"One who is unattached to the fruits of his work and who works as he is obligated is in the renounced order of life, and he is the true mystic: not he who lights no fire and performs no work". - |||श्रीमद भगवद गीता, अध्याय 6, Verse 1|||
Friday, December 20, 2019
MP हाइकोर्ट नोटिस के बाद भी नही थम रही गोवंश प्रताड़ना, अवैध बाड़ों में भूंख प्यास ठंड से तड़प कर मर रहे गोवंश (मामला जिले में बनाये जा रहे अवैध बाड़ों का जहां एकबार शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते पुनः घुट घुट कर दम तोड़ रहे गोवंश)
Saturday, December 14, 2019
मुझसे मिलिए मैं हूँ टिकुरी-खरहना पीडब्ल्यूडी सड़क (मामला जिले की बहुचर्चित दो जनपदों के बीच फंसी टिकुरी 37 नईगढ़ी एवं खरहना गंगेव ब्लॉक पीडब्ल्यूडी सड़क का, डेढ़ करोड़ के आसपास राशि स्वीकृत होने के बाद भी नही हुआ कोई निर्माण कार्य, पीडब्ल्यूडी विभाग एकबार पुनः कटघरे में)
आखिर आज 21 वीं सदी में जब की मॉनव चंद्रमा और मंगल एवं अंतरिक्ष में घर बनाने, पानी खोजने, रास्ता बनाने की सोच रहा है ऐसे में क्या इस धरती में इन मूलभूत मानवाधिकारों के लिए कोई जगह नही है? इससे बेहतर तो कह सकते हैं की स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व की स्थिति रही होगी जब जगह जगह ट्रांसपोर्टेशन के लिए रेल की पटरियों का ईजाद कर लिया गया था. आखिर स्वतंत्रता प्राप्ति के 7 दशकों के बाद भी यदि आमजन और ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की चलने योग्य सड़कें न बन पाएं तो भला इस लोकतंत्र के लिए उससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।
Sunday, December 1, 2019
आर टी आई कानून में धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत (मामला कुछ मप्र राज्य सूचना आयोग के प्रकरणों का जहाँ राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आरटीआई की धारा 18 की शक्तियों के तहत की जा रही त्वरित कार्यवाहियां, हाल ही में एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन का एक कराधान का आरटीआई प्रकरण रहा काफी अहम)
Thursday, September 12, 2019
कैथा में भंडारे के साथ श्रीगणेशोत्सव संपन्न, कैथा श्रीहनुमान मन्दिर में चला 11 दिवशीय कार्यक्रम, लोगों ने संगीत संध्या का जमकर लिया आनंद (जिले के विभिन्न ग्रामों में आयोजित हुआ श्रीगणेशोत्सव, अनंत चतुर्दशी के दिन हुआ विसर्जन)
Tuesday, February 12, 2019
रीवा ब्रेकिंग- मजदूरी के स्थान पर मिली जेल, मजदूरों के मानवाधिकार का हुआ घोर हनन (मामला जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत डाढ़ पंचायत का जहाँ सैकड़ों मजदूर मजदूरी न मिलने को लेकर कर रहे थे अनसन, गढ़ पुलिश आयी और उठाकर ले गयी, अनसन में महिलाएं बुजुर्ग भी थे सम्मिलित)
Tuesday, January 15, 2019
पावर प्लांट चचाई में जंगल बीच करंट लगाकर चीतल एवं भैंसों का हुआ शिकार, वन विभाग पल्ला झाड़ रहा, पुलिश को कुछ फर्क नही पड़ता (मामला जिले में बढ़े वन अपराधों का जहाँ एमपीईबी पावर प्लांट चचाई के पास जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर अखंड प्रताप सिंह की 5 भैंसों को मार डाला गया, लंबे अरसे से करंट लगाकर चीतल का किया जा रहा था शिकार, बदकिस्मती से लाखों की फंस गयीं भैंसें)
दिनाँक 15 जनवरी 2019, स्थान - चचाई पावर प्लांट, सिरमौर, रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
प्रदेश एवं जिले में निरंतर बढ़ रहे बेलगाम वन अपराधों की श्रेणी में एक और अध्याय जुड़ चुका है. अभी तक तो नहरों, घाटियों, जलप्रपातों के बीच में मवेशियों को जीवित धकेले जाने की वारदातें सामने आईं थीं लेकिन अब तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे पूरे जंगल विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने वाला है. जी हाँ यहां कोई पहेलियां नही बुझाई जा रही बल्कि सच्चाई के समाज को अवगत कराया जा रहा है.
जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर किया जाता रहा शिकार
यह मामला है चचाई जलप्रपात से होकर जाने वाले जंगल का जहां से होते हुए लगभग 7 से 8 किमी दूर जंगल के रास्ते बकिया-बीहर नहर पावर प्लांट चचाई से अतरैला वन परिक्षेत्र के जंगल तक जाती है. अभी पिछले दिनों ही इसी नहर में इंटेक प्लांट के पास दर्ज़नों गोवंशों के उतराते हुए शव मिले थे जो मीडिया में और समाज में हलचल पैदा कर दिए थे. अभी एक और मामला सामने आया है जो महीनों पुराना बताया गया है जिंसमे पीड़ित अखंड प्रताप सिंह निवासी मरैला ने लिखित तौर पर पुलिश एवं वन विभाग को शिकायत भी की लेकिन कार्यवाही नही हुई है.
मामला है 5 भैंसों और एक चीतल का जंगल के बीच करंट से फंसकर मौत का
सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की जंगल के बीचोंबीच आखिर करंट आया कहां से लेकिन चकित मत होइये बता दें की चचाई पावर प्लांट बस नजदीक ही स्थित है जो 315 मेगावाट की बिजली उत्पन्न करता है. यह पावर प्लांट सरकार के ऐसे नियमों के अन्तर्गत बनाया गया है जो जंगल भूमि का भी उपयोग कर रहा है यद्यपि इस पावर प्लांट का कर्ताधर्ता एमपीईबी विभाग है.
दिसंबर दूसरे सप्ताह की है वारदात
दिनाँक 12-13 दिसंबर के आसपास मरैला निवासी अखंड प्रताप सिंह उम्र लगभग 65 वर्ष की चार भैंसें एवं एक भैसा भैंसहटी नामक चचाई घाट के नीचे चरने के लिए उतारे गए थे. बताया गया की यहीं एमपीईबी पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली का दुरुपयोग करके अर्जुन केवट नामक जवा निवासी उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए करंट लगाया था जिसमे अखंड प्रताप सिंह की 4 नग जीवित पजाने योग्य भैंसें एवं एक नग भैंसा सब मिलाकर लगभग 4 से 5 लाख कीमत की फंसकर मारे गए।
अतरैला थाने एवं वन विभाग में लिखित दी सूचना
अखंड प्रताप सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर घटना की सूचना तत्काल अतरैला थाना एवं वन परिक्षेत्र अतरैला में दी गई लेकिन न तो वन विभाग द्वारा और न ही पुलिश विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज की गई. जबकि देखा जाए तो दोनों ही दृष्टि से करंट लगाकर जंगल के अंदर शिकार और मवेशियों का उसमे फंसकर मारना एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे वन विभाग को पीओआर और पुलिश विभाग को बकायदे एफआईआर दर्ज करना चाहिए.
वेटेरिनरी अधिकारी ने शव न मिलने का बनाया बहाना
बता दें की इस घटना के विषय में जब जवा वेटेरिनरी अधिकारी आर पी गौतम मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने पूरा दोष वन विभाग और पुलिश विभाग पर मढ़ दिया और बताया की हमे मृत भैंसों का कोई भी अंग नही मिला. जबकि पीड़ित अखंड प्रताप दवारा बताया गया को मृत भैंसों के कुछ पैर वगैरह अंग अभी भी वहीं जंगल में पड़े हुए हैं जिनको आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर फेंक दिया था जिससे यह पता न चले की घटना करंट लगाकर कारित हुई है. जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो ही जाती है की जीव केई मृत्यु के क्या कारण थे.
