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Sunday, January 3, 2021

MP//Rewa//Bhopal सूचना का अधिकार एक सत्याग्रह का साधन है - RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग // RTI में महिला सहभागिता विषय पर 28 वें ज़ूम मीटिंग वेबीनार का हुआ आयोजन // राहुल सिंह ने महिला आवेदकों को दिया नए साल की व्यवस्था - अब मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिए जीआरडी डेस्क पर सूचना आयोग करेगा तत्काल सुनवाई

दिनाँक 03 जनवरी 2021 रीवा मप्र

    सूचना का अधिकार और महिला सहभागिता विषय पर 28वें राष्ट्रीय ज़ूम मीटिंग वेबीनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने किया जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी, माहिती अधिकार मंच मुंबई के संयोजक भास्कर प्रभु, माहिती अधिकार गुजरात पहल संस्था की संस्थापक एवं आरटीआई हेल्पलाइन प्रारंभ करने वाली आरटीआई एक्टिविस्ट पंक्ति जोग, उत्तराखंड से आरटीआई एक्टिविस्ट विभा नामदेव सहित दर्जनों आरटीआई एक्टिविस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता, सिविल राइट्स एक्टिविस्ट आदि सम्मिलित हुए। 


    मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश आदि प्रदेशों से दर्जनों एक्टिविस्टों ने कार्यक्रम में भाग लिया और विषय पर अपने विचार रखें तथा समस्याओं का समाधान पाया।

  कार्यक्रम का संयोजन समन्वयक एवं प्रबंधन का कार्य आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी, अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद मिश्रा, शिवेंद्र मिश्रा, अंबुज पांडे के द्वारा किया गया।

   सूचना का अधिकार एक सत्याग्रह का साधन है - पंक्ति जोग

   कार्यक्रम में गुजरात से पधारी सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट पंक्ति जोग ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2006 में माहिती अधिकार गुजरात पहल नामक संस्था की स्थापना की एवं साथ में उसी वर्ष एक लीगल आरटीआई हेल्पलाइन भी प्रारंभ किया। वर्ष 2001 में कच्छ में आए भूकंप ने पंक्ति जोग को अपनी विज्ञान से संबंधित ओसओनोग्राफी विषय में पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर किया और फिर वह सामाजिक क्षेत्र के कार्य मे लग गई। उन्होंने बताया कि प्रारंभ में उनके पास कोई व्यवस्था नहीं होती थी और वालंटियर आधारित कार्य प्रारंभ किया और इस प्रकार जनपद के ही स्थान का प्रयोग कर एक लैंडलाइन नंबर उपयोग करती थी। इसके बाद उन्होंने पहला लीगल आरटीआई हेल्पलाइन नंबर 9924085000 लांच किया जिसमें मात्र इनकमिंग कॉल आते हैं और लोग अपनी समस्याएं बताते हैं जिनका निदान किया जाता है। उन्होंने बताया कि लीगल हेल्पलाइन नंबर में अब तक 10 लाख से अधिक कॉल आ चुके हैं और लोक सूचना अधिकारियों से लेकर आम जनमानस तक ने अपनी समस्याओं को रखा है और समाधान पाया है। पंक्ति ने बताया कि सूचना का अधिकार हेल्पलाइन एक हथियार नहीं बल्कि औजार की तरह है जिसके प्रयोग से समाज में लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने अकाउंटेबिलिटी और रिस्पांसिबिलिटी बनाने में मदद मिली है। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार एक सत्याग्रह का साधन है और यदि साधन का प्रयोग हम करते रहे तो हमारे सामाजिक स्तर और प्रशासनिक व्यवस्था में काफी सुधार आ सकता है। उन्होंने बताया कि आज इस आरटीआई हेल्पलाइन नंबर में साउथ इंडिया की कुछ भाषाओं को छोड़कर अन्य देश के सभी जगह हिंदीभाषी, गुजराती, मराठी, इंग्लिश आदि भाषा के लोग अपनी बात रखते हैं और समाधान पाते हैं। उन्होंने कहा कि आरटीआई कानून मात्र कागज कट्ठा करने का नाम नहीं है बल्कि इससे हर सरकारी विभाग का कामकाज आम नागरिक की पहुंच में आ जाता है जिससे सरकारी विभागों की जिम्मेदारी बढ़ती है।

   आरटीआई ऑन व्हील्स हमारा सबसे बड़ा प्रयोग - RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग

   गुजरात से पधारी आरटीआई कार्यकर्ता पंक्ति जोग ने बताया कि उनका अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग आरटीआई हेल्पलाइन के बाद आरटीआई ऑन व्हील रहा है जिसे हम सामान्य तौर पर कानून की गाड़ी बोल सकते हैं। आरटीआई ऑन व्हील्स के द्वारा वह गुजरात सहित अन्य प्रदेशों में जगह-जगह जाकर आरटीआई कानून का प्रचार करते हैं और उन्हें और लोगों को बताते हैं कि किस प्रकार से आरटीआई का उपयोग कर वह अपने अधिकारों की माग कर सकते हैं। यहां तक कि उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक अलग से आरटीआई ऑन व्हील्स गाड़ी की व्यवस्था की है जिसमें पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं, आरटीआई से संबंधित पोस्टर, पंपलेट और अन्य जानकारी के माध्यम जिसमे टीवी, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जिसमे सीडी, कैसेट, लाउडस्पीकर सभी व्यवस्थाएं हुआ करती हैं इस आरटीआई ऑन व्हील्स से प्रचारित किया जा रहा है।


   आरटीआई हेल्पलाइन में महिलाओं के फोन कॉल्स का करते हैं विश्लेषण - RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग

   पंक्ति जोग ने बताया कि आरटीआई हेल्प लाइन में जो फ़ोन कॉल आते हैं उनमें पीड़ित महिलाओं के द्वारा किए जानेवाले कॉल का अलग से विश्लेषण किया जाता है और बाद में उनकी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है जिससे महिलाओं को आरटीआई के प्रति और अधिक जोड़ा जा सके और उन्हें जागरूक बनाया जा सके। आरटीआई हेल्पलाइन में समाज और प्रशासन से जुड़ी हुई हर प्रकार की समस्याएं जिसमें खाद्य, मनरेगा, मजदूरी, किसानों की समस्याएं, पीड़ित महिलाओं की समस्याएं से लेकर लोक सूचना अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी तक अपनी समस्याएं लेकर के आते हैं जिनका समाधान किया जाता है। उन्होंने बताया कि वह राजस्थान, हिमांचल और गोवा में भी इस आरटीआई ऑन व्हील्स को लेकर आरटीआई कानून का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। आरटीआई कानून सशक्तिकरण के औजार की तरह उपयोग किया जा रहा है।

   रंजन और उषा बहन बनी आरटीआई कानून की स्पोक्सपर्सन- RTI एक्टिविस्ट पंक्ति जोग

   पंक्ति जोग ने बताया कि उनके पास एक ऐसा मामला आया जिसमें उषा बहन नामक विकलांग और कमजोर महिला के द्वारा चलाए जाने वाले टेलीफोन बूथ को वहां की टेलीकॉम कंपनी ने तोड़ दिया था जिसके विषय में उषा बहन ने आरटीआई दायर कर जानकारी मांगी तो जानकारी नहीं दी गई जिसके बाद मामला आयोग में पहुंचा और आयोग ने पूरी जानकारी निकलवाई जिसमें वह आदेश भी जानने का प्रयास किया जिसके तहत टेलीफोन बूथ को हटाया गया था। इसके बाद बताया गया कि टेलीकॉम कंपनी ने वापस लाकर टेलीफोन बूथ लगा दिया और अब उषा बहन आरटीआई कानून को स्वयं भी उपयोग करती है और अन्य सभी पीड़ितों को मदद करती हैं। इसी प्रकार एक अन्य मामले के विषय में रंजन बहन का उदाहरण लेते हुए पंक्ति जोग ने बताया कि वह एक ऐसी महिला हैं जो बोलने और सुनने में असमर्थ हैं लेकिन फिर भी आज वह आरटीआई की समझ रखती हैं। वह आरटीआई के बारे में दिव्यांग लोगों को प्रेरित करती हैं और उनकी मदद करती है। पंक्ति ने कहा कि सही मायने में देखा जाए तो उषा बहन एवं रंजन बहन आरटीआई कानून की स्पोक्सपर्सन है।

