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Sunday, August 26, 2018

कैथा पंचायती पुलिया निर्माण में भष्ट्राचार - लाख की पुलिया निर्माण में सरपंच सचिव सब खा गया (मामला ज़िला रीवा अन्तर्गत गंगेव जनपद का जिंसमे कैथा पंचायत सरपंच संत कुमार ने लाखों की पुलिया निर्माण में किया भष्ट्रचार, कंक्रीट के स्थान पर पंचायत भवन के पत्थर और डस्ट से बन रही बृजबल्लभ पटेल के घर के पास की पुलिया, पाइप भी पुरानी डाली)

दिनांक 27 अगस्त 2018, स्थान - गंगेव/गढ़ रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  गंगेव जनपद में भष्ट्राचार अपने चरम पर चल रहा है. गंगेव जनपद पंचायत अन्तर्गत आने वाली लगभग ज्यादातर पंचायतों में शेयर का खेल चल रहा है. जनपद सीईओ एवं राजेश सोनी नामक बाबू के करामात निरंतर जारी हैं. चाहे कोई भी सीईओ आये गंगेव जनपद में मात्र राजेश सोनी की चल रही है. सोनी बाबू ने पूरी जनपद की ऐसी तैसी करके रखी हुई है जिस पर कलेक्टर कमिश्नर तक की कार्यवाही की हिम्मत नही. अभी पिछले कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री कन्यादान योजनान्तर्गत गरीब परिवारों की शादियाँ करवाई गई थी जिंसमे जमकर फर्ज़ीवाड़ा हुआ था जिसकी खबर प्रदेश के काफी समाचार पत्रों में छपी थी. ऐसे फ़र्ज़ी जोड़ों की शादियाँ हुईं जिनके कई बच्चे भी थे.

   कैथा पंचायत में सभी पुलिया निर्माण में हुई लीपापोती

   जनपदों के लगभग सभी पंचायतों में पञ्च परमेश्वर योजनान्तर्गत पुलिया एवं नाली साथ ही पीसीसी सड़क निर्माण का कार्य करवाया जा रहा है. इस बीच कैथा पंचायत में भी कई पुलिया निर्माण एवं पीसीसी निर्माण का कार्य किया जा रहा है.

    कैथा पंचायत की पुलिया निर्माण में कंक्रीट के स्थान पर पत्थर और डस्ट का प्रयोग हो रहा है. जबकि देखा जाए तो पुलिया निर्माण के लिए 89 हज़ार रुपये के बिल में अच्छी गुणवत्ता के बालू, गिट्टी एवं 55 बोरी सीमेंट की बात आई है. संलग्न रसीद से साफ स्पष्ट है जिस 89 हज़ार रुपये का फ़र्ज़ी बिल बाउचर बनाया हुआ बताया गया है उसमे किसी भी सामग्री का प्रयोग वास्तविक धरातल पर पुलिया निर्माण में नही हो रहा है.

बृजबल्लभ पटेल के घर के पास पुलिया निर्माण में भष्ट्राचार

  बृजबल्लभ पटेल के घर के पास नामक पुलिया निर्माण की राशि एक लाख रुपये सैंक्शन हुई बतायी गई थी जिंसमे किसी राजवीर ट्रेडर्स के द्वारा 89 हज़ार रुपये सामग्री का बिल बाउचर दिनाँक 04/05/2018 को पास किया गया है. पुलिया निर्माण के लिए राशि पंचायतीराज संचालनालय द्वारा पंच परमेश्वर योजनान्तर्गत दिनांक 02/10/2016 को सैंक्शन हुई. 

   राजवीर ट्रेडर्स द्वारा जारी किये गए बिल बाउचर में इस पुलिया निर्माण हेतु एक हाइवा बालू 24 हज़ार 500 रुपये के हिसाब से, 310 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से 55 बोरी सीमेंट कुल 17 हज़ार पचास रुपये, दो हाइवा 20 एमएम गिट्टी लागत 39 हज़ार रुपये, एवं ह्यूम पाइप 3 नग लागत 9 हज़ार रुपये की बतायी गई है. इस प्रकार कुल मटेरियल की कीमत 89 हज़ार रुपये बताया गया है जिंसमे यदि वास्तविक धरातल पर देखा जाए तो 8 से 10 बोरी तक घटिया क्वालिटी की राखड़ मिली सीमेंट, पुरानी कैथा पंचायत से निकाले हुए पत्थर, और थर्ड ग्रेड की डस्ट मिलाकर मात्र 10 से 15 हज़ार रुपये के खर्च में पुल बनाई जा रही है जिसकी की फ़ोटो भी संलग्न है. इस पुलिया निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी ही नही हो रही बल्कि सीधे सीधे आंखों में धूल झोंक दिया जा रहा है जिसमे सरकार प्रशासन अंधा हो चुका है. या यूं कहें की सीईओ, इंजीनियर और अन्य अधिकारियों को इतना माल मिल चुका है की सुपरवाईज़िंग  एजेंसी अपने आप आंख बन्द कर ली है.

