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Sunday, July 15, 2018

सिरमौर के सरई बीट जंगल में चल रही धांधली, वृक्षारोपण के नाम पर चल रही औपचारिकता, चेक डैम गायब (मामला ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अन्तर्गत सरई बीट के जंगलों का जहां पर वृक्षारोपण कार्य में अनियमिता, अवैध तरीके से वनों की कटाई, और साथ ही चेक डैम निर्माण में हुई है धांधली)

दिनांक 15 जुलाई 2018, स्थान - सिरमौर वन परिक्षेत्र, रीवा मप्र 

(कैथा श्रीहनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)

    कहां से बरसें बदरा, कैसे आये समय पर मानसून. जब जंगल पर्वत और पेंड़ पौधे ही नही रहे तो कैसे बनेगा प्राकृतिक संतुलन और कैसेl जीवित रहेगी हमारी धरती.

    आज जिस प्रकार से निरंतर वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, जंगल पहाड़ को उत्खनन करके उजाड़ा जा रहा है स्वाभाविक है आने वाला समय हमारे लिए काफी मुश्किल होने वाला है.

सिरमौर सहित पूरे ज़िले के वनों में चल रहा वृक्षारोपण 

    जानकारी मिली की सिरमौर वन परिक्षेत्र सहित पूरे ज़िले के जंगलों में आजकल वृक्षारोपण का कार्य किया जा रहा है. इसी बाबत भौतिक धरातल पर स्थिति देखने लालगांव उप वनपरिक्षेत्र के सरई बीट एरिया में जाया गया तो वहां जो देखा गया वह काफी चौकाने वाला मिला. सरई बीट के जंगलों के बीच खाली पड़े लगभग 30 हेक्टेयर के भूभाग में आंवला और शीशम के पेंड़ लगाए जा रहे हैं. यद्यपि इसकी कोई गारंटी नही की इनमे से कोई भी पेंड़ सर्वाइव कर पाएंगे. क्योंकि अभी पिछले दो से तीन सप्ताह से प्रारम्भ हुआ वृक्षारोपण का कार्य चल रहा है गड्ढे खोदे जा रहे हैं बाड़ियाँ लगाई जा रही है लेकिन जो पेंड़ पिछले हफ्ते लगाए गए हैं वह अभी से उजड़ गए हैं, सूख गए हैं. पेड़ों को ठेकेदार द्वारा लगवाया जा रहा है. यह जानकारी नही मिल पायी है की कितने पेंड़ लगाए जा रहे हैं और इसकी लॉगत कितनी है. पेड़ों को लगाने के लिए खोदे गए गड्ढों में न तो कोई खाद डाली गई है और न ही कोई कीटनाशक. सीधे गड्ढों को खोदकर पेड़ों को रख दिया गया है जबकि सिंचाई का तो प्रश्न ही उठता। सवाल यह है कि बिना अच्छी मानसूनी बारिस के कैसे शूखे में वृक्षारोपण किया जा रहा है।

हरे पेंड़ काटकर बनाया बाड़ी

    बता दें की जो देखा गया उसमे किये जा रहे पौधरोपण को सुरक्षित करने की औपचारिकता में आसपास के हरे धवैया के जंगली पेंड़ काटकर लगभग 30 हेक्टेयर की बाड़ी लगाई गई है. जब बीट के मुंसी प्रवीण गौतम से इस विषय में विस्तृत जानकारी चाही गई तो उनके द्वारा बताया गया की इसकी हमे जानकारी नही की कितना बजट आया है लेकिन कार्य ठेकेदार द्वारा करवाया जा रहा है साथ ही जो बाड़ी लगाई जा रही है वह पेड़ों को छांटकर लगाई जा रही है न की काटकर. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा जो देखा गया वह सब अपने कैमरे में कैद कर लिया गया उसमे साफ दिख रहा था की मृत हो चुके और लगाए जा रहे इन पौधों के लिए पहले से ही मौजूद जंगल की हरियाली को किस तरह नष्ट किया जा रहा है. मुंसी प्रवीण गौतम द्वारा जिस प्रकार से बताया गया वैसा तो कुछ भी नही था बल्कि अंधाधुंध तरीके से उपस्थित पेड़ों की जमकर कटाई की गई है और उन्ही धवैया के काटे हुए पेड़ों की बाड़ी लगा दी गई है. इस बात की कोई गारंटी नही की लगाए गए एक भी पेंड़ जीवित रह पाएंगे लेकिन वृक्षारोपण के नाम पर पूरे सरई के जीवित पेड़ों की ऐसी की तैसी तो कर ही दी गई. 

