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Sunday, November 25, 2018

MP- चचाई जलप्रपात के नीचे जीवित धकेले गए हज़ारों गोवंश, चचाई जलप्रपात पशुओं के लिए बनाया गया कालापानी ( मामला रीवा ज़िले के सिरमौर थाना क्षेत्र अन्तर्गत चचाई जलप्रपात का जहां पर हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे धकेल दिए हज़ारों गोवंश, पानी, चारा, छाया, धूप सभी का बना संकट, अस्तित्व पर बना खतरा, शासन प्रशासन बना तमाशबीन)

दिनांक 26 नवंबर 2018, स्थान - चचाई जलप्रपात रीवा, मप्र

 (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

   ज़िले की गहरी घाटियों और जलप्रपातों के अंदर से एक बार फिर बुरी खबर आई है. आवारा पशुओं से परेशान लोगों और किसानों ने एकबार फिर आवारा पशुओं के हज़ारों की संख्या के झुंड को गहरी घाटियों के नीचे धकेल दिया है जिनके लिए अब उनके जीवन का संकट उत्पन्न हो चुका.

   चचाई जलप्रपात के अंदर का है मामला 

     पिछले दिनों मरहा घाट के नीचे जो गोवंशों को धकेले जाने का मामला सामने आया था उसी कड़ी में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा शोध करने पर ज्ञात हुआ की चचाई रेस्ट हाउस से लगे हुए और जलप्रपात के नीचे जाने के रास्ते से हज़ारों गोवंशों को समय समय पर हज़ारों फीट गहरी घाटियों के नीचे उतारा जा रहा है. जानकार सूत्रों से पता चला की यह घटनाक्रम कोई अकेला नही है और नियमित अंतराल में मवेशियों को घाट के नीची मौत के घाट उतारा जा रहा है. 

   पशुओं के लिए कालापानी की सजा

    वास्तव में देखा जाय तो दिनांक 24 एवं 25 नवंबर 2018 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट शिवानन्द द्विवेदी एवं ध्यान फाउंडेशन नई दिल्ली के सदस्य विनोद सिंह द्वारा जो फ़ोटो और वीडियो डिटेल्स हज़ार फीट गहरी घाटी के नीचे से इकट्ठे किये गए वह आत्मा तक को भी दहला देने वाले हैं.

    चचाई घाट के नीचे से बड़ी मुश्किल से उतरकर देखा गया तो पाया गया की यह रास्ता मानव के ही चलने योग्य नही तो भला इसमे चारपाये डोमेस्टिक मवेशी कैसे निकल सकते थे. यह घटना वाकई पशु क्रूरता की बेइंतेहा और हद पर करने वाली घटना थी जिंसमे इन मवेशियों को जबरन मार मारकर घाट के नीचे उतारा गया था. काफी मवेशियों के चोट के निशान भी पाए गए हैं.

   टेढ़ा मेढ़ा खाइयों से भरा पथरीला दुर्गम है रास्ता

    हज़ारों फीट नीचे घाट में पहुचने से पहले ही मात्र सौ दो सौ फीट गहराई से ही मवेशियों और जानवरों के मरे और सड़ी हुई दुर्गंध आने लगी थी. जिस स्थान पर चचाई वाटरफॉल में ज्यादा पानी भरा हुआ दीखता है वहां ऊपर से देखने पर कुछ समझ नही आ रहा था. यह रास्ता भी इतना फिसलन भरा था की इससे नीचे उतर पाना बहुत कठिन कार्य था. लेकिन किसी तरह से पेड़ों और झाड़ियो को पकड़ पकड़कर नीचे उतरा गया. एक स्थान पर यह रास्ता ब्लॉक भी दिखा जिंसमे वहीं आसपास के छोटे पत्थर लगाकर रास्ता को ब्लॉक कर दिया गया था. आसपास लकड़ी काटने वाले लकड़हारों से जानकारी मिली की जो लोग इन पशुओं को घाट के नीचे उतार देते हैं वह इन रास्तों को बाद में बन्द किये हैं जिससे यह गोवंश वापस न पलट पाएं और यहीं अपनी जान गवां दें जिससे लोगों को आवारा पशुओं से हमेशा के लिए निजात मिल जाए.

  रास्ते में मिले दर्ज़नों मृत मवेशी और उनके कंकाल

    इस बीच घाट के नीचे बड़ी मुश्किल से उतरते हुए कई मवेशियों के मृत कंकाल और बदबू मारती हुई डेड बॉडी भी मिली जिनको की सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया गया. यह सबूत पर्याप्त थे जो इस बात की गवाही दे रहे थे की पशु क्रूरता के चलते ही इन मवेशियों की मौतें हुईं हैं.

