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Friday, December 20, 2019

MP हाइकोर्ट नोटिस के बाद भी नही थम रही गोवंश प्रताड़ना, अवैध बाड़ों में भूंख प्यास ठंड से तड़प कर मर रहे गोवंश (मामला जिले में बनाये जा रहे अवैध बाड़ों का जहां एकबार शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते पुनः घुट घुट कर दम तोड़ रहे गोवंश)

दिनांक 20 दिसंबर 2019, स्थान - कटरा/नईगढ़ी, रीवा मप्र

     जिले एवं प्रदेश में सरकार द्वारा बनाई जा रही गोशालाओं के निर्माण में देरी होने के एक बार फिर गोवंशों का जीवन संकट बना हुआ है.

    यद्यपि मप्र की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने अपने चुनावी एजेंडे में बेसहारा गोवंशों और फसल नुकसानी बचाने के लिए 1000 गोशालाएं बनाए जाने के दावे किये थे लेकिन आज साल भर बाद भी इस को जमीनी स्तर पर पूरा नही किया गया लिहाजा गोवंशों और किसानों दोनो की दुर्दशा बनी हुई है.
  
   पुरानी गोशालाएं बनी नहीं, आ गए नए प्रपोजल

    अभी हाल ही में रीवा जिले में 33 गोशालाएं और पूरे प्रदेश में लगभग 900 गोशालाएं खोले जाने के लिए कार्ययोजना बनाई गई थी और यह कार्य मनरेगा योजना द्वारा किया जाना था जिसके बाद कार्य तो प्रारम्भ हुआ लेकिन पूरा न हो सका. अभी रीवा में 33 में से मात्र 2 ही गोशालाओं का लोकार्पण हो पाया है जबकि विदित हो की तत्कालीन रीवा कलेक्टर ओम प्रकाश श्रीवास्तव द्वारा इन्हें 30 नवंबर तक पूरे करने के निर्देश दिए गए थे.
     जहां 28 सामान्य और 3 वृहद गोशालाएं अभी भी पूरी नही हो पायी हैं शासन प्रशासन से प्राप्त जानकारी से पता चला है की सरकार सभी पंचायतें जिनके पास की सरकारी 6 एकड़ तक का भूभाग है उनसे प्रपोजल मंगाया जा रहा है. 

  रीवा जिले के प्रत्येक ब्लॉक में बननी हैं अन्य 12 गोशालाएं

   इसके अतिरिक्त रीवा जिले के प्रत्येक ब्लॉक में 12 अतिरिक्त गोशालाओं का प्रपोजल मागा गया है जिनके लिए प्रत्येक जनपद पंचायत सीईओ को इस कार्य के लिए बोला गया है साथ ही संबंधित वेटेरिनरी विभाग के वीईओ को डेटा और प्रपोजल कलेक्ट करके शासन तक पहुचाने का जिम्मा दिया गया है.
   बतौर वेटेरिनरी एक्सटेंशन अफसर गंगेव एसके पांडेय एवं वीईओ त्योंथर पी के मिश्रा उन्होंने अपने अपने ब्लॉक में सीईओ और सरपंचों से गोशाला का प्रपोजल कलेक्ट कर शासन तक पहचाने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी है. इस प्रपोजल में बताया गया है कि पंचायत के पास कम से कम 6 एकड़ की सरकारी जमीन होनी अनिवार्य है साथ ही उस जमीन का नक्सा, खसरा एवं बी1 ग्रामसभा के प्रस्ताव के साथ देना अनिवार्य है।

   पनगड़ी में बनेगी 1 करोड़ लागत की गोशाला

    जिले के गंगेव ब्लॉक एवं सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाले पनगड़ी कला पंचायत में लगभग 60 एकड़ के सरकारी भूभाग में एक करोड़ रुपये की लागत से गोशाला निर्माण किये जाने का प्रावधान है जिसके लिए प्राप्त जानकारी अनुसार टेंडर प्रक्रिया भी चल रही है. बताया जा रहा है की जिले एवं प्रदेश की वृहद किश्म की बनाई जा रही कुछ गोशालाएं टेंडर प्रक्रिया से बनाई जाएंगी न की मनरेगा योजना द्वारा. ज्ञातव्य हो की सामान्य गोशालाएं जिनका प्रत्येक का टीएस 27 लाख 62 हज़ार का हुआ है यह सभी गोशालाएं मनरेगा और पंचायत द्वारा बनाई जा रही है.


  गोवंश प्रताड़ना पर हाईकोर्ट की नोटिस का नही दिया जबाब

    सूत्रों से जानकारी मिली है की सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश के अधिकारों के लिए लड़ने वाले शिवानन्द द्विवेदी द्वारा अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा के माध्यम से हाई कोर्ट जबलपुर में लगाई गई जनहित याचिका का जबाब अभी भी कई संबंधित विभागों ने नही दिया है. पशु चिकित्सा विभाग को हाईकोर्ट की नोटिस जारी हुई थी जिसमे जिले और प्रदेश में अवैध बाड़ों और घाटियों जलप्रपातों में हो रही पशु क्रूरता के विषय में जबाब देना था लेकिन अभी तक कई नोटिस जारी करने के बाबजूद भी इन विभागों ने कोर्ट के समक्ष जबाब प्रस्तुत नही किया है.

  अभी भी नही रुक रही पशु क्रूरता

   वैसे जिले एवं प्रदेश में पशु क्रूरता रुकने का नाम नही ले रही है. जहां तहां अवैध बाड़ों में कैद गोवंश अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे हैं. लोग अवैध बांडे तो बना देते हैं लेकिन इस भीषण ठंड में उनके लिए कोई समुचित व्यवस्था नही करते हैं जिससे उनका जीवन संकट बना हुआ है.
   
    जिले की शायद ही कोई ऐसी पंचायत हो जहां बिना किसी समुचित व्यवस्था, बिना शेड के अवैध किश्म के बाड़े न बने हों. इन बाड़ों में मवेशी ठंड में तड़प कर मर रहे हैं लेकिन कोई देखने वाला नही है.

  बाड़ा बनाने किसान बताते हैं मजबूरी

     इसके दूसरे पहलू पर नजर डालें तो उधर से भी बड़ी दुखद और भयानक स्थिति नजर आती है. किसानों और पशुपॉलकों द्वारा गांव गांव में बेसहारा छोड़ दिए गए मवेशियों की स्थिति यह है की जब इनको भूख प्यास लगती है तब यह मवेशी किसी न किसी किसान की हरी भरी फसल को देखकर टूट पड़ते हैं और चट कर जाते हैं. स्वाभाविक है सैकड़ों भूखे प्यासे मवेशी जिस किसी भी खेत में पड़ेंगे तो नुकसान पहुचाना तो निश्चित ही है. ऐसे में मौसम और सरकार की मार झेल रहे किसान भी न आव देखते हैं न ताव बस मवेशियों को समेटा और ठूस दिया कटीले तारों से बनाये अवैध बाड़ों में जहां स्वाभाविक तौर पर बिना किसी समुचित व्यवस्था में ठंड में भूख प्यास से घुट घुट कर यह सब काल के गाल समा जाते हैं.

   पशु क्रूरता है कानूनन अपराध, है दंड का प्रावधान

   बता दें की पशु क्रूरता करना अपराध की श्रेणी में आता है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार से किसी भी पशु को नुकसान पहचाने के उद्देश्य से उसे मारता पीटता है अथवा उसका अंग प्रत्यंग बांधता है या तोड़ता है तो उसके विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करके कार्यवाही होगी. इसी प्रकार मप्र के प्रावधानों के अनुसार मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम के तहत गोवंशों जिसमे की बैल भी सम्मिलित हैं यदि उनका वध किया जाता है तब इसके लिए अर्थदंड के साथ साथ अधिकतम 10 वर्ष के कारावास का भी प्रावधान है.

   इसके साथ भारतीय दंड विधान में पशु अतिचार निवारण अधिनियम एवं पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत भी यह अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे हैवी जुर्माना के साथ साथ जेल तक का प्रावधान है. 

  संलग्न - कृपया बाड़ों में कैद बेजुबान मवेशियों को देखने का कष्ट करें.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Saturday, December 14, 2019

मुझसे मिलिए मैं हूँ टिकुरी-खरहना पीडब्ल्यूडी सड़क (मामला जिले की बहुचर्चित दो जनपदों के बीच फंसी टिकुरी 37 नईगढ़ी एवं खरहना गंगेव ब्लॉक पीडब्ल्यूडी सड़क का, डेढ़ करोड़ के आसपास राशि स्वीकृत होने के बाद भी नही हुआ कोई निर्माण कार्य, पीडब्ल्यूडी विभाग एकबार पुनः कटघरे में)

