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Tuesday, August 28, 2018

गंगेव बाजार सड़क की ठेकेदार ने कर दी तेरही, चल रही बरसी की तैयारी, तिथि के बाद सड़क पहुच जाएगी "गया" ( मामला ज़िले से गुजरने वाली मनगवां चाकघाट वाया गंगेव गढ़ हाईवे सड़क का जिसको एमएस कंस्ट्रक्शन नामक कंपनी ने बरसात के मौसम में खोद डाला, अब हो रही रोज दुर्घटनाएं, शासन प्रशासन विकाश रथ में व्यस्त)

दिनाँक 28 अगस्त 2018, स्थान गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

   ज़िले की मनगवां से चाकघाट से गुजरने वाली गंगेव गढ़ होते हुए हाईवे सड़क की स्थिति दयनीय बन चुकी है. गंगेव बाजार में ठेकेदार और निर्माण एजेंसी एमएस कंस्ट्रक्शन द्वारा सड़क को एक तरफ से खोद दिया गया है जिससे आये दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं. निरंतर इस बात को मीडिया के समक्ष रखे जाने के बाद भी शासन प्रशासन अपनी चिरनिद्रा से नही जाग पा रहा है.

  बंसल ग्रुप कंपनी ने बरसात आते ही खोद डाली हाईवे

   मनगवां से चाकघाट वाली हाईवे सड़क के निर्माण का कार्य दिलीप बिल्डकॉम के बाद कुछ भाग को एमएस कंस्ट्रक्शन को दिया गया है लेकिन कार्य को सही तरीके से सुपरवाइज़ न कर पाने की वजह से बरसात के मौसम में ही गंगेव की सड़क को एक तरफ से खोद दिया गया. अब जब बरसात आ गई तो काम को बन्द कर दिया गया जिससे सड़क के पश्चिम दिशा में एक तरफ सड़क गहरी खायीं में बदल चुकी है. जब कोई वहां सड़क पर चलता है तो मानो एक तरफ ऊंचा टीला रहता है तो दूसरी तरफ खायीं बनी रहती है ऐसे में मात्र एक तरफ से ही वहां निकल सकते हैं. यदि कोई वाहन अथवा बाइकर्स दूसरी तरफ से आ रहा है तो उसे खायीं की तरफ जबरन और मजबूरन घुसना पड़ता है जिससे फिसलन और ऊबड़ खाबड़ होने की वजह से दुर्घटनाएं हो रही हैं. अभी कुछ दिन पहले दुर्घटना के कारण कई पशु भी अपनी जान दे चुके हैं. आम बाइकर्स और वाहनों का फिसलन और एक्सीडेंट तो आम बात है.

जल्दी बनाई जाए गंगेव बाजार की सड़क

   जब इस संदर्भ में आसपास के रहवाशियों से संपर्क किया गया तो विष्णु पटेल द्वारा बताया गया की उनके द्वारा इस मुद्दे को निरंतर उठाया जा रहा है लेकिन इसकी सुनवाई नही हो रही है. गंगेव में दुकान चला रहे बसौली के बबलू सिंह ने बताया की गंगेव से बसौली जाते समय ऐसा लगता है की कब कोई दुर्घटना हो जाए और कब जान पर बन आये. इसी तरह गंगेव जनपद और कृषि विभाग में कार्यरत कर्मचारियों द्वारा बताया गया कि उन्हें रोज ही बैतरणी पार करना पड़ रहा है। सरकारी कर्मचारियों को छोड़कर सभी ने एक स्वर में बताया की इस सड़क को जल्दी दुरुस्त किया जाय वरना हम सब मिलकर गंगेव बाजार के बीचोंबीच चक्का जाम करेंगे जिसकी जबाबदेही मात्र शासन प्रशासन की होगी. 

    इस बीच खुलासा न्यूज़ लाइव के ज़िला ब्यूरो चीफ आनंद द्विवेदी ने बताया की हम लगभग सप्ताह में दो दिन गंगेव आते हैं और पाते हैं की जिस दिन बारिश हुई होती है उस दिन इस लगभग दो किमी बंसल ग्रुप द्वारा उखाड़ी गई सड़क पर चलना काफी मुश्किल होता है. किसी प्रकार से इससे पार जाने पर ईश्वर को शुक्रिया अदा करते हैं की आज तो जान बचा लिया.

संलग्न -  कृपया संलग्न तस्वीर में देखें गंगेव से होते हुए गढ़ मार्ग की मनगवां के चाकघाट हाईवे सड़क को किस प्रकार से वर्तमान निर्माण एजेंसी ने खोदकर नष्ट कर दिया है.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, ज़िला रीवा मप्र,

मोबाइल 7869992139, 9589152587

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2122633094645561&id=100006966720612

Sunday, August 26, 2018

कैथा पंचायती पुलिया निर्माण में भष्ट्राचार - लाख की पुलिया निर्माण में सरपंच सचिव सब खा गया (मामला ज़िला रीवा अन्तर्गत गंगेव जनपद का जिंसमे कैथा पंचायत सरपंच संत कुमार ने लाखों की पुलिया निर्माण में किया भष्ट्रचार, कंक्रीट के स्थान पर पंचायत भवन के पत्थर और डस्ट से बन रही बृजबल्लभ पटेल के घर के पास की पुलिया, पाइप भी पुरानी डाली)

दिनांक 27 अगस्त 2018, स्थान - गंगेव/गढ़ रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  गंगेव जनपद में भष्ट्राचार अपने चरम पर चल रहा है. गंगेव जनपद पंचायत अन्तर्गत आने वाली लगभग ज्यादातर पंचायतों में शेयर का खेल चल रहा है. जनपद सीईओ एवं राजेश सोनी नामक बाबू के करामात निरंतर जारी हैं. चाहे कोई भी सीईओ आये गंगेव जनपद में मात्र राजेश सोनी की चल रही है. सोनी बाबू ने पूरी जनपद की ऐसी तैसी करके रखी हुई है जिस पर कलेक्टर कमिश्नर तक की कार्यवाही की हिम्मत नही. अभी पिछले कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री कन्यादान योजनान्तर्गत गरीब परिवारों की शादियाँ करवाई गई थी जिंसमे जमकर फर्ज़ीवाड़ा हुआ था जिसकी खबर प्रदेश के काफी समाचार पत्रों में छपी थी. ऐसे फ़र्ज़ी जोड़ों की शादियाँ हुईं जिनके कई बच्चे भी थे.

   कैथा पंचायत में सभी पुलिया निर्माण में हुई लीपापोती

   जनपदों के लगभग सभी पंचायतों में पञ्च परमेश्वर योजनान्तर्गत पुलिया एवं नाली साथ ही पीसीसी सड़क निर्माण का कार्य करवाया जा रहा है. इस बीच कैथा पंचायत में भी कई पुलिया निर्माण एवं पीसीसी निर्माण का कार्य किया जा रहा है.

