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Sunday, December 29, 2019

(MP news) खरीदी केंद्र बने भ्रष्टाचार के केंद्र, खरीदी केंद्रों में मची है लूट, 42 किलो तक हो रही तुलाई, किसानों ने किया कार्यवाही की मांग, कार्यवाही नहीं हुई तो होगा आंदोलन (मामला जिले के धान खरीदी का जहाँ आर्द्रता और अन्य चार्ज के नामपर चल रही है लुटाई, हिनौती, गंगेव, देवास, त्योंथर, जवा आदि खरीदी केंद्रों भी शामिल)

दिनांक 29 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

    जिले के खरीदी केंद्रों में किसानों की लुटाई अनवरत जारी है. शिकायतों और मीडिया के बाबजूद भी खरीदी केंद्र प्रबंधकों और उनके दलालों पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ रहा है.

   एक तो पूरे जिले और संभाग में खरीदी लेट प्रारम्भ हुई वहीं ऊपर से किसानों पर ठंडी का भी सितम जारी है. ऐसे में अन्नदाता अपनी धान ट्रेक्टर में लादकर जगह जगह की ठोकर खाने पर मजबूर है जिसको देखने वाला कोई शासन प्रशासन नही है.


   वजन से अधिक हो रही तुलाई

   बता दें की जिले अथवा संभाग का शायद ही कोई ऐसा खरीदी केंद्र हो जहाँ प्रति बोरी धान की तुलाई वास्तविक वजन से अधिक न हो रही हो. आमतौर पर खाली बोरी का वजन 500 से 600 ग्राम माना जाता है ऐसे में प्रति बोरी सहित धान का वजन 40 किलो 600 ग्राम तक होता है लेकिन खरीदी केंद्रों में बैठे दलाल और प्रबंधक किसानों से 41 से 45 किलो तक वजन की धान ले रहे हैं. जो किसान इसका विरोध करते हैं उनकी तुलाई ही नही की जाती और वापस कर दिया जाता है.


आर्द्रता के नाम पर मची है लूट

  किसानों से आर्द्रता के नाम पर लूट की जा रही है. वैसे सामान्यतौर पर धान की आर्द्रता 17 पॉइंट तक होती है और यदि 17 से अधिक की आर्द्रता हुई तो धान नही ली जाती. लेकिन जिन किसानों की आर्द्रता 17 से अधिक होती है उनसे अतिरिक्त धान तुलाई की जाती है साथ ही उनसे पैसे भी लिए जाते हैं. 17 से अधिक आर्द्रता वाले किसानों से 42 किलो तक धान ली जाती है.


धान भराई और तुलाई के नाम पर लुटाई

  इसी प्रकार सभी समितियों और खरीदी केंद्रों में धान भराई और तुलाई के नाम पर भी लूट मची हुई है. बता दें की यह नागरिक आपूर्ति निगम खाद्य विभाग और सहकारिता विभाग की जिम्मेदारी होती है वह अपने लेबरों और तुलावटी को खरीदी केंद्रों पर रखे क्योंकि शासन इसके वास्ते प्रबंधकों को अलग से पैसे देती है लेकिन समस्या बताकर किसानों से प्रति बोरी 5 से 10 रुपये तक लिया जाता है. आमतौर पर यह सभी खरीदी केंद्रों में देखा जा सकता है।


प्रासंगिक व्यय की राशि में भी धांधली

  इसी प्रकार सभी समितियों के खरीदी केंद्रों में शासन द्वारा तुलाई, भराई, बोरे की सिलाई, उठाई, लदाई के नाम पर, किसानों के लिए खरीदी केंद्रों पर व्यवस्था के लिए एवं खरीदी गयी धान की सुरक्षा के लिए अमूमन 5 से 10 लाख के बीच की राशि दी जाती जो सीधे समितियों से सम्बद्ध रहती है लेकिन चूंकि यह देखा जा सकता है की किसी भी खरीदी केंद्र में न तो उचित छाया टेंट की व्यवस्था होती है और न ही अन्य किसी प्रकार की सुविधा होती है. जहाँ तक सवाल धान का है तो वह खुले आसमान के नीचे पड़ी सड़ती रहती है तो साफ जाहिर है की यह प्रासंगिक व्यय राशि का सीधा सीधा घालमेल कर दिया जाता है और संबंधित समिति खरीदी केंद्रों के मालिक मिलकर इसको भी चट कर जाते हैं.


