Showing posts with label Farmers. Show all posts
Showing posts with label Farmers. Show all posts

Friday, June 29, 2018

विभाग में बीज तक नही और करेंगे किसान का कल्याण (मामला ज़िले के किसान कल्याण एवं कृषि विभाग का जहां पर खरीफ सीजन का बीज खाद नही पहुचा, जो पहुचा भी वह आधा अधूरा और उचित नही, हल्की धान का बीज नही, मात्र 140 दिन से अधिक वाली धान कावेरी-199 का है बीज उपलब्ध, अरहर उडद वगैरह का बीज गायब)

दिनांक 29 जून 2018, स्थान - गंगेव, रीवा-मप्र

(कैथा से, रीवा-मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   अभी हाल ही में 1 से 10 जून तक किसान आंदोलन हुआ जिसे गांव बंद बताया गया. कुछ जिलों को छोंड़कर गांव बन्द का विशेष प्रभाव सरकार को नही पड़ा. चिंता तो सरकार की तब बढ़ती जब अच्छा खासा गांव बन्द का प्रभाव पड़ता. लेकिन किसानों की एकजुटता की कमी और कमजोरी के चलते सरकार का पलड़ा भारी पड़ जाता है. सरकार उन्ही की सुनती है जिनसे उसे खतरा बना रहता है. सरकार गिरने का खतरा, लॉ एंड आर्डर का खतरा अथवा सरकार चला रही पार्टी के लिए वोट बैंक का खतरा. लेकिन 1 से 10 जून तक गांव बन्द में किसानों की एकजुटता न हो पाने से सरकार के आर्थिक ढांचे में कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा.

  किसानों की आत्महत्या में कोई अंतर नही

  पूरे प्रदेश या यूं कहें की सम्पूर्ण देश में जगह जगह गरीब और कमज़ोर किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. प्रतिदिन कोई न कोई घटना ऐसी घटित हो रही है जिंसमे किसान कर्ज़ के बोझ, शूखे की मार, अथवा अन्य कृषि संबंधी कारणों से मजबूर होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है.  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड के डेटा इस बात के पूरे गवाह हैं की किसानों की बदहाली में कोई विशेष अंतर नही दिख रहा है.

बोवनी आधी होने को आई पर कृषि विभाग में बीज नही

  आज पूरे प्रदेश में खरीफ फसल की बोवनी चल रही है आधा बोवनी का समय व्यतीत होने को है लेकिन ज़िले और प्रदेश के किसान कल्याण एवं कृषि विभाग में बीज ही नही है. कुछ बीज जरूर आये हैं परंतु वह पहले से ही कम से कम 15 दिन विलंब से हैं. मसलन गंगेव कृषि विभाग रीवा में अब तक जो बीज किसानों के लिए उपलब्ध बताया जा रहा है वह है सबसे ज्यादा समय लेने वाली धान कावेरी-199 का बीज. यही धान पिछले वर्ष भी गंगेव ब्लॉक में भेजी गयी थी और बताया गया था की यह प्रदर्शन वाली धान है जिसे कुछ विशेष ग्रामों में किसानों को देकर देखा जाता है की इसकी उपज कैसे होती है. पिछले वर्षों गंगेव ब्लॉक के कृषि विस्तार कार्यालयों के जिन ग्रामों में इस धान को बोया गया था वहां पर किसान ज्यादा खुश नही है. इसे पकने में साढ़े चार माह के आसपास का समय लगा था. पिछले वर्ष रीवा में आषाढ़ श्रावण में एक दो बार जमकर बारिश हो गई थी जिससे खेतों में भराव हो गया था इसके बाद बारिश चली गई और मात्र कुछ स्थानों पर धान के पकने के समय बारिश हुई. जिन जिन किसानों ने इस कावेरी धान को बोया था और जिनके पास स्वयं बोरवेल और पानी की व्यवस्था थी वह किसी तरह से रो गाकर धान पकाए लेकिन जिन किसानों के पास सिंचित भूमि नही थी उन्हें काफी दिक्कत हुई. या की उन्होंने अपने पडोस वाले किसान से पैसा में पानी खरीदकर इस धान को पकाया अथवा उनकी पूरी फसल पकने के बहुत पहले ही सूख गई. खैर कृषि विस्तार अधिकारियों ने तो यह भी जानकारी लेने का प्रयाश नही किया की बोई गई ध्यान का हुआ क्या? क्या धान पकी की नही पकी? यदि नही पकी तो इसके आधार पर कृषि विभाग को फीडबैक देना चाहिए की रीवा क्षेत्र में पानी के अभाव के कारण हल्की किश्म की धान जो 70 से 90 दिन में पकती है उसे बढ़ावा देना चाहिए न की ऐसी धान जिसके लिए क्षेत्र के वातावरण के विपरीत लगाया जाय. कावेरी जैसा की नाम ही बता रहा है की यह साउथ इंडियन टाइप की धान हैं जहां वर्ष में धान की 3 खेती की जा सकती है और जहां पानी का बहुतायत रहता है. लेकिन मप्र के रीवा जैसे संभाग में जहां अक्सर ही अल्प वृष्टि देखी जाती है और साथ ही बोरवेल भी सूख जाते हैं , कावेरी जैसी बजनी धानों को प्रमोट करने की क्या जरूरत है?

कावेरी धान को नही पसंद करते किसान

  रीवा ज़िले के गंगेव कृषि विभाग सहित अन्य कृषि विभागों में आने वाली कावेरी धान को किसान कम पसंद करते हैं. यद्यपि यह धान प्रदर्शन की होने के कारण फ्री ऑफ कॉस्ट उपलब्ध करवाई जाती है इसलिए किसान ले तो जाते हैं लेकिन फिर भी बोवनी के समय काफी चिन्तित रहते हैं की क्या पता इसकी पैदावार हो भी की न हो. हाँ आज अधिकतर किसानों के पास बोरवेल ट्यूबवेल है इसलिए पानी की ज्यादा दिक्कत न होने के कारण रिस्क ले लेते हैं. लेकिन ज्यादातर किसान अभी भी अधिक पैदावार देने वाली हल्की किश्म की धान जैसे आई आर 50 अथवा 64 या 1010 ही ज्यादा बोते हैं. 

कृषि कर्मचारियों की हड़ताल के कारण भारी समस्या

   पिछले महीने भर से कृषि विभाग के कर्मचारियों की हड़ताल ने भी किसानों की समस्याओं को काफी हद तक बढ़ा दिया है. बताया गया की बीज खाद का भंडारण समय पर न हो पाने के कारण वितरण भी लेट हो रहा है. किसानों द्वारा बताया गया की 15 जून तक कावेरी जैसे बजनी किश्म की 140 दिन के ऊपर का समय लेने वाली धानों का बीज डाल दिया जाना चाहिए नही तो समय पर पकने में दिक्कत होती है.

