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Monday, December 10, 2018

MP - गोवंशों को चचाई जलप्रपात से बचाने मानवता की पेश की मिशाल - हिंदुओ ने मौत के घाट धकेला तो मुस्लिमों ने जीवित बचाया

दिनांक 10 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    संभाग के अब तक के सबसे भीषण पशु क्रूरता के मामले में चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटियों के नीचे धकेले गए सैकड़ों गोवंशों को अभी भी रेस्क्यू किये जाने का कार्य चल रहा है और अभी भी सैकड़ों गोवंशों का 20 किमी की हजारों फीट गहरी घाटी में फंसे होने की संभावना बनी हुई है. यद्यपि ध्यान फाउंडेशन ने तो पूरे मामले में पूरा सहयोग दिया लेकिन आइए इस बीच पिछले दो सप्ताह से अधिक के रेस्क्यू आपरेशन में कुछ मानवीय पहलुओं पर चर्चा करते हैं जहां भारतीय संस्कृति की माता गोमाता को बचाने के लिए मात्र हिन्दू ही नही बल्कि मुस्लिमों ने भी कोई कोर कसर नही छोड़ी.  

 संकल्प फाउंडेशन - द एनिमल रेस्क्यू टीम का सराहनीय कार्य

    रीवा ज़िले में कार्य करने वाले एवं श्रीमती नजमा बेगम के द्वारा आधारित संकल्प फाउंडेशन के सदस्यों द्वारा चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों से गोवंशों को जीवित सुरक्षित निकालने में अतुलनीय योगदान रहा है. श्रीमती मेनका गांधी की एनजीओ संस्था पीपल फ़ॉर एनिमल की मप्र टीम द्वारा एक रीवा जिले का भी व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया हुआ है जिंसमे इस प्रकार पशुओं से प्रेम रखने वाले और उनके रेस्क्यू के लिए कार्य करने वाले युवाओं को जोड़कर रखा हुआ है. उसी ग्रुप में प्रियांशु जैन, रूपा द्विवेदी, विनय श्रीवास्तव, असद उल्लाह उर्फ आरिफ आदि कई सदस्य जुड़े हुए हैं. जब भी मवेशियों और पशुओं के पीड़ा और कष्ट में होने की कोई सूचना आती है तो यह सभी सदस्य अपने स्तर से एक दूसरे को सूचित करते हुए उन्हें रेस्क्यू किये जाने के प्रयास करते हैं.

मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम का महत्वपूर्ण योगदान

   इस बीच जब पिछले सप्ताह चचाई की हजारों फीट गहरी घाटियों में हजारों गोवंशों को घाट के नीचे जबरन धकेल दिए जाने की खबर अखबारों और सोशल मीडिया में आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की अगुआई में सभी टीम मेंम्बर को सूचना दी गई जिस पर संकल्प फाउंडेशन के आरिफ ने अपने टीम के सदस्यों समीर अंसारी, पारस सोंधिया, फैजल खान, विक्की शर्मा, जीशान राईन, सूर्य रॉय एवं मोहम्मद असद उल्लाह ने अगले दिन मोर्चा संभाला और न केवल रीवा से बाइकिंग करते हुए पूरे टीम मेंबर के साथ उपस्थित हुए बल्कि आवश्यकता अनुरूप घायल और बीमार गोवंशों के लिए दवाईयां भी खरीद कर लाये.

  लड़कों ने हजारों फीट गहरे चचाई घाट के नीचे उतरकर गाय को पानी से निकाला

    दिनाँक 30 नवंबर का दिन था जब संकल्प फाउंडेशन के यह सभी सदस्य दोपहर तक चचाई घाट के नीचे उतर चुके थे जहां इन्हें प्रपात के पानी में गिरी हुई एक गाय मिली जिसे सभी ने मिलकर बाहर निकाला और वहीं जंगल से खर पतवार निकालकर आग लगाकर गाय को ऊष्मा दिया. इतने में ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली से आये गोशेवक विनोद सिंह उपस्थित हुए जो पहले से सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य साथियों के साथ चचाई घाट के नीचे थे, इस प्रकार विनोद सिंह ने गाय को एंटीबायोटिक, दर्द बुखार के इंजेक्शन और साथ में डी-टेन का बॉटल चढ़ाया. चूंकि गाय उठ पाने और चल पाने में पूरी तरह से असमर्थ थी अतः उसका जीवन मुश्किल समझ आया. 

 मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने पूरा दिन रेस्क्यू में किया सहयोग

   इस बीच दिनाँक 30 नवंबर को चचाई घाट की हजारों फीट गहरी घाटी में चले सबसे महत्वपूर्ण रेस्क्यू आपरेशन में मोहम्मद असद उल्लाह और उनके संकल्प फाउंडेशन के साथियों द्वारा अभूतपूर्व योगदान देते हुए पूरे दिन भर रेस्क्यू आपरेशन में सहयोग प्रदान किया. जहां मरैला, कुइयां-मटीमा और अन्य आसपास के आये ग्रामवाशियों और वन विभाग के कर्मचारी मात्र तमाशबीन बने रहे वहीं लगभग 130 गोवंशों को हजारों फीट गहरी चचाई की घाटी से बाहर निकालने में मोहम्मद असद उल्लाह की टीम ने एड़ी चोटी की ताकत लगा दी और तब तक शांत नही हुए जब तक 130 गोवंश सुरक्षित घाट के ऊपर निकाल नही दिए गए.

   दया और मानवता का नही कोई जाति-धर्म 

   इस प्रकार इन दो सप्ताह अर्थात 15 दिन के लगभग किये गए रेस्क्यू आपरेशन के कई मानवीय पहलू सामने आये हैं जिनसे जाति, धर्म और आस्था के आधार पर यह बिल्कुल नही कहा जा सकता मानवीयता और दया धर्म अथवा जाति देखकर आती है.

   देखा जाय तो जिस चचाई और पुरवा जलप्रपात क्षेत्र में पशुओं और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ क्रूरता बढ़ी है वह कोई अन्य धर्म सम्प्रदाय का क्षेत्र नही है बल्कि उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है जिंसमे उच्चवर्गीय हिंदुओं के सहयोग से ऐसी भीषण पशु क्रूरता और विशेषतौर पर गोवंशों के साथ प्रताड़ना और हत्या हुई है. तो क्या यह कहा जाय की आज हिंदुओं का वह समूह जो गोवंशों और गोमाता को पूजता था आज स्वयं ही पथभ्रष्ट्र हो कर अपने धर्म और कर्तव्य को भूल चुका है? क्या यह माना जाए की इन तथाकथित उच्चवर्गीय हिंदुओं से श्रेष्ठ तो हमारे वह मुस्लिम भाई हैं जिनके ऊपर गोहत्या के आरोप लगते रहे हैं? मानाकि की हर धर्म में हर व्यक्ति एक जैसा नही होता उसमे अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं. अतः यह बिल्कुल कहना उचित नही की मानवीयता और दया कोई धर्म और जाति देखकर आती है. यदि ऐसा होता तो चचाई और रीवा में होने वाले ज्यादातर गोवंशों के साथ क्रूरता के मामलों में हिन्दू सम्मिलित नही होते क्योंकि धर्म से तो गोमाता और गोवंश हिंदुओ के पूज्य हैं और गाय में तो 84 करोड़ देवी देवताओं का निवास माना गया है.

   समय था जब 1857 की क्रांति का आधार ही गोमाता थीं 

  इस प्रकार यदि इतिहास को उठाकर देखा जाए तो लगता नही की यह वही भारत देश है जिंसमे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम मात्र गाय और सुअर की चर्बी लगी कारतूस के कारण हुआ था. तो फिर ऐसे में भारत जैसे देश के इतिहास और वर्तमान के लिए क्यों किसी धर्म और क्यों किसी विदेशी शक्ति अथवा अंग्रेजों को दोषी ठहराया जाय. वास्तव में अब देखकर और अनुभव करके तो यही लगता है की बाप बड़ा न मैया सबसे बड़ा रुपैया. पेट और रुपये की अंधी दौड़ के पीछे धर्म, मानवता और इंसानियत तुच्छ साबित हो रही है. 

    वरना यदि ऐसा नही होता तो भारत का हिन्दू किसान भूंखों मरना उचित समझता लेकिन कभी भी अपनी गोमाता को आंच नही आने देता लेकिन क्या समय आ चुका है की आवश्यकता और भौतिकतावादी दौड़ के चलते कहीं कुछ नही बचा है मात्र पेट और पेट बचा है जिसका पोषण पहले होना चाहिए बांकी दया, मानवता रहे अथवा न रहे, इसे किसी को फिक्र नही.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में कुछ वह तस्वीरें हैं जिनमे संकल्प फाउंडेशन के लड़के जिनमे मोहम्मद असद उल्लाह उर्फ आरिफ की टीम सामिल हैं और उन लड़कों ने गोवंशों को बचाकर जीता जागता नमूना प्रस्तुत कर रीवा जिला क्या देश के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Thursday, December 6, 2018

