Showing posts with label PMFBY. Show all posts
Showing posts with label PMFBY. Show all posts

Tuesday, August 14, 2018

15 अगस्त, पर पीएम फसल बीमा टाँय टाँय फिस्स (मामला ज़िले में होने वाली खरीफ वर्ष 2018 की फसल बीमा योजना का जिंसमे डेडलाइन आने पर भी नही हुए अऋणी किसानों की फसल बीमा, अब तक मात्र 5 प्रतिशत भी अऋणी किसानों की नही हुई बीमा )

दिनांक 14 अगस्त 2018, स्थान - गंगेव/गढ़, रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

फसल बीमा क्या होती है अऋणी किसानों को कोई इसकी जानकारी नही. स्थिति इतनी नाजुक है की 15 अगस्त की डेडलाइन आ गई लेकिन अब तक ज़िले के लाखों अऋणी किसानों की फसल बीमा नही हुई. सहकारी समितियों से पूंछो तो उनके पास फॉर्म नही और ग्राम सेवकों का कोई रता पता नही. 

  खरीफ 2018 की स्थिति अकाल जैसे 

    वास्तव में देखा जाए तो खरीफ 2018 की स्थिति विशेषकर रीवा ज़िले में अभी भी दुर्भाग्यपूर्ण बनी हुई है. यहाँ औसत से काफी कम वर्षा हुई है, और अब तक बोवनी भी अधिकतम मात्र 30 से 35 प्रतिशत तक हो पायी है. जहां तक सवाल लेव और रोपा का है वह न के बराबर है क्योंकि सिरमौर, मनगवां, त्योंथर आदि तहसीलों में वारिश की स्थिति ठीक नही है ऐसे में लेव रोपा कैसे लगेगी. कुछ हद तक झुरिया खेती हुई है जिसके लिए भी पानी की दरकार है. बारिश कम होने से झुरिया की खेती भी नष्ट होने के कगार पर है. 

  त्रुटिपूर्ण होने के वावजूद भी फसल बीमा से मिलेगी काफी राहत

   अब जबकि सम्भाग में बारिश की स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है ऐसे में ऋणी और अऋणी दोनो किसानों के लिए फसल बीमा से काफी राहत मिल सकती है. यद्यपि वर्तमान फसल बीमा त्रुटियों से परिपूर्ण है जिंसमे अच्छा खासा प्रीमियम जमा करने के बाद भी किसान के हाँथ कुछ विशेष नही लगने वाला परंतु फिर भी गई गुजरी स्थिति में भी किसान को उसकी बोवाई बीज और खाद का पैसा तो निकल ही आता है ऐसे में कहा जा सकता है की डूबते को तिनके का सहारा.

 गंगेव ब्लॉक में कृषि विभाग सोया चिरनिद्रा

   यदि लोकल लेवल की बात करें तो गंगेव कृषि विभाग में लगभग 40 आरएईओ होने के बाद भी ग्रामों की खबर लेने वाला कोई नही. कुछ ग्रामों के बीच किसान मित्र भी बनाये गए हैं लेकिन उनकी भी रुचि कोई विशेष नही है, मात्र मानदेय उठा रहे हैं. 

    गंगेव कृषक कल्याण एवं कृषि विभाग में पदस्थ एसएडीओ वीरेंद्र सिंह चौहान से बात की गई तो बताया की हमारे यहाँ आरएईओ कार्य नही करते तो हम क्या करें. चौहान ने बताया की मैं भी आरएईओ ही हूँ और एसएडीओ के प्रभार में हूँ इसलिए सभी आरएईओ हमारी बातें नही सुनते हैं. इससे साफ जाहिर है की वर्तमान प्रभारी एसएडीओ को हटाकर सक्षम फुल चार्ज वाला एसएडीओ आना चाहिए तभी कोई जिम्मेदारी तय हो सकती है

गंगेव कृषि विभाग अक्षम कर्मचारियों के हवाले

    गंगेव कृषि विभाग अक्षम कर्मचारियों के हवाले है. पूरे ब्लॉक में कोई भी कर्मचारी कार्यालय में उपस्थित नही रहता. मात्र गुरुवार को ही आरएईओ की बैठकें होती हैं जिंसमे मात्र कुछ ग्राम सेवक आते हैं. ऐसा लगता है की इन्हें मॉनिटर करने वाला कोई नही. ग्रामीण किसानों द्वारा जब भी कभी खाद बीज के लिए जाया जाता है तो उन्हें वह भी नही दिया जाता बल्कि उन्हें बोला जाता है की जाकर अपने अपने आरएईओ से मिलो. जबकि ग्राम सेवकों का कोई पता नही रहता. गंगेव कृषि विभाग में मात्र बसंत गौतम बैठते हैं साथ ही प्रिंस द्विवेदी नामक एक लड़का जो की चपरासी के पद पर है.

सूखा की स्थिति में अऋणी किसानों का क्या होगा

   अब प्रश्न यह है की इस वर्ष खरीफ 2018 में सूखा लगभग तय है और ऐसे में उन किसानों का क्या होगा जिनका फसल बीमा ही नही हो पाया है. जिन किसानों ने किसी प्रकार से सहकारी समितियों और बैंकों से कर्ज़ अथवा खाद बीज लिया है उनके लिए तो बीमा मानो हो गई लेकिन जिन्होंने किसी प्रकार से कोई कर्ज़ नही लिया अब उनका क्या होगा? ऐसे किसानों का फसल बीमा कैसे होगा क्योंकि 15 अगस्त की बतायी गई डेडलाइन भी बीत चुकी है. 

इन किसानों ने जाहिर की नाराजगी

    गंगेव कृषि विभाग अन्तर्गत आने वाले कैथा, हिनौती, कठमना, लोटनी, मदरी, बांस, इटहा, अकलसी, सोरहवा, मिसिरा, पडुआ, सेदहा, बड़ोखर, अमवा, अमिलिया, अगडाल, आदि ग्रामों के सैकड़ों अऋणी किसानों ने सहकारिता एवं कृषि विभाग के कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़ा किया है और बताया है की उन्हें न तो सहकारी समितियों के माध्यम से और न ही कृषि विभाग के माध्यम से ही फसल बीमा की कोई जानकारी मिली है. सत्यभान पटेल, रामखेलावन द्विवेदी, रामनरेश, जगदीश, संतोष, पिंटू, रामाधार, सिवाधार, गिरीश, सहित सैकड़ों किसानों ने बताया की हमे आजतक फसल बीमा की कोई जानकारी नही मिली है. यदि किसी कागज़ात में हस्ताक्षर करवाने पड़ते हैं तो हमे सीधा पिसान लेकर ग्राम सेवकों और पटवारियों को हूंढने पड़ते हैं. न तो ग्राम सेवक का कोई रता पता है और न ही पटवारी का.

संलग्न - संलग्न तस्वीर में हिनौती आरएईओ के उपस्थित ग्रामीण कृषकजन जिन्हें कभी भी कृषि फसल बीमा की कोई जानकारी ग्राम सेवकों अथवा पटवारियों द्वारा नही बतायी गई.

-------------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र मोबाइल 9589152587, 7869992139

Monday, July 9, 2018

अब तक रीवा में सूखा जैसे हालात, कहाँ गए फसल बीमा करवाने वाले विभाग? (मामला ज़िले में अऋणी किसानों की प्रधानमंत्री फसल बीमा की दयनीय स्थिति की जहां अब तक न तो ग्राम सेवक, कृषि विभाग और न ही सहकारिता विभाग का है कोई रता पता, ज़िले में सूखा जैसे हालात, यदि अऋणी किसानों की फसल बीमा नही हुई तो होगी भीषण समस्या)

दिनांक 09 जुलाई 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  रीवा ज़िले में बारिस की स्थिति अब तक चिंतनीय बनी हुई है. औसत से काफी कम बारिस होने की वजह से किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें स्वाभाविक है. जहां एक तरफ बोवनी लेट हो रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान उहापोह में झुरिया धान का ही छिटाव शुरू किये हुए हैं. पर यदि बारिस नही होती अथवा कम बारिस होती है दोनो ही स्थितियों में विशेषकर असिंचित क्षेत्रों में किसानों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है.

  प्रधानमंत्री फसल बीमा की स्थिति दयनीय

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रारम्भ से लेकर अब तक रीवा संभाग में फसल बीमा की स्थिति दयनीय बनी हुई है. या यूं कहें की प्रधानमंत्री फसल बीमा ने किसानों की स्थिति ही दयनीय बना दी है. पिछले कुछ सालों में रीवा संभाग में मात्र किसानों से फसल बीमा के नाम पर प्रीमियम की उगाही की गई है उसके एवज में उन्हें मिला कुछ नही है अथवा यदि कुछ तहसीलों में मिला भी है तो बहुत कम जिंसमे किसान की लॉगत तक नही निकल पायी है. रीवा ज़िले के मनगवां तहसील में प्रधानमंत्री फसल बीमा के आने के अब तक मात्र किसानों को अंगूठा ही दिखाया गया है.

90 प्रतिशत किसानों को पता ही नही फसल बीमा क्या है?