प्रदर्शन के अतिरिक्त कोई बीज नही 

   यदि किसान कृषि विभाग द्वारा लाया गया अच्छा और मानक बीज पैसे से भी लेना चाहे तो यहाँ प्रदर्शन वाले कावेरी बीज के अतिरिक्त अन्य कोई बीज उपलब्ध नही है. यह एक बहुत बड़ी बिडम्बना है. प्रदर्शन वाला कावेरी बीज भी बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है. बताया गया की जो भी उपलब्ध है वह कुछ गिने चुने किसानों को ही दिया जा सकता है. इस प्रकार देखा जाए तो जितनी बीज की मात्रा गोदाम में भंडारित दिखी है उससे पूरे गंगेव ब्लॉक के 88 ग्रामों के किसानों को लिया जाए तो मात्र एक ग्राम के एक या दो किसान को ही दिया जा सकता है.

जिनकी जितनी पहुच उनको उतना बीज

  गंगेव ब्लॉक में यह देखा गया की किसानों को बीज खाद और कीटनाशक वितरित करने का कोई नियम कायदा नही है. यहां सारा कार्य दबाब पद्धति से किया जाता है. मसलन जिसकी जितनी पहुच होती है उसे उतनी सामग्री मिलती है. यदि कोई आम किसान बिना किसी जान पहचान के पहुच जाए चाहे उसके पास 20 एकड़ की ही भूमि क्यों न हो उसे कुछ नही दिया जाएगा. उसे सीधे बताया जाता है की बीज अभी तक आया ही नही. लेकिन यदि वही किसान हो हल्ला मचाना प्रारम्भ कर दिया और ऊपर तक कंप्लेन करने लगे तो फिर उसे बीज दे दिया जाएगा.

कृषि कमर्चारी कहते हैं उनका कोई दोष नही

  गंगेव कृषि विभाग में पदस्थ एसएडीओ वीरेंद्र सिंह चौहान और अन्य ग्राम केवकों की दलील है की इसमे हमारा कोई दोष नही है. यह सीधे सरकार का मामला है. यदि सरकार और ऊपर विभाग हमारे पास कुछ भेजेंगे ही नही तो हम कैसे दे पाएँगे. कृषि कर्मचारियों ने यह भी बताया की ज्यादातर किसान हल्की किस्म की धान पसंद करते हैं लेकिन विभाग बार बार ऊपर से कावेरी ही भेज देता है.

कृषि विभाग में पारदर्शिता का अभाव एक बड़ी समस्या

  कृषि विभाग रीवा में पारदर्शिता की व्यापक समस्या है. जिसके कारण किसान पूरी तरह से अंधेरे में रहता है. किसान को इसकी कोई जानकारी नही रहती की कब बीज का भंडारण किया जा रहा है और कब वितरण. जब तक किसान स्वयं जाकर लड़ झगड़कर ब्लॉक आफिस में जानकारी न ले तब तक उसे किसी भी प्रकार की कोई जानकारी नही दी जाती.

आर टी आई की जानकारी तक छुपाने का प्रयाश

   और तो और अभी पिछले वर्षों कृषि विभाग गंगेव में कई आर टी आई दाखिल कर जानकारी प्राप्त करने का प्रयाश किया गया की किस ग्राम में कौन से आर ए ई ओ कार्यरत हैं कौन किसान मित्र हैं, खरीफ और रवी वाइज कौन कौन सी योजनाओं में क्या क्या बीज खाद कीटनाशक किन किन किसानों को वितरित किये गए. क्या क्या सामग्री सरकार द्वारा ब्लॉक कार्यालय में भेजी गई. कृषि विभाग द्वारा गांव गांव जाकर क्या क्या कार्यक्रम किये गए और इसके कितने खर्च आये. यह सब जानकारी कृषि विभाग गंगेव से चाही गई लेकिन कहीं कुछ जानकारी दिए गए समय सीमा में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को उपलब्ध नही करवाई गई. उल्टे कृषि विभाग त्योंथर के एसडीओ मनीष मिश्रा द्वारा और साथ ही ब्लॉक गंगेव के एसएडीओ द्वारा कहा गया की आर टी आई लगाने की क्या जरूरत है जब हम लोग आपको सब सामग्री उपलब्ध करवा देते हैं. 

मतलब आर टी आई को भूल जाईये, आपका काम होगा

    जिस प्रकार से गंगेव कृषि विभाग में निरंतर पारदर्शिता का अभाव बना हुआ है उससे स्पष्ट है की पूरे ज़िले के कृषि विभाग में मनमानी चलती रहेगी इसमे कोई अंतर नही आने वाला. जो कृषक और हितग्राही आर टी आई लगाएगा उसे पटाने का प्रयाश किया जाएगा और जिनको कुछ नही मिल रहा उन्हें कभी कुछ नही मिलेगा. 

ग्राम सेवक को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है

  यहां गंगेव ब्लॉक अंतर्गत आने वाले ज्यादातर किसानों को यह जानकारी ही नही है की उनके ग्राम सेवक और कृषि विस्तार अधिकारी कौन हैं कहां रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर कहाँ मिलेंगे. जब कभी किसी जरूरी कागजातों में हस्ताक्षर करवाने होते हैं तो ग्राम सेवक को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है.

गंगेव कृषि विभाग में सप्ताह में बड़े मुश्किल से एकबार आते हैं ग्राम सेवक

  यदि किसी किसान को ग्राम सेवकों की जरूरत है तो उसे ब्लॉक कृषि विभाग जाना पड़ेगा जहां सप्ताह में मात्र वृहस्पतिवार को मुलाकात हो सकती है. यद्यपि वृहस्पतिवार मीटिंग का दिन बताया गया है लेकिन इसकी कोई गारंटी नही रहती की कृषि विभाग में भी ग्राम सेवकों से मुलाकात हो ही जाए.

नही है अरहर उड़द का बीज 

  गंगेव ब्लॉक में अरहर और उड़द का बीज उपलब्ध नही है. जानकारी मिली की अरहर और उड़द का बीज इस वर्ष अभी आया ही नही जबकि नियमानुसार बोवनी का आधा समय व्यतीत हो चुका है. कई किसान अरहर उड़द का बीज लेने के लिए ब्लॉक आफिस गए लेकिन मायूस होकर खाली हाँथ लौट आये. 