    यहां तक की घाट के ऊपर से ही एक मवेशी एक बड़े पेंड के नीचे मृत देखा जा सकता था जिसकी की ऊपर से फ़ोटो भी लेने के प्रयास किये गए थे. वह अभी भी मौजूद है.

   रेतीले भाग में पाए गए सैकड़ों जीवित गोवंश

    इस बीच पेड़ों और झाड़ियों को पकड़ पकड़कर उतरते हुए जब कुछ समतल भाग में पहुचा गया तो वहां पर काफी रेत दिखी जिंसमे पैर धस रहा था. वहीं पर बगल में वाटरफॉल का पानी भी जमा हुआ था जिंसमे बहाव नही था. ऐसा लगा की यहां पर आकर मवेशी इसीलिए इकठ्ठे हुए थे क्योंकि यहां पर पानी का स्रोत उपलब्ध था. आसपास देखने पर पता चला की जंगली पेड़ों की ऐसी पत्तियां जिन्हें यह घरेलू पशु नही खाते इसके अतिरिक्त और कोई भी चारा अथवा पशुओं के खाने योग्य वहां पर कुछ नही पाया गया. कुछ आसपास हरे बांस के पौधे पाए गए लेकिन बांस की जो पत्तियां नजदीक थीं उनको तो पहले ही यह पशु खा चुके थे परंतु अब बांस की पत्तियां भी उपलब्ध नही थीं जो काफी ऊंचाई में थीं. 

    पशु ज्यादा भागने में असमर्थ, काफी बैठ चुके थे

     इन पशुओं को थोड़ा और भी करीब से देखा गया तो पाया गया की यह पशु चल फिर पाने में पूरी तरह से असमर्थ थे. कुछ अभी जो चल फिर पा रहे थे वह कुछ यंग थे. जो गोवंश ज्यादा उम्र वाले थे वह अब बैठ चुके थे. एक दो मवेशी ऐसे भी दिखे जिनके शरीर में गहरे चोट के निशान थे और खून बह रहा था. चूंकि वहां पर वेटेरिनरी फैसिलिटी उपलब्ध नही थी अतः उसके लिए कुछ नही किया जा सका.

  सबसे बड़ा प्रश्न  - वन विभाग के अंदर पशु क्रूरता का जिम्मेदार कौन?

    सबसे प्रथम बात तो यह है की चचाई जलप्रपात के नीचे पूरी तरह से एक आरक्षित क्षेत्र है जहां वन विभाग और शाशन की निगाह रहती है. बताया गया की यहाँ पर एक परमानेंट बीट गॉर्ड भी है लेकिन वह कभी भी अपनी ड्यूटी देने नही आता. इस बीच पिछले तीन चार दिनों में घाटी के नीचे टांगी और कुल्हाड़ी लिए हुए काफी लकड़हारे भी मिले जो बेहिचक और बेरोकटोक लकड़ियां काट रहे थे और पूंछने पर बताया की यहां उनका रोज का धंधा है कोई कुछ नही बोलता.

    इससे स्पष्ट है की सबसे जिम्मेदार वन एवं पर्यावरण विभाग ही है जिसने इस प्रकार की पशु क्रूरता होने दिया और इसमे कोई रोंक नही लगाई. सूत्रों और ग्रामीणों ने यहां तक बताया की यह सब वन विभाग की सह से ही किया जा रहा है. बताया गया की वन विभाग के कर्मचारी ग्रामीणों से पैसे लेते हैं और पशुओं को घाट के नीचे उतरवाते हैं. लकड़हारों ने बताया की जब कोई मुंसी और बीट गार्ड यहां पर आता है वह हमसे पैसे ले लेता है और हमे छोंड़ देता है.

  अब क्या है आगे का रास्ता?

   अब सबसे बड़ी बात यह है की हज़ारों की संख्या में फंसे हुए इन गोवंशों को निकालने के लिए क्या किया जाए? क्या इस चचाई घाट की दुर्दान्त पहाड़ियों और घाटियों के बीच से इन गोवंशों को निकाला जाना संभव है? चूंकि मानव तक को उतरने और चढ़ने में भारी मुश्किल का सामना करना पड़ता है ऐसे में घाट के नीचे हज़ारों फीट गहरी खाई में उतार दिए गए इन गोवंशों को ऊपर कैसे लाया जाय यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है. 

