति, एवं बनाया गया वीडियो भी व्हाट्सएप्प के माध्यम से भी भेज दिया गया है.

दुर्गंध का रोजगार सहायक के विरोध करने पर जान से मारने और नौकरी से निकालने की धमकी

   ग्रामीणों द्वारा जो जानकारी सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमो से शेयर की गई थी उसमे कशियारी ग्राम पंचायत के रोजगार सहायक पर संदेह करते हुए सरपंच पति और उसके परिवार द्वारा रोजगार सहायक अंकित तिवारी को नौकरी से निकाले जाने एवं उनकी माँ को आंगनवाड़ी से निकाले जाने की धमकी दी गई है. स्वयं सरपंच पति अखिलेश तिवारी ने कहा की रोजगार सहायक अंकित तिवारी एवं उसकी माँ की आंगनवाड़ी की नौकरी मेरे हाँथ में है जब चाहूं तब निकाल सकता हूँ.

सरपंच पति ने कहा हम बाड़ा नही हटाएँगे

   इस बीच चर्चा के दौरान कशियारी सरपंच पति एवं कुष्ठरोग विभाग में कार्य करने वाले अखिलेश तिवारी ने कहा की बाड़ा हम नही हटाएँगे चाहे कुछ भी हो जाए. उसने आगे कहा की इन आवारा पशुओं से हमारी फसलों को नुकसान होता है इसलिए हमने बाड़ा बनवाया है. यदि स्कूल के पास से हटवा भी दिया गया तो अन्य जगहों पर बनाया जाएगा.

    अखिलेश तिवारी द्वारा यह भी कहा गया की अंकित तिवारी रोजगार सहायक का घर स्कूल और बाड़े के पास है अतः हमने जानबूझकर बाड़ा वहीं पर बनवाया है जिससे जब मवेशी मरें तो उसकी दुर्गंध से यह परेशान हों क्योंकि इन्होंने अपनी मा को हमारे विरुद्ध चुनाव में खड़ा किया था और हमारे विरोधी है. वहरहाल सरपंच पति और अन्य गोवंश प्रताड़ना में संलिप्त लोगों की वॉइस रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर मौजूद हैं.

यदि बाड़ा नही हटा तो मरेंगे सभी गोवंश

   अब देखना यह है की यदि अगले कुछ दिनों में स्कूल के पीछे से बाड़ा नही हटाया गया तो शेष बचे हुए गोवंश भी ठंड और भूंख प्यास से काल के गाल में समाहित हो जायँगे. अतः प्रशासन के लिए यह अति आवश्यक है की या की विधिवत पशुओं के सुरक्षा और रहने के इंतज़ामात किये जाएं नही तो वहां से इस अवैध बाड़े को जितना जल्दी संभव  हो हटवाया जाए.

प्रशासन निष्क्रिय मात्र एक्टिविस्टों के दम पर है गोवंशों की सुरक्षा

   निश्चित तौर पर पुलिश प्रशासन और जिला प्रशासन का नजरिया तो पशुओं के लिए बिल्कुल पशु जैसा ही है लेकिन पशु आधिकारों के लिए लड़ने और कार्य करने वाले संगठनों के लिए आगामी ठंड ऋतु एक बार फिर चुनौतियां लेकर आ रही है जिंसमे जगह जगह गांव गांव अवैध अनाधिकृत पशु बाड़े बनाये जाएंगे और पिछले वर्षों की ही भांति एकबार फिर गोवंश जिनमे बहुतायत में गायें होंगी भूंख प्यास और ठंड से तड़प तड़प कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देंगी.

संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखें रीवा जिला एवं थाना अतरैला स्थित ग्राम पंचायत कशियारी शासकीय प्राथमिक पाठशाला एवं हरिजन बस्ती के पीछे बनाये गए अवैध बाड़े में मृत पड़ी गायें एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं सहयोगियों दवारा थाना अतरैला को लिखित दी गई शिकायत की प्रति.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 786992139

Wednesday, July 11, 2018

गंगेव बाजार में वाहन की ठोकर से गाय की मौत (ज़िला रीवा मप्र)

दिनांक 11 जुलाई 2018, स्थान - गंगेव ब्लॉक रीवा मप्र

   👉 रीवा ज़िले में पशुओं की दुर्दशा दिन प्रतिदिन बढ़ती देखी जा रही है. अभी हाल ही में कई पशुओं का करंट में फसकर मौत की खबर पुरानी नही हुई है उधर गगेव बाजार में गर्ल्स स्कूल के पास दिनांक 10 जुलाई को किसी भारी वाहन ने ठोकर मार दिया जिस पर गाय की तत्काल मौत हो गई. 

      अभी पिछले दिनों त्योंथर तहसील अन्तर्गत आने वाले देउर ग्राम पंचायत में भी दिलीप सिंह द्वारा घायल गाय पड़ी होने की सूचना दी गई थी साथ ही गंगेव ब्लॉक अन्तर्गत पनगड़ी एवं मदरी पंचायत में भी निरंतर गो प्रताड़ना और पशु क्रूरता की बारदतें शिवेंद्रमणि शुक्ला, प्रमोद सिंह, वंशगोपाल सिंह  एवं डॉक्टर अम्बिका पटेल द्वारा सूचित की गईं थी जिस पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंशों कर अधिकार के लिए कार्य करने वाले शिवानन्द द्विवेदी द्वारा सम्बंधित पशु चिकित्सा विभाग को बुलाकर इलाज कराया गया था।.

💥 *आवारा पशुओं की नही है कोई व्यवस्था*

   आज आवारा छोड़ दिए गए पशु जगह जगह प्रताड़ित किये जा रहे हैं. जब तक यह गायें समाज के लिए काम की रहती हैं दूध और दुग्ध उत्पाद देती हैं तो समाज इनको घर में रखता है लेकिन जैसे ही यह दूध देना बन्द कर देती हैं वैसे ही लवारित छोड़ दी जाती हैं.

💥 *सरकार नही दे रही कोई ध्यान*

   सबसे बड़ी समस्या यह है की चूंकि गोवंश वोट नही डाल सकते हैं अतः इन सरकारों के लिए किसी प्रयोजन के नही हैं. जब समाज ही इन्हें नकार चुका है और वह भी हिन्दू बाहुल्य समाज तो फिर सरकार की बातें कौन करे. आज गोवंशों और पशुओं के लिए मारे मारे फिरने के अतिरिक्त और कोई दूसरा रास्ता नही दिख रहा है. मप्र सरकार ने गो संवर्धन बोर्ड का गठन तक करके रखा है लेकिन इसका भी कोई विशेष प्रभाव गोवंशों की सुरक्षा में नही दिख रहा है. गोवंशों को आज देखने वाला न कोई इंसान है और न ही भगवान. अभी कुछ ही दिनों में गोवंश प्रताड़ना का एक और भी वीभत्स रूप देखने को मिलने लगेगा जब किसान अपनी खेती की सुरक्षा के नाम पर अवैध बाड़ों में इन्हें ठूंस देंगे जहां पर न तो  इनके लिए कोई चारा पानी की समुचित व्यवस्था रहेगी और न ही कोई छत्र छाया. 

