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Sunday, January 3, 2021

MP//Rewa//Bhopal सूचना का अधिकार एक सत्याग्रह का साधन है - RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग // RTI में महिला सहभागिता विषय पर 28 वें ज़ूम मीटिंग वेबीनार का हुआ आयोजन // राहुल सिंह ने महिला आवेदकों को दिया नए साल की व्यवस्था - अब मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिए जीआरडी डेस्क पर सूचना आयोग करेगा तत्काल सुनवाई

दिनाँक 03 जनवरी 2021 रीवा मप्र

    सूचना का अधिकार और महिला सहभागिता विषय पर 28वें राष्ट्रीय ज़ूम मीटिंग वेबीनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु, माहिती अधिकार गुजरात पहल संस्था की संस्थापक एवं आरटीआई हेल्पलाइन प्रारंभ करने वाली आरटीआई एक्टिविस्ट पंक्ति जोग, उत्तराखंड से आरटीआई एक्टिविस्ट विभा नामदेव सहित दर्जनों आरटीआई एक्टिविस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता, सिविल राइट्स एक्टिविस्ट आदि सम्मिलित हुए। 


    मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश आदि प्रदेशों से दर्जनों एक्टिविस्टों ने कार्यक्रम में भाग लिया और विषय पर अपने विचार रखें तथा समस्याओं का समाधान पाया।

  कार्यक्रम का संयोजन समन्वयक एवं प्रबंधन का कार्य आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी, अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद मिश्रा, शिवेंद्र मिश्रा, अंबुज पांडे के द्वारा किया गया।

   सूचना का अधिकार एक सत्याग्रह का साधन है - पंक्ति जोग

   कार्यक्रम में गुजरात से पधारी सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट पंक्ति जोग ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2006 में माहिती अधिकार गुजरात पहल नामक संस्था की स्थापना की एवं साथ में उसी वर्ष एक लीगल आरटीआई हेल्पलाइन भी प्रारंभ किया। वर्ष 2001 में कच्छ में आए भूकंप ने पंक्ति जोग को अपनी विज्ञान से संबंधित ओसओनोग्राफी विषय में पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर किया और फिर वह सामाजिक क्षेत्र के कार्य मे लग गई। उन्होंने बताया कि प्रारंभ में उनके पास कोई व्यवस्था नहीं होती थी और वालंटियर आधारित कार्य प्रारंभ किया और इस प्रकार जनपद के ही स्थान का प्रयोग कर एक लैंडलाइन नंबर उपयोग करती थी। इसके बाद उन्होंने पहला लीगल आरटीआई हेल्पलाइन नंबर 9924085000 लांच किया जिसमें मात्र इनकमिंग कॉल आते हैं और लोग अपनी समस्याएं बताते हैं जिनका निदान किया जाता है। उन्होंने बताया कि लीगल हेल्पलाइन नंबर में अब तक 10 लाख से अधिक कॉल आ चुके हैं और लोक सूचना अधिकारियों से लेकर आम जनमानस तक ने अपनी समस्याओं को रखा है और समाधान पाया है। पंक्ति ने बताया कि सूचना का अधिकार हेल्पलाइन एक हथियार नहीं बल्कि औजार की तरह है जिसके प्रयोग से समाज में लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने अकाउंटेबिलिटी और रिस्पांसिबिलिटी बनाने में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार एक सत्याग्रह का साधन है और यदि साधन का प्रयोग हम करते रहे तो हमारे सामाजिक स्तर और प्रशासनिक व्यवस्था में काफी सुधार आ सकता है। उन्होंने बताया कि आज इस आरटीआई हेल्पलाइन नंबर में साउथ इंडिया की कुछ भाषाओं को छोड़कर अन्य देश के सभी जगह हिंदीभाषी, गुजराती, मराठी, इंग्लिश आदि भाषा के लोग अपनी बात रखते हैं और समाधान पाते हैं। उन्होंने कहा कि आरटीआई कानून मात्र कागज कट्ठा करने का नाम नहीं है बल्कि इससे हर सरकारी विभाग का कामकाज आम नागरिक की पहुंच में आ जाता है जिससे सरकारी विभागों की जिम्मेदारी बढ़ती है।

   आरटीआई ऑन व्हील्स हमारा सबसे बड़ा प्रयोग - RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग

   गुजरात से पधारी आरटीआई कार्यकर्ता पंक्ति जोग ने बताया कि उनका अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग आरटीआई हेल्पलाइन के बाद आरटीआई ऑन व्हील रहा है जिसे हम सामान्य तौर पर कानून की गाड़ी बोल सकते हैं। आरटीआई ऑन व्हील्स के द्वारा वह गुजरात सहित अन्य प्रदेशों में जगह-जगह जाकर आरटीआई कानून का प्रचार करते हैं और उन्हें और लोगों को बताते हैं कि किस प्रकार से आरटीआई का उपयोग कर वह अपने अधिकारों की माग कर सकते हैं। यहां तक कि उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक अलग से आरटीआई ऑन व्हील्स गाड़ी की व्यवस्था की है जिसमें पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं, आरटीआई से संबंधित पोस्टर, पंपलेट और अन्य जानकारी के माध्यम जिसमे टीवी, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जिसमे सीडी, कैसेट, लाउडस्पीकर सभी व्यवस्थाएं हुआ करती हैं इस आरटीआई ऑन व्हील्स से प्रचारित किया जा रहा है।


   आरटीआई हेल्पलाइन में महिलाओं के फोन कॉल्स का करते हैं विश्लेषण - RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग

   पंक्ति जोग ने बताया कि आरटीआई हेल्प लाइन में जो फ़ोन कॉल आते हैं उनमें पीड़ित महिलाओं के द्वारा किए जानेवाले कॉल का अलग से विश्लेषण किया जाता है और बाद में उनकी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है जिससे महिलाओं को आरटीआई के प्रति और अधिक जोड़ा जा सके और उन्हें जागरूक बनाया जा सके। आरटीआई हेल्पलाइन में समाज और प्रशासन से जुड़ी हुई हर प्रकार की समस्याएं जिसमें खाद्य, मनरेगा, मजदूरी, किसानों की समस्याएं, पीड़ित महिलाओं की समस्याएं से लेकर लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी तक अपनी समस्याएं लेकर के आते हैं जिनका समाधान किया जाता है। उन्होंने बताया कि वह राजस्थान, हिमांचल और गोवा में भी इस आरटीआई ऑन व्हील्स को लेकर आरटीआई कानून का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। आरटीआई कानून सशक्तिकरण के औजार की तरह उपयोग किया जा रहा है।

   रंजन और उषा बहन बनी आरटीआई कानून की स्पोक्सपर्सन- RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग

   पंक्ति जोग ने बताया कि उनके पास एक ऐसा मामला आया जिसमें उषा बहन नामक विकलांग और कमजोर महिला के द्वारा चलाए जाने वाले टेलीफोन बूथ को वहां की टेलीकॉम कंपनी ने तोड़ दिया था जिसके विषय में उषा बहन ने आरटीआई दायर कर जानकारी मांगी तो जानकारी नहीं दी गई जिसके बाद मामला आयोग में पहुंचा और आयोग ने पूरी जानकारी निकलवाई जिसमें वह आदेश भी जानने का प्रयास किया जिसके तहत टेलीफोन बूथ को हटाया गया था। इसके बाद बताया गया कि टेलीकॉम कंपनी ने वापस लाकर टेलीफोन बूथ लगा दिया और अब उषा बहन आरटीआई कानून को स्वयं भी उपयोग करती है और अन्य सभी पीड़ितों को मदद करती हैं। इसी प्रकार एक अन्य मामले के विषय में रंजन बहन का उदाहरण लेते हुए पंक्ति जोग ने बताया कि वह एक ऐसी महिला हैं जो बोलने और सुनने में असमर्थ हैं लेकिन फिर भी आज वह आरटीआई की समझ रखती हैं। वह आरटीआई के बारे में दिव्यांग लोगों को प्रेरित करती हैं और उनकी मदद करती है। पंक्ति ने कहा कि सही मायने में देखा जाए तो उषा बहन एवं रंजन बहन आरटीआई कानून की स्पोक्सपर्सन है।

   पंक्ति जोग जैसी महिलाएं आगे आए तो देश की दशा और दिशा दोनों बदल जाए- राहुल सिंह

   गुजरात से  ज़ूम मीटिंग में सम्मिलित हुईं पंक्ति जोग के कार्यों की प्रशंसा करते हुए मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की पंक्ति जोग जैसी महिलाएं यदि समाज में आगे आ जाएं तो देश की दिशा और दशा दोनों बदल जाए। राहुल सिंह ने आरटीआई हेल्पलाइन और माहिती अधिकार गुजरात पहल के कार्यों आरटीआई ऑन व्हील्स की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्य मध्यप्रदेश में भी किए जाने चाहिए जिससे महिलाओं को आरटीआई कानून के विषय में जागरूक कर उनके अधिकारों के बारे में सचेत किया जाए।

   अब मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिए जीआरडी डेस्क पर सूचना आयोग करेगा तत्काल सुनवाई - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

   3 जनवरी 2021 को वेबिनार मीटिंग के दौरान मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि जिस प्रकार गुजरात में पंक्ति जोग ने आरटीआई हेल्पलाइन खोलकर एवं साथ में संस्था स्थापित कर आरटीआई ऑन व्हील्स आदि के माध्यम से आरटीआई के प्रति जागरूकता फैला रही है और महिलाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहित कर रही है वैसे ही मध्यप्रदेश में भी अब यदि कोई महिला आरटीआई आवेदन अथवा अपील लेकर आयोग के समक्ष आती हैं तो उनकी अपील और शिकायत को प्राथमिकता दी जाएगी और आउट ऑफ टर्न मामले की सुनवाई की जाएगी जो कि मध्य प्रदेश में ऐसा पहली बार होगा। 