   पंक्ति जोग जैसी महिलाएं आगे आए तो देश की दशा और दिशा दोनों बदल जाए- राहुल सिंह

   गुजरात से  ज़ूम मीटिंग में सम्मिलित हुईं पंक्ति जोग के कार्यों की प्रशंसा करते हुए मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की पंक्ति जोग जैसी महिलाएं यदि समाज में आगे आ जाएं तो देश की दिशा और दशा दोनों बदल जाए। राहुल सिंह ने आरटीआई हेल्पलाइन और माहिती अधिकार गुजरात पहल के कार्यों आरटीआई ऑन व्हील्स की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्य मध्यप्रदेश में भी किए जाने चाहिए जिससे महिलाओं को आरटीआई कानून के विषय में जागरूक कर उनके अधिकारों के बारे में सचेत किया जाए।

   अब मध्यप्रदेश में महिलाओं के लिए जीआरडी डेस्क पर सूचना आयोग करेगा तत्काल सुनवाई - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

   3 जनवरी 2021 को वेबिनार मीटिंग के दौरान मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि जिस प्रकार गुजरात में पंक्ति जोग ने आरटीआई हेल्पलाइन खोलकर एवं साथ में संस्था स्थापित कर आरटीआई ऑन व्हील्स आदि के माध्यम से आरटीआई के प्रति जागरूकता फैला रही है और महिलाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहित कर रही है वैसे ही मध्यप्रदेश में भी अब यदि कोई महिला आरटीआई आवेदन अथवा अपील लेकर आयोग के समक्ष आती हैं तो उनकी अपील और शिकायत को प्राथमिकता दी जाएगी और आउट ऑफ टर्न मामले की सुनवाई की जाएगी जो कि मध्य प्रदेश में ऐसा पहली बार होगा। 


    राहुल सिंह ने बताया कि जीआरडी नंबर पर कॉल कर महिलाएं अपना आवेदन भेज सकती हैं और साथ में जानकारी प्राप्त कर सकती हैं। सूचना आयुक्त ने आगे कहा कि यदि महिलाएं आरटीआई के फील्ड में आगे आती हैं तो इससे कार्यालयों की मनमानी बंद हो जाएगी क्योंकि जिस प्रकार लोक सूचना अधिकारी आम आदमी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं वैसा वह किसी महिला आरटीआई कार्यकर्ता के साथ नहीं कर पाएंगे। सूचना आयुक्त ने कहा कि 4 जनवरी 2021 से यह व्यवस्था मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में लागू कर दी जाएगी।

गिरीश चंद देशपांडे बनाम राजगोपाल आदेश पर हुआ डिबेट

   इस बीच सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 में धारा 8(1)(जे) जिसमें कोई जानकारी न दिए जाने का प्रावधान मात्र इस आधार पर होता है कि वह जानकारी व्यक्तिगत है अथवा उस जानकारी का लोकहित से कोई विशेष लेना देना नहीं है इस विषय पर आज जूम मीटिंग के दौरान डिबेट हुआ जिसमें पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने बताया की लोक सूचना अधिकारियों के द्वारा गिरीश चंद्र देशपांडे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आधार बनाकर 8(1)(जे) के तहत जानकारी न दिया जाना आरटीआई कानून की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। शैलेश गांधी ने कहा कि जब भी आयोग के समक्ष गिरीश चंद्र देशपांडे का मामला रखा जाए तो उसमें राजगोपाल वाले मामले को सामने रखना चाहिए जिससे आम व्यक्ति को महत्वपूर्ण जानकारी मिल सके एवं 8(1)(जे) का हवाला देकर जानकारी छुपाया न जा सके। शैलेश गांधी ने बताया कि हम भारत के सूचना आयोगों के इतिहास में एक ऐसे निर्णय की अपेक्षा कर रहे हैं जब राजगोपाल वाले मामले को आधार बनाकर निर्णय लिए जायेंगे।


संलग्न - कृपया इसे ईमेल के साथ संलग्न जो मीटिंग वेबीनार की तस्वीरें देखने का कष्ट करें। 

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शिवानंद द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता जिला रीवा मध्य प्रदेश मोबाइल नंबर 9589 1525 87

Sunday, July 12, 2020

(Rewa/Bhopal, MP) आरटीआई की धारा 2(जे) में कर सकते हैं कार्य का निरीक्षण और ले सकते हैं सैंपल (मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह की अध्यक्षता में मानसून सत्र की पांचवीं जूम मीटिंग वेबिनार का हुआ आयोजन, पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और महाराष्ट्र महिती अधिकार मंच के अध्यक्ष भास्कर प्रभु रहे विशिष्ट अतिथि)

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को जन जन तक पहुचाने के लिए और सर्व सुलभ बनाने के लिए मप्र सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह द्वारा इस मानसून सत्र की पांचवीं वेबीनार मीटिंग का आयोजन किया गया जिसमें आरटीआई की धारा 2(जे) से जुड़ी उपधाराओं पर विस्तृत चर्चा की गई। 

   कार्यक्रम में लगभग 50 पार्टिसिपेंट्स ने भाग लिया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी एवं महाराष्ट्र महिती अधिकार मंच के संस्थापक भास्कर प्रभु रहे जिन्होंने आरटीआई कार्यकर्ताओं के विभिन्न प्रश्नों एवं कौतूहल का जबाब दिया।
कार्यक्रम का संयोजन एवं समन्वयन आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी द्वारा किया गया।

  देशभर से यह यह एक्टिविस्ट हुए सम्मिलित

   वेबिनार मीटिंग में सम्मिलित होने वाले सदस्यों में दिल्ली से अक्षय गोस्वामी, राजस्थान से आरके मीणा, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, शिवेंद्र मिश्रा, छत्तीसगढ़ से विनोद दास, नागपुर से वीरेंद्र द्विवेदी, मदन गोपाल तिवारी, सत्येंद्र शिकरवार, इंदौर से अंकुर मिश्रा, दिल्ली-हरियाणा से निखिल खुराना, हिमांशु पण्डेय, ग्वालियर से आशीष राय, रीवा से प्रदीप उपाध्याय,  राजू तिवारी, कृष्ण नारायण दुबे, स्वतंत्र शुक्ला, मेघना गटिया, शैलेन्द्र प्रताप सिंह, आदि प्रमुख रहे जिन्होंने अपने प्रश्नों के समाधान प्राप्त किये।
   क्या निरीक्षण अथवा सैम्पल लेने के लिए अलग से आरटीआई लगाना होता है?

   इस बीच दिल्ली से अक्षय गोस्वामी और अन्य के द्वारा इंस्पेक्शन और सैंपलिंग लेने के संदर्भ में प्रश्न किये गए और जानने के प्रयास किये गए कि निरीक्षण और सैंपलिंग की प्रक्रिया क्या है? क्या इसके लिए अलग से आरटीआई लगाना पड़ता है तो इसके जबाब में मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह, पूर्व सीआईसी शैलेश गांधी ने बताया कि धारा 6(1) के तहत ही आवेदन दिया जाता है और कागज़ दस्तावेज के स्थान पर कार्य के निरीक्षण, किसी स्थल के निरीक्षण और सैंपल लेना है इस प्रकार लिखा जाता है। इस प्रक्रिया में भी लोक सूचना अधिकारी को समयसीमा पर जानकारी उपलब्ध करानी होती है और यदि पीआईओ समय पर जानकारी नही देता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है।
    महाराष्ट्र में अस्पताल और दिल्ली में स्कूल  के निरीक्षण का दिया था आदेश - पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी
 
    चर्चा के दौरान मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि उनके बीच पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में काफी महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। आरटीआई की धारा 2(जे) पर ही चर्चा करते हुए बात आई कि श्री गांधी ने कई ऐसे निर्णय दिए हैं जिनमे किसी कार्य स्थल का निरीक्षण और सैंपल लेने सम्बन्धी आवेदनों पर अच्छी कार्यवाहियां की हैं। दिल्ली की स्कूलों के इंस्पेक्शन से जुड़े मामले में भी श्री गांधी द्वारा आदेशित किया गया था कि अपीलार्थी स्कूलों का इंस्पेक्शन कर सकते हैं और पीआईओ को इस पर कोआपरेट करना चाहिए। इसी प्रकार पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री गांधी द्वारा बताया गया कि ऐसे ही एक आरटीआई में मुम्बई भयंदर के कृष्णा गुप्ता द्वारा आरटीआई लगाकर अस्पतालों के निरीक्षण की बात कही गयी थी जिस पर श्री गांधी द्वारा अनुमति प्रदान की गई थी जब अपीलार्थी कृष्णा गुप्ता द्वारा हॉस्पिटल का इंस्पेक्शन किया गया तो अस्पताल प्रबंधन में कई कमियां पाई गईं थीं। इसी मामले में 50 हज़ार रुपये कीमत से अधिक के सामान खरीदी का भी इन्सपेक्शन हुआ तो पाया गया कि अस्पताल में कई सामानों की खरीदी भी नही की गई थी। इस प्रकार आरटीआई की धारा 2(जे)(आई) के तहत निरीक्षण मात्र से ही काफी महत्वपूर्ण जानकारी मिल गयी और काफी भ्रष्टाचार सामने आ गया।
   कार्यों के निरीक्षण के बाद करें जनसुनवाई, उसमें बुलाएं अधिकारी - भास्कर प्रभु