आज आवश्यकता है हमारे इस समाज को बैठकर सोचने की क्या भारतीय समाज जिंसमे कण कण में ईश्वर का वास बताया जाता है, हर जीव की आत्मा में परमात्मा का होना बताया जाता है, आज भारतीय संस्कृति में माता की उपमा प्राप्त गौमाता की क्या यही दुर्दशा होनी चाहिए?

💥 *संलग्न* - गंगेव रीवा मप्र में बीच बाजार में भारी वाहन की ठोकर खाकर मौत से घाट उतर चुकी गौमाता की मृत तस्वीर....

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🙏 *शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587*🙏

गोहत्यारों ने 8 माह की बछिया का तोड़ा पैर, घटना गढ़ थाना अंतर्गत मदरी ग्राम की (जिला रीवा मप्र)

रीवा मप्र,दिनाँक 11 जुलाई 2018 

   💥 थाना गढ़ अंतर्गत मदरी ग्राम में लगभग 8 माह की बछिया का पैर तोड़ दिया गया। मदरी पनगड़ी क्षेत्र में इस प्रकार की वारदात आज आम हो चुकी है जहां पर पशुक्रूरता निरंतर बढ़ती जा रही है। 

   💥 मदरी भठवा निवासी डॉक्टर अम्बिका द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता को जानकारी दी गई जिस पर हिनौती पशु औसधालय में कार्यरत समय लाल साहू को सूचित करने पर उन्होंने जाकर बछिया का इलाज किया। प्लास्टर पट्टी वगैरह किया। गाय का इलाज किया जा रहा है।

संलग्न - घटना की फ़ोटो संलग्न है।

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   *- शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता, रीवा मप्र 7869992139, 9589152587*

Saturday, June 30, 2018

किसानों की खेती के साथ फिर बढ़ जाएंगी गोप्रताड़ना, बनेंगे अवैध बाड़े, होगी पशु क्रूरता, शासन प्रशासन मौन, हिंदुत्ववादी संगठन बने रहेंगे तमाशबीन, मात्र होगी वोट बैंक की राजनीति, गोवंश न डाल पाएंगे वोट इसलिए नही सुनी जाएगी मूक बेजुबान की आवाज ( मामला देश प्रदेश में हो रहे पशु प्रताड़ना पर जहां मजबूर किसान खेती बचाने बनाते हैं अवैध बाड़े जहां घुट घुट कर मर जाते हैं मूक बेजुबान पशु)

दिनांक 30 जून 2018, गढ़, रीवा-मप्र,

(कैथा श्री हनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)

     आज जब हम सब किसान एक बार फिर खरीफ धान की खेती प्रारम्भ करने वाले हैं हममें से कुछ गोवंश और पशु प्रेमी किसान यह बात जरूर सोच रहे होंगे की अब इस वर्ष क्या होगा? क्या हमारी सारी धान की फसलें आवारा पशुओं द्वारा चर ली जाएंगी या यह बच पाएगी? क्या सरकार आवारा पशुओं के लिए व्यवस्था करेगी य यूं ही हमारे स्वयं के द्वारा आवारा छोंड़ दिए गए इन पशुओं से हमारी स्वयं की फसलें तबाह हो जाएंगी?

    शायद कुछ किसान अथवा गोवंश प्रेमी यह भी सोच रहे होंगे की एकबार फिर गायों की दुर्दशा देखने को मिलेगी जहां आवारा पशुओं को एकत्रित करके जबरन किसी बाड़े में ठूस दिया जाएगा जहां न तो इनके लिए चारा पानी की व्यवस्था होगी और न ही किसी छत्रछाया की. उन्ही अवैध रूप से ग्रामीणों द्वारा बनाये गए बाड़ों में यह बेजुबान पशु भूंख प्यास वर्षा सहते हुए कुछ सप्ताह अथवा महीनों में घुट घुट कर मर जाएंगे.

  आवारा पशुओं का क्या है समाधान 

    आज समाज और सरकार दोनो के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न यह है की समाज द्वारा आवारा छोंड़ दिए गए इन पशुओं का क्या समाधान है? इनको कौन पाले? कौन इनकी व्यवस्था करे? जब तक गायें दूध देती हैं तब तक दूध बहुत प्रिय है. हमे चाय तो दूधवाली चाहिए, बच्चों को भी देशी गाय का ही दूध चाहिए, साथ ही मठ्ठा, दही, लस्सी, घी, मख्खन पनीर सब कुछ चाहिए. परंतु जैसे ही गाय दूध देना बन्द कर देती है वैसे ही वह आजकल के फैशन में बूढ़े माँ-बाप की तरह बेकाम हो जाती हैं और उन्हें मरने के लिए छोंड़ देते हैं. आज भारतीय समाज में जिस प्रकार से वृद्धाश्रम और अनाथाश्रम बढ़ रहे हैं उसी प्रकार आवारा छोंड़ दिए गए गायों के लिए भी कुछ गिने चुने बचे हुए गोप्रेमी लोगों द्वारा मिलजुलकर अथवा सरकार पर दबाब डालकर और अधिक बड़ी गोशालाएं बनाई जानी चाहिए. आने वाला भारतीय समाज और भी आधुनिक होगा जहां पर पुरानी परंपराओं और रीति रिवाजों के लिए कोई विशेष जगह नही बचेगी. यदि परंपराएं बड़ी मुश्किल से चलेंगी भी तो मात्र औपचारिकता के रूप में.

