Showing posts with label Farmers suffering. Show all posts
Showing posts with label Farmers suffering. Show all posts

Saturday, August 4, 2018

बिना पानी ही लग रहे रोपा, 75 प्रतिशत खेत बोवनी बिना (मामला ज़िले में खरीफ वर्ष की बोवनी का जहां इस वर्ष अकाल सी स्थिति बनी हुई है, बारिश बहुत कम और खेत पानी से खाली, मात्र मोटर पंप का सहारा लेकर हो रही बोवनी)

दिनांक 04 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी) 

    रीवा संभाग में वर्ष 2018 की खरीफ बोवनी में अब तक असमंजस की स्थिति बनी हुई है और विशेषकर रीवा ज़िले में इस वर्ष औसत से बहुत कम बारिश होने से अब तक 25 प्रतिशत तक भी बोवनी नही हो पायी है.

    पूरे रीवा ज़िले में भ्रमण किया जाए तो सभी खेत बोवनी से खाली हैं. निचले बांधों को छोंड़कर किसी भी खेत में पानी देखने को नही मिल सकता. इसी से पता चल जाता है कहीं भी लेउ और रोपा योग्य पानी नही है. 

    जिन कास्तकारों के पास अपना स्वयं का मोटर पंप है वही थोड़ा बहुत बोवनी कर पा रहे हैं लेकिन यह स्पष्ट नही है की यदि पानी नही गिरा तो यह खेती पकेगी कैसे? क्योंकि ऊपर से बारिश न होने से निरंतर खिसकते जलस्तर से बोरवेल भी बन्द हो जाएंगे और पीने के पानी तक का संकट उत्पन्न हो जाएगा.

  कैथा और आसपास के किसानों ने मात्र बोई झुरिया खेती

      कैथा, मिसिरा, सेदहा, बड़ोखर, सोरहवा, डाढ़, जमुई, हिनौती, लोटनी, चियार, मदरी, बांस, अमवा आदि नजदीकी ग्रामों में किसानों ने मात्र अब तक झुरिया ही फसल बोई है. वह भी मात्र एक चौथाई. अभी भी 75 प्रतिशत के अधिक खेत खाली हैं. जिन किसानों ने बेहन डाली हुई है उनकी बेहन भी खराब हो चुकी है. लगभग डेढ़ माह से आधिक समय के डाली हुई बेहन अब रोपा लगाने योग्य नही बची है क्योंकि नियमानुसार मात्र 20 से 25 दिवश के अंदर ही रोपा लगा दिया जाना चाहिए नही तो फसल का उत्पादन सही तरीके से नही हों पाता है. 

  कई दिनों से हो रही थी फब्बारे वाली बारिश

    वैसे देखा जाय तो रीवा ज़िले के काफी हिस्सों में पिछले एक सप्ताह से निरंतर फब्बारे वाली बारिश हो रही है. जिस प्रकार से किसी पिकनिक स्पॉट में जाएं तो वहां पर कृत्रिम फब्बारा लगाया हुआ होता है और न तो पानी में उससे बढ़ोत्तरी होती है और न ही कमी आती है. ठीक इसी प्रकार की बारिश पिछले एक सप्ताह से रीवा के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिली है जिसकी वजह से न तो किसान झुरिया ही बोवनी कर पाया और रोपा लेउ का तो प्रश्न ही नही उठता क्योंकि फब्बारे वाली बारिश जमीन तक पहुची ही नही.

 खरीफ 2018 घोषित हो सूखाग्रस्त 

     जिस प्रकार से प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में अकाल जैसे संभावना बनी हुई है ऐसे में सरकार को चाहिए की गिरदावरी और सर्वे करवाकर तत्काल ऐसे सभी जिलों को सूखग्रस्त घोषित करे जिनमे 30 प्रतिशत के कम अब तक बोवनी हुई है. विशेषतौर पर रीवा संभाग में अब तक की स्थिति के स्पष्ट है की यह पूरी तरह से शूखे की जद में आ चुका है. अब यदि बारिश होती भी है तो जलस्तर बनाये रखने और इकोसिस्टम बरकरार रखने के अतिरिक्त बोवनी योग्य नही होगी क्योंकि अगस्त मध्य में कोई भी खरीफ धान की खेती प्रश्न के दायरे में ही रहने वाली है की उसमे कुछ उपज हो पाएगी की नही क्योंकि मध्य अगस्त में बोई जाने वाली धान की फसल को पर्याप्त पानी की चाहत के साथ साथ कीड़ों मकोड़ों से होने वाली बीमारी आदि के भी खतरा बना रहेगा. इस प्रकार बारिश की किसी अप्रत्याशित स्थिति में मध्य अगस्त तक बोवनी होती भी है तो आगे आने वाली रवी 2018-19 की खेती भी पिछड़ेगी जिससे किसान रवी की फसल में भी मार खा जाएंगे इससे बेहतर यही होगा की 15 अगस्त के बाद किसी भी प्रकार की खरीफ 2018 की बोवनी न ही की जाए तो ज्यादा बेहतर है.

संलग्न - रीवा ज़िले के मायूस किसान और साथ ही खरीफ वर्ष 2018 की कुछ रोपा लगी हुई खेती जिनमे पानी का नामोनिशान तक नही. साथ ही पोखर तालाबों का दृश्य जो पूरी तरह से खाली पड़े हुए हैं. आसपास दिख रहे हरे भरे खेत धान से नही लहलहा रहे बल्कि झरगा फसही और नया चारा घास है जो बोवनी न हो पाने की स्थिति में खेतों में उग आये हैं.

----------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139

Monday, July 9, 2018

अब तक रीवा में सूखा जैसे हालात, कहाँ गए फसल बीमा करवाने वाले विभाग? (मामला ज़िले में अऋणी किसानों की प्रधानमंत्री फसल बीमा की दयनीय स्थिति की जहां अब तक न तो ग्राम सेवक, कृषि विभाग और न ही सहकारिता विभाग का है कोई रता पता, ज़िले में सूखा जैसे हालात, यदि अऋणी किसानों की फसल बीमा नही हुई तो होगी भीषण समस्या)

दिनांक 09 जुलाई 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी)

  रीवा ज़िले में बारिस की स्थिति अब तक चिंतनीय बनी हुई है. औसत से काफी कम बारिस होने की वजह से किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें स्वाभाविक है. जहां एक तरफ बोवनी लेट हो रही है वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान उहापोह में झुरिया धान का ही छिटाव शुरू किये हुए हैं. पर यदि बारिस नही होती अथवा कम बारिस होती है दोनो ही स्थितियों में विशेषकर असिंचित क्षेत्रों में किसानों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है.

  प्रधानमंत्री फसल बीमा की स्थिति दयनीय

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रारम्भ से लेकर अब तक रीवा संभाग में फसल बीमा की स्थिति दयनीय बनी हुई है. या यूं कहें की प्रधानमंत्री फसल बीमा ने किसानों की स्थिति ही दयनीय बना दी है. पिछले कुछ सालों में रीवा संभाग में मात्र किसानों से फसल बीमा के नाम पर प्रीमियम की उगाही की गई है उसके एवज में उन्हें मिला कुछ नही है अथवा यदि कुछ तहसीलों में मिला भी है तो बहुत कम जिंसमे किसान की लॉगत तक नही निकल पायी है. रीवा ज़िले के मनगवां तहसील में प्रधानमंत्री फसल बीमा के आने के अब तक मात्र किसानों को अंगूठा ही दिखाया गया है.

90 प्रतिशत किसानों को पता ही नही फसल बीमा क्या है?

   बड़े ही आश्चर्य की बात है की ग्रामीण अंचलों के बहुत से किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कोई विशेष जानकारी नही है. जब कभी टीवी अथवा रेडियो के माध्यम से सुन देख लिया उसके अतिरिक्त न तो समिति प्रबंधकों का कोई रता पता है और न ही ग्राम सेवकों का. कृषि और सहकारिता विभाग के ऊपर फसल बीमा कराने और जानकारी देने का ज्यादा से ज्यादा दारोमदार होता है लेकिन आज भी यदि गंगेव ब्लॉक अथवा किसी भी ब्लॉक के कृषि कार्यालय में जाया जाए तो वहां बहुतायत में पुराने पड़े पैम्फलेट और पोस्टर मिल जाएंगे जो पिछले 3 वर्षों से ब्लॉक कृषि विभाग के गोदाम और कमरों अलमारियों में धूल फांक रहे होंगे. वैसे यह सभी योजनाओं के पोस्टर बैनर और पैम्फलेट किसानों और ग्रामीणों को वितरित करने जन जागरूकता फैलाने के लिए आये हैं. 