   महिती अधिकार मंच महाराष्ट्र के अध्यक्ष भास्कर प्रभु ने कहा कि उन्होंने कई ऐसे मामलों में धारा 2(जे)(आई) का प्रयोग कर समाज मे बदलाव और सकारात्मक दिशा में प्रयाश किये हैं। ऐसे ही एक मामले का उदाहरण देते हुए श्री प्रभु ने बताया कि उन्होंने अपने कम्युनिटी के लोगों के सहयोग से एक बार 4 गार्डन के निरीक्षण के लिए आरटीआई लगाई थी जिसमे उन्होंने निरीक्षण में क्रमवार कई कमियां पाई थीं एवं लगभग 80 लाख का भ्रष्टाचार पकड़ा था। उन्होंने आगे कहा कि एजेंसी से बच कर रहना चाहिए और सिर्फ अधिकारियों से ही संपर्क में रहना चाहिए क्योंकि कई बार एजेंसियों द्वारा नुकसान पहुचाया जा सकता है और अपीलार्थी पर दबाब बनाया जा सकता है।
   श्री प्रभु ने कहा कि निरीक्षण करने में पूरी कम्युनिटी के लोगों को आगे आना चाहिए और यह निरीक्षण मिलकर करना चाहिए फिर सबके साथ बैठकर जनसुनवाई के दौरान कमियों पर चर्चा कर कार्यवाही करना चाहिए। इस बीच उस विभाग से जुड़े किसी अधिकारी को भी जनसुनवाई में लेटर लिखकर बुलाना चाहिए।
   श्री प्रभु ने कहा कि निरीक्षण और सैंपलिंग एक काफी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमे सिस्टम में काफी सुधार किया जा सकता है। हॉस्पिटल में दवा का और कोटे अथवा स्टोर हाउस में अनाज का निरीक्षण और सैंपलिंग से काफी परिवर्तन देखने को मिल सकता है। इससे कालाबाजारी और भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है।

  95 प्रतिशत जानकारी धारा 4 के तहत आयोग करवाये सार्वजनिक 

    चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कई आवेदकों द्वारा प्रश्न किये गए कि आखिर धारा 4 के तहत जानकारी कैसे सार्वजनिक होती है और कैसे मिलती है क्योंकि कई बार पीआईओ द्वारा जानकारी साझा करने और उपलब्ध कराने में जानकारी की अधिकता की बातें सामने आती हैं। इसी विषय में मप्र सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के भी एक निर्णय का हवाला दिया जिसमें 75 प्रतिशत वर्क फ़ोर्स को ऐसे आरटीआई दस्तावेज कलेक्ट करने में न लगाए जाने की बात कही गयी थी और फिर उसी आदेश का हवाला देकर सभी लोक सूचना अधिकारी जानकारी देने से बच जाते हैं। इस पर श्री प्रभु का स्पष्ट कहना था कि वास्तव में देखा जाय तो मामले को सही ढंग से सुप्रीम कोर्ट में प्रजेंट न करने से ऐसी स्थिति बनी होगी।
  धारा 4(1)(a) एवं धारा 4(4) का पालन होना अनिवार्य

   भास्कर प्रभु द्वारा आगे कहा गया कि 95 प्रतिशत जानकारी धारा 4 की विभिन्न उपधाराओं के तहत स्वयमेव ही साझा होनी चाहिए और वह बिल्कुल ही आवश्यक नही की ऑनलाइन और वेबसाइट के माध्यम से ही हो। यह जानकारी लोकल स्तर पर हार्ड कॉपी के रूप में अथवा नोटिस बोर्ड में भी साझा होनी चाहिए।

   श्री प्रभु ने कहा कि धारा 4(1)(आई) में जानकारी को ऑर्गनाइज करने और कम्प्यूटरीकृत करने के स्पष्ट निर्देश हैं। लेकिन आयोग इस बात पर कोई एक्शन नहीं लेता की आखिर यह सभी विभाग जानकारी को आर्गनाइज्ड तरीके से क्यों नही रखते। यदि विभाग जानकारियां ऑर्गनाइज तरीके से रखेंगे तो निश्चित ही ज्यादातर जानकारी को रेडी टू यूज़ स्थिति में प्राप्त किया जा सकता है और वह जानकारी कोई भी कभी भी प्राप्त कर सकता है और इसमे लेबर भी नहीं लगेगा ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की 75 प्रतिशत वर्क फ़ोर्स की बात भी नही आएगी। इसी प्रकार धारा 4(4) का जिक्र करते हुए बताया गया कि इसमे पीआईओ और उस विभाग को सभी जानकारी नंबरिंग करते हुए क्रमवार और कैटलॉग के रूप में रखनी चाहिए जिससे जानकारी को ढूंढने अथवा संकलित करने में श्रम और धन का अपव्यय भी न हो और जानकारी भी अपीलार्थी को आसानी पूर्वक मिल जाय।
  महाराष्ट्र में सूचना आयुक्त श्री सारकुंडे ने 436 प्रकरणों में पीआईओ को करवाया दंडित 

   वेबिनार में चर्चा के दौरान लोक सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीलीय अधिकारियों द्वारा जुर्माना राशि के न भरने की भी बात आई जिसमे भास्कर प्रभु द्वारा बताया गया कि महाराष्ट्र में सूचना आयुक्त श्री सारकुंडे द्वारा काफी सराहनीय कार्य किये गए हैं। श्री सारकुंडे ने कुल 436 मामलों में जुर्माने की कार्यवाहियां की हैं जिसमे कुल एक करोड़ 8 लाख रुपये का फाइन लगाया हुआ है। श्री सारकुंडे ने 49 मामलों में अनुशासनात्मक कार्यवाही करवाई है, और लगभग 39 प्रकरणों में अपीलार्थी को सरकारी बाबुओं द्वारा 1 हजार से 5 हज़ार के बीच हर्जाना  भी भरवाया गया है।
  मप्र सूचना आयोग में पीआईओ/एफएओ समय पर नही भर रहे जुर्माना राशि

   मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा बताया गया कि सूचना के अधिकार को और अधिक मजबूत बनाने के लिए मप्र में अभी काफी कार्य किया जाना है और इस मामले को सामान्य प्रशासन विभाग को भी लिखा जा चुका है। बता दें कि सूचना आयुक्त श्री सिंह द्वारा मप्र में काफी ताबड़तोड़ कार्यवाहियां चल रही हैं लेकिन लोक सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीलीय अधिकारियों द्वारा जुर्माने की राशि समय पर नही भरी जा रही हैं जिससे उनके विभाग प्रमुखों को इसके बारे में लगातार लिखा जा रहा है।  जब विभाग प्रमुख भी कंप्लायंस नही करवाते हैं तो डीएम कलेक्टर को कुर्की के लिए लिखा जाता है। 
   हालांकि इस मामले में उपस्थित सभी विशेषज्ञों द्वारा यह कहा गया कि इस पर सभी आरटीआई से जुड़े कार्यकर्ताओं को एकजुट होकर सरकार पर दबाब बनाना चाहिए और कार्यवाही के लिए लिखना चाहिए।

   हम चाहते हैं द्वितीय अपील प्राप्त होने के तीन दिन के भीतर जारी करें नोटिस - मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह

   देश के कई सूचना आयोगो की ही तरह मप्र सूचना आयोग में भी पेंडेंसी एक बहुत बड़ा इशू बनकर सामने आया है। जानकारी के अनुसार आयोग में लगभग 7000 प्रकरण लंबित होने से नए मामलों पर कार्यवाही में देरी होना स्वाभाविक बात है। बताया गया कि औसतन 500 मामले हर महीने पंजीकृत किये जाते हैं। 
   हालांकि इस विषय को गंभीरता से लेते हुए मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा इंटर्न की अपील की गई है जिनका कार्य आयोग के कार्यों में सहयोग देना होगा। इंटर्न को सेवा समाप्ति पर उनके उत्कृष्ट सहयोग के लिए सर्टिफिकेट भी वितरित की जाएगी।
   इस बीच श्री सिंह ने कहा कि पेंडेंसी कम होने पर हम चाहते हैं कि अपीलार्थी को न्याय के लिए ज्यादा समय तक इन्तेजार न करना पड़े और द्वितीय अपील प्रस्तुति के तीन दिन के भीतर ही संबधित लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी को नोटिस जारी कर दी जाय और मामले की प्रोसीडिंग प्रारंभ कर दी जाय।
   इस प्रकार वेबीनार कार्यक्रम लगभग 2 घण्टे तक चला जिसमे एक्टिविस्टों ने उपस्थित विशेषज्ञों से अपने अपने प्रश्नों से संदेहों को दूर किया। वेबीनार मीटिंग हर रविवार सुबह 11 बजे से 01 बजे तक आयोजित की जाती है। 