   आसपास के ग्रामीणों से जानकारी मिली की यही पथरीले और कठिन रास्ते हैं जिनसे एक एक करके इनको ऊपर लाया जा सकता है अन्यथा फिर घाट के नीचे ही नीचे लगभग 20 किमी दूरी पथरीले भाग से होते हुए इन्हें आगे निकाल दिया जाय. यद्यपि दोनो ही स्थितियों में कार्य बहुत मुश्किल है.

  पुलिश प्रशासन, वन एवं ज़िला प्रशासन का मिले सहयोग

     इस रेस्क्यू अभियान में पुलिश, वन एवं अन्य ज़िला प्रशासन का सहयोग चाहिए होगा वरना यह कार्य इतना आसान नही होगा. संभव है इसमे एक सप्ताह के आसपास का समय लग जाए. क्योंकि झुंड में इन मवेशियों को निकालने का कार्य संभव नही होगा. इन्हें एक एक करके ही निकाला जा सकेगा.

    इस बीच पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं और उच्चस्तरीय मंत्रालयों और विभागों के हस्तक्षेप से काम में आसानी होगी.

संपर्क - डीएफओ रीवा श्री विपिन पटेल - 9424793326

   सीसीएफ रीवा संभाग श्री अतुल खेड़ा - 9424793325

कलेक्टर रीवा श्रीमती प्रीति मैथिल नायक 

 - 9977742118,

 कमिश्नर रीवा संभाग - 9425088190

  संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें चचाई वाटरफॉल के नीचे धकेले गए हज़ारों की संख्या में हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे फंसे गोवंश.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Wednesday, June 13, 2018

मानसेवियों की वर्षों से बन्द पेमेंट की हुई जांच (मामला ज़िले के ग्राम वन समितियों में कार्यरत मानसेवी सुरक्षा कर्मियों का जिनकी वर्षों से मात्र 3 हज़ार रुपये की मासिक पेमेंट रोक कर रखी गई है, सामाजिक कार्यकर्ता की सीएम हेल्पलाइन की शिकायत की हुई विधिवत जांच)

दिनांक 13 जून 2018, स्थान - सिरमौर वन परिक्षेत्र, लालगांव रीवा मप्र

(कैथा, शिवानन्द द्विवेदी, रीवा-मप्र)

   ज़िले के कई वन परिक्षेत्रों में मानसेवी वन सुरक्षा कर्मियों के रोंके गए पेमेंट संबंधी मामले पिछले कुछ महीने से निरंतर ज़िले और प्रदेश से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में छपे थे जिस पर संबंधित वन मंडलाधिकारी और मुख्य वन संरक्षक सीसीएफ से लेकर अन्य अधिकारियों को लिखित और साथ ही अन्य संपर्क माध्यमो से निरंतर सूचित किया जाता रहा है. लेकिन जब मामला निपटता नही समझ आया तो सिरमौर वन परिक्षेत्र अन्तर्गत आने वाले क्योटी, रुझौही, सरई, पनगड़ी, देउर, घूमा, सर्रा आदि वन समितियों में कार्य कर रहे मानसेवी कर्मियों को पेमेंट न मिलने की शिकायत सीएम हेल्पलाइन 181 में भी दिनांक 31 मई 2018 को दर्ज की गई थी जिसकी शिकायत क्रमांक 6172305 एवं 6172406 थी. जिस पर प्रथम लेवल जांच के लिए आये जांचकर्ता डिप्टी रेंजर राममणि तिवारी ने शिकायतकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी सहित उपस्थित सभी एक दर्ज़न मानसेवी कर्मियों के कथन बयान रिकॉर्ड किये. जांच के दौरान जांचकर्ता अधिकारी डिप्टी रेंजर राममणि तिवारी द्वारा सभी मानसेवी कर्मियों को आश्वस्त किया गया की जांच के बाद प्रतिवेदन संबंधित विभाग को सौंपकर सभी पीड़ितों को जल्द से जल्द पेमेंट दिलाये जाने के प्रयास किये जाएंगे.