    राहुल सिंह ने बताया कि जीआरडी नंबर पर कॉल कर महिलाएं अपना आवेदन भेज सकती हैं और साथ में जानकारी प्राप्त कर सकती हैं। सूचना आयुक्त ने आगे कहा कि यदि महिलाएं आरटीआई के फील्ड में आगे आती हैं तो इससे कार्यालयों की मनमानी बंद हो जाएगी क्योंकि जिस प्रकार लोक सूचना अधिकारी आम आदमी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं वैसा वह किसी महिला आरटीआई कार्यकर्ता के साथ नहीं कर पाएंगे। सूचना आयुक्त ने कहा कि 4 जनवरी 2021 से यह व्यवस्था मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में लागू कर दी जाएगी।

गिरीश चंद देशपांडे बनाम राजगोपाल आदेश पर हुआ डिबेट

   इस बीच सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 में धारा 8(1)(जे) जिसमें कोई जानकारी न दिए जाने का प्रावधान मात्र इस आधार पर होता है कि वह जानकारी व्यक्तिगत है अथवा उस जानकारी का लोकहित से कोई विशेष लेना देना नहीं है इस विषय पर आज जूम मीटिंग के दौरान डिबेट हुआ जिसमें पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया की लोक सूचना अधिकारियों के द्वारा गिरीश चंद्र देशपांडे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आधार बनाकर 8(1)(जे) के तहत जानकारी न दिया जाना आरटीआई कानून की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। शैलेश गांधी ने कहा कि जब भी आयोग के समक्ष गिरीश चंद्र देशपांडे का मामला रखा जाए तो उसमें राजगोपाल वाले मामले को सामने रखना चाहिए जिससे आम व्यक्ति को महत्वपूर्ण जानकारी मिल सके एवं 8(1)(जे) का हवाला देकर जानकारी छुपाया न जा सके। शैलेश गांधी ने बताया कि हम भारत के सूचना आयोगों के इतिहास में एक ऐसे निर्णय की अपेक्षा कर रहे हैं जब राजगोपाल वाले मामले को आधार बनाकर निर्णय लिए जायेंगे।


संलग्न - कृपया इसे ईमेल के साथ संलग्न जो मीटिंग वेबीनार की तस्वीरें देखने का कष्ट करें। 

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शिवानंद द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता जिला रीवा मध्य प्रदेश मोबाइल नंबर 9589 1525 87

Sunday, June 21, 2020

(Rewa/Bhopal, MP) " Big Breaking- आरटीआई में प्रश्न सूचक शब्द, किन बातों का रखें खयाल" पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आयोजित (मप्र राज्य सूचना आयुक्त द्वारा दूसरी जूम मीटिंग में दिया गया कई प्रश्न का जबाब, पार्टिसिपेंट्स में दिखा भारी उत्साह, हर रविवार को सुबह 11 से 12 बजे के बीच आयोजित की जा रही ज़ूम मीटिंग, लगभग 100 पार्टिसिपेंट्स रहे सम्मिलित)

दिनाँक 21 जून 2020, स्थान - रीवा/भोपाल मप्र
     सूचना के अधिकार के क्षेत्र में क्रांति आना तय है क्योंकि आपको बता दें की इस समय मप्र राज्य सूचना आयोग में एक ऐसे सूचना आयुक्त पदस्थ हैं जिन्होंने आरटीआई को जन जन तक पहुचाने और उसके अवेयरनेस और जागरूकता का वीणा उठा रखा है. शायद ही भारत के सूचना आयोग के इतिहास में आज तक ऐसा कभी हुआ हो जब एक पदासीन सूचना आयुक्त जन जन तक पहुचने का प्रयास कर रहा हो. यह प्रयास जहां सेमिनार और वर्कशॉप के माध्यम से हो रहा था वहीं कोरोना लॉक डाउन के चलते यह अब हाई टेक हो चुका है. जी हाँ आपको कुछ नही चाहिए बस एक एंड्राइड मोबाइल चाहिए जो एक विशेष ज़ूम क्लाउड मीटिंग एप्प सपोर्ट करता हो और बस सोचना क्या हर रविवार सुबह 11 से 12 बजे के बीच में छुट्टी के दिनों में अपने घर से ही जुड़ जाईये वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में और पूँछिये वह सब सवाल जो अब तक आपके जेहन में उठ रहे थे लेकिन एक्सपर्ट एडवाइस की कमी के कारण आप उसे पूंछ नही पा रहे थे.

   यह सब संभव हो पा रहा है मप्र में और सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह आपको आपके आरटीआई से जुड़े प्रश्नों के जबाब दे रहे हैं. तो यदि आप पिछली मीटिंग नही अटेंड कर पाए तो कोई समस्या नही और जुड़ जाईये अगली मीटिंग में.

   रविवार 21 जून को विषय रहा आरटीआई में प्रश्न सूचक शब्द कैसे करें आवेदन और  किन बातों का रखें खयाल
     जहां पिछले रविवार को आरटीआई से जुड़े बेसिक मुद्दों पर चर्चना हुई थी वहीं 21 जून को आरटीआई में प्रश्न सूचक शब्दों के इस्तेमाल और कैसे इनसे बचा जाय और कहां इन्हें लगाना आवश्यक है उन विषयों पर चर्चा हुई.

     ज़ूम मीटिंग के दौरान लगभग 100 के आसपास पार्टिसिपेंट्स मौजूद रहे जिन्होंने अपने अपने प्रश्न रखे. 

  यहां यहां से यह यह लोग हुए सम्मिलित

   अमूमन ज़ूम मीटिंग के माध्यम से होने वाली वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में पूरे विश्व के कहीं से भी लोग जुड़ सकते हैं. पर फिर भी चूंकि मामला मप्र से संबंधित है तो जहां ज्यादातर लोग मप्र से जुड़े हुए रहते हैं वहीं लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक लोग अन्य राज्यों जैसे झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तरांचल, ओडिशा,  विहार आदि प्रदेशों से जुड़े हुए थे. 

   मुख्य रूप से जिन लोगों ने प्रश्न पूँछे वह सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, बीके माला, मदन गोपाल तिवारी, सुरेश उपाध्याय, सत्येंद्र शिकरवार, भोपाल से गोविंद देशवाही, इंदौर से अंकुर मिश्रा, राजस्थान से आरके मीणा, भोपाल से प्रदीप उपाध्याय, रीवा से स्वतंत्र शुक्ला आदि सम्मिलित रहे.
    जस्टिस बोवड़े के 2008 के बॉम्बे हाइकोर्ट के निर्णय से हुई सुरुआत

   इस बीच ज़ूम मीटिंग की सुरुआत करते हुए मप्र राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने जस्टिस बोवड़े के 2008 के बॉम्बे हाइकोर्ट के एक फैसले पिंटो बनाम महाराष्ट्र सूचना आयोग का हवाला दिया जिंसमे बताया गया की इस निर्णय में जस्टिस बोवड़े द्वारा पूरे मामले की समीक्षा करते हुए आरटीआई दायर करने में प्रश्न सूचक शब्दों के इस्तेमाल के विषय में रोक सी लगा दी थी जो की अपीलार्थी के विरुद्ध निर्णय साबित हुआ था. वास्तव में हुआ यूं था की महाराष्ट सूचना आयोग ने जहां अपने आदेश में श्री पिंटो को जानकारी मुहैया कराए जाने के लिए आदेशित किया था वहीं लोक सूचना अधिकारी द्वारा यह कहकर बॉम्बे हाइकोर्ट में अपील की गयी की जो जानकारी आपिलार्थी द्वारा चाही गयी है उसमे कई प्रश्न सूचक शब्द हैं इसलिए हायपोथेटिकल ग्राउंड पर ऐसी जानकारी पीआईओ के पास उपलब्ध नही है. जिस पर जस्टिस बोवड़े ने पीआईओ का पक्ष लेते हुए अपीलार्थी के विरुद्ध निर्णय दिया था. इसके बाद से आरटीआई दायर करते समय इन बातों का विशेष खयाल रखा जाने लगा की प्रश्न सूचक शब्द और मार्क न हों. 
   मात्र हाइपोथेटिकल प्रश्न न पूँछें बांकी प्रश्न में कोई परेशानी नही - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

    ज़ूम मीटिंग के दौरान मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कई उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया की आरटीआई दायर करते समय हाइपोथेटिकल प्रश्न नही पूँछे जाने चाहिए जैसे अमुक योजना कब संचालित होगा? अमुक कार्य कब होगा फला फला क्योंकि यह हाइपोथेटिकल प्रश्न होते हैं क्योंकि ऐसे प्रश्नों के जबाब लोक सूचना अधिकारी के पास जरूरी नही की हों. अतः इस प्रकार के हाइपोथेटिकल प्रश्नों से बचना चाहिए. लेकिन जहां तक संख्या वाचक प्रश्न हैं और जो संख्या से जुड़े हुए हैं जैसे किन किन लोगों के ऊपर फला कार्यवाही हुई? किस किस अधिकारी फला कार्य में अथवा फला दोष में संलिप्त है? यदि किन्ही योजना विशेष का लाभ किसी हितग्राही को मिला है तो वह किन किन हितग्राहियों को मिला है आदि यह प्रश्न हाइपोथेटिकल प्रश्न नही हैं और यह सूची अथवा जानकारी किसी संबंधित विभाग में रहनी चाहिए जो पीआईओ का कर्तव्य होता है की वह आरटीआइ की धारा 5(3) के तहत भी अपीलार्थी के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए उसका सहयोग करे और जानकारी देवे. 
  सतना में खनिज विभाग के मामले में लगाया एक लाख रुपये का भारी भरकम जुर्माना

  इस बीच प्रश्न वाचक शब्दों के विषय में जिक्र करते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा बताया गया की अभी हाल ही के एक निर्णय में सतना जिले से किसी अपीलार्थी द्वारा कुछ जानकारी लगभग 2 वर्ष पूर्व सतना जिले के खनिज विभाग से चाही गयी थी लेकिन खनिज विभाग द्वारा वह जानकारी आवेदक को उपलब्ध नही कराई गयी थी. जिसके चलते मामले की द्वितीय अपील मप्र राज्य सूचना आयोग में पेंडिंग पड़ी हुई थी. जिस पर अभी हाल ही में आयुक्त द्वारा निर्णय पारित किया गया और कुल 4 आरटीआई के इन मामलों में अधिकतम 25 हजार रुपये के हिसाब से कुल एक लाख रुपये की फाइन लोक सूचना अधिकारी दीपमाला तिवारी को लगा दी गयी. 

