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Tuesday, January 15, 2019

पावर प्लांट चचाई में जंगल बीच करंट लगाकर चीतल एवं भैंसों का हुआ शिकार, वन विभाग पल्ला झाड़ रहा, पुलिश को कुछ फर्क नही पड़ता (मामला जिले में बढ़े वन अपराधों का जहाँ एमपीईबी पावर प्लांट चचाई के पास जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर अखंड प्रताप सिंह की 5 भैंसों को मार डाला गया, लंबे अरसे से करंट लगाकर चीतल का किया जा रहा था शिकार, बदकिस्मती से लाखों की फंस गयीं भैंसें)

दिनाँक 15 जनवरी 2019, स्थान - चचाई पावर प्लांट, सिरमौर, रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    प्रदेश एवं जिले में निरंतर बढ़ रहे बेलगाम वन अपराधों की श्रेणी में एक और अध्याय जुड़ चुका है. अभी तक तो नहरों, घाटियों, जलप्रपातों के बीच में मवेशियों को जीवित धकेले जाने की वारदातें सामने आईं थीं लेकिन अब तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे पूरे जंगल विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगने वाला है. जी हाँ यहां कोई पहेलियां नही बुझाई जा रही बल्कि सच्चाई के समाज को अवगत कराया जा रहा है.

    जंगल के बीचोंबीच करंट लगाकर किया जाता रहा शिकार

    यह मामला है चचाई जलप्रपात से होकर जाने वाले जंगल का जहां से होते हुए लगभग 7 से 8 किमी दूर जंगल के रास्ते बकिया-बीहर नहर पावर प्लांट चचाई से अतरैला वन परिक्षेत्र के जंगल तक जाती है. अभी पिछले दिनों ही इसी नहर में इंटेक प्लांट के पास दर्ज़नों गोवंशों के उतराते हुए शव मिले थे जो मीडिया में और समाज में हलचल पैदा कर दिए थे. अभी एक और मामला सामने आया है जो महीनों पुराना बताया गया है जिंसमे पीड़ित अखंड प्रताप सिंह निवासी मरैला ने लिखित तौर पर पुलिश एवं वन विभाग को शिकायत भी की लेकिन कार्यवाही नही हुई है.

    मामला है 5 भैंसों और एक चीतल का जंगल के बीच करंट से फंसकर मौत का

   सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की जंगल के बीचोंबीच आखिर करंट आया कहां से लेकिन चकित मत होइये बता दें की चचाई पावर प्लांट बस नजदीक ही स्थित है जो 315 मेगावाट की बिजली उत्पन्न करता है. यह पावर प्लांट सरकार के ऐसे नियमों के अन्तर्गत बनाया गया है जो जंगल भूमि का भी उपयोग कर रहा है यद्यपि इस पावर प्लांट का कर्ताधर्ता एमपीईबी विभाग है.

   दिसंबर दूसरे सप्ताह की है वारदात  

    दिनाँक 12-13 दिसंबर के आसपास मरैला निवासी अखंड प्रताप सिंह उम्र लगभग 65 वर्ष की चार भैंसें एवं एक भैसा भैंसहटी नामक चचाई घाट  के नीचे चरने के लिए उतारे गए थे. बताया गया की यहीं एमपीईबी पावर प्लांट से उत्पन्न होने वाली बिजली का दुरुपयोग करके अर्जुन केवट नामक जवा निवासी उम्र लगभग 40 से 45 वर्ष जंगली जानवरों का शिकार करने के लिए करंट लगाया था जिसमे अखंड प्रताप सिंह की 4 नग जीवित पजाने योग्य भैंसें एवं एक नग भैंसा सब मिलाकर लगभग 4 से 5 लाख कीमत की फंसकर मारे गए।

   अतरैला थाने एवं वन विभाग में लिखित दी सूचना

    अखंड प्रताप सिंह ने बताया की जानकारी मिलने पर घटना की सूचना  तत्काल अतरैला थाना एवं वन परिक्षेत्र अतरैला में दी गई लेकिन न तो वन विभाग द्वारा और न ही पुलिश विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज की गई. जबकि देखा जाए तो दोनों ही दृष्टि से करंट लगाकर जंगल के अंदर शिकार और मवेशियों का उसमे फंसकर मारना एक संगीन अपराध की श्रेणी में आता है जिंसमे वन विभाग को पीओआर और पुलिश विभाग को बकायदे एफआईआर दर्ज करना चाहिए.

   वेटेरिनरी अधिकारी ने शव न मिलने का बनाया बहाना

     बता दें की इस घटना के विषय में जब जवा वेटेरिनरी अधिकारी आर पी गौतम मिश्रा से बात की गई तो उन्होंने पूरा दोष वन विभाग और पुलिश विभाग पर मढ़ दिया और बताया की हमे मृत भैंसों का कोई भी अंग नही मिला. जबकि पीड़ित अखंड प्रताप दवारा बताया गया को मृत भैंसों के कुछ पैर वगैरह अंग अभी भी वहीं जंगल में पड़े हुए हैं जिनको आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर फेंक दिया था जिससे यह पता न चले की घटना करंट लगाकर कारित हुई है. जबकि फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो ही जाती है की जीव केई मृत्यु के क्या कारण थे.

 क्या कहा अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह ने

    जब प्राथमिकी दर्ज न किये जाने के विषय में अतरैला थाना प्रभारी प्रदीप सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की वह मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं जबकि मेडिकल रिपोर्ट इसलिए नही बनी की वेटेरिनरी अधिकारी को मवेशियों के शव ही नही मिले.

    चश्मदीख गवाह भी है पुख्ता प्रमाण 

    यद्यपि इस पूरे मामले में एक चश्मदीख गवाह भी मौजूद है. चश्मदीख प्रदीप कुमार कोल उर्फ विधायक पिता चंद्रशेखर कोल उर्फ बेसहना निवासी मरैला उम्र लगभग 20 वर्ष के द्वारा पूरी घटना की जानकारी बतायी जा चुकी है लेकिन थाना प्रभारी अतरैला प्रदीप सिंह का अब यह कहना है की जब तक आरोपी अर्जुन केवट को पुलिश पकड़ कर पूंछताछ नही करेगी तब तक प्राथमिकी दर्ज नही होगी. वहरहाल अभी तक पुलिश ने आरोपी को ढूंढने तक का प्रयाश नही किया है जबकि घटना कारित हुए एक माह से ऊपर बीत चुके हैं. 

   रेंज अफसर अतरैला का वीडियो वायरल

    बता दें की रेंज अफसर अतरैला का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमे रेंज अफसर स्वयं भी घटना कारित होने की स्वीकारोक्ति कर चुके हैं और बता रहे हैं की करंट से न केवल भैसों की मौत हुई हैं बल्कि चीतल की भी मौत हुई है. पर अब सवाल यह उठता है की आखिर जंगली संरक्षित क्षेत्र में एमपीईबी पावर प्लांट के करंट द्वारा असामाजिक एवं आपराधिक तत्वों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार जैसे संगीन अपराध के लिए अब तक रेंज के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को बर्खास्त क्यों नही किया गया? आखिर पूरे मामले में एमपीईबी की भी तो जबाबदेही तय है की आखिर उनके द्वारा पावर प्लांट में उत्पन्न की जाने वाली बिजली का दुरुपयोग आपराधिक किस्म के लोग कैसे कर रहे हैं?

 संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें पीड़ित अखंड प्रताप सिंह दवारा लिखित दिया गया आवेदन एवं साथ में करंट में मृत हुई भैंसों के कंकाल आदि जिन्हें बताया गया की आरोपी अर्जुन केवट ने काटकर वहीं नदी में फेंक दिया था.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, December 10, 2018

MP - गोवंशों को चचाई जलप्रपात से बचाने मानवता की पेश की मिशाल - हिंदुओ ने मौत के घाट धकेला तो मुस्लिमों ने जीवित बचाया

दिनांक 10 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    संभाग के अब तक के सबसे भीषण पशु क्रूरता के मामले में चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटियों के नीचे धकेले गए सैकड़ों गोवंशों को अभी भी रेस्क्यू किये जाने का कार्य चल रहा है और अभी भी सैकड़ों गोवंशों का 20 किमी की हजारों फीट गहरी घाटी में फंसे होने की संभावना बनी हुई है. यद्यपि ध्यान फाउंडेशन ने तो पूरे मामले में पूरा सहयोग दिया लेकिन आइए इस बीच पिछले दो सप्ताह से अधिक के रेस्क्यू आपरेशन में कुछ मानवीय पहलुओं पर चर्चा करते हैं जहां भारतीय संस्कृति की माता गोमाता को बचाने के लिए मात्र हिन्दू ही नही बल्कि मुस्लिमों ने भी कोई कोर कसर नही छोड़ी.  

 संकल्प फाउंडेशन - द एनिमल रेस्क्यू टीम का सराहनीय कार्य

    रीवा ज़िले में कार्य करने वाले एवं श्रीमती नजमा बेगम के द्वारा आधारित संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों द्वारा चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों से गोवंशों को जीवित सुरक्षित निकालने में अतुलनीय योगदान रहा है. श्रीमती मेनका गांधी की एनजीओ संस्था पीपल फ़ॉर एनिमल की मप्र टीम द्वारा एक रीवा जिले का भी व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया हुआ है जिंसमे इस प्रकार पशुओं से प्रेम रखने वाले और उनके रेस्क्यू के लिए कार्य करने वाले युवाओं को जोड़कर रखा हुआ है. उसी ग्रुप में प्रियांशु जैन, रूपा द्विवेदी, विनय श्रीवास्तव, असद उल्लाह उर्फ आरिफ आदि कई सदस्य जुड़े हुए हैं. जब भी मवेशियों और पशुओं के पीड़ा और कष्ट में होने की कोई सूचना आती है तो यह सभी सदस्य अपने स्तर से एक दूसरे को सूचित करते हुए उन्हें रेस्क्यू किये जाने के प्रयास करते हैं.

मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम का महत्वपूर्ण योगदान

   इस बीच जब पिछले सप्ताह चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों में हजारों गोवंशों को घाट के नीचे जबरन धकेल दिए जाने की खबर अखबारों और सोशल मीडिया में आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की अगुआई में सभी टीम मेंम्बर को सूचना दी गई जिस पर संकल्प फाउंडेशन के आरिफ ने अपने टीम के सदस्यों समीर अंसारी, पारस सोंधिया, फैजल खान, विक्की शर्मा, जीशान राईन, सूर्य रॉय एवं मोहम्मद असद उल्लाह ने अगले दिन मोर्चा संभाला और न केवल रीवा से बाइकिंग करते हुए पूरे टीम मेंबर के साथ उपस्थित हुए बल्कि आवश्यकता अनुरूप घायल और बीमार गोवंशों के लिए दवाईयां भी खरीद कर लाये.

  लड़कों ने हजारों फीट गहरे चचाई घाट के नीचे उतरकर गाय को पानी से निकाला

    दिनाँक 30 नवंबर का दिन था जब संकल्प फाउंडेशन के यह सभी सदस्य दोपहर तक चचाई घाट के नीचे उतर चुके थे जहां इन्हें प्रपात के पानी में गिरी हुई एक गाय मिली जिसे सभी ने मिलकर बाहर निकाला और वहीं जंगल से खर पतवार निकालकर आग लगाकर गाय को ऊष्मा दिया. इतने में ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली से आये गोशेवक विनोद सिंह उपस्थित हुए जो पहले से सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य साथियों के साथ चचाई घाट के नीचे थे, इस प्रकार विनोद सिंह ने गाय को एंटीबायोटिक, दर्द बुखार के इंजेक्शन और साथ में डी-टेन का बॉटल चढ़ाया. चूंकि गाय उठ पाने और चल पाने में पूरी तरह से असमर्थ थी अतः उसका जीवन मुश्किल समझ आया. 

 मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने पूरा दिन रेस्क्यू में किया सहयोग

   इस बीच दिनाँक 30 नवंबर को चचाई घाट की हजारों फीट गहरी घाटी में चले सबसे महत्वपूर्ण रेस्क्यू आपरेशन में मोहम्मद असद उल्लाह और उनके संकल्प फाउंडेशन के साथियों द्वारा अभूतपूर्व योगदान देते हुए पूरे दिन भर रेस्क्यू आपरेशन में सहयोग प्रदान किया. जहां मरैला, कुइयां-मटीमा और अन्य आसपास के आये ग्रामवाशियों और वन विभाग के कर्मचारी मात्र तमाशबीन बने रहे वहीं लगभग 130 गोवंशों को हजारों फीट गहरी चचाई की घाटी से बाहर निकालने में मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने एड़ी चोटी की ताकत लगा दी और तब तक शांत नही हुए जब तक 130 गोवंश सुरक्षित घाट के ऊपर निकाल नही दिए गए.

   दया और मानवता का नही कोई जाति-धर्म 

   इस प्रकार इन दो सप्ताह अर्थात 15 दिन के लगभग किये गए रेस्क्यू आपरेशन के कई मानवीय पहलू सामने आये हैं जिनसे जाति, धर्म और आस्था के आधार पर यह बिल्कुल नही कहा जा सकता मानवीयता और दया धर्म अथवा जाति देखकर आती है.

   देखा जाय तो जिस चचाई और पुरवा जलप्रपात क्षेत्र में पशुओं और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ क्रूरता बढ़ी है वह कोई अन्य धर्म सम्प्रदाय का क्षेत्र नही है बल्कि उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है जिंसमे उच्चवर्गीय हिंदुओं के सहयोग से ऐसी भीषण पशु क्रूरता और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ प्रताड़ना और हत्या हुई है. तो क्या यह कहा जाय की आज हिंदुओं का वह समूह जो गोवंशों और गोमाता को पूजता था आज स्वयं ही पथभ्रष्ट्र हो कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल चुका है? क्या यह माना जाए की इन तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदुओं से श्रेष्ठ तो हमारे वह मुस्लिम भाई हैं जिनके ऊपर गोहत्या के आरोप लगते रहे हैं? मानाकि की हर धर्म में हर व्यक्ति एक जैसा नही होता उसमे अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. अतः यह बिल्कुल कहना उचित नही की मानवीयता और दया कोई धर्म और जाति देखकर आती है. यदि ऐसा होता तो चचाई और रीवा में होने वाले ज्यादातर गोवंशों के साथ क्रूरता के मामलों में हिन्दू सम्मिलित नही होते क्योंकि धर्म से तो गोमाता और गोवंश हिंदुओ के पूज्य हैं और गाय में तो 84 करोड़ देवी देवताओं का निवास माना गया है.