जनपद और ज़िला स्तर से चलाया जा रहा भष्ट्राचार का धंधा

    जिन ग्राम पंचायतों में हो रहे कार्यों में अनियमितता और भष्ट्राचार की शिकायत जनपद और जिला स्तर पर की जा रही है आखिर उसमे कलेक्टर, कमिश्नर और सीईओ कार्यवाही क्यों नही कर रहे है. क्या वजह है? बात बहुत ही स्पष्ट है की चूंकि इसमे भष्ट्राचार की राशि उच्चस्तर तक जा रही है इसलिए पंचायती कार्यों में अनियमितता की शिकायत पर कोई भी उच्चाधिकारी कोई कार्यवाही नही करता. टीएस होने से लेकर कार्य तक सभी का शेयर फिक्स होने से शिकायतो पर मात्र लीपापोती की जाती है. यदि शिकायतें की जाती हैं तो मात्र उनमे फ़र्ज़ी पंचनामा और फ़र्ज़ी प्रतिवेदन बनाकर ऊपर प्रेषित कर दिया जाता है. इसी बात को पुख्ता करते हुए बता दें की सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा वर्ष 2016 के आसपास भोपाल मंत्रालय बल्लभ भवन से लेकर पीएमओ तक दर्जनों पुख्ता शिकायतें पूरे प्रूफ के साथ भेजी गईं थीं लेकिन जब दो साल बाद उनके निराकरण का प्रतिवेदन प्राप्त हुआ तो आश्चर्य हुआ क्योंकि पीएमओ में भेजी गई शिकायत के निराकरण में जिंसमे की उच्चधिकारियों और प्रतिस्पर्धी सक्षम टीम द्वारा जांच की माग की गई थी उसकी जांच प्रतिवेदन में जनपद स्तर के बाबू द्वारा उपलब्ध करवाये गए जांच प्रतिवेदन को ही आधार बनाकर सीईओ जनपद एवं ज़िला एवं कलेक्टर रीवा तक के हस्ताक्षर तो थे ही साथ ही प्रादेशिक स्तर पर बल्लभ भवन मंत्रालय के अधिकारियों के भी वही प्रतिवेदन थे. अर्थात मामला साफ स्पष्ट था की जिस जांच और हीलाहवाली से थककर आवेदक द्वारा मामला बल्लभ भवन मंत्रालय एवं पीएमओ को इस आशय के साथ भेजा गया था की इसमे कोई सार्थक कार्यवाही होगी और साथ ही जांच स्वतंत्र एवं निष्पक्ष एजेंसी द्वारा करवाई जाकर सही निराकरण होगा उसमे पीएमओ लेवल तक कहीं कुछ नही हुआ. 

   अब प्रश्न यह उठता है की कार्यपालिका में पीएमओ से बड़ा कौन सा विभाग हो सकता है. आवेदक शिकायतकर्ता जब ज़िला स्तर की हीलाहवाली से थकता है तो सीएमओ और पीएमओ को शिकायत भेजता है लेकिन वहां भी उसे गंभीरता से लेने की बजाय मात्र औपचारिकता पूर्वक निचले स्तर पर फॉरवर्ड कर दिया जाता है नतीज़ा वही मिलता है जो पहले मिल रहा था. जांच प्रतिवेदन मात्र बाबू लेवल के कर्मचारी का ही जाएगा जो पहले ही खा पीकर बैठा हुआ है. 

    भगवान मालिक है ऐसे सरकार प्रशासन का और ऐसे लोकतंन्त्र का.

