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Sunday, July 15, 2018

सिरमौर के सरई बीट जंगल में चल रही धांधली, वृक्षारोपण के नाम पर चल रही औपचारिकता, चेक डैम गायब (मामला ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अन्तर्गत सरई बीट के जंगलों का जहां पर वृक्षारोपण कार्य में अनियमिता, अवैध तरीके से वनों की कटाई, और साथ ही चेक डैम निर्माण में हुई है धांधली)

दिनांक 15 जुलाई 2018, स्थान - सिरमौर वन परिक्षेत्र, रीवा मप्र 

(कैथा श्रीहनुमान मंदिर से, शिवानन्द द्विवेदी)

    कहां से बरसें बदरा, कैसे आये समय पर मानसून. जब जंगल पर्वत और पेंड़ पौधे ही नही रहे तो कैसे बनेगा प्राकृतिक संतुलन और कैसेl जीवित रहेगी हमारी धरती.

    आज जिस प्रकार से निरंतर वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, जंगल पहाड़ को उत्खनन करके उजाड़ा जा रहा है स्वाभाविक है आने वाला समय हमारे लिए काफी मुश्किल होने वाला है.

सिरमौर सहित पूरे ज़िले के वनों में चल रहा वृक्षारोपण 

    जानकारी मिली की सिरमौर वन परिक्षेत्र सहित पूरे ज़िले के जंगलों में आजकल वृक्षारोपण का कार्य किया जा रहा है. इसी बाबत भौतिक धरातल पर स्थिति देखने लालगांव उप वनपरिक्षेत्र के सरई बीट एरिया में जाया गया तो वहां जो देखा गया वह काफी चौकाने वाला मिला. सरई बीट के जंगलों के बीच खाली पड़े लगभग 30 हेक्टेयर के भूभाग में आंवला और शीशम के पेंड़ लगाए जा रहे हैं. यद्यपि इसकी कोई गारंटी नही की इनमे से कोई भी पेंड़ सर्वाइव कर पाएंगे. क्योंकि अभी पिछले दो से तीन सप्ताह से प्रारम्भ हुआ वृक्षारोपण का कार्य चल रहा है गड्ढे खोदे जा रहे हैं बाड़ियाँ लगाई जा रही है लेकिन जो पेंड़ पिछले हफ्ते लगाए गए हैं वह अभी से उजड़ गए हैं, सूख गए हैं. पेड़ों को ठेकेदार द्वारा लगवाया जा रहा है. यह जानकारी नही मिल पायी है की कितने पेंड़ लगाए जा रहे हैं और इसकी लॉगत कितनी है. पेड़ों को लगाने के लिए खोदे गए गड्ढों में न तो कोई खाद डाली गई है और न ही कोई कीटनाशक. सीधे गड्ढों को खोदकर पेड़ों को रख दिया गया है जबकि सिंचाई का तो प्रश्न ही उठता। सवाल यह है कि बिना अच्छी मानसूनी बारिस के कैसे शूखे में वृक्षारोपण किया जा रहा है।

हरे पेंड़ काटकर बनाया बाड़ी

    बता दें की जो देखा गया उसमे किये जा रहे पौधरोपण को सुरक्षित करने की औपचारिकता में आसपास के हरे धवैया के जंगली पेंड़ काटकर लगभग 30 हेक्टेयर की बाड़ी लगाई गई है. जब बीट के मुंसी प्रवीण गौतम से इस विषय में विस्तृत जानकारी चाही गई तो उनके द्वारा बताया गया की इसकी हमे जानकारी नही की कितना बजट आया है लेकिन कार्य ठेकेदार द्वारा करवाया जा रहा है साथ ही जो बाड़ी लगाई जा रही है वह पेड़ों को छांटकर लगाई जा रही है न की काटकर. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा जो देखा गया वह सब अपने कैमरे में कैद कर लिया गया उसमे साफ दिख रहा था की मृत हो चुके और लगाए जा रहे इन पौधों के लिए पहले से ही मौजूद जंगल की हरियाली को किस तरह नष्ट किया जा रहा है. मुंसी प्रवीण गौतम द्वारा जिस प्रकार से बताया गया वैसा तो कुछ भी नही था बल्कि अंधाधुंध तरीके से उपस्थित पेड़ों की जमकर कटाई की गई है और उन्ही धवैया के काटे हुए पेड़ों की बाड़ी लगा दी गई है. इस बात की कोई गारंटी नही की लगाए गए एक भी पेंड़ जीवित रह पाएंगे लेकिन वृक्षारोपण के नाम पर पूरे सरई के जीवित पेड़ों की ऐसी की तैसी तो कर ही दी गई. 

चेक या स्टॉप डैम के नाम पर हुआ भ्रष्ट्राचार

    मात्र बात वृक्षारोपण में अनियमितता तक ही सीमित नही है यहां और भी मामले हैं जिनके कारण वन विभाग हमेशा की तरह कठघरे में है. आखिर गर्मियों में चेक अथवा स्टॉप डैम के नाम पर किया जाने वाला हर वर्ष के कार्य का क्या होता है? कहाँ चले जाते हैं चेक डैम के पत्थर? क्या वास्तव में यह कार्य होता भी है की बस सब कागजों में ही चलता है. 