दिनांक 14 दिसंबर 2019, स्थान गंगेव/नईगढ़ी, रीवा MP
   आज स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से लेकर सात दशक बीत जाएं और आपके गांव में चलने लायक सड़क न हो तो आप इसे क्या कहेंगे? विकास कहेंगे, लोकतंत्र कहेंगे या कुछ और? जी हां कुछ ऐसा ही हाल है नईगढ़ी ब्लॉक में टिकुरी 37 में प्रणामी मंदिर ट्रस्ट के पास से होते हुए सथनी प्रधानमंत्री सड़क की तरफ न मुड़कर वहां से बाएं हाँथ मुड़ने पर आपको टिकुरी नंबर 37 की ग्राम बस्तियों जिनमे से कुसवाहा बस्ती, दुबे बस्ती, यादव बस्ती, कंहार बस्ती, गौतमान बस्ती, यादव बस्ती, प्राथमिक पाठशाला कहरान टोला (टिकुरी नंबर 37) से होते हुए पकड़ियार नदी, बाणसागर नहर पुल से होते हुए खरहना ग्राम के पहले पुल क्रासिंग से होते हुए पुनः बाणसागर के पास खरहना में रामनिहोर गौतम, रामसजीवन गौतम के घर से होते हुए श्यामलाल जगदीश, तीर्थ प्रसाद, सच्चीदानंद पांडेय, रमेश गौतम से होते हुए प्राथमिक एवं माध्यमिक पाठशाला ग्राम खरहना (मढ़ी खुर्द पंचायत) से होते हुए झिरिया नाला, हरिजन बस्ती से आते हुए दिवाकर सिंह ग्राम नीबी तहसील नईगढ़ी की पट्टे की लगभग 650 मीटर की अराजी जिसमे मेढ़ से होकर रास्ता गुजरता है इस प्रकार लगभग 7.2 किमी लंबा यह मार्ग है जिसमे दिवाकर सिंह की जामीन मेढ़ को छोंड़कर सब शासकीय है और वर्ष 2008 से पीडब्ल्यूडी के शिकंजे में है जिसके निर्माण बाबत करोड़ों रुपये निकल भी चुके हैं लेकिन अब तक इस रास्ते का कोई विधिवत जीएसबी और डामर डालकर निर्माण नही कराया गया है.
 क्या कहना है ग्रामवासियों का 
    जब इस विषय में ग्रामवासियों से संपर्क किया गया और उनसे कीचड़ से सनी हुई सड़क के विषय में जायज़ा लिया गया तो यह कहना था ग्रामीणों का-
  1-”आज जब से हमारा जन्म हुआ है हमारे ग्राम में पक्की सड़क नसीब नही हुई है. हमारा पूरा जीवन इसी कीचड़ में सनते हुए निकल रहा है. पता नही टिकुरी नंबर 37 से लेकर खरहना तक की यह सड़क कब तक बनेगी.”- ददन कुसवाहा, कुसवाहा बस्ती टिकुरी नं 37 नईगढ़ी.
  2-”मैं पेशे से लाइनमैन हूँ. चाहे बरसात के 4 महीने हों अथवा बीच में असमय बारिश यहां टिकुरी नंबर 37 से लेकर खरहना और उधर प्रणामी मंदिर तक घर से निकलना दूभर हो जाता है. पूरी पगडंडी कीचड़ से सराबोर हो जाती है. यदि कोई बीमार हो जाए अथवा कोई डिलीवरी केस आ जाए तो सिर पर उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है.”- अमृतलाल दुबे, दुबे बस्ती टिकुरी नंबर 37 नईगढ़ी.
 3-”हमारा जॉब सहकारी बैंक में है और हमे कार्य के सिलसिले में हर मौसम में आना जाना पड़ता है. शुबह 9 बजे खरहना से निकलते हैं और शाम को 7 या 8 बजे आते हैं. अब गौर करिए की बरसात के चार महीनों में हमारी सबकी क्या दुर्दशा होती होगी. हम कीचड़ में सनकर बाहर निकलते हैं. यह हालात बचपन से है. लगभग साढ़े सात किमी सड़क निर्माण का जिम्मा पीडब्ल्यूडी को वर्ष 2008 में मिला था लेकिन इस सड़क पर एक मुठ्ठी गिट्टी तक नही पड़ी है. पता नही करोड़ों रुपये कहां चले गए.’ -गौतम जी, ग्राम खरहना ब्लॉक गंगेव.
4-”हम अब उम्मीद छोड़ चुके हैं की इस रोड को कोई बनाएगा. कई बार सीएम हेल्पलाइन में लोगों द्वारा शिकायत भी की गयी है लेकिन पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा भ्रामक और गलत निराकरण करके छोड़ दिया जाता है. सीएम हेल्पलाइन से ही पता चला था की इस सड़क का टेंडर और राशि 2008 में स्वीकृत की गई थी लेकिन साढ़े सात किमी के आसपास सड़क पर कोई कार्य नही हुआ और करोड़ों के प्रोजेक्ट का क्या हुआ आपके सामने है. हम आज भी कीचड़ पर चलने को मजबूर हैं.”- राघव शरण गौतम, भूतपूर्व सरपंच.
5-”हमारी यही माग है की सरकार हमारी टिकुरी 37 से लेकर खरहना तक की सड़क को जल्दी बनवाये जिससे हमे राहत मिल सके. हमारे छोटे छोटे बच्चे कीचड़ में सनकर स्कूल जाते हैं. एम्बुलेंस और जननी की गाड़ियां यहां घुस नही सकतीं. कोई बीमार हो जाए तो सिर में उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है. यह सब अच्छा नही है. हमे तो अब लगता है जैसे शासन प्रशासन सब मर चुके हैं कोई देखने सुनने वाला नही है. हमारी समस्या का कोई तो समाधान करवा दे. हमे पक्की सड़क बनवा दे.”- शिवबालक यादव, टिकुरी 37.
  सीएम हेल्पलाइन में ऐसे शुरू हुआ खोज का सिलसिला 
   चूंकि टिकुरी 37 ग्राम पंचायत नईगढ़ी ब्लॉक में आती है और खरहना ग्राम गंगेव ब्लॉक में आता है इसलिए यह किसी को पता नही चल रहा था की आखिर इस सड़क को बना कौन रहा है और अंतरब्लोकीय सड़क का जिम्मेदार है कौन. इस बाबत एक शिकायत सीएम हेल्पलाइन में दिनांक 22/05/2019 को खरहना पंचायत मढ़ी खुर्द निवासी प्रमोद गौतम द्वारा क्रमांक 8387450 से दर्ज कराई गई. इस शिकायत में सभी बातों को स्पष्टतः रखा गया लेकिन सड़क कौन बना रहा था इसकी जानकारी किसी को नही थी. 
   सीएम हेल्पलाइन में चालू हुआ स्थानांतरण का खेल
     इस शिकायत क्रमांक 8387450 को दर्ज होने के बाद पहले इसे ग्रामीण यांत्रिकी सेवा को भेजा गया. वहां से जबाब आया की यह सड़क आरईएस द्वारा नही बनाई जा रही है. अतः यह दूसरे विभाग को भेजी जाए. इसके बाद शिकायत को पीएम सड़क विभाग को भेजा गया जिसमे इसे बताया गया की पीएमजीएसवाई यूनिट 2 मऊगंज द्वारा बनाई जा रही होगी अतः वहां स्थानांतरित किया जाय. वहां से भी जबाब मिला की यह सड़क पीएमजीएसवाई द्वारा नही बनायी जा रही है.
  इस प्रकार यह शिकायत के स्थानांतरण का खेल पूरे 27 नवंबर तक अर्थात 6 माह तक चलता रहा लेकिन यह पता नही कर पाया प्रशासन की आखिर इस सड़क का मालिक कौन था जो अपने आप में सीएम हेल्पलाइन की कार्यप्रणाली को दर्शाता है.
  27 मई को पीडब्ल्यूडी का आया जबाब
   अंततः पूरे 6 माह अंदर ही अंदर विभागीय चक्कर लगाने के बाद पीडब्ल्यूडी को जब शिकायत पहुची तो उनका जबाब आया जो अक्षरसः नीचे है - “ कार्यपालन यंत्री से प्राप्त जानकारी अनुसार शिकायतकर्ता से दिनांक 28.11.2019 को दोपहर 1.10 बजे दूरभाष पर संपर्क किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा वर्णित गंगेव टिकुरी मार्ग लंबाई 7.20 किमी. लागत 136.85 लाख की स्वीकृति प्रमुख अभियन्ता लो.नि.वि. भोपाल के पत्र क्रमांक 1454-55/842/19/यो./2008 भोपाल दिनांक 06.3.2008 के द्वारा नावार्ड योजना के तहत प्राप्त हुई थी। उपरोक्त मार्ग में 650 मीटर पर निजी आराजी होने तथा भू-अर्जन की स्वीकृति न होने के कारण एवं मान्नीय न्यायालय द्वारा स्टे दिये जाने से 650 मीटर में तत्कालीन मार्ग निर्माण नहीं हो सका था। वर्तमान में अब शिकायतकर्ता के द्वारा मार्ग निर्माण की मांग की जा रही है। वर्तमान में उक्त मार्ग निर्माण की कोई स्वीकृति विभाग को प्राप्त नहीं है। मार्ग निर्माण की स्वीकृति शासन स्तर से संबंधित है। शिकायतकर्ता को जानकारी दे दी गई है। अतः शिकायत विलोपन योग्य है।
एक करोड़ 36 लाख 85 हज़ार कहाँ गए?
   जिस प्रकार से उपरोक्त शिकायत में देखा जा सकता है की पीडब्ल्यूडी के कर्यपालन यंत्री द्वारा निराकरण में यह स्वीकार किया गया की 1 करोड़ 36 लाख और 85 हज़ार रुपये की स्वीकृत हुई थी लेकिन विवादित 650 मीटर दिवाकर सिंह ग्राम नीबी की जमीन का भूअर्जन न हो पाने के चलते सड़क निर्माण पूरा नही हो पाया.
    यह बात तो ठीक है की 650 मीटर भूमि का भूअर्जन नही हो पाया पर क्या प्रशासन और पीडब्ल्यूडी विभाग यह बताएगा की 7 किमी और 200 मीटर स्वीकृत मार्ग में से यदि 650 मीटर विवादित मार्ग को हटा दिया जाए तो शेष उसका निर्माण क्यों नही किया गया? और मात्र इस सड़क के कुछ ही भाग में मात्र कुछ गिट्टी मोरम डालकर ही क्यों पीडब्ल्यूडी विभाग फुरसत हो गया।
  सच्चाई यह की पीडब्ल्यूडी विभाग सब खा गए
     खरहना और टिकुरी 37 ग्राम के ग्रामीण बताते हैं की सच्चाई यह है की यह राशि 2008 में मप्र शासन द्वारा स्वीकृत हुई थी जिसमे विवादित 650 मीटर के अतिरिक्त पीडब्ल्यूडी विभाग ने सड़क बनी हुई है इस प्रकार दर्शा कर अन्य सड़कों की भांति पूरी राशि हजम कर ली. और शायद यह भी जानकारी नही मिलती पर चूंकि ग्रामीण निरंतर परेशान होते रहे और आवाजें उठाई, सरकार भी इस बीच बदल गयी तो पीडब्ल्यूडी विभाग को जबाब देना पड़ा.
    अब ग्रामीण चाहते हैं की पीडब्ल्यूडी बताये की आखिर 1 करोड़ 36 लाख और 85 हज़ार की स्वीकृत राशि आखिर गई तो गई कहाँ?
   सड़क की जांच नही हुई तो ग्रामीण बैठेंगे आमरण अनशन पर, करेंगे कलेक्टर बंगले का घेराव
    इस बीच दोनो ब्लॉकों गंगेव एवं जुड़े हुए नईगढ़ी ब्लॉक से मढ़ी खुर्द स्थित खरहना और टिकुरी 37 नईगढ़ी के ग्रामीणों ददन कुसवाहा, प्रमोद गौतम , अमृतलाल दुबे, शिवबालक यादव, लोकनाथ गौतम, भूतपूर्व सरपंच राघवशरण गौतम, रामनिहोर गौतम, तीरथ प्रसाद गौतम, सच्चीदानंद, जगदीश, रमेश गौतम आदि ने बताया की यदि इस सड़क घोटाले की विधिवत कमेटी बनाकर जांच कर पीडब्ल्यूडी से जुड़े भ्रष्टाचारी अधिकारियों और इंजीनियर के ऊपर रिकवरी की कार्यवाही नही होती तो सभी ग्रामीण कलेक्टर के बंगले का घेराव करेंगे और वहीं पर आमरण अनशन करेंगे।
   सड़क है समाज का मानवाधिकार
   वास्तव में यूएनएचआरसी, एनएचआरसी, एमपीएचआरसी के परिपेक्ष्य में देखा जाय तो बिजली पानी सड़क स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक देश की सिविल सोसाइटी की जनता के मूलभूत मानव अधिकारों में से एक हैं. अतः इन मानवाधिकारों की सुरक्षा करना किसी भी देश और प्रदेश की लोकतांत्रिक चुनी हुई सरकार का संवैधानिक दायित्व है।
   आज भारत और इसके विभिन्न राज्यों में जिस प्रकार से आम और ग्रामीण जनता को इन सभी मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित किया जा रहा है यह काफी विचारणीय मुद्दा है जिसे हरहाल में शासन सत्ता पर बैठी सरकारों को देखना पड़ेगा. आखिर उस माँ का क्या दोष जिसे बरसात में डिलीवरी हो जाए, कैसे जाएगी वह अस्पताल? आखिर उन बुजुर्गों का क्या दोष जिन्हें बरसात के समय बीमार होने पर एम्बुलेंस गांव तक नही पहुच सकती? आखिर उन स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों का क्या दोष जो कीचड़ में सनकर स्कूल जाते हैं?
  आखिर आज 21 वीं सदी में जब की मॉनव चंद्रमा और मंगल एवं अंतरिक्ष में घर बनाने, पानी खोजने, रास्ता बनाने की सोच रहा है ऐसे में क्या इस धरती में इन मूलभूत मानवाधिकारों के लिए कोई जगह नही है? इससे बेहतर तो कह सकते हैं की स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व की स्थिति रही होगी जब जगह जगह ट्रांसपोर्टेशन के लिए रेल की पटरियों का ईजाद कर लिया गया था. आखिर स्वतंत्रता प्राप्ति के 7 दशकों के बाद भी यदि आमजन और ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की चलने योग्य सड़कें न बन पाएं तो भला इस लोकतंत्र के लिए उससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।
   उम्मीद है शासन प्रशासन जल्द ही पक्की सड़क बनवायेगा
    यद्यपि मायूसी और लाचारी के बीच अभी भी खरहना और टिकुरी 37 के ग्रामीणों का मन टूटा नही है और उन्हें उम्मीद है की सरकार बदलने के साथ ही मप्र में शायद सड़क बनाने की प्रक्रिया में तेजी आये और उनके ग्राम में भी पक्की सड़क बन पाए. लोगों का मानना है की ग्रामीणों ने दिवाकर सिंह निवासी नीबी से भी निवेदन किया है और वह भी अब चाहते हैं की जो 650 मीटर रुकी हुई सड़क का भूअर्जन नही हुआ है वह अब हो जाए क्योंकि दिवाकर सिंह के परिवार के सदस्यों से बात करने पर यह पता चला की यह रास्ता दसकों से चल रहा है और इस सड़क के अधूरे पड़े रहने से उनकी फसल का भी नुकसान हो रहा है जिससे अब वह भी चाहते हैं की यह छूटी हुई 650 मीटर जमीन का भूअर्जन होकर पक्की सड़क बन जाए जिससे वह भी अपनी जमीन का सदुपयोग कर पाएं. क्योंकि कहीं न कहीं पक्की सड़क से जुड़ने के बाद उसी जमीन की कीमत भी कई गुना बढ़ जाती है.
  संलग्न - दिनांक 14 दिसंबर 2019 दिन शनिवार की स्थिति में ओला और बारिश होने के बाद सड़क की कीचड़ से सनी हुई स्थिति.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587