आरएईओ और ग्राम सेवकों का नही कोई रता पता कौन कराए अऋणी किसानों की फसल बीमा

    कृषि विभाग द्वारा प्रत्येक 4 से 5  ग्राम पंचायतों के बीच एक ग्राम सेवक अथवा आरएईओ रखा जाता है जिसका काम होता है की किसानों के हित संबंधी सभी योजनाओं की जानकारी गांव गांव जाकर उपलब्ध कराना, किसानों को फसल बीमा योजना के बारे में अवगत कराना, उन्हें फॉर्म भरवाकर प्रीमियम जमा करवाकर फसल बीमा का फॉर्म भरना, समय समय पर खरीफ और रवी सीजन में आने वाले खाद बीज कीटनाशक एवं अन्य जानकारी उपलब्ध कराना. परंतु यहां तो पूरा उल्टा होता है और ग्राम सेवकों का कोई रता पता ही नही रहता है. यदि कोई जल क्षमता प्रमाण पत्र अथवा कृषि से संबंधित कोई जरूरी कागज़ात में ग्राम सेवकों के हस्ताक्षर करवाने होते हैं तो ग्राम सेवक को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है. 

समिति प्रबंधक बोलते हैं फसल बीमा का फॉर्म ही नही

  किसान के पास तो बस दो ही विकल्प बचते हैं. एक ग्राम सेवक को ढूंढे और दूसरा समिति सेवक को. न तो ग्राम सेवक फसल बीमा कराने में सहयोग कर रहा और न ही समिति सेवक. यह दोनो ही सेवक अब सेवक से मालिक बन चुके हैं और आम जनता स्वयं नौकर बनकर इन मालिको को ढूंढे.

  जहां ग्राम सेवक का कोई पता ही नही वहीं समिति सेवक के पास कृषि विभाग के फॉर्म ही उपलब्ध नही. समिति सेवक बोलता है की उसके पास फसल बीमा कराने के लिए कोई जानकारी नही आई है और न ही कोई अऋणी किसानों के फॉर्म ही उपलब्ध हैं.

   स्वाभाविक रूप से किसान ऐसे में कहाँ जाए और क्या करे. कृषि विभाग के ग्राम सेवकों और सहकारिता विभाग के समिति सेवकों ने गरीब किसान की धुरचट बिगाड़ कर रख दिया है.

95 प्रतिशत आऋणी किसानों की नही हुई फसल बीमा

    मनगवां तहसील के 95 प्रतिशत के आसपास किसानों की फसल बीमा खरीफ 2018 में अब तक नही हो पायी है. न तो इसमे सहकारिता विभाग कोई रुचि ले रहा है और न ही कृषि विभाग. 

    ऐसे में यह स्प्ष्ट दिख रहा है की यदि इस वर्ष खरीफ 2018 में सूखा पड़ता है अथवा कम बारिस होती है तो किसानों के लिए एक बार फिर भारी मुश्किल होने वाली है. क्योंकि फसल बीमा के अभाव में और समय पर फसल बीमा न करवा पाने की स्थिति में उन्हें अपने फसलों की नुकसानी की कोई भरपाई नही हो पाएगी और एकबार फिर किसान इस सरकारी योजना का समुचित लाभ न ले पाने के कारण ठगा सा रह जाएगा. 

  संलग्न - मनगवां तहसील ज़िला रीवा क्षेत्र के कैथा और उसके आसपास के क्षेत्र में बारिस न होने से मायूस किसान और खाली पड़े खेतों की तस्वीरें. साथ मे सूखे पड़े कुएं जो बता रहे क्षेत्र के जलस्तर को।

-----

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Sunday, May 13, 2018

भाग 3 - दास्तां ए किसानी - रवी बोवनी 29 एकड़, लागत 165200 रु, कुल उपज 316080 रु (मामला मप्र के जिला रीवा अंतर्गत थाना गढ़ ग्राम बड़ोखर के 20 सदस्यीय परिहार किसान परिवार का जिसमे उद्यमी शिवेंद्र सिंह एवं उनके भाईयों की कड़ी मेहनत ने मौसम विरुद्ध राई की खेती में बनाना चाहा पहाड़)

दिनांक 13 मई 2018, स्थान - कैथा, रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

  5 से 10 एकड़ अर्थात 2 से 4 हेक्टेयर के आसपास तक के किसानों की परंपरागत किसानी तो पहले ही प्रश्नवाचक दायरे में है जहां ऐसे छोटे और मझले किसानों के लिए जीवन यापन तक करना असंभव हो रहा है. अब देखते हैं कुछ ऐसे किसानों परिवारों को जिनके पास अपेक्षाकृत सामूहिक तौर पर 2 अथवा 4  हेक्टेयर से अधिक की किसानी की गई. मप्र के रीवा ज़िला अंतर्गत थाना गढ़ के बड़ोखर ग्राम निवासी सुरसरी सिंह परिहार का परिवार है. सुरसरी सिंह के 5 पुत्र हैं जिनमे से एक जितेंद्र सिंह आर्मी पुलिस में आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं. वहीं उनके शेष 4 पुत्र घर में ही रहकर खेती किसानी का कार्य देखते हैं. सुरसरी सिंह की कुल जमीन 14 एकड़ के आसपास है जिसमे अभी उन्ही के नाम पर है और पुत्रों के मध्य कोई बटवारा नही हुआ है. सुरसरी सिंह के घर में रहने वाले 4 पुत्र क्रमसः धीरेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह और शिवेंद्र सिंह हैं. सबसे बड़े वाले पुत्र धीरेंद्र सिंह शारीरिक रूप से अक्षम हैं क्योंकि वह एक असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं जिसमे उनका पूरा शरीर लकवे की तरह हो गया है जिसमे कोई किसी भी प्रकार का मूवमेंट नही होता. बीमार सुरसरी सिंह स्वयं भी 80 वर्ष के ऊपर होने के कारण शारीरिक रूप से अक्षम हैं और घर गृहस्थी का कार्य मात्र उनके तीनो पुत्र शिवेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह के हवाले है. कार्यक्षमता के तौर पर देखा जाए तो सम्पूर्ण खेती किसानी के कार्य का मालिकाना शिवेंद्र सिंह के हाँथ में है. कहां पर क्या बुवाई करना है, व्यवस्था कैसे देखने है यह कार्य शिवेंद्र सिंह करते हैं बांकी सहयोगी के तौर पर उनके अन्य बड़े भाई वीरेंद्र सिंह और देवेंद्र सिंह भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.

  कर्ता अर्थात लीज में की जाने वाली खेती -

---------------------------------------

  किसान शिवेंद्र सिंह द्वारा जानकारी दी गई की उनके पिता के नाम कुल 14 एकड़ के रकबे के अतिरिक्त भी उन्होंने रवी वर्ष 2018 में कुछ जमीन कर्ता अर्थात छमाही लीज के तौर पर ली थी. जब किसी किसान के पास पर्याप्त जमीन न हो और उसे खेती-किसानी का शौक हो तो वह ग्रामीण क्षेत्रों की प्रथा अनुरूप किसी सक्षम जमीदार से आवश्यकतानुरूप जमीन लीज अर्थात कर्ता के तौर ले सकता है. इस प्रकार लीज में ली जाने वाली जमीन की हर स्थान पर अपनी अलग अलग कीमत हुआ करती है. जहां जैसी जमीन की गुणवत्ता और पैदावार हो उस हिसाब से लीज में ली जाने वाली जमीन की कीमत किसान तय करते हैं. यहां पर बडियोर निवासी दिनेश सिंग से 15 एकड़ कर्ता अर्थात लीज में ली गई इस जमीन के लिए किसान शिवेंद्र सिंह ने 18 हज़ार रुपये की रकम दिनेश सिंह को दिया.