   इस मामले में आयुक्त द्वारा बताया गया की यद्यपि अपीलार्थी द्वारा कुछ प्रश्न सूचक शब्दों का प्रयोग किया गया था लेकिन यह शब्द हाइपोथेटिकल नही होने से अपील स्वीकार की गयी. इसलिए आवेदक को हर भरसक प्रयास करना चाहिए की वह प्रश्न सूचक शब्दों से बचें और साथ में हाइपोथेटिकल किश्म के प्रश्न सूचक शब्द तो बिल्कुल ही न पूँछे अन्यथा अपील ख़रीजी किये जाने के चांस बने रहते हैं.
    इन इन पार्टिसिपेंट्स ने पूँछे यह सवाल 

    जूम मीटिंग रविवार सुबह 11 बजे से प्रारम्भ होकर 12:30 बजे दोपहर तक चलती रही. यद्यपि समय 1 घंटे का ही सुनिश्चित किया गया था लेकिन मीटिंग डेढ़ घंटे चली. लोगों की उत्सुकता को देखते हुए मीटिंग का समय बढ़ाये जाने का विचार भी किया जा रहा है.

  प्रबल प्रजापति शहडोल से आल आउट की संख्यात्मक जानकारी मागी 
  
 वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में सुरुआत के प्रश्न में प्रबल प्रजापति शहडोल से रहे जिन्होंने बताया की वह रेलवे में नौकरी करते हैं और उन्होंने रेलवे विभाग में ही आरटीआई दायर कर आलआउट की संख्या के विषय में जानकारी चाही थी जिस पर लोक सूचना अधिकारी द्वारा उन्होंने प्रश्न वाचक शब्द होने के चलते घुमा दिया और जानकारी देने से मना कर दिया. इस पर आयुक्त राहुल सिंह द्वारा कहा गया की वह इसकी अपील करें. क्योंकि संख्यात्मक प्रश्न तो पूँछे जाएंगे और मात्र हाइपोथेटिकल प्रश्नों से आवेदकों को बचना चाहिए.
सुरेंद्र तिवारी रिपोर्टर ने अधिकारी के टूर डायरी की जानकारी मागी

   रीवा से पत्रकार सुरेंद्र तिवारी ने एक अधिकारी के आफिस टूर डायरी की जानकारी मागी इस पर विभाग ने उन्हें टूर डायरी देने से मना कर दिया और बोला की टूर डायरी की जानकारी संधारित्र नही रहती. इस पर सूचना आयुक्त श्री सिंह ने जबाब दिया की किसी अधिकारी की सरकारी टूर डायरी संधारित्र होनी चाहिए और वह जानकारी पब्लिक डोमेन में आनी चाहिए. यह जानकारी देने योग्य होती है और दी जानी चाहिए. जानकारी यदि नही दी गयी तो अपीलार्थी को अपील करनी चाहिए.

  कृष्ण प्रताप सिंह इंदौर ने मागा 4 वर्ष की जानकारी

  इंदौर से ज़ूम मीटिंग में सम्मिलित हुए कृष्ण प्रताप सिंह ने कहा की उन्होंने एक विभाग में आरटीआई दायर की थी और जानकारी चाही थी इस पर उस विभाग द्वारा कहा गया की चूंकि जानकारी 3 या 4 वर्ष की है और वृहद है इसलिए आवेदक को जानकारी नही दी जा सकती. इस पर आयुक्त श्री सिंह ने जबाब दिया की यदि जानकारी उजागर होने से भ्रष्ट्राचार की पुष्टि होती है तो जानकारी देने योग्य है. यदि लोक सूचना अधिकारी ने जानकारी नही दी तो अपीलार्थी को उसकी अपील करनी चाहिए.
  गिरीश रामचंद्र का प्रकरण - सरकारी कार्य प्रभावित होने सम्बन्धी तर्क

   इस बीच सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने गिरीश रामचंद्र के एक प्रकरण का हवाला दिया और बताया की इस मामले में कोर्ट ने यह तर्क दिया था की यदि 75 प्रतिशत से अधिक वर्कफोर्स आरटीआई की जानकारी बनाने के लिए लगा दिया जाता है तो इससे सरकारी कार्य प्रभावित होते हैं. अतः जानकारी इस प्रकार मागी जानी चाहिए जिससे सरकारी कार्य लोकसेवा के कार्य प्रभावित न हों और आवेदक को जानकारी भी मिल जाए. लेकिन फिर भी श्री सिंह ने बताया की यदि जानकारी से किसी भ्रष्ट्राचार की पुष्टि होती है इस परिस्थिति में चाहे जानकारी कितनी भी बड़ी क्यों न हो लोकहित में वह दी जानी चाहिए.

 मदन गोपाल तिवारी की संबल योजना के एक हितग्राही की जानकारी बताई व्यक्तिगत

   भोपाल से मदन गोपाल तिवारी ने बताया की उन्होंने एक मृतक हितग्राही को मिलने वाले संबल योजना ले लाभ के विषय में जानकारी चाही थी जिस पर विभाग ने बताया की वह जानकारी नही दे सकते क्योंकि यह थर्ड पार्टी से संबंधित है. इस पर आयोग ने कहा की यदि धारा 8(1)(जे) का उल्लंघन हो रहा है और जानकारी थर्ड पार्टी से संबंधित है भी तो यह बात विभाग के पीआईओ को 10 दिवस के भीतर हितग्राही को सूचित किया जाना चाहिए. पर सरकारी योजना से संबंधित कोई भी जानकारी किसी की व्यक्तिगत जानकारी नही होनी चाहिए क्योंकि यह योजना विशेष की जानकारी है जो पब्लिक डोमेन में साझा की जानी चाहिए.
   भिंड से सत्येंद्र सिंह शिकरवार ने पूंछा की बीपीएल कार्डधारक को अधिकतम कितने पेज की जानकारी फ्री ऑफ कॉस्ट मिलनी चाहिए इस पर आयुक्त श्री सिंह ने बताया की इसकी सीमा 50 पेज की है लेकिन यदि जानकारी 30 दिन के भीतर उपलब्ध नही कराई गयी है तो सम्पूर्ण जानकारी फ्री ऑफ कॉस्ट दी जानी चाहिए.

  जिला शिक्षा अधिकारी रीवा के एक मामले में प्रश्न करने हुए सामाजिक कार्यकर्ता बीके माला ने कहा की एक जानकारी 20 हजार रुपये बताकर विभाग ने आवेदक को गुमराह किया इस पर आयुक्त श्री सिंह ने कहा की आवेदक को पुनः एक पत्र लिखकर पीआईओ को दस्तावेजों के अवलोकन के लिए लिखना चाहिए और जाकर देखना चाहिए की जो जानकारी आवेदक के लिए आवश्यक हो वही जानकारी आवेदक प्राप्त करे. इस मामले में भी आवेदकों को अपील करनी चाहिए.

  अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने रीवा पुलिश अधिकारियों के विरुद्ध चल रहे प्रकरणों की मागी थी जानकारी

  इस बीच रीवा से हाइकोर्ट जबलपुर में अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद मिश्रा ने बताया की उन्होंने आरटीआइ दायर कर एसपी आफिस से जानकारी चाही थी की ऐसे कौन कौन से अधिकारी हैं जिनके विरुद्ध लोकायुक्त, मानवाधिकार आदि द्वारा जांच चल रही है और कार्यवाही की क्या अद्यतन स्थिति है इस पर एसपी आफिस द्वारा प्रशवचक शब्द बोलकर जानकारी देने से मना कर दिया गया जिसके विषय में आयुक्त श्री सिंह द्वारा कहा गया की यह यद्यपि प्रश्न सूचक शब्द है लेकिन यहहाइपोथेटिकल नही है बल्कि स्पष्ट है इसलिए एसपी आफिस से यह जानकारी दी जानी चाहिए. क्योंकि "किन किन अधिकारी" यह वाक्य संख्यात्मक और स्पष्ट है इसलिए इसमे जानकारी छुपाए जाने का सवाल ही नही उठता और आवेदक को इसकी अपील करनी चाहिए.
  गोविंद देशवाही भोपाल ने न्यायालयीन प्रकरणों की मागी जानकारी

  इस बीच गोविंद देशवाही ने बताया की उन्होंने पुलिश द्वारा पंजीबद्ध किये गए अपराधों के विषय में और न्यायालयीन प्रकरणों की जानकारी चाही थी लेकिन पुलिश विभाग ने वह जानकारी देने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि यह विवेचना और जांच को प्रभावित कर सकता था. इस पर आयूक्त ने एक बार फिर सतना के एक पत्रकार के मामले का हवाला देकर बताया की यह सही है की कुछ मामलों में जांच और विवेचना प्रभावित हो सकती है लेकिन यदि प्रकरण न्यायालय में पहुंच चुका है और चलानी कार्यवाही हो चुकी है तब वह जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही यदि किसी जानकारी को पुलिश यह कहती है की विवेचना प्रभावित कर सकती है तो पुलिश को आयोग के समक्ष उपस्थित होकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह कैसे जांच प्रभावित करेगी. आयुक्त श्री सिंह ने 8(1)(एच) एवं 8(1)(जे) का जिक्र किया लेकिन बताया की यह पीआईओ द्वारा स्पष्ट करना चाहिए.

