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Saturday, February 25, 2017

(Rewa, MP) श्रीमती मेनका गाँधी जी का कलेक्टर रीवा को अल्टीमेटम – तत्काल जांच कर करो कार्यवाही


दिनांक – 26/02/2017
स्थान –  (रीवा, मप्र)


अवैध बाड़ों में गौवंशों की करुण पुकार पहुची दिल्ली तक - श्रीमती मेनका गाँधी जी के आदेश पर कलेक्टर ने गठित की एसडीएम और डिप्टी डायरेक्टर पशु चिकित्सा विभाग की संयुक्त टीम

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) दिनांक 24 फरवरी महाशिरात्रि के दिन भगवान् शिव के वाहक नंदी की माता श्री गौमाता की अवैध बाड़ों में हो रही हत्याओं की करुण पुकार जब श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय नई दिल्ली तक पहुची तो वहां से कलेक्टर रीवा को फ़ोन कर तत्काल पुनः एक जांच टीम का गठन कर संयुक्त टीम में एसडीएम मनगवां के पी पाण्डेय और डिप्टी डायरेक्टर पशु-चिकित्सा विभाग रीवा को सम्बंधित अमलों के साथ भेज दिया गया. जांच के दौरान आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को भी मोबाइल फ़ोन के माध्यम से कॉल करके घटना स्थल पर हिनौती के पास पाण्डेय ढाबा में बुलवाया गया.

श्रीमती मेनका गाँधी जी का कलेक्टर रीवा को अल्टीमेटम – तत्काल जांच कर करो कार्यवाही

जाँच के दौरान एस डी एम के पी पाण्डेय द्वारा बताया गया की यह जांच टीम केन्द्रीय मंत्री एवं पशु कल्याण विभाग की अध्यक्ष श्रीमती मेनका गाँधी जी सहित दर्ज़नों विभागों को एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट एवं सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा भेजे गए दर्ज़नों ईमेल जिसमे की थाना गढ़ अंतर्गत हिनौती, सोनवर्षा, हर्दी-अटरिया, लौरी, गंतीरा-कटरा, एवं लोटनी के अवैध बाड़ों की फोटो विडियो सहित सबूत के तौर पर भेजे गए साक्ष्यों पर कार्यवाही के फलस्वरूप है. श्रीमती मेनका गाँधी जी सहित अन्य विभागों को भेजे गए साक्ष्यों फोटो, विडियो आदि में दिखाए गए इंटरव्यू आदि में कई दर्ज़नों गायें बाड़ों में भूंख प्यास से बिना किसी छत्र-छाया के मृत पाए गए थे.  
   इस जांच के विषय में आवेदक को भी श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय से प्राप्त ईमेल में यह जानकारी भेजी गयी थी की गौवंशों के प्रति हो रही प्रताड़ना के विषय में कलेक्टर से भी मैडम की बात की गयी थी जिसके फलस्वरूप कलेक्टर ने दो सदस्यीय टीम का गठन किया था और तीन दिवश के अन्दर जांच प्रतिवेदन मागा था. 

गौ-अभयारण्य के लिए 1300 एकड़ से अधिक का शासकीय भूभाग उपलब्ध

    इस प्रकार दिनांक 24 फरवरी महाशिवरात्रि के दिन जांच हुई और जांच के दौरान आवेदक को भी घटनास्थल पर बुलाया गया. जांच में आवेदक से गौवंशों के प्रताड़ना में किये गए कार्य के विषय में जानकारी चाही गयी. आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता ने गौवंशों की सुरक्षा के लिए देश के उच्चतम कार्यालयों तक भेजे गए अपनी मांग और आवेदन जिसमे की सिरमौर तहसील अंतर्गत हिनौती हल्का 39 के गदही नामक स्थान में 1300 एकड़ से अधिक के शासकीय भूभाग में गौ-अभयारण्य बनाए जाने की बात कही गयी है, इस बात से भी कलेक्टर रीवा द्वारा भेजे गए दो सदस्यीय जांच दल को अवगत कराया गया. इस बीच आवेदक द्वारा कलेक्टर रीवा, पशुपालन एवं पशुसंवर्धन विभाग भोपाल, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया चेन्नई, चीफ सेक्रेटरी मप्र शासन भोपाल, एवं डीजीपी भोपाल मप्र शासन को भी भेजे गए विभिन्न आवेदनों की प्रतिलियाँ सौंपीं.

हिनौती हल्का के गदही में गौ अभयारण्य बनाया जाना
गौवंशों के लिए साबित होगी एक नवनीत पहल