चेक या स्टॉप डैम के नाम पर हुआ भ्रष्ट्राचार

    मात्र बात वृक्षारोपण में अनियमितता तक ही सीमित नही है यहां और भी मामले हैं जिनके कारण वन विभाग हमेशा की तरह कठघरे में है. आखिर गर्मियों में चेक अथवा स्टॉप डैम के नाम पर किया जाने वाला हर वर्ष के कार्य का क्या होता है? कहाँ चले जाते हैं चेक डैम के पत्थर? क्या वास्तव में यह कार्य होता भी है की बस सब कागजों में ही चलता है. 

     सिरमौर के सरई बीट एरिया में मानसेवी सुरक्षा वन कर्मियों बाबूलाल यादव एवं दसरथ यादव के साथ भ्रमण के दौरान पाया गया की इन दोनो मानसेवियों के अतिरिक्त अन्य कोई भी जंगल विभाग का कर्मचारी मौजूद नही था. जानकारी मिली की काम तो यहां कुछ न कुछ हर वर्ष होता है लेकिन सुरक्षा कर्मियों के अभाव में आसपास के रसूखदार अपने ट्रेक्टर ट्राली में सब भर ले जाते हैं.

    जब यह पूंछा गया की आखिर आप लोग भी तो समितियों के माध्यम से तैनात किये गए वन सुरक्षा कर्मी ही तो हैं तो उनके द्वारा बताया गया की हम मात्र नाम के सुरक्षा कर्मी हैं यहां हमारी कुछ नही चलती. वन समिति के सचिवों मुंसियों के द्वारा हमारी डेढ़ दो साल से पेमेंट रोककर रखी गई है. मुंसी रेंजर कहते हैं की हमे पेमेंट ही नही मिलेगी तो हम क्या करें? क्या हम मुफ्त में काम करते रहें? फिर भी हम दिन में भ्रमण करते रहते हैं और प्रयाश कर रहे हैं की कोई जंगल को नुकसान न पहुचा पाए. लेकिन जब भी हम कार्यवाही करवाते हैं तो मुंसी और डिप्टी रेंजर पैसे लेकर छोंड़ देते हैं तो हम क्या करें.

मानसेवियों की 2 साल से नही मिली पेमेंट

   जंगल विभाग में ग्राम वन समितियों के माध्यम से कार्यरत मानसेवी वन सुरक्षा कर्मियों की 2 साल से पेमेंट नही मिली है. मानसेवी दसरथ यादव, बाबूलाल यादव, कौशल यादव आदि द्वारा बताया गया की उनकी 2 वर्षों से रुकी हुई 3 हज़ार प्रतिमाह की पेमेंट नही दी जा रही है जबकि सभी ने नियमित रूप से कार्य किया हुआ है. पनगड़ी ग्राम वन समिति के राघुवेन्द्र पांडेय एवं रामसिया साकेत द्वारा भी बताया गया की उनकी भी 2 वर्षों के कोई पेमेंट नही मिली है जबकि सभी वनकर्मी नियमित कार्य कर रहे हैं. 

    बता दें की रीवा ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र के विभिन्न बीटों की ग्राम वन समितियों में कार्य कर रहे दर्जनों मानसेवी चौकीदारों की पेमेंट को वर्षों से नही दिया गया है जिसकी वजह से उनके परिवार के लिए भी भीषण समस्या की स्थिति निर्मित हो चुकी है. उनके अनुसार उनका परिवार दानों दानों के लिए मोहताज़ हो रहे हैं. इस बाबत सभी मानसेवियों ने व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से भी शिकायतें और आवेदन भी संबंधित वन विभाग के अधिकारियों के समक्ष रखा है लेकिन अब तक कोई सुनवाई नही हो रही है. जब इसके विषय में रेंजर, एसडीओ एवं डीएफओ से बात की गई तो उनके द्वारा बताया गया की यह कार्य समितियों का है की किसे रखें और किसे न रखें साथ ही चौकीदारों की पेमेंट भी समितियों के माध्यम से होता है. जिन जिन समितियों का गठन हर पांच वर्ष में नही हो रहा है उनके चौकीदारों को कार्य करने के वावजूद भी पेमेंट संबंधी समस्या का सामना करना पड़ रहा है. इस बाबत सभी मानसेवी चौकीदारों ने एक स्वर में कार्यवाही की आवाज़ उठाई है.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें -

  1) रीवा सिरमौर के जंगलों में सरई बीट वन क्षेत्र में औपचारिकता के तौर पर हो रहा वृक्षारोपण का कार्य.