संलग्न - कृपया संलग्न कार्यक्रम की फ़ोटो देखने का कष्ट करें।

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शिवानन्द द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिला रीवा मप्र। मोबाइल 9589152587

Sunday, June 21, 2020

(Rewa/Bhopal, MP) " Big Breaking- आरटीआई में प्रश्न सूचक शब्द, किन बातों का रखें खयाल" पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आयोजित (मप्र राज्य सूचना आयुक्त द्वारा दूसरी जूम मीटिंग में दिया गया कई प्रश्न का जबाब, पार्टिसिपेंट्स में दिखा भारी उत्साह, हर रविवार को सुबह 11 से 12 बजे के बीच आयोजित की जा रही ज़ूम मीटिंग, लगभग 100 पार्टिसिपेंट्स रहे सम्मिलित)

दिनाँक 21 जून 2020, स्थान - रीवा/भोपाल मप्र
     सूचना के अधिकार के क्षेत्र में क्रांति आना तय है क्योंकि आपको बता दें की इस समय मप्र राज्य सूचना आयोग में एक ऐसे सूचना आयुक्त पदस्थ हैं जिन्होंने आरटीआई को जन जन तक पहुचाने और उसके अवेयरनेस और जागरूकता का वीणा उठा रखा है. शायद ही भारत के सूचना आयोग के इतिहास में आज तक ऐसा कभी हुआ हो जब एक पदासीन सूचना आयुक्त जन जन तक पहुचने का प्रयास कर रहा हो. यह प्रयास जहां सेमिनार और वर्कशॉप के माध्यम से हो रहा था वहीं कोरोना लॉक डाउन के चलते यह अब हाई टेक हो चुका है. जी हाँ आपको कुछ नही चाहिए बस एक एंड्राइड मोबाइल चाहिए जो एक विशेष ज़ूम क्लाउड मीटिंग एप्प सपोर्ट करता हो और बस सोचना क्या हर रविवार सुबह 11 से 12 बजे के बीच में छुट्टी के दिनों में अपने घर से ही जुड़ जाईये वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में और पूँछिये वह सब सवाल जो अब तक आपके जेहन में उठ रहे थे लेकिन एक्सपर्ट एडवाइस की कमी के कारण आप उसे पूंछ नही पा रहे थे.

   यह सब संभव हो पा रहा है मप्र में और सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह आपको आपके आरटीआई से जुड़े प्रश्नों के जबाब दे रहे हैं. तो यदि आप पिछली मीटिंग नही अटेंड कर पाए तो कोई समस्या नही और जुड़ जाईये अगली मीटिंग में.

   रविवार 21 जून को विषय रहा आरटीआई में प्रश्न सूचक शब्द कैसे करें आवेदन और  किन बातों का रखें खयाल
     जहां पिछले रविवार को आरटीआई से जुड़े बेसिक मुद्दों पर चर्चना हुई थी वहीं 21 जून को आरटीआई में प्रश्न सूचक शब्दों के इस्तेमाल और कैसे इनसे बचा जाय और कहां इन्हें लगाना आवश्यक है उन विषयों पर चर्चा हुई.

     ज़ूम मीटिंग के दौरान लगभग 100 के आसपास पार्टिसिपेंट्स मौजूद रहे जिन्होंने अपने अपने प्रश्न रखे. 

  यहां यहां से यह यह लोग हुए सम्मिलित

   अमूमन ज़ूम मीटिंग के माध्यम से होने वाली वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में पूरे विश्व के कहीं से भी लोग जुड़ सकते हैं. पर फिर भी चूंकि मामला मप्र से संबंधित है तो जहां ज्यादातर लोग मप्र से जुड़े हुए रहते हैं वहीं लगभग 20 से 25 प्रतिशत तक लोग अन्य राज्यों जैसे झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तरांचल, ओडिशा,  विहार आदि प्रदेशों से जुड़े हुए थे. 

   मुख्य रूप से जिन लोगों ने प्रश्न पूँछे वह सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी, अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा, बीके माला, मदन गोपाल तिवारी, सुरेश उपाध्याय, सत्येंद्र शिकरवार, भोपाल से गोविंद देशवाही, इंदौर से अंकुर मिश्रा, राजस्थान से आरके मीणा, भोपाल से प्रदीप उपाध्याय, रीवा से स्वतंत्र शुक्ला आदि सम्मिलित रहे.
    जस्टिस बोवड़े के 2008 के बॉम्बे हाइकोर्ट के निर्णय से हुई सुरुआत

   इस बीच ज़ूम मीटिंग की सुरुआत करते हुए मप्र राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने जस्टिस बोवड़े के 2008 के बॉम्बे हाइकोर्ट के एक फैसले पिंटो बनाम महाराष्ट्र सूचना आयोग का हवाला दिया जिंसमे बताया गया की इस निर्णय में जस्टिस बोवड़े द्वारा पूरे मामले की समीक्षा करते हुए आरटीआई दायर करने में प्रश्न सूचक शब्दों के इस्तेमाल के विषय में रोक सी लगा दी थी जो की अपीलार्थी के विरुद्ध निर्णय साबित हुआ था. वास्तव में हुआ यूं था की महाराष्ट सूचना आयोग ने जहां अपने आदेश में श्री पिंटो को जानकारी मुहैया कराए जाने के लिए आदेशित किया था वहीं लोक सूचना अधिकारी द्वारा यह कहकर बॉम्बे हाइकोर्ट में अपील की गयी की जो जानकारी आपिलार्थी द्वारा चाही गयी है उसमे कई प्रश्न सूचक शब्द हैं इसलिए हायपोथेटिकल ग्राउंड पर ऐसी जानकारी पीआईओ के पास उपलब्ध नही है. जिस पर जस्टिस बोवड़े ने पीआईओ का पक्ष लेते हुए अपीलार्थी के विरुद्ध निर्णय दिया था. इसके बाद से आरटीआई दायर करते समय इन बातों का विशेष खयाल रखा जाने लगा की प्रश्न सूचक शब्द और मार्क न हों. 
   मात्र हाइपोथेटिकल प्रश्न न पूँछें बांकी प्रश्न में कोई परेशानी नही - सूचना आयुक्त राहुल सिंह

    ज़ूम मीटिंग के दौरान मप्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कई उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया की आरटीआई दायर करते समय हाइपोथेटिकल प्रश्न नही पूँछे जाने चाहिए जैसे अमुक योजना कब संचालित होगा? अमुक कार्य कब होगा फला फला क्योंकि यह हाइपोथेटिकल प्रश्न होते हैं क्योंकि ऐसे प्रश्नों के जबाब लोक सूचना अधिकारी के पास जरूरी नही की हों. अतः इस प्रकार के हाइपोथेटिकल प्रश्नों से बचना चाहिए. लेकिन जहां तक संख्या वाचक प्रश्न हैं और जो संख्या से जुड़े हुए हैं जैसे किन किन लोगों के ऊपर फला कार्यवाही हुई? किस किस अधिकारी फला कार्य में अथवा फला दोष में संलिप्त है? यदि किन्ही योजना विशेष का लाभ किसी हितग्राही को मिला है तो वह किन किन हितग्राहियों को मिला है आदि यह प्रश्न हाइपोथेटिकल प्रश्न नही हैं और यह सूची अथवा जानकारी किसी संबंधित विभाग में रहनी चाहिए जो पीआईओ का कर्तव्य होता है की वह आरटीआइ की धारा 5(3) के तहत भी अपीलार्थी के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए उसका सहयोग करे और जानकारी देवे. 
  सतना में खनिज विभाग के मामले में लगाया एक लाख रुपये का भारी भरकम जुर्माना

  इस बीच प्रश्न वाचक शब्दों के विषय में जिक्र करते हुए सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा बताया गया की अभी हाल ही के एक निर्णय में सतना जिले से किसी अपीलार्थी द्वारा कुछ जानकारी लगभग 2 वर्ष पूर्व सतना जिले के खनिज विभाग से चाही गयी थी लेकिन खनिज विभाग द्वारा वह जानकारी आवेदक को उपलब्ध नही कराई गयी थी. जिसके चलते मामले की द्वितीय अपील मप्र राज्य सूचना आयोग में पेंडिंग पड़ी हुई थी. जिस पर अभी हाल ही में आयुक्त द्वारा निर्णय पारित किया गया और कुल 4 आरटीआई के इन मामलों में अधिकतम 25 हजार रुपये के हिसाब से कुल एक लाख रुपये की फाइन लोक सूचना अधिकारी दीपमाला तिवारी को लगा दी गयी. 