   दशकों पूर्व थी पशुओं की अधिक उपयोगिता 

   आज गोवंशों के प्रति निरंतर हो रही क्रूरता और उपेक्षा के पीछे सबसे बड़ा कारण इनकी उपयोगिता का कम हो जाना है. शहरों में तो कभी भी दूध डेयरी के अतिरिक्त पशुपालन होता नही. कहें की हज़ारों में कोई एकाध गो प्रेमी हों जो अपने घर में एक गाय रखे हों वह अलग बात है. गायों और पशुओं की उपयोगिता सबसे अधिक ग्रामीण समाज में रहती थी. भारत में चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, इशाई हो या सिक्ख सभी धर्मों और सम्प्रदायों के ऐसे लोग जो ग्रामों में निवास करते थे और जिनके पास दो चार एकड़ अथवा अधिक की भूमि थी जब तक मशीन का ईजाद नही हुआ था तब तक अपने ग्रामों में पशुओं को पाल कर रखते थे. गाय से बैल उत्पन्न होता था और बैल हल में जोतने का कार्य करता था साथ ही गहाई मिजाई में भी काम आता था. पहले आज जैसे न तो मिटी का तेल पर्याप्त था और न ही गैस वगैरह अतः पशुओं से प्राप्त गोबर का प्रयोग ईंधन और खेत में उपयोग होने वाली खाद के रूप में किया जाता था.

मशीनीकरण और आधुनिकता है मुख्य वजह

   पर आज जब पशुओं से लेकर आदमी तक की जगह मशीनें और रोबोट लेने लगे हैं स्वाभाविक रूप से पशुओं के साथ साथ आदमी की भी उपयोगिता कम होती जा रही है. अतः आज के इस कलयुगी समाज में यदि किसी को भी सम्मान पूर्वक जीवित बने रहना है तो इस स्वार्थी समाज के किसी न किसी उपयोग में आना होगा. धर्म कर्म और संस्कार की आज बात करना लगभग फालतू हो चुका है. जो धर्म की बात करते हैं उन्हें पागल और साम्प्रदायिक कहते हैं और जो कर्तव्य की बात करते हैं उन्हें यह तथाकथित आधुनिक समाज मूर्ख और 18 वीं सदी का बताता है. अतः बहुत से लोग इसके चलते आधुनिकता और मशीनीकरण के दौर में वह सब अनर्थ करते जा रहे हैं और वही सब अनर्थ आज उनके संस्कार बनते जा रहे हैं.

  ट्रेक्टर, जेसीबी, थ्रेशर, और अन्य मशीनों ने पशुओं का कर दिया काम तमाम

   गाय को माँ कहना भूल जाईये, आज का कुछ आधुनिक समाज अपनी माँ को भी माँ कहने में झिझकता है. यदि माँ-बाप बूढ़े और ग्रामीण कम पढ़े लिखे हैं तो आज का तथाकथित मॉडर्न व्यक्ति उन्हें अपना नौकर अथवा गांव वाला कहकर इंट्रोड्यूस करता है. इससे बढ़कर विडंबना और क्या हो सकती है.

    गाय तो बहुत दूर की वस्तु है. गाय का देशी दूध सभी को चाहिए, दुग्ध उत्पाद सभी को चाहिए लेकिन गायों के प्रति संवेदनशील कोई नही होना चाहता. गाय के बच्चे अर्थात बैल को कोई देखना नही चाहता.

    जब तक बैल हलों में चलते थे और उपयोगी थे तब तक वह सभी के लिए महत्व के थे अब मशीनों के चलते उनका महत्व समाप्त हो चुका है.

  फिर बनेंगे अवैध बाड़े, फिर बढ़ेगी पशु क्रूरता

     खरीफ वर्ष 2018 की फसल के साथ ही आवारा छोंड़ दिए गए गोवंशों की प्रताड़ना फिर बढ़ने वाली हैं. जगह जगह गांव गांव में किसानों काश्तकारों की लाठियां और डंडे के साथ साथ टांगा और कुल्हाड़ी खाते हुए यह गोवंश घायल अवस्था में भूंखे प्याशे फिर मरेंगे, गांव गांव इनके लिए नाज़ी युग में यहूदियों के लिए बनाये गए गैस चैम्बर और डिटेंशन कैम्प की तरह बांस बल्ली और कटीले तारों के बनाये गए अवैध बाड़ें होंगे जहां इन्हें अपर्याप्त व्यवस्था के साथ रखा जाएगा. न तो वहां पर कोई किसी प्रकार की छाया होगी और न ही पैरा भूषा की. ऐसे में कुछ दिनों बाद यह पशु प्रताड़ित होकर मरेंगे यही इनकी किस्मत में हर वर्ष लिखा रहता है. 

  जनकहाई और गदही के गो अभ्यारण्य का क्या हुआ?

    सिरमौर क्षेत्र रीवा में पिछले कई वर्षों से गोवंश प्रताड़ना के केस सामने आये हैं जिनमे सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा पशुओं के साथ हो रही क्रूरता को सोशल मीडिया एवं मीडिया के माध्यम से निरंतर उठाया जाता रहा है साथ ही ऐसे दर्जनों प्रकरणों में पूरे सबूत के साथ घटनास्थल पर जाकर उच्चधिकारियों द्वारा कार्यवाही भी करवाई गई है, अवैध बाड़े तोड़वाकर पशुओं को आज़ाद करवाया गया है, उनकी जाने बचाई गई हैं और साथ ही दोषियों को दंडित करवाने का भी प्रयाश किया गया है.

      पिछले वर्षों समाजिक कार्यकर्ता के इन्ही प्रयाशों के चलते रीवा ज़िले में गोअभ्यारण्य बनाये जाने की पहल की गई हैं जिनमे जनकहाई में प्रपोजल का डीपीआर हुआ था और साथ ही हिनौती के गदही में हज़ार एकड़ से अधिक शासकीय भूभाग में भी गोअभ्यारण्य बनाये जाने के लिए प्रपोजल ज़िला कलेक्टर रीवा एवं केंद्रीय मंत्रालय के निर्देश पर एसडीएम केपी पांडेय की जांच के दौरान उठा था. लेकिन जनकहाई एवं गदही के प्रपोजल का क्या हुआ इसकी कोई जानकारी नही है. एकबार फिर अकस्मात शासन चौंक पड़ेगा जब नित नए रोज गोप्रताड़ना के किस्से सोशल मीडिया एवं मीडिया में छाए रहेंगे.

   गदही में गो अभयारण्य बनाया जाना अति आवश्यक

    यदि गढ़ थाना क्षेत्र में गोवंश प्रताड़ना पर रोक लगाना है तो या की ऐसा कृत्य करने वालों के ऊपर सीधे एफआईआर दर्ज हो अथवा गोवंशों की समुचित व्यवस्था की जाए जिससे किसानों की फसल नुकसानी पर रोक लगे. उसके लिए आवश्यक है की गंगेव ब्लॉक एवं सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाला गदही ग्राम पर हज़ार एकड़ से अधिक के शासकीय भूभाग पर गोअभ्यारण्य बनाया जाए.

