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Saturday, December 21, 2019

(Rewa, MP) धान खरीदी में घपला, किसानों से ले रहे 41 किलो से अधिक धान, पूंछने पर आर्द्रता का बता रहे कारण (मामला जिले के खरीदी केंद्रों का जहां किसानों का जमकर चल रहा शोषण, 40 किलो 600 ग्राम से अधिक की की जा रही खरीदी, किसान परेशान कोई नही सुन रहा किसानों की समस्या)

दिनाँक 21 दिसंबर 2019, स्थान - गढ़/कोट/भठवा, रीवा मप्र

     खरीफ धान की खरीदी के साथ ही खरीदी केंद्रों में धांधली और अव्यवस्था भी फैल चुकी है. आर्द्रता और कंडों रोग के नाम पर किसानों को जमकर लूटा जा रहा है. किसान आवाज उठा रहे हैं लेकिन कोई अधिकारी सुनने को तैयार नही है.

  आर्द्रता बताकर ले रहे ज्यादा धान

    जब किसान खरीदी केंद्रों पर जाते हैं तो उन्हें बताया जाता की है की आपकी धान अभी गीली है अतः आपको ज्यादा देनी पड़ेगी. किसानों का कहना है की हमारी धान 15 से 18 के बीच में आर्द्रता टेस्ट में रहती है. 95 प्रतिशत धान 17 पॉइंट आर्द्रता के भीतर रहती है फिर भी उनसे बोरी और बारदाना की वजन के नाम पर ज्यादा धान ली जा रही है. बताया गया की एक बोरी में मात्र 40 किलो और 600 ग्राम भरे जाने का प्रावधान है जबकि इसका भराव ज्यादा किया जा रहा है. कई किसानों ने बताया की उनसे 41 से 42 किलो के बीच में धान ली जा रही है.

  सैंपल के नाम पर हिनौती समिति में चल रही लुटाई

   गंगेव ब्लॉक अन्तर्गत आने वाले हिनौती ए और बी दोनो ही खरीदी केंद्रों में सैंपल लिए जा रहे हैं. खरीदी केंद्र प्रबंधक राजेन्द्र सिंह एवं वर्कर कोटेदारों द्वारा बताया गया की यह सैंपल तीन भागों में में रखा जाता है. जबकि खाद्य विभाग में फ़ूड कंट्रोलर राजेन्द्र सिंह ठाकुर और गंगेव फ़ूड इंस्पेक्टर गौरी मिश्रा से पूंछने पर पता चला की सैंपल जैसी कोई बात नही है. सैंपल लेकर उसकी आर्द्रता देखी जाती है और इसके बाद उसे किसान को वापस कर दिया जाता है. जबकि हिनौती खरीदी केंद्रों में पॉलीथिन में प्रति किसान तीन किलो धान लेकर पता नही कहां रखा जाता है. कुछ लोगों ने बताया की सैंपल वैम्पल कुछ नही रहता है रात के अंधेरे में एकत्रित की गई धान को बोरी में भरकर किसी चमचे वाले किसान के खाते में डाल दिया जाता है जिससे किसानों को पता भी नही चल पाता कि क्या घालमेल है. वैसे यह कोई नई प्रथा नही है और पुराना पैसा कमाने का जरिया है सब.

  कोटेदार यहां भी किसानों को नही बख्शते

  बताया गया की जिले के ज्यादातर खरीदी केंद्र कोटेदारों के हवाले रहता है. यही कोटेदार खरीदी में समिति प्रबंधकों की मदद करते हैं. सामान्यतया नपाई तुलाई में जो सिस्टम इनका कोटों में रहता है वही खरीदी केंद्रों में भी रहता है. यहां भी कांटों के माध्यम से भी किसानों की लूट हो रही है. किसान यदि बोलते हैं तो उनकी धान को वापस कर देने और पैसे रोकने की धमकी दी जाती है. किसानों ने इसकी सख्त जांच की माग की है.

  प्रासंगिक व्यय के नाम पर भी लूट

   मात्र नपाई तुलाई तक ही बात नही रह जाती. यदि देखा जाय तो लुटाई काफी आगे तक है. बता दें की प्रत्येक खरीदी केंद्रों को बारदाने की सिलाई, ढुलाई, एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने लेबर चार्ज, किसानों को छाया उपलब्ध कराने, जनरेटर, शेड, बिजली पानी की व्यवस्था करने, उचित रेट पर भोजन चाय की व्यवस्था करने आदि के लिए प्रासंगिक व्यय के नाम से राशि प्रत्येक समिति के खरीदी केंद्रों में सरकार द्वारा भेजी जाती है जो लाखों में होती है लेकिन उसका कोई उपयोग नही किया जाता सब समिति प्रबंधक और खरीदी केंद्र प्रबंधक अपने पास रखकर हजम कर लेता है जिसकी जांच की माग भी किसानों ने की है.