   इस मामले में आयुक्त द्वारा बताया गया की यद्यपि अपीलार्थी द्वारा कुछ प्रश्न सूचक शब्दों का प्रयोग किया गया था लेकिन यह शब्द हाइपोथेटिकल नही होने से अपील स्वीकार की गयी. इसलिए आवेदक को हर भरसक प्रयास करना चाहिए की वह प्रश्न सूचक शब्दों से बचें और साथ में हाइपोथेटिकल किश्म के प्रश्न सूचक शब्द तो बिल्कुल ही न पूँछे अन्यथा अपील ख़रीजी किये जाने के चांस बने रहते हैं.
    इन इन पार्टिसिपेंट्स ने पूँछे यह सवाल 

    जूम मीटिंग रविवार सुबह 11 बजे से प्रारम्भ होकर 12:30 बजे दोपहर तक चलती रही. यद्यपि समय 1 घंटे का ही सुनिश्चित किया गया था लेकिन मीटिंग डेढ़ घंटे चली. लोगों की उत्सुकता को देखते हुए मीटिंग का समय बढ़ाये जाने का विचार भी किया जा रहा है.

  प्रबल प्रजापति शहडोल से आल आउट की संख्यात्मक जानकारी मागी 
  
 वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में सुरुआत के प्रश्न में प्रबल प्रजापति शहडोल से रहे जिन्होंने बताया की वह रेलवे में नौकरी करते हैं और उन्होंने रेलवे विभाग में ही आरटीआई दायर कर आलआउट की संख्या के विषय में जानकारी चाही थी जिस पर लोक सूचना अधिकारी द्वारा उन्होंने प्रश्न वाचक शब्द होने के चलते घुमा दिया और जानकारी देने से मना कर दिया. इस पर आयुक्त राहुल सिंह द्वारा कहा गया की वह इसकी अपील करें. क्योंकि संख्यात्मक प्रश्न तो पूँछे जाएंगे और मात्र हाइपोथेटिकल प्रश्नों से आवेदकों को बचना चाहिए.
सुरेंद्र तिवारी रिपोर्टर ने अधिकारी के टूर डायरी की जानकारी मागी

   रीवा से पत्रकार सुरेंद्र तिवारी ने एक अधिकारी के आफिस टूर डायरी की जानकारी मागी इस पर विभाग ने उन्हें टूर डायरी देने से मना कर दिया और बोला की टूर डायरी की जानकारी संधारित्र नही रहती. इस पर सूचना आयुक्त श्री सिंह ने जबाब दिया की किसी अधिकारी की सरकारी टूर डायरी संधारित्र होनी चाहिए और वह जानकारी पब्लिक डोमेन में आनी चाहिए. यह जानकारी देने योग्य होती है और दी जानी चाहिए. जानकारी यदि नही दी गयी तो अपीलार्थी को अपील करनी चाहिए.

  कृष्ण प्रताप सिंह इंदौर ने मागा 4 वर्ष की जानकारी

  इंदौर से ज़ूम मीटिंग में सम्मिलित हुए कृष्ण प्रताप सिंह ने कहा की उन्होंने एक विभाग में आरटीआई दायर की थी और जानकारी चाही थी इस पर उस विभाग द्वारा कहा गया की चूंकि जानकारी 3 या 4 वर्ष की है और वृहद है इसलिए आवेदक को जानकारी नही दी जा सकती. इस पर आयुक्त श्री सिंह ने जबाब दिया की यदि जानकारी उजागर होने से भ्रष्ट्राचार की पुष्टि होती है तो जानकारी देने योग्य है. यदि लोक सूचना अधिकारी ने जानकारी नही दी तो अपीलार्थी को उसकी अपील करनी चाहिए.
  गिरीश रामचंद्र का प्रकरण - सरकारी कार्य प्रभावित होने सम्बन्धी तर्क

   इस बीच सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने गिरीश रामचंद्र के एक प्रकरण का हवाला दिया और बताया की इस मामले में कोर्ट ने यह तर्क दिया था की यदि 75 प्रतिशत से अधिक वर्कफोर्स आरटीआई की जानकारी बनाने के लिए लगा दिया जाता है तो इससे सरकारी कार्य प्रभावित होते हैं. अतः जानकारी इस प्रकार मागी जानी चाहिए जिससे सरकारी कार्य लोकसेवा के कार्य प्रभावित न हों और आवेदक को जानकारी भी मिल जाए. लेकिन फिर भी श्री सिंह ने बताया की यदि जानकारी से किसी भ्रष्ट्राचार की पुष्टि होती है इस परिस्थिति में चाहे जानकारी कितनी भी बड़ी क्यों न हो लोकहित में वह दी जानी चाहिए.

 मदन गोपाल तिवारी की संबल योजना के एक हितग्राही की जानकारी बताई व्यक्तिगत

   भोपाल से मदन गोपाल तिवारी ने बताया की उन्होंने एक मृतक हितग्राही को मिलने वाले संबल योजना ले लाभ के विषय में जानकारी चाही थी जिस पर विभाग ने बताया की वह जानकारी नही दे सकते क्योंकि यह थर्ड पार्टी से संबंधित है. इस पर आयोग ने कहा की यदि धारा 8(1)(जे) का उल्लंघन हो रहा है और जानकारी थर्ड पार्टी से संबंधित है भी तो यह बात विभाग के पीआईओ को 10 दिवस के भीतर हितग्राही को सूचित किया जाना चाहिए. पर सरकारी योजना से संबंधित कोई भी जानकारी किसी की व्यक्तिगत जानकारी नही होनी चाहिए क्योंकि यह योजना विशेष की जानकारी है जो पब्लिक डोमेन में साझा की जानी चाहिए.
   भिंड से सत्येंद्र सिंह शिकरवार ने पूंछा की बीपीएल कार्डधारक को अधिकतम कितने पेज की जानकारी फ्री ऑफ कॉस्ट मिलनी चाहिए इस पर आयुक्त श्री सिंह ने बताया की इसकी सीमा 50 पेज की है लेकिन यदि जानकारी 30 दिन के भीतर उपलब्ध नही कराई गयी है तो सम्पूर्ण जानकारी फ्री ऑफ कॉस्ट दी जानी चाहिए.

  जिला शिक्षा अधिकारी रीवा के एक मामले में प्रश्न करने हुए सामाजिक कार्यकर्ता बीके माला ने कहा की एक जानकारी 20 हजार रुपये बताकर विभाग ने आवेदक को गुमराह किया इस पर आयुक्त श्री सिंह ने कहा की आवेदक को पुनः एक पत्र लिखकर पीआईओ को दस्तावेजों के अवलोकन के लिए लिखना चाहिए और जाकर देखना चाहिए की जो जानकारी आवेदक के लिए आवश्यक हो वही जानकारी आवेदक प्राप्त करे. इस मामले में भी आवेदकों को अपील करनी चाहिए.

  अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने रीवा पुलिश अधिकारियों के विरुद्ध चल रहे प्रकरणों की मागी थी जानकारी

  इस बीच रीवा से हाइकोर्ट जबलपुर में अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता नित्यानंद मिश्रा ने बताया की उन्होंने आरटीआइ दायर कर एसपी आफिस से जानकारी चाही थी की ऐसे कौन कौन से अधिकारी हैं जिनके विरुद्ध लोकायुक्त, मानवाधिकार आदि द्वारा जांच चल रही है और कार्यवाही की क्या अद्यतन स्थिति है इस पर एसपी आफिस द्वारा प्रशवचक शब्द बोलकर जानकारी देने से मना कर दिया गया जिसके विषय में आयुक्त श्री सिंह द्वारा कहा गया की यह यद्यपि प्रश्न सूचक शब्द है लेकिन यहहाइपोथेटिकल नही है बल्कि स्पष्ट है इसलिए एसपी आफिस से यह जानकारी दी जानी चाहिए. क्योंकि "किन किन अधिकारी" यह वाक्य संख्यात्मक और स्पष्ट है इसलिए इसमे जानकारी छुपाए जाने का सवाल ही नही उठता और आवेदक को इसकी अपील करनी चाहिए.
  गोविंद देशवाही भोपाल ने न्यायालयीन प्रकरणों की मागी जानकारी

  इस बीच गोविंद देशवाही ने बताया की उन्होंने पुलिश द्वारा पंजीबद्ध किये गए अपराधों के विषय में और न्यायालयीन प्रकरणों की जानकारी चाही थी लेकिन पुलिश विभाग ने वह जानकारी देने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि यह विवेचना और जांच को प्रभावित कर सकता था. इस पर आयूक्त ने एक बार फिर सतना के एक पत्रकार के मामले का हवाला देकर बताया की यह सही है की कुछ मामलों में जांच और विवेचना प्रभावित हो सकती है लेकिन यदि प्रकरण न्यायालय में पहुंच चुका है और चलानी कार्यवाही हो चुकी है तब वह जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही यदि किसी जानकारी को पुलिश यह कहती है की विवेचना प्रभावित कर सकती है तो पुलिश को आयोग के समक्ष उपस्थित होकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह कैसे जांच प्रभावित करेगी. आयुक्त श्री सिंह ने 8(1)(एच) एवं 8(1)(जे) का जिक्र किया लेकिन बताया की यह पीआईओ द्वारा स्पष्ट करना चाहिए.

इंदौर से अंकुर मिश्रा ने एक ट्रस्ट के बिजली कनेक्शन से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी चाही तो विभाग ने बताया की यह काफी पुरानी है और जानकारी नही दी. अंकुर मिश्रा ने यह भी कहा की यद्यपि वह ट्रस्ट आरटीआई के दायरे में आना चाहिए क्योंकि ट्रस्ट सरकार द्वारा दान दी गयी भूमि पर बना है. बता दें कि यदि किसी एनजीओ अथवा ट्रस्ट पर एक वर्ष के भीतर 50 रुपये और उससे अधिक इन्वेस्ट हुआ है तो वह आरटीआइ के दायरे में आता है। इस पर आयुक्त ने बताया की बिजली बिल सम्बन्धी दस्तावेज साझा करने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए क्योंकि यह कोई प्राइवेट दस्तावेज नही है.

  आरटीआई से जुड़े कार्यकर्ताओं की सुरक्षा पर एक बार फिर सवाल

    इस बीच सबसे महत्वपूर्ण बात जो सामने अयी वह आरटीआई से जुड़े कार्यकर्ताओं की सुरक्षा से संबंधित थी जिस पर राजस्थान से आरटीआई कार्यकर्ता आरके मीणा ने पूंछा की आरटीआई लगाने वाले और अपनी जान को जोखिम में डालकर समाज और सरकार के भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध लड़ने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के विषय में सरकार की क्या मंशा और नियमावली है. इस पर आयुक्त राहुल सिंह द्वारा मप्र और रीवा के आरटीआइ एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी का हवाला देकर बताया गया की अभी हाल ही में उनके ऊपर भी इस प्रकार से एक हमला किया गया था जिस पर आयोग ने 20 मार्च 2020 की रीवा में आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान अधिकारियों को बड़े ही स्पष्ट तौर पर आदेशित किया था की यदि आरटीआइ से जुड़ा कोई मामला है अथवा कोई जांच है वहां आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होती है. इस पर श्री सिंह ने 2013 के होम मिनिस्ट्री के एक सर्कुलर का भी हवाला दिया था और विभागों को आगाह किया था.
 क्या पीएम केअर फण्ड आरटीआई के दायरे में आना चाहिए

  इस बीच कुछ पार्टिसिपेंट्स ने पीएम केअर फण्ड को आरटीआई के दायरे में लाये जाने की बात कही और आयुक्त श्री सिंह से जानकारी और उनका मंतव्य जानना चाहा तो श्री सिंह ने बताया की जहां तक व्यक्तिगत तौर पर और देश के नागरिक होने के नाते उनका मानना है की कोई भी एजेंसी जो की पब्लिक फण्ड अथवा कंपनियों के द्वारा पोषित हुई है अथवा जनता का पैसा उसमे इन्वेस्ट किया गया है अथवा डोनेट किया गया है वह समस्त फण्ड आरटीआई के दायरे में आने चाहिए क्योंकि जनता को उसके दिए गए पैसे को जानने का पूरा अधिकार है अतः वही बात हर फण्ड पर लागू होती है. 
कार्यक्रम का संयोजन एवं प्रचार प्रसार

   इस ऐतिहासिक पहल जिसमे मोबाइल एप्प के माध्यम से ज़ूम मीटिंग आयोजित की जा रही है इसका संयोजन और समन्वयन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा किया गया जबकि प्रचार प्रसार और  मीडिया का प्रभार का दायित्व देवी अहिल्या के मास्टर ऑफ जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन के छात्र स्वतंत्र शुक्ला द्वारा पूरा किया गया.
संलग्न - कृपया ज़ूम मीटिंग के दौरान उपस्थित सदस्यों आदि की स्क्रीनशॉट फ़ोटो देखने का कष्ट करें.

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शिवानन्द द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Sunday, December 1, 2019

आर टी आई कानून में धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत (मामला कुछ मप्र राज्य सूचना आयोग के प्रकरणों का जहाँ राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आरटीआई की धारा 18 की शक्तियों के तहत की जा रही त्वरित कार्यवाहियां, हाल ही में एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन का एक कराधान का आरटीआई प्रकरण रहा काफी अहम)