गो अभ्यारण्य से स्थापित होगा उद्योग

   यदि थाना गढ़ क्षेत्र एवं सिरमौर तहसील के अन्तर्गत आने वाले गदही ग्राम के शासकीय राजस्व के भूभाग में गो अभ्यारण्य बनाये जाने की पहल शासन प्रशासन करता है तो इससे न केवल गोवंशों की सुरक्षा होगी बल्कि गोवंश जनित उद्योग की भी एक प्रकार से स्थापना हो जाएगी. गोवंशों के गोबर से जैविक खाद, गोबर की खाद, गोबर गैस, गोमूत्र से दवा का निर्माण, पंचगव्य का निर्माण, दूध से दुग्ध उत्पाद आधारित सामग्री आदि का निर्माण किया जाकर कई लोगों को इस रोजगार से भी जोड़ा जा सकता है.

गोहत्या पर सीधी हो फांसी की सजा का प्रावधान 

    वास्तव में जब तक गाय को संरक्षित राष्ट्रीय पशु की संज्ञा में नही लाया जाता तब तक गाय की रक्षा सुरक्षा हो पाना काफी मुश्किल बात है.  सबसे पहले सरकार को चाहिए देश से बीफ उत्पाद के निर्यात पर पूरी तरह से बैन लगा देना चाहिए. साथ ही जानबूझकर गाय की हत्या करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा और यहां तक की फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए. 

कैसे बढ़ाई जाए गोवंशों की उपयोगिता

    आज तथाकथित आधुनिक मॉडर्न समाज में गाय की उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लग चुका है. गोवंश की उपयोगिता मात्र दूध खाने तक ही सीमित रह गई है. आज न तो हल में बैल की जरूरत है न ही बैलगाड़ी में, इसी प्रकार कोल्हू में भी बैल नही लगता, मिजाई, गहाई, दमरी आदि में बैल की उपयोगिता समाप्त हो चुकी है अतः यह आवश्यक है की बूढ़े और कमजोर हो चुके बैलों से लेकर सभी प्रकार के गोवंशों की उपयोगिता पर पुनर्विचार किया जाए. 

   कृत्रिम और रासायनिक खादों से बढ़ रही बीमारियां, समाप्त हो रही उर्वराशक्ति

   कृत्रिम और रासायनिक खादों के उपयोग से बीमारियां बढ़ रही हैं और साथ ही जमीन की उर्वराशक्ति भी समाप्त होती जा रही है जिससे वैज्ञानिकों द्वारा निरंतर जैविक खेती पर बल दिया जा रहा है. जैविक खेती करने के लिए सरकारें भी प्रोत्साहित कर सब्सिडी दे रही हैं लेकिन अभी भी हरित क्रांति के बाद से इतना अधिक रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाने लगा है की जैविक और गोबर की खाद के विषय में कोई सोच ही नही रहा है. अब जब इस प्रदूषित खान पान और केमिकल से नित नई बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं ऐसे में वैज्ञानिक और डॉक्टर भी चिंतित हो रहे हैं की ऐसे में उत्पादन से अधिक सरकार का खर्च तो बीमारियों के इलाज में खर्च हो रहा है ऐसे में वैज्ञानिक और सरकारें कम से कम रासायनिक खाद के प्रयोग पर बल दे रही हैं साथ ही जैविक खाद और जैविक खेती का प्रचार प्रसार कर रही हैं. यह बात तो आज आम है की हरित क्रांति के बाद ज्यादा उत्पादन की होड़ में हो रही बेतरतीब रासायनिक खाद के प्रयोग से हमारी इतनी उर्वर धरती भी बंजर होकर रेगिस्तान में बदलती जा रही है. शायद इस विषय में आम किसान और नागरिक आज विचार न कर रहा होगा परंतु जब तक विचार करेगा शायद तब तक काफी देर हो चुकी होगी अतः आज आवश्यकता है एकबार पुनः वैदिक खेती की जिंसमे न तो जीवों की हत्या होती और न ही गोवंशों की. इन्ही गोवंशों के सहारे अधिक से आधिक उत्पादन प्राप्त कर लाभ कमाया जाकर जीवन यापन किया जा सकता है. हाँ एक बात जरूर है की गोवंशों और पशु आधारिक वैदिक खेती में एक व्यक्ति को फुलटाइम समय देना पड़ता है जिंसमे माल मवेशियों की देखभाल से लेकर खेती किसानी करना. परंतु चूंकि आज के इस भागते दौड़ते जीवन में किसी को समय ही नही है अतः हर कोई चाहता है की ट्रेक्टर से 2 घंटे में जोतबोकर फुरसत हुआ जाए और जाकर आगे का पैसा कमाया जाए, क्यो पूरा समय खेती किसानी के ही चक्कर में पड़ा रहा जाए. 

दोषारोपण बन्द कर समस्या का निकले मानवीय समाधान 

    इस प्रकार इस विश्लेषण से यह भलीभांति समझा जा सकता है की गोवंशों की उपयोगिता इस मसीनी युग में ढूंढ पाना एक टेढ़ी खीर ही है. ऐसे में तो बस यही लगता है की आने वाले समय में कहीं इन गोवंशों की और अधिक दुर्दशा न बढ़े. आखिर किसी भी प्रकार के वृहद और सर्वांगीड़ परिवर्तन के लिए पूरे देश और समाज को सामने आना पड़ेगा, इसका रास्ता ढूंढना पड़ेगा अन्यथा समाज का सरकार को दोष देना और सरकार का समाज को दोष देने का सिलसिला चलता रहेगा और गोवंशों की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जाएगी. 

संलग्न - संलग्न चित्र में देखा जा सकता है रीवा ज़िले में गर्मियों के समय ऐरा चरते हुए मवेशी जो अभी कुछ सप्ताह बाद अवैध बाड़ों में ठूस दिए जाएंगे और अपने जीवन के अंतिम दिन गिनना प्रारम्भ कर देंगे.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Thursday, January 18, 2018

Rewa, MP - (पशु क्रूरता) पनगड़ी ग्राम में फिर दिखी पशु क्रूरता, मवेशियों के तार से मुह पैर बांध कर छोड़ा।

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दिनांक 19 जनवरी 2018, स्थान भठवा, गढ़ रीवा मप्र।

(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र) ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले पनगड़ी बीट के भलघटी पहाड़  मे सैकड़ों मवेशियों को जीवित घाट के नीचे धकेले फेंके जाने का मामला अभी ज्यादा पुराना नही हुआ है, इसी पनगड़ी क्षेत्र में गोहत्यारों द्वारा फिर बेजुबान पशुओं के साथ अमानवीय और पाशविक क्रूरता का मामला प्रकाश में आया है। 