इंदौर से अंकुर मिश्रा ने एक ट्रस्ट के बिजली कनेक्शन से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी चाही तो विभाग ने बताया की यह काफी पुरानी है और जानकारी नही दी. अंकुर मिश्रा ने यह भी कहा की यद्यपि वह ट्रस्ट आरटीआई के दायरे में आना चाहिए क्योंकि ट्रस्ट सरकार द्वारा दान दी गयी भूमि पर बना है. बता दें कि यदि किसी एनजीओ अथवा ट्रस्ट पर एक वर्ष के भीतर 50 रुपये और उससे अधिक इन्वेस्ट हुआ है तो वह आरटीआइ के दायरे में आता है। इस पर आयुक्त ने बताया की बिजली बिल सम्बन्धी दस्तावेज साझा करने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए क्योंकि यह कोई प्राइवेट दस्तावेज नही है.

  आरटीआई से जुड़े कार्यकर्ताओं की सुरक्षा पर एक बार फिर सवाल

    इस बीच सबसे महत्वपूर्ण बात जो सामने अयी वह आरटीआई से जुड़े कार्यकर्ताओं की सुरक्षा से संबंधित थी जिस पर राजस्थान से आरटीआई कार्यकर्ता आरके मीणा ने पूंछा की आरटीआई लगाने वाले और अपनी जान को जोखिम में डालकर समाज और सरकार के भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध लड़ने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के विषय में सरकार की क्या मंशा और नियमावली है. इस पर आयुक्त राहुल सिंह द्वारा मप्र और रीवा के आरटीआइ एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी का हवाला देकर बताया गया की अभी हाल ही में उनके ऊपर भी इस प्रकार से एक हमला किया गया था जिस पर आयोग ने 20 मार्च 2020 की रीवा में आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान अधिकारियों को बड़े ही स्पष्ट तौर पर आदेशित किया था की यदि आरटीआइ से जुड़ा कोई मामला है अथवा कोई जांच है वहां आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होती है. इस पर श्री सिंह ने 2013 के होम मिनिस्ट्री के एक सर्कुलर का भी हवाला दिया था और विभागों को आगाह किया था.
 क्या पीएम केअर फण्ड आरटीआई के दायरे में आना चाहिए

  इस बीच कुछ पार्टिसिपेंट्स ने पीएम केअर फण्ड को आरटीआई के दायरे में लाये जाने की बात कही और आयुक्त श्री सिंह से जानकारी और उनका मंतव्य जानना चाहा तो श्री सिंह ने बताया की जहां तक व्यक्तिगत तौर पर और देश के नागरिक होने के नाते उनका मानना है की कोई भी एजेंसी जो की पब्लिक फण्ड अथवा कंपनियों के द्वारा पोषित हुई है अथवा जनता का पैसा उसमे इन्वेस्ट किया गया है अथवा डोनेट किया गया है वह समस्त फण्ड आरटीआई के दायरे में आने चाहिए क्योंकि जनता को उसके दिए गए पैसे को जानने का पूरा अधिकार है अतः वही बात हर फण्ड पर लागू होती है. 
कार्यक्रम का संयोजन एवं प्रचार प्रसार

   इस ऐतिहासिक पहल जिसमे मोबाइल एप्प के माध्यम से ज़ूम मीटिंग आयोजित की जा रही है इसका संयोजन और समन्वयन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि प्रचार प्रसार और  मीडिया का प्रभार का दायित्व देवी अहिल्या के मास्टर ऑफ जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन के छात्र स्वतंत्र शुक्ला द्वारा पूरा किया गया.
संलग्न - कृपया ज़ूम मीटिंग के दौरान उपस्थित सदस्यों आदि की स्क्रीनशॉट फ़ोटो देखने का कष्ट करें.

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शिवानन्द द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Sunday, December 1, 2019

आर टी आई कानून में धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत (मामला कुछ मप्र राज्य सूचना आयोग के प्रकरणों का जहाँ राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आरटीआई की धारा 18 की शक्तियों के तहत की जा रही त्वरित कार्यवाहियां, हाल ही में एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन का एक कराधान का आरटीआई प्रकरण रहा काफी अहम)

दिनांक 01 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा/भोपाल, मप्र
  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
  वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा देश में पारदर्शिता लाने, आम जनमानस को सरकारी कामकाजों की जानकारी आसानी से मुहैय्या हो सके, देश और समाज में भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके, लोक सेवक अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहें, और आम जनता भी अपने अधिकारों को अच्छे से समझकर उसका सदुपयोग कर सके इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर आर टी आई अर्थात सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लाया गया था. सूचना का अधिकार हर भारतवासी का संवैधानिक अधिकार है. तब से लेकर अब तक और वर्ष 2015 में इसमे कुछ अमेंडमेंट भी हुए हैं.
  आर टी आई अधिनियम में क्या क्या जानकारी माग सकते हैं
   सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत देश प्रदेश की सरकारी काम काज और लोक सेवकों से संबंधित वह समस्त जानकारी माँगी और प्राप्त की जा सकती है जो आर टी आई की धारा 8 एवं 24 के तहत प्रतिबंधित न हो. जैसे देश की खुफिया जानकारी जिससे देश की सुरक्षा के संकट उत्पन्न हो जाएं, शाशकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 के तहत छूट, अथवा अन्य इसी प्रकार की जानकारी देने का प्रावधान आर टी आई कानून में नही है. इसके अतिरिक्त लोक सेवकों और सरकार के काम काज बजट, राशि के आय व्यय, सरकारी कार्यों के विषय में उनके लेखे जोखे, उपलब्ध कागज़ात सभी की जानकारी आर टी आई कानून के तहत प्राप्त की जा सकती है.
   कैसे फ़ाइल करते हैं आर टी आई आवेदन
   आर टी आई आवेदन फ़ाइल करने का एक विशेष प्रोफार्मा होता है जिसके अन्तर्गत आप 10 रुपए के शासकीय शुल्क जिसमे आई पी ओ अथवा राज्य स्तरीय स्टाम्प शुल्क सम्मिलित है उसके साथ में एक धारा 6(1) के तहत आवेदन बनाकर संबंधित लोक सूचना अधिकारी के नाम भेज सकते हैं. यह हांथोहाथ भी दिया जा सकता था और पोस्ट के माध्यम से भी भेजा जा सकता है.
आर टी आई की प्रथम एवं द्वितीय अपील
   जब चाही गई जानकारी प्रथम आर टी आई आवेदन पर अधिकतम 30 दिवश के भीतर उपलब्ध न करवाई जाए तो प्रथम अपील का प्रावधान होता है जो आर टी आई की धारा 19(1) के तहत की जाती है. इसमे आवेदन प्रोफार्मा के साथ अपीलकर्ता को 50 रुपये स्टाम्प शुल्क अथवा आई पी ओ के साथ अपील करना होता है. इसकी समयावधि 45 दिवश के भीतर होती है. यदि इस दरम्यान अपीलकर्ता को जानकारी संबंधित कार्यालय द्वारा उपलब्ध न करवाई जाए तो आवेदक को द्वितीय और अंतिम अपील के लिए जाना होता है 
   आरटीआई की धारा 19(3) के तहत दायर द्वितीय अपील दो तरह के कार्यालयों में भेजी जाती है. एक तो यदि प्रकरण या मूल आवेदन राज्यस्तरीय कार्यालयों और राज्य सरकार के कार्यालयों में भेजा गया था तो वह संबंधित राज्य के राज्य सूचना आयुक्त के नाम की जाती है, और यदि मूल आवेदन किसी केंद्रीय कार्यालय या केंद्रीय लोक सेवक के विरुद्ध दायर किया गया था तो उसमे केंद्रीय सूचना आयोग में आयुक्त के नाम पर अंतिम एवं द्वितीय अपील की जाती है.
  अंतिम विकल्प हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट
   यदि इतने में भी जानकारी अपीलकर्ता को उपलब्ध न हो तो वह संबंधित राज्य की उच्च न्यायालय में केस दायर कर सकता है और उसमे लोक सूचना अधिकारी से लेकर प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं राज्य सूचना आयोग को पार्टी बना सकता है. हाई कोर्ट से भी रिलीफ न मिलने पर यही सब कुछ उच्चतम न्यायालय में भी दायर किया जा सकता है.
   क्या है आर टी आई कानून की धारा 18
   इसी बीच आवेदन से लेकर द्वितीय और अंतिम अपील के बीच की एक सीढ़ी है आर टी आई कानून की धारा 18. धारा 18 का प्रयोग आवेदक द्वारा शिकायत के रूप में किया जाता है. जब कभी लोक सूचना अधिकारी द्वारा आर टी आई आवेदक द्वारा चाही गई जानकारी छुपाने का प्रयास किया जाए, जानकारी के नाम पर घुमाया जाय, गलत जानकारी देकर आवेदक को भ्रमित किया जाय अथवा झूठी जानकारी दी जाय तब तब आवेदक संबंधित लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध संबंधित सूचना आयोग में धारा 18 का प्रयोग कर शिकायत भेज सकता है जिंसमे वह यह माग करेगा की संबंधित लोक सूचना अधिकारी द्वारा गलत जानकारी देना, जानकारी छुपाना अथवा भ्रमित करने का प्रयास किया गया अतः आर टी आई की धारा 20(1)/(2) के तहत अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्यवाही की माग के साथ अन्य जो उचित लगे वह कार्यवाही की माग कर सकता है. ऐसे में राज्य सूचना आयुक्त उक्त मामले को अपने संज्ञान में लेकर लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी के कार्यों को विधिविरुद्ध पाए जाने पर अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग कर धारा 18 के तहत धारा 20(1)/(2) का प्रयोग करते हुए अनुशासनात्मक एवं दंडात्मक कार्यवाही कर सकता है.
  आर टी आई की धारा 18 सूचना आयोग का विशेषाधिकार की तरह है
   वास्तव में आर टी आई की धारा 6(1), 19(1) अथवा 19(3) की पेचीदगी से भरी प्रक्रिया से गुजरने के साथ साथ धारा 18 की शक्तियां आर टी आई आवेदकों के लिए रामबाण साबित हो सकती हैं बशर्ते इसके प्रति आयोग भी गंभीर हो तब. लेकिन इन सबके मूल में राज्य सूचना आयोग की तत्परता ही है. यदि राज्य सूचना आयोग इसे गंभीरता से लेता है और त्वरित कार्यवाही करता है तब तो धारा 18 ठीक है वरना बहुत से ऐसे मामले होते हैं जो सूचना आयोग में वर्षों से धूल फांक रहे होते हैं. यहाँ तो द्वितीय अपील ही एंटरटेन नही की जाती हैं तो सामान्य धारा 18 के तहत शिकायतों की तो कोई गिनती ही नही हैं.
   अपीलकर्ता शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन 
   अभी हाल ही में एक मामला आया जिंसमे रीवा मप्र में 75 पंचायतों के कराधान और 14वें वित्त आयोग की ग्रांट के उपयोग में अनियमितता प्रकाश में आयी. जिसके विषय में जिले के कई कार्यकर्ताओं द्वारा आवाज बुलंद की गई. उनमे से सामाजिक आर टी आई कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा भी जिला कलेक्टर रीवा के एक आदेश 2495 एवं 2498 को आधार बनाकर जिले की 75 पंचायतों जिनमे बहुतायत में 38 पंचायतें मात्र गंगेव जनपद में ही थीं जहां पर यह कराधान मामले में अनियमिता एवं भ्रष्टाचार प्रकाश में आया था इसी विषय पर अलग अलग दो लोक सूचना कार्यालयों पर आवेदन प्रस्तुत किया गया था जिनमे से दिनांक 24 एवं 25 सितंबर 2019 को क्रमशः लोक सूचना अधिकारी कार्यालय जनपद गंगेव एवं कार्यालय कलेक्टर को आर टी आई आवेदन देकर उक्त कलेक्टर द्वारा जारी पत्र पर जांच प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति अन्य संबंधित दस्तावेजों के साथ जजानकारी चाही गई थी.
  दोनो ही पीआईओ ने किया गुमराह
   गौरतलब है की दिनांक 03/10/2019 एवं दिनांक 14/10/2019 को क्रमशः जारी पत्रों क्र. 1247 एवं 176 के माध्यम से आर टी आई आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को सीईओ कार्यालय गंगेव एवं कलेक्टर कार्यालय रीवा के लोक सूचना अधिकारियों द्वारा पल्ला झाड़ते हुए जानकारी छुपाने के उद्देश्य, आवेदक अपीलार्थी को भ्रमित करने के उद्देश्य से बताया गया की संबंधित जानकारी उनके कार्यालय में उपलब्ध नही है बल्कि अन्य कार्यालय में उपलब्ध है.
  धारा 18 के तहत राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह को शिकायत
   इस बीच आवेदक द्वारा ट्विटर सोशल मीडिया के माध्यम से राज्य सूचना आयुक्त और रीवा संभाग के प्रभारी आयुक्त श्री राहुल सिंह को संदेश भेजकर शिकायत की गई और एक मार्गदर्शन मागा गया जिंसमे यह कहा गया की चूंकि संबंधित दोनो लोक सूचना अधिकारियों ने जानकारी देने से मना कर दिया है और भ्रमित करने का प्रयाश किया है अतः इस स्थिति में आवेदक को पुनः नाहक ही प्रथम एवं द्वितीय अपील की पेचीदगी से गुजरते हुए वर्षों इंतज़ार करने पड़ सकते हैं जैसा की पहले भी होता आया है.