     सिरमौर के सरई बीट एरिया में मानसेवी सुरक्षा वन कर्मियों बाबूलाल यादव एवं दसरथ यादव के साथ भ्रमण के दौरान पाया गया की इन दोनो मानसेवियों के अतिरिक्त अन्य कोई भी जंगल विभाग का कर्मचारी मौजूद नही था. जानकारी मिली की काम तो यहां कुछ न कुछ हर वर्ष होता है लेकिन सुरक्षा कर्मियों के अभाव में आसपास के रसूखदार अपने ट्रेक्टर ट्राली में सब भर ले जाते हैं.

    जब यह पूंछा गया की आखिर आप लोग भी तो समितियों के माध्यम से तैनात किये गए वन सुरक्षा कर्मी ही तो हैं तो उनके द्वारा बताया गया की हम मात्र नाम के सुरक्षा कर्मी हैं यहां हमारी कुछ नही चलती. वन समिति के सचिवों मुंसियों के द्वारा हमारी डेढ़ दो साल से पेमेंट रोककर रखी गई है. मुंसी रेंजर कहते हैं की हमे पेमेंट ही नही मिलेगी तो हम क्या करें? क्या हम मुफ्त में काम करते रहें? फिर भी हम दिन में भ्रमण करते रहते हैं और प्रयाश कर रहे हैं की कोई जंगल को नुकसान न पहुचा पाए. लेकिन जब भी हम कार्यवाही करवाते हैं तो मुंसी और डिप्टी रेंजर पैसे लेकर छोंड़ देते हैं तो हम क्या करें.

मानसेवियों की 2 साल से नही मिली पेमेंट

   जंगल विभाग में ग्राम वन समितियों के माध्यम से कार्यरत मानसेवी वन सुरक्षा कर्मियों की 2 साल से पेमेंट नही मिली है. मानसेवी दसरथ यादव, बाबूलाल यादव, कौशल यादव आदि द्वारा बताया गया की उनकी 2 वर्षों से रुकी हुई 3 हज़ार प्रतिमाह की पेमेंट नही दी जा रही है जबकि सभी ने नियमित रूप से कार्य किया हुआ है. पनगड़ी ग्राम वन समिति के राघुवेन्द्र पांडेय एवं रामसिया साकेत द्वारा भी बताया गया की उनकी भी 2 वर्षों के कोई पेमेंट नही मिली है जबकि सभी वनकर्मी नियमित कार्य कर रहे हैं. 

    बता दें की रीवा ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र के विभिन्न बीटों की ग्राम वन समितियों में कार्य कर रहे दर्जनों मानसेवी चौकीदारों की पेमेंट को वर्षों से नही दिया गया है जिसकी वजह से उनके परिवार के लिए भी भीषण समस्या की स्थिति निर्मित हो चुकी है. उनके अनुसार उनका परिवार दानों दानों के लिए मोहताज़ हो रहे हैं. इस बाबत सभी मानसेवियों ने व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से भी शिकायतें और आवेदन भी संबंधित वन विभाग के अधिकारियों के समक्ष रखा है लेकिन अब तक कोई सुनवाई नही हो रही है. जब इसके विषय में रेंजर, एसडीओ एवं डीएफओ से बात की गई तो उनके द्वारा बताया गया की यह कार्य समितियों का है की किसे रखें और किसे न रखें साथ ही चौकीदारों की पेमेंट भी समितियों के माध्यम से होता है. जिन जिन समितियों का गठन हर पांच वर्ष में नही हो रहा है उनके चौकीदारों को कार्य करने के वावजूद भी पेमेंट संबंधी समस्या का सामना करना पड़ रहा है. इस बाबत सभी मानसेवी चौकीदारों ने एक स्वर में कार्यवाही की आवाज़ उठाई है.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें -

  1) रीवा सिरमौर के जंगलों में सरई बीट वन क्षेत्र में औपचारिकता के तौर पर हो रहा वृक्षारोपण का कार्य.

   2) सरई बीट के जंगलों की कटाई की फ़ोटो.

    3) बनाये गए चेक और स्टॉप डैम की फ्लॉप स्थिति को बयान करते टूटे आउर उखड़े चेक डैम.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Wednesday, May 30, 2018

मानसेवियों के खून-पसीने पर पल रहा वन विभाग (मामला ज़िले के सभी रेंज में आने वाले ग्राम वन समितियों के मानसेवी चौकीदारों की सालों से रोक कर रखी गयी पेमेंट पर, जबकि वन संपदा की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मात्र 3 हज़ार प्रतिमाह पाने वाले इन्ही मानसेवियों के कंधों पर ही टिकी है)

दिनांक 30 मई 2018, स्थान - गढ़/गगेव, रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   प्रदेश में प्रत्येक जिलान्तर्गत ग्राम स्तर पर गठित की गई वन समितियों की स्थिति दयनीय हो चली है. 

    प्राप्त जानकारी के अनुसार ग्राम वन समितियों द्वारा मनोनीत किये गए मानसेवी चौकीदारों की सालों से पेमेंट रोक कर रखी गई है. जबकि देखा जाए तो पूरे जंगल की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदारों के ही कंधों पर है.