  किसानों से प्रति बोरी 5 से 10 रुपये एक्स्ट्रा

   बात यहीं आकर नही रुकती बताया गया की जब किसान ट्रेक्टर में धान लेकर खरीदी केंद्रों पर जाते हैं तो उनको बताया जाता है की या की खुद तौल कराओ नही तो एक्स्ट्रा 5 से लेकर 10 रुपये प्रति बोरी तक चार्ज दो. किसान यदि यह राशि देने से मना करता है तब उसकी धान वापस कर दी जाती है. जबकि इस विषय में जब खाद्य विभाग से जानकारी चाही गई तो खाद्य नियंत्रक राजेन्द्र सिंह ठाकुर द्वारा बताया गया की ऐसी कोई राशि किसानों को देने की जरूरत नही है. क्योंकि किसान से कोई राशि वसूली नही जाएगी और जहां भी ऐसा हो रहा है वह गलत है. तुलावटी और नापतोल करने वाले लेबरों को पहले से ही खरीदी केंद्रों द्वारा सरकार के व्यय से राशि दी जाती है. 

 खरीदी केंद्रों पर डंप पड़ी है धान, उठाव नही

   बता दें कुछ खरीदी केंद्रों में अभी भी दर्जनों ट्रक धान डंप पड़ी हुई है जिसकी खरीदी के बाद उठाव नही हो पाया है. वैसे भी मौसम काफी खराब चल रहा है ऐसे में पता नही कब इंद्र देव का मूड बिगड़ जाए और किसानों से 17 की आर्द्रता की कहकर खरीदी गई धान 50 पॉइंट की आर्द्रता हो जाए.

   धान सड़ाने और भींगाने से प्रबंधकों को होता है लाभ

   बता दें की धान सड़ाने का भी एक फंडा होता है. जानकार सूत्रों ने बताया की जब धान खरीदी 17 और उसके नीचे की आर्द्रता में की जाती है तब उसमे ज्यादा मात्रा चढ़ती है पर जैसे ही शीत अथवा पानी गिरने से धान भीग जाएगी तो स्वाभाविक रूप से उसकी आर्द्रता बढ़ने से धान कम मात्रा में तौल होगी जिससे समिति प्रबंधक बोरियों से धान निकाल लेंगे और उनको उसी धान का भी फायदा हो जाएगा.

   पूरा सिस्टम लगा है काले धंधे में

    यदि सूत्रों की माने तो इस धंधे में नीचे से लेकर ऊपर तक के लोग लगे हुए हैं. यह कार्य मात्र समिति प्रबंधक अथवा खरीदी केंद्रों का मुखिया बस नही करता है बल्कि इसमे फ़ूड और नागरिक आपूर्ति निगम से लेकर सहकारिता विभाग तक के कर्मचारी अधिकारी मिले हुए रहते हैं.

   जब इसकी शिकायत की जाती है तो जांच के नाम पर मात्र खानापूर्ति होती है. नियमतः जब धान खरीदी हो तो उसी रात इसका उठाव भी सुनिश्चित हो जाए. यदि किसी कारण बस उठाव नही भी हो पाया तो उस रात धान को ढकने और शीत पानी से बचाने के उचित प्रबंध करने चाहिए लेकिन ऐसा कुछ होता नही है और किसानों से उच्च गुणवत्ता बताकर खरीदी गई धान निम्न गुणवत्ता में नॉन को भेजी जाती है. 

   संलग्न - कृपया संलग्न खरीदी केंद्रों की फ़ोटो देखें जहां पर धान खरीदी के नाम पर धांधली चल रही है. किसान परेशान हैं लेकिन कोई सुनने वाला नही.

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शिवानन्द द्विवेदी
समाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Thursday, November 15, 2018