संलग्न - रीवा ज़िले के गंगेेेे जनपद अन्तर्गत वघटितहै पंचायत केेई घााटीया तरीके से निर्माण की जा रही गुणवत्ताविहीन पुलिया की फ़ोटो साथ ही पञ्च परमेश्वर योजनान्तर्गत बनाई जा रही इस पुलिया के विषय में राजवीर ट्रेडर्स नामक दुकान से जारी किये गए फ़र्ज़ी बिल बाउचर की फ़ोटो भ संलग्न भी.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139

Sunday, April 22, 2018

झोलाछाप का बोलबाला, एक का ग्यारह देने पर भी जान से हाँथ धो रहे, न दवा और न ही जीवन की कोई गारंटी, सुप्रीम कोर्ट तक के निर्देशों की कोई कीमत नही (मामला ज़िले की हज़ारों प्राइवेट क्लिनिक और झोलाछाप डक्टरों का)

दिनांक 22 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी) 

    कहते हैं सबसे सुखी निरोगी काया, पर इस मॉनव तन में रोग व्याधि भी समय समय पर आते ही रहते हैं. कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनका इलाज करवाने से राहत मिल जाती है और कुछ ऐसी व्याधियां लग जाती हैं जो शरीर के अंत के साथ ही समाप्त होती हैं.

    पुराने समय में बीमारी की स्थिति में गांव के वैद्य की दवा काफी कारगढ़ साबित होती थी. तब आयुर्वेद और जड़ी बूटियों में काफी ताकत होती थी और तब की जड़ी बूटियां स्वच्छ वातावरण में पैदा होती थीं. तब का खान पान भी इतना प्रदूषित नही था जितना आज का हो गया है. आज तो हर एक पदार्थ में दवा और प्रिजरवेटिव मिले रहते हैं. दूध में सोड़ा और यूरिया मिला रहता है, अनाज की बुवाई से कटाई और घर में स्टोर करने तक यूरिया, डीएपी, कीटनाशक, सल्फास और पता नही क्या क्या डाला रहता है. ऐसे में आज जब हम यह भोजन करते हैं तो यह जहर हमारे शरीर में प्रवेश कर हमारे शरीर के रोग प्रतिरोधक शक्ति को कमजोर कर विभिन्न प्रकार की साध्य और असाध्य बीमारी का तोहफा दे जाता है जिससे लड़ने के लिए हमारा जीवन पर्याप्त नही हो पाता.

   बीमारी तो होना आजकल एक आम बात हो गई है, और मौसमी से लेकर विभिन्न बीमारियां, पर यदि उसका अच्छे डॉक्टर से समय पर इलाज हो जाए तो निजात मिल जाती है. पर आज ग्रामों कस्बों में अच्छे डॉक्टरों का अभाव है जिससे झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला हो गया है. आज फार्मेसी की डिग्री और मेडिकल स्टोर खोल पाने की डिग्री धारक भी एम बी बी एस, एम डी, और सर्जरी का काम कर रहे हैं. अभी पिछले दिनों थाना गढ़ अंतर्गत इटहा ग्राम के हीरालाल पटेल ने बताया की उसकी पत्नी को डायबिटीज की समस्या थी और उसका इलाज चल रहा था इसी बीच उसकी तबियत अचानक खराब हो गई और वह पास ही स्थित गढ़ कस्बा के किसी डॉक्टर के पास गया और अपनी पत्नी का इलाज करवाया. इन बंगाली और बनारसी किश्म के डक्टरों ने कुछ ऐसा इलाज कर दिया की बिना जांच पड़ताल के 50 का ग्लूकोस बोतल 500 में चढ़ा दिया और हीरालाल की औरत का शुगर लेवल अचानक बढ़ कर कंट्रोल से बाहर हो गया. जब वह पूरी तरह से मरने लायक हो गई तो डॉक्टर साहब ने कहा की अब आप इन्हें रीवा या अन्यत्र लेकर चले जाएं हमारे बस की बीमारी नही है. रीवा जाते जाते और भर्ती कराते कराते उसकी पत्नी ने अंतिम सांस ले ली. हीरालाल ने बताया की उनकी अभी बेटी भी शादी करने योग्य है. उसकी पत्नी के अकस्मात मरने से उसका जीवन नीरस हो गया है।