कर्ता अर्थात लीज और अधिया की जमीन में खेती नुकसानी पर मुआबजा भरपाई नही

--------------------------------------------

  अमूमन देखा जाए तो किसान के पास यह हक होता है की उसकी पट्टे की जमीन पर की गयी खेती पर यदि प्राकृतिक आपदा की वजह से नुकसानी होती है तो पट्टेदार को सरकारें भरपाई करती हैं. उनके लिए मुआबजा वितरण होता है, साथ ही पीएम फसल बीमा योजना के अंतर्गत बीमा का भी कुछ लाभ मिल जाता है. परंतु कर्ता अर्थात लीज में ली जाने वाली और अधिया में की जाने वाली खेती में आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई लिखित प्रमाण नही होता. यदि पट्टेदार किसान जिसकी जमीन को लीज अर्थात कर्ता अथवा अधिया में लिया गया है प्राप्त हुए मुआबजे की रकम को नैतिक तौर पर कर्ता या अधिया लिए हुए किसान को दे दे तो ठीक है वरना अधिया लिए हुए किसान के पास कोई लिखित प्रमाण नही होता की वह प्राकृतिक आपदा की स्थिति में प्राप्त मुआबजा अथवा फसल बीमा की राशि के लिए कोई भी क्लेम कर सके. यह इस लीज सिस्टम और अधिया सिस्टम की बहुत बड़ी कमी है. जिससे ऐसे किसानों के लिए हमेशा ही खतरा बना रहता है की यदि कहीं सूखा, बाढ़, अकाल, ओला, पाला, अथवा अन्य किसी भी प्रकार की प्राकृतिक विपदा आ जाए तो अधिया और कर्ता के किसान की पूरी पूंजी डूबना तय बात है. आज नैतिक तौर अच्छे जमीदार बहुत ही विरले हैं जो मुआबजे और बीमा की राशि को अधिया या कर्ता के किसान को दे दें.

शिवेन्द्र सिंह द्वारा 15 एकड़ की अतिरिक्त कर्ता जमीन पर किसानी उद्यमिता का उदाहरण

---------------------------------------------

   बड़ोखर निवासी शिवेंद्र सिंह द्वारा अपने पैतृक जमीन 14 एकड़ के अतिरिक्त बडियोर निवासी दिनेश सिंह से 15 एकड़ जमीन कर्ता अर्थात लीज में लेकर किसानी करना हिम्मत और उद्यमिता का एक सुंदर उदाहरण है. आज जब किसान वर्ग स्वयं की जमीन पर भी किसानी नही कर पा रहा ऐसे में किसी अन्य जमीदार की जमीन लीज पर लेकर सूखा अकाल की स्थिति में इतना बड़ा जुआ खेलना बहादुर किसानों के उदाहरण है. क्या होता यदि मौसम साथ नही देता? क्या होता यदि कहीं ओला पड़ जाता? क्या होता यदि कहीं अतिवृष्टि हो जाती? क्या किसान शिवेंद्र सिंह को दिनेश सिंह द्वारा सरकार से प्राप्त मुआबजा अथवा फसल बीमा की राशि दे दी जाती? यह सब प्रश्न हर एक ऐसा किसान अपनी किसानी प्रारम्भ करने के पहले जरूर अपने आप से पूछता है.

आईये अब नीचे देखते हैं किसान शिवेंद्र सिंह और उनके अन्य दो भाईयों द्वारा खरीफ वर्ष 2017-18 और रवी वर्ष 2018 में उनकी पैतृक भूमि और कर्ता की भूमि पर की गई खेती के क्या नफा नुकसान हैं.

--------------------------------------

किसान का नाम - शिवेंद्र सिंह परिहार पिता सुरसरी सिंह परिहार निवासी ग्राम बड़ोखर, थाना गढ़, ज़िला रीवा मप्र.

खरीफ वर्ष 2017-18 की खेती का व्योरा -

कुल जमीन का रकबा - 14 एकड़, जिसमे परती छोड़ा गया 7 एकड़,

धान की बुवाई - 4 एकड़,

जुताई - 8000 रुपये,

हाइब्रिड धान बीज - 6000 रुपये,

खाद - सहकारी समिति हिनौती से ली गई 11000 रुपये,

धान रोपाई की लागत - 8500 रुपये,

कीटनाशक का खर्च - 2000 रुपये,

निराई - 4000 रुपये,

कटाई - 9500 रुपये,

गहाई - 12000 रुपये थ्रॉशेरिंग,

खरीदी केंद्र में धान पहुचाने का खर्चा - 800 रुपये,

मोटर पंप का कनेक्शन 3 एच पी - 2400 रुपये,

मोटर पंप दो बार जलने पर मरम्मत खर्च - 4300 रुपये,

उड़द बुवाई का रकबा - डेढ़ एकड़,

अरहर अर्थात तुअर की बुवाई का रकबा - एक एकड़,

मूग की बुवाई का रकबा - आधा एकड़,

देशी उडद मूग और अरहर के बीज का खर्च - 550 रुपये,

छिटुआ उडद मूग एवं अरहर का तीन एकड़ जुताई एवं बुवाई का खर्च - 2000 रुपये,

तीनों फसलों की कटाई का खर्च - 3500 रुपये,

तीनों फसलों की गहाई मिजाई का खर्च - 200 रुपये प्रति मजदूर के हिसाब से 15 मजदूरों का एक दिन का कुल खर्च 3000 रुपये,

नोट - खाद, कीटनाशक और पानी उपरोक्तानुसार.

खरीफ वर्ष 2017-18 की कुल उपज की कीमत -

4 एकड़ में बोई गई धान की उपज = 55 क्विंटल = रुपये में 55 गुणा 1550 रुपये = 85250 रुपये,

3 एकड़ रकबा में उडद मूग और अरहर की कुल उपज = 2 क्विंटल अरहर, 1.25 क्विंटल उड़द, और 60 किलो मूग जिनका मार्किट रेट, अरहर = 2 गुणा 4000 रुपये = 8000 रुपये. उडद की कीमत = 1.25 गुणा 3000 रुपये = 3750 रुपये. मूग की कुल कीमत = 0.60 गुणा 3500 रुपये = 2100 रुपये.

वर्ष 2017-18 खरीफ की 7 एकड़ रकबे में धान अरहर मूग और उडद की कुल लागत = 77550 रुपये,

वर्ष 2017-18 खरीफ की 7 एकड़ में कुल बुवाई जिसमे 4 एकड़ में धान, और तीन एकड़ में अरहर मूग और उडद की खेती की गई में कुल उपज की कीमत = 85250 धन 8000 धन 3750 धन 2100 रुपये = 99100 रुपये.

तीनों किसानों की छमाही खरीफ की मूल आमदनी 21550 रुपये -

कुल आमदनी खरीफ वर्ष 2017-18 =  कुल उपज - कुल लागत = 99100 - 77550 = 21550 रुपये.

किसान शिवेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह तीनों लोग पूरे 6 माह मिलकर यह किसानी करते हैं अतः मजदूर के तौर पर भी देखा जाए तो कम से कम 200 प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति की मजदूरी के हिसाब से तीन लोगों की 6 माह की मजदूरी 1 लाख और 8 हज़ार बनती है. इस प्रकार देखा जाए तो इस किसानी में भारी घाटा हुआ.

रवी वर्ष 2018 गेहूं और अन्य फसलों की खेती का व्योरा -

कुल बुवाई का रकबा - 14 एकड़

कर्ता की बुवाई का रकबा - 15 एकड़,

राई की बुवाई का रकबा - 5 एकड़,

गेहूं की बुवाई का रकबा - 7 एकड़,

चना की बुवाई का रकबा - आधा एकड़, जौ की बुवाई का रकबा - आधा एकड़, मसूर की बुवाई का रकबा - 1 एकड़,

कर्ता की 15 एकड़ के रकबे में राई की बुवाई की गई जिसे हिबोती-बडियोर निवासी डॉक्टर दिनेश सिंह से 18000 रुपये में कर्ता में अर्थात जमीन का एक सीजन का पैसा देकर छमाही बुवाई के लिए जमीन लीज पर ली गई.

कुल 29 एकड़ की जुताई का खर्च = 65000 रुपये,

बुवाई का कुल 29 एकड़ का खर्च = 18000 हज़ार रुपये,

सहकारी समिति हिनौती से ली गई खाद का खर्च = 15000 रुपये,

29 एकड़ रकबे में बोई गई सभी फसलों के कुल बीज का खर्च = 18000 रुपये,

कीटनाशक का खर्च = 2000 रुपये,

मोटर पंप 3 एच पी का 6 माह का बिजली बिल = 2400 रुपये,

एक बार मोटर पंप जलने के कारण बनवाई का खर्च - 1800 रुपये,

29 एकड़ की बोई फसलों के कटाई का कुल खर्च = 25000 रुपये,

29 एकड़ में बोई गई फसलों की कुल गहाई का खर्च = 18000 रुपये,

रवी फसल वर्ष 2018 की 29 एकड़ रकबे में बोई फसल की कुल उपज -

गेहूं की कुल उपज =  60 क्विंटल = 60 गुणा 1735 रुपये = 104100 रुपये,

राई की कुल उपज = 48 क्विंटल = 48 गुणा 4000 रुपये = 192000 रुपये,

चना की कुल उपज = 3 क्विंटल = 3 गुणा 4400 रुपये = 13200 रुपये,

मसूर की कुल उपज = 90 किलो मात्र = 0.90 गुणा 4200 रुपये = 3780 रुपये,

जौ की कुल उपज = 1.5 क्विंटल = 1.5 गुणा 2000 रुपया = 3000 रुपया,

अर्थात रवी वर्ष 2018 की कुल उपज की कीमत = 104100 धन 192000 धन 13200 धन 3780 धन 3000 = 316080 रुपए,

रवी वर्ष 2018 की कुल लागत = 165200 रुपये,

तीनों किसानों की रवी की मूल आमदनी 150880 रुपये -

29 एकड़ की रवी फसल की कुल आमदनी = कुल उत्पादन - कुल लागत = 316080 - 165200 = 150880 रुपये,

रवी वर्ष 2018 में भी तीनो काश्तकारों शिवेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह एवं वीरेंद्र सिंह ने समूहिक रूप से 6 माह निरंतर खेतों में मेहनत किया अर्थात 200 रुपये कम से कम प्रतिव्यक्ति की मजदूरी प्रतिदिन की जोड़ने पर 6 माह की कुल मजदूरी 1 लाख 8 हज़ार रुपये बनता है. इस प्रकार 150880 रुपये में 108000 घटाने पर 42880 रुपये की रवी छमाही की आमदनी बनती है.  