चचाई कालापानी में नौ गायों का फिर हुआ इलाज, पहुचाया चारा-भूषा (मामला ज़िले के अब तक के सबसे भीषण गो प्रताड़ना के किस्से का जिंसमे डेढ़ सौ से अधिक गोवंशों के रेस्क्यू के बाद अभी भी हजारों फीट गहरी घाटी में फंसी है गायें)

दिनाँक 06 दिसंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    ज़िले के चचाई जलप्रपात की हजारों फीट गहरी घाटी में हुए अब तक से सबसे भीषण गोहत्या और गोप्रताड़ना के बारदात में अब तक लगभग डेढ़ सैकड़ा गायों को घाट के ऊपर निकाला गया है. अभी भी कई सैकड़ा गोवंशों के घाटी में फंसे होने की सूचना है लेकिन घाटी इतनी गहरी और विस्तृत है की वहां तक पहुच पाना असंभव सा प्रतीत होता है. यह काम रेस्क्यू आपरेशन में ट्रेनिंग प्राप्त प्रोफेशनल के सहयोग एवं जंगली इलाकों में रहने वाले लोगों के सहयोग से ही पूरी तरह संभव है.

 दिनाँक 06 दिसंबर को वेटेरिनरी कर्मचारियों ने किया इलाज, फंसी गायों के लिए पहुचा भूषा

    दिनाँक 06 दिसंबर को एक बार फिर सामाजिक कार्यकर्ता एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी के डायरेक्शन में चचाई की गहरी घाटियों में फंसे गोवंशों के लिए भूषा पहुचाया गया साथ ही वेटेरिनरी विभाग सिरमौर के प्रशिक्षु सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्राधिकारी रमेश सिंह, प्रतिबंधक संत कुमार साकेत एवं राष्ट्रीय किसान संगठन के मप्र मंत्री वंश गोपाल सिंह, कठमना निवासी विजय सिंह के सहयोग से हजारों फीट की चचाई जलप्रपात की गहरी घाटी में पहुचा गया जहां पर प्रारंभिक स्थल पर मात्र 10 गोवंश ही मिले. उम्मीद की गई की यह वही गोवंश थे जो रेस्क्यू के दौरान उसी स्थान पर छूट गए थे. साथ ही इनमे से वह गाय भी सम्मिलित थी जिसके पैर में चोट की वजह से कीड़े पड़ गए थे. पशु चिकित्सक के रूप में गए रमेश सिंह एवं संत कुमार साकेत ने गोवंशों का स्वास्थ्य चेक किया और आवश्यकतानुसार कमजोर गोवंशों को क्रमसः 9 एंटीबायोटिक, 9 मल्टी विटामिन इंजेक्शन लगाया. साथ ही 3 गायों को दर्द बुखार के इंजेक्शन लगाए, घाव वाली गाय के घाव को धोकर एकबार फिर मलहम पट्टी की गई. इनमे से एक बैल था जो स्वस्थ्य था जिसको कोई उपचार नही किया गया. 

   बांस के पत्ते तोड़कर खिलाये और भूसा डाला

  इस बीच ऊपर चचाई रेस्ट हाउस के पास स्टोर किया गया एक बोरी भूषा ले जाया गया और सभी गोवंशों को थोड़ा थोड़ा दिया गया साथ ही वहां पर बांस के पत्ते भी तोड़कर खिलाये गए जिससे पशुओं के स्वास्थ में सुधार हो सके और उन्हें भी किसी प्रकार से चढ़ाकर घाट के ऊपर तक लाया जा सके.

   गहरी घाटी में पहुचना था काफी मुश्किल

   इस बीच दिनाँक 06 दिसंबर को शाम 5 बजने को थे और चचाई एवं पुरवा की गहरी और लगभग 20 किमी के विस्तार में फैली घाटी में पहुच पाना काफी मुश्किल था. पूरी घाटी में घुसने के लिए शुबह सूर्योदय से ही प्रवेश करते हुए दिन भर का समय देना पड़ेगा तभी जाकर कुछ सार्थक कार्य किया जा सकेगा.