   2) सरई बीट के जंगलों की कटाई की फ़ोटो.

    3) बनाये गए चेक और स्टॉप डैम की फ्लॉप स्थिति को बयान करते टूटे आउर उखड़े चेक डैम.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Wednesday, June 13, 2018

मानसेवियों की वर्षों से बन्द पेमेंट की हुई जांच (मामला ज़िले के ग्राम वन समितियों में कार्यरत मानसेवी सुरक्षा कर्मियों का जिनकी वर्षों से मात्र 3 हज़ार रुपये की मासिक पेमेंट रोक कर रखी गई है, सामाजिक कार्यकर्ता की सीएम हेल्पलाइन की शिकायत की हुई विधिवत जांच)

दिनांक 13 जून 2018, स्थान - सिरमौर वन परिक्षेत्र, लालगांव रीवा मप्र

(कैथा, शिवानन्द द्विवेदी, रीवा-मप्र)

   ज़िले के कई वन परिक्षेत्रों में मानसेवी वन सुरक्षा कर्मियों के रोंके गए पेमेंट संबंधी मामले पिछले कुछ महीने से निरंतर ज़िले और प्रदेश से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में छपे थे जिस पर संबंधित वन मंडलाधिकारी और मुख्य वन संरक्षक सीसीएफ से लेकर अन्य अधिकारियों को लिखित और साथ ही अन्य संपर्क माध्यमो से निरंतर सूचित किया जाता रहा है. लेकिन जब मामला निपटता नही समझ आया तो सिरमौर वन परिक्षेत्र अन्तर्गत आने वाले क्योटी, रुझौही, सरई, पनगड़ी, देउर, घूमा, सर्रा आदि वन समितियों में कार्य कर रहे मानसेवी कर्मियों को पेमेंट न मिलने की शिकायत सीएम हेल्पलाइन 181 में भी दिनांक 31 मई 2018 को दर्ज की गई थी जिसकी शिकायत क्रमांक 6172305 एवं 6172406 थी. जिस पर प्रथम लेवल जांच के लिए आये जांचकर्ता डिप्टी रेंजर राममणि तिवारी ने शिकायतकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी सहित उपस्थित सभी एक दर्ज़न मानसेवी कर्मियों के कथन बयान रिकॉर्ड किये. जांच के दौरान जांचकर्ता अधिकारी डिप्टी रेंजर राममणि तिवारी द्वारा सभी मानसेवी कर्मियों को आश्वस्त किया गया की जांच के बाद प्रतिवेदन संबंधित विभाग को सौंपकर सभी पीड़ितों को जल्द से जल्द पेमेंट दिलाये जाने के प्रयास किये जाएंगे.

पेमेंट रुकने का एक महत्वपूर्ण कारण ग्राम वन समितियों का लंबित चुनाव 

    बता दें की आज ज़िले एवं प्रदेश भर के कार्य कर रहे ग्राम वन समिति के सुरक्षा चौकीदारों की जो पेमेंट रुकी हुई है उसके पीछे एक बड़ा कारण कई ग्राम वन समितियों की आंतरिक प्रणांली है जिसमे कई समितियों में पिछले कई वर्षों से चुनाव तक नही हुए हैं जिससे कार्यकारी तौर पर पिछले गठन में ही नियुक्त किये गए ग्राम वन समिति अध्यक्ष आदि कार्य कर रहे हैं जिससे कागज़ी कार्यवाही में भी वाधा उत्पन्न हो रही है. यद्यपि उपस्थित ग्राम वन समिति के कर्मियों और अध्यक्षों द्वारा यह बताया गया की सुरक्षा कर्मियों के बिल बाउचर पहले से ही संबंधित सचिवों को भेजे जा चुके हैं. अब मात्र विभाग और सचिवों में लेटलतीफी और कुछ नियम विरुद्ध अपेक्षाओं के चलते गरीब और मात्र 3 हज़ार रुपये मासिक वेतन पाने वाले मानसेवी कर्मियों के पेमेंन्ट को रोक कर रखा गया है. कई ग्राम वन समितियों के अध्यक्ष और सहसचिव ने जानकारी दी की उनके समितियों में पर्याप्त पैसे भी हैं जिनसे ग्राम वन समिति के वन चौकीदारों को पेमेंट दी जा सकती है लेकिन फिर भी बिना किसी कारण के रोक कर रखा गया है. जहां तक प्रश्न ग्राम वन समितियों के हर पंचवर्षीय चुनाव की बात आई तो बताया गया की यह विभाग और पंचायत के द्वारा सम्पन्न होता है. जहां वन विभाग ने पंचायतों पर आरोप लगाया वहीं पंचायतों ने वन विभाग पर. इस प्रकार देखा जा सकता है की वन विभाग और पंचायत विभाग में तालमेल न बन पाने के कारण शासन स्तर की इतनी महत्वाकांशी योजना जिसमे उसी ग्राम से संबंधित वन समिति को गठित कर वनों की सुरक्षा और देखरेख की बात कही गयी थी आज पूरी तरह से एक फ्लॉप शो साबित हो रही है जिस पर शासन प्रशासन को गंभीरता से कार्य करने की जरूरत है.