   समय था जब 1857 की क्रांति का आधार ही गोमाता थीं 

  इस प्रकार यदि इतिहास को उठाकर देखा जाए तो लगता नही की यह वही भारत देश है जिंसमे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मात्र गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस के कारण हुआ था. तो फिर ऐसे में भारत जैसे देश के इतिहास और वर्तमान के लिए क्यों किसी धर्म और क्यों किसी विदेशी शक्ति अथवा अंग्रेजों को दोषी ठहराया जाय. वास्तव में अब देखकर और अनुभव करके तो यही लगता है की बाप बड़ा न मैया सबसे बड़ा रुपैया. पेट और रुपये की अंधी दौड़ के पीछे धर्म, मानवता और इंसानियत तुच्छ साबित हो रही है. 

    वरना यदि ऐसा नही होता तो भारत का हिन्दू किसान भूंखों मरना उचित समझता लेकिन कभी भी अपनी गोमाता को आंच नही आने देता लेकिन क्या समय आ चुका है की आवश्यकता और भौतिकतावादी दौड़ के चलते कहीं कुछ नही बचा है मात्र पेट और पेट बचा है जिसका पोषण पहले होना चाहिए बांकी दया, मानवता रहे अथवा न रहे, इसे किसी को फिक्र नही.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में कुछ वह तस्वीरें हैं जिनमे संकल्प फाउंडेशन के लड़के जिनमे मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम सामिल हैं और उन लड़कों ने गोवंशों को बचाकर जीता जागता नमूना प्रस्तुत कर रीवा जिला क्या देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Thursday, December 6, 2018

चचाई कालापानी में नौ गायों का फिर हुआ इलाज, पहुचाया चारा-भूषा (मामला ज़िले के अब तक के सबसे भीषण गो प्रताड़ना के किस्से का जिंसमे डेढ़ सौ से अधिक गोवंशों के रेस्क्यू के बाद अभी भी हजारों फीट गहरी घाटी में फंसी है गायें)

दिनाँक 06 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    ज़िले के चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटी में हुए अब तक से सबसे भीषण गोहत्या और गोप्रताड़ना के बारदात में अब तक लगभग डेढ़ सैकड़ा गायों को घाट के ऊपर निकाला गया है. अभी भी कई सैकड़ा गोवंशों के घाटी में फंसे होने की सूचना है लेकिन घाटी इतनी गहरी और विस्तृत है की वहां तक पहुच पाना असंभव सा प्रतीत होता है. यह काम रेस्क्यू आपरेशन में ट्रेनिंग प्राप्त प्रोफेशनल के सहयोग एवं जंगली इलाकों में रहने वाले लोगों के सहयोग से ही पूरी तरह संभव है.

 दिनाँक 06 दिसंबर को वेटेरिनरी कर्मचारियों ने किया इलाज, फंसी गायों के लिए पहुचा भूषा

    दिनाँक 06 दिसंबर को एक बार फिर सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी के डायरेक्शन में चचाई की गहरी घाटियों में फंसे गोवंशों के लिए भूषा पहुचाया गया साथ ही वेटेरिनरी विभाग सिरमौर के प्रशिक्षु सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी रमेश सिंह, प्रतिबंधक संत कुमार साकेत एवं राष्ट्रीय किसान संगठन के मप्र मंत्री वंश गोपाल सिंह, कठमना निवासी विजय सिंह के सहयोग से हजारों फीट की चचाई जलप्रपात की गहरी घाटी में पहुचा गया जहां पर प्रारंभिक स्थल पर मात्र 10 गोवंश ही मिले. उम्मीद की गई की यह वही गोवंश थे जो रेस्क्यू के दौरान उसी स्थान पर छूट गए थे. साथ ही इनमे से वह गाय भी सम्मिलित थी जिसके पैर में चोट की वजह से कीड़े पड़ गए थे. पशु चिकित्सक के रूप में गए रमेश सिंह एवं संत कुमार साकेत ने गोवंशों का स्वास्थ्य चेक किया और आवश्यकतानुसार कमजोर गोवंशों को क्रमसः 9 एंटीबायोटिक, 9 मल्टी विटामिन इंजेक्शन लगाया. साथ ही 3 गायों को दर्द बुखार के इंजेक्शन लगाए, घाव वाली गाय के घाव को धोकर एकबार फिर मलहम पट्टी की गई. इनमे से एक बैल था जो स्वस्थ्य था जिसको कोई उपचार नही किया गया. 

   बांस के पत्ते तोड़कर खिलाये और भूसा डाला

  इस बीच ऊपर चचाई रेस्ट हाउस के पास स्टोर किया गया एक बोरी भूषा ले जाया गया और सभी गोवंशों को थोड़ा थोड़ा दिया गया साथ ही वहां पर बांस के पत्ते भी तोड़कर खिलाये गए जिससे पशुओं के स्वास्थ में सुधार हो सके और उन्हें भी किसी प्रकार से चढ़ाकर घाट के ऊपर तक लाया जा सके.

   गहरी घाटी में पहुचना था काफी मुश्किल

   इस बीच दिनाँक 06 दिसंबर को शाम 5 बजने को थे और चचाई एवं पुरवा की गहरी और लगभग 20 किमी के विस्तार में फैली घाटी में पहुच पाना काफी मुश्किल था. पूरी घाटी में घुसने के लिए शुबह सूर्योदय से ही प्रवेश करते हुए दिन भर का समय देना पड़ेगा तभी जाकर कुछ सार्थक कार्य किया जा सकेगा.

   सबसे बड़ी चुनौती रेस्क्यू किये गए पशुओं का रिहैबिलिटेशन

     आज रीवा ज़िले में पशुओं के रखने के लिए कोई समुचित गोशाला नही है जहां इन्हें रखा जा सके. सबसे बड़ी चुनौती आज यह है की कैसे अधिक से अधिक गोशालाओं की व्यवस्था की जाए और कैसे इन गोवंशों का पुनर्वाश और पोषण किया जा सके. ज्ञातव्य है की रीवा में लक्ष्मण बाग गोशाला पहले से ही भस्ट्राचार की बलि चढ़ चुकी है जहां पर गोवंशों का पूरा खाना पशुओं को न दिया जाकर गोशाला प्रबंधन समिति के लोग खाये जा रहे हैं और गोवंश भूंखों मर रहे हैं.

  बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमिता

    अभी अभी खोली गई बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमितता देखने को मिल रही है. जब चचाई घाट से रेस्क्यू किये गए मवेशियों को बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में डालने की बात आई तो वहां का प्रबंधन संभाल रहे अरुण गौतम का कहना था की मीडिया में बात मत रखिये तो जितने चाहिए उतने लाकर डाल दीजिए. कुछ चचाई के लोगों द्वारा बताया गया की प्रति मवेशी 500 रुपये फिक्स किया हुआ है जो पैसा देता है उसके मवेशी डाल लेता है और जो नही देता उसे वापस कर देता है.