   सबसे बड़ी चुनौती रेस्क्यू किये गए पशुओं का रिहैबिलिटेशन

     आज रीवा ज़िले में पशुओं के रखने के लिए कोई समुचित गोशाला नही है जहां इन्हें रखा जा सके. सबसे बड़ी चुनौती आज यह है की कैसे अधिक से अधिक गोशालाओं की व्यवस्था की जाए और कैसे इन गोवंशों का पुनर्वाश और पोषण किया जा सके. ज्ञातव्य है की रीवा में लक्ष्मण बाग गोशाला पहले से ही भस्ट्राचार की बलि चढ़ चुकी है जहां पर गोवंशों का पूरा खाना पशुओं को न दिया जाकर गोशाला प्रबंधन समिति के लोग खाये जा रहे हैं और गोवंश भूंखों मर रहे हैं.

  बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमिता

    अभी अभी खोली गई बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी अनियमितता देखने को मिल रही है. जब चचाई घाट से रेस्क्यू किये गए मवेशियों को बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में डालने की बात आई तो वहां का प्रबंधन संभाल रहे अरुण गौतम का कहना था की मीडिया में बात मत रखिये तो जितने चाहिए उतने लाकर डाल दीजिए. कुछ चचाई के लोगों द्वारा बताया गया की प्रति मवेशी 500 रुपये फिक्स किया हुआ है जो पैसा देता है उसके मवेशी डाल लेता है और जो नही देता उसे वापस कर देता है.

   300 की क्षमता पर कैसे पहुच गए ढाई हजार?

   सबसे बड़ी बात यह है जब मंत्री के पिए राजेश पांडेय से बात की गई तो उसका कहना था की हमारे पास बसामन मामा में जगह नही बची है और हमारी क्षमता मात्र 300 की है तब सवाल यह उठता है की गोवंशों की संख्या वन्य विहार केंद्र में ढाई हजार कैसे पहुच गई? निश्चित तौर पर जिस प्रकार लक्षमण बाग में इनकी दलाली और गोवंशों के नाम पर भ्रष्टाचार चल रहा था ठीक वही इन्होंने बसामन मामा गोवंश वन्य विहार केंद्र में भी प्रारम्भ कर दिया है. 

  घायल रेस्क्यू किये गए गोवंशों तक के लिए मना कर दिया 

    जब चचाई से रेस्क्यू किये गए गोवंशों को बसामन मामा में रखने की बात अरुण गौतम और मंत्री के पीए राजेश पांडेय के समक्ष रखी गई तो इनके लिए जगह नही थी लेकिन ढाई हजार के लिए जगह कहां से निकल आई? 500 रुपये प्रति मवेशी लेकर घुसेड़ने का धंधा इनका काफी पुराना है जो लक्षमण बाग में भी चलता था.

  संलग्न - दिनाँक 06 दिसंबर 2018 को चचाई घाट के नीचे जाकर गोवंशों का इलाज किया गया एवं साथ ही उनके लिए भूसे चारे की भी व्यवस्था की गई. घाटी के नीचे पहुचे कार्यकर्ता की तस्वीर.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, 9589152587, 78699992139

Sunday, November 25, 2018

MP- चचाई जलप्रपात के नीचे जीवित धकेले गए हज़ारों गोवंश, चचाई जलप्रपात पशुओं के लिए बनाया गया कालापानी ( मामला रीवा ज़िले के सिरमौर थाना क्षेत्र अन्तर्गत चचाई जलप्रपात का जहां पर हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे धकेल दिए हज़ारों गोवंश, पानी, चारा, छाया, धूप सभी का बना संकट, अस्तित्व पर बना खतरा, शासन प्रशासन बना तमाशबीन)

दिनांक 26 नवंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा, मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

   ज़िले की गहरी घाटियों और जलप्रपातों के अंदर से एक बार फिर बुरी खबर आई है. आवारा पशुओं से परेशान लोगों और किसानों ने एकबार फिर आवारा पशुओं के हज़ारों की संख्या के झुंड को गहरी घाटियों के नीचे धकेल दिया है जिनके लिए अब उनके जीवन का संकट उत्पन्न हो चुका.

   चचाई जलप्रपात के अंदर का है मामला 

     पिछले दिनों मरहा घाट के नीचे जो गोवंशों को धकेले जाने का मामला सामने आया था उसी कड़ी में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा शोध करने पर ज्ञात हुआ की चचाई रेस्ट हाउस से लगे हुए और जलप्रपात के नीचे जाने के रास्ते से हज़ारों गोवंशों को समय समय पर हज़ारों फीट गहरी घाटियों के नीचे उतारा जा रहा है. जानकार सूत्रों से पता चला की यह घटनाक्रम कोई अकेला नही है और नियमित अंतराल में मवेशियों को घाट के नीची मौत के घाट उतारा जा रहा है. 