   इस पर ट्विटर के माध्यम से राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आवेदक को उनके ईमेल एड्रेस पर आर टी आई की विशेष धारा 18 का प्रयोग करते हुए शिकायत भेजे जाने की बात कही साथ ही प्रथम अपील भी करने की सलाह दी गई.
  धारा 18 के तहत शिकायत पर हुई त्वरित कार्यवाही
   आर टी आई की धारा 18 के तहत शिकायत दिनांक 08 नवंबर को अपीलार्थी द्वारा राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के ईमेल में की गई जिस पर दिनांक 29 नवंबर 2019 को ठीक 3 सप्ताह में एक्शन लेते हुए निराकरण किया गया जो अब तक के मप्र के राज्य सूचना आयोग में काफी त्वरित एक्शन के तौर पर माना जा रहा है.
  क्यों न तीनो पीआईओ पर प्रति 11250 रुपये का जुर्माना लगाया जाए
   रीवा जिले में लगभग 8 करोड़ के कराधान घोटाले के  विषय में गंगेव जनपद एवं रीवा कलेक्टर कार्यालय द्वारा जानकारी छुपाने के प्रयाश पर एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी की दिनांक 08 नवंबर की शिकायत पर राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने काफी गंभीरता से लिया. जिंसमे उन्होंने तीनों लोक सूचना आधिकारी जनपद गंगेव, जिला पंचायत रीवा एवं कलेक्टर रीवा को आड़े हांथों लिया और आर टी आई की धारा 7, 6, 7 की उपधारा 8(1), (2), (3), एवं धारा 5(5) का दोषी पाया और धारा 20(1)/(2) की कार्यवाही करते हुए अपने आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस जारी किया और पूंछा की क्यों न प्रत्येक तीनों लोक सूचना अधिकारियों के विरुद्ध जुर्माने के तौर पर 11,250/- रुपये का जुर्माना लगाया जाए.
  23 दिसंबर को तीनों लोक सूचना अधिकारियों की भोपाल में होगी पेशी
   जुर्माने के आशय के साथ आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने न केवल जुर्माने लगाने की नोटिस दी है बल्कि तीनों संबंधित लोक सूचना अधिकारियों जनपद पंचायत गंगेव, जिला पंचायत रीवा एवं साथ में संयुक्त कलेक्टर रीवा को 23 दिसंबर को व्यक्तिगत रूप से भोपाल में राज्य सूचना आयोग में हाजिर होने का आदेश दिया है.
 क्या क्या कहा राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने
  आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस के साथ राज्य सूचना आयुक्त ने काफी तल्ख टिप्पड़ी की है जिसमे उन्होंने कहा की लगता है कि सूचना न देने के लिए तीनों लोक सूचना कार्यालयों में मैच फिक्सिंग जैसी हुई है. क्योंकि जिस प्रकार से आवेदकों को घुमाया जा रहा था इससे साफ जाहिर था की लोक सेवकों की सूचना की पारदर्शिता के प्रति मंसा बहुत अच्छी नहीं लगती. सूचना आयुक्त ने इस आदेश में कहा की कराधान घोटाले के मामले में आवेदक द्वारा जो जानकारी चाही गई थी वह सीधे सीधे कलेक्टर के एक आदेश 2495 एवं 2498 से संबंधित है जो स्वयं कलेक्टर द्वारा 7 दिवश के भीतर कार्यवाही चाही गई थी. आवेदक ने वह जानकारी सात दिवश के बाद चाही अतः यह पीआईओ कलेक्टर कार्यालय की जिम्मेदारी बनती थी की वह जानकारी दे न की किसी दूसरे कार्यालय को अंतरित करे. इस विषय में माननीय सूचना आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया जिसमे बताया की बेबजह आर टी आई आवेदन अंतरित कर लोक सूचना अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बच नही सकते.
  पीआईओ जिला पंचायत रीवा को पाया धारा 5(5) का दोषी
   चूंकि मूल आर टी आई आवेदन पीआईओ कलेक्टर कार्यालय रीवा द्वारा पीआईओ जिला पंचायत रीवा को अंतरित किया गया था अतः यह पीआईओ जिला पंचायत रीवा की जिम्मेदारी बनती थी की वह आवेदक को 7 दिवश के भीतर जानकारी मुहैया कराने संबंधित लिखित पत्र जारी करे जिसमे पीआईओ जिला पंचायत स्वयं असफल साबित हुए और इस आशय का कोई पत्र और जानकारी आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को उपलब्ध नही कराया जिसमे न केवल आवेदक के साथ धारा 7 की उपधारा 8(1), (2), (3) के दोषी पाए गए बल्कि कार्यालय कलेक्टर के अंतरित आर टी आई आवेदन का जबाब कलेक्टर को न देकर कलेक्टर के साथ असहयोग भी किया इसलिए असहयोग के चलते आर टी आई की धारा 5(5) के दोषी पाए गए. जिसके फलस्वरूप राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने पीआईओ जिला पंचायत के विरुद्ध अनुशासनात्मक दंडात्मक कार्यवाही करते हुए धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत कारण बताओं नोटिस जारी किया और कहा की क्यों न आपके भी विरुद्ध 11 हज़ार 250 रुपये का जुर्माना ठोका जाय.
  पीआईओ गंगेव को पाया धारा 7(1) एवं  उपधारा 8(1), (2), (3) का दोषी
   इस बीच अपने पत्र में मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की गंगेव जनपद के लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदक अपीलार्थी शिवानन्द द्विवेदी को जानकारी न देकर, जानकारी छुपाने के प्रयाश करने और भ्रमित करने पर धारा 7(1) के दोषी हैं साथ ही युक्तियुक्त कारण नही बताकर एवं अपीलीय अधिकारी की जानकारी एवं संपर्क उपलब्ध न कराकर धारा 7 की उपधारा 8(1), (2), (3) के भी दोषी हैं. अतः क्यों न इनके विरुद्ध भी अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत 11 हज़ार 250 रुपये का जुर्माना लगाया जाय.
 आयोग का अभिमत - जानकारी आपके पास नही तो हवा में कहां गायब हो गई
   पत्र के अंत में आयोग ने अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा की गुणदोष के आधार पर प्रथम दृष्टया लोक सूचना अधिकारियों द्वारा जारी पत्रों एवं अपीलकर्ता की शिकायत के अवलोकन उपरांत इस प्रकरण में स्पष्ट होता है की सूचना के अधिकार अधिनियम के विपरीत विधि विरुद्ध तरीके से लोक सूचना अधिकारियों द्वारा जानबूझकर जानकारी के नाम पर एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के बीच घुमाया जा रहा है. सवाल यह है की कार्यालय कलेक्टर जिसके आदेश पर जांच शुरू हुई उसका कहना है की जानकारी उसके पास नही है. जिस कार्यालय को पीआईओ कलेक्टर द्वारा मूल आर टी आई आवेदन 6(3) के तहत अंतरित किया गया वह कह रहा है की जानकारी उसके पास भी नही है तो आखिर जानकारी हवा में कहां गायब हो गई.
 ट्विटर में आयुक्त ने बताया पीआईओ के बीच मैच फिक्सिंग जैसा खेल
   इस बीच ट्विटर पर की गई कार्यवाही की जानकारी देते हुए राज्य सूचना आयुक्त ने काफी तल्ख टिप्पड़ी की और कहा ऐसे लगता है जैसे लोक सूचना अधिकारियों के बीच मैच फिक्सिंग जैसा चल रहा है जिसमे एक विभाग कह रहा है की जानकारी मेरे पास नही उनके पास है और उनके पास जाओ तो वह बोलते हैं मेरे पास नही तीसरे के पास जाओ. जब तीसरे के पास जाओ वह बोलते हैं पहले के पास जाओ. तो सवाल यह उठता है की मूल जांच का आदेश देने वाला कार्यालय कलेक्टर ही जब ऐसे गैर जिम्मेदाराना बर्ताव करेगा तो अन्य कार्यालयों का क्या कहना.
  आर टी आई की धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए अच्छा संदेश
   आज जिस प्रकार से देश प्रदेश में लोक सूचना के अधिकार का मजाक बन चुका था उससे साफ जाहिर है आने वाले दिनों में आम जनता और आर टी आई कार्यकर्ताओं का लोक सूचना के अधिकार कानून से विश्वास उठता जा रहा है. ऐसे में मप्र के वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह एक आशा की किरण जैसे आये हैं जो न केवल सूचना आवेदनों और अपीलों का त्वरित निराकरण करने का हर संभव प्रयाश कर रहे हैं बल्कि मप्र में लोक सूचना के अधिकार का कैसे प्रचार किया जाए कैसे कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा किया जाय वह सभी जरूरी संभव प्रयास भी कर रहे हैं.
   न केवल कार्यालयीन और कागज़ी तौर पर बल्कि सोशल मीडिया व्हाट्सएप एवं ट्विटर जैसे शसक्त आधुनिक सूचना माध्यमों का सहारा लेकर आवेदकों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें आवश्यक जानकारी दे रहे हैं की वह कैसे और कहां अपील करें, कहां आर टी आई दाखिल करें, कैसे लोक सूचना अधिकारी के भ्रमित करने पर धारा 18 के तहत आयोग में शिकायत भेज सकते हैं आदि.
  आवेदन से लेकर अपील तक थी दौड़, अब जानी धारा 18 की भी ताकत