क्या कहा अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने
जब प्राथमिकी दर्ज न किये जाने के विषय में अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की वह मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं जबकि मेडिकल रिपोर्ट इसलिए नही बनी की वेटेरिनरी अधिकारी को मवेशियों के शव ही नही मिले.
चश्मदीख गवाह भी है पुख्ता प्रमाण
यद्यपि इस पूरे मामले में एक चश्मदीख गवाह भी मौजूद है. चश्मदीख प्रदीप कुमार कोल उर्फ विधायक पिता चंद्रशेखर कोल उर्फ बेसहना निवासी मरैला उम्र लगभग 20 वर्ष के द्वारा पूरी घटना की जानकारी बतायी जा चुकी है लेकिन थाना प्रभारी अतरैला प्रदीप सिंह का अब यह कहना है की जब तक आरोपी अर्जुन केवट को पुलिश पकड़ कर पूंछताछ नही करेगी तब तक प्राथमिकी दर्ज नही होगी. वहरहाल अभी तक पुलिश ने आरोपी को ढूंढने तक का प्रयाश नही किया है जबकि घटना कारित हुए एक माह से ऊपर बीत चुके हैं.
रेंज अफसर अतरैला का वीडियो वायरल
बता दें की रेंज अफसर अतरैला का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमे रेंज अफसर स्वयं भी घटना कारित होने की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं और बता रहे हैं की करंट से न केवल भैसों की मौत हुई हैं बल्कि चीतल की भी मौत हुई है. पर अब सवाल यह उठता है की आखिर जंगली संरक्षित क्षेत्र में एमपीईबी पावर प्लांट के करंट द्वारा असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार जैसे संगीन अपराध के लिए अब तक रेंज के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया? आखिर पूरे मामले में एमपीईबी की भी तो जबाबदेही तय है की आखिर उनके द्वारा पावर प्लांट में उत्पन्न की जाने वाली बिजली का दुरुपयोग आपराधिक किस्म के लोग कैसे कर रहे हैं?
संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें पीड़ित अखंड प्रताप सिंह दवारा लिखित दिया गया आवेदन एवं साथ में करंट में मृत हुई भैंसों के कंकाल आदि जिन्हें बताया गया की आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर वहीं नदी में फेंक दिया था.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
Friday, January 4, 2019
चल-पशु तस्करी मामले में टी आई के विरुद्ध आई जी को की गयी शिकायत, पत्रकारों ने कार्यवाही की किया माग (बैकुंठपुर थाना क्षेत्र का है मामला जिसमे चल-पशु तस्करी पर पर्दा डालने पुलिश ने पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसाने की दी थी धमकी साथ ही पत्रकारों को टी आई मंगल सिंह ने बताया था फ़र्ज़ी)
दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।
बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब
बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।
चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे
सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है?
इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।
पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत
चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है।
बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।
बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।
सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।
पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।
संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
Saturday, December 29, 2018
छुहिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, जैतपुर, कोतमा के रास्ते बांग्लादेश तक पशु तस्करी का चल रहा खेल, कोतमा और जैतपुर का पशु मेला है पशु तस्करी और पशु अपराध की मुख्य जड़ (मामला देश में चल रहे पशु तस्करी के खेल का जिसमे पशु तस्करों द्वारा पैदल मवेशियों को ले जाया जा रहा छत्तीशगढ़ के रास्ते बंगाल और बांग्लादेश, शासन प्रशासन सब जानते हुए भी लगाम लगाने में विफल)
दिनांक 29/12/2018, स्थान - शहडोल-कोतमा, मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी)
देश प्रदेश में पशु तस्करी का खेल किस कदर बढ़ गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की रीवा जिले में आवारा छोड़े गए पशुओं को समूहों में इकट्ठा कर गांव गांव में रखा जाता है फिर उन्हें पैदल चलकर छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी के रास्ते सीधी और शहडोल के रास्ते छतीसगढ़, विहार, आंध्रा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश तक भेज दिया जाता है.