  सर्रा ग्राम वन समिति के चौकीदारों की व्यथा

    सर्रा ग्राम वन समिति में पदस्थ मानसेवी चौकीदारों दद्दू सिंह एवं अयोध्या केवट द्वारा बताया गया की उनकी 6 माह से अधिक समय से मात्र 25 सौ अथवा 3 हज़ार रुपये मिलने वाली मासिक तनख्वाह उन्हें नही मिल रही है जबकि इस बाबत शिकायत कई मर्तबा डीएफओ सहित अन्य उच्चधिकारियों तक की गई है.

रुझौही ग्राम वन समिति के मानसेवियों की रोकी पेमेंट

   ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले रुझौही ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदारों जैसे दसरथ यादव द्वारा बताया गया की वह समिति में वर्ष 2002 से मानसेवी चौकीदार के रूप में कार्यरत हैं. प्रारम्भ में ग्राम वन समिति के चौकीदारों की पेमेंट 900 रुपये प्रतिमाह थी बाद में धीरे धीरे बढ़कर अब 3 हज़ार रुपये प्रतिमाह हो चुकी है. मानसेवी दिलीप मिश्रा द्वारा बताया गया की वह ग्राम वन समिति में पिछले 5 वर्ष से पदस्थ हैं. प्रारम्भ में दिलीप मिश्रा को 15 सौ रुपये प्रतिमाह दिए जाते थे. मानसेवी दसरथ यादव  द्वारा बताया गया की उन्हें मई 2017 से लेकर मई 2018 तक पूरे 13 माह उन्हें कोई पेमेंट नही दी गई है. मानसेवियों का कहना है की वन समिति यदि उनसे काम नही लेना चाहती तो उसे लिखित सूचना और कारण सहित बताना चाहिए जिससे मानसेवी अपनी रोजी रोटी के लिए आगे प्रयास करें. वन विभाग और वन समिति द्वारा मानसेवी चौकीदारों का निरंतर शोषण किया जा रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार पता चला की रुझौही ग्राम वन समिति में अर्चना सिंह अध्यक्ष हैं और सहसचिव पंकज सिंह हैं. इनसे प्राप्त जानकारी के अनुसार रुझौही वन समिति में पिछले 2 माह पहले तक समिति के खाते में लगभग ढाई लाख रुपये तक था लेकिन जब मानसेवी चौकीदारों को उनका मेहनताना देने की बात आती है तो बताया जाता है की समिति के खातों में पैसे ही नही है.

सरई ग्राम वन समिति के मानसेवी चैकीदारों के मानवाधिकारों का हो रहा हनन  

  सरई ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदारों की भी स्थिति दूसरी अन्य समितियों जैसी ही बनी हुई है. सरई ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार बाबूलाल यादव द्वारा बताया गया की चौकीदार के तौर पर वर्ष 1999 से अपनी सेवा दे रहे हैं. बाबूलाल यादव द्वारा बताया गया की उन्हें भी मई वर्ष 2017 से लेकर अब तक पूरे 13 माह की 3 हज़ार रुपये के हिसाब से 39 हज़ार रुपये की पेमेंट रोक कर रखी गई है जबकि उनके बच्चे भूंखे मर रहे हैं. सरई ग्राम वन समिति की अध्यक्ष शशि सिंह पति लक्ष्मीनारायण सिंह हैं जबकि सहसचिव एवं चौकीदार को गोपनीय तौर पर रखे गए हैं जो अध्यक्ष के फेवर के हैं और बताया गया कि कुछ ऐसे कर्मचारी बिना काम के ही माल उठा रहे हैं।

क्योटी ग्राम वन समिति के मानसेवियों की स्थिति

   क्योटी ग्राम वन समिति के अध्यक्ष बैद्यनाथ तिवारी हैं. सहसचिव उनके भाई संतोष तिवारी को रखा गया है. जबकि संतोष तिवारी का एक अन्य भाई चौकीदार के पद पर है जिससे कार्य में घोलमोल चल रहा है जिसके कारण समिति के कार्य प्रभावित हो रहे हैं.

    क्योटी क्षेत्र में वन संपदा और वन संबंधी खनिज संपदा का निरंतर दोहन किया जा रहा है लेकिन इस बात पर वन विभाग अज्ञान बना हुआ है कोई कार्यवाही नही की जा रही है. सबकी मिलीभगत से पूरे वन क्षेत्र में माफिया कब्जा किये हुए है और पूरे जंगली क्षेत्र की ऐसी की तैसी कर दी है. 

ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदारों की पेमेंट रोके जाने से वन संपदा को बना खतरा 

   आज पूरे रीवा ज़िले और यहां तक की पूरे प्रदेश में मात्र 3 हज़ार रुपये मासिक तनख्वाह पाने वाले ग्राम वन समितियों के मानसेवी चौकीदारों की पेमेंट को जिस प्रकार से वर्षों से रोक कर रखा गया है इससे साफ जाहिर है की वन संपदा की सुरक्षा सही तरीके से नही हो पाएगी. क्योंकि मानसेवी चौकीदार अपने घर परिवार की रोजी रोटी और गृहस्थी की व्यवस्था करेगा की मुफ्त में जंगल की निगरानी करेगा. फिर भी देखा जाय तो इस आशा के साथ की आज नही तो कल इन मानसेवियों को रुकी हुई पेमेंट मिलेगी अभी भी सभी मानसेवी कर्मी अपने अपने कार्य में मुस्तैद हैं.