     इसी प्रकार पिछले दो वर्ष पहले कैथा निवासी अम्बिका मिश्रा भी किसी हिनौती के झोलाछाप डॉक्टर के चक्कर मे पड़कर अपनी जान गवां बैठे। मामला जब अंतिम स्थित में आया तो गंगेव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया जहाँ बीच रास्ते मे ही अम्बिका की मृत्यु हो गयी।

गढ़, गंगेव, हिनौती, कटरा, कलवारी, भठवा और लालगांव में चलता है झोलाछाप का बोलबाला 

    वैसे तो पूरे ही ज़िले और संभवतः प्रदेश में ही आज फ़र्ज़ी किश्म की डिग्री लिए हुए, फार्मेसी और मेडिकल की दुकान खोलने की डिग्री लिए हुए फ़र्ज़ी डॉक्टर सर्जरी और मेडिसिन जैसे बड़े डॉक्टरों का काम कर रहे हैं परंतु सबसे ताजुब्ब की बात यह है की इस सबको सीएमएचओ और फूड्स एंड ड्रग्स डिपार्टमेंट के अधिकारी जानते हैं लेकिन सबकी मासिक बंधी होने के चलते कोई कार्यवाही नही होती. 

    ज़िले के सभी छोटे बड़े कस्बों में इन झोलाछाप का बोलबाला है परंतु यह सब जानते हुए भी शासन प्रशासन कार्यवाही से कतरा रहा है. थाना गढ़ और लालगांव चौकी क्षेत्र में ही अकेले गढ़, तेंदुआ, परासी, कलवारी, कटरा, हिनौती, लालगांव, भठवा सहित अन्य जगहों पर इन झोलाछाप डॉक्टरों ने अपनी दुकानें खोल कर रखी हैं. इनमे ज्यादातर मेडिकल स्टोर में संचालित होते हैं. मेडिकल स्टोर के नाम पर अपना आला पाला रखे हुए यह झोलाछाप डॉक्टर आम जनता की खूब जमकर लूटाई कर रहे हैं. 

   बेचारे गांव के लोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अभाव और साथ ही जहां भी ऐसे केंद्र बने हुए भी हैं वहां उचित तरीके से संचालित न होने के कारण इन झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में पड़ने को मजबूर हो जाते हैं. छोटी बीमारी की स्थिति में भी मेडिकल दुकान में जाएंगे और मेडिकल दुकान पर बैठे झोलाछाप के चंगुल में पड़ जाएंगे. 2 रुपये का इंजेक्शन 200 रुपये में और 40 रुपये का बॉटल 800 रुपये में चढ़ाएंगे. 

फ़र्ज़ी क्लिनिक तक हैं संचालित, बिना साइन पर्ची, एक्सपायरी डेट की दवाईयां 

   बात मात्र 1 का 11 बसूलने तक ही सीमित नही है. यहां तो बहुत सी समस्याएं हैं जिन्हें गौर किया जाना चाहिए

  --- चूंकि क्लिनिक फ़र्ज़ी होती हैं अतः दवा पर्ची में कौन डॉक्टर इलाज किया इसका कोई सबूत नही छोड़ा जाता. किसी भी पर्ची में डॉक्टर के हस्ताक्षर नही होते. इन दवा पर्चियों में मरीजों के नाम भी नही लिखे रहते.

 --- इन फ़र्ज़ी क्लीनिकों पर कोई ओ पी डी रजिस्टर नही होता. जिससे इस बात की कोई जनकारी नही होती की कौन से मरीज कहाँ से कब आया किसका इलाज किया गया और उसको क्या बीमारी डायग्नोज़ की गई. यह सब इसलिए होता है क्योंकि यदि कहीं भूल से ओ पी डी रजिस्टर बनाया गया तो उससे इन फ़र्ज़ी क्लीनिक पर कार्यवाही हो अक्ति है.

 --- जिस प्रकार एक एम बी बी एस अथवा एम डी डिग्री धारक डॉक्टर अंग्रेज़ी दवा से इलाज करते समय उसका उचित डोज़ और उसके रिएक्शन के होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के लिए दूसरी दवाईयों की पुख्ता जानकारी रखता है उसके विपरीत इन झोलाछाप डॉक्टरों के पास इसकी कोई जानकारी नही होती. ज्यादातर देखा गया है की मर्ज़ के इलाज के वक्त पहले से ही यह झोलाछाप डॉक्टर एक दो एविल की टेबलेट खिला दिया करते हैं जिससे रिएक्शन ही न हो. पर बिना रिएक्शन हुए ही एविल की गोली खिलाना भी उचित नही. रिएक्शन और दुष्प्रभाव से होने वाली मौत बढ़ रही हैं. जब झोलाछाप के बस में नही रह जाता तो आनन फानन में मरीज को रिलीव करके कट लेते हैं.