    पहले आर टी आई में मात्र आवेदन के बाद प्रथम और द्वितीय अपील तक ही ज्यादातर आवेदक सीमित रहते थे और उस पर भी इंतज़ार इतना लंबा होता था की आवेदक स्वयं थक हारकर परेशान हो जाते थे. अब जब धारा 18 के तहत लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध शिकायत पर भी त्वरित कार्यवाही हो रही है ऐसे में ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे लोकतंत्र में नई जान फूंकी जा रही है. अब देखना यह होगा की यह सिलसिला कब तक चलता है और सरकारें इस विषय में और कितने कदम उठा पाती हैं जिससे आरटीआई को और मजबूत और शसक्त बनाया जाए और जन जन तक सूचना पहुच सके और लोकतंत्र में पारदर्शिता आ सके.

     वैसे यह कहना गलत नही होगा की फिलहाल तो मात्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह ही एकमात्र आशा की किरण हैं बांकी सूचना के मामले में देश की स्थिति तो सभी को स्पष्ट ही है.
संलग्न - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें राज्य सूचना आयुक्त महोदय श्री राहुल सिंह जी द्वारा धारा 18 की शिकायत पर की गई कार्यवाही की प्रतियां. साथ में राहुल सिंह जी की तस्वीरें. साथ में ट्विटर से स्क्रीनशॉट. आवेदक द्वारा धारा 18 के तहत भेजी गई शिकायत की पीडीएफ फ़ाइल आदि.
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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़, तहसील मनगवां, 

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587








Friday, August 23, 2019

धड़ल्ले से दौड़ रहे ओवरलोड वाहनों की ठोकर से घायल हुई गाय, स्थिति गंभीर (मामला जिले के थाना गढ़ अन्तर्गत भठवा मार्केट के पास का, पशु संजीवनी 1962 को किया गया सूचित, डॉक्टर और सर्जनों की टीम ने किया इलाज)

दिनांक 23 अगस्त 2019, स्थान गढ़/गंगेव/भठवा, रीवा मप्र
  घोषणा वीरों की घोषणाओं के बाद भी धरातल स्तर पर गौशाला निर्माण कार्य जीरो
 स्थानीय पुलिस प्रशासन की मदद से धड़ल्ले से दौड़ रहे ओव्हर लोड वाहन
  शिवानन्द द्विवेदी एवं स्वतंत्र शुक्ला (रीवा मप्र)

      प्रदेश सरकार के द्वारा गौशाला निर्माण कार्य की घोषणा करने के बाद भी अब तक धरातल स्तर में कार्य किसी प्रकार से आरंभ होने का नाम नहीं ले रहा है। आपको बता दें कि आज दिनांक 23 अगस्त 2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की गोमाता भठवा मार्केट के बस स्टैंड में अज्ञात वाहन से दुर्घटना ग्रस्त होकर अपनी अंतिम सांस गिन रही है। घटना की जानकारी शहर वाशियों द्वारा गौरक्षक शिवानंद द्विवेदी को दी गई जिससे हाल ही में घटना स्थल पर पहुंच कर प्राथमिक उपचार कराया गया, साथ ही पशु संजीवनी एम्बुलेंस 1962 को सूचना प्रेषित की गई, लेकिन अब तक 3 घन्टे बाद भी संजीवनी उपस्थित नहीं हो पाई। अंत मे शाम 4 बजे पशु संजीवनी को लेकर गंगेव वेटेरिनरी एक्सटेंशन अधिकारी उपस्थित हुए जिनके साथ आये सर्जनों ने गाय का इलाज किया।
   सुबह लगभग 11 बजे यद्यपि कम्पाउण्डर और ड्रेसर संतलाल साहू एवं रामानुज कोल के द्वारा प्राथमिक उपचार तो किया गया है लेकिन सर्जन के आने के बाद ही प्लास्टर हो पाया, वहीं घटना स्थल पर  उपस्थित लोगों का कहना था कि, गाय के पेट में लगभग 5 माह के गर्भ में बच्चा था जो ठोकर लगने से सम्भवतः मर चुका था लेकिन जिस प्रकार गाय जीवित बची हुई थी इससे डॉक्टरों का कहना था कि गाय के पेट मे बच्चा तब तक मरा नही था।
क्या कहना है इनका
गौरव शुक्ला निवासी भठवा - "गौरक्षक श्री शिवानंद द्विवेदी जी के द्वारा हमें गाय एक्सीडेंट होने की  सूचना मिली तो हमनें संबंधित अधिकारियों को इस विषय पर अवगत कराया, साथ ही प्राथमिक उपचार करा के ट्रेक्टर ट्राली  के माध्यम से गाय को परिजनों के घर पहुंचा दिया "
 गिरीश पटेल निवासी बांस-  "जब से यह रोड हाइवे बनी है तब से ओव्हर लोड बहनों की निकशी के चलते लगातार इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं।"
ओम शुक्ला निवासी भठवा - "पशुओं की तो गिनती नहीं की एक दिन में कितने दुर्घटना के शिकार होते हैं आए दिन लोगों के साथ भी यही होता है। स्थानीय पुलिस प्रशासन की सह से ओव्हर लोड बहनों की धड़ल्ले से निकासी होती है। इसका विरोध भी किया गया लेकिन कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है।"
 शिवानंद द्विवेदी, गौरक्षक सामाजिक कार्यकर्ता - "यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी बड़े बड़े ट्रक घरों में घुस चुके हैं। पता नहीं कितने व्यक्ति व मवेशी दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं। इसलिए साशन प्रशासन संदर्भित विषय को संज्ञान में ले ओव्हर लोडेड व भारी वाहनों के निकासी में प्रतिबंध लगाएं। साथ ही क्षेत्र में बनाएं जाने वाली गौशाला के निर्माण कार्य में भी तीव्रता आए जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।"
   गोशालाएं न बनने से बेसहारा मवेशियों की हालत खराब
     मप्र में वर्तमान सरकार द्वारा 1000 गोशालाओं को बनाये जाने हेतु प्रस्ताव लाया गया है जिनमे से काफी गोशालाओं को बनाये जाने हेतु जगह भी चिन्हित कर ली गयी हैं। जिला रीवा में ही अकेले 33 गोशालाएं खोली जानी हैं जिनमे से 30 गोशालाओं के निर्माण  हेतु टीएस भी जारी किए जा चुके हैं लेकिन ग्राउंड वर्क न होने से स्थिति दयनीय बनी हुई है।
  हिनौती और बांस ग्राम पंचायत में मात्र खोदे गए गड्ढे
    बता दें कि गंगेव ब्लॉक के हिनौती एवं बांस ग्राम पंचायत में गोशाला निर्माण के नाम पर अब तक मात्र गड्ढे ही खोदे गए हैं। कुछ गड्ढे खोदे जाने के बबाद बाहर के मजदूरों द्वारा कार्य अधूरा छोंड़कर भाग जाने के कारण मनरेगा का कार्य पूर्णतया बन्द हो चुका है। ज्ञात हो कि मनरेगा के कार्य बाहरी मजदूरों नही बल्कि पंचायत और आसपास के मजदूरों के द्वारा करवाये जाते हैं। जबकि उक्त पंचायतों में गोशाला निर्माण के प्रारम्भ से ही धांधली प्रारम्भ होगयी है जिसकी निगरानी शासन प्रशासन को करना अत्यंत आवश्यक है।
  वाहनों की स्पीड पर लगे रोक, ऐरा प्रथा पर भी लगे लगाम
    आज सबसे ज्यादा मवेशी वैष्णो6 और सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं।सतना से बेला, क्योटी से कलवारी, मनगवां से चाकघाट एवं मनगवां से हनुमना अथवा शहरी रोड कोई भी सड़कें हो, इनमे बेतरतीब और रेलमपेल दौड़ने वाले ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों की वजह से रोज सैकड़ों ऐरा मवेशी इसका शिकार हो रहे हैं। सामान्य तौर पर फसल नुकसानी बचाने के लिए होने वाली पशु क्रूरता तो है ही लेकिन उससे कहीं भयावह स्थिति सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने वाले मवेशियों की है। इस कारण जब तक ऐरा प्रथा में रोक नही लगती और ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों पर नियत्रण और कार्यवाही नही होती तब तक कुछ भी कह पाना मुश्किल है। भठवा मार्केट के पास की घटना उसका एक पहलू मात्र है।
संलग्न - कृपया दुर्घटना से बुरी तरह घायल गाय की स्थिति एवं तत्पश्चात सर्जनों एवं डॉक्टर द्वारा किया गया इलाज की फ़ोटो।
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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587