गुरुवार 28 जून को गंगेव में हंगामे के बाद ही मिल पाया बीज 

  जहां तक सवाल गुरुवार दिनांक 28 जून 2018 को कृषि विभाग गंगेव में एकत्रित दर्जनों किसानों को बीज वितरण का है उसके बारे में बताना पड़ेगा की ग्राम पंचायत कैथा, हिनौती और पडुआ के एकत्रित दर्जनों किसानों को नियमानुसार सारे कागजातों को जमा करने के बाद भी बीज उपलब्ध नही करवाया जा रहा था, फालतू के नियम कायदे जिनका की पालन स्वयं कृषि विभाग भी नही कर रहा ऐसे नियम बताकर किसानों को परेशान किया जा रहा था. इस बीच सभी किसानों की अगुआई सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा किया जा रहा था. इस बीच देखा गया कि जहां आम किसानों को फालतू में बैठा कर रखा गया था वहीं रसूखदारों को दनादन गोदाम खोलकर बीज बांटा जा रहा था. कई रसूखदार स्वयं ही घुसकर दो बोरी चार बोरी हाइब्रिड धान की 30 किलो की बोरियां उठा उठाकर अपने गाड़ियों में भर भर कर ढो रहे थे. यह सब वाकया देखा नही गया और इसकी सूचना संबंधित उच्च धिकारियों को दिए जाने का विचार हुआ. इस बीच भोपाल डायरेक्टरेट स्थित कृषि विभाग में जानकारी दी गई और सारा वाकया बताया गया. डायरेक्टरेट से बताया गया की पहले रीवा डिप्टी डायरेक्टर और संभागीय कृषि अधिकारी से बात की जाए और यदि मामला नही सुलझता तो फिर भोपाल में कंप्लेंट भेजी जाए. भोपाल कार्यालय से ही प्राप्त रीवा के कृषि अधिकारियों के नंबर में जानकारी प्रेषित की गई और बहुत ही स्पष्ट शब्दों में डायरेक्टर कृषि को बताया गया की यहां गंगेव कृषि विभाग में भौशा चल रहा है और यदि समस्या का समाधान नही किया जाएगा तो उपस्थित किसान आंदोलन करेंगे और कृषि विभाग से हटेंगे नही. इस पर समस्या की गंभीरता को आंकते हुए डायरेक्टर कृषि ने गंगेव के एसएडीओ वीरेंद्र सिंह चौहान को तत्काल फ़ोन लगाकर किसानों की समस्या के समाधान के लिए कहा तब जाकर गंगेव कृषि विभाग के कर्मचारियों के होश ठिकाने आये और तत्काल बीज बांटना प्रारम्भ किया.

कुछ 2 दर्ज़न किसानों को दिए बीज 

  इस बीच उपस्थित  किसानों देवेंद्र सिंह पिता सुरसरी सिंह, पुष्पराज सिंह पिता सुमंत सिंह, सत्यभान पटेल, राम खेलावन पटेल पिता जग्गू पटेल, श्रवण कुमार पटेल, रवि सिंह पिता वीरेंद्र सिंह, राजेश पटेल पिता जगदीश पटेल, शैलेन्द्र पटेल पिता जगदीश पटेल, नरेंद्र पटेल पिता जगदीश पटेल, जगदीश पटेल पिता राम विशाल पटेल, सत्यनारायण सिंह पिता बंश बहादुर सिंह, राजनारायण सिंह पिता वंस बहादुर सिंह, अरुणेंद्र पटेल पिता हरीबन्स पटेल, शैलेन्द्र पटेल महारथी प्रसाद पटेल, लाल बहादुर पटेल पिता जमुना पटेल आदि को कुल 6 किलो प्रत्येक के हिसाब के दो दो पैकेट का बीज दिया गया. किसानों को बीज देते समय यह बताया गया की यह बीज दो एकड़ में लगाया जा सकता है और रोपा पद्धति से लगाया जाना चाहिए.

मात्र 6 किलो प्रत्येक किसान को दिया गया बीज है बहुत कम

   किसान कल्याण एवं कृषि विभाग द्वारा उक्त किसानों को वितरित 6 किलो प्रत्येक कावेरी धान का बीज बहुत कम है. यद्यपि यह बीज तो किसानों को मुफ्त में दिया गया है लेकिन किसानों को बोवनी के रकबे के हिसाब से काफी कम था. कुछ उपस्थित किसानों ने बताया की उनका रकबा 10 से लेकर 50 एकड़ तक का है अतः उन्हें चाहे पैसे में मिले लेकिन सब्सिडी वाला हल्की धान का बीज मिल जाता तो उनके लिए बेहतर होता.

सूरज धारा स्कीम का बीज हरिजन आदिवासी कृषकों के लिए

    जब गोदाम में घुसकर देखा गया तो पता चला की कावेरी हाइब्रिड धान के बीज के अतिरिक्त भी सफेद किस्म की बोरियों में अलग से भी बीज का कुछ स्टॉक था जो लगभग 100 बोरी के आसपास समझ आया. जब इस विषय में एसएडीओ वीरेंद्र सिंह चौहान से जानकारी चाही गई तो उन्होंने बताया की यह बीज हरिजन आदिवासी कृषकों के लिए स्कीम के अन्तर्गत आया है जिसे उन्हें फ्री ऑफ कॉस्ट बाटना है. इसके लिए बताया गया की सामान्य वर्ग की ही तरह उन कृषकों के पास कम से कम एक एकड़ की भूमि होनी चाहिए. जरूरी कागजातों में ऋण पुस्तिका एवं आधार कार्ड लाना अनिवार्य है.

सरकार की कथनी और विभागों की करनी में अंतर

    यहां पर यह बात विशेष तौर से कहना उचित होगा की सरकार किसानों के कल्याण के लिए और कृषि के विकाश के लिए बड़े बड़े दावे तो कर रही हैं. मप्र में तो सरकार दर्जनों पैम्फलेट और बुकलेट भी बना बनाकर बांटे हैं लेकिन उनका कहीं क्रियान्वयन होता हुआ नही दिख रहा है. 

      सरकार के यह निकम्मे विभाग और उनके कर्मचारी अधिकारी सभी योजनाओं का क्या कर दे रहे हैं इसका कोई रता पता नही चल पा रहा है. आज सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 एक सबसे ससक्त माध्यम था लेकिन आर टी आई को इतना कमज़ोर कर दिया है की कहीं कोई जानकारी नही दी जा रही है. यहां तक की अपील में जाने और राज्य सूचना आयोग में जाने पर भी वर्षों बाद भी जानकारी नही मिल पा रही है इसलिए सभी विभागों और अधिकारियों ने अपने मनमर्जी के हिसाब से काम चलाने का मन बना रखा है यदि आम जनता हल्ला गुल्ला और शोर शराबा भी करे तो इन्हे क्या फर्क पड़ने वाला है. विभाग सरकार से बड़े तो नही होते अतः विभाग को क्या कहना इसमे मुख्य खलनायक तो यह सरकारें ही हैं जो किसानों के लिए कुछ भी सार्थक नही कर रही हैं क्योंकि यदि विभाग गलत कर रहा है तो उस पर कार्यवाही करने का अधिकार मात्र सरकार के पास ही है. इन सरकारों को जबाब किसानों और आम जनता को एकजुट होकर देना पड़ेगा.