MP - मप्र की विकाश गाथा का प्रतीक - मनगवां चाकघाट हाईवे में सोहागी पहाड़

दिनांक 15 नवंबर 2018, स्थान - सोहागी पहाड़, रीवा मप्र

( शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से बनाई जा रही रीवा ज़िले की बहुचर्चित मनगवां-चाकघाट हाईवे सड़क आज तक नही बन पायी है जबकि इसमे अब तक देश दुनिया की नामी गिरामी कंपनियों ने काम किया है. टॉपबर्थ, दिलीप बिल्डकॉम और बंसल जैसी कंपनियों ने इस सड़क कार्य में हाँथ आजमाया है और अब वर्तमान में बंसल कंपनी द्वारा ही कार्य किया जा रहा है. टॉपबर्थ कंपनी द्वारा कार्य का टेंडर लिया जाकर दिलीप बिल्डकॉम कंपनी को पेटी कॉन्ट्रैक्ट में दिया गया था जिंसमे बताया गया कि लेनदेन को लेकर आपसी विवाद और समय पर गुणवत्तापूर्ण तरीके से पूरा न कर पाने के कारण ठेका निरस्त हुआ. इसके बाद पुनर्निविदा के चलते बंसल कंपनी को कार्य सौंपा गया. बंसल द्वारा आज तक कार्य पूरा नही किया गया जिसका परिणाम है पिछले पांच से अधिक वर्षों से मनगवां और चाकघाट के बीच रहने वाले और यहां इस सड़क मार्ग से प्रतिदिन आवागमन करने वाले आम जन मानस से लेकर वीआईपी तक की फजीहत.

  सोहागी पहाड़ में स्थिति सबसे खतरनाक

    मनगवां से चाकघाट सड़क मार्ग में सोहागी नामक पहाड़ आता है जो किसी भी रोड निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. पिछले पांच से अधिक वर्षों से हो रहा यह सड़क निर्माण का कार्य आज मात्र सोहागी पहाड़ में ही आकर रुका हुआ है. टेढ़ा मेढ़ा और ऊंचाई गहराई से भरा यह पहाड़ काफी मुश्किल है. अब जो भी कपंनियां कार्य कर रही हैं उन सबका अंतिम और सबसे मुश्किल कार्य इसी पहाड़ को तोड़कर यहां से सड़क मार्ग निकलना है।

  ऐसा क्या है इस सड़क में की पांच साल से अधिक का समय लग गया

   अब प्रश्न यह है की आज भी क्या मॉनव 17 वीं सताब्दी में जीवन यापन कर रहा है जबकी मसीनी उपकरणों का अभाव रहता था और मॉनव ज्यादातर कार्य हाँथ से करता था. आज तो 21 वीं सदी का दौर है जबकि ऐसी मसीनों का ईजाद हो चुका है जहाँ पर कोई मुश्किल से मुश्किल कार्य भी कुछ दिनों अथवा महीनों में पूरा किया जा सकता है. तब प्रश्न यह उठता है की आखिर यह सरकारें क्या कर रही हैं. क्या सरकारों में बैठे सिविल कंस्ट्रक्शन के इंजीनियर और इनके नीति निर्धारक इन बातों का ध्यान नही रखते की जिस कंपनी को यह टेंडर देकर कार्य सौंप रहे हैं वह कार्य करने योग्य भी हैं की नही. आखिर टेंडर देते समय कोई तो समय निर्धारण हुआ होगा की इतने वर्षों में कार्य को पूरा किया जाकर सरकार के हवाले किया जाना है. वास्तव में बात यह है की कमीशन के खेल में पूरी सरकार और इनके सिपहसालार ही लिप्त हैं तो भला कार्यवाहि फिर कौन करेगा. कार्यवाही करने के लिए पाक साफ और मजबूत होना पड़ता है. कमीशन खोर थोड़े ही कार्यवाही करते हैं. 

  सोहागी पहाड़ में वर्षों से मानक स्तर से कई गुना अधिक प्रदूषण 

    सोहागी पहाड़ की स्थिति आज इतनी भयावह हो चुकी है की यहां पर दुर्घटनाएं तो बहुत आम बातें हैं और लगभग रोज ही कोई न कोई अप्रिय दुर्घटना हो रही है. मनगवां से चाकघाट वाया सोहागी पहाड़ से गुजरने वाले हर एक सख्स की हालात यह है की यदि उसका मेडिकल चेकअप कराया जाये तो खतरनाक बीमारियां मिलेंगी जिंसमे फेंफड़ों और सांस की बीमारियां जैसे सिलकोसिस, टीबी, और अन्य बीमारियां सम्मिलित हैं. 

    प्रदूषण चेक करने वाली संस्थाएं और उस पर कार्यवाही करने वाली संस्थाएं जैसे पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड आदि तो ऐसा लगता है जैसे अस्तित्व में हैं ही नही. रीवा संभाग और संभवतः पूरे मप्र में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाएं नाकाम और अक्षम साबित हुई हैं. क्रशर प्लांट से निकलने वाला डस्ट और फैलने वाला प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाले धुंए और धूल का प्रदूषण, निर्माणाधीन सड़कों में अमानक स्तर पर उड़ने वाल धूल डस्ट का प्रदूषण, आखिर इन सब प्रदूषण की समस्याओं का समाधान कौन करेगा? कहां है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य ऐसी संस्थाएं? कहां गई जनता के हित की बात करने वाली सरकारें?