खरीदी में ऐसे चलता है करोड़ो के भ्रष्टाचार का खेल

  अब आइए समझते हैं की खरीदी केंद्रों में धान गेहूं तुलाई का खेल किस कदर करोड़ो के भ्रष्टाचार का रूप ले लेता है. मानाकि हिनौती खरीदी केंद्र का उदाहरण लेते हैं पर यह सिस्टम सभी खरीदी केंद्रों में लागू होता है. हिनौती ए एवं बी खरीदी केंद्रों के नाम से चल रहे भमरिया और भठवा खरीदी केंद्रों में कुल मिलाकर 80 हजार क्विंटल धान खरीदी की लिमिट का प्रावधान है. 

   ऐसे में यदि ऊपर के सिस्टम से देखा जाय तो यदि 80 हज़ार क्विंटल का दुगुना किया जाए तो 160 हज़ार बोरियां से अधिक खरीदी होना पाया जाता है. ऐसे में यदि प्रति बोरी आर्द्रता के नाम पर एक किलो धान भी बचाई जाती है तो यह 160 हज़ार किलो धान अर्थात 1600 क्विटल धान की अतिरिक्त खरीदी होगी जो रिकॉर्ड में खरीदी गई धान में नही है. अब 1815 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से देखा जाय तो यह राशि 29 लाख 4 हज़ार रुपये बनती हैं. मतलब 29 लाख रुपये सीधे समिति प्रबंधक मात्र एक बार की धान की खरीदी में बचा रहा है. इसमे से 4 से 5 लाख रुपये तक शिकायतों पर जांच के नाम पर और कमीसन के नाम पर सहकारिता, फ़ूड विभाग और नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों को चली जाएगी. क्योंकि यह तो समझिए ही कि जब आम खरीदी केंद्रों की शिकायतें करेंगे तो जांच होगी फिर जांच के नाम पर हीलाहवाली के लिए ऊपर वालों को खिलाना पिलाना पड़ेगा. इस प्रकार का यह खेल आर्द्रता और अतिरिक्त खरीदी का हुआ. इसके अतिरिक्त लेबरों के लिए प्रति बोरी कम से कम 2 रुपये रखा जाए तो 160 हज़ार बोरी धान मतलब 3 लाख 20 हज़ार रुपये कम से कम हुआ. इससे साफ जाहिर है की लेबरों के लिए तो मजदूरी से भी अधिक तो 2 रुपये प्रति बोरी वाले मामले से ही निकल आया. शेष देखें की यह 5 लाख कम से कम प्रासंगिक व्यय वाली राशि का क्या होता है. यह राशि किसी भी प्रासंगिक व्यय में खर्च नही होती है यह सीधे समिति प्रबंधक और उनसे जुड़े खा जाते हैं. 


अभी खेल खत्म नही हुआ, धान को खुले में क्यों रखते हैं?

   अभी भ्रष्टाचार का खेल खत्म थोड़ी हुआ है. अभी भी कई सीन बांकी हैं. अब समझिए की धान को ट्रांसपोर्ट करने में देरी और खुले में रखने से क्या फायदा होता है? 

   यदि धान को जल्दी ट्रांसपोर्ट कर दिया जाता है अथवा खुले में न रखकर उसे ढककर अथवा गोदामो में रखा जाता है तो कोहरे, शीत और पानी की वजह से खरीदी गयी धान का वजन आटोमेटिक रूप से बढ़ जाता है जिससे जो धान 42 किलो प्रति बोरी के हिसाब से खरीदी गयी है वह बढ़कर 45 किलो तक हो जाती है क्योंकि पानी खाकर धान की वजन बढ़ जाती है. अब यह धान समिति प्रबंधक और खरीदी केंद्र प्रबंधक सीधे निकालकर बोरियों को खाली करके उन्ही से अन्य कई बोरियां बना डालते हैं यह उस 29 लाख में दुगुने से भी अधिक का कार्य करता है और भ्रष्टाचार की कमाई सीधे 29 लाख से बढ़कर करोड़ तक पहुच जाती है.