जंगल की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मात्र 3 हज़ार प्रतिमाह पाने वाले मानसेवी चौकीदारों के बलबूते

    अब हाल यह है की पूरे ज़िले में जबकि मुंसी एवं वन रक्षकों की हड़ताल चल रही है वन में कहीं आग लग रही है तो कहीं अवैध कटाई हो रही है तो कहीं जंगल में अवैध परिवहन हो रहा है तो कहीं जंगली जानवरों का शिकार हो रहा है ऐसे में मात्र जंगलों की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी वर्षों से कार्यरत और वर्षों से रुकी पेमेंट के वावजूद भी निरंतर काम करने वाले ग्राम वन समितियों के मानसेवी चौकीदारों के ही बलबूते है.     

  सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा वन अपराध रोकने को लेकर मुहिम

    इस बाबत देखा जाए तो पिछले कई वर्षों से रीवा सर्किल के अंदर और विशेषतौर पर सिरमौर वन परिक्षेत्र में हो रहे वन अपराध की निरन्तर निगरानी की जा रही है जिसकी शिकायतें समय समय पर सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा सीएम हेल्पलाइन मप्र शासन से लेकर वन मंत्रालय नई दिल्ली एवं क्षेत्रीय फारेस्ट कार्यालय भोपाल सहित स्थानीय स्तर पर ज़िले में वन मंडलाधिकारी, मुख्य वन संरक्षक, एवं उप वन मंडलाधिकारी आदि तक की जाती रही है लेकिन मात्र कागज़ी कोरम पूर्ति और आश्वासन के अतिरिक्त कहीं कुछ हुआ नही है. 

बारी ही खा रही खेत

   सही मायनों में यदि देखा जाए तो आज बारी ही खेत खा रही है. जिस वन विभाग को वन संपदा की सुरक्षा के लिए रखा गया है वह स्वयं ही वन संपदा को नष्ट कर रहा है. वन परिक्षेत्र के नियमति सरकारी अधिकारी कर्मचारी जैसे रेंजर, डिप्टी रेंजर, मुंसी आदि माफियाओं से सीधे मिले होते हैं और कमीशन का खेल खेल रहे हैं. कई मर्तबा सामाजिक कार्यकर्ता के समक्ष ही यह बात आई है जब रंगे हांथों वन मफ़िया के गिट्टी पत्थर से भरी अवैध ट्रेक्टर ट्राली पकड़ी गई लेकिन कोई सार्थक कार्यवाही नही हुई. इसी प्रकार कई मर्तबा अवैध शिकार और अवैध वनों की कटाई के भी मामले रखे गए लेकिन सभी में मात्र कोरम पूर्ति ही हुई कहीं कोई सार्थक कार्यवाही नही हुई. होता क्या है की जो नियमति अधिकारी कर्मचारी हैं वह वन माफियाओं से मिलकर लेन देन कर मामलों को रफा दफा कर देते हैं जबकि मानसेवी चौकीदार अपनी जान को जोखिम में डालकर अपने ही ग्राम और और आसपास के अवैध कार्य में संलिप्त लोगों से पंगा ले लेते हैं. ऐसे में जहां अपने ही लोकल लोगों से उन्हें एक दीर्घकालीन दुश्मनी की गुन्जाईस बनी रहती है वहीं दूसरी तरफ नियमित वन अधिकारियों की नमकहरामी की वजह से इन बेचारे मानसेवी चौकीदारों की सामाजिक तौर पर भी भर्तस्ना का शिकार होना पड़ता है जबकि माफिया किश्म के लोग धौस भी जमाते कहते हैं की चलो चले थे कार्यवाही करवाने और हुआ कहीं कुछ नही. 

मानसेवियों की पेमेंट बनाने वास्ते माग रहे पैसा

  आज कितनी बड़ी विडंबना है की भ्रष्ट्राचार का आलम यह है की व्यक्ति आज अपने जमीर को भी बेंच देने में पीछे नही हट रहा है. मात्र 3 हज़ार रुपए मासिक तनख्वाह पाने वाले ग्राम वन समितियों के मानसेवी चौकीदारों की पेमेंट बंनाने के लिए बाउचर रोक कर रखे गए हैं. पेमेंट बनाने के लिए मानसेवियों से घूस की माग की जा रही है. ग्राम वन समितियों रुझौही, सरई आदि के उपस्थित मानसेवी चौकीदारों द्वारा बताया गया की उन्हें यह कहा जा रहा है की कुछ खर्चा दो तो बाउचर आगे बढ़ाएं बिना खर्चे के कुछ नही होता. बताया गया की इसमे ऊपर तक शेयर बंधा रहता है और डिप्टी और अन्य अधिकारियों को भी देना पड़ता है अतः जब तक ऊपर का खर्चा नही मिलेगा तब तक पेमेंट नही बन पाएगी.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें की रीवा ज़िला अंतर्गत आने वाले सिरमौर वन परिक्षेत्र के रुझौही और सरई ग्राम वन समिति के मात्र 3 हज़ार रुपये मासिक पाने वाले उपास्थित मानसेवी चौकीदार जिनकी पेमेंट आज पिछले वर्षों से रुकी हुई है. मानसेवी चौकीदारों के नाम क्रमशः - 1) दसरथ यादव पिता दीनदयाल यादव 2) दिलीप कुमार मिश्रा पिता मोहन लाल मिश्रा 3) बाबूलाल यादव पिता श्रीरामगोपाल यादव.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र