पेमेंट रुकने का एक महत्वपूर्ण कारण ग्राम वन समितियों का लंबित चुनाव 

    बता दें की आज ज़िले एवं प्रदेश भर के कार्य कर रहे ग्राम वन समिति के सुरक्षा चौकीदारों की जो पेमेंट रुकी हुई है उसके पीछे एक बड़ा कारण कई ग्राम वन समितियों की आंतरिक प्रणांली है जिसमे कई समितियों में पिछले कई वर्षों से चुनाव तक नही हुए हैं जिससे कार्यकारी तौर पर पिछले गठन में ही नियुक्त किये गए ग्राम वन समिति अध्यक्ष आदि कार्य कर रहे हैं जिससे कागज़ी कार्यवाही में भी वाधा उत्पन्न हो रही है. यद्यपि उपस्थित ग्राम वन समिति के कर्मियों और अध्यक्षों द्वारा यह बताया गया की सुरक्षा कर्मियों के बिल बाउचर पहले से ही संबंधित सचिवों को भेजे जा चुके हैं. अब मात्र विभाग और सचिवों में लेटलतीफी और कुछ नियम विरुद्ध अपेक्षाओं के चलते गरीब और मात्र 3 हज़ार रुपये मासिक वेतन पाने वाले मानसेवी कर्मियों के पेमेंन्ट को रोक कर रखा गया है. कई ग्राम वन समितियों के अध्यक्ष और सहसचिव ने जानकारी दी की उनके समितियों में पर्याप्त पैसे भी हैं जिनसे ग्राम वन समिति के वन चौकीदारों को पेमेंट दी जा सकती है लेकिन फिर भी बिना किसी कारण के रोक कर रखा गया है. जहां तक प्रश्न ग्राम वन समितियों के हर पंचवर्षीय चुनाव की बात आई तो बताया गया की यह विभाग और पंचायत के द्वारा सम्पन्न होता है. जहां वन विभाग ने पंचायतों पर आरोप लगाया वहीं पंचायतों ने वन विभाग पर. इस प्रकार देखा जा सकता है की वन विभाग और पंचायत विभाग में तालमेल न बन पाने के कारण शासन स्तर की इतनी महत्वाकांशी योजना जिसमे उसी ग्राम से संबंधित वन समिति को गठित कर वनों की सुरक्षा और देखरेख की बात कही गयी थी आज पूरी तरह से एक फ्लॉप शो साबित हो रही है जिस पर शासन प्रशासन को गंभीरता से कार्य करने की जरूरत है.


    वहरहाल देखना यह होगा की मीडिया में काफी खबरों के बाद और साथ ही सीएम हेल्पलाइन पोर्टल में भी सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा जनहित को ध्यान में रखकर दर्ज की गई शिकायत पर कब तक समुचित और न्यायोचित कार्यवाही होकर वर्षों से लंबित मात्र 3 हज़ार प्रतिमाह की पेमेंट मानसेवी सुरक्षा कर्मियों को मिल पाती है.

संलग्न - ज़िला रीवा के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम वन समितियों के मानसेवी सुरक्षा कर्मियों की रुकी हुई वर्षों से पेमेंट की जांच करने आये जांचकर्ता डिप्टी रेंजर राममणि तिवारी और साथ में आसपास की दर्जनों ग्राम वन समितियों के मानसेवी चौकीदार. साथ में जांचकर्ता दवारा बनाया गया मौका पंचनामा और साथ में शिकायतकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता का कथन बयान की फ़ोटो एवं सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायत की भी छायाप्रति.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, 

ज़िला रीवा मप्र, मोब - 07869992139, 09589152587

Saturday, June 2, 2018

पनगड़ी में चल रही गड़बड़ी, क्रेशर ने पत्थर समझकर खनिज, वन और पर्यावरण नियमों की जमकर की तोड़ाई ( मामला ज़िले के अवैध उत्खनन का जिसमे खनिज, वन एवं पर्यावरण के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही, सिरमौर तहसील अंतर्गत पनगड़ी की वैध अथवा अवैध खदानों में पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड और वन विभाग के नियमों का नही होता पालन, साथ ही लीज से अतरिक्त हो रही खोदाई)

दिनांक 02 जून 2018, स्थान - गढ़/सिरमौर, रीवा मप्र


(रीवा, मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

  ज़िले में अवैध तरीके से संचालित गिट्टी क्रेशर प्लांट अपनी काली करतूतों को अंजाम दिए जा रहे हैं लेकिन शिकायतों के वाबजूद भी कहीं कोई एक्शन होता नजर नही आ रहा. जो भी कार्यवाहियां हो रही हैं वह मात्र कागजों तक ही सीमित होती दिख रही हैं.