 --- क्योंकि मरीज के नाम पर कोई पुख्ता रशीद नही होती इसलिए जी एस टी और अन्य टैक्सेशन से बचे रहते हैं जिससे सरकार के खजाने में चूना लगता रहता है. 

 --- संबंधित ग्रामीण अंचलों में यह झोलाछाप डॉक्टर अपने आपको शांतिदूत बताकर इलाज करते हैं. इनका कहना होता है की यदि आप शहर में जाएंगे तो वहां डॉक्टर आपसे भारी भरकम 500 रुपये की फीस लेगा और दुनिया भर की तकलीफें होंगी. हमारी कोई फीस नही है. इस प्रकार झांसा देकर यह झोलाछाप गरीब और अनपढ़ ग्रामीणों को अपने चंगुल में फंसा लेंगे और उस फीस की वशूली इंजेक्शन, गोली दवा और बॉटल में कर लेंगे. 2 रुपये के इंजेक्शन की कीमत 200 रुपये और 2 रुपये की गोली की कीमत 20 रुपये लेते हैं. इसी प्रकार बिना किसी बीमारी के ही दनादन बोतल चढ़ाते जाएँगे जिस पर जमकर वशूली करेंगे.

रीवा हार्ट स्पेशलिस्ट के डी सिंह ने कहा इस मृत को अब यहां लेकर क्यों आये हो फेंक दो इसे रोड में

अभी हाल ही में कैथा निवासी रामखेलावन द्विवेदी पिता स्व. लोकनाथ द्विवेदी भी इन झोलाछाप और अधूरे ज्ञान वाले डॉक्टरों के चंगुल में फंस गए. गनीमत तो यह थी की आनन फानन में रामखेलावन को रीवा रेफेर किया गया जहां से उनकी स्थिति में सुधार न होने पर भोपाल के चिरायु अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनका हफ्तों इलाज चला  और तब जाकर राहत मिली. 

   मामला यूं था की रामखेलावन द्विवेदी को डायबिटीज और हार्ट की तकलीफ बतायी गई थी जिसका पहले से रीवा स्थित हार्ट विशेषज्ञ के डी सिंह से इलाज चल रहा था. फिर दवा खत्म होने के कारण गांव में उन्हें तकलीफ बढ़ गई जिस पर उन्होंने कटरा स्थित किसी अधूरी डिग्री और अधूरे ज्ञान वाले झोलाछाप डॉक्टर को दिखा दिया. उस डॉक्टर महाशय ने रामखेलावन को बॉटल ठोंक दिया जिससे ग्लूकोस अधिक हो जाने से शुगर लेवल हाई हो गया. हार्ट में अचानक दर्द बढ़ गया, फेंफड़े में पानी भर गया. जब स्थिति कंट्रोल से बाहर दिखी तो डॉक्टर महाशय ने जबाब दे दिया. रामखेलावन को उहापोह में रीवा लेजाकर संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके पहले वाले डॉक्टर के डी सिंह को बुलाया गया. के डी सिंह ने जब मरीज को इस स्थिति में देखा तो यहां तक कह दिया की इस मृत शरीर को मेरे पास लेकर क्यों आये हो जाकर फेंक दो रोड में. मतलब यह था की स्थिति 80 प्रतिशत कंट्रोल से बाहर थी. बताया गया की रामखेलावन का हार्ट 80 प्रतिशत डैमेज हो चुका था और बचने के चांस नही थे. इस पर उनके परिजनों ने उन्हें चिरायु अस्पताल में भर्ती कराया जहां किसी दिल्ली से आये हार्ट विशेषज्ञ आर के सिंह ने जाकर हफ्तों इलाज किया और रामखेलावन को मृत्युशैया से वापस लाया. तो यह कहानी है हमारे देश की मेडिकल फैसिलिटी और चिकित्सकीय अव्यवस्था की. इस पर ध्यान देने वाला कोई नही है जबकि लगभग रोज ही इन झोलाछाप डॉक्टरों के काले कारनामे किसी न किसी मीडिया ग्रुप और न्यूज़पेपर में उजागर होते रहते हैं. इस विषय मे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी गाइड लाइन जारी कर रखी है लेकिन कोई अमल नही हो रहा।