   300 की क्षमता पर कैसे पहुच गए ढाई हजार?

   सबसे बड़ी बात यह है जब मंत्री के पिए राजेश पांडेय से बात की गई तो उसका कहना था की हमारे पास बसामन मामा में जगह नही बची है और हमारी क्षमता मात्र 300 की है तब सवाल यह उठता है की गोवंशों की संख्या वन्य विहार केंद्र में ढाई हजार कैसे पहुच गई? निश्चित तौर पर जिस प्रकार लक्षमण बाग में इनकी दलाली और गोवंशों के नाम पर भ्रष्टाचार चल रहा था ठीक वही इन्होंने बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी प्रारम्भ कर दिया है. 

  घायल रेस्क्यू किये गए गोवंशों तक के लिए मना कर दिया 

    जब चचाई से रेस्क्यू किये गए गोवंशों को बसामन मामा में रखने की बात अरुण गौतम और मंत्री के पीए राजेश पांडेय के समक्ष रखी गई तो इनके लिए जगह नही थी लेकिन ढाई हजार के लिए जगह कहां से निकल आई? 500 रुपये प्रति मवेशी लेकर घुसेड़ने का धंधा इनका काफी पुराना है जो लक्षमण बाग में भी चलता था.

  संलग्न - दिनाँक 06 दिसंबर 2018 को चचाई घाट के नीचे जाकर गोवंशों का इलाज किया गया एवं साथ ही उनके लिए भूसे चारे की भी व्यवस्था की गई. घाटी के नीचे पहुचे कार्यकर्ता की तस्वीर.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, 9589152587, 78699992139

Sunday, November 25, 2018

MP- चचाई जलप्रपात के नीचे जीवित धकेले गए हज़ारों गोवंश, चचाई जलप्रपात पशुओं के लिए बनाया गया कालापानी ( मामला रीवा ज़िले के सिरमौर थाना क्षेत्र अन्तर्गत चचाई जलप्रपात का जहां पर हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे धकेल दिए हज़ारों गोवंश, पानी, चारा, छाया, धूप सभी का बना संकट, अस्तित्व पर बना खतरा, शासन प्रशासन बना तमाशबीन)

दिनांक 26 नवंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा, मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

   ज़िले की गहरी घाटियों और जलप्रपातों के अंदर से एक बार फिर बुरी खबर आई है. आवारा पशुओं से परेशान लोगों और किसानों ने एकबार फिर आवारा पशुओं के हज़ारों की संख्या के झुंड को गहरी घाटियों के नीचे धकेल दिया है जिनके लिए अब उनके जीवन का संकट उत्पन्न हो चुका.

   चचाई जलप्रपात के अंदर का है मामला 

     पिछले दिनों मरहा घाट के नीचे जो गोवंशों को धकेले जाने का मामला सामने आया था उसी कड़ी में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा शोध करने पर ज्ञात हुआ की चचाई रेस्ट हाउस से लगे हुए और जलप्रपात के नीचे जाने के रास्ते से हज़ारों गोवंशों को समय समय पर हज़ारों फीट गहरी घाटियों के नीचे उतारा जा रहा है. जानकार सूत्रों से पता चला की यह घटनाक्रम कोई अकेला नही है और नियमित अंतराल में मवेशियों को घाट के नीची मौत के घाट उतारा जा रहा है. 

   पशुओं के लिए कालापानी की सजा

    वास्तव में देखा जाय तो दिनांक 24 एवं 25 नवंबर 2018 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी एवं ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली के सदस्य विनोद सिंह द्वारा जो फ़ोटो और वीडियो डिटेल्स हज़ार फीट गहरी घाटी के नीचे से इकट्ठे किये गए वह आत्मा तक को भी दहला देने वाले हैं.

    चचाई घाट के नीचे से बड़ी मुश्किल से उतरकर देखा गया तो पाया गया की यह रास्ता मानव के ही चलने योग्य नही तो भला इसमे चारपाये डोमेस्टिक मवेशी कैसे निकल सकते थे. यह घटना वाकई पशु क्रूरता की बेइंतेहा और हद पर करने वाली घटना थी जिंसमे इन मवेशियों को जबरन मार मारकर घाट के नीचे उतारा गया था. काफी मवेशियों के चोट के निशान भी पाए गए हैं.

   टेढ़ा मेढ़ा खाइयों से भरा पथरीला दुर्गम है रास्ता

    हज़ारों फीट नीचे घाट में पहुचने से पहले ही मात्र सौ दो सौ फीट गहराई से ही मवेशियों और जानवरों के मरे और सड़ी हुई दुर्गंध आने लगी थी. जिस स्थान पर चचाई वाटरफॉल में ज्यादा पानी भरा हुआ दीखता है वहां ऊपर से देखने पर कुछ समझ नही आ रहा था. यह रास्ता भी इतना फिसलन भरा था की इससे नीचे उतर पाना बहुत कठिन कार्य था. लेकिन किसी तरह से पेड़ों और झाड़ियो को पकड़ पकड़कर नीचे उतरा गया. एक स्थान पर यह रास्ता ब्लॉक भी दिखा जिंसमे वहीं आसपास के छोटे पत्थर लगाकर रास्ता को ब्लॉक कर दिया गया था. आसपास लकड़ी काटने वाले लकड़हारों से जानकारी मिली की जो लोग इन पशुओं को घाट के नीचे उतार देते हैं वह इन रास्तों को बाद में बन्द किये हैं जिससे यह गोवंश वापस न पलट पाएं और यहीं अपनी जान गवां दें जिससे लोगों को आवारा पशुओं से हमेशा के लिए निजात मिल जाए.

  रास्ते में मिले दर्ज़नों मृत मवेशी और उनके कंकाल

    इस बीच घाट के नीचे बड़ी मुश्किल से उतरते हुए कई मवेशियों के मृत कंकाल और बदबू मारती हुई डेड बॉडी भी मिली जिनको की सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया गया. यह सबूत पर्याप्त थे जो इस बात की गवाही दे रहे थे की पशु क्रूरता के चलते ही इन मवेशियों की मौतें हुईं हैं.

    यहां तक की घाट के ऊपर से ही एक मवेशी एक बड़े पेंड के नीचे मृत देखा जा सकता था जिसकी की ऊपर से फ़ोटो भी लेने के प्रयास किये गए थे. वह अभी भी मौजूद है.

   रेतीले भाग में पाए गए सैकड़ों जीवित गोवंश

    इस बीच पेड़ों और झाड़ियों को पकड़ पकड़कर उतरते हुए जब कुछ समतल भाग में पहुचा गया तो वहां पर काफी रेत दिखी जिंसमे पैर धस रहा था. वहीं पर बगल में वाटरफॉल का पानी भी जमा हुआ था जिंसमे बहाव नही था. ऐसा लगा की यहां पर आकर मवेशी इसीलिए इकठ्ठे हुए थे क्योंकि यहां पर पानी का स्रोत उपलब्ध था. आसपास देखने पर पता चला की जंगली पेड़ों की ऐसी पत्तियां जिन्हें यह घरेलू पशु नही खाते इसके अतिरिक्त और कोई भी चारा अथवा पशुओं के खाने योग्य वहां पर कुछ नही पाया गया. कुछ आसपास हरे बांस के पौधे पाए गए लेकिन बांस की जो पत्तियां नजदीक थीं उनको तो पहले ही यह पशु खा चुके थे परंतु अब बांस की पत्तियां भी उपलब्ध नही थीं जो काफी ऊंचाई में थीं. 