   अभी हाल ही में पिछले वर्षों वन एवं पर्यावरण की धज्जियां उड़ाने वाले के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नामक फैंसी नाम से बनाये गए पनगड़ी में स्थापित क्रेशर प्लांट ने लगातार खनिज, वन एवं पर्यावरण के नियमों के विपरीत जाकर अवैध तरीके से उत्खनन तो किया ही है साथ ही वहां आसपास रहने वाले रहवाशियों की जिंदगी भी हराम कर दिया है. न तो प्रदूषण रोकने के कोई सार्थक उपाय किये गए हैं और न ही खनिज के नियमों का पालन हुआ है. जिस रकबे में खुदाई की गई है वहां बड़ी बड़ी खाई बन गई है. उत्खनन वाले रकबे में कोई सही तरीके की बाउंड्री भी नही बनाई गई है. उत्खनन क्षेत्र और क्रेशर प्लांट के नजदीक सैकड़ों की आवादी है जिसके कारण जब भी क्रेशर में पत्थर और गिट्टी तोड़ने का कार्य होता है तो पूरी डस्ट उड़कर घरों में आती है जिससे गंभेर सांस संबधी बीमारियों का खतरा बना रहता है. कई टेस्ट में ओ सिलकोसिस नामक सांस की बीमारी का होना पाया गया है.

पनगड़ी पंचायत ने किया विरोध लेकिन नही हुई सुनवाई

   सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाली पनगड़ी पंचायत के सरपंच, उप सरपंच और अन्य सैकड़ों सदस्यों ने के -स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड नामक फैंसी नाम से बने क्रेशर प्लांट और अन्य अवैध उत्खनन की शिकायतें की और कार्यवाही हेतु खनिज विभाग, वन विभाग और साथ ही ज़िला रीवा कलेक्टर को भी लिखा लेकिन कोई सार्थक सुनवाई नही हुई. ऐसा लगता है ज़िला कलेक्टर पहले ही बिका हुआ है।

खनिज विभाग रीवा की मिलीभगत का परिणाम अवैध उत्खनन

   जब शिकायतें संबंधित खनिज विभाग रीवा को की जाती हैं तो खनिज विभाग के चमचे पहले ही संबंधित क्रेशर प्लांट के मालिकों और अवैध उत्खननकर्ताओं को सूचित कर देते हैं की आपके नाम से शिकायत आई है. इस पर कई बार तो जांच के नाम पर मात्र खानापूर्ति हुई है. साथ ही झूँठा पंचनामा बनवाकर बता दिया गया की न तो अवैध उत्खनन हो रहा है और न ही अवैध क्रेशर प्लांट लगा है. इसी प्रकार वन एवं पर्यावरण विभाग में भी धांधली चल रही है. कार्यवाही के नाम पर मात्र खानापूर्ति होती है केवल कागज़ी घोड़े दौड़ते हैं.

शिवानन्द द्विवेदी की सीएम हेल्पलाइन में कड़े शब्दों में की गई शिकायत और पीसीबी ने कहा बन्द कर दो बिजली सप्लाई, क्लोजर नोटिस जारी की फिर भी धड़ल्ले से चल रहा प्लांट