  तो समझ आया पूरा मामला. कैसे बिना किसी मेहनत के मात्र खरीदी केंद्रों के प्रबंधक बनकर एक ही वर्ष में करोड़पति बन सकते हैं. कौन इसे देखेगा? कौन इसकी जांच करेगा? सबसे बड़ी बात कौन स्वार्थी किसान इसकी आवाज उठाएगा?


  कुछ खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार के पुख्ता उदाहरण

  रीवा जिले के जिन जिन खरीदी केंद्रों में यह शोध किया गया और समस्या विशेष तौर पर किसानों से बातकर पूँछी गयी जिनके की काफी फ़ोटो और वीडियो उपलब्ध हैं उनमे से गंगेव ब्लॉक के हिनौती ए और बी, देवास ए और बी, भठवा, भमरिया, घुमा-कटरा, भीर-कोट, खर्रा-लौरी-गढ़ आदि प्रमुख हैं. यहां तो जमकर लूट मची है. अब सवाल यह है कि इसे कौन देखेगा। इस पर जांच कौन करेगा?


  हज़ारों क्विंटल की परमिट वाले किसानों के भी काले कारनामे देखते चलें

   जिन जिन समितियों और खरीदी केंद्रों की बातें की गईं हैं उनमे से सभी में ऐसे भी किसान हैं जिनकी सैकड़ों हेक्टेयर की जमीनें हैं. इसमे से काफी जमीन परती भी पड़ी हुई है जिसमे की कुछ बोया ही नही जाता लेकिन यह रसूखदार किसान पटवारी तहसीलदार से मिल बैठकर उस जमीन का हज़ारों क्विंटल की परमिट बनवा डालते हैं और बनिकों और व्यापारी वर्ग से संपर्क कर कमीसन पर वह धान भी अपने एकाउंट में डलवा लेते हैं. पूरे जिले और प्रदेश में देखा जाय तो हज़ारों ऐसे किसान हैं जो की व्यापारियों से मिलकर यह अवैध धंधा चला रहे हैं. यह सब सहकारिता, खाद्य विभाग और नागरिक आपूर्ति निगम की समिति प्रबंधकों से मिली भगत के चलते होता है. अब बताएं कौन इस संगठित अपराध और माफिया पर कार्यवाही करेगा?


संलग्न - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें खरीदी केंद्रों पर डंप पड़ी हुई शीत पानी खा रही धान और किसानों का समूहआदि की फ़ोटो शॉट.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587.

Saturday, December 21, 2019

(Rewa, MP) धान खरीदी में घपला, किसानों से ले रहे 41 किलो से अधिक धान, पूंछने पर आर्द्रता का बता रहे कारण (मामला जिले के खरीदी केंद्रों का जहां किसानों का जमकर चल रहा शोषण, 40 किलो 600 ग्राम से अधिक की की जा रही खरीदी, किसान परेशान कोई नही सुन रहा किसानों की समस्या)

दिनाँक 21 दिसंबर 2019, स्थान - गढ़/कोट/भठवा, रीवा मप्र

     खरीफ धान की खरीदी के साथ ही खरीदी केंद्रों में धांधली और अव्यवस्था भी फैल चुकी है. आर्द्रता और कंडों रोग के नाम पर किसानों को जमकर लूटा जा रहा है. किसान आवाज उठा रहे हैं लेकिन कोई अधिकारी सुनने को तैयार नही है.

  आर्द्रता बताकर ले रहे ज्यादा धान

    जब किसान खरीदी केंद्रों पर जाते हैं तो उन्हें बताया जाता की है की आपकी धान अभी गीली है अतः आपको ज्यादा देनी पड़ेगी. किसानों का कहना है की हमारी धान 15 से 18 के बीच में आर्द्रता टेस्ट में रहती है. 95 प्रतिशत धान 17 पॉइंट आर्द्रता के भीतर रहती है फिर भी उनसे बोरी और बारदाना की वजन के नाम पर ज्यादा धान ली जा रही है. बताया गया की एक बोरी में मात्र 40 किलो और 600 ग्राम भरे जाने का प्रावधान है जबकि इसका भराव ज्यादा किया जा रहा है. कई किसानों ने बताया की उनसे 41 से 42 किलो के बीच में धान ली जा रही है.

