*रीवा के रोझौही में न्यूक्लियर पावर प्लांट की राह मुश्किल: अनापत्ति प्रमाण पत्र पर उठे सवाल, वन अधिकार पट्टों ने खड़े किए गंभीर मुद्दे//*
*टाटा पावर प्रोजेक्ट पर संकट: रोझौही में एक तरफ प्रशासन की एनओसी, तो दूसरी तरफ आदिवासियों के वन अधिकार पट्टों ने उलझाया मामला//*
*एनओसी की शर्त और ज़मीनी हकीकत: क्या रोझौही भूमि विवाद के चलते स्वतः निरस्त हो जाएगी न्यूक्लियर प्लांट की अनुमति?//*
*रोझौही न्यूक्लियर पावर प्लांट: पट्टों और एनओसी के बीच फंसा प्रोजेक्ट//*
*रीवा: प्रस्तावित न्यूक्लियर प्लांट साइट पर वन अधिकार पट्टों का पेंच, मचा घमासान//*
*'जब पट्टे पहले से बंटे हैं, तो प्लांट कैसे बनेगा?'- रोझौही में खड़े हुए बड़े सवाल//*
*भूमि विवाद के साये में रीवा का न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट: स्वतः निरस्तीकरण की ओर एनओसी?//*
विशेष ब्यूरो रिपोर्ट
रीवा (म.प्र.), 02 नवंबर 2026
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के रोझौही गांव में टाटा पावर कंपनी लिमिटेड (TPCL) के प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट (NPP) को लेकर प्रशासनिक स्तर पर जारी अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) और ज़मीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आया है। इस मामले में एक ओर जहां कार्यालय संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश, जिला कार्यालय रीवा द्वारा बोर लॉगिंग स्टडी के लिए शर्तों के साथ अनुमति दी गई है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय आदिवासियों द्वारा पूर्व में बांटे गए वन अधिकार पट्टों को लेकर खड़े किए गए सवालों ने इस परियोजना पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
*क्या है कार्यालयीन पत्र और शर्तें?*
कार्यालय संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश, जिला कार्यालय रीवा म.प्र. द्वारा पत्र क्रमांक I/523664/2026/ नग्रानि/ तक/ 2026 (दिनांक 21-09-2026) जिला दंडाधिकारी, रीवा को प्रेषित किया गया है। यह पत्र कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी रीवा के पत्र क्रमांक 139/आमर्स.लाय./2026 (दिनांक 18.09.2026) के संदर्भ में जारी किया गया है। इस पत्र के अनुसार, रोझौही गांव (साइट कोऑर्डिनेट 24^\circ52'32.15''\text{N}, 81^\circ29'55.01''\text{E}) में टीपीसीएल (TPCL) के प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट हेतु बोर लॉगिंग स्टडी (BSR प्रोजेक्ट के तहत) के लिए विभाग का अभिमत चाहा गया था। विभाग ने स्पष्ट किया है कि प्रश्नाधीन भूमि म.प्र. नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन गठित किसी भी निवेश क्षेत्र के अंतर्गत स्थित नहीं है, इसलिए भू-वैज्ञानिक और जियो-टेक्निकल डेटा संग्रह हेतु स्टडी पर कोई आपत्ति नहीं है।
हालांकि, इस अनापत्ति पत्र में कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी जोड़ी गई हैं:
बोर लॉगिंग स्टडी का कार्य निर्धारित मापदंडों और संबंधित विभाग के मार्गदर्शन में करना अनिवार्य होगा। स्थानीय संस्थाओं और संबंधित विभागों से अग्नि सुरक्षा, औद्योगिक सुरक्षा व अन्य मापदंडों की अनापत्ति प्राप्त करनी होगी। परियोजना से प्रभावित व्यक्तियों की सहमति आवश्यक होगी।
सबसे अहम शर्त (शर्त क्रमांक 6): पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि "भूमि के संबंध में विवाद/अन्य किसी भी प्रकार की विसंगति होने की स्थिति में यह अभिमत/अनापत्ति स्वयंमेव निरस्त मानी जावेगी।"
*रोझौही के आदिवासियों के सवाल और भूमि विवाद*
एक तरफ जहां प्रशासन ने स्टडी के लिए एनओसी दी है, वहीं रोझौही गांव के आदिवासियों ने वन अधिकार पट्टों को लेकर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। आदिवासियों का कहना है कि वन विभाग और राजस्व विभाग द्वारा संयुक्त रूप से ठीक उसी न्यूक्लियर पावर प्लांट की प्रस्तावित साइट और उसके आसपास वर्ष 2020-21 में उन्हें वन अधिकार पट्टे वितरित किए गए थे। इस बात को लेकर आदिवासियों द्वारा पूर्व में भी अपनी आपत्तियां दर्ज कराई जा चुकी हैं, जो विभिन्न समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित भी हो चुकी हैं।
*क्या स्वतः निरस्त हो जाती है एनओसी?*
अब सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि जब उसी न्यूक्लियर पावर प्लांट की प्रस्तावित साइट और उसके आसपास वर्ष 2020-21 में आदिवासियों को कानूनी रूप से वन अधिकार पट्टे बांटे जा चुके हैं, तो फिर वहां न्यूक्लियर पावर प्लांट का निर्माण कैसे संभव है? सामाजिक एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी, अन्य जानकारों और स्थानीय लोगों के अनुसार इन वैध वन अधिकार पट्टों और आपत्तियों के चलते रोझौही में भूमि का स्पष्ट विवाद सतह पर आ चुका है। चूंकि कार्यालय संयुक्त संचालक, नगर तथा ग्राम निवेश के पत्र की शर्त क्रमांक 6 में यह प्रावधान है कि भूमि विवाद या विसंगति होने पर अनापत्ति स्वतः निरस्त मानी जाएगी, इसलिए इस जमीनी विवाद के सामने आने के बाद यह अनापत्ति प्रमाण पत्र स्वतः ही निष्प्रभावी और निरस्त माना जा रहा है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और शासन इस भूमि विवाद एवं आदिवासियों के अधिकारों के बीच न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रोजेक्ट को लेकर क्या रुख अपनाता है। जबकि रोझौही और सरई सहित आसपास के सैकड़ो ग्रामों के लोग इस प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट प्रोजेक्ट को निरस्त किए जाने की निरंतर माग पर अड़े हुए हैं। गौरतलब है कि इसको लेकर जल सत्याग्रह एवं आमरण अनशन भी हो चुके हैं जिसमें एक आदिवासी महिला विमला कोल की मौत भी सामने आई है।
*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*
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