   बड़े ही आश्चर्य की बात है की ग्रामीण अंचलों के बहुत से किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कोई विशेष जानकारी नही है. जब कभी टीवी अथवा रेडियो के माध्यम से सुन देख लिया उसके अतिरिक्त न तो समिति प्रबंधकों का कोई रता पता है और न ही ग्राम सेवकों का. कृषि और सहकारिता विभाग के ऊपर फसल बीमा कराने और जानकारी देने का ज्यादा से ज्यादा दारोमदार होता है लेकिन आज भी यदि गंगेव ब्लॉक अथवा किसी भी ब्लॉक के कृषि कार्यालय में जाया जाए तो वहां बहुतायत में पुराने पड़े पैम्फलेट और पोस्टर मिल जाएंगे जो पिछले 3 वर्षों से ब्लॉक कृषि विभाग के गोदाम और कमरों अलमारियों में धूल फांक रहे होंगे. वैसे यह सभी योजनाओं के पोस्टर बैनर और पैम्फलेट किसानों और ग्रामीणों को वितरित करने जन जागरूकता फैलाने के लिए आये हैं. 

आरएईओ और ग्राम सेवकों का नही कोई रता पता कौन कराए अऋणी किसानों की फसल बीमा

    कृषि विभाग द्वारा प्रत्येक 4 से 5  ग्राम पंचायतों के बीच एक ग्राम सेवक अथवा आरएईओ रखा जाता है जिसका काम होता है की किसानों के हित संबंधी सभी योजनाओं की जानकारी गांव गांव जाकर उपलब्ध कराना, किसानों को फसल बीमा योजना के बारे में अवगत कराना, उन्हें फॉर्म भरवाकर प्रीमियम जमा करवाकर फसल बीमा का फॉर्म भरना, समय समय पर खरीफ और रवी सीजन में आने वाले खाद बीज कीटनाशक एवं अन्य जानकारी उपलब्ध कराना. परंतु यहां तो पूरा उल्टा होता है और ग्राम सेवकों का कोई रता पता ही नही रहता है. यदि कोई जल क्षमता प्रमाण पत्र अथवा कृषि से संबंधित कोई जरूरी कागज़ात में ग्राम सेवकों के हस्ताक्षर करवाने होते हैं तो ग्राम सेवक को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है. 

समिति प्रबंधक बोलते हैं फसल बीमा का फॉर्म ही नही

  किसान के पास तो बस दो ही विकल्प बचते हैं. एक ग्राम सेवक को ढूंढे और दूसरा समिति सेवक को. न तो ग्राम सेवक फसल बीमा कराने में सहयोग कर रहा और न ही समिति सेवक. यह दोनो ही सेवक अब सेवक से मालिक बन चुके हैं और आम जनता स्वयं नौकर बनकर इन मालिको को ढूंढे.

  जहां ग्राम सेवक का कोई पता ही नही वहीं समिति सेवक के पास कृषि विभाग के फॉर्म ही उपलब्ध नही. समिति सेवक बोलता है की उसके पास फसल बीमा कराने के लिए कोई जानकारी नही आई है और न ही कोई अऋणी किसानों के फॉर्म ही उपलब्ध हैं.

   स्वाभाविक रूप से किसान ऐसे में कहाँ जाए और क्या करे. कृषि विभाग के ग्राम सेवकों और सहकारिता विभाग के समिति सेवकों ने गरीब किसान की धुरचट बिगाड़ कर रख दिया है.

95 प्रतिशत आऋणी किसानों की नही हुई फसल बीमा

    मनगवां तहसील के 95 प्रतिशत के आसपास किसानों की फसल बीमा खरीफ 2018 में अब तक नही हो पायी है. न तो इसमे सहकारिता विभाग कोई रुचि ले रहा है और न ही कृषि विभाग. 

    ऐसे में यह स्प्ष्ट दिख रहा है की यदि इस वर्ष खरीफ 2018 में सूखा पड़ता है अथवा कम बारिस होती है तो किसानों के लिए एक बार फिर भारी मुश्किल होने वाली है. क्योंकि फसल बीमा के अभाव में और समय पर फसल बीमा न करवा पाने की स्थिति में उन्हें अपने फसलों की नुकसानी की कोई भरपाई नही हो पाएगी और एकबार फिर किसान इस सरकारी योजना का समुचित लाभ न ले पाने के कारण ठगा सा रह जाएगा. 

  संलग्न - मनगवां तहसील ज़िला रीवा क्षेत्र के कैथा और उसके आसपास के क्षेत्र में बारिस न होने से मायूस किसान और खाली पड़े खेतों की तस्वीरें. साथ मे सूखे पड़े कुएं जो बता रहे क्षेत्र के जलस्तर को।

-----

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Saturday, July 7, 2018

बारिस में बिलम्ब से किसान मायूस, कब बरसेंगे मेघा कब लगेगी लेउ (रीवा में अब तक बारिश की कमी से किसान मात्र झुरिया फसल बो पाये,  उड़द, मूग, अरहर के अतिरिक्त थोड़ी बहुत सोयाबीन की हुई बोवाई, लेउ और रोपा धान की नही हो सकी बुवाई, असिंचित क्षेत्र के किसान मात्र ईश्वर पर निर्भर)

दिनाँक 07 जुलाई 2018, स्थान - गढ़/ गंगेव, रीवा मप्र 

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी, रीवा-मप्र)

     देश प्रदेश के कुछ हिस्सों में चाहे भले ही अब तक औसत और औसत से अधिक बारिश हुई हो लेकिन प्रदेश के रीवा ज़िले में बारिश की स्थिति अब तक चिंताजनक बनी हुई है. सबसे अधिक चिंता अन्नदाता के लिए है. 

     किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं की कब बारिश हो और वह लेउ तथा रोपा लगाएं. कुछ किसान तो मायूस होकर झुरिया की ही खेती कर रहे है. पिछले दो तीन दिनों से काफी किसान 80 से 90 दिवश में पकने वाली धान जैसे आई आर 50, 64, 1010, लोचई, नीलम, ॐ थ्री आदि धानों की बुवाई करने लगे हैं. यह धान के बीज परंपरागत तरीके से बोए जा रहे हैं. धान का शूखे खेतों में छिटाव करने के बाद ट्रेक्टर से जुताई की जा रही है. खेतों में दूर दूर तक कहीं पानी के नामोनिशान नही है. 

झुरिया खेती ही बच रहा एकमात्र विकल्प

   तेरा कातिक तीन आषाढ़ की पुरानी कहावत है. क्षेत्रीय किसानी परंपरा के अनुसार कार्तिक मास के 13 दिन काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं जब गेहूं रवी सीजन की खेती की जाती है इसी प्रकार आषाढ़ महीने के तीन दिन बहुत मत्वपूर्ण माने जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह हुआ की आषाढ़ महीने में तोरा बहुत महत्वपूर्ण होता है. यदि तोरा आर्थात समय बीत गया तो किसानी का उतना लाभ नही मिल पाता जितनी उम्मीद की जाती है.

   अब जब इस वर्ष 2018 खरीफ में 7 जुलाई तक ज़िले में बारिश नही हुई है अथवा जहां हुई भी है वहां बहुत हल्की फुल्की हुई है ऐसे में किसानों के लिए जो विकल्प बचा हुआ है वह मात्र झुरिया की खेती का ही है. झुरिया अर्थात शूखे खेत में बीज डालकर हल चलाना झुरिया खेती कहलाता है. झुरिया खेती के लिए पानी की कम मात्रा भी ठीक रहती है.

   कैथा और आसपास के किसानों ने बोया झुरिया धान 

   कैथा और आसपास के बहुतायत किसान जो असिंचित क्षेत्र अंतर्गत आते हैं और अधिक पानी का इंतज़ार नही कर पा रहे हैं. यहां बता दें की कैथा और उसके आसपास के ग्रामों से संबंधित भौगोलिक परिस्थितयों में मनगवां तहसील के हल्का इटहा नंबर 2, बांस, लौरी गढ़, सिरमौर तहसील के हिनौती हल्का नंबर 39, सर्किल लाल गांव, त्योंथर तहसील के पटवारी हल्का जमुई नंबर 31 सहित अन्य आसपास के पचासों ग्रामों में अब तक नईगढ़ी सूक्ष्म सिंचाई परियोजना की नहर सुविधा उपलब्ध नही हो पायी है जिससे अभी भी यह क्षेत्र सूखा ही है. यहां पर जमीन के नीचे का जलस्तर भी काफी नीचे पहुच चुका है. जिन किसानों के पास बोरवेल अथवा ट्यूबवेल हैं उनका भी जलस्तर काफी नीचे होने की वजह से पर्याप्त पानी नही मिल पा रहा है. साथ ही दूसरी समस्या बिजली की बनी हुई है जिंसमे कटरा डीसी अंतर्गत एक 5 एमवीए का बड़ा और मुख्य ट्रांसफार्मर फैल हो जाने की वजह से वाधित बिजली आपूर्ति हो रही है. हर आधे घंटे में बिजली ट्रिप कर रहीं है. 