  सैंपल के नाम पर हिनौती समिति में चल रही लुटाई

   गंगेव ब्लॉक अन्तर्गत आने वाले हिनौती ए और बी दोनो ही खरीदी केंद्रों में सैंपल लिए जा रहे हैं. खरीदी केंद्र प्रबंधक राजेन्द्र सिंह एवं वर्कर कोटेदारों द्वारा बताया गया की यह सैंपल तीन भागों में में रखा जाता है. जबकि खाद्य विभाग में फ़ूड कंट्रोलर राजेन्द्र सिंह ठाकुर और गंगेव फ़ूड इंस्पेक्टर गौरी मिश्रा से पूंछने पर पता चला की सैंपल जैसी कोई बात नही है. सैंपल लेकर उसकी आर्द्रता देखी जाती है और इसके बाद उसे किसान को वापस कर दिया जाता है. जबकि हिनौती खरीदी केंद्रों में पॉलीथिन में प्रति किसान तीन किलो धान लेकर पता नही कहां रखा जाता है. कुछ लोगों ने बताया की सैंपल वैम्पल कुछ नही रहता है रात के अंधेरे में एकत्रित की गई धान को बोरी में भरकर किसी चमचे वाले किसान के खाते में डाल दिया जाता है जिससे किसानों को पता भी नही चल पाता कि क्या घालमेल है. वैसे यह कोई नई प्रथा नही है और पुराना पैसा कमाने का जरिया है सब.

  कोटेदार यहां भी किसानों को नही बख्शते

  बताया गया की जिले के ज्यादातर खरीदी केंद्र कोटेदारों के हवाले रहता है. यही कोटेदार खरीदी में समिति प्रबंधकों की मदद करते हैं. सामान्यतया नपाई तुलाई में जो सिस्टम इनका कोटों में रहता है वही खरीदी केंद्रों में भी रहता है. यहां भी कांटों के माध्यम से भी किसानों की लूट हो रही है. किसान यदि बोलते हैं तो उनकी धान को वापस कर देने और पैसे रोकने की धमकी दी जाती है. किसानों ने इसकी सख्त जांच की माग की है.

  प्रासंगिक व्यय के नाम पर भी लूट

   मात्र नपाई तुलाई तक ही बात नही रह जाती. यदि देखा जाय तो लुटाई काफी आगे तक है. बता दें की प्रत्येक खरीदी केंद्रों को बारदाने की सिलाई, ढुलाई, एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने लेबर चार्ज, किसानों को छाया उपलब्ध कराने, जनरेटर, शेड, बिजली पानी की व्यवस्था करने, उचित रेट पर भोजन चाय की व्यवस्था करने आदि के लिए प्रासंगिक व्यय के नाम से राशि प्रत्येक समिति के खरीदी केंद्रों में सरकार द्वारा भेजी जाती है जो लाखों में होती है लेकिन उसका कोई उपयोग नही किया जाता सब समिति प्रबंधक और खरीदी केंद्र प्रबंधक अपने पास रखकर हजम कर लेता है जिसकी जांच की माग भी किसानों ने की है.

  किसानों से प्रति बोरी 5 से 10 रुपये एक्स्ट्रा

   बात यहीं आकर नही रुकती बताया गया की जब किसान ट्रेक्टर में धान लेकर खरीदी केंद्रों पर जाते हैं तो उनको बताया जाता है की या की खुद तौल कराओ नही तो एक्स्ट्रा 5 से लेकर 10 रुपये प्रति बोरी तक चार्ज दो. किसान यदि यह राशि देने से मना करता है तब उसकी धान वापस कर दी जाती है. जबकि इस विषय में जब खाद्य विभाग से जानकारी चाही गई तो खाद्य नियंत्रक राजेन्द्र सिंह ठाकुर द्वारा बताया गया की ऐसी कोई राशि किसानों को देने की जरूरत नही है. क्योंकि किसान से कोई राशि वसूली नही जाएगी और जहां भी ऐसा हो रहा है वह गलत है. तुलावटी और नापतोल करने वाले लेबरों को पहले से ही खरीदी केंद्रों द्वारा सरकार के व्यय से राशि दी जाती है. 