मोबाइल - 07869992139, 09589152587  

Monday, April 16, 2018

वन समिति के मानसेवियों के मान का कोई नही सम्मान, इनकी सालों से नही मिली पेमेंट (मामला ज़िले की सिरमौर रेंज अंतर्गत आने वाली पनगड़ी, देउर, सर्रा, घुमा सहित ज़िले की सैकड़ों वन समितियों का)

दिनांक 16 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा मप्र - शिवानन्द द्विवेदी)

     ज़िले में एक बार फिर वन विभाग में कार्यरत मानसेवी कर्मचारियों के शोषण का मामला प्रकाश में आया है. अभी पिछले दिनों पनगड़ी ग्राम वन समिति के 25 सौ रुपये मात्र पाने वाले मानसेवी चौकीदारों रामसिया साकेत एवं राघुवेन्द्र पांडेय निवासी पनगड़ी द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी के समक्ष अपनी व्यथा रखी गई थी की उनकी पिछले 14 माह के पेमेंट लंबित है.

    अभी पुनः वही समस्या सर्रा ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार अयोध्या प्रसाद केवट द्वारा बताई गई है जिसमे बताया गया की अयोध्या को मई जून और जुलाई 2017 की पेमेंट अब तक लटका के रखा गया है. अयोध्या ने आगे बताया की साहब बताईये हमे रोज का 100 रुपये से भी कम मिलता है और हमारे बाल बच्चे भूखे मर रहे हैं. वन अधिकारी कहते हैं की काम करो. अब ऐसे में कैसे काम होगा. 

   इसी प्रकार एक अन्य मामले में देउर और घूमा वन समिति के भी मानसेवियों ने अपनी समस्या रखी है और बताया गया की उन्हें भी पिछले 2 साल से मात्र 25 सौ की दी जाने वाली पेमेंट नही दी गई है. देउर वन समिति के पिछले पंचवर्षीय में रह चुके अध्यक्ष दिलीप सिंह ने बताया की उनके समिति के कर्मचारी मथुरा सिंह को पिछले दो साल से पेमेंट नही दी गई है.

   बिना चुनाव ही चल रही  पनगड़ी और देउर वन समिति 

    प्राप्त जानकारी के अनुसार बताया गया की पनगड़ी और देउर वन समिति का चुनाव पिछले 15 वर्ष से नही हुआ है. जो पूर्व के समिति अध्यक्ष थे वही जबरन पद पर बने हुए हैं. इस संबंध में जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा वन विभाग के रेंजर और डीएफओ से जानकारी चाही गई और साथ ही सीएम हेल्पलाइन में भी कंप्लेन दर्ज करवाई गई तो उसके निराकरण में बड़ा ही अजीब जानकारी दी गई जिसमे कहा गया की वन विभाग ने तो अपनी प्रक्रिया पूर्ण कर दी है मात्र पंचायतें ही चुनाव नही करवा रही हैं. अब  इसी खेल में वन समिति का चुनाव पिछले 15 वर्षों से लटका पड़ा है. गौरतलब है की सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाली वन समितियों में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद के चलते पूरा वन एवं पर्यावरण समाप्ति की कगार पर है. जंगल की रखवाली का जिम्मा जिन महानुभावों के सर पर है वह मात्र 25 सौ रुपया पाने वाले ग्राम वन समिति के मानसेवी हैं अन्यथा जो नियमित चौकीदार मुंसी और डिप्टी आदि हैं वह तो बन्द वातानुकूलित कमरों और घरों में ऐश फर्मा रहे होते हैं.

लाल गांव उप वन परिक्षेत्र का डिप्टी रेंजर बृजभूषण रहता है अनुपस्थित, सिरमौर रेंजर बघेला ने काट दी उसकी तीन माह की पेमेंट-

    मात्र इसी भररेशाही के चलते अभी हाल ही में दौरे के दौरान सिरमौर रेंज अफसर बघेला ने लालगांव उप वन परिक्षेत्र के अधिकारी कर्मचारियों की पेमेंट काट दी और तीन महीने तक वंचित कर दिया. जिसकी की शिकायत रीवा की स्टाइल में यह सभी लोकल वन कर्मचारी अधिकारी नेताओं से करते घूम रहे हैं, प्राप्त जानकारी में बताया गया की यह सभी नियमित और सरकारी अधिकारी कर्मचारी जिनकी पेमेंन्ट काट दी गई है वह विधायक, सांसद और मंत्रियों से जोर जुगुत लगाने में लगे हैं और खूब सिफारिश करवा रहे हैं. लेकिन चूंकि बाघेला ने इन सबको अनुपस्थित पाया तो इन सबको लटका दिया और तीन महीने की इनकी पेमेंट को ही काट दिया. 

    यह बिल्कुल उचित भी है चूंकि जब सिरमौर वन रेंज में आग लगी थी तब भी यह सरकारी और नियमित अधिकारी कर्मचारी अपने काम में नही थे. जब आग ने पूरे जंगली क्षेत्र का पूरी तरह से सफाया कर दिया तब जाकर इनका रता पता चला. 