  झुरिया धान में ज्यादा लॉगत, पैदावार कम

    इस क्षेत्र में बोई जाने वाली झुरिया धान में लॉगत ज्यादा होती है पर उपज कम. सबसे बड़ी बात यह है की धान जैसी फसल मात्र पानी की ही फसल है. जितना पानी मिले धान उतनी ही उपज देती है. हाँ यह बात जरूर है की धान में इतना पानी न भरा रहे की धान डूब में आ जाए ऐसे में धान सड़ जाती है. 

     झुरिया धान में चूंकि पानी का अभाव रहता है इसलिए इसमे खर पतवार और चारा घास बहुत उत्पन्न होता है. ऐसे में या की चारा घास नष्ट करने वाली दवा का प्रयोग किया जाए जो धान के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत अच्छी नही मानी जाती और साथ ही हमारे स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी नही है. दूसरा विकल्प परंपरागत रूप से खेतों में की जाने वाली निरवायी है. निरवायी से बोई गई धान के अतिरिक्त अन्य चारा घास और लमेरा झरगा फसही, गोंदिला आदि किश्म के चारा घास मजदूरों द्वारा उखाड़ फेंके जाते हैं. 

  झरगा, फसही, गोंदिला, लमेरा चारा घास निरवायी का बढ़ जाता है खर्च

    देखा जाए तो झुरिया की खेती आज बहुत कम किसान करना पसंद कर रहे हैं. इसका मुख्य कारण जैसा की ऊपर बताया गया इसकी लॉगत है. लॉगत की वजह से झुरिया की खेती काफी महँगी पड़ रही है और उपज पैदावार भी कुछ विशेष नही होती. झरगा, फसही, गोंदिला, लमेरा और अन्य चारा घास को साफ करने में मजदूरों को दी जाने वाली निरवायी की मजदूरी किसानों को और अधिक महँगी पड़ जाती है. ऐसा भी नही की एक बार निरवायी करवाने से सब चारा घास साफ हो जाता है. इसे समय समय पर कई बार निरवायी करवाना पड़ता है. जिससे लॉगत बढ़ती जाती है. निरवायी न भी हो तो घास फूस नष्ट करने की दवा डालने से भी खर्चा अधिक आता है तथा साथ ही स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है.

   झुरिया धान की खेती में पानी का भराव भी है हानिकारक

   यदि देखा जाए तो झुरिया धान की खेती में पानी का अधिक भराव भी हानिकारक होता है. लेउ तथा नर्सरी द्वारा रोपा पद्धति से लगाई गई धान की तुलना में चूंकि खेतों को झुरिया फसल हेतु बनाया जाता है अतः पानी का ज्यादा भराव भी हानिकारक होता है जिससे धान सड़ जाती है. सबसे बड़ी बात यह होती है की झुरिया धान में जुताई के बाद धान का बीज काफी नीचे गड़ जाता है जिससे उसकी जड़ें काफी नीचे चली जाती हैं अतः यदि पानी का भराव ज्यादा समय तक हुआ तो यह धान सड़ने लगती है. जबकि लेउ और रोपा में बिल्कुल इसके विपरीत होता है. एक कहावत भी है जिसे जैसे संस्कार मिलते हैं उसकी वैसी ही प्रवृति निर्मित होती है. झुरिया धान के संस्कार पानी विहीन अथवा कम पानी की खेती के होते हैं अतः इसे कम पानी ही चाहिए जबकि लेउ और रोपा पद्धति के द्वारा लगाई गई धान को प्रारम्भ से ही पानी चाहिए य यूं कहें की पानी से ही उत्पन्न ही होती हैं इसलिए लेउ रोपा धान पानी की अधिकता के वावजूद भी आसानी से नही सड़तीं.

लेउ धान के लिए बुवाई हो रही लेट

  7 जुलाई तक आवश्यक बारिश न हो पाने से लेउ धान की बोवाई संभव नही हो पा रही है. लेउ धान की बोवाई के लिए काफी पानी की आवश्यकता होती है. जब बारिश का पानी खेतों में पूरी तरह से भर जाता है और पूरी खेत की जमीन पानी से लबालब हो जाती है ऐसे में एक दो बाह जुताई किया हुआ खेत को ट्रेक्टर में चैन लगाकर जोत दिया जाता है जिससे खेत में उपस्थित खरपतवार और घासफूस उसी कीचड़ में गड़ जाती है. इसके बाद खेत बनने के बाद उसी में पहले से ही अंकुरित अथवा भींगे हुए बीज को बीजोपचार के पश्चात बो दिया जाता है. चूंकि खेतों को लेउ पद्धति से बुवाई के बाद चारा घास गड़ जाता है अतः यह अतिरिक्त खर्चा किसानों का बच जाता है जिंसमे या की निरवायी करवानी ही नही पड़ती अथवा यदि करवानी पड़ती है तो काफी कम निरवायी करनी होती है.

रोपा पद्धति एवं मेडागास्कर पद्धति से धान की रोपाई के लिए चाहिए पर्याप्त पानी

   सबसे ज्यादा आज रोपा पद्धति से धान की खेती प्रचलित हो रही है. यदि देखा जाए तो यह रोपा पद्धति काफी बेहतर प्रक्रिया है. इसमे सबसे पहले धान की नर्सरी डाली जाती है. जिसके तहत धान के बीज को घने रूप में किसी खेत में लेउ पद्धति से बोवाई कर दी जाती है. वैसे यह धान जब दो सप्ताह की हो जाए तभी इसे उखाड़कर खेतों में रोप दिया जाता है. सामान्यतया रोपा पद्धति की धान की किस्म के अनुसार अलग अलग प्रक्रिया होती है परंतु बहुतायत में जो धान रोपा पद्धति द्वारा लगाई जाती है उसकी दूरी कम से कम आठ अंगुल के बीच में होनी चाहिए. हाइब्रिड धान की रोपा पद्धति से की जाने वाली खेती ज्यादा पैदावार देने वाली होती है. 140 दिन में उत्पन्न होने वाली कावेरी 199 धान की नर्सरी डालकर की जाने वाली रोपाई में फायदे काफी बताए गए हैं. जिन किसानों ने कावेरी 199 की रोपा पद्धति से खेती की है उनका कहना है की धान को कम के कम 8 से 12 अंगुल की दूरी पर रोपना चाहिए जिससे जब इसमे नीचे से शाखाएं फूटें तो जगह की कमी न पड़े. किसानों द्वारा बताया गया की उनकी पिछले वर्षों बोई गई कावेरी रोपा धान में 70 से लेकर 80 तक शाखाएं नीचे से फूटी थीं जो काफी अच्छा है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कावेरी 199 धान की सही तरीके से खेती करने पर प्रति एकड़ 50 क्विंटल तक की उपज प्राप्त की जा सकती है. जबकि धरातल पर किसानी करने वाले किसानों का कहना है की अब तक उन्हें अधिकतम इसके आधे अर्थात 20 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक की ही पैदावार हुई है. यद्यपि कृषि विशेषज्ञों ने इसके पीछे पानी, खाद, मौसम को जिम्मेदार ठहराया.

खरीफ 2018 किसानों के लिए चिंताजनक 

   अब वर्तमान में जो स्थित बनी हुई है उसमे काफी किसान झुरिया की ही खेती कर रहे हैं. यह खरीफ वर्ष किसानों के लिए कुछ चिंताजनक है क्योंकि गई गुजरी हालात में जुलाई प्रारम्भ होते ही पर्याप्त पानी गिर देता था ऐसे में देखा जाए तो 7 जुलाई तक पानी कम से कम एक सप्ताह लेट है ऐसे में असिंचित किसानों के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है.

कैथा के किसानों ने बोया झुरिया धान 

   कैथा ग्राम एवं उसके आसपास के किसान बहुतायत में झुरिया धान की खेती कर रहे हैं. दिवाकर केवट, दिलीप केवट, गोकुल केवट, राम खेलावन साकेत, बैद्यनाथ केवट, शिव मूर्ति केवट, शेषमणि पटेल, मुन्नालाल केवट, यज्ञनारायण केवट, दासरथ केवट, प्रसन्नलाल केवट, सहित रामविलाश लोनिय आदि कई लघु कृषकों ने झुरिया धान की ही बुवाई की है. जब उनसे पूंछा गया तो ज्यादातर एक से दो हेक्टेयर के छोटे किसानों का कहना था की यदि बारिश के पानी का और अधिक इंतज़ार करते हैं तो उनकी बुवाई लेट हो जाएगी जिससे आगे के रवी सीजन में बोवनी में भी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा.