आये दिन बांग्लादेश बॉर्डर में बीएसएफ द्वारा हज़ारों की संख्या में ट्रकों से लदे हुए मवेशियों के जत्थे पकड़े जाते हैं.
कैसा है यह पशु तस्करी का पूरा खेल
यह पूरा खेल काफी टेढ़ा मेढ़ा है जिसमे सम्मिलित पशु तस्कर गांव से लेकर हाई प्रोफाइल तक के लोग हैं जिनके पास पैसा और पावर दोनो है. जहां मवेशियों को हांकने के लिए छोटे गरीब किश्म के लेबर लगाए जाते हैं जिन्हें कुछ पैसे देकर मवेशियों को हांका जाता है वहीं इन्हें मॉनिटर करने के लिए कारों, और बाइक में इनके बड़े दलाल पूरे रास्ते भर लगे होते हैं.
पुलिस के सह से चलता है काला धंधा
यह पूरा धंधा पुलिश प्रशासन के सह से चलता है. पुलिश प्रशासन की मिलीभगत के चलते आम शिकायतों पर कोई कार्यवाही नही होती. पशु तस्कर सीधे पुलिश से मिले होते हैं जिससे उन्हें इसका शेयर मिल जाता है. इसका खुलासा भी तब हुआ जब रीवा जिले के थाना गढ़ एवं लालगांव चौकी अन्तर्गत पिपरहा एवं क्योटी ग्राम के पास एक इसी तरह से पशु तस्करी का गिरोह पकड़ा गया था जिसमे इस बात का खुलासा हुआ.
पैदल मार्च से संदेह की कम है गुंजाइश
इस काले धंधे में सबसे बड़ा पॉइंट यह रहता है की यदि पशु तस्कर ट्रक और वाहनों का इस्तेमाल करते हैं तो मोटर व्हीकल एक्ट, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, मप्र गोवंश वध प्रतिशेष अधिनियम सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज होने का डर रहता है इसलिए ज्यादातर पशु तस्कर लेबरों के सहयोग से गांव गांव अपनी सेटिंग बनाये रहते हैं और इन पशुओं को पैदल मार्च करवाते हैं जिससे आम नागरिकों को इस बात का संदेह नही होता की पशु काटने के लिए ले जाए जा रहे हैं. पर वास्तव में सच्चाई यही है की पशुओं को काटने के लिए भेजा जाता है.
पूँछने पर बताते हैं कृषि और जुताई के लिए
जब कोई पूंछता है की यह पैदल मवेशियों को कहां ले जाया जा रहा है तो बताया जाता है की यह सब कृषि कार्य हेतु ले जाए जा रहे हैं जहां शहडोल कोतमा अनूपपुर में इनसे खेती की जाती है लेकिन सवाल यह उठता है की हर रोज हज़ारों की संख्या में जाने वाले बैल आखिर किस खेती के लिए जाते हैं? आखिर इनकी खेती में कितनी डिमांड है? क्या अनूपपुर, शहडोल और कोतमा में मवेशी पैदा नही होते की इनको रीवा सतना के तराई इलाकों से पैदल होते हुए सीधी शहडोल और अनूपपुर से छत्तीशगढ़ रोज ले जाया जाता है? यदि बैलों की कृषि कार्य में आवश्यकता है तो क्या छत्तीशगढ़ में बैल उत्पन्न नही होते?
स्टिंग आपरेशन में सच्चाई आई सामने
इसी बात की पड़ताल करने के लिए एक टीम गठित कर एक स्टिंग आपरेशन के वास्ते और सबूत इकठ्ठा करने के लिए रीवा की छुहिया घाटी से होते हुए सीधी शहडोल, कोतमा अनूपपुर, मलगा-छत्तीसगढ़ तक पहुचा गया. रास्ते में आने वाले ऐसे दर्जनों समूहों को देखा गया जिसमे ज्यादातर समूह रोड में रास्ते में ही मिल गए जो धड़ल्ले से बिना किसी डर के सैकड़ों की संख्या में मवेशियों को हांकते हुए ले जा रहे थे. इनमे से कुछ से पूंछा भी गया तो उन लेबरों ने बताया की कोतमा में बैलों की मंडी लगती है जहां पर इनका व्यापार होता है. इसी प्रकार जैतपुर आदि कुछ अन्य जगहों का भी जिक्र किया गया जहां पर पशु मेला की बात सामने आयी.