 खरीदी केंद्रों पर डंप पड़ी है धान, उठाव नही

   बता दें कुछ खरीदी केंद्रों में अभी भी दर्जनों ट्रक धान डंप पड़ी हुई है जिसकी खरीदी के बाद उठाव नही हो पाया है. वैसे भी मौसम काफी खराब चल रहा है ऐसे में पता नही कब इंद्र देव का मूड बिगड़ जाए और किसानों से 17 की आर्द्रता की कहकर खरीदी गई धान 50 पॉइंट की आर्द्रता हो जाए.

   धान सड़ाने और भींगाने से प्रबंधकों को होता है लाभ

   बता दें की धान सड़ाने का भी एक फंडा होता है. जानकार सूत्रों ने बताया की जब धान खरीदी 17 और उसके नीचे की आर्द्रता में की जाती है तब उसमे ज्यादा मात्रा चढ़ती है पर जैसे ही शीत अथवा पानी गिरने से धान भीग जाएगी तो स्वाभाविक रूप से उसकी आर्द्रता बढ़ने से धान कम मात्रा में तौल होगी जिससे समिति प्रबंधक बोरियों से धान निकाल लेंगे और उनको उसी धान का भी फायदा हो जाएगा.

   पूरा सिस्टम लगा है काले धंधे में

    यदि सूत्रों की माने तो इस धंधे में नीचे से लेकर ऊपर तक के लोग लगे हुए हैं. यह कार्य मात्र समिति प्रबंधक अथवा खरीदी केंद्रों का मुखिया बस नही करता है बल्कि इसमे फ़ूड और नागरिक आपूर्ति निगम से लेकर सहकारिता विभाग तक के कर्मचारी अधिकारी मिले हुए रहते हैं.

   जब इसकी शिकायत की जाती है तो जांच के नाम पर मात्र खानापूर्ति होती है. नियमतः जब धान खरीदी हो तो उसी रात इसका उठाव भी सुनिश्चित हो जाए. यदि किसी कारण बस उठाव नही भी हो पाया तो उस रात धान को ढकने और शीत पानी से बचाने के उचित प्रबंध करने चाहिए लेकिन ऐसा कुछ होता नही है और किसानों से उच्च गुणवत्ता बताकर खरीदी गई धान निम्न गुणवत्ता में नॉन को भेजी जाती है. 

   संलग्न - कृपया संलग्न खरीदी केंद्रों की फ़ोटो देखें जहां पर धान खरीदी के नाम पर धांधली चल रही है. किसान परेशान हैं लेकिन कोई सुनने वाला नही.

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शिवानन्द द्विवेदी
समाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Saturday, August 4, 2018

बिना पानी ही लग रहे रोपा, 75 प्रतिशत खेत बोवनी बिना (मामला ज़िले में खरीफ वर्ष की बोवनी का जहां इस वर्ष अकाल सी स्थिति बनी हुई है, बारिश बहुत कम और खेत पानी से खाली, मात्र मोटर पंप का सहारा लेकर हो रही बोवनी)

दिनांक 04 अगस्त 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा से, शिवानन्द द्विवेदी) 

    रीवा संभाग में वर्ष 2018 की खरीफ बोवनी में अब तक असमंजस की स्थिति बनी हुई है और विशेषकर रीवा ज़िले में इस वर्ष औसत से बहुत कम बारिश होने से अब तक 25 प्रतिशत तक भी बोवनी नही हो पायी है.

    पूरे रीवा ज़िले में भ्रमण किया जाए तो सभी खेत बोवनी से खाली हैं. निचले बांधों को छोंड़कर किसी भी खेत में पानी देखने को नही मिल सकता. इसी से पता चल जाता है कहीं भी लेउ और रोपा योग्य पानी नही है. 

    जिन कास्तकारों के पास अपना स्वयं का मोटर पंप है वही थोड़ा बहुत बोवनी कर पा रहे हैं लेकिन यह स्पष्ट नही है की यदि पानी नही गिरा तो यह खेती पकेगी कैसे? क्योंकि ऊपर से बारिश न होने से निरंतर खिसकते जलस्तर से बोरवेल भी बन्द हो जाएंगे और पीने के पानी तक का संकट उत्पन्न हो जाएगा.