कुछ किसानों ने डाला नर्सरी बीज, लगाएंगे रोपा

   कैथा और उसके आसपास के कई किसान ऐसे भी हैं जिनके पास ट्यूबवेल और मोटर पंप कनेक्शन उपलब्ध है उन ज्यादातर किसानों ने पहली दूसरी बारिश के बाद ही धान की नर्सरी डाल दिए जिसको बड़ी होने पर और पानी बरसने पर रोपा पद्धति से लगा दिया जाएगा. रोपा पद्धति से किसानी करने वाले किसानों में कैथा से सिद्धमुनि द्विवेदी, भद्रिका प्रसाद द्विवेदी, शिवशंकर द्विवेदी, भैयालाल पांडेय, भैयालाल द्विवेदी, बुद्धसेन पटेल, शम्भू पटेल, अंगद पटेल, शैलेन्द्र पटेल, राजेश पटेल, सत्यभान पटेल, जिमीदार, नरेंद्र पटेल, संपत्ति पटेल, गोपी पटेल, सोरहवा से हरीबन्स पटेल, राम नरेश पटेल, राजबहोर पटेल, सुरेश पटेल, रामाश्रय पटेल, चंद्रिका पटेल,  ग्राम बड़ोखर से मुनेंद्र सिंह परिहार, शिवेंद्र सिंह परिहार, बृजराज सिंह परिहार, ग्राम करहिया से दिनेश लोनिया, नेता लोनिया, सुरेश लोनिया, अजय तिवारी, रामचंद्र लोनिया सहित अन्य किसान सम्मिलित हैं.

संलग्न - कैथा, बड़ोखर, सोरहवा आदि आसपास क्षेत्र के झुरिया की बोवाई करते किसान.

------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मनवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587 

Friday, May 11, 2018

दास्ताँ-ए-किसानी - दसरथ केवट की ढाई एकड़ की किसानी है घाटे का सौदा (मामला ज़िले एवं प्रदेश के छोटे और मझले तबके के किसानों का जिनके लिए किसानी करना किसी मजबूरी से कम नही, लॉगत ज्यादा और उपज कम तो कैसे होगा किसानों का कल्याण, पीएम फसल बीमा योजना कमियों से सनी हुई नही कर सकती किसान का कल्याण)

दिनाँक 12 मई 2018, स्थान - रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानंद द्विवेदी)

   इस वर्ष पूरे प्रदेश और देश में सूखे अकाल के कारण किसानों की फसलें एकबार पुनः तबाह हो चुकी हैं। किसान पुनः कर्ज़ के बोझ तले दब चुका है और अब उसके परिवार को चलाने के जद्दोजहद प्रारम्भ हो चुकी है। लगभग हर छोटे और मझले तबके के किसान की लागत उपज से कहीं ज्यादा है, ऐसे में किसानों की स्थिति पर प्रकाश डालता है यह लेख विशेष तौर पर ध्यान देने योग्य है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा मात्र किसानों का प्रीमियम ऐंठने का तरीका, जब तक इसकी कमी दूर नही की जाती तब तक पीएम फसल बीमा किसानों के साथ अन्याय

        कहने को तो समितियों और बैंकों से ऋण लेने के साथ ही सभी किसानों की फसल बीमा अनिवार्य तौर पर अपने आप ही कर दी जाती है लेकिन इन फसल बीमा का कोई लाभ इन किसानों को नही मिल पा रहा है। कारण यह है कि सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ही कमी है। फसल बीमा का कांसेप्ट ऐसा है कि इसमें किसान द्वारा हज़ारों रुपये प्रीमियम देने के वावजूद भी किसानों को बहुत विशेष नुकसान पर ही फसल बीमा का लाभ मिल पाता है। यदि कोई भीषण प्राकृतिक आपदा आ जाये जिसमे बाढ़, ओले, पाला और पत्थर पड़ जाएं अथवा भीषण सूखा हो जिसमे जल स्रोत ही न बचें तो थोड़ा बहुत फसल बीमा का लाभ मिलता है लेकिन उन स्थितियों में जबकि किसान सूखा की स्थिति में खरीदकर फसल में दिन रात पानी लगाए, अपने खून पसीने से सींचे और तब भी यदि उसका उत्पादन लागत से कम हो अथवा बराबर हो तो इन स्थितियों में किसानों को फसल बीमा का कोई लाभ नही मिलता। 

      मसलन इस वर्ष रवी 2018 की स्थिति को ही देख लिया जाए तो यदि आधार के तौर पर प्रदेश का एक जिला रीवा मूल्यांकन के लिए लिया जाए तो पाते हैं कि इस वर्ष रवी गेहूं के सीजन में कोई भी बारिस नही हुई। जिन किसानों के पास परंपरागत तालाब पोखर अथवा ट्यूबवेल वगैरह थे तो किसी कदर 4 से 5 तक पानी की सिचाई की गई। जिन किसानों के पास अपना कोई व्यक्तिगत जलस्रोत नही था उन्होंने दूसरे किसानों से पानी पैसे में खरीदकर सिचाई की। कहने को तो खेतों में काफी हरियाली दिखी और लगा कि किसान की मेहनत रंग लाएगी और काफी कुछ गेहूं का उत्पादन होगा परंतु स्थिति बिल्कुल इसके उलट थी। खेतों में तो हरियाली जरूर दिखी क्योंकि किसानों ने किसी कदर खेतों की सिंचाई की परंतु जब पककर फसल काटने की बात आई तो प्राकृतिक तौर पर ऊपर आसमान से बरसने वाले पानी की तुलना में सिचाई के पानी से प्राप्त फसल के दानों में शक्ति नही दिखी। जिन खेतों में प्रति एकड़ के हिसाब से 15 से 20 क्विंटल तक गेहूं हो सकता था वहां पर बहुत मुश्किल से 5 से 8 क्विंटल अधिकतम हुआ। ऐसे में इतनी मेहनत के बाद यदि आधा से कम उत्पादन हो रहा है तो किसानों को फसल बीमा का लाभ क्यों नही दिया जा रहा है? पीएम फसल बीमा में जब तक इन कमियों को दूर नही किया जाता तब तक वर्तमान फसल बीमा का कोई औचित्य नही होगा। फसल बीमा में किसान की कुल लागत, किसान की दिन रात की मेहनत, और उस सीजन विशेष में मानसून की स्थिति, बारिस आदि को ध्यान में रखकर फसल बीमा का लाभ किसानों को दिया जाना चाहिए। जैसे इस वर्ष भले ही किसानों ने कड़ी मेहनत करके थोड़ा बहुत उत्पादन कर लिया हो पर उन्हें फसल बीमा का लाभ अवश्य मिलना चाहिए था पर ऐसा नही हुआ। यही इस फसल बीमा की बहुत बड़ी कमी है। एक तो उत्पादन कुछ नही हुआ ऊपर से फसल बीमा का फालतू में किसानों से लिया जाने वाला प्रीमियम किसानों पर एक तरह का अत्याचार है।

अध्ययन में लेते हैं छोटे तबके के किसान दसरथ केवट को

           किसान दसरथ केवट पिता गणेश केवट निवासी ग्राम कैथा, थाना गढ़, ज़िला रीवा मप्र

-----------------

दसरथ की खरीफ वर्ष 2017-18 धान की खेती का व्योरा -

कुल किसानी ढाई एकड़-

धान बीज 4 बोरी 800 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से 3200 रुपये,

जुताई - 7000 रुपये,

खाद (समिति से) - 3 बोरी यूरिया 900 रुपये, और 2 बोरी डी ए पी 2200 रुपये,

कीटनाशक - 1400 रुपये,

सिचाई - 5000 रुपये,

कटाई - 7000 रुपये.

गहाई - 4 घंटे ट्रेक्टर थ्रॉशेरिंग 700 रुपये घंटे के हिसाब से 2800 रुपये,

खरीदी केंद्र में ट्रेक्टर से धान पहुचाने का चार्ज = 1000 रुपया

कुल लॉगत धान = 30500 रुपये.

कुल धान की उपज = 30 क्विंटल = 30 गुणा 1550 = 46500 रुपये.

कुल आमदनी खरीफ धान = कुल उपज धान - कुल लॉगत धान = 46500 - 30500 = 16000 रुपये.

6 महीने रवी सीजन की मूल आमदनी 16000 रुपये जबकि दो व्यक्तियों की 400 रुपये रोज़ के हिसाब से 72000 रुपये जोड़ दिया जाए तो आमदनी निगेटिव में र्थात घाटा आता है।

वर्ष 2018 रवी गेहूं की फसल -

कुल बुबाई का रकबा = ढाई एकड़,

जुताई = 7000 रुपये,

कुल बीज खर्च =  3300 रुपये,

खाद =  3 बोरी डी ए पी 3300 रुपये, 2 बोरी यूरिया 600 रुपये = 3900 रुपये

सिचाई तीन पानी = 8000 रुपये,

कटाई = 12000 रुपये,

गहाई =  1100 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से 4 घंटा = 4400 रुपये।

कुल लागत रवी वर्ष 2017-18 = 38600 रुपये,

कुल उपज गेहूं रवी 2017-18 = 15 क्विंटल = 15 गुणा 1735 = 26025 रुपये।

कुल आमदनी रवी वर्ष 2017-18 = कुल उपज गेहूं - कुल लागत गेहूं = 26025 - 38600 = -12575 रुपये का घाटा जबकि प्रति मजदूर 200 रूपाये के हिसाब से 2 व्यक्तियों का मजदूरी का चार्ज 72 हज़ार रुपये अलग से जपड दें तो घाटा कई गुना अधिक बढ़ जाता है।

किसान दसरथ केवट की पारिवारिक स्थिति -

        किसान दसरथ केवट के परिवार में पत्नी जुगुन्ती केवट हैं जिनके 3 पुत्र और दो पुत्रियां हैं। दोनो पुत्रियों सीता केवट एवं बेला केवट की शादी हो चुकी है। 3 पुत्रों के नाम क्रमशः अरुण केवट उम्र 26 वर्ष, शिव कुमार केवट उम्र 19 वर्ष, शिवभान केवट 16 वर्ष है। बड़ा पुत्र की शादी हुई है जिसके 2 लड़के और 1 लड़की है। पूरा परिवार साथ में ही रहता है। इस प्रकार कुल परिवार में 9 सदस्य हैं. सभी का गुजारा इसी खेती और मजदूरी से होता है। दसरथ केवट ने बताया की वह घर जोड़ने वाले मिस्त्री का भी काम काम कर लेते हैं जिसकी वजह से घर का खर्च चलाने में मदद मिलती है।

       बड़ा लड़का अरुण केवट कभी कभी मजदूरी के सिलसिले में बाहर जाता है। दोनो बड़े लड़के अरुण केवट और शिवकुमार केवट मात्र 9 वीं पास हैं 10 वीं में फैल हो जाने के कारण बीच में ही पढ़ाई छोंड़ दिए। सबसे छोटा लड़का शिवभान केवट 8 वीं कक्षा में अध्ययन कर रहा है।

 ऐसे किसान परिवारों का क्या है भविष्य?