हाई प्रोफाइल लोगों के जुड़े होने के संदेह
जिस प्रकार से बेरोकटोक यह पशुओं के तथाकथित व्यापार का खेल एक अरसे से चल रहा है इससे साफ पता चलता है की इसमे सम्मिलित लोग कोई छोटे मोटे कैलिबर के नही हो सकते. इसमे ऐसे लोग सम्मिलित हैं जिनकी पंहुच काफी ऊपर तक है. यहां तक की कुछ सूत्रों से यहां तक जानकारी मिली की इसमे कुछ नेता भी सम्मिलित हैं जो कुछ तथाकथित हिंदूवादी पार्टियों से भी तालुक रखते हैं. कई बार जब इस अवैध काले धंधे पर कुछ पशु अधिकारों के लिए और अवैध कार्यों के विरोध में लड़ने वाले लोगों ने आवाज उठाई तो इन नेताओं और संगठनों के लोगों के नाम भी सामने आये जिहोने धमकियां भी दीं. अतः यह कहना बिल्कुल ही अतिशयोक्ति नही है की हाई प्रोफाइल संगठनों और पार्टियों के नेताओं के हाँथ और मिलीभगत से ऐसे धंधे फुल फ्लेज में चल रहे हैं वरना आज इतने ज्यादा हिंदूवादी संगठन सक्रिय हैं तो क्या इस काले धंधे को रोंका नही जा सकता था?
कोतमा सरस्वती स्कूल परिसर में लगता है पशु मेला
रीवा और तराई क्षेत्रों से समेटे गए हज़ारों की संख्या में मवेशियों को रविवार के दिन हांक कर कोतमा की ब्वॉयज सरस्वती स्कूल के परिसर में लेजाकर रखा जाता है जहां से प्रत्येक रविवार के दिन पशुओं की मंडी लगती है और वहीं से इन्हें फिर इधर उधर किया जाता है. रातोंरात यहीं से लोडिंग भी हो जाती है इस वास्ते स्कूल ग्राउंड परिसर में कई संदिग्ध ट्रक भी खड़े देखे जा सकते हैं. बताया तो यह जाता है की यह बैलों की मंडी जुताई और कृषि कार्य के लिए लगती है लेकिन सच्चाई यह है की यह स्कूल परिसर में एक दो दिन पहले से ही मवेशी इकठ्ठे कर लिए जाते हैं और अगले सोमवार मंगलवार तक बाहर ले जाए जाते हैं. यह कहना की मात्र रविवार को ही मंडी लगती है सही नही है क्योंकि ब्यॉयज सरस्वती स्कूल कोतमा के शिक्षकों से बात करने पर बताया की यह जबरन और स्कूल के उच्च प्रबंधन की सांठगांठ से लगभग 15 एकड़ में मंडी लगती है जिसका स्कूल के शिक्षकों ने विरोध भी किया है लेकिन कोई सुनवाई नही हो रही है. स्कूल का कहना है की वह इस मंडी को बन्द करवाना चाहते हैं लेकिन सफलता नही मिली है. बताया गया की नगर पालिका/नगर निगम कोतमा द्वारा किसी बरगाही को इसका ठेका दिया जाता है और उनके स्कूल ग्राउंड का दुरुपयोग किया जा रहा है.