    कैथा पंचायत की पुलिया निर्माण में कंक्रीट के स्थान पर पत्थर और डस्ट का प्रयोग हो रहा है. जबकि देखा जाए तो पुलिया निर्माण के लिए 89 हज़ार रुपये के बिल में अच्छी गुणवत्ता के बालू, गिट्टी एवं 55 बोरी सीमेंट की बात आई है. संलग्न रसीद से साफ स्पष्ट है जिस 89 हज़ार रुपये का फ़र्ज़ी बिल बाउचर बनाया हुआ बताया गया है उसमे किसी भी सामग्री का प्रयोग वास्तविक धरातल पर पुलिया निर्माण में नही हो रहा है.

बृजबल्लभ पटेल के घर के पास पुलिया निर्माण में भष्ट्राचार

  बृजबल्लभ पटेल के घर के पास नामक पुलिया निर्माण की राशि एक लाख रुपये सैंक्शन हुई बतायी गई थी जिंसमे किसी राजवीर ट्रेडर्स के द्वारा 89 हज़ार रुपये सामग्री का बिल बाउचर दिनाँक 04/05/2018 को पास किया गया है. पुलिया निर्माण के लिए राशि पंचायतीराज संचालनालय द्वारा पंच परमेश्वर योजनान्तर्गत दिनांक 02/10/2016 को सैंक्शन हुई. 

   राजवीर ट्रेडर्स द्वारा जारी किये गए बिल बाउचर में इस पुलिया निर्माण हेतु एक हाइवा बालू 24 हज़ार 500 रुपये के हिसाब से, 310 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से 55 बोरी सीमेंट कुल 17 हज़ार पचास रुपये, दो हाइवा 20 एमएम गिट्टी लागत 39 हज़ार रुपये, एवं ह्यूम पाइप 3 नग लागत 9 हज़ार रुपये की बतायी गई है. इस प्रकार कुल मटेरियल की कीमत 89 हज़ार रुपये बताया गया है जिंसमे यदि वास्तविक धरातल पर देखा जाए तो 8 से 10 बोरी तक घटिया क्वालिटी की राखड़ मिली सीमेंट, पुरानी कैथा पंचायत से निकाले हुए पत्थर, और थर्ड ग्रेड की डस्ट मिलाकर मात्र 10 से 15 हज़ार रुपये के खर्च में पुल बनाई जा रही है जिसकी की फ़ोटो भी संलग्न है. इस पुलिया निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी ही नही हो रही बल्कि सीधे सीधे आंखों में धूल झोंक दिया जा रहा है जिसमे सरकार प्रशासन अंधा हो चुका है. या यूं कहें की सीईओ, इंजीनियर और अन्य अधिकारियों को इतना माल मिल चुका है की सुपरवाईज़िंग  एजेंसी अपने आप आंख बन्द कर ली है.

जनपद और ज़िला स्तर से चलाया जा रहा भष्ट्राचार का धंधा

    जिन ग्राम पंचायतों में हो रहे कार्यों में अनियमितता और भष्ट्राचार की शिकायत जनपद और जिला स्तर पर की जा रही है आखिर उसमे कलेक्टर, कमिश्नर और सीईओ कार्यवाही क्यों नही कर रहे है. क्या वजह है? बात बहुत ही स्पष्ट है की चूंकि इसमे भष्ट्राचार की राशि उच्चस्तर तक जा रही है इसलिए पंचायती कार्यों में अनियमितता की शिकायत पर कोई भी उच्चाधिकारी कोई कार्यवाही नही करता. टीएस होने से लेकर कार्य तक सभी का शेयर फिक्स होने से शिकायतो पर मात्र लीपापोती की जाती है. यदि शिकायतें की जाती हैं तो मात्र उनमे फ़र्ज़ी पंचनामा और फ़र्ज़ी प्रतिवेदन बनाकर ऊपर प्रेषित कर दिया जाता है. इसी बात को पुख्ता करते हुए बता दें की सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा वर्ष 2016 के आसपास भोपाल मंत्रालय बल्लभ भवन से लेकर पीएमओ तक दर्जनों पुख्ता शिकायतें पूरे प्रूफ के साथ भेजी गईं थीं लेकिन जब दो साल बाद उनके निराकरण का प्रतिवेदन प्राप्त हुआ तो आश्चर्य हुआ क्योंकि पीएमओ में भेजी गई शिकायत के निराकरण में जिंसमे की उच्चधिकारियों और प्रतिस्पर्धी सक्षम टीम द्वारा जांच की माग की गई थी उसकी जांच प्रतिवेदन में जनपद स्तर के बाबू द्वारा उपलब्ध करवाये गए जांच प्रतिवेदन को ही आधार बनाकर सीईओ जनपद एवं ज़िला एवं कलेक्टर रीवा तक के हस्ताक्षर तो थे ही साथ ही प्रादेशिक स्तर पर बल्लभ भवन मंत्रालय के अधिकारियों के भी वही प्रतिवेदन थे. अर्थात मामला साफ स्पष्ट था की जिस जांच और हीलाहवाली से थककर आवेदक द्वारा मामला बल्लभ भवन मंत्रालय एवं पीएमओ को इस आशय के साथ भेजा गया था की इसमे कोई सार्थक कार्यवाही होगी और साथ ही जांच स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी द्वारा करवाई जाकर सही निराकरण होगा उसमे पीएमओ लेवल तक कहीं कुछ नही हुआ. 

   अब प्रश्न यह उठता है की कार्यपालिका में पीएमओ से बड़ा कौन सा विभाग हो सकता है. आवेदक शिकायतकर्ता जब ज़िला स्तर की हीलाहवाली से थकता है तो सीएमओ और पीएमओ को शिकायत भेजता है लेकिन वहां भी उसे गंभीरता से लेने की बजाय मात्र औपचारिकता पूर्वक निचले स्तर पर फॉरवर्ड कर दिया जाता है नतीज़ा वही मिलता है जो पहले मिल रहा था. जांच प्रतिवेदन मात्र बाबू लेवल के कर्मचारी का ही जाएगा जो पहले ही खा पीकर बैठा हुआ है. 

    भगवान मालिक है ऐसे सरकार प्रशासन का और ऐसे लोकतंन्त्र का.