      इस प्रकार के छोटे और मझले तबके के किसानों का कोई भविष्य नही है. इनके पूर्वजों के इन्हें मजदूरी और आर्थिक सामाजिक पराधीनता विरासत में मिलती चली आ रही है.

    गरीबी, अशिक्षा, और लाचारी इन्हें विरासत में मिलती चली जाती है. जब दसरथ केवट से पूछा गया की उनकी शिक्षा कितनी हुई तो बताया की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही नही मिला. बड़े भाई मोतीलाल केवट की मृत्यु कर बाद बचपन में ही मां बाप मजदूरी और खेती किसानी में लगा दिए तो बस उसी में लगे हुए हैं. इनके पुत्रों ने भी यही बात कही की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही नही मिला. घर के काम और पिता की मजदूरी में हाँथ बटाऐं की पढ़ाई लिखाई करें. कुछ ने 9 वीं तक प्रयास भी किया परंतु 10 वीं में फैल होने की वजह से हिम्मत हारकर रुचि खो दिया और पढ़ाई छोड़ दिया। बताया गया की गांव की सरकारी स्कूलें न के बराबर हैं जहां पढ़ने और न पढ़ने में कोई अंतर नही है. गांव में कोई पढ़ाई लिखाई नही होती और शहर की इंग्लिश माध्यम की स्कूलों में पढ़ने के लिए क्षमता और पैसे ही नही. 

छोटे किसानों को खेती किसानी छोड़ व्यापार करना भी नही आसान, बैंकों में विश्वशनीयता और शाख की है समस्याएं 

     इस प्रकार देखा जाए तो अशिक्षा, गरीबी, लाचारी और बेरोजगारी इन्हें विरासत में मिलती जाती है. पीढ़ी दर पीढ़ी इनको इनके जीवन स्तर में कोई विशेष सुधार नही हो पाता है. इनके लिए अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का एक ही तरीका बचता है जो व्यापार है. कम पढ़े लिखे अथवा अशिक्षित भी यदि खेती किसानी छोड़ व्यापार में उतर आएं तो इनके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है. परंतु अच्छे व्यापार के लिए भी कई समस्याएं हैं जिनसे निजात मिल पाना मुश्किल है. चूंकि इन गरीबों के पास पूंजी का अभाव रहता है अतः किसी अच्छे व्यापार की दिशा में सोच पाना भी इनके लिए स्वप्न जैसा ही है. 

     बैंकिंग सेक्टर से कर्ज़ भी उन्ही लोगोँ को दिया जाता है जिनकी कुछ क्रेडिट होती है. क्रेडिट के अभाव में इन छोटे मजदूर किसानों को लोन मिलने में भी कठिनाई होती है. यद्यपि सरकार द्वारा दुनिया भर की योजनाएं मात्र कागजों पर दौड़ रही हैं जिनमे युवा स्वरोजगार, युवा उद्यमी आदि योजनाओं में लोन दिया जाने का प्रावधान है लेकिन यह कर्ज़ भी ऐसे लोगों को मिल पाता है जिनकी पहले से साख और पहचान होती है. गरीब मजदूर और किसानों की कहीं कोई पूँछ नही. ऐसे किसानों को बैंकों की सीढियां ही नही चढ़ने दिया जाता और पहले ही भगा दिया जाता है.

मायूसी और अवसाद में ग्रस्त किसान लगाते हैं मौत और नशे को गले

  इन परिस्थितियों में जबकि खेती-किसानी घाटे का सौदा और एक मजबूरी बन चुका है कोई भी विकल्प उपस्थित न होने पर छोटे और मझले तबके के किसान जिंदगी की जद्दोजहद से हार मान लेते हैं और मायूस होकर अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं. ऐसे में ज्यादातर नशे की गिरफ्त में भी आ जाते हैं जिससे उनकी समस्याएं कम होने की जगह बढ़ जाती हैं. नशे का सहारा लेने पर पारिवारिक और सामाजिक स्तर में और भी अधिक पतन हो जाता है. इससे रही सही आर्थिक स्थिति भी और अधिक डांवाडोल हो जाती है. किसान कर्ज़ में डूबता चला जाता है. और फिर अंत में आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाता है. 

मनोवैज्ञानिक तौर पर आत्महत्या निराशा की पराकाष्ठा है

     आज मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं की किसी भी व्यक्ति द्वारा आपने इस जीवन को नष्ट करने का निर्णय लेना निराशा की पराकष्ठा है. जब व्यक्ति को परिवार, समाज, देश, सरकार और ईश्वर सभी के विश्वास उठ जाता है और उसे लगता है की इस जीवन में अब कुछ भी शेष नही बचा है तब वह अंत में ऐसे घातक कदम उठाता है जिसमे वह अपने सुंदर जीवन को नष्ट करने पर मजबूर हो जाता है. यद्यपि आत्महत्या के पहले यदि मनोवैज्ञानिकों द्वारा सही तरीके से काउंसलिंग की जाए तो मरने वाले का जीवन तो किसी तरह बचाया जा सकता है.

संलग्न - मप्र के रीवा ज़िला अंतर्गत थाना गढ़ के कैथा ग्राम निवासी दसरथ केवट के परिवार के साथ फ़ोटो यहां पर संलग्न है. 

------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, 

मोबाइल - 7869992139, 9589152587,

Friday, April 13, 2018

ज़िले में बेमौसम बारिश ने बढ़ा दी किसानों की मुश्किलें, गहाई हुई हफ्ते भर लेट, बाहर पड़ी सब कच्ची ईंटें पानी में बही

दिनांक 12 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा, मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   देश के उत्तरी क्षेत्र में कई दिनों से खराब चल रहा मौसम का कहर पिछली रात रीवा में भी बरपा. दिनांक 12 अप्रैल की रात को लगभग एक बजे के बाद से गरज लपक एवं तेज़ आँधी के साथ बूंदा बांदी प्रारम्भ हुई. देखते ही देखते पिछली रात किसानों के लिए दुःस्वप्न बन गई. शायद जब रात में लोग सोये होंगे तो इस बात का अंदाज़ा न लगा पाए होंगे की अर्धरात्रि से ही उनकी नीद उड़ने वाली है. 

    कैथा ग्राम के आसपास बसे हुए किसानों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया की बेमौसम बारिश ने उनकी फसल की नुकसानी तो की ही साथ ही ईंट के कच्चे लगे छल्लों को भी नुकसान पहुचाया. बता दें की आजकल ग्राम क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास की भरमार होने से काफी लोग पक्के मकान के लिए ईंट पारने का काम कर रहे हैं. इस बीच जिन ग्रामीणों ने ईंट की पराई पूरी करके भठ्ठे अभी नही लगाए हैं उनके लिए यह बेमौसम बारिश काफी नुकसानी के तौर पर देखी जा रही है. 

   कैथा ग्राम के अरुण केवट, दसरथ केवट, दिलीप केवट, गोकुल केवट, सोमधर मिश्रा, अरुणेंद्र पटेल एवं अन्य लोगों ने बताया की उनकी बाहर पड़ी कच्ची ईंट तेज़ बारिश की वजह से नष्ट हो गयी है और काफी नुकसानी उठानी पड़ी है. शिव शंकर द्विवेदी, सिद्धमुनि द्विवेदी, संतोष केवट, सतानंद केवट, रोहित मिश्रा, हरिबंश पटेल सहित दर्जनों किसानों ने बताया की उनकी बाहर पड़ी गेंहूँ की फसल पूरी तरह से प्रभावित हुई है. जिसमे अभी भी गहाई में काफी वक्त लगेगा क्योंकि फसल पूरी तरह से भींग चुकी है. जब तक फसल सूखेगी नही तब तक उसकी गहाई किया जाना संभव नही है. गांव के कई किसानों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया की तेज़ हवा और आँधी की वजह से भी उनकी खेतों में कटी पड़ी फसल उड़ गई है. जिन किसानों ने ज्यादा सावधानी नही बरती थी और फसल को बोझा बनाये बिना ही खेतों में जेंटा के रूप में छोंड़ दिया था ऐसे सभी किसानों की फसल पूरे खेत में इधर उधर फैली मिली और आधे से अधिक तो कहां उड़ गई इसका पता तक नही चल पाया. इस प्रकार सभी किसानों ने मांग भी की सरकार को इस ओर भी ध्यान देने चाहिए और इस प्रकार की प्राकृतिक आपदा की वजह के हुए नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए.