Tuesday, February 12, 2019

रीवा ब्रेकिंग- मजदूरी के स्थान पर मिली जेल, मजदूरों के मानवाधिकार का हुआ घोर हनन (मामला जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत डाढ़ पंचायत का जहाँ सैकड़ों मजदूर मजदूरी न मिलने को लेकर कर रहे थे अनसन, गढ़ पुलिश आयी और उठाकर ले गयी, अनसन में महिलाएं बुजुर्ग भी थे सम्मिलित)

दिनांक 12 फरवरी 2019, स्थान - गढ़/कटरा, रीवा मप्र
  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
    लोकतंन्त्र की हत्या कर पुलिसिया राज कैसे स्थापित हो रहा है इसका एक जीता जागता उदाहरण दिखा रीवा जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत आने वाली घाट के ऊपर स्थित डाढ़ पंचायत में।
   मजदूरी न मिलने पर सौंपा था ज्ञापन
    विंध्य किसान परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता पुष्पराज तिवारी, डाढ़ निवासी गीता साकेत एवं ममता साकेत द्वारा बताया गया कि वह सभी अपने गांव के सैकड़ों मजदूरों के साथ 42 मजदूरों के मनरेगा में मेढ़ बंधान में मिट्टीकरण के किये गए कार्य के पैसे की माग कर रहे थे जिसके लिए पिछले सप्ताह मजदूरों ने त्योंथर सीईओ, एसडीएम, एवं जिला कलेक्टर को विधिवत लिखित ज्ञापन सौंपा था जिसके लिए माग की थी कि यदि 10 फरवरी 2019 तक यदि डाढ़ पंचायत के पंच परमेश्वर एवं मनरेगा के कार्यों की विधिवत जांच होकर 42 मजदूरों को उनकी मजदूरी नही दी जाती तो सभी मजदूर 11 फरवरी से अनसन प्रदर्शन करेंगे। 
      मनरेगा मजदूरी न मिलने पर कर रहे थे अनसन, पुलिश आयी और भर ले गयी थाने
    इस बीच कोई प्रशासनिक सुनवाई न होने पर सभी मजदूर पूर्व सूचना के आधार पर डाढ़ पंचायत भवन के सामने उपस्थित होकर प्रदर्शन कर रहे थे। दिनाँक 12 फरवरी को अनसन का दूसरा दिन था तभी सुबह 11 बजे के लगभग गढ़ पुलिश टी आई सीके तिवारी, एवं मनगवां एसडीओपी के निर्देश पर एसआई शैलेन्द्र सिंह अपने बल के साथ आये और शिवकुमार साकेत सहित अन्य मजदूरों को गाड़ी में भरकर गढ़ थाने ले गए।
    क्या लोकतंन्त्र में अनसन करना है अपराध?
    जिस प्रकार से लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण ढंग से अपने पंचायत भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे मनरेगा के मजदूरों को गढ़ पुलिश उठाकर थाना ले गयी उससे साफ जाहिर है कि लोकतंन्त्र की हत्या कर मजदूरों और आम नागरिकों के मानवाधिकार का अच्छा खासा उल्लंघन किया जा रहा है।
   पुलिश ने क्यों नही की मामले की जांच?
   सवाल यह भी है कि आखिर गढ़ पुलिश टी आई सीके तिवारी द्वारा वास्तविकता जानने का प्रयाश क्यों नही किया गया? क्या यह पुलिश विभाग को नही पता था कि आखिर मजदूर इकठ्ठा होकर किस बात के लिए प्रदर्शन कर रहे थे? क्या सबसे पहले अपराध ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव एवं सीईओ त्योंथर के खिलाफ नही बनता? आखिर मजदूरों ने जब मनरेगा में कार्य किया है तो उनकी मजदूरी किस आधार पर नही दी जा रही क्या सीईओ अथवा पंचायत विभाग ने लिखित तौर पर मजदूरों को अवगत कराया था?
   हिटलरवादी तंत्र में कमजोर का जीना दूभर
   इन सब प्रश्नों के जबाब यह हिटलरवादी तंत्र नही दे सकता क्योंकि यह तो अंग्रेजों के समय की पुलिश है जो अपनी अकल कम लगाती है और नेताओं रसूखदारों की ज्यादा सुनती है। आज गढ़ पुलिश के यह हाल हैं कि यहाँ अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है और अपराधियों पर लगाम नही लग पा रहा है जबकि अपनी नाकामी छुपाने के लिए गढ़ पुलिश निर्दोषों कमजोरों और मजदूरों को निशाना बनाकर उन्हें जबरन कठघरे में खड़े कर रही है।
   वास्तव में देखा जाय तो गढ़ पुलिश इस मामले को पंचायत विभाग पर दबाब डालकर मजदूरों की मजदूरी दिलवाने में एवं पंचायती भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती थी लेकिन उल्टे अपने नाकामी छुपाने के लिए पुलिश ने एक कमजोर बेरोजगार मजदूर के मानवाधिकार को खत्म करते हुए मजदूर को ही सलाखों के पीछे पहुचा दिया। 
    अब देखना यह होगा कि मजदूरों की इस शिकायत पर गढ़ पुलिश एवं पंचायत सरपंच सचिव के विरुद्ध क्या कार्यवाही होती है?
संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखें अनसन प्रदर्शन करते डाढ़ पंचायत के मजदूर एवं दिए गए ज्ञापन की फ़ोटो।
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा, मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, February 11, 2019

ग्राम पंचायत भवन डाढ़ में मजदूरों ने किया तालाबंदी,अधिकारियों ने नही ली सुध, जारी रहेगा धरना प्रदर्शन