Sunday, December 1, 2019

आर टी आई कानून में धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत (मामला कुछ मप्र राज्य सूचना आयोग के प्रकरणों का जहाँ राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आरटीआई की धारा 18 की शक्तियों के तहत की जा रही त्वरित कार्यवाहियां, हाल ही में एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन का एक कराधान का आरटीआई प्रकरण रहा काफी अहम)

दिनांक 01 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा/भोपाल, मप्र
  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
  वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा देश में पारदर्शिता लाने, आम जनमानस को सरकारी कामकाजों की जानकारी आसानी से मुहैय्या हो सके, देश और समाज में भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके, लोक सेवक अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहें, और आम जनता भी अपने अधिकारों को अच्छे से समझकर उसका सदुपयोग कर सके इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर आर टी आई अर्थात सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लाया गया था. सूचना का अधिकार हर भारतवासी का संवैधानिक अधिकार है. तब से लेकर अब तक और वर्ष 2015 में इसमे कुछ अमेंडमेंट भी हुए हैं.
  आर टी आई अधिनियम में क्या क्या जानकारी माग सकते हैं
   सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत देश प्रदेश की सरकारी काम काज और लोक सेवकों से संबंधित वह समस्त जानकारी माँगी और प्राप्त की जा सकती है जो आर टी आई की धारा 8 एवं 24 के तहत प्रतिबंधित न हो. जैसे देश की खुफिया जानकारी जिससे देश की सुरक्षा के संकट उत्पन्न हो जाएं, शाशकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 के तहत छूट, अथवा अन्य इसी प्रकार की जानकारी देने का प्रावधान आर टी आई कानून में नही है. इसके अतिरिक्त लोक सेवकों और सरकार के काम काज बजट, राशि के आय व्यय, सरकारी कार्यों के विषय में उनके लेखे जोखे, उपलब्ध कागज़ात सभी की जानकारी आर टी आई कानून के तहत प्राप्त की जा सकती है.
   कैसे फ़ाइल करते हैं आर टी आई आवेदन
   आर टी आई आवेदन फ़ाइल करने का एक विशेष प्रोफार्मा होता है जिसके अन्तर्गत आप 10 रुपए के शासकीय शुल्क जिसमे आई पी ओ अथवा राज्य स्तरीय स्टाम्प शुल्क सम्मिलित है उसके साथ में एक धारा 6(1) के तहत आवेदन बनाकर संबंधित लोक सूचना अधिकारी के नाम भेज सकते हैं. यह हांथोहाथ भी दिया जा सकता था और पोस्ट के माध्यम से भी भेजा जा सकता है.
आर टी आई की प्रथम एवं द्वितीय अपील
   जब चाही गई जानकारी प्रथम आर टी आई आवेदन पर अधिकतम 30 दिवश के भीतर उपलब्ध न करवाई जाए तो प्रथम अपील का प्रावधान होता है जो आर टी आई की धारा 19(1) के तहत की जाती है. इसमे आवेदन प्रोफार्मा के साथ अपीलकर्ता को 50 रुपये स्टाम्प शुल्क अथवा आई पी ओ के साथ अपील करना होता है. इसकी समयावधि 45 दिवश के भीतर होती है. यदि इस दरम्यान अपीलकर्ता को जानकारी संबंधित कार्यालय द्वारा उपलब्ध न करवाई जाए तो आवेदक को द्वितीय और अंतिम अपील के लिए जाना होता है 
   आरटीआई की धारा 19(3) के तहत दायर द्वितीय अपील दो तरह के कार्यालयों में भेजी जाती है. एक तो यदि प्रकरण या मूल आवेदन राज्यस्तरीय कार्यालयों और राज्य सरकार के कार्यालयों में भेजा गया था तो वह संबंधित राज्य के राज्य सूचना आयुक्त के नाम की जाती है, और यदि मूल आवेदन किसी केंद्रीय कार्यालय या केंद्रीय लोक सेवक के विरुद्ध दायर किया गया था तो उसमे केंद्रीय सूचना आयोग में आयुक्त के नाम पर अंतिम एवं द्वितीय अपील की जाती है.
  अंतिम विकल्प हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट
   यदि इतने में भी जानकारी अपीलकर्ता को उपलब्ध न हो तो वह संबंधित राज्य की उच्च न्यायालय में केस दायर कर सकता है और उसमे लोक सूचना अधिकारी से लेकर प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं राज्य सूचना आयोग को पार्टी बना सकता है. हाई कोर्ट से भी रिलीफ न मिलने पर यही सब कुछ उच्चतम न्यायालय में भी दायर किया जा सकता है.
   क्या है आर टी आई कानून की धारा 18
   इसी बीच आवेदन से लेकर द्वितीय और अंतिम अपील के बीच की एक सीढ़ी है आर टी आई कानून की धारा 18. धारा 18 का प्रयोग आवेदक द्वारा शिकायत के रूप में किया जाता है. जब कभी लोक सूचना अधिकारी द्वारा आर टी आई आवेदक द्वारा चाही गई जानकारी छुपाने का प्रयास किया जाए, जानकारी के नाम पर घुमाया जाय, गलत जानकारी देकर आवेदक को भ्रमित किया जाय अथवा झूठी जानकारी दी जाय तब तब आवेदक संबंधित लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध संबंधित सूचना आयोग में धारा 18 का प्रयोग कर शिकायत भेज सकता है जिंसमे वह यह माग करेगा की संबंधित लोक सूचना अधिकारी द्वारा गलत जानकारी देना, जानकारी छुपाना अथवा भ्रमित करने का प्रयास किया गया अतः आर टी आई की धारा 20(1)/(2) के तहत अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्यवाही की माग के साथ अन्य जो उचित लगे वह कार्यवाही की माग कर सकता है. ऐसे में राज्य सूचना आयुक्त उक्त मामले को अपने संज्ञान में लेकर लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी के कार्यों को विधिविरुद्ध पाए जाने पर अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग कर धारा 18 के तहत धारा 20(1)/(2) का प्रयोग करते हुए अनुशासनात्मक एवं दंडात्मक कार्यवाही कर सकता है.
  आर टी आई की धारा 18 सूचना आयोग का विशेषाधिकार की तरह है
   वास्तव में आर टी आई की धारा 6(1), 19(1) अथवा 19(3) की पेचीदगी से भरी प्रक्रिया से गुजरने के साथ साथ धारा 18 की शक्तियां आर टी आई आवेदकों के लिए रामबाण साबित हो सकती हैं बशर्ते इसके प्रति आयोग भी गंभीर हो तब. लेकिन इन सबके मूल में राज्य सूचना आयोग की तत्परता ही है. यदि राज्य सूचना आयोग इसे गंभीरता से लेता है और त्वरित कार्यवाही करता है तब तो धारा 18 ठीक है वरना बहुत से ऐसे मामले होते हैं जो सूचना आयोग में वर्षों से धूल फांक रहे होते हैं. यहाँ तो द्वितीय अपील ही एंटरटेन नही की जाती हैं तो सामान्य धारा 18 के तहत शिकायतों की तो कोई गिनती ही नही हैं.
   अपीलकर्ता शिवानन्द द्विवेदी बनाम मप्र शासन 
   अभी हाल ही में एक मामला आया जिंसमे रीवा मप्र में 75 पंचायतों के कराधान और 14वें वित्त आयोग की ग्रांट के उपयोग में अनियमितता प्रकाश में आयी. जिसके विषय में जिले के कई कार्यकर्ताओं द्वारा आवाज बुलंद की गई. उनमे से सामाजिक आर टी आई कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा भी जिला कलेक्टर रीवा के एक आदेश 2495 एवं 2498 को आधार बनाकर जिले की 75 पंचायतों जिनमे बहुतायत में 38 पंचायतें मात्र गंगेव जनपद में ही थीं जहां पर यह कराधान मामले में अनियमिता एवं भ्रष्टाचार प्रकाश में आया था इसी विषय पर अलग अलग दो लोक सूचना कार्यालयों पर आवेदन प्रस्तुत किया गया था जिनमे से दिनांक 24 एवं 25 सितंबर 2019 को क्रमशः लोक सूचना अधिकारी कार्यालय जनपद गंगेव एवं कार्यालय कलेक्टर को आर टी आई आवेदन देकर उक्त कलेक्टर द्वारा जारी पत्र पर जांच प्रतिवेदन की प्रमाणित प्रति अन्य संबंधित दस्तावेजों के साथ जजानकारी चाही गई थी.
  दोनो ही पीआईओ ने किया गुमराह
   गौरतलब है की दिनांक 03/10/2019 एवं दिनांक 14/10/2019 को क्रमशः जारी पत्रों क्र. 1247 एवं 176 के माध्यम से आर टी आई आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को सीईओ कार्यालय गंगेव एवं कलेक्टर कार्यालय रीवा के लोक सूचना अधिकारियों द्वारा पल्ला झाड़ते हुए जानकारी छुपाने के उद्देश्य, आवेदक अपीलार्थी को भ्रमित करने के उद्देश्य से बताया गया की संबंधित जानकारी उनके कार्यालय में उपलब्ध नही है बल्कि अन्य कार्यालय में उपलब्ध है.
  धारा 18 के तहत राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह को शिकायत
   इस बीच आवेदक द्वारा ट्विटर सोशल मीडिया के माध्यम से राज्य सूचना आयुक्त और रीवा संभाग के प्रभारी आयुक्त श्री राहुल सिंह को संदेश भेजकर शिकायत की गई और एक मार्गदर्शन मागा गया जिंसमे यह कहा गया की चूंकि संबंधित दोनो लोक सूचना अधिकारियों ने जानकारी देने से मना कर दिया है और भ्रमित करने का प्रयाश किया है अतः इस स्थिति में आवेदक को पुनः नाहक ही प्रथम एवं द्वितीय अपील की पेचीदगी से गुजरते हुए वर्षों इंतज़ार करने पड़ सकते हैं जैसा की पहले भी होता आया है.