    इस प्रकार अनुशासनहीनता और अनुपस्थिति इनका पेशा है. कई मर्तबा तो कई बार डीएफओ और एस डी ओ आदि को इन्होंने गालियां तक दी है और कहा है की कर लें जिसको जो करना है हम तो ऐसे ही करेंगे.

   इस प्रकार समझा जा सकता है की वन विभाग की भररेशाही इतनी बढ़ गई है की इनके ऊपर किसी कार्यवाही का प्रभाव ही नही पड़ रहा है. 

    ऐसे में यदि मात्र 25 सौ रुपये पाने वाले मानसेवी वन चौकीदारों की पेमेंट भी सालों साल नही मिलेगी तो वन की सुरक्षा व्यवस्था मात्र भगवान भरोसे ही चलेगी.

संलग्न - 1) सिरमौर रेंज अंतर्गत आने वाले पनगड़ी वन समिति के दो मानसेवी चौकीदार रामसिया साकेत और रागावेंद्र पांडेय की फ़ोटो.

  2) सिरमौर रेंज में ही देउर वन समिति के अध्यक्ष दिलीप सिंह और मथुरा सिंह की फ़ोटो. मथुरा को 2 साल से पेमेंट नही मिली.

   3) सर्रा ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार अयोध्या केवट की फ़ोटो जिसे मई जून जुलाई महीने की पेमेंट नही मिली है।

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, 

मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Sunday, April 1, 2018

वन अपराध की आग ने खाक कर दिया सिरमौर (पनगड़ी ) का जंगल

दिनांक 01 अप्रैल 2018,

स्थान – तेंदून/नौपथा जंगली क्षेत्र से, सिरमौर वन परिक्षेत्र रीवा मप्र,

(कैथा, शिवानंद द्विवेदी)

      गर्मी आते ही ज़िले के वन परिक्षेत्र मे जंगली आग का सिलसिला एक बार फिर चल पड़ा है। अभी हाल ही मे डभौरा वन परिक्षेत्र मे आग लगाए जाने की खबर कुछ ही दिनों पूर्व रीवा से प्रकाशित होने वाले प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय अखबारों मे आई थी।

गौहत्या के लिए कुख्यात पनगड़ी बीट के जंगलों मे फिर लगाई गई आग

      अभी पिछले एक सप्ताह से सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले कुख्यात पनगड़ी बीट के जंगलों मे भी एक बार फिर दावानल ने भीषण रूप ले लिया है। खबर थी की त्योंथर और जनकहाई क्षेत्र से घाट के ऊपर पश्चिम क्षेत्र से पिछले सप्ताह आग ऊपर की ओर आ रही है जिस पर वन विभाग काबू पाने मे असफल रहा जो आगे बढ़कर पनगड़ी के जंगलों मे आ गई जिससे तेदून, नौपथा, मछेहुआ के जंगलों तक बढ़ते हुये नादघाट और रवार एरिया तक पहुच गई। जब आग रवार क्षेत्र के पास पहुची और रहवाशी एरिया मे आने लगी तब जाकर लोगों ने हल्ला गुल्ला मचाया और तब जाकर लालगाँव उप-वनपरिक्षेत्र के डेप्युटी रेंजर तिवारी और इनके कुछ मुंसी चौकीदारों और अन्य कर्मचारियों ने आग पर काबू करने के नाकाफी प्रयास किए।

केचुआ पंचायत निवासी कल्लू आदिवाशी को थी आग लगने की जानकारी

      त्योंथर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले केचुआ पंचायत के निवासी कल्लू आदिवाशी का कहना है की यह आग आज से महीनों पहले से लगी हुई है जिसकी जानकारी लालबिहारी सिंह डेप्युटी रेंजर त्योंथर को थी। कल्लू आदिवाशी और उसका परिवार तेदून के जंगलों के बीच निवास करता है साथ ही पैरा ग्राम का पुस्तईनी निवासी भी है। कल्लू आदिवाशी ने बताया की जंगल के बीचोबीच उसकी पट्टे की जमीन है। यह जमीन उसके पट्टे मे कैसे आई यह बिलकुल स्पष्ट नहीं है। 

डेप्युटी रेंजर त्योंथर लालबिहारी सिंह को बिंझन मे लगी आग की थी जानकारी

      केचुआ निवासी कल्लू आदिवाशी द्वारा बताया गया की आज से 15 दिन पूर्व जब पनगड़ी के जंगल अंतर्गत आने वाले बिंझन महादेव मंदिर के पास आग लगी थी और जंगल धू धू करके जल रहा था तब उसी समय डेप्युटी रेंजर त्योंथर लालबिहारी सिंह ने एक ट्रैक्टर से भरी गिट्टी पत्थर जंगली क्षेत्र से पकड़ी हुई थी और जिस जगह आग लगी थी वहीं से ट्रैक्टर लेकर निकले थे तब कैसे संभव है की लालबिहारी सिंह ने इस आग को विभाग को सूचित नहीं किया। जब आग बिंझन के जंगलों से बढ़ती हुई घाट के ऊपर तेदून, नौपथा से होते हुये नादघाट तक पहुच गई तब जाकर वन विभाग सिरमौर के पदस्थ रेंजर,डेप्युटी रेंजर और अन्य कर्मचारियों की आँख खुली।