अन्य खेती के मुकाबले देशी सरसों की उपज से बनाना चाहा राई का पहाड़

------------------------------------------------

 उपरोक्त विश्लेषण से जानकारी मिलती है की किसान शिवेंद्र सिंह और उनके अन्य दो भाईयों द्वारा हाड़ पिघलाने वाली मेहनत और सही फसल सेलेक्ट करने का परिणाम है की जहां दूसरे किसान हिम्मत हारकर किसानी बन्द कर दिए वहीं शिवेंद्र सिंह और उनके भाइयों ने पत्थर पर सोना उगाने का प्रयास किया. यदि शिवेंद्र सिंह ग्रामीण अंचल में परंपरागत रूप से की जाने वाली रवी गेहूं की फसल की खेती करते तो घाटे में रहते क्योंकि जहां पहाड़ी क्षेत्रों में मवेशियों और जंगली जानवरों का खतरा बराबर बना रहता है वहीं गेहूं की फसल का ज्यादा खयाल भी रखना पड़ता है. जबकि देशी राई अर्थात सरसौं की खेती सही समय पर किये जाने से यह लाभ हुआ की फाल्गुन और चैत्र तक इसकी कटाई हो गई और ओला से बचाव हो गया. यद्यपि शौभाग्य से इस वर्ष इस क्षेत्र में ओला का प्रकोप नही रहा. राई की खेती की नुकसानी भी कम हुई क्योंकि रोझ और नीलगाय आदि जंगली और आथ ही देशी पशु राई को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुचाते हैं.

 29 एकड़ में 6 माह की तीन किसानों की मेहनत की कुल आमदनी 150880 रुपया कुछ खास नही

-------------------------------------------------

   यदि देखा जाय तो पूरे 6 माह तक तीन किसान भाईयों शिवेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह और देवेंद्र सिंह की अथक मेहनत से रवी वर्ष 2018 में मूलतः राई की खेती से प्राप्त आमदनी 150880 रुपया कोई विशेष नही है. क्योंकि इसमे अभी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 200 रुपये के हिसाब से 6 माह की न्यूनतम मजदूरी रुपये 108000 रुपया तो जोड़ी ही नही गई. मानकर चलें की यदि यही तीनो किसान भाई शहर निकल गए होते और किसी ग्रोसरी स्टोर में नौकरी करते या कहीं चौकीदारी भी करते तो कम से कम 8 से 10 हज़ार महीने की कमाई करते जिसमे यदि आधा इनका खर्चा निकाल दिया जाए तो भी 5 हज़ार तक प्रतिमाह गिरी हुई हालात में भी बच जाते हैं. यदि थोड़ी ज्यादा समझदारी हुई और कोई अच्छा कार्य मिल गया तो निश्चित तौर पर आमदनी बढ़ जाती है. इस प्रकार स्वयं के खर्च को निकालकर तीनो किसान कम से कम 90 हज़ार से 1 लाख तक 6 माह में बचा सकते थे जिसमे अपने घर परिवार के लिए कपड़े, भोजन और बच्चों के स्वास्थ्य और स्कूली फीस की व्यवस्था बनाकर बढ़िया शांतिपूर्ण जीवन जी सकते थे. खेती किसानी में तो इतनी मेहनत पड़ती है की न तो नहाने की फुरसत और न ही खाने की होती है. हां किसानी में एक ही चीज का फायदा रहता है की व्यक्ति पूरे समय अपने घर परिवार के बीच में बना रहता है जबकि शहरों में पलायन कर नौकरी करने से यह लाभ नही मिल पाता जिससे मानसिक उद्विग्नता बनी रहती है.

किसान सुरसरी सिंह के परिवार की स्थिति

-------------------------------------------

  किसान सुरसरी सिंह के पांच पुत्रों में एक नौकरी पेशा होने के अलावा शेष चार घर में हैं जिनमे से चार शादीसुदा हैं जबकि सबसे छोटे शिवेंद्र सिंह की अभी शादी नही हुई है. पूरे संयुक्त परिवार में कुल 20 सदस्य हैं जिनका जीवन यापन भोजन कपड़ा सब कुछ इसी खेती किसानी पर आधारित है. इनके परिवार में नौकरीपेशा पुत्र जितेंद्र सिंह का योगदान काफी महत्वपूर्ण है. आज जब किसान को अपनी जमीन पर ही खेती किसानी करने के लिए समय पर जरूरी खाद बीज और नगद नही मिल पा रहा है तो भला अधिया और कर्ता के लिए लिए जाने वाले रिस्क के लिए व्यवस्था कौन भगवान करेगा? किसान शिवेंद्र सिंह दवारा बताया गया की उनके बड़े भाई जितेंद्र सिंह द्वारा खेती किसानी में पूंजी लॉगत संबंधी खर्च के लिए पूरा सहयोग मिलता है. क्योंकि यदि लॉगत पूंजी नही हुई तो उत्पाद कहां से होगा, पहले तो लगाने के लिए पूंजी चाहिए. ज्यादातर छोटे और मझले तबके के किसानों के साथ यह भी एक बड़ी समस्या रहती है की समय पर खाद बीज जुताई बुवाई के लिए नगदी और पूंजी की व्यवस्था न बन पाने के कारण उनकी सारी सोच और प्लान धरे के धरे राह जाते हैं. वही लोग हिम्मत बना सकते हैं जिन्होंने पहले से पूंजी की व्यवस्था कर रखी है अथवा जिनके घरों में कोई नौकरीपेशा व्यक्ति है जो बाहर से मदद करता है. वैसे आजकल बैंकों और सहकारी समितियों से भी किसान क्रेडिट कार्ड आदि व्यवस्था के माध्यम से खाद बीज आउर कर्ज़ मिलता है परंतु कई किसानों मौसम की मार के कारण डिफाल्टर हो जाते हैं और कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में उनका भविष्य की पूरी किसानी शाख खराब होने के कारण बाधित हो जाती है. इस बात को समझने वाला कोई सरकार नही है. यद्यपि चुनावी वर्ष कहें या जो भी परंतु अभी पिछले छमाही में मप्र सरकार ने इस विषय पर गौर किया है और ऐसे कालातीत किसानों के लिए ऋण अदायगी की व्यजमाफी के साथ 50 प्रतिशत अदायगी करने पर पुनः शाख बरकरार रहने वाली जो व्यवस्था की है वह काफी हद तक राहत देने वाली है.

अंततः परंपरागत खेती किसानी बन रहा अंतिम विकल्प

--------------------------------------------

   इस प्रकार देखा जा सकता है की यदि औषधीय अथवा फल सब्जी की खेती को फिलहाल यदि अलग रखा जाए तो परंपरागत अनाजों  की जाने वाली खेती से 30 एकड़ तक के किसान परिवारों को कोई विशेष लाभ समझ नही आ रहा है.