   इस पर ट्विटर के माध्यम से राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह द्वारा आवेदक को उनके ईमेल एड्रेस पर आर टी आई की विशेष धारा 18 का प्रयोग करते हुए शिकायत भेजे जाने की बात कही साथ ही प्रथम अपील भी करने की सलाह दी गई.
  धारा 18 के तहत शिकायत पर हुई त्वरित कार्यवाही
   आर टी आई की धारा 18 के तहत शिकायत दिनांक 08 नवंबर को अपीलार्थी द्वारा राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह के ईमेल में की गई जिस पर दिनांक 29 नवंबर 2019 को ठीक 3 सप्ताह में एक्शन लेते हुए निराकरण किया गया जो अब तक के मप्र के राज्य सूचना आयोग में काफी त्वरित एक्शन के तौर पर माना जा रहा है.
  क्यों न तीनो पीआईओ पर प्रति 11250 रुपये का जुर्माना लगाया जाए
   रीवा जिले में लगभग 8 करोड़ के कराधान घोटाले के  विषय में गंगेव जनपद एवं रीवा कलेक्टर कार्यालय द्वारा जानकारी छुपाने के प्रयाश पर एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी की दिनांक 08 नवंबर की शिकायत पर राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने काफी गंभीरता से लिया. जिंसमे उन्होंने तीनों लोक सूचना आधिकारी जनपद गंगेव, जिला पंचायत रीवा एवं कलेक्टर रीवा को आड़े हांथों लिया और आर टी आई की धारा 7, 6, 7 की उपधारा 8(1), (2), (3), एवं धारा 5(5) का दोषी पाया और धारा 20(1)/(2) की कार्यवाही करते हुए अपने आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस जारी किया और पूंछा की क्यों न प्रत्येक तीनों लोक सूचना अधिकारियों के विरुद्ध जुर्माने के तौर पर 11,250/- रुपये का जुर्माना लगाया जाए.
  23 दिसंबर को तीनों लोक सूचना अधिकारियों की भोपाल में होगी पेशी
   जुर्माने के आशय के साथ आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए राज्य सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने न केवल जुर्माने लगाने की नोटिस दी है बल्कि तीनों संबंधित लोक सूचना अधिकारियों जनपद पंचायत गंगेव, जिला पंचायत रीवा एवं साथ में संयुक्त कलेक्टर रीवा को 23 दिसंबर को व्यक्तिगत रूप से भोपाल में राज्य सूचना आयोग में हाजिर होने का आदेश दिया है.
 क्या क्या कहा राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने
  आदेश क्रमांक/सी-0820/रासूआ/रीवा /2019 दिनांक 29/11/2019 के माध्यम से कारण बताओ नोटिस के साथ राज्य सूचना आयुक्त ने काफी तल्ख टिप्पड़ी की है जिसमे उन्होंने कहा की लगता है कि सूचना न देने के लिए तीनों लोक सूचना कार्यालयों में मैच फिक्सिंग जैसी हुई है. क्योंकि जिस प्रकार से आवेदकों को घुमाया जा रहा था इससे साफ जाहिर था की लोक सेवकों की सूचना की पारदर्शिता के प्रति मंसा बहुत अच्छी नहीं लगती. सूचना आयुक्त ने इस आदेश में कहा की कराधान घोटाले के मामले में आवेदक द्वारा जो जानकारी चाही गई थी वह सीधे सीधे कलेक्टर के एक आदेश 2495 एवं 2498 से संबंधित है जो स्वयं कलेक्टर द्वारा 7 दिवश के भीतर कार्यवाही चाही गई थी. आवेदक ने वह जानकारी सात दिवश के बाद चाही अतः यह पीआईओ कलेक्टर कार्यालय की जिम्मेदारी बनती थी की वह जानकारी दे न की किसी दूसरे कार्यालय को अंतरित करे. इस विषय में माननीय सूचना आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया जिसमे बताया की बेबजह आर टी आई आवेदन अंतरित कर लोक सूचना अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बच नही सकते.
  पीआईओ जिला पंचायत रीवा को पाया धारा 5(5) का दोषी
   चूंकि मूल आर टी आई आवेदन पीआईओ कलेक्टर कार्यालय रीवा द्वारा पीआईओ जिला पंचायत रीवा को अंतरित किया गया था अतः यह पीआईओ जिला पंचायत रीवा की जिम्मेदारी बनती थी की वह आवेदक को 7 दिवश के भीतर जानकारी मुहैया कराने संबंधित लिखित पत्र जारी करे जिसमे पीआईओ जिला पंचायत स्वयं असफल साबित हुए और इस आशय का कोई पत्र और जानकारी आवेदक शिवानन्द द्विवेदी को उपलब्ध नही कराया जिसमे न केवल आवेदक के साथ धारा 7 की उपधारा 8(1), (2), (3) के दोषी पाए गए बल्कि कार्यालय कलेक्टर के अंतरित आर टी आई आवेदन का जबाब कलेक्टर को न देकर कलेक्टर के साथ असहयोग भी किया इसलिए असहयोग के चलते आर टी आई की धारा 5(5) के दोषी पाए गए. जिसके फलस्वरूप राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने पीआईओ जिला पंचायत के विरुद्ध अनुशासनात्मक दंडात्मक कार्यवाही करते हुए धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत कारण बताओं नोटिस जारी किया और कहा की क्यों न आपके भी विरुद्ध 11 हज़ार 250 रुपये का जुर्माना ठोका जाय.
  पीआईओ गंगेव को पाया धारा 7(1) एवं  उपधारा 8(1), (2), (3) का दोषी
   इस बीच अपने पत्र में मप्र राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा की गंगेव जनपद के लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदक अपीलार्थी शिवानन्द द्विवेदी को जानकारी न देकर, जानकारी छुपाने के प्रयाश करने और भ्रमित करने पर धारा 7(1) के दोषी हैं साथ ही युक्तियुक्त कारण नही बताकर एवं अपीलीय अधिकारी की जानकारी एवं संपर्क उपलब्ध न कराकर धारा 7 की उपधारा 8(1), (2), (3) के भी दोषी हैं. अतः क्यों न इनके विरुद्ध भी अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए धारा 20(1) एवं 20(2) के तहत 11 हज़ार 250 रुपये का जुर्माना लगाया जाय.
 आयोग का अभिमत - जानकारी आपके पास नही तो हवा में कहां गायब हो गई
   पत्र के अंत में आयोग ने अपना अभिमत प्रस्तुत करते हुए कहा की गुणदोष के आधार पर प्रथम दृष्टया लोक सूचना अधिकारियों द्वारा जारी पत्रों एवं अपीलकर्ता की शिकायत के अवलोकन उपरांत इस प्रकरण में स्पष्ट होता है की सूचना के अधिकार अधिनियम के विपरीत विधि विरुद्ध तरीके से लोक सूचना अधिकारियों द्वारा जानबूझकर जानकारी के नाम पर एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के बीच घुमाया जा रहा है. सवाल यह है की कार्यालय कलेक्टर जिसके आदेश पर जांच शुरू हुई उसका कहना है की जानकारी उसके पास नही है. जिस कार्यालय को पीआईओ कलेक्टर द्वारा मूल आर टी आई आवेदन 6(3) के तहत अंतरित किया गया वह कह रहा है की जानकारी उसके पास भी नही है तो आखिर जानकारी हवा में कहां गायब हो गई.
 ट्विटर में आयुक्त ने बताया पीआईओ के बीच मैच फिक्सिंग जैसा खेल
   इस बीच ट्विटर पर की गई कार्यवाही की जानकारी देते हुए राज्य सूचना आयुक्त ने काफी तल्ख टिप्पड़ी की और कहा ऐसे लगता है जैसे लोक सूचना अधिकारियों के बीच मैच फिक्सिंग जैसा चल रहा है जिसमे एक विभाग कह रहा है की जानकारी मेरे पास नही उनके पास है और उनके पास जाओ तो वह बोलते हैं मेरे पास नही तीसरे के पास जाओ. जब तीसरे के पास जाओ वह बोलते हैं पहले के पास जाओ. तो सवाल यह उठता है की मूल जांच का आदेश देने वाला कार्यालय कलेक्टर ही जब ऐसे गैर जिम्मेदाराना बर्ताव करेगा तो अन्य कार्यालयों का क्या कहना.
  आर टी आई की धारा 18 की शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र के लिए अच्छा संदेश
   आज जिस प्रकार से देश प्रदेश में लोक सूचना के अधिकार का मजाक बन चुका था उससे साफ जाहिर है आने वाले दिनों में आम जनता और आर टी आई कार्यकर्ताओं का लोक सूचना के अधिकार कानून से विश्वास उठता जा रहा है. ऐसे में मप्र के वर्तमान राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह एक आशा की किरण जैसे आये हैं जो न केवल सूचना आवेदनों और अपीलों का त्वरित निराकरण करने का हर संभव प्रयाश कर रहे हैं बल्कि मप्र में लोक सूचना के अधिकार का कैसे प्रचार किया जाए कैसे कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा किया जाय वह सभी जरूरी संभव प्रयास भी कर रहे हैं.
   न केवल कार्यालयीन और कागज़ी तौर पर बल्कि सोशल मीडिया व्हाट्सएप एवं ट्विटर जैसे शसक्त आधुनिक सूचना माध्यमों का सहारा लेकर आवेदकों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें आवश्यक जानकारी दे रहे हैं की वह कैसे और कहां अपील करें, कहां आर टी आई दाखिल करें, कैसे लोक सूचना अधिकारी के भ्रमित करने पर धारा 18 के तहत आयोग में शिकायत भेज सकते हैं आदि.
  आवेदन से लेकर अपील तक थी दौड़, अब जानी धारा 18 की भी ताकत



    पहले आर टी आई में मात्र आवेदन के बाद प्रथम और द्वितीय अपील तक ही ज्यादातर आवेदक सीमित रहते थे और उस पर भी इंतज़ार इतना लंबा होता था की आवेदक स्वयं थक हारकर परेशान हो जाते थे. अब जब धारा 18 के तहत लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध शिकायत पर भी त्वरित कार्यवाही हो रही है ऐसे में ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे लोकतंत्र में नई जान फूंकी जा रही है. अब देखना यह होगा की यह सिलसिला कब तक चलता है और सरकारें इस विषय में और कितने कदम उठा पाती हैं जिससे आरटीआई को और मजबूत और शसक्त बनाया जाए और जन जन तक सूचना पहुच सके और लोकतंत्र में पारदर्शिता आ सके.