      पनगड़ी क्षेत्र से मिली जानकारी अनुसार भठवा निवासी पत्रकार प्रमोद सिंह द्वारा अपने फेसबुक और व्हाट्सएप्प के जरिये मुह पैर बुरी तरह बधे हुए मवेशियों के फोटो और वीडियो शेयर किए गए हैं जिसमे उनके द्वारा ग्रामीणों के सहयोग से मुह पैर खोलकर मवेशियों को आज़ाद किया गया

       वास्तव में देखा जाय तो इस प्रकार की घटना कोई नई नही है। पूरे रीवा जिले से जगह जगह गोवंशों के साथ निरंतर क्रूरता के प्रकरण सामने आ रहे हैं जिसके संदर्भ में देश भर में पशु अधिकारों के लिए कार्य करने वाली विभिन्न संस्थाओं जैसे श्रीमती मेनका गांधी का पीपल फ़ॉर एनिमल्, ध्यान फाउंडेशन, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया सहित अन्य संस्थान इस प्रकार की पशु क्रूरता बंद किये जाने और दोषियों के ऊपर वैधानिक कार्यवाही किये जाने के लिए निरंतर प्रयाशरत हैं। सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा ज़िले के समय समय पर पशु क्रूरता के प्रकरण उक्त सभी संस्थानों को सूचित किये जाते रहे हैं।

        सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि पिछले कई वर्षों से पशुओं के साथ क्रूरता बढ़ती जा रही है लेकिन ज़िला एवं प्रदेश के शासन प्रशासन द्वारा अब तक कोई सार्थक कार्यवाही नही की गई है।

      ज़िला प्रशासन पशु क्रूरता रोक पाने और दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही करवा पाने में पूरी तरह अक्षम साबित हुआ है। प्रदेश और ज़िले में बने गोसंवर्धन बोर्ड मात्र औपचारिक बोर्ड हैं जिसमे पशुओं की देखभाल और सुरक्षा के लिए आने वाले करोड़ों का बन्दरवाट कर लिया जाता है और कोई भी कार्य नही किये जा रहे हैं।

     प्रश्न यह भी उठता है कि प्रदेश सरकार द्वारा गोवंशों की रक्षा सुरक्षा के लिए बनाये गए इतने अधिनियमों के वावजूद भी आज मवेशियों की इतनी अधिक दुर्दशा क्यों है?

संलग्न - कृपया संलग्न फ़ोटो में देखें किस प्रकार सिरमौर वन परिक्षेत्र और तहसील अंतर्गत आने वाले पनगड़ी ग्राम में गोवंशों का मुँह पैर बांध कर छोड़ दिया जाता है।

   - शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता रीवा मप्र। 7869992139।

Saturday, February 25, 2017

(Rewa, MP) श्रीमती मेनका गाँधी जी का कलेक्टर रीवा को अल्टीमेटम – तत्काल जांच कर करो कार्यवाही


दिनांक – 26/02/2017
स्थान –  (रीवा, मप्र)


अवैध बाड़ों में गौवंशों की करुण पुकार पहुची दिल्ली तक - श्रीमती मेनका गाँधी जी के आदेश पर कलेक्टर ने गठित की एसडीएम और डिप्टी डायरेक्टर पशु चिकित्सा विभाग की संयुक्त टीम

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) दिनांक 24 फरवरी महाशिरात्रि के दिन भगवान् शिव के वाहक नंदी की माता श्री गौमाता की अवैध बाड़ों में हो रही हत्याओं की करुण पुकार जब श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय नई दिल्ली तक पहुची तो वहां से कलेक्टर रीवा को फ़ोन कर तत्काल पुनः एक जांच टीम का गठन कर संयुक्त टीम में एसडीएम मनगवां के पी पाण्डेय और डिप्टी डायरेक्टर पशु-चिकित्सा विभाग रीवा को सम्बंधित अमलों के साथ भेज दिया गया. जांच के दौरान आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को भी मोबाइल फ़ोन के माध्यम से कॉल करके घटना स्थल पर हिनौती के पास पाण्डेय ढाबा में बुलवाया गया.

श्रीमती मेनका गाँधी जी का कलेक्टर रीवा को अल्टीमेटम – तत्काल जांच कर करो कार्यवाही

जाँच के दौरान एस डी एम के पी पाण्डेय द्वारा बताया गया की यह जांच टीम केन्द्रीय मंत्री एवं पशु कल्याण विभाग की अध्यक्ष श्रीमती मेनका गाँधी जी सहित दर्ज़नों विभागों को एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा भेजे गए दर्ज़नों ईमेल जिसमे की थाना गढ़ अंतर्गत हिनौती, सोनवर्षा, हर्दी-अटरिया, लौरी, गंतीरा-कटरा, एवं लोटनी के अवैध बाड़ों की फोटो विडियो सहित सबूत के तौर पर भेजे गए साक्ष्यों पर कार्यवाही के फलस्वरूप है. श्रीमती मेनका गाँधी जी सहित अन्य विभागों को भेजे गए साक्ष्यों फोटो, विडियो आदि में दिखाए गए इंटरव्यू आदि में कई दर्ज़नों गायें बाड़ों में भूंख प्यास से बिना किसी छत्र-छाया के मृत पाए गए थे.  
   इस जांच के विषय में आवेदक को भी श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय से प्राप्त ईमेल में यह जानकारी भेजी गयी थी की गौवंशों के प्रति हो रही प्रताड़ना के विषय में कलेक्टर से भी मैडम की बात की गयी थी जिसके फलस्वरूप कलेक्टर ने दो सदस्यीय टीम का गठन किया था और तीन दिवश के अन्दर जांच प्रतिवेदन मागा था. 

गौ-अभयारण्य के लिए 1300 एकड़ से अधिक का शासकीय भूभाग उपलब्ध

    इस प्रकार दिनांक 24 फरवरी महाशिवरात्रि के दिन जांच हुई और जांच के दौरान आवेदक को भी घटनास्थल पर बुलाया गया. जांच में आवेदक से गौवंशों के प्रताड़ना में किये गए कार्य के विषय में जानकारी चाही गयी. आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता ने गौवंशों की सुरक्षा के लिए देश के उच्चतम कार्यालयों तक भेजे गए अपनी मांग और आवेदन जिसमे की सिरमौर तहसील अंतर्गत हिनौती हल्का 39 के गदही नामक स्थान में 1300 एकड़ से अधिक के शासकीय भूभाग में गौ-अभयारण्य बनाए जाने की बात कही गयी है, इस बात से भी कलेक्टर रीवा द्वारा भेजे गए दो सदस्यीय जांच दल को अवगत कराया गया. इस बीच आवेदक द्वारा कलेक्टर रीवा, पशुपालन एवं पशुसंवर्धन विभाग भोपाल, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया चेन्नई, चीफ सेक्रेटरी मप्र शासन भोपाल, एवं डीजीपी भोपाल मप्र शासन को भी भेजे गए विभिन्न आवेदनों की प्रतिलियाँ सौंपीं.