दिनांक 01 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा/भोपाल, मप्र
  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
  वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा देश में पारदर्शिता लाने, आम जनमानस को सरकारी कामकाजों की जानकारी आसानी से मुहैय्या हो सके, देश और समाज में भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके, लोक सेवक अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहें, और आम जनता भी अपने अधिकारों को अच्छे से समझकर उसका सदुपयोग कर सके इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर आर टी आई अर्थात सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लाया गया था. सूचना का अधिकार हर भारतवासी का संवैधानिक अधिकार है. तब से लेकर अब तक और वर्ष 2015 में इसमे कुछ अमेंडमेंट भी हुए हैं.
  आर टी आई अधिनियम में क्या क्या जानकारी माग सकते हैं
   सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत देश प्रदेश की सरकारी काम काज और लोक सेवकों से संबंधित वह समस्त जानकारी माँगी और प्राप्त की जा सकती है जो आर टी आई की धारा 8 एवं 24 के तहत प्रतिबंधित न हो. जैसे देश की खुफिया जानकारी जिससे देश की सुरक्षा के संकट उत्पन्न हो जाएं, शाशकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 के तहत छूट, अथवा अन्य इसी प्रकार की जानकारी देने का प्रावधान आर टी आई कानून में नही है. इसके अतिरिक्त लोक सेवकों और सरकार के काम काज बजट, राशि के आय व्यय, सरकारी कार्यों के विषय में उनके लेखे जोखे, उपलब्ध कागज़ात सभी की जानकारी आर टी आई कानून के तहत प्राप्त की जा सकती है.
   कैसे फ़ाइल करते हैं आर टी आई आवेदन
   आर टी आई आवेदन फ़ाइल करने का एक विशेष प्रोफार्मा होता है जिसके अन्तर्गत आप 10 रुपए के शासकीय शुल्क जिसमे आई पी ओ अथवा राज्य स्तरीय स्टाम्प शुल्क सम्मिलित है उसके साथ में एक धारा 6(1) के तहत आवेदन बनाकर संबंधित लोक सूचना अधिकारी के नाम भेज सकते हैं. यह हांथोहाथ भी दिया जा सकता था और पोस्ट के माध्यम से भी भेजा जा सकता है.
आर टी आई की प्रथम एवं द्वितीय अपील
   जब चाही गई जानकारी प्रथम आर टी आई आवेदन पर अधिकतम 30 दिवश के भीतर उपलब्ध न करवाई जाए तो प्रथम अपील का प्रावधान होता है जो आर टी आई की धारा 19(1) के तहत की जाती है. इसमे आवेदन प्रोफार्मा के साथ अपीलकर्ता को 50 रुपये स्टाम्प शुल्क अथवा आई पी ओ के साथ अपील करना होता है. इसकी समयावधि 45 दिवश के भीतर होती है. यदि इस दरम्यान अपीलकर्ता को जानकारी संबंधित कार्यालय द्वारा उपलब्ध न करवाई जाए तो आवेदक को द्वितीय और अंतिम अपील के लिए जाना होता है 
   आरटीआई की धारा 19(3) के तहत दायर द्वितीय अपील दो तरह के कार्यालयों में भेजी जाती है. एक तो यदि प्रकरण या मूल आवेदन राज्यस्तरीय कार्यालयों और राज्य सरकार के कार्यालयों में भेजा गया था तो वह संबंधित राज्य के राज्य सूचना आयुक्त के नाम की जाती है, और यदि मूल आवेदन किसी केंद्रीय कार्यालय या केंद्रीय लोक सेवक के विरुद्ध दायर किया गया था तो उसमे केंद्रीय सूचना आयोग में आयुक्त के नाम पर अंतिम एवं द्वितीय अपील की जाती है.
  अंतिम विकल्प हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट
   यदि इतने में भी जानकारी अपीलकर्ता को उपलब्ध न हो तो वह संबंधित राज्य की उच्च न्यायालय में केस दायर कर सकता है और उसमे लोक सूचना अधिकारी से लेकर प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं राज्य सूचना आयोग को पार्टी बना सकता है. हाई कोर्ट से भी रिलीफ न मिलने पर यही सब कुछ उच्चतम न्यायालय में भी दायर किया जा सकता है.
   क्या है आर टी आई कानून की धारा 18
   इसी बीच आवेदन से लेकर द्वितीय और अंतिम अपील के बीच की एक सीढ़ी है आर टी आई कानून की धारा 18. धारा 18 का प्रयोग आवेदक द्वारा शिकायत के रूप में किया जाता है. जब कभी लोक सूचना अधिकारी द्वारा आर टी आई आवेदक द्वारा चाही गई जानकारी छुपाने का प्रयास किया जाए, जानकारी के नाम पर घुमाया जाय, गलत जानकारी देकर आवेदक को भ्रमित किया जाय अथवा झूठी जानकारी दी जाय तब तब आवेदक संबंधित लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध संबंधित सूचना आयोग में धारा 18 का प्रयोग कर शिकायत भेज सकता है जिंसमे वह यह माग करेगा की संबंधित लोक सूचना अधिकारी द्वारा गलत जानकारी देना, जानकारी छुपाना अथवा भ्रमित करने का प्रयास किया गया अतः आर टी आई की धारा 20(1)/(2) के तहत अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्यवाही की माग के साथ अन्य जो उचित लगे वह कार्यवाही की माग कर सकता है. ऐसे में राज्य सूचना आयुक्त उक्त मामले को अपने संज्ञान में लेकर लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी के कार्यों को विधिविरुद्ध पाए जाने पर अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग कर धारा 18 के तहत धारा 20(1)/(2) का प्रयोग करते हुए अनुशासनात्मक एवं दंडात्मक कार्यवाही कर सकता है.
  आर टी आई की धारा 18 सूचना आयोग का विशेषाधिकार की तरह है
   वास्तव में आर टी आई की धारा 6(1), 19(1) अथवा 19(3) की पेचीदगी से भरी प्रक्रिया से गुजरने के साथ साथ धारा 18 की शक्तियां आर टी आई आवेदकों के लिए रामबाण साबित हो सकती हैं बशर्ते इसके प्रति आयोग भी गंभीर हो तब. लेकिन इन सबके मूल में राज्य सूचना आयोग की तत्परता ही है. यदि राज्य सूचना आयोग इसे गंभीरता से लेता है और त्वरित कार्यवाही करता है तब तो धारा 18 ठीक है वरना बहुत से ऐसे मामले होते हैं जो सूचना आयोग में वर्षों से धूल फांक रहे होते हैं. यहाँ तो द्वितीय अपील ही एंटरटेन नही की जाती हैं तो सामान्य धारा 18 के तहत शिकायतों की तो कोई गिनती ही नही हैं.
   अपीलकर्ता शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन 
   अभी हाल ही में एक मामला आया जिंसमे रीवा मप्र में 75 पंचायतों के कराधान और 14वें वित्त आयोग की ग्रांट के उपयोग में अनियमितता प्रकाश में आयी. जिसके विषय में जिले के कई कार्यकर्ताओं द्वारा आवाज बुलंद की गई. उनमे से सामाजिक आर टी आई कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा भी जिला कलेक्टर रीवा के एक आदेश 2495 एवं 2498 को आधार बनाकर जिले की 75 पंचायतों जिनमे बहुतायत में 38 पंचायतें मात्र गंगेव जनपद में ही थीं जहां पर यह कराधान मामले में अनियमिता एवं भ्रष्टाचार प्रकाश में आया था इसी विषय पर अलग अलग दो लोक सूचना कार्यालयों पर आवेदन प्रस्तुत किया गया था जिनमे से दिनांक 24 एवं 25 सितंबर 2019 को क्रमशः लोक सूचना अधिकारी कार्यालय जनपद गंगेव एवं कार्यालय कलेक्टर को आर टी आई आवेदन देकर उक्त कलेक्टर द्वारा जारी पत्र पर जांच प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति अन्य संबंधित दस्तावेजों के साथ जजानकारी चाही गई थी.
  दोनो ही पीआईओ ने किया गुमराह
   गौरतलब है की दिनांक 03/10/2019 एवं दिनांक 14/10/2019 को क्रमशः जारी पत्रों क्र. 1247 एवं 176 के माध्यम से आर टी आई आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को सीईओ कार्यालय गंगेव एवं कलेक्टर कार्यालय रीवा के लोक सूचना अधिकारियों द्वारा पल्ला झाड़ते हुए जानकारी छुपाने के उद्देश्य, आवेदक अपीलार्थी को भ्रमित करने के उद्देश्य से बताया गया की संबंधित जानकारी उनके कार्यालय में उपलब्ध नही है बल्कि अन्य कार्यालय में उपलब्ध है.
  धारा 18 के तहत राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह को शिकायत
   इस बीच आवेदक द्वारा ट्विटर सोशल मीडिया के माध्यम से राज्य सूचना आयुक्त और रीवा संभाग के प्रभारी आयुक्त श्री राहुल सिंह को संदेश भेजकर शिकायत की गई और एक मार्गदर्शन मागा गया जिंसमे यह कहा गया की चूंकि संबंधित दोनो लोक सूचना अधिकारियों ने जानकारी देने से मना कर दिया है और भ्रमित करने का प्रयाश किया है अतः इस स्थिति में आवेदक को पुनः नाहक ही प्रथम एवं द्वितीय अपील की पेचीदगी से गुजरते हुए वर्षों इंतज़ार करने पड़ सकते हैं जैसा की पहले भी होता आया है.