संलग्न - गंगेव कृषि विभाग में दिनांक 28 जून 2018 को एकत्रित किसान गण और साथ में एसएडीओ गंगेव को सौंपने को ज्ञापन जिंसमे ज्यादातर उपस्थित किसानों के सिग्नेचर थे. साथ ही रसूखदार अपनी अपनी गाड़ियों में भरते हुए मनमुताबिक बीज जिन्हें देखने वाला कोई न था.

------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला - रीवा मप्र, मोब 7869992139, 9589152587

Sunday, May 13, 2018

भाग 3 - दास्तां ए किसानी - रवी बोवनी 29 एकड़, लागत 165200 रु, कुल उपज 316080 रु (मामला मप्र के जिला रीवा अंतर्गत थाना गढ़ ग्राम बड़ोखर के 20 सदस्यीय परिहार किसान परिवार का जिसमे उद्यमी शिवेंद्र सिंह एवं उनके भाईयों की कड़ी मेहनत ने मौसम विरुद्ध राई की खेती में बनाना चाहा पहाड़)

दिनांक 13 मई 2018, स्थान - कैथा, रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

  5 से 10 एकड़ अर्थात 2 से 4 हेक्टेयर के आसपास तक के किसानों की परंपरागत किसानी तो पहले ही प्रश्नवाचक दायरे में है जहां ऐसे छोटे और मझले किसानों के लिए जीवन यापन तक करना असंभव हो रहा है. अब देखते हैं कुछ ऐसे किसानों परिवारों को जिनके पास अपेक्षाकृत सामूहिक तौर पर 2 अथवा 4  हेक्टेयर से अधिक की किसानी की गई. मप्र के रीवा ज़िला अंतर्गत थाना गढ़ के बड़ोखर ग्राम निवासी सुरसरी सिंह परिहार का परिवार है. सुरसरी सिंह के 5 पुत्र हैं जिनमे से एक जितेंद्र सिंह आर्मी पुलिस में आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं. वहीं उनके शेष 4 पुत्र घर में ही रहकर खेती किसानी का कार्य देखते हैं. सुरसरी सिंह की कुल जमीन 14 एकड़ के आसपास है जिसमे अभी उन्ही के नाम पर है और पुत्रों के मध्य कोई बटवारा नही हुआ है. सुरसरी सिंह के घर में रहने वाले 4 पुत्र क्रमसः धीरेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह और शिवेंद्र सिंह हैं. सबसे बड़े वाले पुत्र धीरेंद्र सिंह शारीरिक रूप से अक्षम हैं क्योंकि वह एक असाध्य बीमारी से ग्रस्त हैं जिसमे उनका पूरा शरीर लकवे की तरह हो गया है जिसमे कोई किसी भी प्रकार का मूवमेंट नही होता. बीमार सुरसरी सिंह स्वयं भी 80 वर्ष के ऊपर होने के कारण शारीरिक रूप से अक्षम हैं और घर गृहस्थी का कार्य मात्र उनके तीनो पुत्र शिवेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह के हवाले है. कार्यक्षमता के तौर पर देखा जाए तो सम्पूर्ण खेती किसानी के कार्य का मालिकाना शिवेंद्र सिंह के हाँथ में है. कहां पर क्या बुवाई करना है, व्यवस्था कैसे देखने है यह कार्य शिवेंद्र सिंह करते हैं बांकी सहयोगी के तौर पर उनके अन्य बड़े भाई वीरेंद्र सिंह और देवेंद्र सिंह भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.

  कर्ता अर्थात लीज में की जाने वाली खेती -

---------------------------------------

  किसान शिवेंद्र सिंह द्वारा जानकारी दी गई की उनके पिता के नाम कुल 14 एकड़ के रकबे के अतिरिक्त भी उन्होंने रवी वर्ष 2018 में कुछ जमीन कर्ता अर्थात छमाही लीज के तौर पर ली थी. जब किसी किसान के पास पर्याप्त जमीन न हो और उसे खेती-किसानी का शौक हो तो वह ग्रामीण क्षेत्रों की प्रथा अनुरूप किसी सक्षम जमीदार से आवश्यकतानुरूप जमीन लीज अर्थात कर्ता के तौर ले सकता है. इस प्रकार लीज में ली जाने वाली जमीन की हर स्थान पर अपनी अलग अलग कीमत हुआ करती है. जहां जैसी जमीन की गुणवत्ता और पैदावार हो उस हिसाब से लीज में ली जाने वाली जमीन की कीमत किसान तय करते हैं. यहां पर बडियोर निवासी दिनेश सिंग से 15 एकड़ कर्ता अर्थात लीज में ली गई इस जमीन के लिए किसान शिवेंद्र सिंह ने 18 हज़ार रुपये की रकम दिनेश सिंह को दिया.

कर्ता अर्थात लीज और अधिया की जमीन में खेती नुकसानी पर मुआबजा भरपाई नही

--------------------------------------------

  अमूमन देखा जाए तो किसान के पास यह हक होता है की उसकी पट्टे की जमीन पर की गयी खेती पर यदि प्राकृतिक आपदा की वजह से नुकसानी होती है तो पट्टेदार को सरकारें भरपाई करती हैं. उनके लिए मुआबजा वितरण होता है, साथ ही पीएम फसल बीमा योजना के अंतर्गत बीमा का भी कुछ लाभ मिल जाता है. परंतु कर्ता अर्थात लीज में ली जाने वाली और अधिया में की जाने वाली खेती में आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई लिखित प्रमाण नही होता. यदि पट्टेदार किसान जिसकी जमीन को लीज अर्थात कर्ता अथवा अधिया में लिया गया है प्राप्त हुए मुआबजे की रकम को नैतिक तौर पर कर्ता या अधिया लिए हुए किसान को दे दे तो ठीक है वरना अधिया लिए हुए किसान के पास कोई लिखित प्रमाण नही होता की वह प्राकृतिक आपदा की स्थिति में प्राप्त मुआबजा अथवा फसल बीमा की राशि के लिए कोई भी क्लेम कर सके. यह इस लीज सिस्टम और अधिया सिस्टम की बहुत बड़ी कमी है. जिससे ऐसे किसानों के लिए हमेशा ही खतरा बना रहता है की यदि कहीं सूखा, बाढ़, अकाल, ओला, पाला, अथवा अन्य किसी भी प्रकार की प्राकृतिक विपदा आ जाए तो अधिया और कर्ता के किसान की पूरी पूंजी डूबना तय बात है. आज नैतिक तौर अच्छे जमीदार बहुत ही विरले हैं जो मुआबजे और बीमा की राशि को अधिया या कर्ता के किसान को दे दें.