संलग्न - कैथा ग्राम और उसके आसपास स्थित किसानों की फसल की फ़ोटो, और साथ ही कुछ किसानों के ईंट के भठ्ठे और खराब हुई कच्ची ईंटें.

---------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587,

Monday, July 11, 2016

प्रधानमंत्री भारत सरकार के नाम खुला पत्र - रीवा के किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, के.सी.सी. का सही लाभ मिले और फसलों को सही-सही फसलवार अधिसूचित किया जाये

Dated: 11/07/2016. Place: Rewa (MP)
--------------------------------------
प्रति,             
श्रीमान प्रधानमंत्री महोदय,
प्रधानमत्री कार्यालय, नई दिल्ली.
भारत सरकार, भारत.
--------------------------------

विषय – रीवा जिले की फसल बीमा के लाभ, किसान क्रेडिट कार्ड, एवं ओला-पाला-सूखा आदि मुआबजा वितारानार्थ अधिसूचित की जाने वाली फसलों का पुनर्सर्वेक्षण करने हेतु तथा यह सर्वेक्षण फसलवार छमाही आधारित करने हेतु.


सन्दर्भ १) अधिसूचित फसलों का छमाही आधारित फसलावर (रवी और खरीफ में अलग-अलग) सही सर्वे न होने से फसल बीमा एवं किसान क्रेडिट कार्ड का सही लाभ किसानों को नहीं मिलने सम्बन्धी २) ओला-पाला-सूखा आदि के मुआबजा वितरण में भी वास्तविक फसल अधिसूचित रिकॉर्ड में दर्ज न होने के कारण सही एवं न्यायपूर्ण मुआबजा कृषकों को न मिल पाने सम्बन्धी ३) सम्पूर्ण रीवा जिले में कौन सी फसल सिंचित है और कौन सी असिंचित इस विषय में भी पटवारी तहसीलदार द्वारा सही सूचना न लिखने के कारण के.सी.सी. एवं प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के सही लाभ कृषकों न मिलने सम्बन्धी.

महोदय,

     कृपया उपरोक्त विषयान्तर्गत एवं संदर्भित प्रकरणों का अवलोकन करने का कष्ट करें. उपरोक्त सभी बिन्दुओ में मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा और मांग करूंगा की रीवा जिले के किसानों के हित में यहाँ की सभी तहसीलों में छमाही फसल आधारित फसलों को अधिसूचित किया जाये और वहां पर वास्तविक लोकेशन पर पटवारी, कानूनगो और तहसीलदार द्वारा जाकर देखा जाये की किस ग्राम में ज्यादातर कौन सी फसल की बुवाई हुई है और फिर वास्तविक परिश्थिति को देखकर ही फसलों को अधिसूचित किया जाये जिससे सभी कृषकों को उनकी बोई हुई फसलों का उचित फसल बीमा लाभ, ओला-पाला-सूखा मुआबजा तथा साथ ही साथ उनके के.सी.सी. में भी उचित और सही ऋण उपलब्ध करवाया जा सके.
       सम्पूर्ण रीवा जिले में कृषकों की फसल बीमा, ओला-पाला-सूखा और के.सी.सी. से सम्बंधित निम्नलिखित मूल समस्याएं देखी गयी हैं.

अधिसूचित फसलों का छमाही फसलावर (रवी और खरीफ में अलग अलग) सही सर्वे न होने से फसल बीमा एवं किसान क्रेडिट कार्ड (के.सी.सी.) का सही लाभ कृषकों को नहीं मिलने सम्बन्धी

 मनगवां तहसील में विशेषकर और सम्पूर्ण रीवा जिले में ज्यादातर ग्रामीण अंचल के किसानों को न तो किसान क्रेडिट कार्ड का ही सही लाभ मिल पा रहा है और न ही फसल बीमा का. जिला रीवा के मनगवां, गुढ़, त्योंथर, जवा, सिरमौर, मऊगंज आदि तहसीलों में लगभग प्रत्येक राजस्व क्षेत्र में किसानों की फसलों को पटवारियों, राजस्य निरीक्षकों, और तहसीलदारों द्वारा अपने तहसील कार्यालय में ही बैठ कर अधिसूचित कर लिया जाता है. अधिकतर पटवारी और राजस्व निरीक्षक अपने फील्ड में नहीं पंहुचते है. किसानों और ग्रामीणों को इन कर्मचारियों को दर-दर ढूँढना पड़ता है. उदहारण के लिए मनगवां तहसील, इटहा हल्का, और गढ़ सर्किल के अंतर्गत आने वाले ग्रामों में पिछले वर्ष 2014-2016 के मध्य सूखा अकाल की स्थिति थी. इस दौरान पटवारियों द्वारा सही फसल सर्वे नहीं किया गया जिससे किसानों को फसल बीमा का भी लाभ नहीं मिला है. जो फसल बीमा आयी है वह औसत से बहुत नीचे है और कुछ ही किसानों को मिली है. क्योंकि फसल का वास्तविक धरातल पर जाकर कभी भी सही निरीक्षण और सर्वे नहीं किया जाता है इसलिए जो फसल रिकॉर्ड और कागजों में आज से दस साल से पहले से दर्ज है वही आज भी दर्ज है. जबकि वास्तविकता यह है की प्रति वर्ष आज का किसान मौसम के हिसाब से अपने फसल का चयन करता है. जब ज्यादा बारिस की गुंजाईश होती है तो धान की खरीफ में ज्यादा बोवाई और जब कम बारिश या सूखे जैसी स्थिति रही है तो फसल का चुनाव किसान उस हिसाब से करते हैं और फसलों में सोयाबीन, अरहर, मूग, उरद आदि फसलें चुनते हैं जबकि गर्मियों में रवी के मौसम में ज्यादातर रीवा के किसान प्याज की फसल का उत्पादन करते हैं. जैसे उदहारण के तौर पर इसी वर्ष पूरे रीवा जिले में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मध्य भारत में सूखा-अकाल को देखते हुए किसानों ने प्याज की फसल की बहुतायत में खेती की. अब क्योंकि प्याज बहुतायत में हो गयी इस कारण प्याज़ को खरीदने वाला कोई ग्राहक नहीं मिला जिससे किसानों की टनों प्याज नष्ट हो गयी और उसे फ़ेंक दिया गया. यह एक सामान्य प्रश्न हो सकता है कि क्या भोपाल और दिल्ली में बैठी हुई सरकारें मात्र तमाशा देखने के लिए है? जब किसानों की ऐसी दुर्दशा हो रही है तो सरकार किस लिए बैठी है? क्या सरकारी राजस्व के कर्मचारी और अन्य कृषि और अन्य विभागों के क्षेत्रीय कर्मचारी/अधिकारी और विभिन्न अन्य संस्थान सो रहे होते हैं? सरकारों को तो यह भली भांति पता होना चाहिए की किस ग्राम में, किस तहसील में और किस जिले में किस समय कौन सी फसल किसानों मने बो रखी है, और उसकी क्या स्थिति है? मानाकि यदि किसानों ने बहुतायत में प्याज़ की बोवनी की है तो इस स्थिति में सरकारों को तो चाहिए की अपने तंत्र की मदद से पहले से ही यह आंकलन कर लें की जब यह प्याज अथवा कोई भी अन्य फसल का उत्पादन होगा तो किसानों का खरीददार कौन बनेगा? क्या साहूकार, व्यापारी वर्ग पहले से तैयार है इतनी प्याज़ अथवा कोई भी फसल को उचित और सही मूल्य पर लेने के लिए? व्यापारी इन फसलों का क्या मूल्य देगा? यदि व्यापारी कम मूल्य देगा तो सरकार को किसानों गरीबों और इन रात दिन ग्रामों में मेहनत करने वालों के लिए क्या तरीके ढूंढें जाने चाहिए जिससे किसानों के हितों की रक्षा हो सके? यदि इन प्रश्नों को गंभीरता से लिया जाये तो आम गरीब किसानों के हितों की रक्षा करने वाली कोई भी सरकार के लिए उत्तर ढूँढने में ज्यादा कठिनाई नहीं होनी चाहिए.
  समस्या इस बात की है कागजों में जो नतीजे और विवरण सरकारी कर्मचारियों एजेंसियों और विभागों द्वारा दिए जा रहे हैं वह असत्य और निराधार हैं. उनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है. यदि सम्पूर्ण रीवा जिले में रिकॉर्ड प्याज का उत्पादन हुआ तो इससे साफ़ जाहिर है की अकाल और सूखा में भी किसानों के पास सिंचाई की सुविधा तो थी तब ऐसा हुआ? यदि घर में सिंचाई न होती तो कैसे प्याज जैसी फसल जो की पानी की इतनी अधिक मांग करती है बची रहती, सब नष्ट हो न हो जाती? पर दुर्भाग्य देखिये देश का कि सम्पूर्ण रीवा जिले में आज के दिनांक में आप स्वतंत्र सर्वेक्षण करवा लें और आप पाएंगे की रिकॉर्ड और कागजों में दर्ज सिंचाई सम्बन्धी जानकारी आज से दश वस्ढ़ से भी अधिक पुरानी है. ऐसा क्यों है? ऐसा मात्र तहसीलदार, राजस्व निरीक्षकों और पटवारियों की निष्क्रियता और भ्रष्ट होने की वजह से है. सामान्य तौर पर यदि सरकारें चाहें तो बड़ी आसानी से पता लगा सकती हैं की विजली विभाग द्वारा किन किन कृषकों को सिंचाई के लिए दो हार्स पॉवर या उससे अधिक का कनेक्शन प्रत्येक वितरण केंद्र में दिया गया है. इस सूचना के आधार पर और तहसील कार्यालय से जानकारी लेकर यह बड़ी आसानी से अपडेट किया जा सकता है कि कौन कौन किसानों के कितने रकबे सिंचित है. कभी कभी ऐसा भी होता है की ग्रामों में एक किसान के पास यदि सिच्न्हाई सुविधा है तो अन्य भी कुछ आसपास के किसान इसका कुछ किराया देकर लाभ ले लिया करते हैं. पर यह सिंचित अथवा असिंचित होने का आधार नहीं बनाया जा सकता है. क्योंकि वही फसल और रकबे सिंचित की श्रेणी में आने चाहिए जीने पास या तो तालाब की सुविधा है, सिच्न्हाई के लिए मोटर पंप का कनेक्शन है अथवा आसपास ग्रामों में नहर की सुविधा है. ऐसे ही कृषकों को सिंचित की श्रेणी में रखा जाना चाहिए. और यह काम ज्यादा कठिन नहीं है. मात्र पंचायती क्षेत्र के पटवारी, ग्राम सेवक, समिति सेवक, और पंचायत सचिव के माध्यम से यह जानकारी पूर्ण कर फीड की जा सकती है. पर रीवा जिले के किसों का दुर्भाग्य ही है की उनके खून पसीने की कमाई मौज से खाने वाले यह सरकारी कर्मचारी किसानों, मजदूरों और गरीबों के हित में कोई कार्य नहीं कर सकते. पर प्रश्न यह भी उठता है की क्या एस.डी.एम., कलेक्टर, और अन्य सम्बंधित जिला और प्रदेश स्तर के अधिकारी सो रहे होते हैं की इतनी सी.एफ.टी, ग्राम संसद, ग्रामोदय से भारतोदय, आदि पता नहीं कितने कार्यक्रम हुए पर हुआ कहीं कुछ नहीं. किसानों ग्रामीणों की स्थितियां यथावत बरक़रार हैं.