   सिलिकोसिस एक जानलेवा बीमारी

          सिलिकोसिस फेंफड़ों से संबंधित एक ऐसी बीमारी है जो महीन धूल के कणों से उत्पन्न होती है. सिलिका की धूल सांस के साथ खिंचकर फेंफड़ों के अंदर जाने से फेंफड़ों में छोटे छोटे नोड्यूल बन जाते हैं. सिलिका एक यौगिक है जो सिलिका व ऑक्सीजन के योग से बनता है जो खनिजों में पाया जाता है. इसे पीसने पर उस पत्थर के अत्यंत बारीक कण धूल के रूप में सांस के साथ जाकर फेंफड़ों में जम जाते हैं व फेंफड़ों की कार्यक्षमता को कम कर देते हैं. ये धूल के कण फेंफड़ों के ऊपर परत बना देते हैं जिस कारण ऑक्सीजन फेंफड़ों में शोषित नही हो पाती है और बाद में यह सिलिकोसिस नामक बीमारी के रूप में बदल जाती है. 

  सिलिकोसिस और प्रदूषण की समस्याओं का कानूनी प्रावधान 

    वास्तव में देखा जाए तो व्यक्ति को जानबूझकर प्रदूषण में धकेल देना और खतरनाक बीमारियों का तोहफा देना व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन है. 

   फैक्ट्री मजदूरों के हित में शासन द्वारा कारखाना अधिनियम 1948, खनन अधिनियम 1952, अंतरराज्यीय पलायन मजदूर कानून 1979, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम, असंगठित कामगार व सामाजिक सुरक्षा कानून आदि के अन्तर्गत यह कंनूनी अपराध हैं. इसके अतिरिक्त भी मध्य प्रदेश असंगठित कामगार कल्याण अधिनियम 2003, मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 1982, मध्य प्रदेश स्लेट पेंसिल कर्मकार कल्याण मॉडल, मप्र भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल जैसे कानूनों के दिशा निर्देश भी लागू हैं.

   मानव अधिकार संरक्षण कानून के अन्तर्गत है मुआबजे पुनर्वाश का प्रावधान 

      मॉनव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अन्तर्गत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी यह अनुसंसा की हुई है की यदि सिलकोसिस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु होती है तो यह माना जाएगा की उसके जीवन के अधिकार की अवहेलना हुई है जिसके लिए वह पीड़ित मुआबजा और पुनर्वाश का अधिकारी होगा. 

    नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का हो हस्तक्षेप 

   प्रदूषण के अमानक स्तर और निरंतर पर्यावरण की हो रही अपूरणीय क्षति के चलते पूरे मामले में नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का हस्तक्षेप होना चाहिए. सबसे बड़ी बिडम्बना यह है की राष्ट्रीय हरित ट्राइब्यूनल एक हज़ार के स्टाम्प और फीस के साथ ही प्रकरण पर कार्यवाही करता है और दुनिया भर के टेक्निकल प्रोब्लम्स रहते हैं. जबकि जनहित याचिका के कांसेप्ट की तरह ही नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में भी मात्र सीधे प्रकरण की एक दो फ़ोटो के साथ समस्या को लिखित रूप से भेजे जाने अथवा ईमेल कर दिए जाने के साथ ही स्वतः संज्ञान ले लेना चाहिए.

    इसलिए जनता के व्यापक हित से जुड़े हुए मामलों पर स्वतः संज्ञान और सीधे हस्तक्षेप का प्रावधान होना चाहिए इसमे यह नही देखा जाना चाहिए कि कोई शिकायतकर्ता बने और जब शिकायत आये तभी कार्यवाही हो। आखिर त्योंथर से मनगवां वाया सोहागी से गुजरने वालों में क्या कलेक्टर, डीएम, जस्टिस, सीएम, और प्रिंसिपल सेक्रेटरी नही होते होंगे? क्या वर्ष भर में ऐसे उच्चाधिकारी इस सड़क मार्ग से नही गुजरते होंगे? मानाकि यह बन्द एसी गाड़ियों में गुजरते होंगे लेकिन क्या आम जनता के दुख दर्द और तकलीफों को नही समझ सकते? समस्या तो यह है कि जब कुछ करना ही नही चाहते और इक्षाशक्ति ही नही है तो कहां से कुछ होगा? 