   भारतीय लोकतंत्र और इसके वर्तमान भष्ट्राचार युक्त सिस्टम की दुर्दशा तो तब समझ आती है जब शक्तिप्राप्त प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वयं भी अपने नोटिफिकेशन को फॉलो नही करवा पा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द विवेदी के सीएम हेल्पलाइन की अत्यंत कड़े शब्दों में की गई शिकायत क्रमांक 3468430 से प्रारम्भ हुई उथल पुथल के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हरकत में आया. सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा सबूतों के आधार पर बहुत ही कड़े शब्दों में शिकायत की गई जिसमे स्पष्ट रूप से लिखा गया की ज़िला रीवा का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मात्र नाम मात्र का विभाग बना है और जनता के पैसे की पूरी तरह से बर्वादी कर रहा है. क्योंकि जिस प्रकार से पिछले कई वर्षों से प्रदूषण को लेकर शिकायतें बोर्ड के समक्ष रखी गई थीं उन पर न तो कोई जांच हो रही थी और न ही कोई कार्यवाही अतः ऐसे तीखे शब्दों में शिकायत की गई. इस शिकायत के बाद शायद पीसीबी में बैठे ज़िला अधिकारियों को थोड़ी बहुत शर्म का एहसास हुआ होगा और उनका जमीर जागा होगा की नही अब ओ कुछ न कुछ किया जाना चाहिए. इस बाबत पीसीबी रीवा ने के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम प्रदूषण के मापदंडों का पालन न करने के लिए और बिजली विभाग को भी क्रेशर प्लांट की बिजली सप्लाई बन्द करने के लिए नोटिस क्रमांक 576, 579, 3336, और 3509 जारी किया जो की सीएम हेल्पलाइन की शिकायत क्रमांक 3468430 में शिकायतकर्ता को सूचित किया गया. अब लगने लगा था की शायद कहीं जाकर समस्या को गंभीरता से लिया जाने लगा है. शिकायतकर्ता द्वारा मात्र पनगड़ी के वैध अथवा अवैध क्रेशर प्लांट को ही नही बल्कि पूरे ज़िले में हो रहे अवैध उत्खनन और प्रदूषण के नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियाँ के विषय में शिकायत रखी गई थी जिसका की दूरगामी परिणाम यह भी हुआ की पूरे ज़िले में कार्य करने वाले वैध एवं अवैध स्टोन क्रेशर जो की पर्यावरण के नियमों के विपरीत काम कर रहे थे और प्रदूषण फैला रहे थे ज्यादातर के लिए क्लोजर नोटिस जारी कर दिया. यह एक सार्थक पहल कही जा सकती है. परंतु चूंकि पीसीबी के पास कोई न्यायिक शक्ति अथवा पुलिस बल नही है उसकी सभी सूचना कलेक्टर रीवा की ओर सूचनार्थ दिया जिससे दंडाधिकारी द्वारा अग्रिम प्रशासनिक कार्यवाही की जा सके. लेकिन हुआ पूरी तरह से उल्टा. यहां कलेक्टर रीवा ने कुछ नही किया. यदि कोई सामान्य अतिक्रमण हटाना होता अथवा किसी गरीब को परेशान करना होता तो ज़िले क्या पूरे प्रदेश का शासकीय आमला हरकत में आ जाता परंतु रसूखदारों और माफिया किश्म के स्टोन क्रेशर चलाने वाले माफियाओं के क्रेशर प्लांट बन्द करने की कूबत न तो ज़िला कलेक्टर एवं दंडाधिकारी में है और न ही प्रदेश के मुखिया में. जहां तक सवाल प्रदेश के मुखिया का है यह आज एक आम बात हो चुकी है ज्यादातर ऐसे क्रेशर चलाने वाले और अवैध खनिज का काम कारने वाले लोग इन्ही मंत्रियों, और उच्चाधिकारियों के ही सरणागत होते हैं. 

सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा फ़ाइल आर टी आई में पीसीबी ने दिया जानकारी 

    अभी हाल ही मे अप्रैल 2018 में सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड पीसीबी में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जानकारी चाही गई थी जिसमे पीसीबी द्वारा की गई कागज़ी कार्यवाही की जानकारी चाही गई थी जिसके जबाब में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में दिनांक 25 अप्रैल 2018 को जारी किये गए पत्र क्रमांक/906/क्षे.का/तक./प्रनिबो/2017 के माध्यम से जानकारी दी जिसमे प्रपत्र क्रमांक 576, 579, 3336 एवं 3509 संलग्न करके भेजा है जो यहां पर संलग्न है.

कलेक्टर रीवा बना मूकदर्शक

   सबसे बड़ी कमी ज़िला प्रशासन की है क्योंकि ज़िला प्रशासन के पास शक्ति होती है लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास कोई शक्ति नही होती. पीसीबी मात्र जांच कर कार्यवाही करने के लिए अनुशंसा कर सकता है. पीसीबी क्रेशर प्लांट पर नियमों की अवहेलना पर डंडा नही चला सकता. सवाल इस बात का है की जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी बार बार कार्यवाही और जांच करके प्रतिवेदन कलेक्टर अथवा बिजली, खनिज विभाग को भेज रहे हैं तब फिर कलेक्टर क्यों सो रहा है. आखिर ज़िला दंडाधिकारी तो कलेक्टर ही है जिसके पास पुलिश बल भी है साथ में न्यायिक शक्ति भी है. परंतु जिस प्रकार से ज़िला प्रशासन ने पीसीबी को मजाक बनाकर रखा है ऐसा प्रतीत हो रहा है की सबकी अच्छी खासी मिली भगत है. ऐसे में इस देश में न्याय और सच्चाई की लड़ाई लड़ना असंभव हो जाएगा क्योंकि बच्चे बच्चे को पता है की यहां कुछ नही होने वाला. अब यदि रीवा कलेक्टर को थोड़ा भी शासन प्रशासन का खयाल है तो जितने भी क्लोजर नोटिस पर्यावरण नियम के उल्लंघन पर पीसीबी द्वारा ज़िला दंडाधिकारी की तरफ कार्यवाही हेतु अग्रेषित किया गया है तत्काल प्रभाव के साथ पुलिस प्रशासन के सहयोग से पूरी तरह से बन्द करके ब्लैक लिस्ट कर देना चाहिए और हैवी जुर्माना लगाया जाना चाहिए जिससे भविष्य में ज़िले का पूरे प्रदेश में किसी स्टोन क्रेशर संचालक की अवैध कार्य करने की हिम्मत न पड़े.