हिनौती हल्का के गदही में गौ अभयारण्य बनाया जाना
गौवंशों के लिए साबित होगी एक नवनीत पहल

     इस प्रकार जांच लगभग दो घंटे के आसपास चली जिसमे आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता की भी बाड़ों के विषय में मंशा चाही गयी. इस पर सामाजिक कार्यकर्ता का स्पष्ट कहना था की ऐसे निराकरण निकाले जाने चाहिये जिसमे पशुओं के साथ क्रूरता भी न हो और साथ ही किसानों को भी नुकसान न हो. इस प्रकार तात्कालिक रूप से सभी अवैध बाड़ों में कैद पशुओं को सर्वप्रथम जिले एवं प्रदेश की गौशालाओं में पहुचाया जाना चाहिए जहाँ पर इनका इलाज़ एवं पोषण होना चाहिए जिससे अत्यंत कमज़ोर हो चुके गौवंशों की जाने बचाई जा सके और साथ ही भविष्य में गौवंशों की प्रताड़ना को रोकने और किसानों के हित की रक्षा के लिए हिनौती हल्का 39 के गदही नामक ग्राम/स्थान पर 1300 एकड़ से अधिक के शासकीय और अनुपयोगी भूभाग पर विशाल गौ अभयारण्य बनाया जाना चाहिए. ऐसा बनाया जाने वाला अभयारण्य न सिर्फ गौवंशों की सुरक्षा, पालन, पोषण एवं इलाज़ के लिए एक नवनीत पहल होगी बल्कि इस प्रकार बने गौ अभयारण्य से बायो-खाद उत्पादन, बायो-कीटनाशक, दुग्ध उत्पाद, एवं रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी जिससे लगातार रासायनिक खादों, एवं कीट नाशकों के हो रहे निरंतर प्रयोग से बंजर पड़ चुकी धरती से की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी.

सभी जांचें मात्र कागजों पर - यथार्थ में अब तक कहीं कुछ भी नहीं

वहरहाल जब तक इन पशुओं के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की जाती तब तक यह सभी जांचें मात्र कागजों पर ही सीमित रह जाएँगी. यह कोई अकेली जांच नहीं है जो आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के प्रयासों से हो रही है. इसके पहले भी लगभग हर माह उच्चस्तरीय दो तीन जांचें होती रही हैं परन्तु कोई भी जांच का अब तक सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल पाया है. सभी अवैध बाड़े ज्यों के त्यों अपने स्थानों पर बने हुए हैं और उनमे कैद गौवंशों की निरंतर मौतें जारी हैं. मानकों की बात तो छोंड ही दें, इन मूक बेजुवान पशुओं के लिए न कोई चारा, न कोई भूषा, न ही किसी समुचित छाया की व्यवस्था बनाई गयी है. स्थिति इतनी दुखदायी है की आँखों से अंशु प्रवाहित हो चलें. शायद भगवान् के अतिरिक्त इस धरती पर इन मूक बेजुवानों की दुर्दशा को देखने सुनने वाला कोई नहीं बचा है. और जहाँ तक भगवान् का प्रश्न है तो शायद उसने तो इन पशुओं को इस पशुविक योनी में ही इसलिए कलयुग में भेजा है की के यह इसी तरह अपने पूर्व जन्मों के कर्म संस्कारों का बुरा फल भोगें. जहाँ तक मानव द्वारा इनकी निरंतर की जा रही प्रताड़ना का प्रश्न है तो कहना यह होगा की मानव अपने कुकर्मों और दुष्कर्मों से भारतीय संस्कृति के हिन्दू धर्म के अनुसार यह सब गौहत्या आदि घृणित कृत्या करके अपने जन्मों को और अधिक विगाड़ रहा है. जिस हिन्दू सनातन संस्कृति में गौवंशों की पूजा माता समझ कर की जाती रही है उसकी यदि आज यह दुर्दशा है तो यह सम्पूर्ण भारतीय इतिहास के स्वर्ण पन्नों पर घोर कालिख तो है ही इन मानव के रूप में राक्षसों की भी अंतिम स्थिति को ही दर्शाता है. संभवतः मानव का पतन इस कलयुग में इससे अधिक और कितना हो पायेगा यह देखना होगा. शास्त्रों में तो यह भी कहा गया है कि गौमांस भक्षण और जीव हत्या के साथ ऐसा भी समय आएगा जब यह पतित मानव स्वयं मानव की ही मांस भक्षण प्रारंभ कर देगा. कैनिबल अर्थात मानव-मांस भक्षी होकर व्यक्ति स्वयं शास्त्रों में वर्णित राक्षस हो जायेगा. फिर इस धरती पर दस मुख, बीस हाँथ आदि वाले राक्षस ढूँढने की जरूरत किम्व्दंतियों में न पड़ेगी सब कुछ साक्षात् ही दिखने लगेगा.

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Sincerely Yours,
Shivanand Dwivedi
(Social, Environmental, RTI and Human Rights Activists)
Village - Kaitha, Post - Amiliya, Police Station - Garh,
Tehsil - Mangawan, District - Rewa (MP)
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Thursday, February 16, 2017

(Rewa, MP) जिले भर के अवैध बाड़ों में गौवंशों के मौत का खेल बदस्तूर जारी - शासन-प्रशासन सोया चिरनिद्रा


दिनांक: 16/02/2017, स्थान: रीवा मप्र


दिनांक 15 फरवरी को हिनौती पंचायत के पाण्डेय ढाबा के पास बने अवैध बाड़े में भूंख प्यास से हुई कुछ और गौवंश की मौत