    वहरहाल देखना यह होगा की मीडिया में काफी खबरों के बाद और साथ ही सीएम हेल्पलाइन पोर्टल में भी सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा जनहित को ध्यान में रखकर दर्ज की गई शिकायत पर कब तक समुचित और न्यायोचित कार्यवाही होकर वर्षों से लंबित मात्र 3 हज़ार प्रतिमाह की पेमेंट मानसेवी सुरक्षा कर्मियों को मिल पाती है.

संलग्न - ज़िला रीवा के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम वन समितियों के मानसेवी सुरक्षा कर्मियों की रुकी हुई वर्षों से पेमेंट की जांच करने आये जांचकर्ता डिप्टी रेंजर राममणि तिवारी और साथ में आसपास की दर्जनों ग्राम वन समितियों के मानसेवी चौकीदार. साथ में जांचकर्ता दवारा बनाया गया मौका पंचनामा और साथ में शिकायतकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता का कथन बयान की फ़ोटो एवं सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायत की भी छायाप्रति.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, 

ज़िला रीवा मप्र, मोब - 07869992139, 09589152587

Monday, April 16, 2018

वन समिति के मानसेवियों के मान का कोई नही सम्मान, इनकी सालों से नही मिली पेमेंट (मामला ज़िले की सिरमौर रेंज अंतर्गत आने वाली पनगड़ी, देउर, सर्रा, घुमा सहित ज़िले की सैकड़ों वन समितियों का)

दिनांक 16 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा मप्र - शिवानन्द द्विवेदी)

     ज़िले में एक बार फिर वन विभाग में कार्यरत मानसेवी कर्मचारियों के शोषण का मामला प्रकाश में आया है. अभी पिछले दिनों पनगड़ी ग्राम वन समिति के 25 सौ रुपये मात्र पाने वाले मानसेवी चौकीदारों रामसिया साकेत एवं राघुवेन्द्र पांडेय निवासी पनगड़ी द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी के समक्ष अपनी व्यथा रखी गई थी की उनकी पिछले 14 माह के पेमेंट लंबित है.

    अभी पुनः वही समस्या सर्रा ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार अयोध्या प्रसाद केवट द्वारा बताई गई है जिसमे बताया गया की अयोध्या को मई जून और जुलाई 2017 की पेमेंट अब तक लटका के रखा गया है. अयोध्या ने आगे बताया की साहब बताईये हमे रोज का 100 रुपये से भी कम मिलता है और हमारे बाल बच्चे भूखे मर रहे हैं. वन अधिकारी कहते हैं की काम करो. अब ऐसे में कैसे काम होगा. 

   इसी प्रकार एक अन्य मामले में देउर और घूमा वन समिति के भी मानसेवियों ने अपनी समस्या रखी है और बताया गया की उन्हें भी पिछले 2 साल से मात्र 25 सौ की दी जाने वाली पेमेंट नही दी गई है. देउर वन समिति के पिछले पंचवर्षीय में रह चुके अध्यक्ष दिलीप सिंह ने बताया की उनके समिति के कर्मचारी मथुरा सिंह को पिछले दो साल से पेमेंट नही दी गई है.