शिवेन्द्र सिंह द्वारा 15 एकड़ की अतिरिक्त कर्ता जमीन पर किसानी उद्यमिता का उदाहरण

---------------------------------------------

   बड़ोखर निवासी शिवेंद्र सिंह द्वारा अपने पैतृक जमीन 14 एकड़ के अतिरिक्त बडियोर निवासी दिनेश सिंह से 15 एकड़ जमीन कर्ता अर्थात लीज में लेकर किसानी करना हिम्मत और उद्यमिता का एक सुंदर उदाहरण है. आज जब किसान वर्ग स्वयं की जमीन पर भी किसानी नही कर पा रहा ऐसे में किसी अन्य जमीदार की जमीन लीज पर लेकर सूखा अकाल की स्थिति में इतना बड़ा जुआ खेलना बहादुर किसानों के उदाहरण है. क्या होता यदि मौसम साथ नही देता? क्या होता यदि कहीं ओला पड़ जाता? क्या होता यदि कहीं अतिवृष्टि हो जाती? क्या किसान शिवेंद्र सिंह को दिनेश सिंह द्वारा सरकार से प्राप्त मुआबजा अथवा फसल बीमा की राशि दे दी जाती? यह सब प्रश्न हर एक ऐसा किसान अपनी किसानी प्रारम्भ करने के पहले जरूर अपने आप से पूछता है.

आईये अब नीचे देखते हैं किसान शिवेंद्र सिंह और उनके अन्य दो भाईयों द्वारा खरीफ वर्ष 2017-18 और रवी वर्ष 2018 में उनकी पैतृक भूमि और कर्ता की भूमि पर की गई खेती के क्या नफा नुकसान हैं.

--------------------------------------

किसान का नाम - शिवेंद्र सिंह परिहार पिता सुरसरी सिंह परिहार निवासी ग्राम बड़ोखर, थाना गढ़, ज़िला रीवा मप्र.

खरीफ वर्ष 2017-18 की खेती का व्योरा -

कुल जमीन का रकबा - 14 एकड़, जिसमे परती छोड़ा गया 7 एकड़,

धान की बुवाई - 4 एकड़,

जुताई - 8000 रुपये,

हाइब्रिड धान बीज - 6000 रुपये,

खाद - सहकारी समिति हिनौती से ली गई 11000 रुपये,

धान रोपाई की लागत - 8500 रुपये,

कीटनाशक का खर्च - 2000 रुपये,

निराई - 4000 रुपये,

कटाई - 9500 रुपये,

गहाई - 12000 रुपये थ्रॉशेरिंग,

खरीदी केंद्र में धान पहुचाने का खर्चा - 800 रुपये,

मोटर पंप का कनेक्शन 3 एच पी - 2400 रुपये,

मोटर पंप दो बार जलने पर मरम्मत खर्च - 4300 रुपये,

उड़द बुवाई का रकबा - डेढ़ एकड़,

अरहर अर्थात तुअर की बुवाई का रकबा - एक एकड़,

मूग की बुवाई का रकबा - आधा एकड़,

देशी उडद मूग और अरहर के बीज का खर्च - 550 रुपये,

छिटुआ उडद मूग एवं अरहर का तीन एकड़ जुताई एवं बुवाई का खर्च - 2000 रुपये,

तीनों फसलों की कटाई का खर्च - 3500 रुपये,

तीनों फसलों की गहाई मिजाई का खर्च - 200 रुपये प्रति मजदूर के हिसाब से 15 मजदूरों का एक दिन का कुल खर्च 3000 रुपये,

नोट - खाद, कीटनाशक और पानी उपरोक्तानुसार.

खरीफ वर्ष 2017-18 की कुल उपज की कीमत -

4 एकड़ में बोई गई धान की उपज = 55 क्विंटल = रुपये में 55 गुणा 1550 रुपये = 85250 रुपये,

3 एकड़ रकबा में उडद मूग और अरहर की कुल उपज = 2 क्विंटल अरहर, 1.25 क्विंटल उड़द, और 60 किलो मूग जिनका मार्किट रेट, अरहर = 2 गुणा 4000 रुपये = 8000 रुपये. उडद की कीमत = 1.25 गुणा 3000 रुपये = 3750 रुपये. मूग की कुल कीमत = 0.60 गुणा 3500 रुपये = 2100 रुपये.

वर्ष 2017-18 खरीफ की 7 एकड़ रकबे में धान अरहर मूग और उडद की कुल लागत = 77550 रुपये,

वर्ष 2017-18 खरीफ की 7 एकड़ में कुल बुवाई जिसमे 4 एकड़ में धान, और तीन एकड़ में अरहर मूग और उडद की खेती की गई में कुल उपज की कीमत = 85250 धन 8000 धन 3750 धन 2100 रुपये = 99100 रुपये.

तीनों किसानों की छमाही खरीफ की मूल आमदनी 21550 रुपये -

कुल आमदनी खरीफ वर्ष 2017-18 =  कुल उपज - कुल लागत = 99100 - 77550 = 21550 रुपये.

किसान शिवेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह और वीरेंद्र सिंह तीनों लोग पूरे 6 माह मिलकर यह किसानी करते हैं अतः मजदूर के तौर पर भी देखा जाए तो कम से कम 200 प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति की मजदूरी के हिसाब से तीन लोगों की 6 माह की मजदूरी 1 लाख और 8 हज़ार बनती है. इस प्रकार देखा जाए तो इस किसानी में भारी घाटा हुआ.

रवी वर्ष 2018 गेहूं और अन्य फसलों की खेती का व्योरा -

कुल बुवाई का रकबा - 14 एकड़

कर्ता की बुवाई का रकबा - 15 एकड़,

राई की बुवाई का रकबा - 5 एकड़,

गेहूं की बुवाई का रकबा - 7 एकड़,

चना की बुवाई का रकबा - आधा एकड़, जौ की बुवाई का रकबा - आधा एकड़, मसूर की बुवाई का रकबा - 1 एकड़,

कर्ता की 15 एकड़ के रकबे में राई की बुवाई की गई जिसे हिबोती-बडियोर निवासी डॉक्टर दिनेश सिंह से 18000 रुपये में कर्ता में अर्थात जमीन का एक सीजन का पैसा देकर छमाही बुवाई के लिए जमीन लीज पर ली गई.