   पशुओं के लिए कालापानी की सजा

    वास्तव में देखा जाय तो दिनांक 24 एवं 25 नवंबर 2018 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी एवं ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली के सदस्य विनोद सिंह द्वारा जो फ़ोटो और वीडियो डिटेल्स हज़ार फीट गहरी घाटी के नीचे से इकट्ठे किये गए वह आत्मा तक को भी दहला देने वाले हैं.

    चचाई घाट के नीचे से बड़ी मुश्किल से उतरकर देखा गया तो पाया गया की यह रास्ता मानव के ही चलने योग्य नही तो भला इसमे चारपाये डोमेस्टिक मवेशी कैसे निकल सकते थे. यह घटना वाकई पशु क्रूरता की बेइंतेहा और हद पर करने वाली घटना थी जिंसमे इन मवेशियों को जबरन मार मारकर घाट के नीचे उतारा गया था. काफी मवेशियों के चोट के निशान भी पाए गए हैं.

   टेढ़ा मेढ़ा खाइयों से भरा पथरीला दुर्गम है रास्ता

    हज़ारों फीट नीचे घाट में पहुचने से पहले ही मात्र सौ दो सौ फीट गहराई से ही मवेशियों और जानवरों के मरे और सड़ी हुई दुर्गंध आने लगी थी. जिस स्थान पर चचाई वाटरफॉल में ज्यादा पानी भरा हुआ दीखता है वहां ऊपर से देखने पर कुछ समझ नही आ रहा था. यह रास्ता भी इतना फिसलन भरा था की इससे नीचे उतर पाना बहुत कठिन कार्य था. लेकिन किसी तरह से पेड़ों और झाड़ियो को पकड़ पकड़कर नीचे उतरा गया. एक स्थान पर यह रास्ता ब्लॉक भी दिखा जिंसमे वहीं आसपास के छोटे पत्थर लगाकर रास्ता को ब्लॉक कर दिया गया था. आसपास लकड़ी काटने वाले लकड़हारों से जानकारी मिली की जो लोग इन पशुओं को घाट के नीचे उतार देते हैं वह इन रास्तों को बाद में बन्द किये हैं जिससे यह गोवंश वापस न पलट पाएं और यहीं अपनी जान गवां दें जिससे लोगों को आवारा पशुओं से हमेशा के लिए निजात मिल जाए.

  रास्ते में मिले दर्ज़नों मृत मवेशी और उनके कंकाल

    इस बीच घाट के नीचे बड़ी मुश्किल से उतरते हुए कई मवेशियों के मृत कंकाल और बदबू मारती हुई डेड बॉडी भी मिली जिनको की सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया गया. यह सबूत पर्याप्त थे जो इस बात की गवाही दे रहे थे की पशु क्रूरता के चलते ही इन मवेशियों की मौतें हुईं हैं.

    यहां तक की घाट के ऊपर से ही एक मवेशी एक बड़े पेंड के नीचे मृत देखा जा सकता था जिसकी की ऊपर से फ़ोटो भी लेने के प्रयास किये गए थे. वह अभी भी मौजूद है.

   रेतीले भाग में पाए गए सैकड़ों जीवित गोवंश

    इस बीच पेड़ों और झाड़ियों को पकड़ पकड़कर उतरते हुए जब कुछ समतल भाग में पहुचा गया तो वहां पर काफी रेत दिखी जिंसमे पैर धस रहा था. वहीं पर बगल में वाटरफॉल का पानी भी जमा हुआ था जिंसमे बहाव नही था. ऐसा लगा की यहां पर आकर मवेशी इसीलिए इकठ्ठे हुए थे क्योंकि यहां पर पानी का स्रोत उपलब्ध था. आसपास देखने पर पता चला की जंगली पेड़ों की ऐसी पत्तियां जिन्हें यह घरेलू पशु नही खाते इसके अतिरिक्त और कोई भी चारा अथवा पशुओं के खाने योग्य वहां पर कुछ नही पाया गया. कुछ आसपास हरे बांस के पौधे पाए गए लेकिन बांस की जो पत्तियां नजदीक थीं उनको तो पहले ही यह पशु खा चुके थे परंतु अब बांस की पत्तियां भी उपलब्ध नही थीं जो काफी ऊंचाई में थीं. 