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा धूल डस्ट और प्रदूषण से भरे सोहागी सड़क मार्ग में घंटे भर खड़ा होकर वीडियो क्लिपिंग बनाई गई और साथ ही फ़ोटोग्राफ लिए गए जिसको समाज और मीडिया के समक्ष रखा जा सके और इस पर कार्यवाही हो सके.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Friday, July 13, 2018

ऊर्जा मंत्री के निर्देश पर मौहरिया का 24 घण्टे में बदला ट्रांसफार्मर, बसौली का भी 2 दिन में बदला जाएगा (मामला ज़िले के गंगेव एवं मनगवां विद्युत वितरण केंद्र का जहां मौहरिया में 2 वर्ष से अधिक समय से जला ट्रांसफार्मर 13 जुलाई को बदला गया, बसौली नं 2 का अगले 2 दिन में बदला जाएगा, सामाजिक कार्यकर्ता की पहल पर ऊर्जा मंत्री पारस जैन ने करवाई कार्यवाही)

दिनांक 14 जुलाई 2018, स्थान - गंगेव/मनगवां रीवा मप्र 

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

    सामाजिक कार्यकर्ता की पहल पर ऊर्जा मंत्री श्री पारस जैन के निर्देश पर 2 से अधिक वर्षों से जला हुआ मौहरिया ग्राम का 100 केवीए का ट्रांसफार्मर दिनांक 13 जुलाई 2018 को शाम को बदल दिया गया. बता दें पिछले दिनों गंगेव डीसी के बसौली नंबर 2 एवं मनगवां डीसी के मौहरिया के जले हुए ट्रांसफार्मर न बदले जाने की खबर ट्विटर के माध्यम से मप्र के ऊर्जा मंत्री श्री पारस जैन को सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं अधिवक्ता जितेंद्र तिवारी के माध्यम से दी गई थी जिस पर तत्काल संज्ञान लेते हुए ऊर्जा मंत्री ने सीएमडी जबलपुर जोन एवं चीफ इंजीनियर रीवा रीजन केएल वर्मा को तत्काल ट्रांसफार्मर बदले जाने के लिए निर्देशित किया था. जिस पर कार्यवाही करते हुए मनगवां बिजली क्षेत्र के असिस्टेंट इंजीनियर प्रशांत नागेश ने 13 जुलाई शाम 100 केवीए का मौहरिया यादव-हरिजन बस्ती के पास का 2 से अधिक वर्षों से जला हुआ ट्रांसफार्मर बदल दिया है और इसकी सूचना उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता द्विवेदी को मोबाइल फ़ोन पर दी है. इस बात की पुष्टि करने के लिए द्विवेदी द्वारा मौहरिया ग्राम निवासी आशीष चतुर्वेदी एवं सुरेश चतुर्वेदी द्वारा नए लगाए गए ट्रांसफार्मर की वहां के ग्रामीणों के साथ फ़ोटो भी प्राप्त की है जिसे यहां पर संलग्न किया जा रहा है. सहायक अभियन्ता मनगवां बिजली विभाग प्रशांत नागेश द्वारा जानकारी दी गई है की अगले 2 दिनों में गंगेव डीसी के बसौली नंबर 2 का भी ट्रांसफार्मर बदल दिया जाएगा. बता दें की बसौली नंबर 2 का ट्रांसफार्मर बबलू सिंह एवं अन्य ग्रामीणों के द्वारा  पिछले 8 माह के अधिक समय के फैल बताया गया था.

    मौहरिया का ट्रांसफार्मर बदले जाने पर वहां सभी उपभोक्तागण में खुसी की लहर है. विशेषतौर पर मोटर कनेक्शनधारी किसान ट्रांसफार्मर बदल दिए जाने से काफी खुश हैं. सुरेश एवं आशीष चतुर्वेदी आदि किसानों द्वारा बताया गया की पिछले 2 वर्षों से उनकी कृषि बुरी तरह से प्रभावित हुई थी जिसके कारण सभी किसान काफी परेशान थे. 

संलग्न - संलग्न तस्वीर में देखें रीवा के मनगवां डीसी अन्तर्गत आने वाले मौहरिया ग्राम का बदला गया ट्रांसफार्मर एवं उपस्थित ग्रामीण उपभोक्ता.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक वआम मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587

Wednesday, July 11, 2018

गंगेव के बसौली नं 2 एवं मनगवां के मौहरिया ग्राम का वर्षों से जला है ट्रांसफ़ॉर्मर (मामला ज़िले के गंगेव डीसी अन्तर्गत बसौली नं 2 ग्राम एवं मनगवां डीसी के मौहरिया ग्राम के वर्षों से जले ट्रांसफार्मर का जहां पर बिजली बिल माफी एवं सरल स्कीम के बाद भी रीवा बिजली विभाग कर रहा हीलाहवाली)

दिनांक 12 जुलाई 2018, स्थान - गंगेव/मनगवां, ज़िला रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  सामाजिक कार्यकर्ता की पहल एवं ऊर्जा मंत्री श्री पारस जैन के निर्देश पर ज़िले के कटरा डीसी का 5 एमवीए का फैल ट्रांसफार्मर तो बहुत जल्दी बदल दिया गया परंतु अभी भी ज़िले के कई ऐसे गांव हैं जहां कई महीनों से जले हुए ट्रांसफार्मर आज तक नही बदले गई हैं.