दिनाँक 11 फरवरी 2019, स्थान - कटरा, रीवा मप्र
  जिले के जनपद पंचायत त्योंथर अन्तर्गत ग्राम पंचायत डाढ़ में मजदूरों ने पंचायत विभाग और जिला प्रशासन को लिखित सूचना के उपरांत पंचायत भवन में तालाबंदी कर दिया।
  लिखित ज्ञापन के बाद भी दिनाँक 11 फरवरी को पूरे दिन पंचायत भवन में कोई अधिकारी सुध लेने नही पहुचा। आलम यह था कि पंचायत भवन में पूरे दिन पंचायत भवन में पंचायत कर्मचारियों द्वारा लगाया गया ताला लटकता रहा इस पर जब कोई अधिकारी नही पहुचा तो मजदूरों ने दूसरा ताला भी लगा दिया और अगले 14 फरवरी तक आंदोलन करते रहने की चेतावनी दी है।
 इन मुद्दों को लेकर किया तालाबंदी
  डाढ़ पंचायत के मजदूर एवं विंध्य किसान परिषद के सक्रिय सदस्य पुष्पराज तिवारी, शिवकुमार साकेत, इंद्रलाल साकेत, लालबहादुर साकेत, दीनदयाल, मुन्नी, संगीता, पुरुषोत्तम आदि सैकड़ों मजदूरों ने बताया कि ग्राम पंचायत डाढ़ में पिछले कई वर्षों से मनरेगा के कार्यों में व्यापक भ्रष्टाचार किया जा रहा है जिसको लेकर मजदूरों ने दर्जनों मर्तबा पंचायत विभाग एवं प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है लेकिन न तो कोई जांच हुई और न ही कोई सुनवाई जिसके चलते मजदूरों ने कई बार तहसील एवं सीईओ कार्यालय त्योंथर में धरना प्रदर्शन किया हुआ है।
  इस बार 4 दिवशीय तालाबंदी एवं धरना प्रदर्शन पंचायत कार्यालय डाढ़ में करने का निश्चय किया गया है।
 माग नही पूरी हुई तो लंबा चलेगा आंदोलन
   विंध्य किसान परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता पुष्पराज तिवारी ने बताया कि यदि मजदूरों को मजदुरी और उनके मागों को नही माना गया तो यह आंदोलन चलता रहेगा।
कलवारी मोड़ राष्ट्रीय राजमार्ग में होगा चक्का जाम
  पुष्पराज तिवारी ने बताया कि यदि मजदूरों की मांगें नही मानी गयी तो दिनांक 14 फरवरी 2019 को कलवारी मोड़ राष्ट्रीय राजमार्ग 27 में चक्का जाम किया जाएगा। इस बीच बताया गया कि मजदूरों के मुद्दों के साथ साथ कलवारी से क्योटी मार्ग पर ओवरलोडेड वाहनों की फर्राटा दौड़ और इससे आमजन को होने वाली असुविधा को लेकर एवं कटरा बाजार की बदहाल सड़क की स्थिति को लेकर भी चक्का जाम किया जाएगा।
संलग्न - दिनांक 11 फरवरी को मजदूरों द्वारा किये गए धरना प्रदर्शन एवं आन्दोलन की फ़ोटो एवं ज्ञापन की फ़ोटो संलग्न हैं।
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र मोब 9589152587, 7869992139








Tuesday, January 15, 2019

पावर प्लांट चचाई में जंगल बीच करंट लगाकर चीतल एवं भैंसों का हुआ शिकार, वन विभाग पल्ला झाड़ रहा, पुलिश को कुछ फर्क नही पड़ता (मामला जिले में बढ़े वन अपराधों का जहाँ एमपीईबी पावर प्लांट चचाई के पास जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर अखंड प्रताप सिंह की 5 भैंसों को मार डाला गया, लंबे अरसे से करंट लगाकर चीतल का किया जा रहा था शिकार, बदकिस्मती से लाखों की फंस गयीं भैंसें)

दिनाँक 15 जनवरी 2019, स्थान - चचाई पावर प्लांट, सिरमौर, रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    प्रदेश एवं जिले में निरंतर बढ़ रहे बेलगाम वन अपराधों की श्रेणी में एक और अध्याय जुड़ चुका है. अभी तक तो नहरों, घाटियों, जलप्रपातों के बीच में मवेशियों को जीवित धकेले जाने की वारदातें सामने आईं थीं लेकिन अब तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे पूरे जंगल विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने वाला है. जी हाँ यहां कोई पहेलियां नही बुझाई जा रही बल्कि सच्चाई के समाज को अवगत कराया जा रहा है.

    जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर किया जाता रहा शिकार

    यह मामला है चचाई जलप्रपात से होकर जाने वाले जंगल का जहां से होते हुए लगभग 7 से 8 किमी दूर जंगल के रास्ते बकिया-बीहर नहर पावर प्लांट चचाई से अतरैला वन परिक्षेत्र के जंगल तक जाती है. अभी पिछले दिनों ही इसी नहर में इंटेक प्लांट के पास दर्ज़नों गोवंशों के उतराते हुए शव मिले थे जो मीडिया में और समाज में हलचल पैदा कर दिए थे. अभी एक और मामला सामने आया है जो महीनों पुराना बताया गया है जिंसमे पीड़ित अखंड प्रताप सिंह निवासी मरैला ने लिखित तौर पर पुलिश एवं वन विभाग को शिकायत भी की लेकिन कार्यवाही नही हुई है.

    मामला है 5 भैंसों और एक चीतल का जंगल के बीच करंट से फंसकर मौत का

   सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की जंगल के बीचोंबीच आखिर करंट आया कहां से लेकिन चकित मत होइये बता दें की चचाई पावर प्लांट बस नजदीक ही स्थित है जो 315 मेगावाट की बिजली उत्पन्न करता है. यह पावर प्लांट सरकार के ऐसे नियमों के अन्तर्गत बनाया गया है जो जंगल भूमि का भी उपयोग कर रहा है यद्यपि इस पावर प्लांट का कर्ताधर्ता एमपीईबी विभाग है.

   दिसंबर दूसरे सप्ताह की है वारदात  

    दिनाँक 12-13 दिसंबर के आसपास मरैला निवासी अखंड प्रताप सिंह उम्र लगभग 65 वर्ष की चार भैंसें एवं एक भैसा भैंसहटी नामक चचाई घाट  के नीचे चरने के लिए उतारे गए थे. बताया गया की यहीं एमपीईबी पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली का दुरुपयोग करके अर्जुन केवट नामक जवा निवासी उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए करंट लगाया था जिसमे अखंड प्रताप सिंह की 4 नग जीवित पजाने योग्य भैंसें एवं एक नग भैंसा सब मिलाकर लगभग 4 से 5 लाख कीमत की फंसकर मारे गए।

   अतरैला थाने एवं वन विभाग में लिखित दी सूचना

    अखंड प्रताप सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर घटना की सूचना  तत्काल अतरैला थाना एवं वन परिक्षेत्र अतरैला में दी गई लेकिन न तो वन विभाग द्वारा और न ही पुलिश विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज की गई. जबकि देखा जाए तो दोनों ही दृष्टि से करंट लगाकर जंगल के अंदर शिकार और मवेशियों का उसमे फंसकर मारना एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे वन विभाग को पीओआर और पुलिश विभाग को बकायदे एफआईआर दर्ज करना चाहिए.

   वेटेरिनरी अधिकारी ने शव न मिलने का बनाया बहाना

     बता दें की इस घटना के विषय में जब जवा वेटेरिनरी अधिकारी आर पी गौतम मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने पूरा दोष वन विभाग और पुलिश विभाग पर मढ़ दिया और बताया की हमे मृत भैंसों का कोई भी अंग नही मिला. जबकि पीड़ित अखंड प्रताप दवारा बताया गया को मृत भैंसों के कुछ पैर वगैरह अंग अभी भी वहीं जंगल में पड़े हुए हैं जिनको आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर फेंक दिया था जिससे यह पता न चले की घटना करंट लगाकर कारित हुई है. जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो ही जाती है की जीव केई मृत्यु के क्या कारण थे.

 क्या कहा अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने

    जब प्राथमिकी दर्ज न किये जाने के विषय में अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की वह मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं जबकि मेडिकल रिपोर्ट इसलिए नही बनी की वेटेरिनरी अधिकारी को मवेशियों के शव ही नही मिले.

    चश्मदीख गवाह भी है पुख्ता प्रमाण 

    यद्यपि इस पूरे मामले में एक चश्मदीख गवाह भी मौजूद है. चश्मदीख प्रदीप कुमार कोल उर्फ विधायक पिता चंद्रशेखर कोल उर्फ बेसहना निवासी मरैला उम्र लगभग 20 वर्ष के द्वारा पूरी घटना की जानकारी बतायी जा चुकी है लेकिन थाना प्रभारी अतरैला प्रदीप सिंह का अब यह कहना है की जब तक आरोपी अर्जुन केवट को पुलिश पकड़ कर पूंछताछ नही करेगी तब तक प्राथमिकी दर्ज नही होगी. वहरहाल अभी तक पुलिश ने आरोपी को ढूंढने तक का प्रयाश नही किया है जबकि घटना कारित हुए एक माह से ऊपर बीत चुके हैं. 

   रेंज अफसर अतरैला का वीडियो वायरल

    बता दें की रेंज अफसर अतरैला का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमे रेंज अफसर स्वयं भी घटना कारित होने की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं और बता रहे हैं की करंट से न केवल भैसों की मौत हुई हैं बल्कि चीतल की भी मौत हुई है. पर अब सवाल यह उठता है की आखिर जंगली संरक्षित क्षेत्र में एमपीईबी पावर प्लांट के करंट द्वारा असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार जैसे संगीन अपराध के लिए अब तक रेंज के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया? आखिर पूरे मामले में एमपीईबी की भी तो जबाबदेही तय है की आखिर उनके द्वारा पावर प्लांट में उत्पन्न की जाने वाली बिजली का दुरुपयोग आपराधिक किस्म के लोग कैसे कर रहे हैं?

 संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें पीड़ित अखंड प्रताप सिंह दवारा लिखित दिया गया आवेदन एवं साथ में करंट में मृत हुई भैंसों के कंकाल आदि जिन्हें बताया गया की आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर वहीं नदी में फेंक दिया था.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Friday, January 4, 2019

चल-पशु तस्करी मामले में टी आई के विरुद्ध आई जी को की गयी शिकायत, पत्रकारों ने कार्यवाही की किया माग (बैकुंठपुर थाना क्षेत्र का है मामला जिसमे चल-पशु तस्करी पर पर्दा डालने पुलिश ने पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसाने की दी थी धमकी साथ ही पत्रकारों को टी आई मंगल सिंह ने बताया था फ़र्ज़ी)

दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।

   बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब

   बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।

चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे

   सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है? 

    इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।

    पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत

    चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है। 

    बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।

   बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।  

     सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।

     पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।

संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।

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शिवानन्द द्विवेदी

 सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139