   सरकार किसानी की लाभ का धंधा बनाने की बात तो कर रही है पर यह ग्रामीण परिवेश की समस्याओं का सही मूल्यांकन किये बगैर भोपाल और दिल्ली में बैठकर यह कार्य कैसे करेगी बिल्कुल स्पष्ट नही है. सबसे पहले तो किसान की लॉगत और मेहनत पर ध्यान दिया जाना चाहिए. लॉगत और मेहनत यदि ज्यादा है तो फसल की कीमत भी उसी हिसाब से तय होनी चाहिए. आज फसल की जो न्यूनतम कीमत रखी गई है वह लॉगत से काफी कम है. वर्तमान में फसल की कीमत जब तक दुगुनी नही होती तब तक किसान के लिए कुछ भी अच्छा नही हो सकता. विचारणीय है की पिछले कई दशकों में कर्मचारियों के लिए कई वेतन भत्ते बढ़े, टी ए डी ए बढ़े, शहरी जिंदगी के स्टैण्डर्ड बढ़े, सभी वस्तुओं में आसमान छूती महंगाई बढ़ी लेकिन किसान की फसल का क्या हुआ. औसत तौर पर देखा जाए तो जहां अन्य क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी दस गुना बढ़ी है वहीं किसान की फसल की कीमत और उसकी जिंदगी का स्तर दुगुना तक नही हुआ है. ऐसे में भला कौन व्यक्ति किसानी को धंधे के तौर पर अपनाना चाहेगा. हर किसान और मजदूर के लिए सबसे पहला विकल्प तो यही होगा की उसके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और वह भी शहर जाकर अच्छी नौकरी प्राप्त करें. यदि सरकारी नौकरी नही भी मिले तो कम सेके कम किसी प्राइवेट सेक्टर में कोई मजदूरी और नौकरी मिल जाय तो वह भी इस परंपरागत किसानी से ज्यादा बेहतर होगा.

आज वही किसानी कर रहे हैं जिनके घरों में बाहर से आमदनी का कोई स्रोत अर्थात कोई बैकअप है

-----------------------------------------------

  आज ग्राम क्षेत्रों में वही किसान खेती कर रहे हैं जिनके परिजन बाहर शहरों में अच्छी नौकरी कर रहे हैं अथवा कोई सरकारी नौकरीपेशा है. क्योंकि बिना बाहरी आमदनी के पूंजी न हो पाने के कारण खेती में लागत लगाना असंभव है. हां ऐसे किसान जिनके पास कोई अन्य रास्ता नही है वह मजबूरी के तौर पर पेट भरने के लिए भूमि में दाना गाड़ने का काम जरूर कर रहे हैं. क्योंकि इसके अतिरिक्त वह कुछ कर भी नही सकते, या की आत्महत्या करें अथवा मजदूरी के लिए पलायन.

संलग्न - मप्र के रीवा ज़िला अंतर्गत थाना गढ़ क्षेत्र में किसान परिवार सुरसरी सिंह और उनके पुत्र शिवेंद्र सिंह आदि की फ़ोटो यहां पर संलग्न है.

--------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र,

 मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Friday, May 11, 2018

दास्ताँ-ए-किसानी - दसरथ केवट की ढाई एकड़ की किसानी है घाटे का सौदा (मामला ज़िले एवं प्रदेश के छोटे और मझले तबके के किसानों का जिनके लिए किसानी करना किसी मजबूरी से कम नही, लॉगत ज्यादा और उपज कम तो कैसे होगा किसानों का कल्याण, पीएम फसल बीमा योजना कमियों से सनी हुई नही कर सकती किसान का कल्याण)

दिनाँक 12 मई 2018, स्थान - रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानंद द्विवेदी)

   इस वर्ष पूरे प्रदेश और देश में सूखे अकाल के कारण किसानों की फसलें एकबार पुनः तबाह हो चुकी हैं। किसान पुनः कर्ज़ के बोझ तले दब चुका है और अब उसके परिवार को चलाने के जद्दोजहद प्रारम्भ हो चुकी है। लगभग हर छोटे और मझले तबके के किसान की लागत उपज से कहीं ज्यादा है, ऐसे में किसानों की स्थिति पर प्रकाश डालता है यह लेख विशेष तौर पर ध्यान देने योग्य है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा मात्र किसानों का प्रीमियम ऐंठने का तरीका, जब तक इसकी कमी दूर नही की जाती तब तक पीएम फसल बीमा किसानों के साथ अन्याय

        कहने को तो समितियों और बैंकों से ऋण लेने के साथ ही सभी किसानों की फसल बीमा अनिवार्य तौर पर अपने आप ही कर दी जाती है लेकिन इन फसल बीमा का कोई लाभ इन किसानों को नही मिल पा रहा है। कारण यह है कि सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ही कमी है। फसल बीमा का कांसेप्ट ऐसा है कि इसमें किसान द्वारा हज़ारों रुपये प्रीमियम देने के वावजूद भी किसानों को बहुत विशेष नुकसान पर ही फसल बीमा का लाभ मिल पाता है। यदि कोई भीषण प्राकृतिक आपदा आ जाये जिसमे बाढ़, ओले, पाला और पत्थर पड़ जाएं अथवा भीषण सूखा हो जिसमे जल स्रोत ही न बचें तो थोड़ा बहुत फसल बीमा का लाभ मिलता है लेकिन उन स्थितियों में जबकि किसान सूखा की स्थिति में खरीदकर फसल में दिन रात पानी लगाए, अपने खून पसीने से सींचे और तब भी यदि उसका उत्पादन लागत से कम हो अथवा बराबर हो तो इन स्थितियों में किसानों को फसल बीमा का कोई लाभ नही मिलता। 

      मसलन इस वर्ष रवी 2018 की स्थिति को ही देख लिया जाए तो यदि आधार के तौर पर प्रदेश का एक जिला रीवा मूल्यांकन के लिए लिया जाए तो पाते हैं कि इस वर्ष रवी गेहूं के सीजन में कोई भी बारिस नही हुई। जिन किसानों के पास परंपरागत तालाब पोखर अथवा ट्यूबवेल वगैरह थे तो किसी कदर 4 से 5 तक पानी की सिचाई की गई। जिन किसानों के पास अपना कोई व्यक्तिगत जलस्रोत नही था उन्होंने दूसरे किसानों से पानी पैसे में खरीदकर सिचाई की। कहने को तो खेतों में काफी हरियाली दिखी और लगा कि किसान की मेहनत रंग लाएगी और काफी कुछ गेहूं का उत्पादन होगा परंतु स्थिति बिल्कुल इसके उलट थी। खेतों में तो हरियाली जरूर दिखी क्योंकि किसानों ने किसी कदर खेतों की सिंचाई की परंतु जब पककर फसल काटने की बात आई तो प्राकृतिक तौर पर ऊपर आसमान से बरसने वाले पानी की तुलना में सिचाई के पानी से प्राप्त फसल के दानों में शक्ति नही दिखी। जिन खेतों में प्रति एकड़ के हिसाब से 15 से 20 क्विंटल तक गेहूं हो सकता था वहां पर बहुत मुश्किल से 5 से 8 क्विंटल अधिकतम हुआ। ऐसे में इतनी मेहनत के बाद यदि आधा से कम उत्पादन हो रहा है तो किसानों को फसल बीमा का लाभ क्यों नही दिया जा रहा है? पीएम फसल बीमा में जब तक इन कमियों को दूर नही किया जाता तब तक वर्तमान फसल बीमा का कोई औचित्य नही होगा। फसल बीमा में किसान की कुल लागत, किसान की दिन रात की मेहनत, और उस सीजन विशेष में मानसून की स्थिति, बारिस आदि को ध्यान में रखकर फसल बीमा का लाभ किसानों को दिया जाना चाहिए। जैसे इस वर्ष भले ही किसानों ने कड़ी मेहनत करके थोड़ा बहुत उत्पादन कर लिया हो पर उन्हें फसल बीमा का लाभ अवश्य मिलना चाहिए था पर ऐसा नही हुआ। यही इस फसल बीमा की बहुत बड़ी कमी है। एक तो उत्पादन कुछ नही हुआ ऊपर से फसल बीमा का फालतू में किसानों से लिया जाने वाला प्रीमियम किसानों पर एक तरह का अत्याचार है।

अध्ययन में लेते हैं छोटे तबके के किसान दसरथ केवट को

           किसान दसरथ केवट पिता गणेश केवट निवासी ग्राम कैथा, थाना गढ़, ज़िला रीवा मप्र

-----------------

दसरथ की खरीफ वर्ष 2017-18 धान की खेती का व्योरा -

कुल किसानी ढाई एकड़-

धान बीज 4 बोरी 800 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से 3200 रुपये,

जुताई - 7000 रुपये,

खाद (समिति से) - 3 बोरी यूरिया 900 रुपये, और 2 बोरी डी ए पी 2200 रुपये,

कीटनाशक - 1400 रुपये,

सिचाई - 5000 रुपये,

कटाई - 7000 रुपये.

गहाई - 4 घंटे ट्रेक्टर थ्रॉशेरिंग 700 रुपये घंटे के हिसाब से 2800 रुपये,

खरीदी केंद्र में ट्रेक्टर से धान पहुचाने का चार्ज = 1000 रुपया

कुल लॉगत धान = 30500 रुपये.