     इस प्रकार जांच लगभग दो घंटे के आसपास चली जिसमे आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता की भी बाड़ों के विषय में मंशा चाही गयी. इस पर सामाजिक कार्यकर्ता का स्पष्ट कहना था की ऐसे निराकरण निकाले जाने चाहिये जिसमे पशुओं के साथ क्रूरता भी न हो और साथ ही किसानों को भी नुकसान न हो. इस प्रकार तात्कालिक रूप से सभी अवैध बाड़ों में कैद पशुओं को सर्वप्रथम जिले एवं प्रदेश की गौशालाओं में पहुचाया जाना चाहिए जहाँ पर इनका इलाज़ एवं पोषण होना चाहिए जिससे अत्यंत कमज़ोर हो चुके गौवंशों की जाने बचाई जा सके और साथ ही भविष्य में गौवंशों की प्रताड़ना को रोकने और किसानों के हित की रक्षा के लिए हिनौती हल्का 39 के गदही नामक ग्राम/स्थान पर 1300 एकड़ से अधिक के शासकीय और अनुपयोगी भूभाग पर विशाल गौ अभयारण्य बनाया जाना चाहिए. ऐसा बनाया जाने वाला अभयारण्य न सिर्फ गौवंशों की सुरक्षा, पालन, पोषण एवं इलाज़ के लिए एक नवनीत पहल होगी बल्कि इस प्रकार बने गौ अभयारण्य से बायो-खाद उत्पादन, बायो-कीटनाशक, दुग्ध उत्पाद, एवं रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी जिससे लगातार रासायनिक खादों, एवं कीट नाशकों के हो रहे निरंतर प्रयोग से बंजर पड़ चुकी धरती से की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी.

सभी जांचें मात्र कागजों पर - यथार्थ में अब तक कहीं कुछ भी नहीं

वहरहाल जब तक इन पशुओं के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं की जाती तब तक यह सभी जांचें मात्र कागजों पर ही सीमित रह जाएँगी. यह कोई अकेली जांच नहीं है जो आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के प्रयासों से हो रही है. इसके पहले भी लगभग हर माह उच्चस्तरीय दो तीन जांचें होती रही हैं परन्तु कोई भी जांच का अब तक सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल पाया है. सभी अवैध बाड़े ज्यों के त्यों अपने स्थानों पर बने हुए हैं और उनमे कैद गौवंशों की निरंतर मौतें जारी हैं. मानकों की बात तो छोंड ही दें, इन मूक बेजुवान पशुओं के लिए न कोई चारा, न कोई भूषा, न ही किसी समुचित छाया की व्यवस्था बनाई गयी है. स्थिति इतनी दुखदायी है की आँखों से अंशु प्रवाहित हो चलें. शायद भगवान् के अतिरिक्त इस धरती पर इन मूक बेजुवानों की दुर्दशा को देखने सुनने वाला कोई नहीं बचा है. और जहाँ तक भगवान् का प्रश्न है तो शायद उसने तो इन पशुओं को इस पशुविक योनी में ही इसलिए कलयुग में भेजा है की के यह इसी तरह अपने पूर्व जन्मों के कर्म संस्कारों का बुरा फल भोगें. जहाँ तक मानव द्वारा इनकी निरंतर की जा रही प्रताड़ना का प्रश्न है तो कहना यह होगा की मानव अपने कुकर्मों और दुष्कर्मों से भारतीय संस्कृति के हिन्दू धर्म के अनुसार यह सब गौहत्या आदि घृणित कृत्या करके अपने जन्मों को और अधिक विगाड़ रहा है. जिस हिन्दू सनातन संस्कृति में गौवंशों की पूजा माता समझ कर की जाती रही है उसकी यदि आज यह दुर्दशा है तो यह सम्पूर्ण भारतीय इतिहास के स्वर्ण पन्नों पर घोर कालिख तो है ही इन मानव के रूप में राक्षसों की भी अंतिम स्थिति को ही दर्शाता है. संभवतः मानव का पतन इस कलयुग में इससे अधिक और कितना हो पायेगा यह देखना होगा. शास्त्रों में तो यह भी कहा गया है कि गौमांस भक्षण और जीव हत्या के साथ ऐसा भी समय आएगा जब यह पतित मानव स्वयं मानव की ही मांस भक्षण प्रारंभ कर देगा. कैनिबल अर्थात मानव-मांस भक्षी होकर व्यक्ति स्वयं शास्त्रों में वर्णित राक्षस हो जायेगा. फिर इस धरती पर दस मुख, बीस हाँथ आदि वाले राक्षस ढूँढने की जरूरत किम्व्दंतियों में न पड़ेगी सब कुछ साक्षात् ही दिखने लगेगा.

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Shivanand Dwivedi
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Thursday, February 16, 2017

(Rewa, MP) जिले भर के अवैध बाड़ों में गौवंशों के मौत का खेल बदस्तूर जारी - शासन-प्रशासन सोया चिरनिद्रा


दिनांक: 16/02/2017, स्थान: रीवा मप्र


दिनांक 15 फरवरी को हिनौती पंचायत के पाण्डेय ढाबा के पास बने अवैध बाड़े में भूंख प्यास से हुई कुछ और गौवंश की मौत