जंगल मे आग के पीछे महुआ बीनने वालों पर लगाया गया आरोप

      इस आग लगने के पीछे जिम्मेदारों मे जंगली क्षेत्रों मे घुस कर रात दिन बराबर महुआ बीनने वालों को दोषी बताया जाता है। बताया गया की महुआ बीनने आने वाले लोग खर-पतवार और पत्तों मे आग लगा देते हैं जिससे महुआ के पेंड के नीचे के पत्ते और कचड़ा जल जाता है इस प्रकार फिर आराम पूर्वक महुआ बीनने के काम करते हैं।

अनुविभागीय अधिकारी एस पी एस गहरवार ने यूपी पुलिश को डभौरा आग के लिए जिम्मेदार ठहराया था

      अभी हाल ही पिछले दिनों प्रकाश मे आए इसी प्रकार के एक अन्य घटना क्रम मे ज़िले मे पदस्थ अनुविभागीय अधिकारी वनविभाग एस पी एस गहरवार ने यूपी पुलिश के मत्थे ठीकड़ा मढ़ दिया था और बताया था की चोर डकैत तलाशने के लिए यूपी पुलिश ने आग लगाई होगी।

      ऐसे यदि बयानवाजी की गई तो किसी को भी आग लगाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है परंतु जब हर वर्ष के यही हाल हैं की गर्मी आते आते रीवा के जंगलों का सत्यानाश होने लगता है तो विभाग सो क्यों रहा होता है? आखिर इस वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी किस बात के लिए पेमेंट पाते हैं। आज कोई भी जाये तो यह ज़्यादातर अधिकारी अपने वातानुकूलित कारों और कमरों मे पड़े ज़िंदगी के आनंद ले रहे होंगे,इनके लिए वन और पर्यावरण जाये भाड़ मे। क्योंकि यदि यही किस्सा नहीं होता तो जब हर वर्ष आग लगती है तो ये अपने कर्मचारियों को पहले से मुस्तैद क्यों नहीं करते? मानते हैं की महुआ बीनने वाले और दूसरे अपराधी लोग ऐसे घटनाक्रम को अंजाम देते होंगे पर सालों साल यही चल रहा है तो पूरे जंगलों की बाउंडरी को सील क्यों नहीं कर दिया जाता? महुआ जंगल की संपत्ति है किसी की बपौती तो नहीं। अब यदि महुआ की शराब भी पीएंगे और जंगल का सत्यानाश भी करेंगे तो ऐसे लोगों को जंगली एरिया मे घुसने क्यों दिया जाय?

रीवा वन विभाग की सह से ही होते हैं ज़्यादातर वन अपराध

      सही मायनों मे देखा जाये तो जो भी वन अपराध आज हो रहे हैं सब वन विभाग की जानकारी मे रहते हैं। वन विभाग के अधिकारी मात्र अंजान बनने का नाटक भर करते हैं। और तो और कितने तो ऐसे वन अपराध हैं जो सीधे इनके सज्ञान मे लाया जाता है परंतु फिर भी ले दे कर यह मामले को रफा दफा कर देते हैं और कोई दंडात्मक कार्यवाही की पहल नहीं करते। अभी जब भलघटी और पनगड़ी मे सैकड़ों गोवंशों को घाट के नीचे मौत का घाट उतारा गया था तो क्या वन विभाग के कर्मचारियों अधिकारियों को यह जानकारी नहीं रही होगी? जब यह गोहत्या की वारदात पिछले कई महीने से निरंतर की जा रही थी तो वन विभाग ने इस पर कार्यवाही क्यों नहीं किया? इसी प्रकार इसी घटना क्रम के दौरान अवैध तरीके से कार्य कर रहे क्रशर के पास पनगड़ी मे भी एक जंगली सूअर को मार कर उसे पकाया जाकर भूनकर खाया गया था जिसके पूरे ढांचे सहित कंकाल पाया गया था और सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा यह सभी घटनाक्रम वन मंडलाधिकारी, मुख्य वनसंरक्षक से लेकर अनुविभागीय अधिकारी और रेंजर डेप्युटी रेंजर सभी को बताया गया था। पूरी विडियोग्राफी की गई थी सभी की फोटो मीडिया और अन्य माध्यमों से भेजी गई थी परंतु वनविभाग अब तक सचेत नहीं हुआ। ऐसी घटना इनके रोज के कार्यप्रणाली मे सम्मिलित है जिस पर शिकायतों के बाद मात्र खानापूर्ति होती है।

पनगड़ी जंगल अग्निकांड का कौन है जिम्मेदार?

      अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है की इस प्रकार के आपराधिक घटनाक्रम का कौन जिम्मेदार है? किसने पनगड़ी और बिंझन के जंगलों मे आग लगाई है? चूंकि हर वर्ष का यही किस्सा है और महुआ बीनने के समय ही होता है अतः महुआ बीनने वालों को प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? क्या वन पर्यावरण की सुरक्षा से ज्यादा महुआ और महुआ की शराब महत्वपूर्ण है?