कुल धान की उपज = 30 क्विंटल = 30 गुणा 1550 = 46500 रुपये.

कुल आमदनी खरीफ धान = कुल उपज धान - कुल लॉगत धान = 46500 - 30500 = 16000 रुपये.

6 महीने रवी सीजन की मूल आमदनी 16000 रुपये जबकि दो व्यक्तियों की 400 रुपये रोज़ के हिसाब से 72000 रुपये जोड़ दिया जाए तो आमदनी निगेटिव में र्थात घाटा आता है।

वर्ष 2018 रवी गेहूं की फसल -

कुल बुबाई का रकबा = ढाई एकड़,

जुताई = 7000 रुपये,

कुल बीज खर्च =  3300 रुपये,

खाद =  3 बोरी डी ए पी 3300 रुपये, 2 बोरी यूरिया 600 रुपये = 3900 रुपये

सिचाई तीन पानी = 8000 रुपये,

कटाई = 12000 रुपये,

गहाई =  1100 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से 4 घंटा = 4400 रुपये।

कुल लागत रवी वर्ष 2017-18 = 38600 रुपये,

कुल उपज गेहूं रवी 2017-18 = 15 क्विंटल = 15 गुणा 1735 = 26025 रुपये।

कुल आमदनी रवी वर्ष 2017-18 = कुल उपज गेहूं - कुल लागत गेहूं = 26025 - 38600 = -12575 रुपये का घाटा जबकि प्रति मजदूर 200 रूपाये के हिसाब से 2 व्यक्तियों का मजदूरी का चार्ज 72 हज़ार रुपये अलग से जपड दें तो घाटा कई गुना अधिक बढ़ जाता है।

किसान दसरथ केवट की पारिवारिक स्थिति -

        किसान दसरथ केवट के परिवार में पत्नी जुगुन्ती केवट हैं जिनके 3 पुत्र और दो पुत्रियां हैं। दोनो पुत्रियों सीता केवट एवं बेला केवट की शादी हो चुकी है। 3 पुत्रों के नाम क्रमशः अरुण केवट उम्र 26 वर्ष, शिव कुमार केवट उम्र 19 वर्ष, शिवभान केवट 16 वर्ष है। बड़ा पुत्र की शादी हुई है जिसके 2 लड़के और 1 लड़की है। पूरा परिवार साथ में ही रहता है। इस प्रकार कुल परिवार में 9 सदस्य हैं. सभी का गुजारा इसी खेती और मजदूरी से होता है। दसरथ केवट ने बताया की वह घर जोड़ने वाले मिस्त्री का भी काम काम कर लेते हैं जिसकी वजह से घर का खर्च चलाने में मदद मिलती है।

       बड़ा लड़का अरुण केवट कभी कभी मजदूरी के सिलसिले में बाहर जाता है। दोनो बड़े लड़के अरुण केवट और शिवकुमार केवट मात्र 9 वीं पास हैं 10 वीं में फैल हो जाने के कारण बीच में ही पढ़ाई छोंड़ दिए। सबसे छोटा लड़का शिवभान केवट 8 वीं कक्षा में अध्ययन कर रहा है।

 ऐसे किसान परिवारों का क्या है भविष्य?

      इस प्रकार के छोटे और मझले तबके के किसानों का कोई भविष्य नही है. इनके पूर्वजों के इन्हें मजदूरी और आर्थिक सामाजिक पराधीनता विरासत में मिलती चली आ रही है.

    गरीबी, अशिक्षा, और लाचारी इन्हें विरासत में मिलती चली जाती है. जब दसरथ केवट से पूछा गया की उनकी शिक्षा कितनी हुई तो बताया की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही नही मिला. बड़े भाई मोतीलाल केवट की मृत्यु कर बाद बचपन में ही मां बाप मजदूरी और खेती किसानी में लगा दिए तो बस उसी में लगे हुए हैं. इनके पुत्रों ने भी यही बात कही की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही नही मिला. घर के काम और पिता की मजदूरी में हाँथ बटाऐं की पढ़ाई लिखाई करें. कुछ ने 9 वीं तक प्रयास भी किया परंतु 10 वीं में फैल होने की वजह से हिम्मत हारकर रुचि खो दिया और पढ़ाई छोड़ दिया। बताया गया की गांव की सरकारी स्कूलें न के बराबर हैं जहां पढ़ने और न पढ़ने में कोई अंतर नही है. गांव में कोई पढ़ाई लिखाई नही होती और शहर की इंग्लिश माध्यम की स्कूलों में पढ़ने के लिए क्षमता और पैसे ही नही. 

छोटे किसानों को खेती किसानी छोड़ व्यापार करना भी नही आसान, बैंकों में विश्वशनीयता और शाख की है समस्याएं 

     इस प्रकार देखा जाए तो अशिक्षा, गरीबी, लाचारी और बेरोजगारी इन्हें विरासत में मिलती जाती है. पीढ़ी दर पीढ़ी इनको इनके जीवन स्तर में कोई विशेष सुधार नही हो पाता है. इनके लिए अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का एक ही तरीका बचता है जो व्यापार है. कम पढ़े लिखे अथवा अशिक्षित भी यदि खेती किसानी छोड़ व्यापार में उतर आएं तो इनके जीवन स्तर में सुधार हो सकता है. परंतु अच्छे व्यापार के लिए भी कई समस्याएं हैं जिनसे निजात मिल पाना मुश्किल है. चूंकि इन गरीबों के पास पूंजी का अभाव रहता है अतः किसी अच्छे व्यापार की दिशा में सोच पाना भी इनके लिए स्वप्न जैसा ही है. 

     बैंकिंग सेक्टर से कर्ज़ भी उन्ही लोगोँ को दिया जाता है जिनकी कुछ क्रेडिट होती है. क्रेडिट के अभाव में इन छोटे मजदूर किसानों को लोन मिलने में भी कठिनाई होती है. यद्यपि सरकार द्वारा दुनिया भर की योजनाएं मात्र कागजों पर दौड़ रही हैं जिनमे युवा स्वरोजगार, युवा उद्यमी आदि योजनाओं में लोन दिया जाने का प्रावधान है लेकिन यह कर्ज़ भी ऐसे लोगों को मिल पाता है जिनकी पहले से साख और पहचान होती है. गरीब मजदूर और किसानों की कहीं कोई पूँछ नही. ऐसे किसानों को बैंकों की सीढियां ही नही चढ़ने दिया जाता और पहले ही भगा दिया जाता है.

मायूसी और अवसाद में ग्रस्त किसान लगाते हैं मौत और नशे को गले

  इन परिस्थितियों में जबकि खेती-किसानी घाटे का सौदा और एक मजबूरी बन चुका है कोई भी विकल्प उपस्थित न होने पर छोटे और मझले तबके के किसान जिंदगी की जद्दोजहद से हार मान लेते हैं और मायूस होकर अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं. ऐसे में ज्यादातर नशे की गिरफ्त में भी आ जाते हैं जिससे उनकी समस्याएं कम होने की जगह बढ़ जाती हैं. नशे का सहारा लेने पर पारिवारिक और सामाजिक स्तर में और भी अधिक पतन हो जाता है. इससे रही सही आर्थिक स्थिति भी और अधिक डांवाडोल हो जाती है. किसान कर्ज़ में डूबता चला जाता है. और फिर अंत में आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाता है. 

मनोवैज्ञानिक तौर पर आत्महत्या निराशा की पराकाष्ठा है

     आज मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं की किसी भी व्यक्ति द्वारा आपने इस जीवन को नष्ट करने का निर्णय लेना निराशा की पराकष्ठा है. जब व्यक्ति को परिवार, समाज, देश, सरकार और ईश्वर सभी के विश्वास उठ जाता है और उसे लगता है की इस जीवन में अब कुछ भी शेष नही बचा है तब वह अंत में ऐसे घातक कदम उठाता है जिसमे वह अपने सुंदर जीवन को नष्ट करने पर मजबूर हो जाता है. यद्यपि आत्महत्या के पहले यदि मनोवैज्ञानिकों द्वारा सही तरीके से काउंसलिंग की जाए तो मरने वाले का जीवन तो किसी तरह बचाया जा सकता है.

संलग्न - मप्र के रीवा ज़िला अंतर्गत थाना गढ़ के कैथा ग्राम निवासी दसरथ केवट के परिवार के साथ फ़ोटो यहां पर संलग्न है. 