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) गौवंशों के लिए जिले में बनाए गए अवैध बाड़ों में स्थितियां सुधरने की कगार पर बिलकुल ही नहीं दिखतीं. कारण स्पष्ट है की जब तक इन अवैध बाड़ों को नष्ट ध्वस्त का हटाया नहीं जाएगा तो भला स्थितियां क्या अपने आप ही सुधर जाएँगी?
आये दिन रोज़ जिले के सभी अवैध बाड़ों में बिना चारा पानी, भूषा, और छाया के बेजुबान गौवंशों की तड़प-तड़प कर मौत का शिलसिला निरन्तर जारी है जिसे देखने वाला न तो कोई शासन प्रशासन है और न ही कोई समाज और उसके ठेकेदार. आज स्थिति यह हो चुकी है की गौवंशों के लिए तथाकथित फसल सुरक्षा के नाम पर बनाए गए यह अवैध बाड़े किसी बूचड़ खाने से ज्यादा भयावह स्थिति में नज़र में आते हैं. जिस प्रकार विश्व युध्य के दौरान यूरोप में नाजियों और उनके समर्थकों के द्वारा यहूदियों को प्रताड़ित करने और मारने के उद्येश्य से घेटो और गैस-कैंप बनाये गए थे जहाँ यहूदियों को मरने के लिए छोंड दिया जाता था, ठीक उसी तरह पूरे रीवा जिले और यहाँ तक की प्रदेश में जगह-जगह पर अवैध तरीके से कानून को ताक पर रखकर अवैध बाड़े बनाए गए हैं जिनमे किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था न तो इस समाज और न ही शासन-प्रशासन द्वारा की गयी है लिहाज़ा रोज़ ही गौवंश भूंख प्याश से तड़प-तड़प कर मर रहे हैं और इस आस ए हैं की शायद कोई तो आकर इन्हें बचाए. पर भला इस कलयुग में अब कृष्ण कहाँ जो आततायियों को अपने चक्र सुदर्शन से छड़ों में नष्ट कर देते और धर्म की पुनः स्थापना करते. पर भले ही कृष्ण सदेंह न हों पर भारत का संविधान तो है जिसमे इन पशुओं को भी कुछ तो अधिकार प्राप्त हैं जो कानूनी तौर पर लागू होने चाहिए. अब प्रश्न यह उठता है की इन अधिकारों को इन कानूनों को लागू तो शासन प्रशासन को ही करवाना है न?

यह कोई पहली बार नहीं है की मीडिया में गौवंशों की प्रताड़ना की बाते आ रही हैं. पिछले कई महीनों से ठण्ड प्रारंभ होते ही नवम्बर माह से लगातार अवैध बाड़ों में मरने वाले मवेशियों की खबरें मीडिया में निरन्तर आती रही हैं और कई बार ईमेल, लिखित, मोबाइल, दूसरे कम्युनिकेशन के माध्यम से शासन-प्रशासन के समक्ष रखी गयीं थी परन्तु मजाल क्या है की सिर्फ कागज़ी घोड़ों के अतिरिक्त इस देश-प्रदेश के शासन-प्रशासन के कान तक जूं भी रेंग पाई हो.
दुर्भाग्य है इस देश और समाज का की जिन गौवंशों का सरोकार सीधे भारतीय संस्कृति से हैं आज भारतीय जनता पार्टी जैसे अपने आपको हिन्दूवादी पार्टी बताने वाली पार्टी और अन्य दुनिया भर के हिंदूवादी संगठन और यह सरकार गौवंशों के लिए क्या कुछ कर रही है आज यह पूरे समाज में विदित हो चुका है. श्री शिवराज सिंह चौहान और श्री नरेंद्र मोदी जी कृपया देखने का कष्ट करें की क्या आपकी पार्टी के शासन काल में गौवंशों की यही दुर्दशा होगी? देखना यह भी होगा की कहीं इन बेजुबान गौवंशों पर हो रही राजनीति से यह तथाकथित हिंदूवादी संगठन और पार्टियाँ गौवंशों के श्राप से भस्मीभूत होकर सदैव के लिए ही न विलुप्त हो जाएँ. क्योंकि यदि ह्रदय और इमानदारी से गौवंशों की सुरक्षा के लिए प्रयास न किये गए तो ईश्वर भी इन्हें माफ़ न कर पायेगा.      


संलग्न – हिनौती के पास बनाए गए अवैध बाड़े के पास कल दिनांक 15 फरवरी को मृत पड़े कुछ मवेशी और साथ में बिना किसी चारा पानी के कमज़ोर और मरने की कगार पर अन्य गौवंश के छायाचित्र.


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Shivanand Dwivedi
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Wednesday, February 8, 2017

(Rewa, MP) हिनौती के पास बने अवैध बाड़े में एकसाथ फिर मरीं दर्ज़न भर गायें



हिनौती के पास बने अवैध बाड़े में एकसाथ फिर मरीं दर्ज़न भर गायें

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) सुबह यूँ तो सैर के लिए कई लोग जाते हैं पर कभी कुछ उद्येश्य लेकर चलने में दोनों कार्य सफल हो सकते हैं. एक तो सैर का आनन्द मिलता है दूसरा अन्य कार्य भी लगे हाथ हो जाता है. पर कुछ कार्य ऐसे होते हैं जहाँ आनंद तो कम और दुःख-दर्द ज्यादा महसूस होता है.

मामला है गंगेव ब्लाक अंतर्गत आने वाली हिनौती ग्राम पंचायत का जहाँ ग्राम हिनौती के पास कैथा मोड़ में पाण्डेय ढाबा के पास बनाये गए अवैध बाड़े में दिनांक 07 फरवरी की सुबह लगभग सात बजे बाड़े में एकसाथ दर्जन भर गौवंश मृत पाए गए जिसका की घटना स्थल पर पहुच कर विडियो और फोटो भी लिया गया जो की संलग्न है. मामला पूरा दिल दहला देने वाला था जिसमे चार छोटे बछड़े तो एकसाथ मौत के घाट उतर गए. यह स्पस्ट नहीं हो पाया की बछड़ों की मौत किस कारण से हुई. क्योंकि एकसाथ इतने अधिक गौवंशों का मरना स्वाभाविक रूप से संदेह प्रकट कर्ता है. कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है की इन्हें यूरिया अथवा दूसरे पेस्टिसाइड देकर मारा जा रहा है.

घटना की जानकारी गढ़ थाना प्रभारी बी आर सिंह सहित डायल 100 को

 उक्त गौवंशों के मरने की जानकारी पुनः एक बार गढ़ थाना प्रभारी बी आर सिंह को दे दी गयी. साथ ही घटना को मध्य प्रदेश शासन की डायल 100 सेवा एवं आपातकाल पुलिश व्यवस्था को भी दे दी गयी परन्तु दोनों ही जगहों से आश्वाशन के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ. गौवंश प्रताड़ना सम्बन्धी घटना की डायल 100 में सूचना क्र. P17038001580 है जो की दिनांक 07 फरवरी को सुबह 07:32:30 बजे दर्ज कराई गयी है. थाने वालों के लिए तो यह आम बात हो गयी है. चाहे कोई कितना भी डायल 100 में कंप्लेंट करे कोई फर्क नहीं पड़ता साथ ही गढ़ थाना प्रभारी भी गौवंशों वाले मामले में अपना हाँथ सकेलते ही नज़र आये. क्योंकि अब तक जितने भी पशु क्रूरता के प्रकरण सामने आये हैं उन सबमे कोई विशेष कार्यवाही दोषिओं के ऊपर नहीं हो पाई है. जबकि देखा जाए तो आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा स्वयं ही इस प्रकरण में कई लिखित आवेदन प्रस्तुत किये जा चुके हैं. यद्यपि इनमे क्या कार्यवाही हुई इस पर आर टी आई लगाना बांकी है.   