(गढ़/गंगेव/कांकर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) गौवंशों के लिए जिले में बनाए गए अवैध बाड़ों में स्थितियां सुधरने की कगार पर बिलकुल ही नहीं दिखतीं. कारण स्पष्ट है की जब तक इन अवैध बाड़ों को नष्ट ध्वस्त का हटाया नहीं जाएगा तो भला स्थितियां क्या अपने आप ही सुधर जाएँगी?
आये दिन रोज़ जिले के सभी अवैध बाड़ों में बिना चारा पानी, भूषा, और छाया के बेजुबान गौवंशों की तड़प-तड़प कर मौत का शिलसिला निरन्तर जारी है जिसे देखने वाला न तो कोई शासन प्रशासन है और न ही कोई समाज और उसके ठेकेदार. आज स्थिति यह हो चुकी है की गौवंशों के लिए तथाकथित फसल सुरक्षा के नाम पर बनाए गए यह अवैध बाड़े किसी बूचड़ खाने से ज्यादा भयावह स्थिति में नज़र में आते हैं. जिस प्रकार विश्व युध्य के दौरान यूरोप में नाजियों और उनके समर्थकों के द्वारा यहूदियों को प्रताड़ित करने और मारने के उद्येश्य से घेटो और गैस-कैंप बनाये गए थे जहाँ यहूदियों को मरने के लिए छोंड दिया जाता था, ठीक उसी तरह पूरे रीवा जिले और यहाँ तक की प्रदेश में जगह-जगह पर अवैध तरीके से कानून को ताक पर रखकर अवैध बाड़े बनाए गए हैं जिनमे किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था न तो इस समाज और न ही शासन-प्रशासन द्वारा की गयी है लिहाज़ा रोज़ ही गौवंश भूंख प्याश से तड़प-तड़प कर मर रहे हैं और इस आस ए हैं की शायद कोई तो आकर इन्हें बचाए. पर भला इस कलयुग में अब कृष्ण कहाँ जो आततायियों को अपने चक्र सुदर्शन से छड़ों में नष्ट कर देते और धर्म की पुनः स्थापना करते. पर भले ही कृष्ण सदेंह न हों पर भारत का संविधान तो है जिसमे इन पशुओं को भी कुछ तो अधिकार प्राप्त हैं जो कानूनी तौर पर लागू होने चाहिए. अब प्रश्न यह उठता है की इन अधिकारों को इन कानूनों को लागू तो शासन प्रशासन को ही करवाना है न?

यह कोई पहली बार नहीं है की मीडिया में गौवंशों की प्रताड़ना की बाते आ रही हैं. पिछले कई महीनों से ठण्ड प्रारंभ होते ही नवम्बर माह से लगातार अवैध बाड़ों में मरने वाले मवेशियों की खबरें मीडिया में निरन्तर आती रही हैं और कई बार ईमेल, लिखित, मोबाइल, दूसरे कम्युनिकेशन के माध्यम से शासन-प्रशासन के समक्ष रखी गयीं थी परन्तु मजाल क्या है की सिर्फ कागज़ी घोड़ों के अतिरिक्त इस देश-प्रदेश के शासन-प्रशासन के कान तक जूं भी रेंग पाई हो.
दुर्भाग्य है इस देश और समाज का की जिन गौवंशों का सरोकार सीधे भारतीय संस्कृति से हैं आज भारतीय जनता पार्टी जैसे अपने आपको हिन्दूवादी पार्टी बताने वाली पार्टी और अन्य दुनिया भर के हिंदूवादी संगठन और यह सरकार गौवंशों के लिए क्या कुछ कर रही है आज यह पूरे समाज में विदित हो चुका है. श्री शिवराज सिंह चौहान और श्री नरेंद्र मोदी जी कृपया देखने का कष्ट करें की क्या आपकी पार्टी के शासन काल में गौवंशों की यही दुर्दशा होगी? देखना यह भी होगा की कहीं इन बेजुबान गौवंशों पर हो रही राजनीति से यह तथाकथित हिंदूवादी संगठन और पार्टियाँ गौवंशों के श्राप से भस्मीभूत होकर सदैव के लिए ही न विलुप्त हो जाएँ. क्योंकि यदि ह्रदय और इमानदारी से गौवंशों की सुरक्षा के लिए प्रयास न किये गए तो ईश्वर भी इन्हें माफ़ न कर पायेगा.      


संलग्न – हिनौती के पास बनाए गए अवैध बाड़े के पास कल दिनांक 15 फरवरी को मृत पड़े कुछ मवेशी और साथ में बिना किसी चारा पानी के कमज़ोर और मरने की कगार पर अन्य गौवंश के छायाचित्र.


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Thursday, February 9, 2017

(Rewa, MP) कांकर-डाढ़ पंचायती क्षेत्र में तार से गायों का बाँध दिया जाता है मुह, चारा पानी बिना तड़प कर मरते गौवंश


कांकर-डाढ़ पंचायती क्षेत्र में तार से गायों का बाँध दिया जाता है मुह,
चारा पानी बिना तड़प कर मरते गौवंश


(गढ़/कांकर/गंगेव, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) गौवंशों के प्रति क्रूरता किसी भी हद तक कम होने का नाम नहीं ले रही है. दिनांक 07 फरवरी की सुबह लगभग नौ बजे एक और ह्रदय विदारक वाकया सामने आया जिसमे एक भूरे-लाल रंग की गाय के मुख में तार बांधकर उसे छोंड दिया गया था. स्वाभाविक है की इस स्थिति में गाय न तो कुछ खा सकती थी और न ही पी सकती थी. मामला था रीवा के त्योंथर तहसील अंतर्गत कांकर पंचायत और डाढ़ पंचायत के आसपास का. भमरिया में अवैध बाड़े में पशुओं के मरने और उनके ऊपर क्रूरता का प्रकरण रिकॉर्ड करने के बाद जैसे ही आगे जाया गया तो पाया गया की कांकर में वन चौकी के पास एक गाय का मुख बुरी तरह से तार से बाँध दिया गया है. वह इधर उधर घूम रही थी पर कुछ भी खाने पीने में असमर्थ थी.
 वन चौकी कांकर के पास उपस्थित चौकी गार्ड को मामला बताया गया तो चौकी गार्ड ने गाय का तार निकालने का प्रयास किया. परन्तु गाय अकेले पकड़ में नहीं आ पाई. इस प्रकार मामले को डाढ़ पंचायत के निवासी पुष्पराज तिवारी, इन्द्रलाल साकेत आदि को बताया गया. तब जाकर चार-पांच लोगों के सहयोग से गाय को किसी तरह पकड़कर उसके मुख में बांधा हुआ तार निकाला गया. सम्पूर्ण घटना की फोटो एवं विडियो रिकॉर्डिंग भी कर ली गयी है जो की यूट्यूब में भी अपलोड कर दी गयी है जिसे पूरी दुनिया देख सकती है
.    
घटना का स्थल पंचनामा बनाकर गढ़ पुलिश को सूचित किया गया
     