सम्पूर्ण मनगवां तहसील में मात्र 15 प्रतिशत से भी कम सिंचित की श्रेणी में –

यदि हम बात करें अपने क्षेत्र की मनगवां तहसील की तो पाएंगे की यहाँ अधिकतम पंद्रह प्रतिशत भी किसानों को सिंचित की श्रेणी में नहीं रखा गया है. सूखा क्षेत्रों की बात तो अलग है मनगवां और गंगेव के मध्य से जो बाणसागर नहर निकली है उसके भी किनारों के कृषकों को अशिंचित दर्शाया गया है. यह कैसे हो सकता है की जहाँ से नहर गुजरे वह भूमि असिंचित हो? क्या नहर में पिछले ४-५ सालों से पानी नहीं छोड़ा गया? अथवा बाँध ही सूखा था? इसी प्रकार अन्य भी क्षेत्र जहाँ नहर नहीं भी है जैसे की गढ़, लालगांव सर्किल और इसी प्रकार चकघाट सर्किल अंतर्गत जमुई कला हल्का तथा आसपास के अन्य पटवारी हल्कों में भी यही स्थिति है. हमारी यही मांग है की तत्काल ऐसे सभी कृषकों को सिंचित की श्रेणी में रखा जाये जिनके पास मोटर कनेक्शन, तालाब, आसपास नहर आदि की सिंचाई सुविधाएँ है. इससे सबसे बड़ा फायदा तो के.सी.सी. में होगा जहाँ इनके ऋण लेने की सीमा में बढ़ोत्तरी होगी और साथ ही सही जानकारी सरकार के पास तक पंहुचेगी जिससे योजनायें बनाने और उनके क्रियान्वयन में भी मदद मिल सके. शायद एक स्थान हो सकता है जहाँ किसानों को नुक्सान होगा और वह है फसल बीमा की राशि मिलने में. क्योंकि यदि कमतर सिंचित क्षेत्र भी पूर्ण सिंचित चिन्हित हो गए तब किसानो को फसल बीमा का शायद उतना अधिक लाभ न मिल पाए. पर यह भी एक गलत ही धरना है. क्योंकि आज जो भी सर्वे होगा और जो भी फसल बीमा सम्बंधित जानकारी संप्रेषित की जाएगी वह जी.पी.एस. रीडिंग और फोटोग्राफ्स आदि लेकर की जाएगी. अतः ऐसी स्थति में यदि योजनायों का क्रियान्वयन सही तरीके से हुआ तो संदेह की कम स्थति रहेगी. 

जब वास्तविक कृषकों के नाम ही शूखा सर्वे सूची में नहीं जोड़े गए तब फसलों को छमाही और रवी-खरीफ के आधार पर ग्रामवार/कृषकवार अधिसूचित कैसे किया जायेगा?

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है की फसलों को अधिसूचित किस प्रकार किया जा रहा है? क्या तहसील कार्यालय में बैठकर फसलों को अधिसूचित किया जा सकता है? कम से कम रीवा में तो ऐसा ही चल रहा है. आप प्रत्येक हल्के में जाएँ और देखें कि उस हल्के में किसानों ने पिछले दो सालों में कौन-कौन सी फसलों की बुवाई की है. यह आंकड़ा मिलने पर आप आश्चर्य चकित रह जायेंगे कि फिर तहसील कार्यालय और पटवारी कानूनगो के रिकॉर्ड में अधिसूचित फसलें पिछले दशक की क्यों दर्शाई जा रही हैं? अभी हाल ही में पिछले वर्ष २०१४-१६ में पड़े भीषण सूखे में हमने तीनों तहसीलों मनगवां, त्योथर और सिरमौर का वाकया देखा. मैं स्वयं प्रत्यक्ष उदहारण हूँ की दर्ज़नों सी.एम. हेल्पलाइन में शिकायतें की गंयीं (शिकायत क्र. 1403875, 1404035, 1404296, 1405821, 1405974, 1409259, 1409286, 1409324, 1409692, 1471423, 1450846, 1516382, 1516433, 1579576, 1597835, 1625395 आदि) और तहसीलदार एस.डी.एम. को लिखित भी दिया गया कि हिनौती हल्का 39, जमुई कला हल्का 31 के जिन किसानों का सूखा सर्वे में नाम छूट गया है उन किसानों के नाम जोड़े जांयें. परन्तु पटवारी, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार, एस.डी.एम, से लेकर कलेक्टर रीवा तक बात रखी गयी पर कोई समाधान न निकला. कलेक्टर रीवा श्री राहुल जैन का कहना था की जब प्रथम सर्वे सूची वनकर आ जाएगी और पंचायतों में नोटिस बोर्ड में चस्पा होगी तो दावा आपत्ति के अंतर्गत नाम जोड़ने के लिए आवेदन दें. सबसे बड़ी बात तो यह की सूची कब आयी और कब नोटिस बोर्ड में लगी इसकी भी कोई जानकारी कृषकों को नहीं हुई, और जिनको जानकारी हुई उन्होंने जब दावा आपत्ति के अंतर्गत आवेदन दिया तो उनके नाम भी पटवारी तहसीलदार द्वारा यह कहकर नहीं जोड़े गए की अब जो होना था वह हो गया, सरकार के पास फण्ड नहीं है और अब और अधिक नाम नहीं जोड़े जांयेंगे. सबसे बड़ी बात तो यह है की नाम ही कब जोड़े गए थे तो और अधिक नाम नहीं जोड़े जायेंगे? कब सर्वे हुआ और किन कृषकों को सर्वे के दौरान उनके खेत में बुलाया गया क्या इसकी जानकारी पटवारी तहसीलदार दे सकते हैं? क्या उन कृषकों के हस्ताक्षर, फोटोग्राफ्स या विडियो तहसीलदार कलेक्टर के पास उपलब्ध हैं जब सर्वे हो रहा था? सबसे दुर्भाग्य पूर्ण रवैया सिरमौर तहसीलदार मुनीन्द्र तिवारी और त्योंथर तहसीलदार देवांगन का था. सैकड़ो में से मात्र दश-बीस के नाम जोड़े गए शेष के नाम छोंड दिए गए. वास्तव में हुआ यह की इन हलकों में पटवारी ग्रामसेवक सर्वे करने ही नहीं आये. हिनौती हल्का 39 लालगांव सर्किल एवं सिरमौर तहसील के अंतर्गत आता है वहां का पटवारी प्रमोद पाण्डेय है. यह व्यक्ति प्रमोद पाण्डेय चौबीस घंटों में अठारह घंटे बराबर शराब के नशे में धुत्त रहता है. यह कभी भी हल्का में नहीं रहता. कई बार इसकी शिकायतें दर्ज़नों लोगों ने की पर कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं हुई. सिरमौर का तहसीलदार मुनीन्द्र तिवारी कई बार स्वयं भी इसका पक्ष लिया. मुनिद्र तिवारी के समक्ष ही पटवारी प्रमोद पाण्डेय ने चार-पांच अन्य हिनौती के हितग्राही ब्रिजेश उपाध्याय, अखिलेश उपाध्याय, और दिनेश सिंह निवासी लोटनी और मेरी उपस्थिति में सभी से बदतमीजी सिरमौर तहसील कार्यालय के अन्दर किया. परन्तु इस तहसीलदार मुनीन्द्र तिवारी ने न ही कोई इस पटवारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की और न ही कोई दंडात्मक कार्यवाही की अनुशंसा. इस बात को बाद में मध्य प्रदेश शासन की पूरी तरह से फ्लॉप हो चुकी सी.एम. हेल्पलाइन (डायल 181) में भी रखा गया था. और उसमे भी मात्र प्रथम लेवल से चौथे लेवल तक का ही खेल चलता रहा और कुछ नहीं हुआ.   
 इसी प्रकार त्योंथर तहसील जिला रीवा अंतर्गत चाकघाट सर्किल में आने वाले जमुई कला 31 के पटवारी कमलेश पाण्डेय का भी यही हाल रहा. कमलेश पाण्डेय ने जमुई हल्का 31 में सही सर्वे नहीं किया. प्रमोद पाण्डेय की तरह कमलेश पाण्डेय ने भी हितग्राहियों से पैसे रुपये लेकर बिना नुकसानी और बिना कृषि योग्य जमीन का ही मुआबजा बना दिया और जिन हितग्राहियों जैसे करहिया के दर्ज़नों लोनिया लोगों का जिनका की वास्तविक नुक्सान हुआ था और इसी प्रकार कैथा निवासी कुछ केवट समुदाय और चौबे, पाण्डेय, द्विवेदी लोगों की जो जमीन करहिया ग्राम अंतर्गत थी उनमे से भारी नुकसान के वावजूद भी कोई मुआबजा नहीं बनाया गया. सभी लिखित शिकायतों की पावती और सी.एम. हेल्पलाइन की शिकायतें इस बात को प्रत्यक्ष बयां करती हैं की किस तरह से तहसील कार्यालयों में पटवारी, कानूनगो, नायब तहसीलदार और तहसीलदार फर्जीवाडा कर रहे हैं काले धंधे में संलिप्त हैं और इसको सुनने देखने वाला कोई मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री नहीं है. ऐसे पटवारी, तहसीलदारों को तत्काल प्रभाव के साथ निलंबित कर देना चाहिए और जुर्माने के तौर पर पांच-पांच साल की इनकी तनख्वाह काट लेनी चाहिए और इस कटी तनख्वाह को उस तहसील और पटवारी हल्के क्षेत्र के गरीब किसानों को बरावर-बराबर वांट देना चाहिए. तब जाकर सही न्याय कहलायेगा.