    पशु ज्यादा भागने में असमर्थ, काफी बैठ चुके थे

     इन पशुओं को थोड़ा और भी करीब से देखा गया तो पाया गया की यह पशु चल फिर पाने में पूरी तरह से असमर्थ थे. कुछ अभी जो चल फिर पा रहे थे वह कुछ यंग थे. जो गोवंश ज्यादा उम्र वाले थे वह अब बैठ चुके थे. एक दो मवेशी ऐसे भी दिखे जिनके शरीर में गहरे चोट के निशान थे और खून बह रहा था. चूंकि वहां पर वेटेरिनरी फैसिलिटी उपलब्ध नही थी अतः उसके लिए कुछ नही किया जा सका.

  सबसे बड़ा प्रश्न  - वन विभाग के अंदर पशु क्रूरता का जिम्मेदार कौन?

    सबसे प्रथम बात तो यह है की चचाई जलप्रपात के नीचे पूरी तरह से एक आरक्षित क्षेत्र है जहां वन विभाग और शाशन की निगाह रहती है. बताया गया की यहाँ पर एक परमानेंट बीट गॉर्ड भी है लेकिन वह कभी भी अपनी ड्यूटी देने नही आता. इस बीच पिछले तीन चार दिनों में घाटी के नीचे टांगी और कुल्हाड़ी लिए हुए काफी लकड़हारे भी मिले जो बेहिचक और बेरोकटोक लकड़ियां काट रहे थे और पूंछने पर बताया की यहां उनका रोज का धंधा है कोई कुछ नही बोलता.

    इससे स्पष्ट है की सबसे जिम्मेदार वन एवं पर्यावरण विभाग ही है जिसने इस प्रकार की पशु क्रूरता होने दिया और इसमे कोई रोंक नही लगाई. सूत्रों और ग्रामीणों ने यहां तक बताया की यह सब वन विभाग की सह से ही किया जा रहा है. बताया गया की वन विभाग के कर्मचारी ग्रामीणों से पैसे लेते हैं और पशुओं को घाट के नीचे उतरवाते हैं. लकड़हारों ने बताया की जब कोई मुंसी और बीट गार्ड यहां पर आता है वह हमसे पैसे ले लेता है और हमे छोंड़ देता है.

  अब क्या है आगे का रास्ता?

   अब सबसे बड़ी बात यह है की हज़ारों की संख्या में फंसे हुए इन गोवंशों को निकालने के लिए क्या किया जाए? क्या इस चचाई घाट की दुर्दान्त पहाड़ियों और घाटियों के बीच से इन गोवंशों को निकाला जाना संभव है? चूंकि मानव तक को उतरने और चढ़ने में भारी मुश्किल का सामना करना पड़ता है ऐसे में घाट के नीचे हज़ारों फीट गहरी खाई में उतार दिए गए इन गोवंशों को ऊपर कैसे लाया जाय यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है. 

   आसपास के ग्रामीणों से जानकारी मिली की यही पथरीले और कठिन रास्ते हैं जिनसे एक एक करके इनको ऊपर लाया जा सकता है अन्यथा फिर घाट के नीचे ही नीचे लगभग 20 किमी दूरी पथरीले भाग से होते हुए इन्हें आगे निकाल दिया जाय. यद्यपि दोनो ही स्थितियों में कार्य बहुत मुश्किल है.

  पुलिश प्रशासन, वन एवं ज़िला प्रशासन का मिले सहयोग

     इस रेस्क्यू अभियान में पुलिश, वन एवं अन्य ज़िला प्रशासन का सहयोग चाहिए होगा वरना यह कार्य इतना आसान नही होगा. संभव है इसमे एक सप्ताह के आसपास का समय लग जाए. क्योंकि झुंड में इन मवेशियों को निकालने का कार्य संभव नही होगा. इन्हें एक एक करके ही निकाला जा सकेगा.

    इस बीच पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं और उच्चस्तरीय मंत्रालयों और विभागों के हस्तक्षेप से काम में आसानी होगी.

संपर्क - डीएफओ रीवा श्री विपिन पटेल - 9424793326

   सीसीएफ रीवा संभाग श्री अतुल खेड़ा - 9424793325

कलेक्टर रीवा श्रीमती प्रीति मैथिल नायक 

 - 9977742118,

 कमिश्नर रीवा संभाग - 9425088190

  संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें चचाई वाटरफॉल के नीचे धकेले गए हज़ारों की संख्या में हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे फंसे गोवंश.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139