संलग्न - रीवा ज़िले के गंगेेेे जनपद अन्तर्गत वघटितहै पंचायत केेई घााटीया तरीके से निर्माण की जा रही गुणवत्ताविहीन पुलिया की फ़ोटो साथ ही पञ्च परमेश्वर योजनान्तर्गत बनाई जा रही इस पुलिया के विषय में राजवीर ट्रेडर्स नामक दुकान से जारी किये गए फ़र्ज़ी बिल बाउचर की फ़ोटो भ संलग्न भी.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139

Saturday, June 23, 2018

उमरी कैप में मौसम की मार खा रहा खुले में रखा हज़ारों टन गेहूं (मामला ज़िले के सिरमौर तहसील अंतर्गत आने वाले उमरी कैप का जहां पर डंपिंग पॉइंट मे खुले में हज़ारों टन पड़ा गेहूं मौसम की मार खा रहा, बाहर से बाउंड्री वाल न होने और प्रॉपर फेंसिंग की व्यवस्था न बन पाने से मवेशियों का भोज बन रहा किसान का गेहूं)

दिनांक 24 जून 2018,  स्थान - उमरी कैप, सिरमौर रीवा मप्र 

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   सरकार ने गेहूं की खरीदी तो कर ली है पर उसकी व्यवस्था कैसे करनी है शायद शासन में बैठे नुमाइईंदों को यह पता नही है. मप्र सरकार कहती है की हमारे पास पर्याप्त वेयर हाउसेस हैं जहाँ पर गेहूं और चावल को स्टोर किया जा सकता है परंतु सरकार के दावे तब खोंखले दिखते हैं जब सिरमौर के पास उमरी कैप और रीवा के हृदय में स्थित करहिया मंडी की तरफ ध्यान जाता है. तब समझ आता है की मात्र कह देने भर से कुछ नही होता. शुक्र है की मीडिया की तीसरी आंख पूरे खरीदी से लेकर उठाव और भंडारण करने तक के पूरे घटनाक्रम में नजर बैठाए हुए रहती है वरना यदि सब कुछ सरकार की मान ली जाए तो कल्याण ही हो जाए, 

उमरी कैप में खुले में पड़ा सड़ रहा है अन्नदाता की गाढ़ी कमाई 

   अभी हाल ही में दिनांक 22 जून को सिरमौर होते हुए बैकुंठपुर वाले रास्ते से उमरी पहुचा गया. पूंछने पर पता चला की उमरी चौराहे से दांए स्थित है उमरी कैप जहां पर धान और गेहूं की खरीदी के बाद डंप किया जाता है और फिर वहीं से या की सीधे राइस मिल में धान को भेज दिया जाता है या फिर कैप में सड़ने के लिए रख दिया जाता है. जहां तक गेहूं का सवाल है तो वहां कार्यरत सुरक्षा चौकीदारों  जन्मेजय कुमार तिवारी,  विजय कुमार यादव,  राजभान लोद, सत्यभान लोद, कृष्णकांत मिश्रा, लंकेश मिश्रा से जानकारी मिली की इस वर्ष अभी भी स्टोर हाउसेस खाली न मिल पाने की वजह से गेहूं की वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर वहीं पर खुले में डंप किया गया है जिसे वेयर हाउस खाली होने के साथ ही उठाव कर लिया जाएगा.

     परंतु वर्तमान में जो स्थिति दिखी वह संतोषजनक तो बिल्कुल नही कही जा सकती है. यद्यपि बारिश के मौसम में भी पन्नी और प्लास्टिक आदि की पर्याप्त व्यवस्था की हुई दिखी जिसमे गेहूं को ढका हुआ था फिर भी यदि मूसलाधार बारिस होने लगे तो ऐसे में पानी को संभालना और साथ ही आर्दता से गेहूं को बचा पाना काफी मुश्किल पड़ जाएगा. यदि किसी तरह से पन्नी वगैरह लगाकर गेहूं को ढक भी लिया गया तो कई दिनों तक चलने वाली बारिश की वजह से आने वाली आर्दता से गेहूं को बचा पाना मुश्किल ही नही असंभव कार्य है. आर्दता की वजह से गेहूं में कीड़े लग जाते और देखते ही देखते पूरा गेहूं सड़ जाता है.

   कहां गए सरकार के वेयर हाउस

     सरकार कहती है की हमारे पास खरीदे गए अनाज के भंडारण की पर्याप्त और समुचित व्यवस्था है लेकिन प्रश्न यह है की यदि पर्याप्त और समुचित व्यवस्था होती तो आखिर गेहूं धान को इस प्रकार उमरी कैप अथवा करहिया मंडी में खुले में क्यों रखा जाता. सरकार की महत्वाकांशी और किसान को राहत देने वाली योजनाएं जिनमे धान-गेहूं की खरीदी की जाकर सरकार उसकी व्यवस्था देखे उचित और सराहनीय है, परंतु सरकार को इस खरीदे हुए अनाज के समुचित भंडारण में विशेष ध्यान देने की जरूरत है. यदि सरकार के पास स्वयं के वेयर हाउस न भी हों तो प्राइवेट वेयर हाउस को को किराये में लेकर अनाज का समुचित भंडारण करना चाहिए. किसान के खून पसीने से पैदा हुआ एक-एक दाना बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसे नष्ट होने से बचाया जाना चाहिए. 

उमरी कैप के कर्ताधर्ता मात्र कुछ चौकीदार 

    ज़िले के सिरमौर स्थित उमरी कैप में पहुच कर जानकारी प्राप्त करने पर पता चला की कैप प्रबंधक मौजूद नही थे और मात्र पूरे सुरक्षा की जिम्मेदारी चंद लोगों के हवाले थी जिंसमे जन्मेजय कुमार तिवारी, विजय कुमार यादव, राजभान लोद, सत्यभान लोद, कृष्णकांत मिश्रा, लंकेश मिश्रा थे जिन्हें बारी बारी से सुरक्षा का जिमा दिया गया था साथ ही सावित्री साकेत, साधना साकेत नामक दोनो महिला झाड़ू और साफ सफाई कर्मचारी के रूप में थीं. वहीं पर वृष्णुदत्त महाराज नामक पुजेरी भी मिले जिन्होंने बताया की वह सिद्ध दानव मामा गंगा बहरी में पूजा अर्चना का कार्य करते हैं.

शुक्ला वेयर हाउस के पास ट्रकों में लदा अनाज खा रहा पानी

    सबसे बड़े ताज्जुब की बात तो यह है की उमरी कैप के नजदीक ही स्थित शुक्ला वेयरहाउस है जिसके पास दर्जनों लोडेड ट्रक खड़े मिले. जानकारी प्राप्त हुई की यह ज्यादातर ट्रक उमरी गेहूं कैप से ही लोड हुए हैं जो हफ्तों से अनलोड होने का इंतज़ार कर रहे हैं और साथ ही मौसम की बारिश खाते हुए खड़े हैं जिंसमे गेहूं बुरी तरह भींग रहा है. मात्र प्रबंधन की अनदेखी और लापरवाही की वजह से किसान के खून पसीने की गाढ़ी कमाई की ऐसी तैसी की जा रही है.

 चारों तरफ से खुला है उमरी कैप, कोई पुख्ता सुरक्षा नही 

      देखने पर पता चला की उमरी कैप जहां पर इतनी अधिक मात्रा में गेहूं और अनाज को खरीदी के बाद डंप किया हुआ है उसकी बाउंड्री वाल नही है. सुरक्षा गार्ड जन्मेजय तिवारी द्वारा उमरी कैप के प्राँगण में अंदर घुसे हुए पशुओं और सुअर की तरफ इशारा करते हुए बताया गया की चारों तरफ से सही फेंसिंग व्यवस्था न हो पाने की वजह के यह जानवर कैप के अंदर घुसे रहते हैं जिससे खुले में रखा हुआ अनाज खाते और नुकसान पहुचाते रहते हैं. 