खनन ने पनगड़ी को पूरी तरह से किया खोखला

   आज पनगड़ी क्षेत्र को अवैध और वैध दोनो तरह के उत्खनन कर्ताओं ने पूरी तरह से खोखला कर दिया है. पनगड़ी में पत्थर बहुतायत में है लेकिन यह क्षेत्र जंगल के पूरी तरह के करीब बसा हुआ हैं जो 250 मीटर के भी दायरे में आता है जिसका तात्पर्य यह हुआ की इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के उत्खनन के लिए आसानी से लीज नही दी जा सकती. परंतु जिस प्रकार से पिछले कुछ वर्षों में खनिज विभाग ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मिलकर पंजीरी की तरह लीज देने का काम किया है इससे पता चलता है की आम जनता के स्वास्थ्य और वन एवं पर्यावरण की किसी को कोई फिक्र नही है. पनगड़ी बीट के जंगलों की तरफ जाने वाले पुस्तैनी और हज़ारों वर्ष प्राचीन महादेवन शिवधाम की तरफ एक कच्ची सड़क जाती थी जो इस स्टोन क्रेशर प्लांट की वजह से पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. अब वहां पर पैदल चलना भी मुश्किल है. इसी प्रकार वहीं पास में नाला और झरना था जो अनियंत्रित और अवैध ब्लास्टिंग की वजह के छत विछत हो चुका है. झरना समाप्त हो गया है. क्रेशर प्लांट के पास अवैध वनों की कटाई और अवैध सुअर हिरण आदि का शिकार भी बढ़ गया है. क्रेशर प्लांट के नजदीक आने वाले घरों की दीवालों और छतों में ब्लास्टिंग की वजह से दरारें आ गईं हैं. आसपास के लोगों का जीना दूभर हो गया है. ज्यादातर नजदीकी बाशिन्दे हरिजन आदिवाशी समूह के होने के कारण अपनी आवाज़ें बुलंद नही कर पाते और बुरी तरह के पीसे जा रहे हैं. जिन्होंने आवाज़ें उठाई भी हैं ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह दबा दी गई. 

क्रेशर प्लांट के 50 मीटर दायरे के भीतर निवासरत है हरिजन परिवार 


      पनगड़ी में ब्लास्टिंग और क्रेशर प्लांट के नजदीक तो पचासों हरिजन आदिवाशी परिवार निवासरत हैं परंतु क्रेशर प्लांट के अत्यंत नजदीक ही एक हरिजन परिवार निवासरत है लेकिन उसे निरंतर वहां से भगाने का प्रयास किया जाता रहा है. वह परिवार क्रेशर प्लांट के 50 मीटर दायरे में इस प्लांट की स्वीकृति के पहले से निवासरत है फिर भी पीसीबी, वन पर्यावरण और खनिज विभाग को यह समझ नही आया की इस क्रेशर प्लांट को लीज और अनुमति किस नियम के आधार पर दी जा रही है. अब जानकारी मिली है की उसी हरिजन परिवार का पीएम आवास भी वहीं पर बन रहा है लेकिन क्रेशर संचालक जोर जबरदस्ती कर दबाब बनाकर तहसील में गलत जानकारी देकर उसका पीएम आवास न बनाये देने के लिए स्थगन भी ले लिया है जो की नियम विरुद्ध है. यह हरिजन परिवार भूमिहीन है जो सरकारी जमीन पर 40 वर्ष से ऊपर से 5 डिसमिल के दायरे में निवास कर रहा है और वासदखल कानून के अंतर्गत उसे वहां का तत्काल आवादी पट्टा दिया जाना चाहिए लेकिन क्रेशर संचालक और माफियाओं के दबाब में तहसीलदार सिरमौर बिक चुका है और बिना ठोस कारण के ही पीएम आवास जैसे महत्वपूर्ण केंद्रीय योजना के विरुद्ध क्रेशर प्लांट संचालक के गुर्गों को स्थगन आदेश हरिजन के विरुद्ध दे दिया जो घोर अन्याय है साथ ही तहसीलदार और अनुविभागीय दंडाधिकारी की शक्ति का दुरुपयोग भी है.