    पशु ज्यादा भागने में असमर्थ, काफी बैठ चुके थे

     इन पशुओं को थोड़ा और भी करीब से देखा गया तो पाया गया की यह पशु चल फिर पाने में पूरी तरह से असमर्थ थे. कुछ अभी जो चल फिर पा रहे थे वह कुछ यंग थे. जो गोवंश ज्यादा उम्र वाले थे वह अब बैठ चुके थे. एक दो मवेशी ऐसे भी दिखे जिनके शरीर में गहरे चोट के निशान थे और खून बह रहा था. चूंकि वहां पर वेटेरिनरी फैसिलिटी उपलब्ध नही थी अतः उसके लिए कुछ नही किया जा सका.

  सबसे बड़ा प्रश्न  - वन विभाग के अंदर पशु क्रूरता का जिम्मेदार कौन?

    सबसे प्रथम बात तो यह है की चचाई जलप्रपात के नीचे पूरी तरह से एक आरक्षित क्षेत्र है जहां वन विभाग और शाशन की निगाह रहती है. बताया गया की यहाँ पर एक परमानेंट बीट गॉर्ड भी है लेकिन वह कभी भी अपनी ड्यूटी देने नही आता. इस बीच पिछले तीन चार दिनों में घाटी के नीचे टांगी और कुल्हाड़ी लिए हुए काफी लकड़हारे भी मिले जो बेहिचक और बेरोकटोक लकड़ियां काट रहे थे और पूंछने पर बताया की यहां उनका रोज का धंधा है कोई कुछ नही बोलता.

    इससे स्पष्ट है की सबसे जिम्मेदार वन एवं पर्यावरण विभाग ही है जिसने इस प्रकार की पशु क्रूरता होने दिया और इसमे कोई रोंक नही लगाई. सूत्रों और ग्रामीणों ने यहां तक बताया की यह सब वन विभाग की सह से ही किया जा रहा है. बताया गया की वन विभाग के कर्मचारी ग्रामीणों से पैसे लेते हैं और पशुओं को घाट के नीचे उतरवाते हैं. लकड़हारों ने बताया की जब कोई मुंसी और बीट गार्ड यहां पर आता है वह हमसे पैसे ले लेता है और हमे छोंड़ देता है.

  अब क्या है आगे का रास्ता?

   अब सबसे बड़ी बात यह है की हज़ारों की संख्या में फंसे हुए इन गोवंशों को निकालने के लिए क्या किया जाए? क्या इस चचाई घाट की दुर्दान्त पहाड़ियों और घाटियों के बीच से इन गोवंशों को निकाला जाना संभव है? चूंकि मानव तक को उतरने और चढ़ने में भारी मुश्किल का सामना करना पड़ता है ऐसे में घाट के नीचे हज़ारों फीट गहरी खाई में उतार दिए गए इन गोवंशों को ऊपर कैसे लाया जाय यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है. 

   आसपास के ग्रामीणों से जानकारी मिली की यही पथरीले और कठिन रास्ते हैं जिनसे एक एक करके इनको ऊपर लाया जा सकता है अन्यथा फिर घाट के नीचे ही नीचे लगभग 20 किमी दूरी पथरीले भाग से होते हुए इन्हें आगे निकाल दिया जाय. यद्यपि दोनो ही स्थितियों में कार्य बहुत मुश्किल है.

  पुलिश प्रशासन, वन एवं ज़िला प्रशासन का मिले सहयोग

     इस रेस्क्यू अभियान में पुलिश, वन एवं अन्य ज़िला प्रशासन का सहयोग चाहिए होगा वरना यह कार्य इतना आसान नही होगा. संभव है इसमे एक सप्ताह के आसपास का समय लग जाए. क्योंकि झुंड में इन मवेशियों को निकालने का कार्य संभव नही होगा. इन्हें एक एक करके ही निकाला जा सकेगा.

    इस बीच पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं और उच्चस्तरीय मंत्रालयों और विभागों के हस्तक्षेप से काम में आसानी होगी.

संपर्क - डीएफओ रीवा श्री विपिन पटेल - 9424793326

   सीसीएफ रीवा संभाग श्री अतुल खेड़ा - 9424793325

कलेक्टर रीवा श्रीमती प्रीति मैथिल नायक 

 - 9977742118,

 कमिश्नर रीवा संभाग - 9425088190

  संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें चचाई वाटरफॉल के नीचे धकेले गए हज़ारों की संख्या में हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे फंसे गोवंश.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, October 29, 2018

मप्र- बकिया बराज नहर में धकेली सैकड़ों गायों पर हो रहीं राजनीति, क्रेडिट लेने का चल पड़ा दौर (मामला सतना जिले में रामपुर थाना अन्तर्गत बकिया बराज नहर में धकेले गए गोवंशों का जहां पर वास्तविक समस्या और उसके समाधान के स्थान पर हो रही राजनीति)

दिनांक 30 अक्टूबर 2018, स्थान - सतना-रीवा बॉर्डर बकिया बराज से करहिया चचाई गेट, मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, ग्राउंड जीरो से)

   पिछले दो कई दिनों से सतना ज़िला एवं रामपुर थाना क्षेत्र अन्तर्गत आने वाले बकिया बराज नहर के अंदर सैकड़ों गोवंशों को धकेल दिए जाने का जो मामला प्रकाश में आया था उसमे कर कराकर कार्यवाही तो हुई और गोवंशों को काफी मसक्कत के बाद निकाला भी गया लेकिन चुनाव को देखते हुए कुछ राजनीतिक किश्म के लोग उन्ही गोवंशों पर अब राजनीतिक रोटी सेंकना भी प्रारम्भ कर दिए हैं. गोवंशों को सुरक्षित निकालने में किसका कितना योगदान रहा और कैसे निकाले गए इन बातों से हटकर गौ संवर्धन बोर्ड रीवा के सदस्य और उपाध्यक्ष और कुछ अन्य संगठन अपना नाम चमकाने के उद्देश्य से जमकर क्रेडिट लेने के प्रयाश कर रहे हैं.

   तटस्थता के उद्देश्य और समाज के सामने वास्तविक सच्चाई लाने के लिए आइए प्रकाश डालते हैं इस पूरे प्रकरण पर. जानते हैं क्या है सच्चाई और हंगामा है क्यों बरपा.

गोवंशों को सुरक्षित निकलने में मदद क्या है कोई एहसान? गौसंवर्धन बोर्ड का काम ही हैं गायों की सुरक्षा

  वास्तव में देखा जाए तो मप्र में विशेष तौर पर गौसंवर्धन बोर्ड का गठन कर उसके अध्यक्ष को एक राज्यमंत्री का दर्जा और एवन क्लास की सुविधा प्रदान किये जाने के पीछे का यही उद्देश्य है की मप्र में निरंतर कई वर्षों से गोवंशों के साथ हो रही प्रताड़ना को कम किया जाकर इनके पोषण एवं पुनर्वाश हेतु सार्थक और दूरगामी प्रयास किये जाएं और इन गोवंशों की सुरक्षा की जाए लेकिन इसके उलट पिछले कई वर्षों से यह देखा गया है मप्र गोसंवर्धन बोर्ड अपने कार्य में पूरी तरह से असफल रहा है. मप्र सरकार ने गायों की सुरक्षा को राजनीतिक आधार बनाकर चुनाव आते ही गो मंत्रालय तक बनाये जाने की घोषणा तो कर डाली है लेकिन इसके वाबजूद भी पूरे प्रदेश में गोवंशों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नही हुआ है.