संलग्न - ऐसे ही झोलाछाप डक्टरों की लिखी कुछ दवा पर्चियां जो ग्रामीण मरीजों को दी गईं थी जो वह लाकर सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दिखाए हैं यहां पर संलग्न हैं.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र

 मोबाइल - 7869992139, 9589152587

Wednesday, January 24, 2018

Rewa, MP - बिजली विभाग का बिल नही फतवा, जारी हुआ तो भरना ही पड़ेगा

दिनांक 25 जनवरी 2018, रीवा/कटरा मप्र
(शिवानंद द्विवेदी, रीवा मप्र) ज़िले में बिजली विभाग का कहर निरंतर जारी है। कटरा डीसी सहित अन्य वितरण केंद्रों में बिना कनेक्शन और मीटर बैठाए ही औसत बिलिंग की जा रही है। हफ्ते की तरह उपभोक्ताओं से उगाही की जा रही है।
    अभी हाल ही में सूचना मिलने पर त्योंथर तहसील एवं ब्लॉक के जमुई पंचायत में पहुचा गया तो पाया गया कि जमुई ग्राम के हरिजन आदिवासी बिजली विभाग के औसत बिलिंग से परेशान थे। सभी ने अपना बिजली का बिल दिखाया और बताया कि राजीव गांधी विद्युतीकरण मिशन के तहत उनके घरों में बकायदे मीटर लगाकर बिजली कनेक्शन दिया जाना था लेकिन बिजली ठेकेदार द्वारा उल्टा सभी से 100 रुपये प्रत्येक के हिसाब से लिये गए और केवल कुछ घरों में खराब मीटर का डिब्बा तो बिठा दिया गया लेकिन उन्हें कोई कनेक्शन नही दिया गया।
     आज 6 माह से ऊपर हो रहे हैं और औसत बिलिंग की जा रही है लेकिन किसी भी घर मे मीटर से लाइन सप्लाई नही हो रही है।
     अब यदि देखा जाए तो यह किस्सा मात्र कटरा डीसी अथवा जमुई ग्राम का ही नही है बल्कि रीवा के बिजली विभाग में आम व्यक्ति का निरंतर शोषण चल रहा है। लगभग सभी ग्रामों में निवासरत गरीबों के यहां मुश्किल से 1 य 2 एल ई डी बल्ब और वह भी रात में जलते हैं, साथ ही ग्रामों में बड़े ही मुश्किल से 6 से 8 घंटे भी लाइन नही दी जाती ऐसे में लाइन लॉस और औसत बिलिंग के नाम पर गरीबों के नाम हज़ारों का फतवा जारी करना कहां तक उचित है।
     कटरा डीसी में पूरे जिले के ग्रामों की ही तरह 90 प्रतिशत से अधिक घरों में मीटर नही लगाए गए हैं और मात्र औसत बिलिंग की जा रही है। केबलिकरन, फीडर सेपरेशन और मीटर बैठाने की पूरी राशि हजम कर ली गई है।
     जहां तक जमुई ग्राम के हरिजन अदिवशिओं का मामला था उनका कहना था कि उन्होंने तो अब तक कोई बिजली ही नही जलाई है फिर भी उनके नाम पर कैसे बिजली बिल भेजे जा रहे हैं
    हरिजन  बस्ती के लालमणि, रामसखा, रमेश, उमेश, दिलराज, सूर्यभान, रामावतार, रामकरण आदि ने बताया कि वह सभी बिना मीटर रीडिंग के औसत बिलिंग से पीड़ित है  और सभी ने यह बात कटरा डीसी में उठाई है लेकिन कोई नही सुन रहा और बस मनमाना बिल भेजे जा रहे है। सभी ने एक स्वर में सभी घरों में मीटर लगाकर रीडिंग के आधार पर बिलिंग की माग की है।
संलग्न - हरिजन बस्ती जमुई के हरिजनों की सामूहिक फ़ोटो जो बिजली बिल से प्रताड़ित है।
    - शिवानंद द्विवेदी सामाजिक आर टी आई कार्यकर्ता रीवा मप्र। 7869992139