   बिना चुनाव ही चल रही  पनगड़ी और देउर वन समिति 

    प्राप्त जानकारी के अनुसार बताया गया की पनगड़ी और देउर वन समिति का चुनाव पिछले 15 वर्ष से नही हुआ है. जो पूर्व के समिति अध्यक्ष थे वही जबरन पद पर बने हुए हैं. इस संबंध में जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा वन विभाग के रेंजर और डीएफओ से जानकारी चाही गई और साथ ही सीएम हेल्पलाइन में भी कंप्लेन दर्ज करवाई गई तो उसके निराकरण में बड़ा ही अजीब जानकारी दी गई जिसमे कहा गया की वन विभाग ने तो अपनी प्रक्रिया पूर्ण कर दी है मात्र पंचायतें ही चुनाव नही करवा रही हैं. अब  इसी खेल में वन समिति का चुनाव पिछले 15 वर्षों से लटका पड़ा है. गौरतलब है की सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाली वन समितियों में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद के चलते पूरा वन एवं पर्यावरण समाप्ति की कगार पर है. जंगल की रखवाली का जिम्मा जिन महानुभावों के सर पर है वह मात्र 25 सौ रुपया पाने वाले ग्राम वन समिति के मानसेवी हैं अन्यथा जो नियमित चौकीदार मुंसी और डिप्टी आदि हैं वह तो बन्द वातानुकूलित कमरों और घरों में ऐश फर्मा रहे होते हैं.

लाल गांव उप वन परिक्षेत्र का डिप्टी रेंजर बृजभूषण रहता है अनुपस्थित, सिरमौर रेंजर बघेला ने काट दी उसकी तीन माह की पेमेंट-

    मात्र इसी भररेशाही के चलते अभी हाल ही में दौरे के दौरान सिरमौर रेंज अफसर बघेला ने लालगांव उप वन परिक्षेत्र के अधिकारी कर्मचारियों की पेमेंट काट दी और तीन महीने तक वंचित कर दिया. जिसकी की शिकायत रीवा की स्टाइल में यह सभी लोकल वन कर्मचारी अधिकारी नेताओं से करते घूम रहे हैं, प्राप्त जानकारी में बताया गया की यह सभी नियमित और सरकारी अधिकारी कर्मचारी जिनकी पेमेंन्ट काट दी गई है वह विधायक, सांसद और मंत्रियों से जोर जुगुत लगाने में लगे हैं और खूब सिफारिश करवा रहे हैं. लेकिन चूंकि बाघेला ने इन सबको अनुपस्थित पाया तो इन सबको लटका दिया और तीन महीने की इनकी पेमेंट को ही काट दिया. 

    यह बिल्कुल उचित भी है चूंकि जब सिरमौर वन रेंज में आग लगी थी तब भी यह सरकारी और नियमित अधिकारी कर्मचारी अपने काम में नही थे. जब आग ने पूरे जंगली क्षेत्र का पूरी तरह से सफाया कर दिया तब जाकर इनका रता पता चला. 

    इस प्रकार अनुशासनहीनता और अनुपस्थिति इनका पेशा है. कई मर्तबा तो कई बार डीएफओ और एस डी ओ आदि को इन्होंने गालियां तक दी है और कहा है की कर लें जिसको जो करना है हम तो ऐसे ही करेंगे.

   इस प्रकार समझा जा सकता है की वन विभाग की भररेशाही इतनी बढ़ गई है की इनके ऊपर किसी कार्यवाही का प्रभाव ही नही पड़ रहा है. 

    ऐसे में यदि मात्र 25 सौ रुपये पाने वाले मानसेवी वन चौकीदारों की पेमेंट भी सालों साल नही मिलेगी तो वन की सुरक्षा व्यवस्था मात्र भगवान भरोसे ही चलेगी.

संलग्न - 1) सिरमौर रेंज अंतर्गत आने वाले पनगड़ी वन समिति के दो मानसेवी चौकीदार रामसिया साकेत और रागावेंद्र पांडेय की फ़ोटो.

  2) सिरमौर रेंज में ही देउर वन समिति के अध्यक्ष दिलीप सिंह और मथुरा सिंह की फ़ोटो. मथुरा को 2 साल से पेमेंट नही मिली.

   3) सर्रा ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार अयोध्या केवट की फ़ोटो जिसे मई जून जुलाई महीने की पेमेंट नही मिली है।

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, 

मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Sunday, April 1, 2018

वन अपराध की आग ने खाक कर दिया सिरमौर (पनगड़ी ) का जंगल

दिनांक 01 अप्रैल 2018,

स्थान – तेंदून/नौपथा जंगली क्षेत्र से, सिरमौर वन परिक्षेत्र रीवा मप्र,

(कैथा, शिवानंद द्विवेदी)

      गर्मी आते ही ज़िले के वन परिक्षेत्र मे जंगली आग का सिलसिला एक बार फिर चल पड़ा है। अभी हाल ही मे डभौरा वन परिक्षेत्र मे आग लगाए जाने की खबर कुछ ही दिनों पूर्व रीवा से प्रकाशित होने वाले प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय अखबारों मे आई थी।