गाय के मुख में बंधे तार और उसे निकालने के सम्पूर्ण प्रकरण का स्थल पंचनामा भी बनाया गया. जिसमे वहां पर उपस्थित सभी लोगों ने अपना हस्ताक्षर किया जो की यहाँ पर संलग्न भी है. पूछताछ करने पर भी यह जानकारी नहीं हो पायी की वह कौन से असमाजिक क्रूर व्यक्ति थे जिन्होंने ऐसा घोर कृत्य किया. सम्पूर्ण घटना की जानकारी गढ़ थाना प्रभारी बी आर सिंह को भी मोबाइल फ़ोन के माध्यम से दे दी गयी. लेकिन दुर्भाग्य यह है की गौवंन्शों और पशुओ के साथ निरंतर हो रही क्रूरता और अत्याचार पर अब तक रीवा जिले में रोक नहीं लग पा रही है.

लालगांव के हर्दी-अटरिया में बने अवैध बाड़े में दिनांक 09 फरवरी
को कुछ और गायों का हुआ दुखद अंत

     इसी बीच दिनांक 09 फरवरी दिन वृहस्पतिवार को लालगांव पंचायत स्थित हर्दी-अटरिया नामक स्थान पर जाया गया तो वहां का नज़ारा देखकर होश उड़ गए. जिस हर्दी-अटरिया के अवैध बाड़े को पुलिश बंद बता रही थी वहां पर पुनः वही बाड़ा बना हुआ पाया गाय. इतना ही नहीं जाब बाड़े की व्यवस्था देखा गया तो पता चला की सी ई ओ जनपद पंचायत गंगेव के माध्यम से प्राप्त हुआ कटीला तार अभी भी बाड़मे लगाया हुआ है. इस बात से साफ़ जाहिर होता है की पूरे ब्लाक गंगेव में बने अवैध बाड़ों में कहीं न कहीं शासन प्रशासन की सः है अन्यथा आम आदमी में इतनी जुर्रत कहाँ की वह कानून को इतनी आसानी से हाँथ में ले सके.  
घटना स्थल पर कटीले तारों के अन्दर बनाये गए बाड़ों में तीन चार गायें दयनीय स्थिति में नज़र आयें जो बहुत जल्दी मरने वाली थीं और एक गाय तो मृत बाड़े में ही पड़ी हुई थी जिसके शरीर से बदबू भी आ रही थी जो की बाड़े में महामारी फ़ैलाने का साफ़ साफ़ इशारा कर रही थी. इस प्रकार देखा जा सकता था की जिन असामाजिक तत्वों और गौ हत्यारों ने अवैध तरीके से बाड़ा बनाया हुआ था उन्होंने न तो कोई उचित चारे पानी की व्यवस्था की हुई थी और न ही मृत पड़े सड़ांध लिए मवेशी को उठाने की ही कोई व्यवस्था थी. आज गौवंशों के प्रति क्रूरता दिन पर दिन बढती जा रही है. कहीं न कहीं यह स्वर्हती मानव आज गौवंशों की वश्यकता कम हो जाने के कारण बैलों को आवारा छोंड दे रहा है जिससे वह तथाकथित किसानों की फसलों को नुकसान पंहुचा रहे हैं और जिसके कारण लोग कानून को धता बताकर गौवंशों के ऊपर निरंतर अत्याचार कर रहे हैं.