तेंदुपत्ता तोड़ाई के समय भी जंगलों को पहुचाया जाता है भारी नुकसान

      एक तरफ तो सरकारें नासामुक्ति की बातें करेंगी और दूसरी तरफ बीड़ी पीने के लिए तेंदू पत्ता तोड़वाने लिए सरकारी ठीके देंगी, इसमे कौन सा लॉजिक है? क्या राजस्व इकठ्ठा करने का इन सरकारों के पास और कोई दूसरा तरीका नहीं? तेंदू के पेड़ों मे शाखकर्तन का कार्य किया जाता है जिसमे शाखकर्तन के नाम पर भी जंगलों का सफाया किया जाता है। यद्यपि नियमावली मे भी शाखकर्तन मे तेंदू की ऐसी शाखाओं को काटा जाता है जो काफी पतली होती हैं परंतु शाखकर्तन मे मोटी-मोटी डालियों को काट दिया जाता है जिससे तेंदू के पेड़ों की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है। तेंदूपत्ता के नाम पर इसी गर्मी के समय जमकर पेड़ों की अवैध कटाई भी की जाती है और बहाना तेंदूपतों का बताया जाता है। आज जबसे सरकारी तौर पर तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य होने लगा तब से जंगली पेड़ों की ऐसी की तैसी हो गई है। यदि तेंदूपत्ता संग्रहकर्ताओं को देखा जाये तो उसी समय तेंदू और दूसरे सेधा छिवला वगैरह की हरी लकड़ी की जमकर कटाई भी होती है। यह सब स्वयं सिद्ध है क्योंकि पहले भी इस बात को कई बार सीएम हेल्पलाइन और अन्य माध्यमों से उठाया जाता रहा है।

रीवा के जंगलों की सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी मात्र 2500 रुपये प्रतिमाह पाने वाले वन समितियों के मानसेवियों के ऊपर

      वन विभाग जंगल की सुरक्षा संबंधी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेता। जब भी कोई वन अपराध की जानकारी संबंधितों को प्रेषित की जाती है तो उसे गलत निराकरण देकर रफा दफा किया जाता है। वन विभाग के ज़्यादातर कर्मचारी अधिकारी अपने घर और कार्यालय मे ही आराम फरमाना पसंद करते हैं। ऐसा बहुत ही कम होता है की कोई भी नियमित वन कर्मचारी अधिकारी कभी भी जंगली क्षेत्र मे भ्रमण करने आया हो। जब बहुत बार शिकायतें की जाती हैं तब कहीं जाकर आते हैं। आम तौर पर यह देखा गया है की वन की सुरक्षा की ज़्यादातर ज़िम्मेदारी साल भर मे मात्र एक बार बमुस्किल तंख्वाह पाने वाले ग्राम वनसमितियों के मानसेवी चौकीदारों के हवाले होती हैं। इन मानसेवी चौकीदारों को कांट्रैक्ट बेसिस पर रखा जाता है जिन्हे मात्र 2500 के आसपास की प्रतिमाह की पेमेंट दी जाती है। कई मर्तबा इस पेमेंट देने मे भी देरी होती है। कई बार नहीं बल्कि यदि देखा जाये तो हमेशा ही 2500 रुपये मात्र दी जाने वाली यह पेमेंट इन वनकर्मियों को साल मे अथवा छह माह मे एक बार दी जाती है। इन मानसेवियों ने यहाँ तक कहा की शासकीय नौकरी करने वाले नियमित अधिकारी कर्मचारी इनका शोषण करते हैं और आवश्यकता से ज्यादा काम लेते हैं। इनकी पेमेंट मे भी कटौती कर ली जाती है। समय पर तो कभी भी पेमेंट नहीं दी जाती।

      अतः चूंकि मानसेवी कर्मचारी पूरी तरह से शोषित हो चुके हैं उनका भी मनोबल गिरा हुआ रहता है और वन की सुरक्षा जैसे जुमलों से थक चुके होते हैं। लोगों का कहना होता है की नियमित मुंशी, चौकीदार, डेप्युटी रेंजर और रेंजर कभी भी जंगली क्षेत्र का दौरा नहीं करते। जब इन्हे दबाब देकर किसी वन अपराध की जानकारी दी जाती है तब जाकर इनके कानों मे जू रेंगती है। और यदि सही मायनों मे देखा जाये तो आज जंगल की जो दुर्दशा हो रही है मात्र उसके पीछे वनविभाग के नियमित और सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों की अकर्मण्यता और भष्ट्राचार ही जिम्मेदार है। अब इससे ज्यादा क्या सबूत दिये जा सकते हैं की आँख के आगे होते हुये वन अपराधों को दिखाने पर और पकड़वाने पर भी और पूरे विडियो फोटो के साथ उपलब्ध करवाने पर भी इन वन अधिकारियों ने कोई कार्यवाही नहीं की।           

      क्या ऐसे निकम्मे वन अधिकारियों कर्मचारियों को मुफ्त का खाया जाने वाला जनता के टैक्स और सरकार का पैसा इन्हे कभी भी पच पाएगा?

      संलग्न – रीवा ज़िले के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले पनगड़ी बीट के तेदून, नौपथा,मछेहुआ, नादघाट एवं रवार एरिया मे आपराधिक तत्वों द्वारा लगाई गई आग से तहस नहस हुये जंगली परिक्षेत्र का दृश्य।

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शिवानंद द्विवेदी, सामाजिक, पर्यावरण,एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र।

मोबाइल – 7869992139, 9589152587