   इस पर ट्विटर के माध्यम से राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आवेदक को उनके ईमेल एड्रेस पर आर टी आई की विशेष धारा 18 का प्रयोग करते हुए शिकायत भेजे जाने की बात कही साथ ही प्रथम अपील भी करने की सलाह दी गई.
  धारा 18 के तहत शिकायत पर हुई त्वरित कार्यवाही
   आर टी आई की धारा 18 के तहत शिकायत दिनांक 08 नवंबर को अपीलार्थी द्वारा राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के ईमेल में की गई जिस पर दिनांक 29 नवंबर 2019 को ठीक 3 सप्ताह में एक्शन लेते हुए निराकरण किया गया जो अब तक के मप्र के राज्य सूचना आयोग में काफी त्वरित एक्शन के तौर पर माना जा रहा है.
  क्यों न तीनो पीआईओ पर प्रति 11250 रुपये का जुर्माना लगाया जाए
   रीवा जिले में लगभग 8 करोड़ के कराधान घोटाले के  विषय में गंगेव जनपद एवं रीवा कलेक्टर कार्यालय द्वारा जानकारी छुपाने के प्रयाश पर एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी की दिनांक 08 नवंबर की शिकायत पर राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने काफी गंभीरता से लिया. जिंसमे उन्होंने तीनों लोक सूचना आधिकारी जनपद गंगेव, जिला पंचायत रीवा एवं कलेक्टर रीवा को आड़े हांथों लिया और आर टी आई की धारा 7, 6, 7 की उपधारा 8(1), (2), (3), एवं धारा 5(5) का दोषी पाया और धारा 20(1)/(2) की कार्यवाही करते हुए अपने आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस जारी किया और पूंछा की क्यों न प्रत्येक तीनों लोक सूचना अधिकारियों के विरुद्ध जुर्माने के तौर पर 11,250/- रुपये का जुर्माना लगाया जाए.
  23 दिसंबर को तीनों लोक सूचना अधिकारियों की भोपाल में होगी पेशी
   जुर्माने के आशय के साथ आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने न केवल जुर्माने लगाने की नोटिस दी है बल्कि तीनों संबंधित लोक सूचना अधिकारियों जनपद पंचायत गंगेव, जिला पंचायत रीवा एवं साथ में संयुक्त कलेक्टर रीवा को 23 दिसंबर को व्यक्तिगत रूप से भोपाल में राज्य सूचना आयोग में हाजिर होने का आदेश दिया है.
 क्या क्या कहा राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने
  आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस के साथ राज्य सूचना आयुक्त ने काफी तल्ख टिप्पड़ी की है जिसमे उन्होंने कहा की लगता है कि सूचना न देने के लिए तीनों लोक सूचना कार्यालयों में मैच फिक्सिंग जैसी हुई है. क्योंकि जिस प्रकार से आवेदकों को घुमाया जा रहा था इससे साफ जाहिर था की लोक सेवकों की सूचना की पारदर्शिता के प्रति मंसा बहुत अच्छी नहीं लगती. सूचना आयुक्त ने इस आदेश में कहा की कराधान घोटाले के मामले में आवेदक द्वारा जो जानकारी चाही गई थी वह सीधे सीधे कलेक्टर के एक आदेश 2495 एवं 2498 से संबंधित है जो स्वयं कलेक्टर द्वारा 7 दिवश के भीतर कार्यवाही चाही गई थी. आवेदक ने वह जानकारी सात दिवश के बाद चाही अतः यह पीआईओ कलेक्टर कार्यालय की जिम्मेदारी बनती थी की वह जानकारी दे न की किसी दूसरे कार्यालय को अंतरित करे. इस विषय में माननीय सूचना आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया जिसमे बताया की बेबजह आर टी आई आवेदन अंतरित कर लोक सूचना अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बच नही सकते.
  पीआईओ जिला पंचायत रीवा को पाया धारा 5(5) का दोषी
   चूंकि मूल आर टी आई आवेदन पीआईओ कलेक्टर कार्यालय रीवा द्वारा पीआईओ जिला पंचायत रीवा को अंतरित किया गया था अतः यह पीआईओ जिला पंचायत रीवा की जिम्मेदारी बनती थी की वह आवेदक को 7 दिवश के भीतर जानकारी मुहैया कराने संबंधित लिखित पत्र जारी करे जिसमे पीआईओ जिला पंचायत स्वयं असफल साबित हुए और इस आशय का कोई पत्र और जानकारी आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को उपलब्ध नही कराया जिसमे न केवल आवेदक के साथ धारा 7 की उपधारा 8(1), (2), (3) के दोषी पाए गए बल्कि कार्यालय कलेक्टर के अंतरित आर टी आई आवेदन का जबाब कलेक्टर को न देकर कलेक्टर के साथ असहयोग भी किया इसलिए असहयोग के चलते आर टी आई की धारा 5(5) के दोषी पाए गए. जिसके फलस्वरूप राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने पीआईओ जिला पंचायत के विरुद्ध अनुशासनात्मक दंडात्मक कार्यवाही करते हुए धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत कारण बताओं नोटिस जारी किया और कहा की क्यों न आपके भी विरुद्ध 11 हज़ार 250 रुपये का जुर्माना ठोका जाय.
  पीआईओ गंगेव को पाया धारा 7(1) एवं  उपधारा 8(1), (2), (3) का दोषी
   इस बीच अपने पत्र में मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की गंगेव जनपद के लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदक अपीलार्थी शिवानन्द द्विवेदी को जानकारी न देकर, जानकारी छुपाने के प्रयाश करने और भ्रमित करने पर धारा 7(1) के दोषी हैं साथ ही युक्तियुक्त कारण नही बताकर एवं अपीलीय अधिकारी की जानकारी एवं संपर्क उपलब्ध न कराकर धारा 7 की उपधारा 8(1), (2), (3) के भी दोषी हैं. अतः क्यों न इनके विरुद्ध भी अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत 11 हज़ार 250 रुपये का जुर्माना लगाया जाय.
 आयोग का अभिमत - जानकारी आपके पास नही तो हवा में कहां गायब हो गई
   पत्र के अंत में आयोग ने अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा की गुणदोष के आधार पर प्रथम दृष्टया लोक सूचना अधिकारियों द्वारा जारी पत्रों एवं अपीलकर्ता की शिकायत के अवलोकन उपरांत इस प्रकरण में स्पष्ट होता है की सूचना के अधिकार अधिनियम के विपरीत विधि विरुद्ध तरीके से लोक सूचना अधिकारियों द्वारा जानबूझकर जानकारी के नाम पर एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के बीच घुमाया जा रहा है. सवाल यह है की कार्यालय कलेक्टर जिसके आदेश पर जांच शुरू हुई उसका कहना है की जानकारी उसके पास नही है. जिस कार्यालय को पीआईओ कलेक्टर द्वारा मूल आर टी आई आवेदन 6(3) के तहत अंतरित किया गया वह कह रहा है की जानकारी उसके पास भी नही है तो आखिर जानकारी हवा में कहां गायब हो गई.
 ट्विटर में आयुक्त ने बताया पीआईओ के बीच मैच फिक्सिंग जैसा खेल
   इस बीच ट्विटर पर की गई कार्यवाही की जानकारी देते हुए राज्य सूचना आयुक्त ने काफी तल्ख टिप्पड़ी की और कहा ऐसे लगता है जैसे लोक सूचना अधिकारियों के बीच मैच फिक्सिंग जैसा चल रहा है जिसमे एक विभाग कह रहा है की जानकारी मेरे पास नही उनके पास है और उनके पास जाओ तो वह बोलते हैं मेरे पास नही तीसरे के पास जाओ. जब तीसरे के पास जाओ वह बोलते हैं पहले के पास जाओ. तो सवाल यह उठता है की मूल जांच का आदेश देने वाला कार्यालय कलेक्टर ही जब ऐसे गैर जिम्मेदाराना बर्ताव करेगा तो अन्य कार्यालयों का क्या कहना.
  आर टी आई की धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए अच्छा संदेश
   आज जिस प्रकार से देश प्रदेश में लोक सूचना के अधिकार का मजाक बन चुका था उससे साफ जाहिर है आने वाले दिनों में आम जनता और आर टी आई कार्यकर्ताओं का लोक सूचना के अधिकार कानून से विश्वास उठता जा रहा है. ऐसे में मप्र के वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह एक आशा की किरण जैसे आये हैं जो न केवल सूचना आवेदनों और अपीलों का त्वरित निराकरण करने का हर संभव प्रयाश कर रहे हैं बल्कि मप्र में लोक सूचना के अधिकार का कैसे प्रचार किया जाए कैसे कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा किया जाय वह सभी जरूरी संभव प्रयास भी कर रहे हैं.
   न केवल कार्यालयीन और कागज़ी तौर पर बल्कि सोशल मीडिया व्हाट्सएप एवं ट्विटर जैसे शसक्त आधुनिक सूचना माध्यमों का सहारा लेकर आवेदकों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें आवश्यक जानकारी दे रहे हैं की वह कैसे और कहां अपील करें, कहां आर टी आई दाखिल करें, कैसे लोक सूचना अधिकारी के भ्रमित करने पर धारा 18 के तहत आयोग में शिकायत भेज सकते हैं आदि.
  आवेदन से लेकर अपील तक थी दौड़, अब जानी धारा 18 की भी ताकत



    पहले आर टी आई में मात्र आवेदन के बाद प्रथम और द्वितीय अपील तक ही ज्यादातर आवेदक सीमित रहते थे और उस पर भी इंतज़ार इतना लंबा होता था की आवेदक स्वयं थक हारकर परेशान हो जाते थे. अब जब धारा 18 के तहत लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध शिकायत पर भी त्वरित कार्यवाही हो रही है ऐसे में ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे लोकतंत्र में नई जान फूंकी जा रही है. अब देखना यह होगा की यह सिलसिला कब तक चलता है और सरकारें इस विषय में और कितने कदम उठा पाती हैं जिससे आरटीआई को और मजबूत और शसक्त बनाया जाए और जन जन तक सूचना पहुच सके और लोकतंत्र में पारदर्शिता आ सके.

     वैसे यह कहना गलत नही होगा की फिलहाल तो मात्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह ही एकमात्र आशा की किरण हैं बांकी सूचना के मामले में देश की स्थिति तो सभी को स्पष्ट ही है.
संलग्न - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें राज्य सूचना आयुक्त महोदय श्री राहुल सिंह जी द्वारा धारा 18 की शिकायत पर की गई कार्यवाही की प्रतियां. साथ में राहुल सिंह जी की तस्वीरें. साथ में ट्विटर से स्क्रीनशॉट. आवेदक द्वारा धारा 18 के तहत भेजी गई शिकायत की पीडीएफ फ़ाइल आदि.
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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़, तहसील मनगवां, 

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587