------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, 

मोबाइल - 7869992139, 9589152587,

Thursday, May 10, 2018

कैसे बन्द होगी किसानों की आत्महत्या - रीवा के किसान गोकुल केवट की डेढ़ एकड़ अधिया की खेती है दर्द-ए-दास्ताँ (मामला रीवा जिले के छोटे किसानों का जिनकी लॉगत है उपज से काफी ज्यादा)

दिनाँक 10 मई 2018, स्थान गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा-मप्र, शिवानंद द्विवेदी)

किसान का नाम - गोकुल केवट पिता छोटेलाल केवट निवासी ग्राम कैथा, थाना गढ़, रीवा मप्र

खरीफ वर्ष 2017 की खेती -

बुबाई डेढ़ एकड़- 24 कुरई में

12 कुरई अधिया, 12 कुरई स्वयं,

धान बीज - 900 रुपये,

यूरिया खाद - 2 बोरी 700 रुपये,

सुपर फोस्फेट - 400 रुपये,

जुताई - 21 सौ रुपये, तीन घंटे का,

निराई - 3000 रुपये,

सिचाई - 600 रुपये (स्वयं का मोटर पंप नही)

कटाई - 3000 रुपये,

गहाई - 2000 रुपये,

 कुल खर्च खरीफ वर्ष 2017 = 12 हज़ार 7 सौ रुपये।

कुल धान का उत्पाद -  12 कुरई स्वयं की बुबाई में - 8 क्विंटल , 12 कुरई अधिया का भी 8 क्विन्टल, अधिया से प्राप्त मात्र 4 क्विन्टल, अतः कुल कमाई 12 क्विन्टल के आसपास।

कुल धान की उपज वर्ष खरीफ 2017 = 12 गुणा 1550 = 18600 रुपये,

कुल कमाई धान खरीफ वर्ष 2017 = कुल धान उपज - कुल धान लॉगत = 18600 - 12700 = 5900 रुपये छमाही आमदनी. (जबकि 2 व्यक्ति 6 माह लगातार काम किये जिनका 200 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से 400 रुपये प्रतिदिन का 72 हज़ार रुपये 6 माह की मजदूरी अलग से जोड़ा जाए तो कहलायेगा भारी घाटा)

गोकुल केवट को खरीफ वर्ष 2017-18 में कितनी हुई आमदनी

      गोकुल केवट की 6 माह डेढ़ एकड़ की अधिया की खेती में झक मराने से कुल 5900 रुपये की धान अर्जित किया जिसमें उनके दो सदस्यों की 400 रुपये रोज की कम से कम मजदूरी जोड़ दी जाय तो 72 हज़ार रुपये अलग से। अब ऐसे में यदि किसान खेती किसानी छोड़कर आत्महत्या न करें और पलायन न करें तो और क्या विकल्प बचता है।

रवी सीजन वर्ष 2017-18 

कुल बुबाई - 60 किलो गेहूं,

रकबा लगभग एक एकड़,

गेहूं बीज - 2000 रुपये,

जुताई - 3000 रुपये,

बुवाई - 2000 रुपये,

खाद - एक बोरी डी ए पी 1200 रुपये, यूरिया एक बोरी - 350 रुपये,

सिचाई - 2000 रुपये,

कटाई - 2000 रुपये,

गहाई - 1200 रुपये घंटे के हिसाब से 2 घंटे का 2400 रुपये,

कुल लॉगत रवी वर्ष 2017-18 =  14950 रुपये,

कुल उपज गेहूं रवी वर्ष 2017-18 = 8 क्विंटल 40 किलो, अधिया वाला 4 क्विंटल तो शेष आधा अर्थात 1 क्विंटल 80 किलो अधिया वाला।

अर्थात किसान गोकुल केवट की वर्ष 2017-18 में गेहूं की आमदनी मात्र 6 क्विंटल हुआ

कुल उपज रवी गेहूं वर्ष 2017-18= 1735 गुणा 6 = 10410 रुपये,

कुल आमदनी गेहूं सीजन = कुल उपज गेहूं - कुल लॉगत गेहूं = 10410 - 14950 = - 4540 रुपये का मूल घाटा हुआ जिसमे 6 माह की की दो व्यक्तियों की 400 रुपये प्रतिदिन मजदूरी के हिसाब से 72000 रुपये अलग से)।

गोकुल केवट की रवी वर्ष 2018 की कुल आमदनी

       

    जैसा कि उपरोक्त मूल्यांकन से जानकारी प्राप्त हुई गोकुल की छमाही रवी वर्ष 2018 की कुल आमदनी ऋणात्मक प्राप्त हुई है। कुल गेहूं की परंपरागत उपज 10410 रुपये की हुई जबकि लॉगत 14950 रुपये लगी अतः उपज से लॉगत को घटाने पर पाया कि 4540 रुपये का मूल घाटा हुआ जबकि परिवार के दो सदस्यों की 400 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 6 माह की कुल 72 हज़ार रुपये मजदूरी जोड़ दी जाय तो किसान के लिए आत्महत्या ही एकमात्र समाधान दिख रहा है क्योंकि किसान मजदूर के इस दर्द को कोई समझ नही पायेगा।

ऐसे किसानों की क्या है परिवार की आय का स्रोत ?

 गोकुल केवट के परिवार के आय का स्रोत मात्र खेती नही है क्योंकि खेती में तो उन्हें भारी घाटा है। मूलरूप से उनकी आय का स्रोत मजदूरी है। ज्यादातर केवट समूह के लोग जमीदारों के यहां अधिया की खेती करके अपना खर्च चलाते हैं अथवा शहरों में पलायन करके मजदूरी करते हैं। पुराने समय में जब जेसीबी और मसीनों का इतना अधिक उद्भव नही हुआ था तब ये लोग मिट्टी की खुदाई करके जीवन यापन करते थे। गोकुल केवट के दो लड़के हैं एक का नाम दिलीप केवट और दिनेश केवट है। इनके दो बेटियां थीं जिनमे एक का व्याह कर दिया है। बड़े बेटे दिलीप केवट की शादी होने के बाद दो बच्चे भी हैं। इस प्रकार इनका परिवार बढ़ रहा है और साथ ही खर्च भी। गोकुल केवट का एक पुत्र दिनेश केवट बाहर शहरों में रहकर प्राइवेट काम करके जीवन यापन कर रहा है जबकि दूसरा घर में ही रहकर परिवार का खेतई किसानी में हाथ बंटाता है।

क्या परंपरागत खेती-किसानी से संभव है जीवन यापन?

   इस प्रकार देखा जा सकता है की न तो पूरी जमीन में परंपरागत खेती से कुछ होता है और न ही अधिया की खेती से। अधिया की खेती तो और भी दर्द से भरी हुई है।

  अधिया की खेती में सबकुछ लगाने के बाद कुल उपज का आधा भाग जमीदार किसान को देने पड़ते हैं। ऐसे में न तो किसान को कुछ हाशिल हो पाता है और न ही अधिया की खेती करने वाले को। अधिया की खेती करने वाले माजदूरों का पारिवारिक स्तर बहुत ही नीचे रहता है। इनकी दुर्दशा तो उपरोक्त विश्लेषण से ही लगाया जा सकता है। जब इनकी मूल लॉगत तक नही मिल पा रही है तो बांकी क्या बात करना।

 अधिहर  खेतिहर माजदूरों के बच्चों का क्या है भविष्य? 

      सही मायनों में देखा जाए तो अधिया की खेती करने वाले किसानों के जीवन स्तर में कोई सुधार तो बहुत दूर की बात है इनका पारिवारिक और सामाजिक स्तर भी दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। क्योंकि यह मजदूर वर्ग के लोग सपरिवार खेती किसानी में लगे रहते हैं और साथ ही छोटे बच्चे और बच्चियों को भी उसी काम में लगाए रहते हैं इसलिए इनके बच्चे अच्छी शिक्षा क्या बेसिक शिक्षा तक नही प्राप्त कर पाते। अच्छी शिक्षा की कामना ग्रामीण अंचलों की सरकारी स्कूलों में करना तो दिवास्वप्न की तरह है। इस प्रकार देखा जाय तो छोटे किसानों और मजदूर वर्ग के लोगों के बच्चों को गरीबी, बीमारी, अशिक्षा विरासत के रूप में मिलता है। अशिक्षित और गरीब परिवार वर्तमान संस्कारविहीन और भ्रष्ट व्यवस्था में मात्र शोषण का ही शिकार हो सकता है जो प्रत्यक्ष रूप से दिख भी रहा है। जानकारी और जागरूकता के अभाव में यह लोग न तो अपने अधिकारों को जानते हैं और न ही अपने अधिकारों की लड़ाई नही लड़ सकते। इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी इनका जीवन स्तर गिरता हुआ ज्यादातर मजदूर वर्ग के लोग नशे की भी लत में पड़ जाते हैं। यद्यपि संस्कारों के प्रभाव के कारण गोकुल केवट का परिवार पूरी तरह से नशामुक्त और अच्छे संस्कारों वाला है.