मप्र एवं भारत के पशु सुरक्षा और पशु क्रूरता सम्बन्धी सभी अधिनियम धराशायी

कहने को तो पशुओं और गौवंशों की सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हैं पर देखना होगा की उन नियमों का पालन क्या कहीं भी पूरे मप्र में सही तरीके से हो पा रहा है. मप्र में विशेष तौर पर गौवंश प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक वर्ष 2010/12 में पारित किया गया जिसमे गौवंशों के वध पर और प्रताड़ना पर पांच हज़ार तक का जुर्माना और अधिकतम सात साल के कैद का प्रावधान है और यह अपराध संज्ञेय भी है साथ ही आरोपी को अपने आप को दोषमुक्त सिद्ध करना पड़ेगा ऐसा प्रावधान है. इसी प्रकार पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत भी कई प्रावधान हैं जिन्हें यदि कड़ाई से लगाया जाये तो पशुओं और गौवंशों के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता काफी हद तक बंद की जा सकती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के अंतर्गत भी पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही करने का प्रावधान है.

गौवंशों और बेजुबान पशुओं के साथ क्रूरता मानवीय संवेदनाओं के अंत का द्योतक

      यह भारतीय संस्कृति का दुर्भाग्य है की आज मात्र गौवंशों और पशुओं की सुरक्षा के लिए भी राजनीति की जा रही है. अब कम से कम आम जनता के समक्ष यह बात भली-भांति स्पष्ट हो जाएगी की क्या यह राजनीतिक पार्टियाँ मात्र मानवीय संवेदनायों को आधार बनाकर ही तो राजनीतिक लाभ ले रही हैं. न ही इन्हें गौवंशों की सुरक्षा से कोई लेना देना है और न ही आम किसान और आम जनता से.
      यह बात सत्य है की आवारा पशुओं से आज हर एक किसान और कास्तकार त्रस्त है परेशान है पर प्रश्न यह भी है की क्या आवारा पशुओं और गौवंशों को अवैध रूप से बनाये गए बिना किसी उचित व्यवस्था के बांडो में चारा, पानी, भूसा, छत बिना कड़ाके की ठण्ड में तड़पने मरने के लिए छोंड देने से किसानों की समस्या का समाधान हो जायेगा? किसान यह कैसे भूल सकता है की यही गौवंश हैं जिनके दूध, दही, घी, और दुग्ध उत्पाद खा पीकर वह पला बढ़ा है और उसके बाल बच्चे इन्ही गौवंशों के दुग्ध उत्पाद से पल बढ़ रहे हैं. क्या हर सुबह जब हम एक कप चाय पीते हैं तो इस बात का एहसास नहीं करते की इस चाय में डाला गया दूध किसी
 दुधारू पशु से ही प्राप्त हुआ होगा?
    
      आखिर इन गौधनों की इतनी बड़ी दुर्दशा क्यों? क्या यही हमारे ग्रामीण किसान भाई हर एक ग्राम पंचायत में स्वयमेव ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकते कि एक-दो पशु सभी लोग अपने घरों में बाँध लें और अन्य पशुओं की तरह ही इनकी भी व्यवस्था बना लें?

पशु और गौवंश न होने पर प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ेगा प्रतिकूल असर
    
      आज अज्ञानता अथवा हेकड़ी बस भले ही किसानों और भारतीयों को यह बात समझ न आ रही हो पर यह बात तय है की यदि गौवंश और पशुधन न रहेंगे तो पूरी भूमि बंजर हो जाएगी. प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जायेगा. उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. शांस लेने के लिए हवा न मिलेगी और पीने के लिये पानी नहीं होगा. ऐसा समय आयेगा की मानवता एक-एक दाने के लिए तरस जाएगी. क्योंकि आज विज्ञान भी इस बात को मान रहा है की रासायनिक खादों के हो रहे निरंतर प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति कमजोर पड़ रही है जिससे हर वर्ष भूमि में पिछले वर्षों की तुलना में अधिक उर्वरक और रासायनिक तत्वों का प्रयोग करना पड़ रहा है. आज कृषि विज्ञान जो गोबर अथवा बायो-खाद और बायो-उत्पाद की निरंतर बात कर रहा है वह इसी वजह से कर रहा है कि लगातार बढ़ रही मानवीय आवादी के पालन-पोषण के लिए निरंतर बंजर हो रही भूमि की उर्वरा शक्ति कैसे बढ़ाई जाए.
     
प्रदेश के हर जिले में कलेक्टर के संज्ञान में है पशुपालन एवं पशु संवर्धन समिति
     
      जिला स्तरीय समितियों की यदि बात किया जाए तो गौधन और पशुधन के पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के हर जिले में विशेष निगरानी समितियों का गठन होता है जो सदैव जिला कलेक्टर के संज्ञान में रहता है. जिला कलेक्टर यदि चाहे तो या की मनरेगा की उप योजना अंतर्गत अथवा पशुपालन विभाग द्वारा तीन-चार पंचायतों के बीच में आवारा गौवंशों की सुरक्षा और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए बजट का आवंटन करवा कर इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान कर सकता है. परन्तु यह सब इच्छाशक्ति और योजनायों के सही क्रियान्वयन पर निर्भर करता है. आज यह जिले में भली भांति विदित है की पशु चिकित्सा विभाग की मदद से कई पंचायतों में गौ संवर्धन केंद्र बनाने बाबत बजट दिया गया था परन्तु वह सब भ्रष्ट्राचार की बलि चढ़ गया. क्या यह सब देखने वाला कोई नहीं है? आखिर क्या जिला कलेक्टर के संज्ञान में यह बातें नहीं हैं? क्या किसानों की आवारा पशुओं सम्बन्धी समस्या जो किसी न किसी माध्यम से रोज ही मीडिया में छाई रहती है जिला प्रशासन अथवा प्रदेश स्तर पर ज्ञात नहीं है? सबको सब कुछ ज्ञात है, मात्र आवश्यकता है उसके सही क्रियान्वयन की और समस्या के उचित निराकरण की. 


संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.


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