बसौली नं 2 का 9 माह से जला है ट्रांसफार्मर

    जानकारी मिली की गंगेव ब्लॉक एवं गंगेव विद्युत वितरण केंद्र अन्तर्गत आने वाले बसौली नं 2 का 65 एचपी का ट्रांसफार्मर पिछले 9 माह से जला हुआ है जिसे अब तक नही बदला जा सका है जबकि इस बाबत कई मर्तबा शिकायतें ग्रामीणों द्वारा की गई हैं.

      जानकारी के अनुसार बसौली नम्बर 2 के बबलू सिंह ने जानकारी दी की उनके घर के पास स्थित ट्रांसफार्मर से तीन दिशाओं में लाइन सप्लाई की जाती थी. ठाकुर एवं अन्य समाज के कुछ परिवारों के अतिरिक्त लगभग 35 आदिवाशी परिवार भी हैं जिन्हें बाधित लाइन सप्लाई मिल रही है. इनमे से कुछ ने वैकल्पिक तौर पर कई सौ मीटर दूर से तार लगाकर कटिया से अन्य ट्रांसफ़ॉर्मर से लाइन ले रखी है. पर अभी भी आधे से अधिक घरों में अंधेरा व्याप्त है.

     साल भर पहले भी यही ट्रांसफार्मर जल गया था जिसे बदला गया था लेकिन बताया गया की पहले से ही खराब ट्रांसफार्मर लगाया गया जो बहुत दिनों तक चल नही पाया और वह भी जल गया. फिर इसके बाद आज 9 महीने से ऊपर हो रहे हैं ट्रांसफार्मर बदला नही गया.

विभाग के अनुसार बिजली बिल बकाया बनी समस्या

   जब इस संदर्भ में गंगेव विद्युत वितरण केंद्र के कनिष्ठ यंत्री मनीष जोशी से सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की बात की गई तो बताया गया की बसौली नंबर 2 के जले ट्रांसफार्मर से जुड़े हुए उपभोक्ताओं के बिजली बिल बकाया होने की वजह से विभाग ने उन्हें अंधेरे में ही रखना उचित समझा. जबकि ग्रामीणों से जब चर्चा की गई तो बताया की काफी लोगों ने बिजली बिल भर दिया है बस कुछ रसूखदार लोगों के बकाया होने की वजह से ऐसा किया गया है अतः इसमे उन लोगों का कोई दोष नही था जो नियमित बिजली बिल देने वाले उपभोक्ता थे. दोष यदि है तो उनका है जिन्होंने बकाया रखा।

मनगवां डीसी के मौहरिया ग्राम का भी जला ट्रांसफार्मर

  इसी प्रकार मनगवां क्षेत्र के जितेंद्र तिवारी ने अपने ट्विटर संदेश में प्रदेश के ऊर्जामंत्री श्री पारस जैन को ट्वीट किया की मौहरिया ग्राम का भी ट्रांसफार्मर पिछले 2 वर्षों से जला हुआ है जिसे बदला जाना अनिवार्य है. लोग काफी परेशान हैं और समस्या का सामना कर रहे हैं. जिस पर तत्काल ऊर्जा मंत्री ने रिट्वीट करके संबंधित ग्राम का नाम, जले हुए ट्रांसफार्मर का डिटेल और पता की जानकारी चाही. जिस पर सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा स्वयं भी तत्काल ऊर्जा मंत्री को पूरा डिटेल ट्वीट कर दिया गया साथ ही कार्यपालन अभियंता आर एक जैन एवं सहायक अभियंता प्रशांत नागेश का मोबाइल नंबर सहित सभी जानकारी ट्वीट कर दी गई साथ ही कार्यपालन अभियंता एवं सहायक अभियंता से बात करके समस्या से अवगत करवाकर समस्या के निराकरण की अपील की गई है. इस पर कनिष्ठ अभियंता, कार्यपालन अभियंता एवं सहायक अभियंता बिजली विभाग ने समस्या के निराकरण का आश्वासन दिया है.