  

   इस प्रकार देखा जाय तो अधिया की खेती में अनाज तो आधा ही हासिल हो पाता है परंतु दर्द पूरा सहना पड़ता है।

संलग्न - मप्र के  रीवा ज़िले अंतर्गत थाना गढ़ में कैथा ग्राम के गोकुल केवट और उसके परिवार के सदस्यों के साथ फोटोग्राफ।

----------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र

 मोबाइल - 7869992139, 9589152587

Friday, April 13, 2018

ज़िले में बेमौसम बारिश ने बढ़ा दी किसानों की मुश्किलें, गहाई हुई हफ्ते भर लेट, बाहर पड़ी सब कच्ची ईंटें पानी में बही

दिनांक 12 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा, मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   देश के उत्तरी क्षेत्र में कई दिनों से खराब चल रहा मौसम का कहर पिछली रात रीवा में भी बरपा. दिनांक 12 अप्रैल की रात को लगभग एक बजे के बाद से गरज लपक एवं तेज़ आँधी के साथ बूंदा बांदी प्रारम्भ हुई. देखते ही देखते पिछली रात किसानों के लिए दुःस्वप्न बन गई. शायद जब रात में लोग सोये होंगे तो इस बात का अंदाज़ा न लगा पाए होंगे की अर्धरात्रि से ही उनकी नीद उड़ने वाली है. 

    कैथा ग्राम के आसपास बसे हुए किसानों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया की बेमौसम बारिश ने उनकी फसल की नुकसानी तो की ही साथ ही ईंट के कच्चे लगे छल्लों को भी नुकसान पहुचाया. बता दें की आजकल ग्राम क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास की भरमार होने से काफी लोग पक्के मकान के लिए ईंट पारने का काम कर रहे हैं. इस बीच जिन ग्रामीणों ने ईंट की पराई पूरी करके भठ्ठे अभी नही लगाए हैं उनके लिए यह बेमौसम बारिश काफी नुकसानी के तौर पर देखी जा रही है. 

   कैथा ग्राम के अरुण केवट, दसरथ केवट, दिलीप केवट, गोकुल केवट, सोमधर मिश्रा, अरुणेंद्र पटेल एवं अन्य लोगों ने बताया की उनकी बाहर पड़ी कच्ची ईंट तेज़ बारिश की वजह से नष्ट हो गयी है और काफी नुकसानी उठानी पड़ी है. शिव शंकर द्विवेदी, सिद्धमुनि द्विवेदी, संतोष केवट, सतानंद केवट, रोहित मिश्रा, हरिबंश पटेल सहित दर्जनों किसानों ने बताया की उनकी बाहर पड़ी गेंहूँ की फसल पूरी तरह से प्रभावित हुई है. जिसमे अभी भी गहाई में काफी वक्त लगेगा क्योंकि फसल पूरी तरह से भींग चुकी है. जब तक फसल सूखेगी नही तब तक उसकी गहाई किया जाना संभव नही है. गांव के कई किसानों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया की तेज़ हवा और आँधी की वजह से भी उनकी खेतों में कटी पड़ी फसल उड़ गई है. जिन किसानों ने ज्यादा सावधानी नही बरती थी और फसल को बोझा बनाये बिना ही खेतों में जेंटा के रूप में छोंड़ दिया था ऐसे सभी किसानों की फसल पूरे खेत में इधर उधर फैली मिली और आधे से अधिक तो कहां उड़ गई इसका पता तक नही चल पाया. इस प्रकार सभी किसानों ने मांग भी की सरकार को इस ओर भी ध्यान देने चाहिए और इस प्रकार की प्राकृतिक आपदा की वजह के हुए नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए.

संलग्न - कैथा ग्राम और उसके आसपास स्थित किसानों की फसल की फ़ोटो, और साथ ही कुछ किसानों के ईंट के भठ्ठे और खराब हुई कच्ची ईंटें.

---------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587,

Monday, June 27, 2016

कैथा पंचायत गंगेव ब्लाक एवं उसके आसपास पचासों पंचायतों में सूखा अकाल में पानी की भारी समस्या - नहर का आभाव, प्रधानमंत्रीजी भारत सरकार के नाम खुला पत्र

हमारे भारत के प्रधानमंत्रीजी के नाम यह खुला पत्र जिसमे सूखे अकाल की स्थिति में पानी के लिए तरशते  जीवों के लिए एक नहर की अपील की गयी है. वैसे यह प्रपत्र/आवेदन मध्य प्रदेश शासन के जल संसाधन विभाग बल्लभ भवन मंत्रालय भोपाल में भी दे दिया गया है और साथ ही मध्य प्रदेश शासन की सी. एम. हेल्पलाइन में भी रखा गया है. इस पत्र को PMO के ऑनलाइन PG Portal सहित पेपर आवेदन के रूप में भी प्रधानमत्री कार्यालय नई दिल्ली भेजा गया है. नहर के निर्माण से जहाँ क्षेत्र में किसानो के लिए सिचाई की सुविधा होगी वहीँ पर समस्त जीव जंतुओं के लिए सूखे अकाल की स्थिति अथवा कम वृष्टि की स्थिति में पानी मिलेगा. जमीनी जलस्तर में सुधार भी होगा जिससे कूप, नल, हैंडपंप, से लेकर ट्यूबवेल में भी जलस्तर में सुधार होगा. कैथा पंचायत (गंगेव ब्लाक, रीवा) और उसके आसपास लगभग पचासों पंचायतों में नहर न होने से गरमी में और कम वृष्टि, सूखे की स्थिति में जीवों को भारी तकलीफ का सामना करना पड़ता है.


To,                                                                                        Date: 27/06/2016
The Prime Minister of India,                                            Place: Rewa (MP)
Govt. of India, New Delhi.  INDIA.

Subject :- Regarding irrigation canal in favor of poor and needy farmers of the region an irrigation canal need to be constructed as soon as possible to deal with the problems of drought in Halka Patwari - ITEHA 2 (Tehsil MANGAWAN), HINAUTI 39 (Tehsil SIRMAUR), JAMUI 31 (Tehsil TEOTHAR) and other nearby HALKA PATWARI of Rewa district of MP.

Sir/Madam,

I would like to bring into your kind notice a very severe problems of drought and falling underground water level of the villages and Halka Patwari in mentioned subject lines such as - ITEHA 2 (Tehsil MANGAWAN), HINAUTI 39 (Tehsil SIRMAUR), JAMUI 31 (Tehsil TEOTHAR) and other nearby HALKA PATWARI of Rewa district Madhya Pradesh.

In this last decade, due to the drought in two phase the underground water level have felt drastically and the farmers are suffering in their crop productivity. Also the level of the drinking water in handpumps also fell down quite deep and further due to this the many tube wells also have stopped functioning.

There are some water canal near the KEOTI area which passes between GANGEV and MANGAWAN of the REWA district but there are hundreds of the villages in centering the GARH Police station area where there is no canal and for that reason scarcity of the water in peak summer seasons and falling down of the underground level could be observed. Near gram panchayats – KAITHA, PANDUA, SEDAHA, LOTANI, MADARI, BANS, PANGADI, LAURI, GARH, KATARA, DARH, KANKAR, BHAUKHARI, HIROODEEH, KALWARI, TENDUA, and other nearby Panchayats in REWA district the problems of water level is seen quite  often in summer season. In year 2014-16 during this severe drought farmers are suffering too much. Their tube wells, handpumps, wells, ponds all dried out and they are suffering from the water scarcity.

Not only the people but also the animals, plants, and birds are even suffering due to the drought in this duration 2014-16 of drought in Madhya Pradesh.
Therefore in order to provide enough drinking and irrigation water to the farmers and people of the reason it is very important and URGENT NEED to set up as soon as possible an irrigation canal project in above mentioned region so that the general problems of irrigation and underground water level could be resolved.

PLEASE NOTE – This application is written by Shivanand Dwivedi (Social, Scientific, and RTI activists) in favor of public interest and to help them to get an irrigation canal in their region. Also is enclosed the signed copy of the extra pages with this application of the people of surrounding areas who want an irrigation canal to be constructed in their region.

-----------------
Sincerely
SHIVANAND DWIVEDI
(Social, Scientific, and RTI activist)
Village KAITHA, Post  AMILIYA,
Police Station GARH, Tehsil  MANGAWAN,
District REWA, Madhya Pradesh. PIN – 486117

Mob. +917869992139