बैलों और पशुओं की देशव्यापी सीमित नसबंदी समाधान का एक पहलू

   यद्यपि सुनने में तो थोडा अटपटा लग सकता है पर कहना पड़ेगा की यदि आज बैलों और गौवंशों की आवश्यकता इस समाज को कम है तो क्यों न पशुपालन और पशु चिकत्सा विभाग के सहयोग से सरकारें इन पशुओं की नसबंदी करवा दें. इससे कम से कम यह तो होगा की एक जनरेशन के बाद दूसरी जनरेशन सीमित हो जाएगी जिससे इन बेजुबान एवं मूक गौवंशों और पशुओं के ऊपर अत्याचार होने से बचाया जा सकता है. अब जहाँ तक सवाल है मानव की उपयोगिता का तो यदि आज इस कलयुगी मानव को गौवंश और गायें बूढ़े माँ बाप की तरह भार बन गयी हैं तो इस मानव को दुग्ध उत्पाद खाने पीने का भी कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. राईट टू मिल्क प्रोडक्ट यानि दुग्ध उत्पाद काधिकार के अंतर्गत सरकारें ऐसा संवैधानिक नियम कानून लायें जिसमे हर वह व्यक्ति जो दुग्ध उत्पाद का सेवन करे उसे गौवंशों की सुरक्षा और एनिमल वेलफेयर के लिए एक निश्चित टैक्स देना पड़े तब जाकर गौवंसों की स्थिति में सुधार हो सकता है और उनके पालन और सुरक्षा के लिए देश व्यापी बजट का आवंटन कर कार्य किया जा पायेगा. शासन-प्रशासन के साथ समाज की भी जिम्मेदारी गौवंशों की सुरक्षा के लिए तय होनी चाहिए और जो भी जिम्मेदारी से भागे उसके ऊपर ऐसे बनाये गए राईट टू मिल्क प्रोडक्ट अधिनियम के तहत दुग्ध उत्पाद से वंचित किया जाना चाहिए.  

जिले में पशु सुरक्षा और पशु क्रूरता सम्बन्धी सभी अधिनियम निष्क्रिय

कहने को तो पशुओं और गौवंशों की सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हैं पर देखना होगा की उन नियमों का पालन क्या कहीं भी पूरे मप्र में सही तरीके से हो पा रहा है. मप्र में विशेष तौर पर गौवंश प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक वर्ष 2010/12 में पारित किया गया जिसमे गौवंशों के वध पर और प्रताड़ना पर पांच हज़ार तक का जुर्माना और अधिकतम सात साल के कैद का प्रावधान है और यह अपराध संज्ञेय भी है साथ ही आरोपी को अपने आप को दोषमुक्त सिद्ध करना पड़ेगा ऐसा प्रावधान है. इसी प्रकार पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत भी कई प्रावधान हैं जिन्हें यदि कड़ाई से लगाया जाये तो पशुओं और गौवंशों के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता काफी हद तक बंद की जा सकती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के अंतर्गत भी पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही करने का प्रावधान है.

संलग्न – त्योंथर ब्लाक के कांकर पंचायत में वन चौकी कांकर के पास गौ के मुख में बंधे तार को निकलने का विडियो और कुछ फोटो.
https://www.youtube.com/watch?v=SgOqXzwNb38&t=4s

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Monday, January 9, 2017

(Rewa, MP) थाना गढ़ अंतर्गत भमरिया में गौ-हत्यारों द्वारा ठण्ड भूंख प्यास से तड़पा कर एक और गाय का हुआ अंत

 दिनांक – 09/01/2017
 स्थान –  (रीवा, मप्र)



थाना गढ़ अंतर्गत भमरिया में गौ-हत्यारों द्वारा ठण्ड भूंख प्यास से तड़पा कर एक और गाय का हुआ अंत

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) यदि आप हिनौती धान खरीदी केंद्र में अपनी धान बेचने जा रहे हैं तो थोडा सावधान होकर जाएँ. जी हाँ हम बात कर रहे हैं जनपद गंगेव अंतर्गत हिनौती धान खरीदी केंद्र और हिनौती समिति की. हिनौती धान खरीदी केंद्र दारुबाजों और गांजाखोरों का अड्डा बन चुका है जिसमे पूरी रात दारुबाजों और गांजाखोरों का जमावड़ा रहता है, और इसी के पास आपको मिलेगा दिल दहलाने वाला नज़ारा जहाँ वहीँ पर भमरिया नामक स्थान पर धान खरीदी केंद्र से पचास मीटर के दायरे में लगभग 500 गौवंशों के लिए बनाया गया अवैध कैदखाना जिसमे न तो पानी, न ही चारा-भूसे और न ही किसी छाया की व्यवस्था है.



दिनांक 08 जनवरी 2017 को रात ठण्ड भूंख प्यास से मर गयी एक और गाय

भमरिया में अभी प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार घटनास्थल पर जाया गया और एक और गाय मृत पाई गयी. पता चला की यह गाय ठण्ड भूंख प्यास की वजह से तड़प कर मर गयी जिसके चास्म्दीख गवाह वहां पर हिनौती धान खरीदी केंद्र में इकठ्ठा दर्ज़नों लोग थे जिहोने पूरा वाकया सुनाया. इस प्रकार रोज़ ही कोई न कोई मवेशी खुले आसमान में ठण्ड भूंख प्यास से तड़प तड़प कर मर रहे हैं जिसके विषय में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा कई विडियो और फोटो मीडिया और साथ ही संवंधित विभागों को कार्यवाही के लिए भेजे जा चुके हैं और समय समय पर लगातार भेजे भी जा रहे हैं.
अब सवाल यह उठता है की पूरे रीवा जिले में जो भी अवैध बांडे बनाये गए हैं उनकी संख्या सैकड़ों में है पर अब तक शासन-प्रशासन मौन क्यों है? यदि गौवंश बिना किसी उचित व्यवस्था के अवैध बने बांडो में भूंख प्यास ठंढ से तड़प-तड़प कर जान दे रहे हैं तो उनके लिए सरकार प्रशासन द्वारा कोई उचित व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है जबकि देखा जाय तो लगभग रोज़ गौवंशों के ऊपर हो रहे अत्याचार का मामला पूरे जिले और प्रदेश की मीडिया में छाया हुआ है. 