गौहत्या के लिए कुख्यात पनगड़ी बीट के जंगलों मे फिर लगाई गई आग

      अभी पिछले एक सप्ताह से सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले कुख्यात पनगड़ी बीट के जंगलों मे भी एक बार फिर दावानल ने भीषण रूप ले लिया है। खबर थी की त्योंथर और जनकहाई क्षेत्र से घाट के ऊपर पश्चिम क्षेत्र से पिछले सप्ताह आग ऊपर की ओर आ रही है जिस पर वन विभाग काबू पाने मे असफल रहा जो आगे बढ़कर पनगड़ी के जंगलों मे आ गई जिससे तेदून, नौपथा, मछेहुआ के जंगलों तक बढ़ते हुये नादघाट और रवार एरिया तक पहुच गई। जब आग रवार क्षेत्र के पास पहुची और रहवाशी एरिया मे आने लगी तब जाकर लोगों ने हल्ला गुल्ला मचाया और तब जाकर लालगाँव उप-वनपरिक्षेत्र के डेप्युटी रेंजर तिवारी और इनके कुछ मुंसी चौकीदारों और अन्य कर्मचारियों ने आग पर काबू करने के नाकाफी प्रयास किए।

केचुआ पंचायत निवासी कल्लू आदिवाशी को थी आग लगने की जानकारी

      त्योंथर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले केचुआ पंचायत के निवासी कल्लू आदिवाशी का कहना है की यह आग आज से महीनों पहले से लगी हुई है जिसकी जानकारी लालबिहारी सिंह डेप्युटी रेंजर त्योंथर को थी। कल्लू आदिवाशी और उसका परिवार तेदून के जंगलों के बीच निवास करता है साथ ही पैरा ग्राम का पुस्तईनी निवासी भी है। कल्लू आदिवाशी ने बताया की जंगल के बीचोबीच उसकी पट्टे की जमीन है। यह जमीन उसके पट्टे मे कैसे आई यह बिलकुल स्पष्ट नहीं है। 

डेप्युटी रेंजर त्योंथर लालबिहारी सिंह को बिंझन मे लगी आग की थी जानकारी

      केचुआ निवासी कल्लू आदिवाशी द्वारा बताया गया की आज से 15 दिन पूर्व जब पनगड़ी के जंगल अंतर्गत आने वाले बिंझन महादेव मंदिर के पास आग लगी थी और जंगल धू धू करके जल रहा था तब उसी समय डेप्युटी रेंजर त्योंथर लालबिहारी सिंह ने एक ट्रैक्टर से भरी गिट्टी पत्थर जंगली क्षेत्र से पकड़ी हुई थी और जिस जगह आग लगी थी वहीं से ट्रैक्टर लेकर निकले थे तब कैसे संभव है की लालबिहारी सिंह ने इस आग को विभाग को सूचित नहीं किया। जब आग बिंझन के जंगलों से बढ़ती हुई घाट के ऊपर तेदून, नौपथा से होते हुये नादघाट तक पहुच गई तब जाकर वन विभाग सिरमौर के पदस्थ रेंजर,डेप्युटी रेंजर और अन्य कर्मचारियों की आँख खुली।

जंगल मे आग के पीछे महुआ बीनने वालों पर लगाया गया आरोप

      इस आग लगने के पीछे जिम्मेदारों मे जंगली क्षेत्रों मे घुस कर रात दिन बराबर महुआ बीनने वालों को दोषी बताया जाता है। बताया गया की महुआ बीनने आने वाले लोग खर-पतवार और पत्तों मे आग लगा देते हैं जिससे महुआ के पेंड के नीचे के पत्ते और कचड़ा जल जाता है इस प्रकार फिर आराम पूर्वक महुआ बीनने के काम करते हैं।

अनुविभागीय अधिकारी एस पी एस गहरवार ने यूपी पुलिश को डभौरा आग के लिए जिम्मेदार ठहराया था

      अभी हाल ही पिछले दिनों प्रकाश मे आए इसी प्रकार के एक अन्य घटना क्रम मे ज़िले मे पदस्थ अनुविभागीय अधिकारी वनविभाग एस पी एस गहरवार ने यूपी पुलिश के मत्थे ठीकड़ा मढ़ दिया था और बताया था की चोर डकैत तलाशने के लिए यूपी पुलिश ने आग लगाई होगी।