  कैथा और आसपास के किसानों ने मात्र बोई झुरिया खेती

      कैथा, मिसिरा, सेदहा, बड़ोखर, सोरहवा, डाढ़, जमुई, हिनौती, लोटनी, चियार, मदरी, बांस, अमवा आदि नजदीकी ग्रामों में किसानों ने मात्र अब तक झुरिया ही फसल बोई है. वह भी मात्र एक चौथाई. अभी भी 75 प्रतिशत के अधिक खेत खाली हैं. जिन किसानों ने बेहन डाली हुई है उनकी बेहन भी खराब हो चुकी है. लगभग डेढ़ माह से आधिक समय के डाली हुई बेहन अब रोपा लगाने योग्य नही बची है क्योंकि नियमानुसार मात्र 20 से 25 दिवश के अंदर ही रोपा लगा दिया जाना चाहिए नही तो फसल का उत्पादन सही तरीके से नही हों पाता है. 

  कई दिनों से हो रही थी फब्बारे वाली बारिश

    वैसे देखा जाय तो रीवा ज़िले के काफी हिस्सों में पिछले एक सप्ताह से निरंतर फब्बारे वाली बारिश हो रही है. जिस प्रकार से किसी पिकनिक स्पॉट में जाएं तो वहां पर कृत्रिम फब्बारा लगाया हुआ होता है और न तो पानी में उससे बढ़ोत्तरी होती है और न ही कमी आती है. ठीक इसी प्रकार की बारिश पिछले एक सप्ताह से रीवा के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिली है जिसकी वजह से न तो किसान झुरिया ही बोवनी कर पाया और रोपा लेउ का तो प्रश्न ही नही उठता क्योंकि फब्बारे वाली बारिश जमीन तक पहुची ही नही.

 खरीफ 2018 घोषित हो सूखाग्रस्त 

     जिस प्रकार से प्रदेश के अधिकतर हिस्सों में अकाल जैसे संभावना बनी हुई है ऐसे में सरकार को चाहिए की गिरदावरी और सर्वे करवाकर तत्काल ऐसे सभी जिलों को सूखग्रस्त घोषित करे जिनमे 30 प्रतिशत के कम अब तक बोवनी हुई है. विशेषतौर पर रीवा संभाग में अब तक की स्थिति के स्पष्ट है की यह पूरी तरह से शूखे की जद में आ चुका है. अब यदि बारिश होती भी है तो जलस्तर बनाये रखने और इकोसिस्टम बरकरार रखने के अतिरिक्त बोवनी योग्य नही होगी क्योंकि अगस्त मध्य में कोई भी खरीफ धान की खेती प्रश्न के दायरे में ही रहने वाली है की उसमे कुछ उपज हो पाएगी की नही क्योंकि मध्य अगस्त में बोई जाने वाली धान की फसल को पर्याप्त पानी की चाहत के साथ साथ कीड़ों मकोड़ों से होने वाली बीमारी आदि के भी खतरा बना रहेगा. इस प्रकार बारिश की किसी अप्रत्याशित स्थिति में मध्य अगस्त तक बोवनी होती भी है तो आगे आने वाली रवी 2018-19 की खेती भी पिछड़ेगी जिससे किसान रवी की फसल में भी मार खा जाएंगे इससे बेहतर यही होगा की 15 अगस्त के बाद किसी भी प्रकार की खरीफ 2018 की बोवनी न ही की जाए तो ज्यादा बेहतर है.

संलग्न - रीवा ज़िले के मायूस किसान और साथ ही खरीफ वर्ष 2018 की कुछ रोपा लगी हुई खेती जिनमे पानी का नामोनिशान तक नही. साथ ही पोखर तालाबों का दृश्य जो पूरी तरह से खाली पड़े हुए हैं. आसपास दिख रहे हरे भरे खेत धान से नही लहलहा रहे बल्कि झरगा फसही और नया चारा घास है जो बोवनी न हो पाने की स्थिति में खेतों में उग आये हैं.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139