-देश प्रदेश के किसानों से गौवंशों के प्रति दया और मानवीयता की अपील-

      गौवंशों के ऊपर निरन्तर हो रहे अत्याचार को लेकर एनजीओ श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत) द्वारा देश-प्रदेश के किसानों और अन्य नागरिकों से अपील की जाती है की भारतीय संस्कृति में विशेष दर्ज़ा प्राप्त गौवंशों के ऊपर अत्याचार न किये जाएँ. उन्हें चारा, पानी भूसा, बिना अवैध बांडो में कैद करके तड़पा-तड़पा कर न मारा जाए. उन्हें मुक्त किया जाए और उसके स्थान पर अपने-अपने खेतों की रखवाली किया जाए. अवैध बांडो के स्थान पर शासन-प्रशासन पर दबाब डालकर वैध तरीके से पंचायती गौशालाएं संचालित की जाएँ जिससे उनकी गोबर की जो खाद, दुधारू पशु से प्राप्त दूध और साथ ही आज वैज्ञानिक तरीके से गौमूत्र, गोबर से अगरवत्ती आयुर्वेदिक दवाईयां आदि का निर्माण सीखकर लोगों को तो रोजगार में लगाया ही जाए साथ ही गौवंशों की उपयोगिता भी बनी रहे और उनकी सुरक्षा भी हो सके.
      गौवंशों के प्रति अमानवीय और हिंसात्मक रास्ता अपनाने से कोई लाभ नहीं बल्कि पशु क्रूरता अधिनियम, मप्र गौवंश वध प्रतिषेध (अमेंडमेंट) बिल 2010/12, आईपीसी की धारा 428/429  आदि द्वारा दंडात्मक कार्यवाही हो सकती है और उल्टा जेल जाने की नौवत आ सकती है. इस कारण आज किसानों और अन्य नागरिकों को अपनी सोच बदलकर वैज्ञानिक दृष्टिकोंड़ अपनाने की आवश्यकता है और गौवंशों और अन्य पशुओं से वैज्ञानिक तरीके से लाभ लेकर उनके भी जीवन रक्षा के विषय में सोचकर उनकी भी उपयोगिता बढ़ाने की आवश्यकता है.

समाज और सरकारें गौवंशों की उपयोगिता पर विचार कर उनकी रक्षा करें

यदि आज गौवंशों और नाकाम हो चुके पशुओं की यह वर्तमान दुर्दशा है तो कहीं न कहीं कारण इनकी उपयोगिता का भी कम होना है. आज सरकार और विभिन्न सरकारी/गैर-सरकारी संगठनों को जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है. मानाकि आज वैज्ञानिक उपकरणों और कृषि यंत्रों से किसान और आम नागरिक का जीवन ज्यादा विलाशी और सुलभ हो गया है पर इसका तात्पर्य यह बिलकुल भी नहीं की इस जीवन का सारा कार्य विज्ञान और मशीनें ही कर लेंगी उसमे किसी पशु की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी. सच्चाई बिलकुल उसके विपरीत है और भले ही आज तात्कालिक रूप से किसानों और नागरिकों को यह लग रहा है गौवंश और पशु उनके लिए बोझ बन गए हैं पर यदि दूरदृष्टि लगाईं जाए तो समझ आएगा यदि पशु, मवेशी, जीव जंतु नहीं होंगे तो यह प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह से विगड़ जायेगा. आज विज्ञान बार-बार इस बात को कह रहा है की गोबर की खाद, बायो-खाद, बायो-उत्पाद की बेहद आवश्यकता है. आज जो हमारी दिनचर्या में इतनी अधिक बीमारियाँ और स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफें बढ़ रही हैं तो उसका कारण आज का वातावरण ही है जो कहीं न कहीं पूरी तरह से केमिकल उत्पादों, केमिकल खादों, जहरीली दवाओं आदि पर निर्भर होता जा रहा है.

      आज आवश्यकता है एकबार पुनः सोचने की और अपनी पूर्व की जीवनचर्या अपनाने की. प्रकृति के नजदीक ही पंहुच कर हमे शांति भी मेलेगी, सुख भी और स्वास्थ भी. मात्र आवश्यकता है परम्पराओं में थोड़ी सी वैज्ञानिक सोच की जो की दाल में नमक का कार्य करेगा और हमारे जीवन के सस्वाद को अत्यधिक बढ़ा देगा.


पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर स्थानीय पुलिश द्वारा दर्ज किये जाने चाहिए अपराधिक प्रकरण

      अब यदि किसान कास्तकार यह चाहें की बेजुवां पशुओं को अवैध तरीके से बिना चारा, पानी, भूसा, और छत्रछाया के कड़ाके की ठण्ड में तड़प कर मरने के लिए छोंड दिया जायेगा और कोई कुछ नहीं करेगा तो यह बहुत बड़ी भ्रान्ति है. क्योंकि हर व्यक्ति आज यह जान ले की जितने कड़े कानून मानव की सुरक्षा के लिए बने हैं वैसे ही कानून घरेलु पशुओं और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए भी बने हैं. समस्या यह है की शासन प्रशासन इन कानून को कड़ाई से नहीं लगा पा रहा है अन्यथा कम से कम छः माह की जेल और एक हज़ार रुपये का जुर्माना तो तय है, और दोषी पाए जाने पर यह सजा पांच हज़ार के जुर्माना के साथ यह सात साल तक हो सकती है.  

संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.














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Thursday, January 5, 2017

(Rewa, MP) गौ हत्याओं और पशु प्रताड़ना पर रीवा जिला प्रशासन नहीं लगा पा रहा रोक



गौ हत्याओं और पशु प्रताड़ना पर रीवा जिला प्रशासन नहीं लगा पा रहा रोक

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) कहने को तो पशुओं और गौवंशों की सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हैं पर देखना होगा की उन नियमों का पालन क्या कहीं भी पूरे मप्र में सही तरीके से हो पा रहा है. मप्र में विशेष तौर पर गौवंश प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक वर्ष 2010/12 में पारित किया गया जिसमे गौवंशों के वध पर और प्रताड़ना पर पांच हज़ार तक का जुर्माना और अधिकतम सात साल के कैद का प्रावधान है और यह अपराध संज्ञेय भी है साथ ही आरोपी को अपने आप को दोषमुक्त सिद्ध करना पड़ेगा ऐसा प्रावधान है. इसी प्रकार पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत भी कई प्रावधान हैं जिन्हें यदि कड़ाई से लगाया जाये तो पशुओं और गौवंशों के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता काफी हद तक बंद की जा सकती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के अंतर्गत भी पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही करने का प्रावधान है.

लालगांव पंचायत में हर्दी-अटरिया के बीच बनाया गया है गौवंशों का अवैध बांड़ा

अवैध बांडे एक जो सबसे भयावह दृश्य था वह है लालगांव पंचायत में हर्दी-अटरिया के बीच बनाया गया अवैध बांड़ा जो की वहीँ आसपास के लोग जैसे विजय सिंह, मुन्ना राजा, काशी सिंह, रावेन्द्र मिश्रा द्वारा कानून को धता बताकर बनाया गया है. चश्मदीखों के अनुसार यहाँ पर पिछले कई महीनों से गौवंशों को कैद करके रखा गया है जिसमे न तो चारे, भूसे की व्यवस्था है और न ही किसी पशुशेड की. ठण्ड में पांच डिग्री के नीचे के तापमान पर आज गौवंश भूंख, प्यास, छाया बिना तड़प-तड़प कर जान दे रहे हैं जिन्हें देखने वाला न तो कोई कलेक्टर है और न ही कोई मंत्री मिनिस्टर. खैर गाँव वालों का क्या कहना यह बाड़े तो उन्ही के द्वारा बनाये गए हैं. हर्दी-अटरिया स्थित यह अवैध पशु-कैदखाना लालगांव के किसी गुप्ता की खाली पड़ी हुई जमीन में बनाया गया है. परन्तु चश्मदीखों के अनुसार यह अवैध बांड़ा बनवाया वहीँ हर्दी, बर्रेही, लालगांव और अटरिया के तथाकथित कृषकों द्वारा हैं.



भाजपा मंडल अध्यक्ष शंकर सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा बनवाया गया सोनवर्षा डांडी का अवैध बांड़ा

      इसी क्षेत्र में दूसरा अवैध बांड़ा लालगांव पंचायत के सोनवर्षा डांडी नामक स्थान पर बनाया गया है जो वहीँ के यादव समुदाय की जमीन पर बना हुआ है. दो जनवरी 2017 की रात गढ़ पुलिश के सहयोग से यह अवैध बांड़ा हटाये जाने के बाद अगले दिन इसी क्षेत्र के भाजपा मंडल अध्यक्ष शंकर सिंह स्वयं जिला पंचायत प्रत्यासी राकेश शर्मा उपाध्याय के साथ थाना गढ़ पहुचे और उन्होंने स्वीकार किया की सोनवर्षा का यादवों की जमीन पर बनाया गया बाड़ा उनके और सहयोगियों की माध्यम से बनाया गया था. यह हाल हैं गौवंश के लिए समर्पित और हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए कार्य कर रहे भाजपा के कार्यकर्ताओं के. यदि ऐसा है तो वह लोग ज्यादा बेहतर हैं जो गौवंशों को अपने आहार के लिए प्रयोग कर रहे हैं. कम से कम गौवंशों को प्रताड़ना देकर घुट-घुट कर अवैध बांडो में चारे, पानी, छाया बिना कड़ाके की ठण्ड में मारने से तो अच्छा है उन्हें एक बार में मौत के घाट उतार दिया जाना?