      बाउंड्री के तौर पर देखा जाए तो मात्र कटीले तार लगे हुए थे जो की खंभों में बांधकर लगाए गए थे. चेक पॉइंट अथवा चुंगी के पास तो खम्भे भी धराशायी हो गए थे जिससे कटीले तार भी जमीदोंज हो गए थे जहां से मवेशियों का आना जाना ज्यादा सुलभ था. जन्मेजय तिवारी और उनके अन्य सुरक्षा गार्ड साथियों द्वारा माग की गई की उमरी कैप के चारों तरफ बाउंड्री वाल बनाई जानी चाहिए जिससे खरीदी के समय खुले में रखे हुए अनाज की सुरक्षा की जा सके.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें उमरी कैप के अंदर का दृश्य जहां पर खुले आसमान के नीचे हज़ारों टन गेहूं पड़ा सुरक्षा की गुहार लगा रहा है साथ ही हमारे किसानों के खून पसीने की कमाई नष्ट हो रही है. एक अन्य तस्वीर में देखें शुक्ला वेयरहाउस के पास खड़े दर्जनों ट्रक जिन्हें अनलोड नही किया गया. साथ ही सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी लिए हुए चौकीदार और टूटी पड़ी बाउंड्री.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल - 7869992139, 9589152587

Tuesday, June 19, 2018

मनरेगा सड़क निर्माण में कैथा पंचायत में बिन कार्य ही जारी हो रहे फ़र्ज़ी मस्टर रोल (मामला ग्राम पंचायत कैथा के ग्राम अकलसी का है जहाँ पर मई और जून 2018 में फ़र्ज़ी मजदूरों के मस्टर रोल जारी किये गए जबकि कार्य कहीं कुछ नही हुआ, पंचायती भष्ट्राचार अपने चरम पर)

दिनांक 19 जून 2018, स्थान - गगेव, रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

    ज़िले के गगेव जनपद अंतर्गत आने वाली कैथा ग्राम पंचायत के अकलसी ग्राम में सुदूर सड़क संपर्क रामदरस के घर से प्रधानमंत्री सड़क तक के कार्य में भारी अनियमितता प्रकाश में आयी है जिसकी की जांच के लिए पिछले वर्ष जनपद से लेकर ज़िला कलेक्टर एवं कमिश्नर तक लिखा गया था लेकिन कोई सार्थक कार्यवाही नही हुई है.

   अभी इस वर्ष पुनः उसी परियोजना में मई एवं जून 2018 में चार नए मस्टर रोल फ़र्ज़ी तरीके से जारी किये गए हैं जिसमे 20 मजदूरों के ऐसे नाम दर्शाए गए हैं जो कभी उस सड़क कार्य में नही आये. इस बात के सबूत पूरे अकलसी ग्राम के लोग हैं जिन्होंने उस सड़क मार्ग में मात्र जेसीबी एवं मसीने चलती हुई देखी हैं मजदूर तो दूर दूर तक कहीं नहीं दिखे.


 वर्ष 2018 में 4 मस्टर रोल में 20880 रुपये प्रति मस्टर रोल में निकाले गए 83 हज़ार 520 रुपये

    ग्राम पंचायत कैथा के अकलसी ग्राम की रामदरस के घर से प्रधानमंत्री सड़क तक परियोजना में वर्ष 2018 के मई एवं जून महीने में कुल 4 मस्टर रोल फ़र्ज़ी तरीके से जारी किये गए जिसमे प्रति मस्टर रोल 20 मजदूरों को काम करता दिखाया गया. साथ ही प्रति मस्टर रोल 20 मजदूरों की मजदूरी 20 हज़ार 880 रुपये प्रति सप्ताह बतायी गई है. इस प्रकार मात्र मजदूरी के नाम पर ही 83 हज़ार 520 रुपये एक बार फिर निकाल लिए गए जबकि सामग्री में खर्च अलग से बताया गया है. इस सड़क परियोजना की लंबाई 500 मीटर बतायी गई है जिसमे 5.5 लाख रुपये खर्च बताया गया है. पिछले वर्ष 2017 में कुल 8 मस्टर रोल जारी हुए थे जो अब तक मिलाकर 12 हो गए हैं। जबकि भूतपूर्व सरपंच कैथा मिथिला प्रसाद पटेल द्वारा अवगत कराया गया है की इसी 500 मीटर सड़क के लिए उन्होंने इसके ठीक पिछली पंचवर्षीय में अपने कार्यकाल में मिट्टी मोरम का कार्य करवाया था अतः नियमानुसार पांच वर्ष के भीतर उसी सड़क के लिए पुनः मिटी मोरम का कार्य होना संभव नही है. इसमे मात्र रिपेयरिंग का काम होता है न की नवनिर्माण का. इस प्रकार देखा जा सकता है की 5.5 लाख रुपये की राशि इतनी छोटी सड़क परियोजना के लिए बहुत अधिक भी है जिसकी जांच बाबत पिछले वर्ष 2017 में जनपद पंचायत गंगेव से लेकर ज़िला पंचायत रीवा, कलेक्टर रीवा एवं कमिश्नर रीवा को लिखित दिया जा चुका है जिसमे पचासों ग्रामवशियों के अपने हस्ताक्षर उर अंगूठा निशानी भी लगाया है. 


   कैथा पंचायत के घोटालों का अम्बार 

   कैथा पंचायत में मात्र यही सड़क मात्र में भष्ट्राचार नही हुआ है बल्कि यहां लगभग सभी मनरेगा एवं पंच परमेश्वर योजना कार्यों में हीलाहवाली हुई है जिसकी की दर्जनों सीएम हेल्पलाइन में शिकायतें दर्ज हैं एवं लिखित तौर पर पूरे प्रमाण के साथ मंत्रालय प्रमुख सचिव बल्लभ भवन एवं नई दिल्ली प्रधानमंत्री कार्यालय तक रखा जा चुका है. 

    इन सबके वावजूद भी विभागीय स्तर पर कहीं कोई कार्यवाही नही हुई है और मात्र लीपापोती ही हुई है.

  संलग्न - 5.5 लाख रुपये की बनाई गई 5 सौ मीटर की सड़क जिसमे मात्र कुछ हज़ार रुपये की मोरम डालकर फुरसत कर दिया है. वर्ष 2017 एवं 2018 दोनो में इस सड़क के नाम पर पैसा की अंधाधुंध निकशी हुई है. सबूत के तौर पर सड़क की फ़ोटो भी संलग्न है साथ ही फ़र्ज़ी तरीके से जारी हुए मस्टर रोल का स्नैपशॉट भी संलग्न है जिसे मनरेगा की वेबसाइट में जाकर आसानी से देखा जा सकता है. 