मीडिया में खबर आते ही प्रशासन की टूटी निद्रा

   पिछले कई दिनों से लोकल पब्लिक द्वारा बकिया बराज नहर में असमाजिक आपराधिक तत्वों द्वारा डम्पर और ट्रेक्टर के माध्यम से सैकड़ों गोवंशों को सूखी नहर में डंप किये जाने का मामला चल रहा था. गांववालों ने यह जानकारी संबंधित थाना रामपुर में भी पहुचाई थी लेकिन आम आदमी की इस वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में न तो कोई सुनवाई है और न ही को कीमत इसलिए कोई कार्यवाही नही हो रही थी. इस बीच जब खबर व्हाट्सएप्प एवं सोशल मीडिया के मॉध्यम से दिनाँक 26 एवं 27 अक्टूबर को प्रकाश में आई तो सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं पशुओं के अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों द्वारा भी प्रयाश प्रारम्भ किये गए. 

फंसी गायों की जानकारी उच्चस्तर तक भेजी गई 

  इस बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट द्वारा बकिया बराज नहर की घटना की जानकारी सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया आदि के माध्यम से होते हुए गौ संवर्धन बोर्ड मप्र के अध्यक्ष अखिलेश्वरानंद, एनिमल वेलफेयर बोर्ड के अध्यक्ष एसपी गुप्ता, मप्र से एनिमल वेलफेयर बोर्ड के सदस्य राम रघुवंशी, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया के समिति में जुड़े हुए दर्जनों सदस्यों जिंसमे मोहन सिंह अहलूवालिया सहित पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली विभिन्न संस्थाएं जैसे पीपल फ़ॉर एनिमल्स, ध्यान फाउंडेशन के सुदर्शन कौशिक, ज़िला सतना के एसपी एवं रामपुर थाना टी आई, ट्विटर के माध्यम से मुख्यमंत्री मप्र शासन, प्रधानमंत्री भारत सरकार सहित अन्य संबंधित जिम्मेदारों के समक्ष रखी गई जिस पर लगभग हर स्थान से प्रेशर लगाया गया और जितनी प्रशासनिक स्तर की मशीनरी सतना एवं रीवा जिले में पशुओं के लिए उपलब्ध थी सभी एक्टिव हुए जिंसमे पशु चिकित्सा विभाग का ज़िला एवं संभागीय दस्ता, नगर निगम रीवा का पशुओं को पकड़ने वाला दस्ता, बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के प्रबंधक सहित अन्य कई स्वयंसेवी संगठन और उनके लोगों ने भी अपना अपना योगदान दिया. 

  किन लोगों ने नहर से गोवंशों को चलकर सुरक्षित निकाला

    इस सम्पूर्ण अभियान में बकिया बराज नहर से लेकर करहिया चचाई गेट तक का लगभग 14 किमी के आसपास का सफर जिन लोगों ने पूरा किया और गोवंशों को चलाकर नहर के बीचोंबीच से चचाई गेट तक पहुचाया उनमे से नगर निगम के ड्राइवर, बैकुंठपुर से गोरक्षक  नितिन गौतम एवं विनीत गौतम, खुलासा न्यूज़ लाइव से ज़िला ब्यूरो आनंद द्विवेदी, कैथा से कार्यकर्ता संतोष केवट, एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी सहित एक दो अन्य गोवंश प्रेमी नहर के बीचोंबीच पूरे 14 किमी पैदल सफर तय करते हुए चचाई गेट के पास तक पहुचे जहां पर चचाई नहर के पास स्थित गेट को खोला गया और लगभग साढ़े तीन सौ की संख्या में गोवंशों की निकाला गया.

गो संवर्धन बोर्ड का पूरी रेस्क्यू प्रकिया में कितना रहा रोल

   सही मायनों में यदि देखा जाए तो मात्र चुनाव कहें की आचार संहिता का डंडा जिसकी वजह से कुछ हद तक इस बार गो संवर्धन बोर्ड के सदस्य कुछ रुचि लिए वरना आज पिछले कई वर्षों से पूरे रीवा में गोवंशों के साथ निरंतर हो रही अतिशय क्रूरता को रोकने में गोसंवर्धन बोर्ड का न तो कोई पता था और न ही कोई किसी प्रकार का योगदान. 

    चूंकि इस मर्तबा अगले कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और आदर्श आचार संहिता भी लगाए हुई है अतः जब कोई भी घटना जो की संवेदनशीलता की दृष्टि से इतनी व्यापक हो उस पर मीडिया और तमाम उछलने पर स्वाभाविक तौर पर इनको कार्यवाही करने मजबूर होना पड़ा. वरना जब थाना गढ़ क्षेत्र में पनगड़ी-भलघटी, लौंगा, क्योटी, रेहवा एवं नांदघाट के जंगली क्षेत्रों एवं हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे ज़रीन गोवंशों को जीवित धकेल दिया गया था तब यह गौसंवर्धन बोर्ड और गायों के नाम पर माल ऐंठेने वाले संगठन सब कहां थे? तब तो दिल्ली और चेन्नई से टीमें आईं और गोवंशों की सुरक्षा की तब रीवा प्रशासन और मप्र में गौसंवर्धन बोर्ड और गोरक्षक दलों का कोई रता पता नही था. पर चूंकि अब जाना की चुनाव भी नजदीक है तो मामले को भुनाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी.

गोसंवर्धन बोर्ड के नाम पर कुछ सदस्यों ने गाय पर किया राजनीति

   अभी हाल ही में बकिया बराज नहर से लेकर चचाई गेट तक नहर के बीचोंबीच से गोवंशों को निकाले जाने का जो सार्थक प्रयाश सभी के सहयोग से हुआ उसमे अब गौसंवर्धन बोर्ड के कुछ सदस्य और उपाध्यक्ष मात्र अपने नाम से क्रेडिट लेने का प्रयास कर हैं.

 यदि गौसंवर्धन बोर्ड ने थोड़ा बहुत योगदान कर ही दिया तो कौन सा बहुत बड़ा कमाल कर दिया. गौसंवर्धन बोर्ड का तो काम ही है गायों की सुरक्षा करना. लेकिन वास्तव में देखा जाए तो बकिया बराज नहर की घटना के अतिरिक्त गौसंवर्धन बोर्ड का कोई रता पता कभी नही चला. गौसंवर्धन बोर्ड ने गायों के नाम पर रीवा में क्या किया यह कभी समझ नही आया जबकि सभी प्रताड़ना की वारदातें हमेशा से ही गौसंवर्धन बोर्ड के पास तक पहुचाई जाती रही हैं. पोषण की दृष्टि से देखा जाए तो लक्षमनबाग गोशाला में गायों की दुर्दशा किसी से छुपी नही है जबकि हर वर्ष लाखों करोड़ों का बजट दिया जाता है. 