जन कल्याण बिजली बिल माफी एवं सरल बिल स्कीम के बाद भी देरी क्यों

    मानाकि 20 प्रतिशत बिजली बिल देने की योजना पहले की है परंतु अब जब मुख्यमंत्री मप्र शासन की महत्वाकांक्षी योजना जनकल्याण संबल योजना एवं सरल बिजली बिल स्कीम लांच हो चुकी है और हितग्राहियों को लाभ दिया जा रहा है तो ऐसे में विभाग द्वारा प्रदेश के जले हुए ट्रांसफार्मर न बदला जाना आम जनता के साथ ज्यादती है. ऐसे में तो यह कहना चाहिए की बिजली विभाग शासन से भी आगे हो गया.

जले ट्रांसफार्मर मुख्यमंत्री की योजना पर लगा रहे पलीता 

    जनकल्याण संबल योजना एवं सरल बिजली बिल स्कीम के बाद तो अब पूरे ज़िले एवं संभाग के जले हुए ट्रांसफार्मर बदले जाने चाहिए. जब सरकार ने आम और गरीब जनता के लिए इतनी अच्छी योजना लांच कर ही दी है तो जले हुए ट्रांसफार्मर न बदला जाए तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा. क्योंकि यदि पूरे प्रदेश में जले हुए ट्रांसफार्मर को बदले जाने का खर्चा देखा जाए तो बिजली बिल माफी एवं सरल बिजली बिल स्कीम की तुलना में 1 प्रतिशत से भी कम होगा.

जले हुए ट्रांसफार्मर न बदला जाना आम जनता का टॉर्चर

   यदि जले हुए ट्रांसफार्मर न बदले गए तो आम जनता और किसान और अधिक टॉर्चर होंगे. एक तरफ तो गर्मी का कहर दूसरी तरफ सिंचाई के लिए समस्या, कुल मिलाकर ट्रांसफार्मर बदलने में देरी मुख्यमंत्री के बिजली बिल माफी और सरल बिजली बिल स्कीम पर पलीता लगा रहे हैं. मुख्यमंत्री एवं ऊर्जा मंत्री को चाहिए की स्वयं भी जले हुए ट्रांसफार्मर के मामलों में तत्काल संज्ञान लेकर पूरे प्रदेश में कार्यवाही करवाएं जिससे आम जनता और अधिक टॉर्चर होने से बचे.

संलग्न - रीवा के गंगेव डीसी के ग्राम बसौली नंबर 2 का जला हुआ 65 एचपी का ट्रांसफार्मर एवं उपस्थित आमजन. साथ ही ऊर्जा मंत्री को भेजा गया ट्वीट की स्क्रीनशॉट.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587

Monday, July 9, 2018

अब तक रीवा में सूखा जैसे हालात, कहाँ गए फसल बीमा करवाने वाले विभाग? (मामला ज़िले में अऋणी किसानों की प्रधानमंत्री फसल बीमा की दयनीय स्थिति की जहां अब तक न तो ग्राम सेवक, कृषि विभाग और न ही सहकारिता विभाग का है कोई रता पता, ज़िले में सूखा जैसे हालात, यदि अऋणी किसानों की फसल बीमा नही हुई तो होगी भीषण समस्या)

दिनांक 09 जुलाई 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  रीवा ज़िले में बारिस की स्थिति अब तक चिंतनीय बनी हुई है. औसत से काफी कम बारिस होने की वजह से किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें स्वाभाविक है. जहां एक तरफ बोवनी लेट हो रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान उहापोह में झुरिया धान का ही छिटाव शुरू किये हुए हैं. पर यदि बारिस नही होती अथवा कम बारिस होती है दोनो ही स्थितियों में विशेषकर असिंचित क्षेत्रों में किसानों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है.

  प्रधानमंत्री फसल बीमा की स्थिति दयनीय

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रारम्भ से लेकर अब तक रीवा संभाग में फसल बीमा की स्थिति दयनीय बनी हुई है. या यूं कहें की प्रधानमंत्री फसल बीमा ने किसानों की स्थिति ही दयनीय बना दी है. पिछले कुछ सालों में रीवा संभाग में मात्र किसानों से फसल बीमा के नाम पर प्रीमियम की उगाही की गई है उसके एवज में उन्हें मिला कुछ नही है अथवा यदि कुछ तहसीलों में मिला भी है तो बहुत कम जिंसमे किसान की लॉगत तक नही निकल पायी है. रीवा ज़िले के मनगवां तहसील में प्रधानमंत्री फसल बीमा के आने के अब तक मात्र किसानों को अंगूठा ही दिखाया गया है.

90 प्रतिशत किसानों को पता ही नही फसल बीमा क्या है?