  संलग्न - ज़िला रीवा अंतर्गत सिरमौर तहसील के पनगड़ी ग्राम पंचायत में लगे के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नामक नाम से बनाये गए फैंसी स्टोन क्रेशर का दृश्य जहां पर कोई भी बाउंड्री नही बनाई गई है,  और न ही खनिज, वन एवं पर्यावरण के नियमों का ओई पालन ही किया जा रहा है. साथ ही यहाँ पर संलग्न है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कार्यालय से प्राप्त आर टी आई के जबाब जिसमे आवेदक शिवानन्द द्विवेदी की सीएम हेल्पलाइन की शिकायत पर अब तक आंशिक रूप से की गई जांच और कारवाही की जानकारी भेजी गई है.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र


मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Monday, January 15, 2018

Rewa, MP - कांकर वन चौकी में 24x7 जड़ा रहता है ताला, लालगांव उप वन परिक्षेत्र में खुलेआम हो रहे वन अपराध, वन विभाग वन अपराध रोकने में पूरी तरह नाकाम

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दिनांक 15 जनवरी 2018,

(शिवानंद द्विवेदी रीवा मप्र) ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले लालगांव उप वन परिक्षेत्र में वन अपराध अपने चरम पर हैं।
    हाल ही में पिछले दिनों सरई रुझौही वन क्षेत्र में अवैध उत्खनन होता पाया गया था जिसकी सूचना संबंधित डिप्टी रेंजर, रेंजर एवं डी एफ ओ रीवा विपिन पटेल सहित सभी जिम्मेदार अधिकारियों को दी गई थी। जिस पर संज्ञान लेकर वन विभाग का दस्ता घटनास्थल पर पहुचा था और 10 ट्रेक्टर ट्राली के लगभग गिट्टी बीच वन क्षेत्र से जब्त किया था। मौके पर पंचनामा बनाकर गिट्टी की जब्ती डिप्टी रेंजर द्वारा बनाई गई थी।
     इसके पूर्व पनगड़ी से सटे जंगल भलघटी के पहाड़ से सैकड़ों गोवंशों को आपराधिक तत्वों द्वारा हज़ारो  फ़ीट नीचे जीवित धकेल दिया गया था जिसमे पचासों मृत पाए गए थे और आधा दर्जन के करीब गायों को जीवित घाटी के नीचे से निकाला गया था। पूरा मामला वन विभाग सहित पुलिश, राजस्व, पशु चिकित्सा विभाग के संज्ञान में लाया गया था साथ ही देशभर की मीडिया में छाया रहा जिसमे केंद्रीय जांच दल भी आया था।
      इन सबके वाबजूद भी सबसे जिम्मेदार विभाग वन विभाग की नींद खुलने का नाम नही ले रही।
      वन विभाग की परिसीमा के अंदर निरंतर हो रहे वन अपराध जिसमे जंगली जानवरों का अवैध शिकार, वनों की अंधाधुंध कटाई एवं अवैध परिवहन और उत्खनन हो रहा है लेकिन वह विभाग इन अपराधों को रोकने में पूरी तरह से नाकाम रहा है।
     दिनांक 15 जनवरी 2018 को कांकर देउर वन चौकी में जाकर देखा गया तो पाया गया कि हमेशा की तरह चौकी में दिन के 12 बजे भी ताला लटक रहा है। आसपास बस्ती के ग्रामीणों से पूंछने पर बताया गया कि कांकर वन चौकी कभी भी कार्यालयीन समय मे नही खुलती है।
     डिप्टी रेंजर, मुंसी और साथ मे अन्य चौकीदार सभी अनुपस्थित रहते हैं।

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   संलग्न - संलग्न फ़ोटो में देखें पिछले दिनों सरई रुझौही वन क्षेत्र में अवैध उत्खनन परिवहन और साथ ही दिनांक 15 जनवरी दिन सोमवार को ताला लटकता हुआ वन चौकी कांकर का दृश्य।

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   - शिवानंद द्विवेदी सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र। मोब 7869992139