    पर आज जब चुनाव नजदीक है और बोर्ड के कुछ सदस्य जो राजनीतिक दृश्टि से लाभ लेना चाह रहे हैं बकिया बराज नहर की घटना को राजनीतिक रंग देकर अपना स्वयं का महिमा मंडन कर रहे हैं, गलत भ्रामक प्रेस रिलीज के माध्यम से अपने नाम की बड़ाई बता रहे हैं. टीवी में इंटरव्यू और प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर बता रहे हैं की मात्र इन्होंने ने ही इतना सब कार्य किया है बांकी सारे ग्राउंड पर नहर के अंदर मेहनत करने वाले समाजसेवी और वास्तविक गोभक्तों का जैसे कोई योगदान ही नही रहा. यह काफी दुखद तो है ही साथ ही गोवंशों के अधिकार के लिए स्वतंत्र तौर पर कार्य करने वाले गोसेवकों के भी मनोबल को गिराने का प्रयाश है.

सूचना पर 27 अक्टूबर को क्या कहा सतना एसपी ने

    जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की सतना एसपी से मोबाइल फ़ोन पर बात हुई तो उन्होंने घटना की जानकारी न होने की बात स्वीकारी पर उन्होंने बताया की वह हर संभव मदद करेंगे और आवश्यकता पड़ी तो क्रेन भी भेजकर गोवंशों को निकलवाने का प्रयाश करेंगे. आखिर जब गोसंवर्धन बोर्ड और अन्य संगठन एक्टिव बता रहे हैं तो एसपी को ऐसी भीषण वारदात को सूचना इसके पहले क्यों नही थी?

क्या कहा रामपुर थाना प्रभारी टी आई द्विवेदी ने

   जब कोई भी आपराधिक घटना जो की लॉ एंड आर्डर से सम्बन्धित हो घटित होती है तो उसमे सबसे पहले जानकारी पुलिश विभाग और संबंधित थाने को ही दी जाती है. इस पर जब रामपुर थाना प्रभारी श्री द्विवेदी से पूंछा गया तो उन्होंने घटना घटित होने की बात स्वीकारी और यह भी बताया की पिछले दो तीन दिन से बकिया बराज नहर में गोवंशों के धकेले जाने और उनके फंसे होने की खबर उन्हें कुछ नजदीकी गांववालों से मिली है. थानेदार ने आगे बताया की बीतेकल राजस्व तहसीलदार, पटवारी, आर आई, और नहर मंडल का दस्ता घटना का मौका मुआयना करने गए थे जिंसमे उनके थाने से भी कर्मचारी मौजूद थे. थाना प्रभारी रामपुर ने लगभग ढाई सौ गोवंशों के फंसे होने की वारदात स्वीकारी और बताया था की इन्हें नहर के अदंर ही चचाई गेट की तरफ से निकाले जाने का प्रयास चल रहा था लेकिन कहीं मजदूरों के साथ आसपास के ग्राम के किसानों ने मारपीट कर दी जिसके कारण गोवंशों को निकाला नही जा सका था.

क्या बकिया बराज नहर में यह गोवंशों को धकेलने की एकमात्र घटना है?

    बकिया बराज नहर में घटित हुई यह गोवंश प्रताड़ना की घटना कोई एकमात्र नही है. जब ग्राउंड जीरो पर जाकर वहां के आसपास के राहवाशियों और ग्रामीणों से समाजिक कार्यकर्ता द्वारा जानकारी लेने का प्रयाश किया गया तो वहीं बीड़ा, सेमरिया, बकिया और आसपास के अन्य ग्रामों के लोगों ने बताया की यहां नहर के अंदर इस प्रकार की वारदातें अक्सर ही होती रहती हैं जब कुछ ऐसे ही असमाजिक और आपराधिक तत्व जीवित गोवंशों को डम्पर और ट्रेक्टर ट्राली में भरकर नहर में डंप कर देते हैं. जिससे अत्यंत फिसलन भरी और गहरी नहर से अपने आप निकल पाने में असमर्थ यह गोवंश फंसे रहकर भूंख प्यास से अपनी जान गवां बैठते हैं और न तो इन्हें कोई देखने वाला होता और न ही बचाने वाला. ग्रामीणों द्वारा बताया की इसके पहले भी कई मर्तबा ऐसी वारदातें होती रही हैं जिंसमे शाशन प्रशासन का कोई रता पता नही रहता था. लेकिन इस बार खबर सोशल मीडिया, मीडिया और उच्चस्तर के अधिकारी और गोसेवकों के बीच पहुचने के कारण इस स्तर की कार्यवाही हुई.

खतरनाक स्तर से खुली है नहर, नही है कोई फेंसिंग

   जब ग्राउंड जीरो में जाकर स्थिति का शोध किया गया तो पाया गया की ऐसे आपराधिक तत्वों के लिए यह कार्य और भी आसान था क्योंकि नहर के फैलाव के दोनो तरफ कोई भी फेंसिंग और प्रोटेक्शन वाल नही होने से न केवल मवेशियों के लिए जबकि आम नागरिक और चलते फिरते लोगों के लिए भी नहर के दोनो छोरों में खतरा बना हुआ था. यह भी जानकारी ग्रामीणों द्वारा दी गई की भले ही आपराधिक तत्व रोज मवेशियों को भरकर नहर में न फेंकते हों लेकिन यहां आमतौर कुछ मवेशी और व्यक्ति भी स्वयं भी नहर के दोनो तरफ के छोरों में फिसल कर गिर जाते हैं जिसकी वजह से अपनी जान गवां बैठते हैं अथवा शरीर के अंग टूट कर अपाहिज हो जाते हैं.

    सबसे बड़ी बात यह है जब 35 से 40 फीट वर्टिकल गहरी नहर बनाई गई थी तो क्या इस नहर के दोनो छोरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग की व्यवस्था के लिए जल संसाधन विभाग ने बजट नही दिया था? मानाकि हर नहर के दोनो छोरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग लगाना थोड़ा मंहगा पड़ सकता है लेकिन जब बात इतनी गहरी और खतरनाक नहर की हो जहां पर एक बार फिसलने के बाद नहर से सुरक्षित निकल पाना आसान न हो तो ऐसे में क्या शासन स्तर से ऐसी खुली हुई समस्त नहरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग क्यों न लगायी जानी चाहिए थी?

यदि नहर फेंसिंग होती तो ऐसी वारदातें रोकी जा सकती थी

   सबसे बड़ा प्रश्न यही है जब इतनी गहरी और चौड़ी नहर ग्रामों के बीचोंबीच है तो उसमे प्रोटेक्शन और सुरक्षा की दृष्टि से व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण थीं. खुली नहर छोड़ने का कोई औचित्य नही समझ आता. आज यदि इस नहर के दोनो छोरो में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग जाली लगाई हुई होती तो संभवतः ऐसे आपराधिक एवं असमाजिक तत्वों के लिए बकिया बराज नहर में गोवंश प्रताड़ना जैसे घृणित कारनामे करने में इतनी आसानी नही होती. 4 से 5 फीट ऊंची प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग निश्चित तौर पर ऐसी वारदात करने वालों के पीछे एक बार आड़े आ जाती और इतना आसान नही होता नहर के बीचोंबीच इन मवेशियों को ऐसे डंप किया जाना.

बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र बताया गया ओवरलोडेड 

   अभी इसी बकिया बराज गोवंश प्रताड़ना वाली घटना के समय ही जब बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के प्रबंधक अरुण गौतम से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया की वर्तमान में उनके केंद्र में 1750 की संख्या में गोवंश दाखिल हैं और इन लगभग साढ़े तीन सौ गोवंशों के साथ संख्या 2 हज़ार के पार चली जाएगी. जब गोवंश विहार केंद्र की क्षमता के विषय में जानकारी चाही गई तो उन्होंने कोई स्पष्ट जानकारी नही दी और बताया की वैसे वर्तमान में ही गोवंश विहार केंद्र ओवरलोडेड चल रहा है तात्पर्य यह हुआ की जितने गोवंश बसामन मामा में रखे गए हैं उनकी देखरेख पर भी एक तरह से प्रश्नचिन्ह ही है क्योंकि जब क्षमता ही नही है तो उनकी व्यवस्था कैसे होगी.

    वैसे अभी कुछ समय से बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के विषय में नकारात्मक समाचार आती रही हैं जिंसमे कुछ सूत्रों द्वारा बताया जाता रहा है की बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र तो बना दिया गया है लेकिन व्यवस्था के तौर पर स्थिति चिंताजनक है. सोशल मीडिया में तो कुछ लोगों ने वहां भी गोवंशों के मरने की बातें कहीं है. वहरहाल सच्चाई क्या है वह तो बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र सेमरिया में जाकर ही पता लगाया जा सकता है.

मप्र सहित पूरे भारतवर्ष में गोवंशों की स्थित चिंताजनक

   वाकया मात्र मप्र अथवा रीवा जिला तक ही सीमित नही रह गया है. यहां तो पूरे देश में ही गोवंशों को लेकर घमासान मचा हुआ है. आज समाज इतना अधिक स्वार्थी हो चुका है की उसे गोवंशों की जरूरत नही बची है. उसका एक सबसे बड़ा कारण है कृषि उपकरणों और मसीनों का ईजाद और दुग्ध उत्पाद प्राप्ति के अन्य साधन. कभी भारत कृषि प्रधान देश कहलाता था और कृषि को सबसे उत्तम माना जाता था और नौकरी पेशा आदि को कृषि के बाद रखा जाता था. लेकिन अब समय पूरी तरह से बदल चुका है. कृषि सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है और नौकरी पेशा सबसे ऊपर. जहां कभी बैलों को हलों में चलाकर खेती की जाकर गोबर और जैविक खादों का उपयोग होता था आज वहां पर मसीनों ट्रेक्टर, थ्रेसर से खेती होकर रासायनिक उर्वरक का प्रयोग चल पड़ा है. कभी ग्रामीण क्षेत्रों में जहां गोबर के कंडों और लकड़ी से भोजन बनाये जाने का प्रचलन था आज वहां पर गैस सिलिंडर की बहुतायत होने से गोबर के कंडों की भी उपयोगिता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. अब देखा जाए तो गोवंशों का उपयोग मात्र दुग्ध उत्पाद तक ही सीमित रह चुका है और वहां भी अब दूसरे विकल्प सामने आ रहे हैं जिंसमे सोयाबीन, गेहूं और अन्य जैविक माध्यमो से भी दूध और दुग्ध उत्पाद बनाये जाने की तकनीकी प्रक्रिया निकल चुकी है अतः रही सही गोवंशों की उपयोगिता भी अब पूरी तरह से समाप्ति की कगार पर है. अतः जब तक गायें दूध देती हैं तब तक तो लोग  किसी कदर अपने घरों में रखते हैं लेकिन जैसे ही दूध देना बन्द कर देेती हैं अथवा बूढ़ी हो चलती हैं उन्हें घर से बाहर कर दिया जाता है. बछड़ों और बैलों की तो और भी अधिक दुर्दशा हो रही है. आज शहर एवं ग्राम तमाम जाएं तो सड़कों गलियों के किनारों पर घूमते लाठी खाते हुए बैलों का झुंड दिख जाएगा. कहीं कूड़े करकट के ढेर से कचरा खाते हुए तो कहीं जहरीली पॉलिथीन खाते हुए. इस प्रकार हमेशा ही इनके जीवन को संकट बना रहता है. कई बार शहरों की गलियों में आवारा घूमते हुए पशुओं के पेट में मरने के बाद कई किलो पन्नियां निकाली जाती हैं. आज शिवजी का नंदी इस भारतीय समाज के लिए बोझ और गोमाता माता न रहकर मात्र उपभोग की सामग्री बन कर रह गई है जब तक दूध दिया तो ठीक नही दिया तो छोड़ दिया.

गोवंश प्रताड़ना और अवहेलना आज एक राष्ट्रव्यापी समस्या

    अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है जब कोई समस्या समाज तक सीमित रहे घर गांव शहर तक सीमित रहे तो ठीक है लेकिन जब वह यहां से निकलकर प्रदेश और देश स्तर की बन जाए तो आखिर उसका क्या समाधान है? क्या इसमे अकेले समाज कुछ कर पायेगा अथवा अकेले सरकार कुछ कर पाएगी? समाज की स्थिति तो पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है और समाज ने तो गोवंशों को अब लगभग पूरी तरह से ही बहिष्कृत कर दिया है लेकिन जब समस्या इस लेवल की हो जाए तो शासन स्तर से क्या कुछ व्यापक और सार्थक प्रयास किये जाने चाहिए. आज मप्र में इसी समस्या को देखते हुए शासन स्तर से चुनाव को देखते हुए और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से वर्तमान सत्ताधारी सरकार ने तो गोसंवर्धन बोर्ड के बाद गो मंत्रालय तक बनाये जाने की घोषणा कर दी लेकिन क्या घोषणा मात्र करने से कुछ हो पायेगा? आखिर क्या है भारतीय समाज में इन गोवंशों का भावी स्थान? क्या भारतीय समाज में गोवंशों का अस्तित्व बना रहेगा अथवा पश्चिमी सभ्यता की तरह ही भारत में भी आगे चलकर मवेशियों को आहार ही समझा जाएगा और आने वाले समय क्या इन्हें मात्र बूचड़खानों का ही रास्ता दिखाया जाएगा अथवा कोई ऐसा प्रयाश किया जाएगा जिससे भारतीय संस्कृति का अस्तित्व और साथ ही गोवंशों का भी अस्तित्व बना रहे? 

  यह सब अनुत्तरित प्रश्न आज हम सबसे जबाब माग रहे हैं जिनका समाधान करना आज हर एक भारतवाशी का दायित्व है. - (शिवानन्द द्विवेदी की कलाम से)

  संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें, बकिया बराज नहर से करहिया चचाई नहर गेट की तरफ लगभग 14 किमी का सफर नहर के बीचोंबीच तय करते हुए लगभग साढ़े तीन सौ गोवंशों को सुरक्षित निकाले जाने की प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा स्वयं उपस्थित रहकर अपने मोबाइल कैमरे से तस्वीरें.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139