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

Saturday, June 2, 2018

पनगड़ी में चल रही गड़बड़ी, क्रेशर ने पत्थर समझकर खनिज, वन और पर्यावरण नियमों की जमकर की तोड़ाई ( मामला ज़िले के अवैध उत्खनन का जिसमे खनिज, वन एवं पर्यावरण के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही, सिरमौर तहसील अंतर्गत पनगड़ी की वैध अथवा अवैध खदानों में पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड और वन विभाग के नियमों का नही होता पालन, साथ ही लीज से अतरिक्त हो रही खोदाई)

दिनांक 02 जून 2018, स्थान - गढ़/सिरमौर, रीवा मप्र


(रीवा, मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

  ज़िले में अवैध तरीके से संचालित गिट्टी क्रेशर प्लांट अपनी काली करतूतों को अंजाम दिए जा रहे हैं लेकिन शिकायतों के वाबजूद भी कहीं कोई एक्शन होता नजर नही आ रहा. जो भी कार्यवाहियां हो रही हैं वह मात्र कागजों तक ही सीमित होती दिख रही हैं.

   अभी हाल ही में पिछले वर्षों वन एवं पर्यावरण की धज्जियां उड़ाने वाले के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नामक फैंसी नाम से बनाये गए पनगड़ी में स्थापित क्रेशर प्लांट ने लगातार खनिज, वन एवं पर्यावरण के नियमों के विपरीत जाकर अवैध तरीके से उत्खनन तो किया ही है साथ ही वहां आसपास रहने वाले रहवाशियों की जिंदगी भी हराम कर दिया है. न तो प्रदूषण रोकने के कोई सार्थक उपाय किये गए हैं और न ही खनिज के नियमों का पालन हुआ है. जिस रकबे में खुदाई की गई है वहां बड़ी बड़ी खाई बन गई है. उत्खनन वाले रकबे में कोई सही तरीके की बाउंड्री भी नही बनाई गई है. उत्खनन क्षेत्र और क्रेशर प्लांट के नजदीक सैकड़ों की आवादी है जिसके कारण जब भी क्रेशर में पत्थर और गिट्टी तोड़ने का कार्य होता है तो पूरी डस्ट उड़कर घरों में आती है जिससे गंभेर सांस संबधी बीमारियों का खतरा बना रहता है. कई टेस्ट में ओ सिलकोसिस नामक सांस की बीमारी का होना पाया गया है.

पनगड़ी पंचायत ने किया विरोध लेकिन नही हुई सुनवाई

   सिरमौर तहसील अन्तर्गत आने वाली पनगड़ी पंचायत के सरपंच, उप सरपंच और अन्य सैकड़ों सदस्यों ने के -स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड नामक फैंसी नाम से बने क्रेशर प्लांट और अन्य अवैध उत्खनन की शिकायतें की और कार्यवाही हेतु खनिज विभाग, वन विभाग और साथ ही ज़िला रीवा कलेक्टर को भी लिखा लेकिन कोई सार्थक सुनवाई नही हुई. ऐसा लगता है ज़िला कलेक्टर पहले ही बिका हुआ है।

खनिज विभाग रीवा की मिलीभगत का परिणाम अवैध उत्खनन

   जब शिकायतें संबंधित खनिज विभाग रीवा को की जाती हैं तो खनिज विभाग के चमचे पहले ही संबंधित क्रेशर प्लांट के मालिकों और अवैध उत्खननकर्ताओं को सूचित कर देते हैं की आपके नाम से शिकायत आई है. इस पर कई बार तो जांच के नाम पर मात्र खानापूर्ति हुई है. साथ ही झूँठा पंचनामा बनवाकर बता दिया गया की न तो अवैध उत्खनन हो रहा है और न ही अवैध क्रेशर प्लांट लगा है. इसी प्रकार वन एवं पर्यावरण विभाग में भी धांधली चल रही है. कार्यवाही के नाम पर मात्र खानापूर्ति होती है केवल कागज़ी घोड़े दौड़ते हैं.

शिवानन्द द्विवेदी की सीएम हेल्पलाइन में कड़े शब्दों में की गई शिकायत और पीसीबी ने कहा बन्द कर दो बिजली सप्लाई, क्लोजर नोटिस जारी की फिर भी धड़ल्ले से चल रहा प्लांट

   भारतीय लोकतंत्र और इसके वर्तमान भष्ट्राचार युक्त सिस्टम की दुर्दशा तो तब समझ आती है जब शक्तिप्राप्त प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वयं भी अपने नोटिफिकेशन को फॉलो नही करवा पा रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द विवेदी के सीएम हेल्पलाइन की अत्यंत कड़े शब्दों में की गई शिकायत क्रमांक 3468430 से प्रारम्भ हुई उथल पुथल के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हरकत में आया. सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा सबूतों के आधार पर बहुत ही कड़े शब्दों में शिकायत की गई जिसमे स्पष्ट रूप से लिखा गया की ज़िला रीवा का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मात्र नाम मात्र का विभाग बना है और जनता के पैसे की पूरी तरह से बर्वादी कर रहा है. क्योंकि जिस प्रकार से पिछले कई वर्षों से प्रदूषण को लेकर शिकायतें बोर्ड के समक्ष रखी गई थीं उन पर न तो कोई जांच हो रही थी और न ही कोई कार्यवाही अतः ऐसे तीखे शब्दों में शिकायत की गई. इस शिकायत के बाद शायद पीसीबी में बैठे ज़िला अधिकारियों को थोड़ी बहुत शर्म का एहसास हुआ होगा और उनका जमीर जागा होगा की नही अब ओ कुछ न कुछ किया जाना चाहिए. इस बाबत पीसीबी रीवा ने के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम प्रदूषण के मापदंडों का पालन न करने के लिए और बिजली विभाग को भी क्रेशर प्लांट की बिजली सप्लाई बन्द करने के लिए नोटिस क्रमांक 576, 579, 3336, और 3509 जारी किया जो की सीएम हेल्पलाइन की शिकायत क्रमांक 3468430 में शिकायतकर्ता को सूचित किया गया. अब लगने लगा था की शायद कहीं जाकर समस्या को गंभीरता से लिया जाने लगा है. शिकायतकर्ता द्वारा मात्र पनगड़ी के वैध अथवा अवैध क्रेशर प्लांट को ही नही बल्कि पूरे ज़िले में हो रहे अवैध उत्खनन और प्रदूषण के नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियाँ के विषय में शिकायत रखी गई थी जिसका की दूरगामी परिणाम यह भी हुआ की पूरे ज़िले में कार्य करने वाले वैध एवं अवैध स्टोन क्रेशर जो की पर्यावरण के नियमों के विपरीत काम कर रहे थे और प्रदूषण फैला रहे थे ज्यादातर के लिए क्लोजर नोटिस जारी कर दिया. यह एक सार्थक पहल कही जा सकती है. परंतु चूंकि पीसीबी के पास कोई न्यायिक शक्ति अथवा पुलिस बल नही है उसकी सभी सूचना कलेक्टर रीवा की ओर सूचनार्थ दिया जिससे दंडाधिकारी द्वारा अग्रिम प्रशासनिक कार्यवाही की जा सके. लेकिन हुआ पूरी तरह से उल्टा. यहां कलेक्टर रीवा ने कुछ नही किया. यदि कोई सामान्य अतिक्रमण हटाना होता अथवा किसी गरीब को परेशान करना होता तो ज़िले क्या पूरे प्रदेश का शासकीय आमला हरकत में आ जाता परंतु रसूखदारों और माफिया किश्म के स्टोन क्रेशर चलाने वाले माफियाओं के क्रेशर प्लांट बन्द करने की कूबत न तो ज़िला कलेक्टर एवं दंडाधिकारी में है और न ही प्रदेश के मुखिया में. जहां तक सवाल प्रदेश के मुखिया का है यह आज एक आम बात हो चुकी है ज्यादातर ऐसे क्रेशर चलाने वाले और अवैध खनिज का काम कारने वाले लोग इन्ही मंत्रियों, और उच्चाधिकारियों के ही सरणागत होते हैं. 

सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा फ़ाइल आर टी आई में पीसीबी ने दिया जानकारी 

    अभी हाल ही मे अप्रैल 2018 में सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड पीसीबी में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जानकारी चाही गई थी जिसमे पीसीबी द्वारा की गई कागज़ी कार्यवाही की जानकारी चाही गई थी जिसके जबाब में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में दिनांक 25 अप्रैल 2018 को जारी किये गए पत्र क्रमांक/906/क्षे.का/तक./प्रनिबो/2017 के माध्यम से जानकारी दी जिसमे प्रपत्र क्रमांक 576, 579, 3336 एवं 3509 संलग्न करके भेजा है जो यहां पर संलग्न है.

कलेक्टर रीवा बना मूकदर्शक

   सबसे बड़ी कमी ज़िला प्रशासन की है क्योंकि ज़िला प्रशासन के पास शक्ति होती है लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास कोई शक्ति नही होती. पीसीबी मात्र जांच कर कार्यवाही करने के लिए अनुशंसा कर सकता है. पीसीबी क्रेशर प्लांट पर नियमों की अवहेलना पर डंडा नही चला सकता. सवाल इस बात का है की जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी बार बार कार्यवाही और जांच करके प्रतिवेदन कलेक्टर अथवा बिजली, खनिज विभाग को भेज रहे हैं तब फिर कलेक्टर क्यों सो रहा है. आखिर ज़िला दंडाधिकारी तो कलेक्टर ही है जिसके पास पुलिश बल भी है साथ में न्यायिक शक्ति भी है. परंतु जिस प्रकार से ज़िला प्रशासन ने पीसीबी को मजाक बनाकर रखा है ऐसा प्रतीत हो रहा है की सबकी अच्छी खासी मिली भगत है. ऐसे में इस देश में न्याय और सच्चाई की लड़ाई लड़ना असंभव हो जाएगा क्योंकि बच्चे बच्चे को पता है की यहां कुछ नही होने वाला. अब यदि रीवा कलेक्टर को थोड़ा भी शासन प्रशासन का खयाल है तो जितने भी क्लोजर नोटिस पर्यावरण नियम के उल्लंघन पर पीसीबी द्वारा ज़िला दंडाधिकारी की तरफ कार्यवाही हेतु अग्रेषित किया गया है तत्काल प्रभाव के साथ पुलिस प्रशासन के सहयोग से पूरी तरह से बन्द करके ब्लैक लिस्ट कर देना चाहिए और हैवी जुर्माना लगाया जाना चाहिए जिससे भविष्य में ज़िले का पूरे प्रदेश में किसी स्टोन क्रेशर संचालक की अवैध कार्य करने की हिम्मत न पड़े.

खनन ने पनगड़ी को पूरी तरह से किया खोखला

   आज पनगड़ी क्षेत्र को अवैध और वैध दोनो तरह के उत्खनन कर्ताओं ने पूरी तरह से खोखला कर दिया है. पनगड़ी में पत्थर बहुतायत में है लेकिन यह क्षेत्र जंगल के पूरी तरह के करीब बसा हुआ हैं जो 250 मीटर के भी दायरे में आता है जिसका तात्पर्य यह हुआ की इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के उत्खनन के लिए आसानी से लीज नही दी जा सकती. परंतु जिस प्रकार से पिछले कुछ वर्षों में खनिज विभाग ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मिलकर पंजीरी की तरह लीज देने का काम किया है इससे पता चलता है की आम जनता के स्वास्थ्य और वन एवं पर्यावरण की किसी को कोई फिक्र नही है. पनगड़ी बीट के जंगलों की तरफ जाने वाले पुस्तैनी और हज़ारों वर्ष प्राचीन महादेवन शिवधाम की तरफ एक कच्ची सड़क जाती थी जो इस स्टोन क्रेशर प्लांट की वजह से पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. अब वहां पर पैदल चलना भी मुश्किल है. इसी प्रकार वहीं पास में नाला और झरना था जो अनियंत्रित और अवैध ब्लास्टिंग की वजह के छत विछत हो चुका है. झरना समाप्त हो गया है. क्रेशर प्लांट के पास अवैध वनों की कटाई और अवैध सुअर हिरण आदि का शिकार भी बढ़ गया है. क्रेशर प्लांट के नजदीक आने वाले घरों की दीवालों और छतों में ब्लास्टिंग की वजह से दरारें आ गईं हैं. आसपास के लोगों का जीना दूभर हो गया है. ज्यादातर नजदीकी बाशिन्दे हरिजन आदिवाशी समूह के होने के कारण अपनी आवाज़ें बुलंद नही कर पाते और बुरी तरह के पीसे जा रहे हैं. जिन्होंने आवाज़ें उठाई भी हैं ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह दबा दी गई. 

क्रेशर प्लांट के 50 मीटर दायरे के भीतर निवासरत है हरिजन परिवार 


      पनगड़ी में ब्लास्टिंग और क्रेशर प्लांट के नजदीक तो पचासों हरिजन आदिवाशी परिवार निवासरत हैं परंतु क्रेशर प्लांट के अत्यंत नजदीक ही एक हरिजन परिवार निवासरत है लेकिन उसे निरंतर वहां से भगाने का प्रयास किया जाता रहा है. वह परिवार क्रेशर प्लांट के 50 मीटर दायरे में इस प्लांट की स्वीकृति के पहले से निवासरत है फिर भी पीसीबी, वन पर्यावरण और खनिज विभाग को यह समझ नही आया की इस क्रेशर प्लांट को लीज और अनुमति किस नियम के आधार पर दी जा रही है. अब जानकारी मिली है की उसी हरिजन परिवार का पीएम आवास भी वहीं पर बन रहा है लेकिन क्रेशर संचालक जोर जबरदस्ती कर दबाब बनाकर तहसील में गलत जानकारी देकर उसका पीएम आवास न बनाये देने के लिए स्थगन भी ले लिया है जो की नियम विरुद्ध है. यह हरिजन परिवार भूमिहीन है जो सरकारी जमीन पर 40 वर्ष से ऊपर से 5 डिसमिल के दायरे में निवास कर रहा है और वासदखल कानून के अंतर्गत उसे वहां का तत्काल आवादी पट्टा दिया जाना चाहिए लेकिन क्रेशर संचालक और माफियाओं के दबाब में तहसीलदार सिरमौर बिक चुका है और बिना ठोस कारण के ही पीएम आवास जैसे महत्वपूर्ण केंद्रीय योजना के विरुद्ध क्रेशर प्लांट संचालक के गुर्गों को स्थगन आदेश हरिजन के विरुद्ध दे दिया जो घोर अन्याय है साथ ही तहसीलदार और अनुविभागीय दंडाधिकारी की शक्ति का दुरुपयोग भी है.