हम चर्चा कर रहे थे किसानों की फसलवार होने वाले सर्वे की. तो हम देख सकते हैं की कभी-कभी पड़ने वाले सूखे-अकाल जैसी स्थति में यदि पटवारी तहसीलदारों के यह रवैये हैं कि किसानों की फसलों का सही मुआबजा तक नहीं बनाया जा रहा है तो भला ऐसे पटवारी तहसीलदार क्या ख़ाक फसलवार फसलों को अधिसूचित करेंगे? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है. और जब तक फसलों को सही तरीके से अधिसूचित नहीं किया जाता और कौन सी भूमि सिंचित है और कौन सी असिंचित इसकी सही-सही जानकारी नहीं भरी जाती तब तक चाहे प्रधानमंत्री फसल बीमा हो या राष्ट्रपति फसल बीमा इनमे से किसी भी बीमा योजना अथवा के.सी.सी. का कोई सही लाभ वास्तविक हितग्राही किसानों को भारतीय भ्रष्ट्राचार युक्त अव्यवस्था में नहीं मिल सकता. यह बात अब लगभग निश्चित हो चुकी है. सब कुछ मात्र कागजों पर ही रह जायेगा. हाँ जिन किसानों या हितग्राहियों के पास पहले से घूस-रिश्वत के रूप में इन चोरों को खिलाने के लिए पैसे हैं तो जरूर ऐसे लोगों के नाम बिना किसी जमीन जायदाद के ही मुआबजा भी बन जायेगा और उनके मन मुताबिक के.सी.सी और अन्य लाभ भी प्राप्त हो जायेंगे जैसा की हर जगह चल रहा है. अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्या इस पूरे सिस्टम में सीधे-सीधे दिखने वाले इस घोटाले को देखने वाला कोई नहीं बचा? कलेक्टर, कमिश्नर यह सब अधिकारी जिले और संभाग में क्या करते हैं? क्यों ये सीधे-सीधे दिखने वाली इन समस्याओं को ध्यान नहीं देते? कलेक्टर, एस.डी.एम आदि अपने सी.एफ.टी. और ग्रामोदय से भारतोदय, ग्राम संसद आदि यात्राओं और मीटिंग में क्या करने जाते हैं? क्या यह ग्रामीण और कृषकों की समस्याएँ देखने सुनने नहीं जाते? क्या उस पंचायत और ग्राम में जाकर यह अधिकारी सीधे ग्राम बस्ती के लोगों के बीच में जाकर संवाद स्थापित नहीं कर सकते, उनकी समस्याओं से रूबरू नहीं होते?
सम्पूर्ण मनगवां तहसील जिला रीवा के ग्रामीण क्षेत्रों की सिंचित असिंचित भूमि की जानकारी में पिछले दश वर्षों में कोई अपडेट नहीं –

 किसानों की कौन सी भूमि सिंचित है और कौन सी असिंचित इसका फसल बीमा और के.सी.सी. के लाभ में सीधा सीधा प्रभाव पड़ता है. क्योंकि जैसा पहले भी चर्चा मेंन आया कि कृषकों के के.सी.सी. के थ्रेशहोल्ड में सिंचित भूमि का सीधे प्रभाव पड़ता है. जिन कृषकों की भूमि सिंचित है उनको असिंचित वाले कृषकों की तुलना में ज्यादा ऋण उपलब्ध हो पाता है. साथ ही यदि उस भूमि पर सही-सही फसलों को अधिसूचित किया गया है अर्थात यदि महगी फसलें बोई गयी ऐसा पटवारी द्वारा बताया जाता है तो उन कृषकों को तीन-चार गुना ज्यादा ऋण मिल सकता है. जैसे उदहारण के लिए किसी कृषक ने मात्र धान की फसल एक एकड़ के रकबे में बोई है और उतने ही रकबे में किसी अन्य कृषक ने सोयाबीन अथवा मसाले की फसल बोई है तो सोयाबीन अथवा मसाले की फसल वाले कृषक को मात्र धान बोने वाले कृषक की तुलना में के.सी.सी. में ज्यादा ऋण मिलता है. परन्तु पटवारी और तहसीलदार यह सब जानकारी अपडेट नहीं करते जिससे किसानों को वास्तविक और सही लाभ नहीं मिल पा रहा है.

समस्याओं के समाधान की दिशा में कठोर कदम उठाने होंगे, ईमानदार और लोकहित चिन्तक कर्मचारियों अधिकारियों की आवश्यकता –

       शासन प्रशासन को उपरोक्त सभी समस्याओं का समाधान निकालना होगा. और यदि ये सरकारें वास्तव में गरीब, किसान और मज्दूरों का भला चाहती हैं तो बड़े कठोर कदम उठाने होंगे. बिना दंड दिए प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार नहीं हो सकता, यह भी एक अकाट्य सत्य है. जो दोषी है उसे दंड मिलना ही चाहिए. जब ऐसा होगा तो सभी अधिकारियों कर्मचारियों की आँखें खुल जाएँगी. तब जाकर इनको समझ में आयेगा की जनता के एक-एक पैसे जो टैक्स के रूप में तनख्वाह में इन्हें दिए जा रहे हैं वह कुर्सी तोड़ने के लिए नहीं है. उसके एवज़ में इन निकम्मों को काम करना पड़ेगा नहीं तो नौकरी छोंड दें. कोई भी लोकतान्त्रिक सरकारें जनता की बनाई जनता के लिए हैं और यह सभी सरकारी कर्मचारी जनता के नौकर हैं जनता के अधिकारी नहीं. यह जनता का पैसा खा रहे हैं तो इनको जनता के लिए कार्य करना पड़ेगा.
-----------------
SHIVANAND DWIVEDI
(Social, Scientific, and RTI activist)
Village KAITHA, Post  AMILIYA,
Police Station GARH, Tehsil  MANGAWAN,
District REWA, Madhya Pradesh. PIN – 486117
Mob. +917869992139