     वैसे यह कहना गलत नही होगा की फिलहाल तो मात्र सूचना आयुक्त राहुल सिंह ही एकमात्र आशा की किरण हैं बांकी सूचना के मामले में देश की स्थिति तो सभी को स्पष्ट ही है.
संलग्न - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें राज्य सूचना आयुक्त महोदय श्री राहुल सिंह जी द्वारा धारा 18 की शिकायत पर की गई कार्यवाही की प्रतियां. साथ में राहुल सिंह जी की तस्वीरें. साथ में ट्विटर से स्क्रीनशॉट. आवेदक द्वारा धारा 18 के तहत भेजी गई शिकायत की पीडीएफ फ़ाइल आदि.
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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ग्राम कैथा, पोस्ट अमिलिया, थाना गढ़, तहसील मनगवां, 

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587








Thursday, September 12, 2019

कैथा में भंडारे के साथ श्रीगणेशोत्सव संपन्न, कैथा श्रीहनुमान मन्दिर में चला 11 दिवशीय कार्यक्रम, लोगों ने संगीत संध्या का जमकर लिया आनंद (जिले के विभिन्न ग्रामों में आयोजित हुआ श्रीगणेशोत्सव, अनंत चतुर्दशी के दिन हुआ विसर्जन)

दिनांक 12 सितंबर 2019, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
     यज्ञों की पावन पुनीत स्थली कैथा श्रीहनुमान मन्दिर प्रांगण में आयोजित हुआ परंपरागत श्रीगणेशोत्सव 2019 का कार्यक्रम दिनांक 12 सितंबर को संपन्न हुआ। इस बीच जहां पूरे 10 दिन भजन संध्या का आयोजन हुआ वहीं ग्यारहवें और कार्यक्रम के अंतिम दिन 12 सितंबर को हवन भंडारे के साथ कार्यक्रम का विसर्जन किया गया।

भंडारे का प्रसाद लेने पहुचे श्रद्धालु
  इस बीच भंडारे का प्रसाद ग्रहण करने भक्त श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। भंडारे का कार्यक्रम प्रतिकूल प्राकृतिक दशाओं के मध्य प्रारम्भ हुआ जब शुबह से ही मौसम ने कुछ बेरुखी की लेकिन इस बीच कार्यक्रम के दौरान मौसम में कुछ परिवर्तन दिखा और धूप सी निकली इस बीच भंडारे में पूड़ी सब्जी और मिष्ठान बनाने का कार्यक्रम हुआ। दोपहर बाद 2 बजकर 30 मिनट से भंडारे में परंपरागत रूप से बैठाकर प्रसाद वितरण प्रारम्भ हुआ और रात्रि श्रद्धालुओं के आगमन तक चलता रहा।

     इस बीच कैथा के अतिरिक्त आसपास के ग्रामों हिनौती, मिसिरा, बड़ोखर, सोरहवा, सेदहा, करहिया, डाढ़, इटहा, पंडुआ, अकलसी आदि ग्रामों के हज़ारों भक्त श्रद्धालुओं ने आकर प्रसाद ग्रहण किया।

    शाम 6 बजे के बाद क्योटी नदी में लेजाकर श्रीगणेश जी की प्रतिमा को विसर्जित कर प्रवाहित किया गया।


   11 की भजन संध्या में ये रहीं प्रस्तुतियां
   इस बीच प्रत्येक शाम को आयोजित होने वाली भजन संध्या में दिनांक 11 सितंबर के कार्यक्रमों में लालगाँव श्रीधाम संगीतांजली से पधारे डॉक्टर सीबी शुक्ला एवं सुनील सिंह और उनके बाल कलाकारों नीलिमा सिंह, श्रेया सिंह, ऋषभ शुक्ला ने शानदार और मनोहारी भजन प्रस्तुतियां दीं।
     नीलिमा, श्रेया और ऋषभ ने जिन भजनों को प्रस्तुत किया उनमे से "ले चल अपनी नागरिया, अवध बिहारी सांवरिया", "मुझे श्याम सुंदर की दुल्हन बना दे", "मोसे हर ले गया दिल जिगर, सांवरा जादूगर", "गौरी के नंदन आये हमारे द्वार", "हरे रामा झिम झिम बरसे पनिया झूले राधा रानियां रे हारी", "एकबार तो राधा बनकर देखो मेरे सांवरिया, राधा ये रोरो कहे", "हो मीरा श्याम दीवानी, हो मीरा प्रेम दीवानी", "गणपति को लगे न नजरिया जरा काजल लगा लो" आदि सम्मिलित रहीं। बालिकाओं द्वारा इतने बेहतर अंदाज़ में कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां हुईं की सभी मंत्रमुग्ध हो गए।
संलग्न - कृपया भंडारे सहित कार्यक्रम की तस्वीरें प्राप्त करें।
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शिवानन्द द्विवेदी

संयोजक एवं प्रचारक

श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति एवं

योग वेदांत धर्मार्थ संघ, जिला रीवा मप्र

मोबाइल 9589152587



Tuesday, February 12, 2019

रीवा ब्रेकिंग- मजदूरी के स्थान पर मिली जेल, मजदूरों के मानवाधिकार का हुआ घोर हनन (मामला जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत डाढ़ पंचायत का जहाँ सैकड़ों मजदूर मजदूरी न मिलने को लेकर कर रहे थे अनसन, गढ़ पुलिश आयी और उठाकर ले गयी, अनसन में महिलाएं बुजुर्ग भी थे सम्मिलित)

दिनांक 12 फरवरी 2019, स्थान - गढ़/कटरा, रीवा मप्र
  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
    लोकतंन्त्र की हत्या कर पुलिसिया राज कैसे स्थापित हो रहा है इसका एक जीता जागता उदाहरण दिखा रीवा जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत आने वाली घाट के ऊपर स्थित डाढ़ पंचायत में।
   मजदूरी न मिलने पर सौंपा था ज्ञापन
    विंध्य किसान परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता पुष्पराज तिवारी, डाढ़ निवासी गीता साकेत एवं ममता साकेत द्वारा बताया गया कि वह सभी अपने गांव के सैकड़ों मजदूरों के साथ 42 मजदूरों के मनरेगा में मेढ़ बंधान में मिट्टीकरण के किये गए कार्य के पैसे की माग कर रहे थे जिसके लिए पिछले सप्ताह मजदूरों ने त्योंथर सीईओ, एसडीएम, एवं जिला कलेक्टर को विधिवत लिखित ज्ञापन सौंपा था जिसके लिए माग की थी कि यदि 10 फरवरी 2019 तक यदि डाढ़ पंचायत के पंच परमेश्वर एवं मनरेगा के कार्यों की विधिवत जांच होकर 42 मजदूरों को उनकी मजदूरी नही दी जाती तो सभी मजदूर 11 फरवरी से अनसन प्रदर्शन करेंगे। 
      मनरेगा मजदूरी न मिलने पर कर रहे थे अनसन, पुलिश आयी और भर ले गयी थाने
    इस बीच कोई प्रशासनिक सुनवाई न होने पर सभी मजदूर पूर्व सूचना के आधार पर डाढ़ पंचायत भवन के सामने उपस्थित होकर प्रदर्शन कर रहे थे। दिनाँक 12 फरवरी को अनसन का दूसरा दिन था तभी सुबह 11 बजे के लगभग गढ़ पुलिश टी आई सीके तिवारी, एवं मनगवां एसडीओपी के निर्देश पर एसआई शैलेन्द्र सिंह अपने बल के साथ आये और शिवकुमार साकेत सहित अन्य मजदूरों को गाड़ी में भरकर गढ़ थाने ले गए।
    क्या लोकतंन्त्र में अनसन करना है अपराध?
    जिस प्रकार से लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण ढंग से अपने पंचायत भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे मनरेगा के मजदूरों को गढ़ पुलिश उठाकर थाना ले गयी उससे साफ जाहिर है कि लोकतंन्त्र की हत्या कर मजदूरों और आम नागरिकों के मानवाधिकार का अच्छा खासा उल्लंघन किया जा रहा है।
   पुलिश ने क्यों नही की मामले की जांच?
   सवाल यह भी है कि आखिर गढ़ पुलिश टी आई सीके तिवारी द्वारा वास्तविकता जानने का प्रयाश क्यों नही किया गया? क्या यह पुलिश विभाग को नही पता था कि आखिर मजदूर इकठ्ठा होकर किस बात के लिए प्रदर्शन कर रहे थे? क्या सबसे पहले अपराध ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव एवं सीईओ त्योंथर के खिलाफ नही बनता? आखिर मजदूरों ने जब मनरेगा में कार्य किया है तो उनकी मजदूरी किस आधार पर नही दी जा रही क्या सीईओ अथवा पंचायत विभाग ने लिखित तौर पर मजदूरों को अवगत कराया था?
   हिटलरवादी तंत्र में कमजोर का जीना दूभर
   इन सब प्रश्नों के जबाब यह हिटलरवादी तंत्र नही दे सकता क्योंकि यह तो अंग्रेजों के समय की पुलिश है जो अपनी अकल कम लगाती है और नेताओं रसूखदारों की ज्यादा सुनती है। आज गढ़ पुलिश के यह हाल हैं कि यहाँ अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है और अपराधियों पर लगाम नही लग पा रहा है जबकि अपनी नाकामी छुपाने के लिए गढ़ पुलिश निर्दोषों कमजोरों और मजदूरों को निशाना बनाकर उन्हें जबरन कठघरे में खड़े कर रही है।
   वास्तव में देखा जाय तो गढ़ पुलिश इस मामले को पंचायत विभाग पर दबाब डालकर मजदूरों की मजदूरी दिलवाने में एवं पंचायती भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती थी लेकिन उल्टे अपने नाकामी छुपाने के लिए पुलिश ने एक कमजोर बेरोजगार मजदूर के मानवाधिकार को खत्म करते हुए मजदूर को ही सलाखों के पीछे पहुचा दिया। 
    अब देखना यह होगा कि मजदूरों की इस शिकायत पर गढ़ पुलिश एवं पंचायत सरपंच सचिव के विरुद्ध क्या कार्यवाही होती है?
संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखें अनसन प्रदर्शन करते डाढ़ पंचायत के मजदूर एवं दिए गए ज्ञापन की फ़ोटो।
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा, मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Tuesday, January 15, 2019

पावर प्लांट चचाई में जंगल बीच करंट लगाकर चीतल एवं भैंसों का हुआ शिकार, वन विभाग पल्ला झाड़ रहा, पुलिश को कुछ फर्क नही पड़ता (मामला जिले में बढ़े वन अपराधों का जहाँ एमपीईबी पावर प्लांट चचाई के पास जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर अखंड प्रताप सिंह की 5 भैंसों को मार डाला गया, लंबे अरसे से करंट लगाकर चीतल का किया जा रहा था शिकार, बदकिस्मती से लाखों की फंस गयीं भैंसें)

दिनाँक 15 जनवरी 2019, स्थान - चचाई पावर प्लांट, सिरमौर, रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    प्रदेश एवं जिले में निरंतर बढ़ रहे बेलगाम वन अपराधों की श्रेणी में एक और अध्याय जुड़ चुका है. अभी तक तो नहरों, घाटियों, जलप्रपातों के बीच में मवेशियों को जीवित धकेले जाने की वारदातें सामने आईं थीं लेकिन अब तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे पूरे जंगल विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने वाला है. जी हाँ यहां कोई पहेलियां नही बुझाई जा रही बल्कि सच्चाई के समाज को अवगत कराया जा रहा है.

    जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर किया जाता रहा शिकार

    यह मामला है चचाई जलप्रपात से होकर जाने वाले जंगल का जहां से होते हुए लगभग 7 से 8 किमी दूर जंगल के रास्ते बकिया-बीहर नहर पावर प्लांट चचाई से अतरैला वन परिक्षेत्र के जंगल तक जाती है. अभी पिछले दिनों ही इसी नहर में इंटेक प्लांट के पास दर्ज़नों गोवंशों के उतराते हुए शव मिले थे जो मीडिया में और समाज में हलचल पैदा कर दिए थे. अभी एक और मामला सामने आया है जो महीनों पुराना बताया गया है जिंसमे पीड़ित अखंड प्रताप सिंह निवासी मरैला ने लिखित तौर पर पुलिश एवं वन विभाग को शिकायत भी की लेकिन कार्यवाही नही हुई है.

    मामला है 5 भैंसों और एक चीतल का जंगल के बीच करंट से फंसकर मौत का

   सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की जंगल के बीचोंबीच आखिर करंट आया कहां से लेकिन चकित मत होइये बता दें की चचाई पावर प्लांट बस नजदीक ही स्थित है जो 315 मेगावाट की बिजली उत्पन्न करता है. यह पावर प्लांट सरकार के ऐसे नियमों के अन्तर्गत बनाया गया है जो जंगल भूमि का भी उपयोग कर रहा है यद्यपि इस पावर प्लांट का कर्ताधर्ता एमपीईबी विभाग है.

   दिसंबर दूसरे सप्ताह की है वारदात  

    दिनाँक 12-13 दिसंबर के आसपास मरैला निवासी अखंड प्रताप सिंह उम्र लगभग 65 वर्ष की चार भैंसें एवं एक भैसा भैंसहटी नामक चचाई घाट  के नीचे चरने के लिए उतारे गए थे. बताया गया की यहीं एमपीईबी पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली का दुरुपयोग करके अर्जुन केवट नामक जवा निवासी उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए करंट लगाया था जिसमे अखंड प्रताप सिंह की 4 नग जीवित पजाने योग्य भैंसें एवं एक नग भैंसा सब मिलाकर लगभग 4 से 5 लाख कीमत की फंसकर मारे गए।

   अतरैला थाने एवं वन विभाग में लिखित दी सूचना

    अखंड प्रताप सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर घटना की सूचना  तत्काल अतरैला थाना एवं वन परिक्षेत्र अतरैला में दी गई लेकिन न तो वन विभाग द्वारा और न ही पुलिश विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज की गई. जबकि देखा जाए तो दोनों ही दृष्टि से करंट लगाकर जंगल के अंदर शिकार और मवेशियों का उसमे फंसकर मारना एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे वन विभाग को पीओआर और पुलिश विभाग को बकायदे एफआईआर दर्ज करना चाहिए.

   वेटेरिनरी अधिकारी ने शव न मिलने का बनाया बहाना

     बता दें की इस घटना के विषय में जब जवा वेटेरिनरी अधिकारी आर पी गौतम मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने पूरा दोष वन विभाग और पुलिश विभाग पर मढ़ दिया और बताया की हमे मृत भैंसों का कोई भी अंग नही मिला. जबकि पीड़ित अखंड प्रताप दवारा बताया गया को मृत भैंसों के कुछ पैर वगैरह अंग अभी भी वहीं जंगल में पड़े हुए हैं जिनको आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर फेंक दिया था जिससे यह पता न चले की घटना करंट लगाकर कारित हुई है. जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो ही जाती है की जीव केई मृत्यु के क्या कारण थे.

 क्या कहा अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने

    जब प्राथमिकी दर्ज न किये जाने के विषय में अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की वह मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं जबकि मेडिकल रिपोर्ट इसलिए नही बनी की वेटेरिनरी अधिकारी को मवेशियों के शव ही नही मिले.

    चश्मदीख गवाह भी है पुख्ता प्रमाण 

    यद्यपि इस पूरे मामले में एक चश्मदीख गवाह भी मौजूद है. चश्मदीख प्रदीप कुमार कोल उर्फ विधायक पिता चंद्रशेखर कोल उर्फ बेसहना निवासी मरैला उम्र लगभग 20 वर्ष के द्वारा पूरी घटना की जानकारी बतायी जा चुकी है लेकिन थाना प्रभारी अतरैला प्रदीप सिंह का अब यह कहना है की जब तक आरोपी अर्जुन केवट को पुलिश पकड़ कर पूंछताछ नही करेगी तब तक प्राथमिकी दर्ज नही होगी. वहरहाल अभी तक पुलिश ने आरोपी को ढूंढने तक का प्रयाश नही किया है जबकि घटना कारित हुए एक माह से ऊपर बीत चुके हैं. 

   रेंज अफसर अतरैला का वीडियो वायरल

    बता दें की रेंज अफसर अतरैला का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमे रेंज अफसर स्वयं भी घटना कारित होने की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं और बता रहे हैं की करंट से न केवल भैसों की मौत हुई हैं बल्कि चीतल की भी मौत हुई है. पर अब सवाल यह उठता है की आखिर जंगली संरक्षित क्षेत्र में एमपीईबी पावर प्लांट के करंट द्वारा असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार जैसे संगीन अपराध के लिए अब तक रेंज के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया? आखिर पूरे मामले में एमपीईबी की भी तो जबाबदेही तय है की आखिर उनके द्वारा पावर प्लांट में उत्पन्न की जाने वाली बिजली का दुरुपयोग आपराधिक किस्म के लोग कैसे कर रहे हैं?

 संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें पीड़ित अखंड प्रताप सिंह दवारा लिखित दिया गया आवेदन एवं साथ में करंट में मृत हुई भैंसों के कंकाल आदि जिन्हें बताया गया की आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर वहीं नदी में फेंक दिया था.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Friday, January 4, 2019

चल-पशु तस्करी मामले में टी आई के विरुद्ध आई जी को की गयी शिकायत, पत्रकारों ने कार्यवाही की किया माग (बैकुंठपुर थाना क्षेत्र का है मामला जिसमे चल-पशु तस्करी पर पर्दा डालने पुलिश ने पत्रकारों पर फ़र्ज़ी मुकदमे में फंसाने की दी थी धमकी साथ ही पत्रकारों को टी आई मंगल सिंह ने बताया था फ़र्ज़ी)

दिनांक 04/01/2019, स्थान - रीवा मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    चल-पशु तस्करी के काले धंधे और पुलिश-माफिया के सम्बंध का पर्दाफाश होने के बाद अब पुलिश ने सामाजिक संगठनों और पत्रकारों को टारगेट करना प्रारंभ कर दिया है। अब सवाल यह है कि पुलिश वाले ही अपनी नाकामी और मिली भगत छुपाने प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं।

   बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने पशु तस्करों को बताया था गरीब

   बता दें कि घटना में टर्न तब आया जब बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह ने दबोचे गए चल-पशु तस्करों को क्लीन चिट देते हुए उन्हें गरीब और किसान बताया। सवाल यह था कि पुलिश आरोपी की घटना में संलिप्तता की जांच किये वगैर स्वयं ही पशु तस्करों को गरीबी रेखा का प्रमाण पत्र दे रही है यह कहाँ तक जायज है? किसी अपराध में आरोपी की संलिप्तता है कि नही और कारित घटना से सम्बंधित साक्ष्यों के आधार पर विधिवत जांच के बाद क्लीन चिट देना तो फिर भी वाजिब हो सकता है, लेकिन बिना जांच किये बिना बयान लिए और बिना कोई कायमी किये वाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पशु तस्करों को गरीब किसान का सर्टिफिकेट देना तो एक तरह से तस्करी को बढ़ावा देना और सभी साक्ष्यों और सबूतों को दरकिनार करना है।

चल-पशु तस्करी सम्बंधित कई प्रश्न अनुत्तरित ही रहे

   सवाल यह था कि जब पिछले कई सप्ताह से पिपरहा, क्योटी, तराई, छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, कोतमा से छतीसगढ़ तक की चल-पशु तस्करी की वारदातें पुलिश और मीडिया के समक्ष रखी गई और रीवा जिले के सगरा, गढ़/लालगांव, और बैकुंठपुर थाने में विधिवत शिकायतें की गईं तो पुलिश ने विधिवत कार्यवाही क्यों नही की? क्या उक्त सभी घटनाओं में संलिप्त लोग गरीब और किसान थे? क्या कार और मोटर साईकल में माफिया की तरह पशुओं का पीछा करने वाले लोग गरीब और किसान थे? यदि प्रतिदिन छुहिया या मोहनिया घाटी से हज़ारों की संख्या में कोतमा के रास्ते छत्तीसगढ़ गोवंश भेजे जाते हैं तो क्या यह सभी गोवंश प्रतिदिन कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे हैं? यदि कृषि कार्य के लिए उपयोग हो रहे तो इसका क्या प्रमाण है? प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में भेजे जाने वाले गोवंश कहां से खरीदे जाते हैं और किन किन किसानों को बेंचे जाते हैं? ऐसे कौन कौन से किसान हैं जो अभी भी इतने बड़े पैमाने पर बैलों से खेती करते हैं? जो लोग अपने आप को तथाकथित पशु व्यापारी बता रहे हैं और इतनी बड़ी संख्या में पशु व्यापार कर रहे हैं क्या इनके पास जिला प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग से पंजीयन है? 