  संलग्न - ज़िला रीवा अंतर्गत सिरमौर तहसील के पनगड़ी ग्राम पंचायत में लगे के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नामक नाम से बनाये गए फैंसी स्टोन क्रेशर का दृश्य जहां पर कोई भी बाउंड्री नही बनाई गई है,  और न ही खनिज, वन एवं पर्यावरण के नियमों का ओई पालन ही किया जा रहा है. साथ ही यहाँ पर संलग्न है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कार्यालय से प्राप्त आर टी आई के जबाब जिसमे आवेदक शिवानन्द द्विवेदी की सीएम हेल्पलाइन की शिकायत पर अब तक आंशिक रूप से की गई जांच और कारवाही की जानकारी भेजी गई है.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र


मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Saturday, April 28, 2018

दास्ताँ ए प्रशासन- आज़ादी के 70 साल, न आवादी न पट्टा (मामला ज़िले के मनगवां तहसील अंतर्गत इटहा हल्का नंबर 2 के कैथा हरिजन आदिवासी बस्तियों के 50 परिवारों का)

दिनांक 28 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

    प्रदेश और केंद्र सरकारें हरिजन आदिवाशियों और दलितों के नाम पर बड़ी बड़ी योजनाओं की बातें कर रही हैं, खूब वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं, लोक लुभावने वादे कर रही हैं. हरिजन आदिवाशियों को उनके आवादी पट्टे वितरित किये जाने के नित नए नियम निकाले जा रहे हैं लेकिन वास्तविक धरातल पर ग्रामीण अंचलों में आज भी स्थिति स्वतंत्रता पूर्व जैसी ही बनी हुई है.

   पिछले कई दसकों से यह गरीब हरिजन आदिवासी जिस भूमि पर काबिज थे आज भी वहीं पर काबिज हैं लेकिन उनके नाम के आवादी पट्टे आज तक वितरित नही किये गए हैं जबकि सरकार ने तो इस विषय में कई नोटिफिकेशन तक जारी किये हुए हैं की सभी भूमिहीनों को उनका आवादी और पट्टे वितरित किये जायें।

 आवादी पट्टा हर भूमिहीन का है मौलिक अधिकार

   वास्तव में देखा जाए तो हर एक भूमिहीन परिवार को उसकी एक दशक से अधिक में काबिज भूमि का आवादी पट्टा मिलना चाहिए. परंतु इसके उलट हितग्राहियों को उनकी भूमि के आवादी पट्टे वितरित नही हुए हैं. यह एक समस्या का विषय है क्योंकि भूअधिकार और पट्टे न मिलने से हितग्राही मूलक योजनाओं का लाभ ले पाना मुश्किल होता है. अब पीएम आवास और शौचालय निर्माण की ही बात करलें तो बता दें की इनमे से किसी भी योजना का लाभ तब तक नही मिलेगा जब तक उस हितग्राही की स्वयं की कुछ जमीन न हो. आखिर पीएम आवास सैंक्शन होने के बाद भी हितग्राही मकान कहां बनाये? हरिजन आदिवासियों के मामलों में यह देखने में आया है की ग्रामीण अंचलों में इनके पूर्वज किसी जमीदार द्वारा खेतों में काम और मजदूरी के उद्देश्य से बसाए जाते थे. सब तो ठीक था परंतु उन तथाकथित जमीदारों ने आज तक उन हितग्राहियों का आवादी और पट्टा नही बनवाया साथ ही अपने जमीन से बेदखल कर देने की धौंस अलग से देते रहते हैं. इसी डर बस उन हरिजन आदिवशियों के लिए जमीदारों के विरुद्ध कुछ बोल पाना भी मुश्किल हो जाता है. आखिर उनको यह डर तो बना ही रहता है की कहीं जमीदार उन्हें अपने जमीन से बेदखल न कर दें. यद्यपि देखा जाय तो दसकों से काबिज भूमिहीन हरिजन आदिवासी परिवारों को बेदखल कर पाना जमीदारों को उतना आसान भी नही होता. लेकिन फिर भी मनोवैज्ञानिक दबाब बनाकर रखना और अपने खेती किसानी और मजदूरी के काम में दबाब देकर लगाए रखने का फायदा जमीदारों को जरूर मिलता है. आज भी कई स्थानों पर यह भूमिहीन बंधुआ मजदूर की तरह ही काम कर रहे हैं।

   इस प्रकार यदि भूमिहीनों को उनके काबिज़ आवासीय भूमि का भूअधिकार और पट्टे न दिए गए तो न यह किसी सरकारी योजना का ठीक ठाक तरीके से लाभ ले सकते हैं और न ही शांति ही प्राप्त कर सकते हैं इस प्रकार देखा जाए तो यह गरीबों और भूमिहीनों के मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों का बहुत बड़ा हनन है जिस पर सरकारों को काफी गंभीरता से लेना चाहिए.

कैथा के 50 परिवारों को दसकों से नही मिला उनका आवादी और पट्टा

     ज़िले के मनगवां तहसील अंतर्गत इटहा हल्का पटवारी नंबर 2 जो की गढ़ सर्किल के अंतर्गत आता है इसके ग्राम कैथा 74 में कैथा निवासी जमीदार परिवार स्व. रामानंद पटेल के पुत्र जगदीश पटेल की आराज़ी नंबर 91/1/1 में 4 दशक से काबिज़ 50 हरिजन आदिवाशी परिवार के भूमिहीन मुखिया को आज दिनांक तक उनका आवादी पट्टा नही दिया गया है. 

    बंसपती साकेत पिता साधूलाल साकेत, अर्जुन कोल, अम्बिका कोल, मुन्नी कोल आदि द्वारा बताया गया की उन्हें और उनके परिवार को आज से कई दशक पूर्व स्व. रामानंद पटेल द्वारा अपनी भूमि पर मजदूरी करने के लिए बुलाया गया था और बसाया गया था. आगे बताया गया की रामानंद और उनके परिवार ने कहा था की इन हरिजन आदिवाशियों को कोई नही भगाएगा. लेकिन उन्हें आज तक उनके काबिज भूमि का आवादी और पट्टा नही दिया गया. अब रामानंद के मृत्यु उपरांत उनके वंशजों जगदीश पटेल और अन्य द्वारा इन गरीब हरिजन आदिवाशी परिवारों को निरंतर धमकियां दी जाती हैं की यदि इन्होंने जमीदारों की बातें नही मानी और उनके कहने के विरुद्ध किसी अन्य को वोट दिया या उनके जमीन और खेतों में काम नही किये तो इन वाशिन्दों को भगा दिया जाएगा. इस बात की शिकायत काफी समय से प्राप्त होती रही है. 