पशु मेला ही है पशु अपराध की जड़
जो जानकारी मिली इससे पता चला की आज भी जब पशुओं की उपयोगिता लगभग समाप्त हो चुकी है ऐसे में कोई भी व्यक्ति विश्वास नही करना चाहता की इतनी बड़ी तादाद में पशुओं को मात्र कृषि कार्य के लिए ले जाया जाता है. मानाकि छत्तीशगढ़ एरिया में कुछ हद तक पिछड़े जंगली इलाकों में अभी भी पशुओं से खेती होती है लेकिन फिर भी रोज हज़ारों की संख्या में छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, बाणसागर, व्योहारी, जयसिंह नगर के रास्ते कोतमा और मलगा आखिर कैसे जा रहे हैं? मानाकि कृषि के लिए कुछ मात्रा में बैलों की आवश्यकता है लेकिन क्या छत्तीशगढ़ के किसानो के घरों में गायें नही हैं? क्या छत्तीशगढ़ में इतने बैल पैदा नही होते की उन लोगों की कृषि सबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति हो पाए? क्या इतने बड़े पैमाने में रोज बैलों की आवश्यकता मात्र कृषि और जुताई के लिए है? क्या छत्तीसगढ़ आज इतना पिछड़ा है की वहां ट्रेक्टर बिल्कुल है ही नही? क्या छत्तीसगढ़ में मॉडर्न आधुनिक यंत्रों से खेती-किसानी नही होती?
इन प्रश्नों के स्वयमेव जबाब ढूंढने चलें तो पता चलता है की खेती-किसानी के नाम पर कोतमा और जैतपुर के आसपास चलने वाला पशु व्यापार मेला मात्र दिखावा और भ्रम पैदा करने के लिए है. वास्तव में वहां के सैकड़ों लोगों ने ही बताया की यहां यह बात सबको पता है की यह सभी पशु मात्र कटने के लिए जाते हैं., शासन प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना हुआ है. सबकी रोटी ही पशुओं के कत्लेआम से चल रही है तो भला इसमे कार्यवाही करने की हिम्मत कौन जुटाएगा? सबसे बड़े दुख की बात तो यह है मानाकि पिछले पंद्रह वर्ष पहले सरकार ने गोवंशों की हत्या के संदर्भ में कोई विशेष अधिनियम पारित नही किया था लेकिन कम से कम हिंदूवादी सरकार के मप्र के पंद्रह वर्ष के कार्यकाल में जबकि मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम पारित हो गया था तब भी इस बात की जांच और इसमे रोकथाम की किसी नेता और हिंदूवादी संगठन को यह बात समझ नही आई. कितना बड़ा दुर्भाग्य है की जिस प्रदेश में गोवंशों के वध और उनके विरुद्ध हो रही क्रूरता को लेकर बड़े बड़े अधिनियम बने हैं फिर भी इतने बड़े और व्यापक पैमाने पर गोवंशों/पशुओं की तस्करी हो रही है.
अब सवाल यह उठता है की आने वाले समय में इस प्रकार के अवैध अथवा वैध तरीके से संचालित पशुओं के मेले और उनके व्यापार की सही तरीके से पड़ताल और जांच हो पाएगी और क्या शासन प्रशासन और पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाएं इस बात की निगरानी और कार्यवाही करवा पाएंगी की आखिर किस बाबत इतनी बड़ी तादाद में पशुओं को ले जाया जाता है और यह पशु वास्तव में जाते कहां हैं?
संलग्न - रीवा की छुहिया घाटी से होते हुए सीधी, शहडोल, देवलोंद, बाणसागर, जयसिंह नगर, व्योहारी, कोतमा, मलगा, छत्तीशगढ़ तक के रास्ते पशुओं को ले जाते हुए बड़ी संख्या में लोग. आखिर कहां जा रहे हैं इतने पशु? साथ ही कोतमा सरस्वती ब्यॉयज स्कूल का 15 एकड़ का वह परिसर जिसका दुरुपयोग पशुओं की तस्करी के लिए पशु मेले के रूप में हो रहा है.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
Monday, December 10, 2018
MP - गोवंशों को चचाई जलप्रपात से बचाने मानवता की पेश की मिशाल - हिंदुओ ने मौत के घाट धकेला तो मुस्लिमों ने जीवित बचाया
दिनांक 10 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात, रीवा मप्र
(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
संभाग के अब तक के सबसे भीषण पशु क्रूरता के मामले में चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटियों के नीचे धकेले गए सैकड़ों गोवंशों को अभी भी रेस्क्यू किये जाने का कार्य चल रहा है और अभी भी सैकड़ों गोवंशों का 20 किमी की हजारों फीट गहरी घाटी में फंसे होने की संभावना बनी हुई है. यद्यपि ध्यान फाउंडेशन ने तो पूरे मामले में पूरा सहयोग दिया लेकिन आइए इस बीच पिछले दो सप्ताह से अधिक के रेस्क्यू आपरेशन में कुछ मानवीय पहलुओं पर चर्चा करते हैं जहां भारतीय संस्कृति की माता गोमाता को बचाने के लिए मात्र हिन्दू ही नही बल्कि मुस्लिमों ने भी कोई कोर कसर नही छोड़ी.