      ऐसे यदि बयानवाजी की गई तो किसी को भी आग लगाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है परंतु जब हर वर्ष के यही हाल हैं की गर्मी आते आते रीवा के जंगलों का सत्यानाश होने लगता है तो विभाग सो क्यों रहा होता है? आखिर इस वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी किस बात के लिए पेमेंट पाते हैं। आज कोई भी जाये तो यह ज़्यादातर अधिकारी अपने वातानुकूलित कारों और कमरों मे पड़े ज़िंदगी के आनंद ले रहे होंगे,इनके लिए वन और पर्यावरण जाये भाड़ मे। क्योंकि यदि यही किस्सा नहीं होता तो जब हर वर्ष आग लगती है तो ये अपने कर्मचारियों को पहले से मुस्तैद क्यों नहीं करते? मानते हैं की महुआ बीनने वाले और दूसरे अपराधी लोग ऐसे घटनाक्रम को अंजाम देते होंगे पर सालों साल यही चल रहा है तो पूरे जंगलों की बाउंडरी को सील क्यों नहीं कर दिया जाता? महुआ जंगल की संपत्ति है किसी की बपौती तो नहीं। अब यदि महुआ की शराब भी पीएंगे और जंगल का सत्यानाश भी करेंगे तो ऐसे लोगों को जंगली एरिया मे घुसने क्यों दिया जाय?

रीवा वन विभाग की सह से ही होते हैं ज़्यादातर वन अपराध

      सही मायनों मे देखा जाये तो जो भी वन अपराध आज हो रहे हैं सब वन विभाग की जानकारी मे रहते हैं। वन विभाग के अधिकारी मात्र अंजान बनने का नाटक भर करते हैं। और तो और कितने तो ऐसे वन अपराध हैं जो सीधे इनके सज्ञान मे लाया जाता है परंतु फिर भी ले दे कर यह मामले को रफा दफा कर देते हैं और कोई दंडात्मक कार्यवाही की पहल नहीं करते। अभी जब भलघटी और पनगड़ी मे सैकड़ों गोवंशों को घाट के नीचे मौत का घाट उतारा गया था तो क्या वन विभाग के कर्मचारियों अधिकारियों को यह जानकारी नहीं रही होगी? जब यह गोहत्या की वारदात पिछले कई महीने से निरंतर की जा रही थी तो वन विभाग ने इस पर कार्यवाही क्यों नहीं किया? इसी प्रकार इसी घटना क्रम के दौरान अवैध तरीके से कार्य कर रहे क्रशर के पास पनगड़ी मे भी एक जंगली सूअर को मार कर उसे पकाया जाकर भूनकर खाया गया था जिसके पूरे ढांचे सहित कंकाल पाया गया था और सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा यह सभी घटनाक्रम वन मंडलाधिकारी, मुख्य वनसंरक्षक से लेकर अनुविभागीय अधिकारी और रेंजर डेप्युटी रेंजर सभी को बताया गया था। पूरी विडियोग्राफी की गई थी सभी की फोटो मीडिया और अन्य माध्यमों से भेजी गई थी परंतु वनविभाग अब तक सचेत नहीं हुआ। ऐसी घटना इनके रोज के कार्यप्रणाली मे सम्मिलित है जिस पर शिकायतों के बाद मात्र खानापूर्ति होती है।

पनगड़ी जंगल अग्निकांड का कौन है जिम्मेदार?

      अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है की इस प्रकार के आपराधिक घटनाक्रम का कौन जिम्मेदार है? किसने पनगड़ी और बिंझन के जंगलों मे आग लगाई है? चूंकि हर वर्ष का यही किस्सा है और महुआ बीनने के समय ही होता है अतः महुआ बीनने वालों को प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? क्या वन पर्यावरण की सुरक्षा से ज्यादा महुआ और महुआ की शराब महत्वपूर्ण है?

तेंदुपत्ता तोड़ाई के समय भी जंगलों को पहुचाया जाता है भारी नुकसान

      एक तरफ तो सरकारें नासामुक्ति की बातें करेंगी और दूसरी तरफ बीड़ी पीने के लिए तेंदू पत्ता तोड़वाने लिए सरकारी ठीके देंगी, इसमे कौन सा लॉजिक है? क्या राजस्व इकठ्ठा करने का इन सरकारों के पास और कोई दूसरा तरीका नहीं? तेंदू के पेड़ों मे शाखकर्तन का कार्य किया जाता है जिसमे शाखकर्तन के नाम पर भी जंगलों का सफाया किया जाता है। यद्यपि नियमावली मे भी शाखकर्तन मे तेंदू की ऐसी शाखाओं को काटा जाता है जो काफी पतली होती हैं परंतु शाखकर्तन मे मोटी-मोटी डालियों को काट दिया जाता है जिससे तेंदू के पेड़ों की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है। तेंदूपत्ता के नाम पर इसी गर्मी के समय जमकर पेड़ों की अवैध कटाई भी की जाती है और बहाना तेंदूपतों का बताया जाता है। आज जबसे सरकारी तौर पर तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य होने लगा तब से जंगली पेड़ों की ऐसी की तैसी हो गई है। यदि तेंदूपत्ता संग्रहकर्ताओं को देखा जाये तो उसी समय तेंदू और दूसरे सेधा छिवला वगैरह की हरी लकड़ी की जमकर कटाई भी होती है। यह सब स्वयं सिद्ध है क्योंकि पहले भी इस बात को कई बार सीएम हेल्पलाइन और अन्य माध्यमों से उठाया जाता रहा है।