   अभी हाल ही में यह भी बताया गया की काबिज भूमिहीन हरिजन आदिवशियों के लिए पीएम आवास, मुख्यमंत्री आवास, और इंदिरा आवास आदि योजनायों सहित शौचालय एवं अन्य हितग्राही मूलक योजनाओं की राशि भी आकर वापस चली गई क्योंकि उनकी खुद की कोई पट्टे की जमीन नही होने के कारण बसाए टिकाए गई भूमि पर उन्हें मकान नही बनाने दिया गया. 

   इस प्रकार देखा जा सकता है की ग्रामीण अंचलों में अभी भी जमीदारों और धूर्त किश्म के लोगों द्वारा गरीबों का निरंतर शोषण होता चला आ रहा है और इसमें कोई विशेष बदलाव नही देखा जा रहा है.

 मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा मामला मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग में भी उठाया गया

   ज्ञात हो की कैथा में भूमिहीन हरिजन आदिवशियों के आवादी पट्टे, आवास, शौचालय आदि संबंधी मामला सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा कई बार उठाया जा चुका है. स्वतंत्र रूप से कार्य करने वाली संस्था सीजी नेट में भी कई पीड़ितों के बयान और वक्तव्य रिकॉर्ड करवाये गए थे जो सबंधितों तक भेजे जा चुके हैं. इसी प्रकार सीएम हेल्पलाइन में भी मामलों को रखा जा चुका है. यदि मानवाधिकार आयोग की बात करें तो भूमिहीनों के आवास और आवादी संबंधी मसले को मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली तक उठाया जा चुका है. 

मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग की रीवा कलेक्टर को नोटिस और हुई मात्र आंशिक कार्यवाही

    जब इस प्रकरण को सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता द्वारा मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग अरेरा हिल्स पर्यावास भवन भोपाल में रखा गया तो उस पर कार्यवाही के तौर पर ज़िला कलेक्टर रीवा राहुल जैन को आयोग ने नोटिस जारी कर दी और आवास संबंधी मानवाधिकार के उल्लंघन के इस विषय पर कलेक्टर से तत्काल जबाब तलब कर लिया जिस पर कलेक्टर ने आगे की प्रक्रिया में मनगवां तहसीलदार ए के सिंह और एस डी एम के पी पांडेय को नोटिफिकेशन जारी किया और आंशिक कार्यवाही के तौर पर तब के इटहा हल्का पटवारी संदीप गौतम और इस समय पदस्थ पटवारी रावेंद्र त्रिपाठी ने जांच की और जांच में सभी बिंदु सही पाए गए जिसमे अभी हरिजन आदिवाशी अपने पूर्वजों की तरह जगदीश पटेल और उसके पिता रामानंद पटेल की जमीन आराज़ी नंबर 91/1/1 पर बसाए मिले और अभी भूमिहीन थे अतः स्वाभाविक रूप से नियमानुसार वैधानिक तरीके से सभी हरिजन आदिवाशी वर्ग के भूमिहीन परिवार का आवादी पट्टा होना अनिवार्य पाया गया. और यही जानकारी मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग को भी पटवारी तहसीलदार कलेक्टर द्वारा भेजी गई. 

कैथा के 50 एस सी एस टी परिवार अभी भी जमीदारों के रहमोकरम पर

    यदि सही मायने में देखा जाए तो प्रथम जांच के उपरांत पूरा मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया. पटवारी हल्का इटहा नंबर 2 रावेंद्र त्रिपाठी द्वारा एक सात पन्ने का फॉर्म सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता को दिया गया जिसे पूरे 40 प्रतियों में भरवाए गए और बाद में सभी काबिज़ हरिजन आदिवाशी वर्ग में लोगों के हस्ताक्षर और अंगूठे निसानी के साथ पुनः पटवारी और तहसीलदार को दे दिया गया की अग्रिम कार्यवाही हो लेकिन पूरे 6 माह तक वह पूरा पड़ा तहसीलदार मनगवां के कार्यालय में गड्ड लगा रहा और अंत में क्या हुआ इसका आज तक कोई पता नही है. बीच में कुछ हरिजनों और अदिवशियों द्वारा बताया गया था की पटवारी द्वारा कुछ पैसों की माग की गई थी की पैसा दोगे तो एसडीएम साहब जल्दी कार्यवाही करवा देंगे.

   आज भी उन 25 आवेदनों के पावती सामाजिक कार्यकर्ता के पास है जिसे वापस मानवाधिकार आयोग को भेजा गया है. 

    अब देखना यह होगा की मप्र और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के विरुद्ध कार्यवाही पर इन जिलाधिकारियों पर क्या कुछ कार्यवाही आयोग करता है. 

कैथा हरिजन आदिवासी परिवार के 25 मुखिया जिन्होंने किया आवेदन

     अभी तक जिन 25 हरिजन आदिवाशी परिवार के मुखिया ने अपने पुस्तैनी काबिज़ भूमि पर आवादी और पट्टे का आवेदन किया है वह इस प्रकार हैं -

1) रामलाल पटेल पिता साधूलाल साकेत, 2) शिव सागर कोल पिता सुफल को;, 3) काशी कोल पिता गयानाथ कोल, 4) गयानाथ कोल पिता स्व. भवानी कोल, 5) दिवाकर साकेत पिता मोतीलाल साकेत, 6) दिनेश साकेत पिता मोतीलाल साकेत, 7) अम्बिका प्रसाद कोल पिता सुफल कोल, 8) सुरेंद्र कोल पिता सुफल कोल, 9) कैलास साकेत पिता शिवप्रसाद साकेत, 10) राजकुमार कोल पिता स्व. सुखलाल कोल, 11) रामनरेश साकेत पिता मोतीलाल साकेत, 12) राजबहोर साकेत पिता बंसपती साकेत, 13) श्रीमती मुन्नी कोल पति स्व. छोटेलाल कोल, 14) चंद्रशेखर कोल पिता अम्बिका प्रसाद कोल, 15) अर्जुन कोल पिता रामसजीवन कोल, 16) रामसजीवन कोल पिता स्व. सुखलाल कोल, 17) पन्नालाल साकेत पिता रामलाल साकेत, 18) राजेश साकेत पिता गणेश साकेत, 19) चंदन साकेत पिता रामावतार साकेत, 20) मदन मोहन कोल पिता गयानाथ कोल, 21) रामावतार साकेत पिता स्व. साधूलाल साकेत, 22) शिवप्रसाद साकेत पिता स्व. साधूलाल साकेत, 23) मोतीलाल साकेत पिता स्व. परागे साकेत, 24) कमलेश साकेत पिता रामाश्रय साकेत, 25) विमलेश साकेत पिता रामाश्रय साकेत आदि.

संलग्न - कुछ हरिजन आदिवशियों की फ़ोटो और उनके काबिज़ भूमि और उनके आवासों की फ़ोटो साथ ही वह पुख्ता प्रमाण जो हल्का पटवारी इटहा नंबर रावेंद्र त्रिपाठी द्वारा सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता को पावती के तौर पर लिखित दिया गया था.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र,

  मोबाइल नंबर 7869992139, 9589152587