   बड़े ही आश्चर्य की बात है की ग्रामीण अंचलों के बहुत से किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कोई विशेष जानकारी नही है. जब कभी टीवी अथवा रेडियो के माध्यम से सुन देख लिया उसके अतिरिक्त न तो समिति प्रबंधकों का कोई रता पता है और न ही ग्राम सेवकों का. कृषि और सहकारिता विभाग के ऊपर फसल बीमा कराने और जानकारी देने का ज्यादा से ज्यादा दारोमदार होता है लेकिन आज भी यदि गंगेव ब्लॉक अथवा किसी भी ब्लॉक के कृषि कार्यालय में जाया जाए तो वहां बहुतायत में पुराने पड़े पैम्फलेट और पोस्टर मिल जाएंगे जो पिछले 3 वर्षों से ब्लॉक कृषि विभाग के गोदाम और कमरों अलमारियों में धूल फांक रहे होंगे. वैसे यह सभी योजनाओं के पोस्टर बैनर और पैम्फलेट किसानों और ग्रामीणों को वितरित करने जन जागरूकता फैलाने के लिए आये हैं. 

आरएईओ और ग्राम सेवकों का नही कोई रता पता कौन कराए अऋणी किसानों की फसल बीमा

    कृषि विभाग द्वारा प्रत्येक 4 से 5  ग्राम पंचायतों के बीच एक ग्राम सेवक अथवा आरएईओ रखा जाता है जिसका काम होता है की किसानों के हित संबंधी सभी योजनाओं की जानकारी गांव गांव जाकर उपलब्ध कराना, किसानों को फसल बीमा योजना के बारे में अवगत कराना, उन्हें फॉर्म भरवाकर प्रीमियम जमा करवाकर फसल बीमा का फॉर्म भरना, समय समय पर खरीफ और रवी सीजन में आने वाले खाद बीज कीटनाशक एवं अन्य जानकारी उपलब्ध कराना. परंतु यहां तो पूरा उल्टा होता है और ग्राम सेवकों का कोई रता पता ही नही रहता है. यदि कोई जल क्षमता प्रमाण पत्र अथवा कृषि से संबंधित कोई जरूरी कागज़ात में ग्राम सेवकों के हस्ताक्षर करवाने होते हैं तो ग्राम सेवक को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है. 

समिति प्रबंधक बोलते हैं फसल बीमा का फॉर्म ही नही

  किसान के पास तो बस दो ही विकल्प बचते हैं. एक ग्राम सेवक को ढूंढे और दूसरा समिति सेवक को. न तो ग्राम सेवक फसल बीमा कराने में सहयोग कर रहा और न ही समिति सेवक. यह दोनो ही सेवक अब सेवक से मालिक बन चुके हैं और आम जनता स्वयं नौकर बनकर इन मालिको को ढूंढे.

  जहां ग्राम सेवक का कोई पता ही नही वहीं समिति सेवक के पास कृषि विभाग के फॉर्म ही उपलब्ध नही. समिति सेवक बोलता है की उसके पास फसल बीमा कराने के लिए कोई जानकारी नही आई है और न ही कोई अऋणी किसानों के फॉर्म ही उपलब्ध हैं.

   स्वाभाविक रूप से किसान ऐसे में कहाँ जाए और क्या करे. कृषि विभाग के ग्राम सेवकों और सहकारिता विभाग के समिति सेवकों ने गरीब किसान की धुरचट बिगाड़ कर रख दिया है.

95 प्रतिशत आऋणी किसानों की नही हुई फसल बीमा

    मनगवां तहसील के 95 प्रतिशत के आसपास किसानों की फसल बीमा खरीफ 2018 में अब तक नही हो पायी है. न तो इसमे सहकारिता विभाग कोई रुचि ले रहा है और न ही कृषि विभाग. 

    ऐसे में यह स्प्ष्ट दिख रहा है की यदि इस वर्ष खरीफ 2018 में सूखा पड़ता है अथवा कम बारिस होती है तो किसानों के लिए एक बार फिर भारी मुश्किल होने वाली है. क्योंकि फसल बीमा के अभाव में और समय पर फसल बीमा न करवा पाने की स्थिति में उन्हें अपने फसलों की नुकसानी की कोई भरपाई नही हो पाएगी और एकबार फिर किसान इस सरकारी योजना का समुचित लाभ न ले पाने के कारण ठगा सा रह जाएगा. 

  संलग्न - मनगवां तहसील ज़िला रीवा क्षेत्र के कैथा और उसके आसपास के क्षेत्र में बारिस न होने से मायूस किसान और खाली पड़े खेतों की तस्वीरें. साथ मे सूखे पड़े कुएं जो बता रहे क्षेत्र के जलस्तर को।

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587