कुल 29 एकड़ की जुताई का खर्च = 65000 रुपये,

बुवाई का कुल 29 एकड़ का खर्च = 18000 हज़ार रुपये,

सहकारी समिति हिनौती से ली गई खाद का खर्च = 15000 रुपये,

29 एकड़ रकबे में बोई गई सभी फसलों के कुल बीज का खर्च = 18000 रुपये,

कीटनाशक का खर्च = 2000 रुपये,

मोटर पंप 3 एच पी का 6 माह का बिजली बिल = 2400 रुपये,

एक बार मोटर पंप जलने के कारण बनवाई का खर्च - 1800 रुपये,

29 एकड़ की बोई फसलों के कटाई का कुल खर्च = 25000 रुपये,

29 एकड़ में बोई गई फसलों की कुल गहाई का खर्च = 18000 रुपये,

रवी फसल वर्ष 2018 की 29 एकड़ रकबे में बोई फसल की कुल उपज -

गेहूं की कुल उपज =  60 क्विंटल = 60 गुणा 1735 रुपये = 104100 रुपये,

राई की कुल उपज = 48 क्विंटल = 48 गुणा 4000 रुपये = 192000 रुपये,

चना की कुल उपज = 3 क्विंटल = 3 गुणा 4400 रुपये = 13200 रुपये,

मसूर की कुल उपज = 90 किलो मात्र = 0.90 गुणा 4200 रुपये = 3780 रुपये,

जौ की कुल उपज = 1.5 क्विंटल = 1.5 गुणा 2000 रुपया = 3000 रुपया,

अर्थात रवी वर्ष 2018 की कुल उपज की कीमत = 104100 धन 192000 धन 13200 धन 3780 धन 3000 = 316080 रुपए,

रवी वर्ष 2018 की कुल लागत = 165200 रुपये,

तीनों किसानों की रवी की मूल आमदनी 150880 रुपये -

29 एकड़ की रवी फसल की कुल आमदनी = कुल उत्पादन - कुल लागत = 316080 - 165200 = 150880 रुपये,

रवी वर्ष 2018 में भी तीनो काश्तकारों शिवेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह एवं वीरेंद्र सिंह ने समूहिक रूप से 6 माह निरंतर खेतों में मेहनत किया अर्थात 200 रुपये कम से कम प्रतिव्यक्ति की मजदूरी प्रतिदिन की जोड़ने पर 6 माह की कुल मजदूरी 1 लाख 8 हज़ार रुपये बनता है. इस प्रकार 150880 रुपये में 108000 घटाने पर 42880 रुपये की रवी छमाही की आमदनी बनती है.  

अन्य खेती के मुकाबले देशी सरसों की उपज से बनाना चाहा राई का पहाड़

------------------------------------------------

 उपरोक्त विश्लेषण से जानकारी मिलती है की किसान शिवेंद्र सिंह और उनके अन्य दो भाईयों द्वारा हाड़ पिघलाने वाली मेहनत और सही फसल सेलेक्ट करने का परिणाम है की जहां दूसरे किसान हिम्मत हारकर किसानी बन्द कर दिए वहीं शिवेंद्र सिंह और उनके भाइयों ने पत्थर पर सोना उगाने का प्रयास किया. यदि शिवेंद्र सिंह ग्रामीण अंचल में परंपरागत रूप से की जाने वाली रवी गेहूं की फसल की खेती करते तो घाटे में रहते क्योंकि जहां पहाड़ी क्षेत्रों में मवेशियों और जंगली जानवरों का खतरा बराबर बना रहता है वहीं गेहूं की फसल का ज्यादा खयाल भी रखना पड़ता है. जबकि देशी राई अर्थात सरसौं की खेती सही समय पर किये जाने से यह लाभ हुआ की फाल्गुन और चैत्र तक इसकी कटाई हो गई और ओला से बचाव हो गया. यद्यपि शौभाग्य से इस वर्ष इस क्षेत्र में ओला का प्रकोप नही रहा. राई की खेती की नुकसानी भी कम हुई क्योंकि रोझ और नीलगाय आदि जंगली और आथ ही देशी पशु राई को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुचाते हैं.

 29 एकड़ में 6 माह की तीन किसानों की मेहनत की कुल आमदनी 150880 रुपया कुछ खास नही

-------------------------------------------------

   यदि देखा जाय तो पूरे 6 माह तक तीन किसान भाईयों शिवेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह और देवेंद्र सिंह की अथक मेहनत से रवी वर्ष 2018 में मूलतः राई की खेती से प्राप्त आमदनी 150880 रुपया कोई विशेष नही है. क्योंकि इसमे अभी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 200 रुपये के हिसाब से 6 माह की न्यूनतम मजदूरी रुपये 108000 रुपया तो जोड़ी ही नही गई. मानकर चलें की यदि यही तीनो किसान भाई शहर निकल गए होते और किसी ग्रोसरी स्टोर में नौकरी करते या कहीं चौकीदारी भी करते तो कम से कम 8 से 10 हज़ार महीने की कमाई करते जिसमे यदि आधा इनका खर्चा निकाल दिया जाए तो भी 5 हज़ार तक प्रतिमाह गिरी हुई हालात में भी बच जाते हैं. यदि थोड़ी ज्यादा समझदारी हुई और कोई अच्छा कार्य मिल गया तो निश्चित तौर पर आमदनी बढ़ जाती है. इस प्रकार स्वयं के खर्च को निकालकर तीनो किसान कम से कम 90 हज़ार से 1 लाख तक 6 माह में बचा सकते थे जिसमे अपने घर परिवार के लिए कपड़े, भोजन और बच्चों के स्वास्थ्य और स्कूली फीस की व्यवस्था बनाकर बढ़िया शांतिपूर्ण जीवन जी सकते थे. खेती किसानी में तो इतनी मेहनत पड़ती है की न तो नहाने की फुरसत और न ही खाने की होती है. हां किसानी में एक ही चीज का फायदा रहता है की व्यक्ति पूरे समय अपने घर परिवार के बीच में बना रहता है जबकि शहरों में पलायन कर नौकरी करने से यह लाभ नही मिल पाता जिससे मानसिक उद्विग्नता बनी रहती है.