रीवा के जंगलों की सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी मात्र 2500 रुपये प्रतिमाह पाने वाले वन समितियों के मानसेवियों के ऊपर

      वन विभाग जंगल की सुरक्षा संबंधी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेता। जब भी कोई वन अपराध की जानकारी संबंधितों को प्रेषित की जाती है तो उसे गलत निराकरण देकर रफा दफा किया जाता है। वन विभाग के ज़्यादातर कर्मचारी अधिकारी अपने घर और कार्यालय मे ही आराम फरमाना पसंद करते हैं। ऐसा बहुत ही कम होता है की कोई भी नियमित वन कर्मचारी अधिकारी कभी भी जंगली क्षेत्र मे भ्रमण करने आया हो। जब बहुत बार शिकायतें की जाती हैं तब कहीं जाकर आते हैं। आम तौर पर यह देखा गया है की वन की सुरक्षा की ज़्यादातर ज़िम्मेदारी साल भर मे मात्र एक बार बमुस्किल तंख्वाह पाने वाले ग्राम वनसमितियों के मानसेवी चौकीदारों के हवाले होती हैं। इन मानसेवी चौकीदारों को कांट्रैक्ट बेसिस पर रखा जाता है जिन्हे मात्र 2500 के आसपास की प्रतिमाह की पेमेंट दी जाती है। कई मर्तबा इस पेमेंट देने मे भी देरी होती है। कई बार नहीं बल्कि यदि देखा जाये तो हमेशा ही 2500 रुपये मात्र दी जाने वाली यह पेमेंट इन वनकर्मियों को साल मे अथवा छह माह मे एक बार दी जाती है। इन मानसेवियों ने यहाँ तक कहा की शासकीय नौकरी करने वाले नियमित अधिकारी कर्मचारी इनका शोषण करते हैं और आवश्यकता से ज्यादा काम लेते हैं। इनकी पेमेंट मे भी कटौती कर ली जाती है। समय पर तो कभी भी पेमेंट नहीं दी जाती।

      अतः चूंकि मानसेवी कर्मचारी पूरी तरह से शोषित हो चुके हैं उनका भी मनोबल गिरा हुआ रहता है और वन की सुरक्षा जैसे जुमलों से थक चुके होते हैं। लोगों का कहना होता है की नियमित मुंशी, चौकीदार, डेप्युटी रेंजर और रेंजर कभी भी जंगली क्षेत्र का दौरा नहीं करते। जब इन्हे दबाब देकर किसी वन अपराध की जानकारी दी जाती है तब जाकर इनके कानों मे जू रेंगती है। और यदि सही मायनों मे देखा जाये तो आज जंगल की जो दुर्दशा हो रही है मात्र उसके पीछे वनविभाग के नियमित और सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों की अकर्मण्यता और भष्ट्राचार ही जिम्मेदार है। अब इससे ज्यादा क्या सबूत दिये जा सकते हैं की आँख के आगे होते हुये वन अपराधों को दिखाने पर और पकड़वाने पर भी और पूरे विडियो फोटो के साथ उपलब्ध करवाने पर भी इन वन अधिकारियों ने कोई कार्यवाही नहीं की।           

      क्या ऐसे निकम्मे वन अधिकारियों कर्मचारियों को मुफ्त का खाया जाने वाला जनता के टैक्स और सरकार का पैसा इन्हे कभी भी पच पाएगा?

      संलग्न – रीवा ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले पनगड़ी बीट के तेदून, नौपथा,मछेहुआ, नादघाट एवं रवार एरिया मे आपराधिक तत्वों द्वारा लगाई गई आग से तहस नहस हुये जंगली परिक्षेत्र का दृश्य।

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शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक, पर्यावरण,एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र।

मोबाइल – 7869992139, 9589152587