संकल्प फाउंडेशन - द एनिमल रेस्क्यू टीम का सराहनीय कार्य
रीवा ज़िले में कार्य करने वाले एवं श्रीमती नजमा बेगम के द्वारा आधारित संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों द्वारा चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों से गोवंशों को जीवित सुरक्षित निकालने में अतुलनीय योगदान रहा है. श्रीमती मेनका गांधी की एनजीओ संस्था पीपल फ़ॉर एनिमल की मप्र टीम द्वारा एक रीवा जिले का भी व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया हुआ है जिंसमे इस प्रकार पशुओं से प्रेम रखने वाले और उनके रेस्क्यू के लिए कार्य करने वाले युवाओं को जोड़कर रखा हुआ है. उसी ग्रुप में प्रियांशु जैन, रूपा द्विवेदी, विनय श्रीवास्तव, असद उल्लाह उर्फ आरिफ आदि कई सदस्य जुड़े हुए हैं. जब भी मवेशियों और पशुओं के पीड़ा और कष्ट में होने की कोई सूचना आती है तो यह सभी सदस्य अपने स्तर से एक दूसरे को सूचित करते हुए उन्हें रेस्क्यू किये जाने के प्रयास करते हैं.
मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम का महत्वपूर्ण योगदान
इस बीच जब पिछले सप्ताह चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों में हजारों गोवंशों को घाट के नीचे जबरन धकेल दिए जाने की खबर अखबारों और सोशल मीडिया में आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की अगुआई में सभी टीम मेंम्बर को सूचना दी गई जिस पर संकल्प फाउंडेशन के आरिफ ने अपने टीम के सदस्यों समीर अंसारी, पारस सोंधिया, फैजल खान, विक्की शर्मा, जीशान राईन, सूर्य रॉय एवं मोहम्मद असद उल्लाह ने अगले दिन मोर्चा संभाला और न केवल रीवा से बाइकिंग करते हुए पूरे टीम मेंबर के साथ उपस्थित हुए बल्कि आवश्यकता अनुरूप घायल और बीमार गोवंशों के लिए दवाईयां भी खरीद कर लाये.
लड़कों ने हजारों फीट गहरे चचाई घाट के नीचे उतरकर गाय को पानी से निकाला
दिनाँक 30 नवंबर का दिन था जब संकल्प फाउंडेशन के यह सभी सदस्य दोपहर तक चचाई घाट के नीचे उतर चुके थे जहां इन्हें प्रपात के पानी में गिरी हुई एक गाय मिली जिसे सभी ने मिलकर बाहर निकाला और वहीं जंगल से खर पतवार निकालकर आग लगाकर गाय को ऊष्मा दिया. इतने में ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली से आये गोशेवक विनोद सिंह उपस्थित हुए जो पहले से सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य साथियों के साथ चचाई घाट के नीचे थे, इस प्रकार विनोद सिंह ने गाय को एंटीबायोटिक, दर्द बुखार के इंजेक्शन और साथ में डी-टेन का बॉटल चढ़ाया. चूंकि गाय उठ पाने और चल पाने में पूरी तरह से असमर्थ थी अतः उसका जीवन मुश्किल समझ आया.
मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने पूरा दिन रेस्क्यू में किया सहयोग
इस बीच दिनाँक 30 नवंबर को चचाई घाट की हजारों फीट गहरी घाटी में चले सबसे महत्वपूर्ण रेस्क्यू आपरेशन में मोहम्मद असद उल्लाह और उनके संकल्प फाउंडेशन के साथियों द्वारा अभूतपूर्व योगदान देते हुए पूरे दिन भर रेस्क्यू आपरेशन में सहयोग प्रदान किया. जहां मरैला, कुइयां-मटीमा और अन्य आसपास के आये ग्रामवाशियों और वन विभाग के कर्मचारी मात्र तमाशबीन बने रहे वहीं लगभग 130 गोवंशों को हजारों फीट गहरी चचाई की घाटी से बाहर निकालने में मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने एड़ी चोटी की ताकत लगा दी और तब तक शांत नही हुए जब तक 130 गोवंश सुरक्षित घाट के ऊपर निकाल नही दिए गए.
दया और मानवता का नही कोई जाति-धर्म
इस प्रकार इन दो सप्ताह अर्थात 15 दिन के लगभग किये गए रेस्क्यू आपरेशन के कई मानवीय पहलू सामने आये हैं जिनसे जाति, धर्म और आस्था के आधार पर यह बिल्कुल नही कहा जा सकता मानवीयता और दया धर्म अथवा जाति देखकर आती है.
देखा जाय तो जिस चचाई और पुरवा जलप्रपात क्षेत्र में पशुओं और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ क्रूरता बढ़ी है वह कोई अन्य धर्म सम्प्रदाय का क्षेत्र नही है बल्कि उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है जिंसमे उच्चवर्गीय हिंदुओं के सहयोग से ऐसी भीषण पशु क्रूरता और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ प्रताड़ना और हत्या हुई है. तो क्या यह कहा जाय की आज हिंदुओं का वह समूह जो गोवंशों और गोमाता को पूजता था आज स्वयं ही पथभ्रष्ट्र हो कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल चुका है? क्या यह माना जाए की इन तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदुओं से श्रेष्ठ तो हमारे वह मुस्लिम भाई हैं जिनके ऊपर गोहत्या के आरोप लगते रहे हैं? मानाकि की हर धर्म में हर व्यक्ति एक जैसा नही होता उसमे अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. अतः यह बिल्कुल कहना उचित नही की मानवीयता और दया कोई धर्म और जाति देखकर आती है. यदि ऐसा होता तो चचाई और रीवा में होने वाले ज्यादातर गोवंशों के साथ क्रूरता के मामलों में हिन्दू सम्मिलित नही होते क्योंकि धर्म से तो गोमाता और गोवंश हिंदुओ के पूज्य हैं और गाय में तो 84 करोड़ देवी देवताओं का निवास माना गया है.
समय था जब 1857 की क्रांति का आधार ही गोमाता थीं
इस प्रकार यदि इतिहास को उठाकर देखा जाए तो लगता नही की यह वही भारत देश है जिंसमे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मात्र गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस के कारण हुआ था. तो फिर ऐसे में भारत जैसे देश के इतिहास और वर्तमान के लिए क्यों किसी धर्म और क्यों किसी विदेशी शक्ति अथवा अंग्रेजों को दोषी ठहराया जाय. वास्तव में अब देखकर और अनुभव करके तो यही लगता है की बाप बड़ा न मैया सबसे बड़ा रुपैया. पेट और रुपये की अंधी दौड़ के पीछे धर्म, मानवता और इंसानियत तुच्छ साबित हो रही है.
वरना यदि ऐसा नही होता तो भारत का हिन्दू किसान भूंखों मरना उचित समझता लेकिन कभी भी अपनी गोमाता को आंच नही आने देता लेकिन क्या समय आ चुका है की आवश्यकता और भौतिकतावादी दौड़ के चलते कहीं कुछ नही बचा है मात्र पेट और पेट बचा है जिसका पोषण पहले होना चाहिए बांकी दया, मानवता रहे अथवा न रहे, इसे किसी को फिक्र नही.
संलग्न - संलग्न तस्वीरों में कुछ वह तस्वीरें हैं जिनमे संकल्प फाउंडेशन के लड़के जिनमे मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम सामिल हैं और उन लड़कों ने गोवंशों को बचाकर जीता जागता नमूना प्रस्तुत कर रीवा जिला क्या देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139