किसान सुरसरी सिंह के परिवार की स्थिति

-------------------------------------------

  किसान सुरसरी सिंह के पांच पुत्रों में एक नौकरी पेशा होने के अलावा शेष चार घर में हैं जिनमे से चार शादीसुदा हैं जबकि सबसे छोटे शिवेंद्र सिंह की अभी शादी नही हुई है. पूरे संयुक्त परिवार में कुल 20 सदस्य हैं जिनका जीवन यापन भोजन कपड़ा सब कुछ इसी खेती किसानी पर आधारित है. इनके परिवार में नौकरीपेशा पुत्र जितेंद्र सिंह का योगदान काफी महत्वपूर्ण है. आज जब किसान को अपनी जमीन पर ही खेती किसानी करने के लिए समय पर जरूरी खाद बीज और नगद नही मिल पा रहा है तो भला अधिया और कर्ता के लिए लिए जाने वाले रिस्क के लिए व्यवस्था कौन भगवान करेगा? किसान शिवेंद्र सिंह दवारा बताया गया की उनके बड़े भाई जितेंद्र सिंह द्वारा खेती किसानी में पूंजी लॉगत संबंधी खर्च के लिए पूरा सहयोग मिलता है. क्योंकि यदि लॉगत पूंजी नही हुई तो उत्पाद कहां से होगा, पहले तो लगाने के लिए पूंजी चाहिए. ज्यादातर छोटे और मझले तबके के किसानों के साथ यह भी एक बड़ी समस्या रहती है की समय पर खाद बीज जुताई बुवाई के लिए नगदी और पूंजी की व्यवस्था न बन पाने के कारण उनकी सारी सोच और प्लान धरे के धरे राह जाते हैं. वही लोग हिम्मत बना सकते हैं जिन्होंने पहले से पूंजी की व्यवस्था कर रखी है अथवा जिनके घरों में कोई नौकरीपेशा व्यक्ति है जो बाहर से मदद करता है. वैसे आजकल बैंकों और सहकारी समितियों से भी किसान क्रेडिट कार्ड आदि व्यवस्था के माध्यम से खाद बीज आउर कर्ज़ मिलता है परंतु कई किसानों मौसम की मार के कारण डिफाल्टर हो जाते हैं और कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में उनका भविष्य की पूरी किसानी शाख खराब होने के कारण बाधित हो जाती है. इस बात को समझने वाला कोई सरकार नही है. यद्यपि चुनावी वर्ष कहें या जो भी परंतु अभी पिछले छमाही में मप्र सरकार ने इस विषय पर गौर किया है और ऐसे कालातीत किसानों के लिए ऋण अदायगी की व्यजमाफी के साथ 50 प्रतिशत अदायगी करने पर पुनः शाख बरकरार रहने वाली जो व्यवस्था की है वह काफी हद तक राहत देने वाली है.

अंततः परंपरागत खेती किसानी बन रहा अंतिम विकल्प

--------------------------------------------

   इस प्रकार देखा जा सकता है की यदि औषधीय अथवा फल सब्जी की खेती को फिलहाल यदि अलग रखा जाए तो परंपरागत अनाजों  की जाने वाली खेती से 30 एकड़ तक के किसान परिवारों को कोई विशेष लाभ समझ नही आ रहा है.

   सरकार किसानी की लाभ का धंधा बनाने की बात तो कर रही है पर यह ग्रामीण परिवेश की समस्याओं का सही मूल्यांकन किये बगैर भोपाल और दिल्ली में बैठकर यह कार्य कैसे करेगी बिल्कुल स्पष्ट नही है. सबसे पहले तो किसान की लॉगत और मेहनत पर ध्यान दिया जाना चाहिए. लॉगत और मेहनत यदि ज्यादा है तो फसल की कीमत भी उसी हिसाब से तय होनी चाहिए. आज फसल की जो न्यूनतम कीमत रखी गई है वह लॉगत से काफी कम है. वर्तमान में फसल की कीमत जब तक दुगुनी नही होती तब तक किसान के लिए कुछ भी अच्छा नही हो सकता. विचारणीय है की पिछले कई दशकों में कर्मचारियों के लिए कई वेतन भत्ते बढ़े, टी ए डी ए बढ़े, शहरी जिंदगी के स्टैण्डर्ड बढ़े, सभी वस्तुओं में आसमान छूती महंगाई बढ़ी लेकिन किसान की फसल का क्या हुआ. औसत तौर पर देखा जाए तो जहां अन्य क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी दस गुना बढ़ी है वहीं किसान की फसल की कीमत और उसकी जिंदगी का स्तर दुगुना तक नही हुआ है. ऐसे में भला कौन व्यक्ति किसानी को धंधे के तौर पर अपनाना चाहेगा. हर किसान और मजदूर के लिए सबसे पहला विकल्प तो यही होगा की उसके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और वह भी शहर जाकर अच्छी नौकरी प्राप्त करें. यदि सरकारी नौकरी नही भी मिले तो कम सेके कम किसी प्राइवेट सेक्टर में कोई मजदूरी और नौकरी मिल जाय तो वह भी इस परंपरागत किसानी से ज्यादा बेहतर होगा.

आज वही किसानी कर रहे हैं जिनके घरों में बाहर से आमदनी का कोई स्रोत अर्थात कोई बैकअप है

-----------------------------------------------

  आज ग्राम क्षेत्रों में वही किसान खेती कर रहे हैं जिनके परिजन बाहर शहरों में अच्छी नौकरी कर रहे हैं अथवा कोई सरकारी नौकरीपेशा है. क्योंकि बिना बाहरी आमदनी के पूंजी न हो पाने के कारण खेती में लागत लगाना असंभव है. हां ऐसे किसान जिनके पास कोई अन्य रास्ता नही है वह मजबूरी के तौर पर पेट भरने के लिए भूमि में दाना गाड़ने का काम जरूर कर रहे हैं. क्योंकि इसके अतिरिक्त वह कुछ कर भी नही सकते, या की आत्महत्या करें अथवा मजदूरी के लिए पलायन.

संलग्न - मप्र के रीवा ज़िला अंतर्गत थाना गढ़ क्षेत्र में किसान परिवार सुरसरी सिंह और उनके पुत्र शिवेंद्र सिंह आदि की फ़ोटो यहां पर संलग्न है.

--------------------

शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र,

 मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Monday, June 27, 2016

(रीवा) किसानो की फसल बीमा की राशि, KCC, एवं समितियों की अन्य जानकारी अँधेरे में - अध्यक्ष महोदय मानवाधिकार आयोग भोपाल म.प्र. के नाम दिया गया पत्र



प्रति,                                          दिनांक:-
श्रीमान् अध्यक्ष महोदय,                           स्थान:-रीवा/भोपाल म.प्र.
मध्य प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग,
अरेरा हिल्स, पर्यावास भवन, भोपाल, मध्य प्रदेश.