गौवंशों और बेजुबान पशुओं के साथ क्रूरता मानवीय संवेदनाओं के अंत का द्योतक

      यह भारतीय संस्कृति का दुर्भाग्य है की आज मात्र गौवंशों और पशुओं की सुरक्षा के लिए भी राजनीति की जा रही है. अब कम से कम आम जनता के समक्ष यह बात भली-भांति स्पष्ट हो जाएगी की क्या यह राजनीतिक पार्टियाँ मात्र मानवीय संवेदनायों को आधार बनाकर ही तो राजनीतिक लाभ ले रही हैं. न ही इन्हें गौवंशों की सुरक्षा से कोई लेना देना है और न ही आम किसान और आम जनता से.
      यह बात सत्य है की आवारा पशुओं से आज हर एक किसान और कास्तकार त्रस्त है परेशान है पर प्रश्न यह भी है की क्या आवारा पशुओं और गौवंशों को अवैध रूप से बनाये गए बिना किसी उचित व्यवस्था के बांडो में चारा, पानी, भूसा, छत बिना कड़ाके की ठण्ड में तड़पने मरने के लिए छोंड देने से किसानों की समस्या का समाधान हो जायेगा? किसान यह कैसे भूल सकता है की यही गौवंश हैं जिनके दूध, दही, घी, और दुग्ध उत्पाद खा पीकर वह पला बढ़ा है और उसके बाल बच्चे इन्ही गौवंशों के दुग्ध उत्पाद से पल बढ़ रहे हैं. क्या हर सुबह जब हम एक कप चाय पीते हैं तो इस बात का एहसास नहीं करते की इस चाय में डाला गया दूध किसी
 दुधारू पशु से ही प्राप्त हुआ होगा?
    
      आखिर इन गौधनों की इतनी बड़ी दुर्दशा क्यों? क्या यही हमारे ग्रामीण किसान भाई हर एक ग्राम पंचायत में स्वयमेव ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकते कि एक-दो पशु सभी लोग अपने घरों में बाँध लें और अन्य पशुओं की तरह ही इनकी भी व्यवस्था बना लें?

पशु और गौवंश न होने पर प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ेगा प्रतिकूल असर
    
      आज अज्ञानता अथवा हेकड़ी बस भले ही किसानों और भारतीयों को यह बात समझ न आ रही हो पर यह बात तय है की यदि गौवंश और पशुधन न रहेंगे तो पूरी भूमि बंजर हो जाएगी. प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जायेगा. उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. शांस लेने के लिए हवा न मिलेगी और पीने के लिये पानी नहीं होगा. ऐसा समय आयेगा की मानवता एक-एक दाने के लिए तरस जाएगी. क्योंकि आज विज्ञान भी इस बात को मान रहा है की रासायनिक खादों के हो रहे निरंतर प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति कमजोर पड़ रही है जिससे हर वर्ष भूमि में पिछले वर्षों की तुलना में अधिक उर्वरक और रासायनिक तत्वों का प्रयोग करना पड़ रहा है. आज कृषि विज्ञान जो गोबर अथवा बायो-खाद और बायो-उत्पाद की निरंतर बात कर रहा है वह इसी वजह से कर रहा है कि लगातार बढ़ रही मानवीय आवादी के पालन-पोषण के लिए निरंतर बंजर हो रही भूमि की उर्वरा शक्ति कैसे बढ़ाई जाए.

     
प्रदेश के हर जिले में कलेक्टर के संज्ञान में है पशुपालन एवं पशु संवर्धन समिति
     
      जिला स्तरीय समितियों की यदि बात किया जाए तो गौधन और पशुधन के पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के हर जिले में विशेष निगरानी समितियों का गठन होता है जो सदैव जिला कलेक्टर के संज्ञान में रहता है. जिला कलेक्टर यदि चाहे तो या की मनरेगा की उप योजना अंतर्गत अथवा पशुपालन विभाग द्वारा तीन-चार पंचायतों के बीच में आवारा गौवंशों की सुरक्षा और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए बजट का आवंटन करवा कर इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान कर सकता है. परन्तु यह सब इच्छाशक्ति और योजनायों के सही क्रियान्वयन पर निर्भर करता है. आज यह जिले में भली भांति विदित है की पशु चिकित्सा विभाग की मदद से कई पंचायतों में गौ संवर्धन केंद्र बनाने बाबत बजट दिया गया था परन्तु वह सब भ्रष्ट्राचार की बलि चढ़ गया. क्या यह सब देखने वाला कोई नहीं है? आखिर क्या जिला कलेक्टर के संज्ञान में यह बातें नहीं हैं? क्या किसानों की आवारा पशुओं सम्बन्धी समस्या जो किसी न किसी माध्यम से रोज ही मीडिया में छाई रहती है जिला प्रशासन अथवा प्रदेश स्तर पर ज्ञात नहीं है? सबको सब कुछ ज्ञात है, मात्र आवश्यकता है उसके सही क्रियान्वयन की और समस्या के उचित निराकरण की. 

पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर स्थानीय पुलिश द्वारा दर्ज किये जाने चाहिए अपराधिक प्रकरण

      अब यदि किसान कास्तकार यह चाहें की बेजुवां पशुओं को अवैध तरीके से बिना चारा, पानी, भूसा, और छत्रछाया के कड़ाके की ठण्ड में तड़प कर मरने के लिए छोंड दिया जायेगा और कोई कुछ नहीं करेगा तो यह बहुत बड़ी भ्रान्ति है. क्योंकि हर व्यक्ति आज यह जान ले की जितने कड़े कानून मानव की सुरक्षा के लिए बने हैं वैसे ही कानून घरेलु पशुओं और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए भी बने हैं. समस्या यह है की शासन प्रशासन इन कानून को कड़ाई से नहीं लगा पा रहा है अन्यथा कम से कम छः माह की जेल और एक हज़ार रुपये का जुर्माना तो तय है, और दोषी पाए जाने पर यह सजा पांच हज़ार के जुर्माना के साथ यह सात साल तक हो सकती है.  

संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.
  
























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