    इसी प्रकार पता नही कितने अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनका जबाब पुलिश ने नही दिया और बिना किसी आधार के ही चल-पशु तस्करों को तथाकथित पशु व्यापारी और गरीब किसान बताकर फुरसत कर दिया। यदि पुलिश लोगों को गरीबी रेखा का प्रमाणपत्र वितरित करेगी तो फिर किसी को कलेक्टर और तहसीलदार के पास जाने की जरूरत नही पड़ेगी।

    पत्रकारों ने आई जी और एसपी को किया लिखित शिकायत

    चल-पशु तस्करी के मामले को उठाने वाले रीवा के पत्रकारों ने दिनांक 03 जनवरी 2019 को पुलिश अधीक्षक और पुलिश महानिरीक्षक रीवा को लिखित शिकायत भी की है जिसमे बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी कहने, धमकाने, और फ़र्ज़ी मामलों में फंसाने की बात कही है। 

    बताया गया कि बेबाक शक्ति न्यूज़ के रीवा ब्यूरो चीफ प्रदीप पटेल एवं खुलासा न्यूज़ लाइव के रीवा ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने दिनांक 03 जनवरी 2019 की एक लिखित शिकायत में बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह द्वारा धमकाने, दुर्व्यवहार करने और मामलों में फंसाने की शिकायत की है और टी आई के विरुद्ध कार्यवाही की माग के साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा की माग की है।

   बता दें कि दिनाँक 31 दिसंबर 2018 को दोपहर के आसपास पत्रकार प्रदीप पटेल ने बैकुंठपुर थाना अंतर्गत हर्दी मोड़ से डिहिया-धुन्धकी ग्राम की तरफ जाने वाली सड़क पर बड़ी संख्या में पशुओं को ले जाते आधा दर्जन लोगों को देखा था जिसकी जानकारी पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी थी। इसके बाद सम्बंधित थाना बैकुंठपुर टी आई मंगल सिंह और रीवा आई जी आदि को सूचित किया गया था। जानकारी ध्यान फाउंडेशन के पदाधिकारियों को भी भेजी गई थी।  

     सूचना काफी उच्चस्तर तक भेजने के बाद जब बैकुंठपुर टी आई पर चल-पशु तस्करों पर कार्यवाही का दबाब बना तो टी आई मंगल सिंह ने बिना विधिवत जांच किये स्वयं ही पशु तस्करों को गरीब और किसान होने का प्रमाणपत्र दे डाला और पत्रकारों को फ़र्ज़ी बताया साथ ही मुकदमों में फंसाने की धमकी दे डाली।

     पुलिश की बर्बरता पर सकते में आये पत्रकारों ने मामले को अगले दिनों एसपी और आई जी रीवा के समक्ष लिखित देकर मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की माग की है।

संलग्न - पत्रकारों द्वारा एसपी और आईजी कार्यालय में लिखित दिए गए आवेदन की प्रतियां साथ ही उपस्थित पत्रकार प्रदीप पटेल और आनंद द्विवेदी।

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शिवानन्द द्विवेदी

 सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Saturday, December 29, 2018

छुहिया घाटी, देवलोंद, व्योहारी, जयसिंह नगर, जैतपुर, कोतमा के रास्ते बांग्लादेश तक पशु तस्करी का चल रहा खेल, कोतमा और जैतपुर का पशु मेला है पशु तस्करी और पशु अपराध की मुख्य जड़ (मामला देश में चल रहे पशु तस्करी के खेल का जिसमे पशु तस्करों द्वारा पैदल मवेशियों को ले जाया जा रहा छत्तीशगढ़ के रास्ते बंगाल और बांग्लादेश, शासन प्रशासन सब जानते हुए भी लगाम लगाने में विफल)

दिनांक 29/12/2018, स्थान - शहडोल-कोतमा, मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी)

    देश प्रदेश में पशु तस्करी का खेल किस कदर बढ़ गया है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की रीवा जिले में आवारा छोड़े गए पशुओं को समूहों में इकट्ठा कर गांव गांव में रखा जाता है फिर उन्हें पैदल चलकर छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी के रास्ते सीधी और शहडोल के रास्ते छतीसगढ़, विहार, आंध्रा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश तक भेज दिया जाता है. 

    आये दिन बांग्लादेश बॉर्डर में बीएसएफ द्वारा हज़ारों की संख्या में ट्रकों से लदे हुए मवेशियों के जत्थे पकड़े जाते हैं. 

   कैसा है यह पशु तस्करी का पूरा खेल

   यह पूरा खेल काफी टेढ़ा मेढ़ा है जिसमे सम्मिलित पशु तस्कर गांव से लेकर हाई प्रोफाइल तक के लोग हैं जिनके पास पैसा और पावर दोनो है. जहां मवेशियों को हांकने के लिए छोटे गरीब किश्म के लेबर लगाए जाते हैं जिन्हें कुछ पैसे देकर मवेशियों को हांका जाता है वहीं इन्हें मॉनिटर करने के लिए कारों, और बाइक में इनके बड़े दलाल पूरे रास्ते भर लगे होते हैं.

   पुलिस के सह से चलता है काला धंधा

  यह पूरा धंधा पुलिश प्रशासन के सह से चलता है. पुलिश प्रशासन की मिलीभगत के चलते आम शिकायतों पर कोई कार्यवाही नही होती. पशु तस्कर सीधे पुलिश से मिले होते हैं जिससे उन्हें इसका शेयर मिल जाता है. इसका खुलासा भी तब हुआ जब रीवा जिले के थाना गढ़ एवं लालगांव चौकी अन्तर्गत पिपरहा एवं क्योटी ग्राम के पास एक इसी तरह से पशु तस्करी का गिरोह पकड़ा गया था जिसमे इस बात का खुलासा हुआ.

  पैदल मार्च से संदेह की कम है गुंजाइश

   इस काले धंधे में सबसे बड़ा पॉइंट यह रहता है की यदि पशु तस्कर ट्रक और वाहनों का इस्तेमाल करते हैं तो मोटर व्हीकल एक्ट, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, मप्र गोवंश वध प्रतिशेष अधिनियम सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज होने का डर रहता है इसलिए ज्यादातर पशु तस्कर लेबरों के सहयोग से गांव गांव अपनी सेटिंग बनाये रहते हैं और इन पशुओं को पैदल मार्च करवाते हैं जिससे आम नागरिकों को इस बात का संदेह नही होता की पशु काटने के लिए ले जाए जा रहे हैं. पर वास्तव में सच्चाई यही है की पशुओं को काटने के लिए भेजा जाता है.

  पूँछने पर बताते हैं कृषि और जुताई के लिए

   जब कोई पूंछता है की यह पैदल मवेशियों को कहां ले जाया जा रहा है तो बताया जाता है की यह सब कृषि कार्य हेतु ले जाए जा रहे हैं जहां शहडोल कोतमा अनूपपुर में इनसे खेती की जाती है लेकिन सवाल यह उठता है की हर रोज हज़ारों की संख्या में जाने वाले बैल आखिर किस खेती के लिए जाते हैं? आखिर इनकी खेती में कितनी डिमांड है? क्या अनूपपुर, शहडोल और कोतमा में मवेशी पैदा नही होते की इनको रीवा सतना के तराई इलाकों से पैदल होते हुए सीधी शहडोल और अनूपपुर से छत्तीशगढ़ रोज ले जाया जाता है? यदि बैलों की कृषि कार्य में आवश्यकता है तो क्या छत्तीशगढ़ में बैल उत्पन्न नही होते? 

   स्टिंग आपरेशन में सच्चाई आई सामने

   इसी बात की पड़ताल करने के लिए एक टीम गठित कर एक स्टिंग आपरेशन के वास्ते और सबूत इकठ्ठा करने के लिए रीवा की छुहिया घाटी से होते हुए सीधी शहडोल, कोतमा अनूपपुर, मलगा-छत्तीसगढ़ तक पहुचा गया. रास्ते में आने वाले ऐसे दर्जनों समूहों को देखा गया जिसमे ज्यादातर समूह रोड में रास्ते में ही मिल गए जो धड़ल्ले से बिना किसी डर के सैकड़ों की संख्या में मवेशियों को हांकते हुए ले जा रहे थे. इनमे से कुछ से पूंछा भी गया तो उन लेबरों ने बताया की कोतमा में बैलों की मंडी लगती है जहां पर इनका व्यापार होता है. इसी प्रकार जैतपुर आदि कुछ अन्य जगहों का भी जिक्र किया गया जहां पर पशु मेला की बात सामने आयी.

    हाई प्रोफाइल लोगों के जुड़े होने के संदेह

   जिस प्रकार से बेरोकटोक यह पशुओं के तथाकथित व्यापार का खेल एक अरसे से चल रहा है इससे साफ पता चलता है की इसमे सम्मिलित लोग कोई छोटे मोटे कैलिबर के नही हो सकते. इसमे ऐसे लोग सम्मिलित हैं जिनकी पंहुच काफी ऊपर तक है. यहां तक की कुछ सूत्रों से यहां तक जानकारी मिली की इसमे कुछ नेता भी सम्मिलित हैं जो कुछ तथाकथित हिंदूवादी पार्टियों से भी तालुक रखते हैं. कई बार जब इस अवैध काले धंधे पर कुछ पशु अधिकारों के लिए और अवैध कार्यों के विरोध में लड़ने वाले लोगों ने आवाज उठाई तो इन नेताओं और संगठनों के लोगों के नाम भी सामने आये जिहोने धमकियां भी दीं. अतः यह कहना बिल्कुल ही अतिशयोक्ति नही है की हाई प्रोफाइल संगठनों और पार्टियों के नेताओं के हाँथ और मिलीभगत से ऐसे धंधे फुल फ्लेज में चल रहे हैं वरना आज इतने ज्यादा हिंदूवादी संगठन सक्रिय हैं तो क्या इस काले धंधे को रोंका नही जा सकता था? 

  कोतमा सरस्वती स्कूल परिसर में लगता है पशु मेला

   रीवा और तराई क्षेत्रों से समेटे गए हज़ारों की संख्या में मवेशियों को रविवार के दिन हांक कर कोतमा की ब्वॉयज सरस्वती स्कूल के परिसर में लेजाकर रखा जाता है जहां से प्रत्येक रविवार के दिन पशुओं की मंडी लगती है और वहीं से इन्हें फिर इधर उधर किया जाता है. रातोंरात यहीं से लोडिंग भी हो जाती है इस वास्ते स्कूल ग्राउंड परिसर में कई संदिग्ध ट्रक भी खड़े देखे जा सकते हैं. बताया तो यह जाता है की यह बैलों की मंडी जुताई और कृषि कार्य के लिए लगती है लेकिन सच्चाई यह है की यह स्कूल परिसर में एक दो दिन पहले से ही मवेशी इकठ्ठे कर लिए जाते हैं और अगले सोमवार मंगलवार तक बाहर ले जाए जाते हैं. यह कहना की मात्र रविवार को ही मंडी लगती है सही नही है क्योंकि ब्यॉयज सरस्वती स्कूल कोतमा के शिक्षकों से बात करने पर बताया की यह जबरन और स्कूल के उच्च प्रबंधन की सांठगांठ से लगभग 15 एकड़ में मंडी लगती है जिसका स्कूल के शिक्षकों ने विरोध भी किया है लेकिन कोई सुनवाई नही हो रही है. स्कूल का कहना है की वह इस मंडी को बन्द करवाना चाहते हैं लेकिन सफलता नही मिली है. बताया गया की नगर पालिका/नगर निगम कोतमा द्वारा किसी बरगाही को इसका ठेका दिया जाता है और उनके स्कूल ग्राउंड का दुरुपयोग किया जा रहा है.

 पशु मेला ही है पशु अपराध की जड़

  जो जानकारी मिली इससे पता चला की आज भी जब पशुओं की उपयोगिता लगभग समाप्त हो चुकी है ऐसे में कोई भी व्यक्ति विश्वास नही करना चाहता की इतनी बड़ी तादाद में पशुओं को मात्र कृषि कार्य के लिए ले जाया जाता है. मानाकि छत्तीशगढ़ एरिया में कुछ हद तक पिछड़े जंगली इलाकों में अभी भी पशुओं से खेती होती है लेकिन फिर भी रोज हज़ारों की संख्या में छुहिया घाटी, मोहनिया घाटी, देवलोंद, बाणसागर, व्योहारी, जयसिंह नगर के रास्ते कोतमा और मलगा आखिर कैसे जा रहे हैं? मानाकि कृषि के लिए कुछ मात्रा में बैलों की आवश्यकता है लेकिन क्या छत्तीशगढ़ के किसानो के घरों में गायें नही हैं? क्या छत्तीशगढ़ में इतने बैल पैदा नही होते की उन लोगों की कृषि सबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति हो पाए? क्या इतने बड़े पैमाने में रोज बैलों की आवश्यकता मात्र कृषि और जुताई के लिए है? क्या छत्तीसगढ़ आज इतना पिछड़ा है की वहां ट्रेक्टर बिल्कुल है ही नही? क्या छत्तीसगढ़ में मॉडर्न आधुनिक यंत्रों से खेती-किसानी नही होती? 