विषय – जिला रीवा के सभी केंद्रीय जिला सहकारी बैंकों के अंतर्गत आने वाली समितियों में ऋणी एवं अऋणी कृषकों की रवी एवं खरीफ फसल की पिछले पांच वर्ष की फसल बीमा सम्बन्धी जानकारी को कृषकों के हित में प्रत्येक समिति के नोटिस बोर्ड में साझा करने विषयक तथा यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत (जो की अधिनियम के अनुसार उपलब्ध करवाई जानी चाहिए थी) उपलब्ध कराये जाने विषयक.

सन्दर्भ- १) जिला रीवा अंतर्गत जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित शाखा गढ़, डभौरा, लालगांव, मनगवां आदि से सम्बद्ध समितियों में फसल बीमा के राशि की जानकारी कृषकों को उपलब्ध नहीं कराई गयी तथा इसे नोटिस बोर्ड में कृषकवार नहीं चस्पा किया गया. २) पारदर्शिता का अभाव सम्बन्धी. ३) भारतीय किसानों के मानवाधिकार के उल्लंघन सम्बन्धी.

महोदय,

कृपया विषयान्तर्गत प्रकरण के अवलोकन का कष्ट करें. जिला रीवा अंतर्गत आने वाले जिला केंद्रीय सहकारी बैंक मर्यादित रीवा एवं इससे संबद्ध सभी शाखाओं एवं सहकारी समितियों में पारदर्शिता की कमी पायी गयी है.
सहकारी बैंकों एवं समितियों से सम्बंधित सभी कृषक हितग्राहियों को अँधेरे में रखा जा रहा है. आयुक्त सहकारिता के निर्देश का भी पालन नहीं किया जा रहा है. इस निर्देश के अनुसार सभी ऋणी एवं अऋणी कृषकों की रवी एवं खरीफ फसल के फसल बीमा के राशि की लिखित जानकारी नियमानुसार सभी सम्बद्ध समितियों के नोटिस बोर्ड में चस्पा कराया जाना था एवं सूचना के अधिकार के अंतर्गत इसे नागरिकों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए था. परन्तु किसी भी निर्देश का पालन नहीं किया जा रहा है. साथ ही गरीब, अशिक्षित कृषकों को अँधेरे में रखा जाता है. किसानों की पिछले पांच वर्ष में बीमा की कितनी राशि प्राप्त हुई है यह जानकारी भी उन्हें नहीं है. कई बार यह राशि उनके समबन्धित समिति के बैंक अकाउंट में नहीं जोड़ा जाता जिससे कृषकों को इसका लाभ नहीं मिल पाता. सहकारी समितियों में पारदर्शिता का बड़ा ही अभाव है.
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को अब वित्तीय वर्ष २०१६-१७ से प्रधानमन्त्री कृषक बीमा योजना के रूप में क्रियान्वित किया जा रहा है जिसमे काफी फेर बदल कर सरकार की यह मनसा है की किसानों को उनकी फसल बीमा का सीधे एवं ज्यादा से ज्यादा एवं उचित लाभ दिलवाया जा सके, परन्तु समितियों, बैंकों, एवं राजस्व कर्मचारियों का रवैया किसान हित के प्रतिकूल है.
यही उपरोक्त कुछ जानकारियाँ आवेदक द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम २००५ के अंतर्गत भी कार्यालय सहकारी संस्थाएं रीवा से चाही गयी थी परन्तु सहकारी संस्थाएं रीवा के  द्वारा इसे देने से मना कर दिया गया, जो किसानों के हित के विपरीत किया गया एवं अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा.
अतः श्रीमान् अध्यक्ष महोदय मानवाधिकार आयोग मध्य प्रदेश से हमारा अनुरोध है कि  इस जनहित के विषय में हस्तक्षेप कर मध्य प्रदेश सहकारिता विभाग को स्पष्ट निर्देश देने का कष्ट करें कि कृषकों की फसल बीमा सम्बन्धी सभी जानकारी को प्राथमिकता के साथ पब्लिक किया जाए तथा जब भी सूचना के अधिकार अथवा सामान्य आवेदन से भी ऐसी जानकारी चाही जाए उसे कृषक नागरिकों को उपलब्ध करवाई जाये. पारदर्शिता की कमी को दूर किया जाये जिससे किसानों में शासन की विभिन्न योजनायों के विषय में आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सके.

विशेष तौर पर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित रीवा को स्पष्ट निर्देश जारी करने का कष्ट करें कि कृषकों के फसल बीमा सम्बन्धी जानकारी को तत्काल प्रत्येक समिति के नोटिस बोर्ड में कृषकवार चस्पा किया जाए.

संलग्न–
१)      दिनांक ८/१२/१५ का कार्यालय उपायुक्त सहकारिता जिला रीवा का पत्र क्र./सू.अ./२०१५/१२१५ की छायाप्रति.
२)      दिनांक २८/०१/२०१६ का कार्यालय उपायुक्त सहकारिता जिला रीवा म.प्र. का पत्र क्रमांक/आर.टी.आई./२०१३/३७ जो कि महाप्रबंधक जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित जिला रीवा की तरफ भेजा गया था, की छायाप्रति.
३)      दिनांक १५/०२/२०१६ का जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित रीवा म.प्र. का पत्र क्रमांक/स्थापना/२९१०, जो की आवेदक को भेजा गया था, की छायाप्रति.
४)      दिनांक १२/०१/२०१६ का आवेदक द्वारा उपायुक्त सहकारिता जिला रीवा को लिखित पत्र की छायाप्रति.
५)      दिनांक ०१/०३/२०१६ का कार्यालय संयुक्त आयुक्त सहकारिता रीवा संभाग रीवा म.प्र. का पत्र क्र./स्था./सू.अधि./२०१६/२५०, जो की सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त होने वाली जानकारी को समय पर उपलब्ध न करवाने के कारण अपीलीय प्रकरण दिनांक ०१/२०१६ को आवेदक द्वारा प्रथम अपीलीय अधिकारी सहकारिता विभाग रीवा को  प्रस्तुत किया गया था, के विषय में नियत तिथि में आवेदक के सहकारिता विभाग रीवा के कार्यालय में उपस्थित होने सम्बन्धी आदि की छायाप्रति.
६)      दिनांक ११/०४/२०१६ का कार्यालय विभागीय प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाए रीवा संभाग रीवा म.प्र. का अपीलीय प्रकरण क्र. ०१/२०१६ एवं सूचना का अधिकार क्रमांक/सू.का अधि./२०१६/४३२ की छायाप्रति.

-----------------
Sincerely
SHIVANAND DWIVEDI
(Social, Scientific, and RTI activist)
Village KAITHA, Post  AMILIYA,
Police Station GARH, Tehsil  MANGAWAN,
District REWA, Madhya Pradesh. PIN – 486117

Mob. +917869992139