    इन प्रश्नों के स्वयमेव जबाब ढूंढने चलें तो पता चलता है की खेती-किसानी के नाम पर कोतमा और जैतपुर के आसपास चलने वाला पशु व्यापार मेला मात्र दिखावा और भ्रम पैदा करने के लिए है. वास्तव में वहां के सैकड़ों लोगों ने ही बताया की यहां यह बात सबको पता है की यह सभी पशु मात्र कटने के लिए जाते हैं., शासन प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना हुआ है. सबकी रोटी ही पशुओं के कत्लेआम से चल रही है तो भला इसमे कार्यवाही करने की हिम्मत कौन जुटाएगा? सबसे बड़े दुख की बात तो यह है मानाकि पिछले पंद्रह वर्ष पहले सरकार ने गोवंशों की हत्या के संदर्भ में कोई विशेष अधिनियम पारित नही किया था लेकिन कम से कम हिंदूवादी सरकार के मप्र के पंद्रह वर्ष के कार्यकाल में जबकि मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम पारित हो गया था तब भी इस बात की जांच और इसमे रोकथाम की किसी नेता और हिंदूवादी संगठन को यह बात समझ नही आई. कितना बड़ा दुर्भाग्य है की जिस प्रदेश में गोवंशों के वध और उनके विरुद्ध हो रही क्रूरता को लेकर बड़े बड़े अधिनियम बने हैं फिर भी इतने बड़े और व्यापक पैमाने पर गोवंशों/पशुओं की तस्करी हो रही है.

  अब सवाल यह उठता है की आने वाले समय में इस प्रकार के अवैध अथवा वैध तरीके से संचालित पशुओं के मेले और उनके व्यापार की सही तरीके से पड़ताल और जांच हो पाएगी और क्या शासन प्रशासन और पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाएं इस बात की निगरानी और कार्यवाही करवा पाएंगी की आखिर किस बाबत इतनी बड़ी तादाद में पशुओं को ले जाया जाता है और यह पशु वास्तव में जाते कहां हैं?

संलग्न - रीवा की छुहिया घाटी से होते हुए सीधी, शहडोल, देवलोंद, बाणसागर, जयसिंह नगर, व्योहारी, कोतमा, मलगा, छत्तीशगढ़ तक के रास्ते पशुओं को ले जाते हुए बड़ी संख्या में लोग. आखिर कहां जा रहे हैं इतने पशु? साथ ही कोतमा सरस्वती ब्यॉयज स्कूल का 15 एकड़ का वह परिसर जिसका दुरुपयोग पशुओं की तस्करी के लिए पशु मेले के रूप में हो रहा है.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, December 10, 2018

MP - गोवंशों को चचाई जलप्रपात से बचाने मानवता की पेश की मिशाल - हिंदुओ ने मौत के घाट धकेला तो मुस्लिमों ने जीवित बचाया

दिनांक 10 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    संभाग के अब तक के सबसे भीषण पशु क्रूरता के मामले में चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटियों के नीचे धकेले गए सैकड़ों गोवंशों को अभी भी रेस्क्यू किये जाने का कार्य चल रहा है और अभी भी सैकड़ों गोवंशों का 20 किमी की हजारों फीट गहरी घाटी में फंसे होने की संभावना बनी हुई है. यद्यपि ध्यान फाउंडेशन ने तो पूरे मामले में पूरा सहयोग दिया लेकिन आइए इस बीच पिछले दो सप्ताह से अधिक के रेस्क्यू आपरेशन में कुछ मानवीय पहलुओं पर चर्चा करते हैं जहां भारतीय संस्कृति की माता गोमाता को बचाने के लिए मात्र हिन्दू ही नही बल्कि मुस्लिमों ने भी कोई कोर कसर नही छोड़ी.  

 संकल्प फाउंडेशन - द एनिमल रेस्क्यू टीम का सराहनीय कार्य

    रीवा ज़िले में कार्य करने वाले एवं श्रीमती नजमा बेगम के द्वारा आधारित संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों द्वारा चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों से गोवंशों को जीवित सुरक्षित निकालने में अतुलनीय योगदान रहा है. श्रीमती मेनका गांधी की एनजीओ संस्था पीपल फ़ॉर एनिमल की मप्र टीम द्वारा एक रीवा जिले का भी व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया हुआ है जिंसमे इस प्रकार पशुओं से प्रेम रखने वाले और उनके रेस्क्यू के लिए कार्य करने वाले युवाओं को जोड़कर रखा हुआ है. उसी ग्रुप में प्रियांशु जैन, रूपा द्विवेदी, विनय श्रीवास्तव, असद उल्लाह उर्फ आरिफ आदि कई सदस्य जुड़े हुए हैं. जब भी मवेशियों और पशुओं के पीड़ा और कष्ट में होने की कोई सूचना आती है तो यह सभी सदस्य अपने स्तर से एक दूसरे को सूचित करते हुए उन्हें रेस्क्यू किये जाने के प्रयास करते हैं.

मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम का महत्वपूर्ण योगदान

   इस बीच जब पिछले सप्ताह चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों में हजारों गोवंशों को घाट के नीचे जबरन धकेल दिए जाने की खबर अखबारों और सोशल मीडिया में आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की अगुआई में सभी टीम मेंम्बर को सूचना दी गई जिस पर संकल्प फाउंडेशन के आरिफ ने अपने टीम के सदस्यों समीर अंसारी, पारस सोंधिया, फैजल खान, विक्की शर्मा, जीशान राईन, सूर्य रॉय एवं मोहम्मद असद उल्लाह ने अगले दिन मोर्चा संभाला और न केवल रीवा से बाइकिंग करते हुए पूरे टीम मेंबर के साथ उपस्थित हुए बल्कि आवश्यकता अनुरूप घायल और बीमार गोवंशों के लिए दवाईयां भी खरीद कर लाये.

  लड़कों ने हजारों फीट गहरे चचाई घाट के नीचे उतरकर गाय को पानी से निकाला

    दिनाँक 30 नवंबर का दिन था जब संकल्प फाउंडेशन के यह सभी सदस्य दोपहर तक चचाई घाट के नीचे उतर चुके थे जहां इन्हें प्रपात के पानी में गिरी हुई एक गाय मिली जिसे सभी ने मिलकर बाहर निकाला और वहीं जंगल से खर पतवार निकालकर आग लगाकर गाय को ऊष्मा दिया. इतने में ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली से आये गोशेवक विनोद सिंह उपस्थित हुए जो पहले से सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य साथियों के साथ चचाई घाट के नीचे थे, इस प्रकार विनोद सिंह ने गाय को एंटीबायोटिक, दर्द बुखार के इंजेक्शन और साथ में डी-टेन का बॉटल चढ़ाया. चूंकि गाय उठ पाने और चल पाने में पूरी तरह से असमर्थ थी अतः उसका जीवन मुश्किल समझ आया. 

 मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने पूरा दिन रेस्क्यू में किया सहयोग

   इस बीच दिनाँक 30 नवंबर को चचाई घाट की हजारों फीट गहरी घाटी में चले सबसे महत्वपूर्ण रेस्क्यू आपरेशन में मोहम्मद असद उल्लाह और उनके संकल्प फाउंडेशन के साथियों द्वारा अभूतपूर्व योगदान देते हुए पूरे दिन भर रेस्क्यू आपरेशन में सहयोग प्रदान किया. जहां मरैला, कुइयां-मटीमा और अन्य आसपास के आये ग्रामवाशियों और वन विभाग के कर्मचारी मात्र तमाशबीन बने रहे वहीं लगभग 130 गोवंशों को हजारों फीट गहरी चचाई की घाटी से बाहर निकालने में मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने एड़ी चोटी की ताकत लगा दी और तब तक शांत नही हुए जब तक 130 गोवंश सुरक्षित घाट के ऊपर निकाल नही दिए गए.

   दया और मानवता का नही कोई जाति-धर्म 

   इस प्रकार इन दो सप्ताह अर्थात 15 दिन के लगभग किये गए रेस्क्यू आपरेशन के कई मानवीय पहलू सामने आये हैं जिनसे जाति, धर्म और आस्था के आधार पर यह बिल्कुल नही कहा जा सकता मानवीयता और दया धर्म अथवा जाति देखकर आती है.

   देखा जाय तो जिस चचाई और पुरवा जलप्रपात क्षेत्र में पशुओं और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ क्रूरता बढ़ी है वह कोई अन्य धर्म सम्प्रदाय का क्षेत्र नही है बल्कि उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है जिंसमे उच्चवर्गीय हिंदुओं के सहयोग से ऐसी भीषण पशु क्रूरता और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ प्रताड़ना और हत्या हुई है. तो क्या यह कहा जाय की आज हिंदुओं का वह समूह जो गोवंशों और गोमाता को पूजता था आज स्वयं ही पथभ्रष्ट्र हो कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल चुका है? क्या यह माना जाए की इन तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदुओं से श्रेष्ठ तो हमारे वह मुस्लिम भाई हैं जिनके ऊपर गोहत्या के आरोप लगते रहे हैं? मानाकि की हर धर्म में हर व्यक्ति एक जैसा नही होता उसमे अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. अतः यह बिल्कुल कहना उचित नही की मानवीयता और दया कोई धर्म और जाति देखकर आती है. यदि ऐसा होता तो चचाई और रीवा में होने वाले ज्यादातर गोवंशों के साथ क्रूरता के मामलों में हिन्दू सम्मिलित नही होते क्योंकि धर्म से तो गोमाता और गोवंश हिंदुओ के पूज्य हैं और गाय में तो 84 करोड़ देवी देवताओं का निवास माना गया है.

   समय था जब 1857 की क्रांति का आधार ही गोमाता थीं 

  इस प्रकार यदि इतिहास को उठाकर देखा जाए तो लगता नही की यह वही भारत देश है जिंसमे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मात्र गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस के कारण हुआ था. तो फिर ऐसे में भारत जैसे देश के इतिहास और वर्तमान के लिए क्यों किसी धर्म और क्यों किसी विदेशी शक्ति अथवा अंग्रेजों को दोषी ठहराया जाय. वास्तव में अब देखकर और अनुभव करके तो यही लगता है की बाप बड़ा न मैया सबसे बड़ा रुपैया. पेट और रुपये की अंधी दौड़ के पीछे धर्म, मानवता और इंसानियत तुच्छ साबित हो रही है. 

    वरना यदि ऐसा नही होता तो भारत का हिन्दू किसान भूंखों मरना उचित समझता लेकिन कभी भी अपनी गोमाता को आंच नही आने देता लेकिन क्या समय आ चुका है की आवश्यकता और भौतिकतावादी दौड़ के चलते कहीं कुछ नही बचा है मात्र पेट और पेट बचा है जिसका पोषण पहले होना चाहिए बांकी दया, मानवता रहे अथवा न रहे, इसे किसी को फिक्र नही.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में कुछ वह तस्वीरें हैं जिनमे संकल्प फाउंडेशन के लड़के जिनमे मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम सामिल हैं और उन लड़कों ने गोवंशों को बचाकर जीता जागता नमूना प्रस्तुत कर रीवा जिला क्या देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139