"One who is unattached to the fruits of his work and who works as he is obligated is in the renounced order of life, and he is the true mystic: not he who lights no fire and performs no work". - |||श्रीमद भगवद गीता, अध्याय 6, Verse 1|||
Saturday, December 21, 2019
(Rewa, MP) धान खरीदी में घपला, किसानों से ले रहे 41 किलो से अधिक धान, पूंछने पर आर्द्रता का बता रहे कारण (मामला जिले के खरीदी केंद्रों का जहां किसानों का जमकर चल रहा शोषण, 40 किलो 600 ग्राम से अधिक की की जा रही खरीदी, किसान परेशान कोई नही सुन रहा किसानों की समस्या)
Thursday, November 15, 2018
MP - मप्र की विकाश गाथा का प्रतीक - मनगवां चाकघाट हाईवे में सोहागी पहाड़
दिनांक 15 नवंबर 2018, स्थान - सोहागी पहाड़, रीवा मप्र
( शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)
पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से बनाई जा रही रीवा ज़िले की बहुचर्चित मनगवां-चाकघाट हाईवे सड़क आज तक नही बन पायी है जबकि इसमे अब तक देश दुनिया की नामी गिरामी कंपनियों ने काम किया है. टॉपबर्थ, दिलीप बिल्डकॉम और बंसल जैसी कंपनियों ने इस सड़क कार्य में हाँथ आजमाया है और अब वर्तमान में बंसल कंपनी द्वारा ही कार्य किया जा रहा है. टॉपबर्थ कंपनी द्वारा कार्य का टेंडर लिया जाकर दिलीप बिल्डकॉम कंपनी को पेटी कॉन्ट्रैक्ट में दिया गया था जिंसमे बताया गया कि लेनदेन को लेकर आपसी विवाद और समय पर गुणवत्तापूर्ण तरीके से पूरा न कर पाने के कारण ठेका निरस्त हुआ. इसके बाद पुनर्निविदा के चलते बंसल कंपनी को कार्य सौंपा गया. बंसल द्वारा आज तक कार्य पूरा नही किया गया जिसका परिणाम है पिछले पांच से अधिक वर्षों से मनगवां और चाकघाट के बीच रहने वाले और यहां इस सड़क मार्ग से प्रतिदिन आवागमन करने वाले आम जन मानस से लेकर वीआईपी तक की फजीहत.
सोहागी पहाड़ में स्थिति सबसे खतरनाक
मनगवां से चाकघाट सड़क मार्ग में सोहागी नामक पहाड़ आता है जो किसी भी रोड निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. पिछले पांच से अधिक वर्षों से हो रहा यह सड़क निर्माण का कार्य आज मात्र सोहागी पहाड़ में ही आकर रुका हुआ है. टेढ़ा मेढ़ा और ऊंचाई गहराई से भरा यह पहाड़ काफी मुश्किल है. अब जो भी कपंनियां कार्य कर रही हैं उन सबका अंतिम और सबसे मुश्किल कार्य इसी पहाड़ को तोड़कर यहां से सड़क मार्ग निकलना है।
ऐसा क्या है इस सड़क में की पांच साल से अधिक का समय लग गया
अब प्रश्न यह है की आज भी क्या मॉनव 17 वीं सताब्दी में जीवन यापन कर रहा है जबकी मसीनी उपकरणों का अभाव रहता था और मॉनव ज्यादातर कार्य हाँथ से करता था. आज तो 21 वीं सदी का दौर है जबकि ऐसी मसीनों का ईजाद हो चुका है जहाँ पर कोई मुश्किल से मुश्किल कार्य भी कुछ दिनों अथवा महीनों में पूरा किया जा सकता है. तब प्रश्न यह उठता है की आखिर यह सरकारें क्या कर रही हैं. क्या सरकारों में बैठे सिविल कंस्ट्रक्शन के इंजीनियर और इनके नीति निर्धारक इन बातों का ध्यान नही रखते की जिस कंपनी को यह टेंडर देकर कार्य सौंप रहे हैं वह कार्य करने योग्य भी हैं की नही. आखिर टेंडर देते समय कोई तो समय निर्धारण हुआ होगा की इतने वर्षों में कार्य को पूरा किया जाकर सरकार के हवाले किया जाना है. वास्तव में बात यह है की कमीशन के खेल में पूरी सरकार और इनके सिपहसालार ही लिप्त हैं तो भला कार्यवाहि फिर कौन करेगा. कार्यवाही करने के लिए पाक साफ और मजबूत होना पड़ता है. कमीशन खोर थोड़े ही कार्यवाही करते हैं.
सोहागी पहाड़ में वर्षों से मानक स्तर से कई गुना अधिक प्रदूषण
सोहागी पहाड़ की स्थिति आज इतनी भयावह हो चुकी है की यहां पर दुर्घटनाएं तो बहुत आम बातें हैं और लगभग रोज ही कोई न कोई अप्रिय दुर्घटना हो रही है. मनगवां से चाकघाट वाया सोहागी पहाड़ से गुजरने वाले हर एक सख्स की हालात यह है की यदि उसका मेडिकल चेकअप कराया जाये तो खतरनाक बीमारियां मिलेंगी जिंसमे फेंफड़ों और सांस की बीमारियां जैसे सिलकोसिस, टीबी, और अन्य बीमारियां सम्मिलित हैं.
प्रदूषण चेक करने वाली संस्थाएं और उस पर कार्यवाही करने वाली संस्थाएं जैसे पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड आदि तो ऐसा लगता है जैसे अस्तित्व में हैं ही नही. रीवा संभाग और संभवतः पूरे मप्र में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाएं नाकाम और अक्षम साबित हुई हैं. क्रशर प्लांट से निकलने वाला डस्ट और फैलने वाला प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाले धुंए और धूल का प्रदूषण, निर्माणाधीन सड़कों में अमानक स्तर पर उड़ने वाल धूल डस्ट का प्रदूषण, आखिर इन सब प्रदूषण की समस्याओं का समाधान कौन करेगा? कहां है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य ऐसी संस्थाएं? कहां गई जनता के हित की बात करने वाली सरकारें?
सिलिकोसिस एक जानलेवा बीमारी
सिलिकोसिस फेंफड़ों से संबंधित एक ऐसी बीमारी है जो महीन धूल के कणों से उत्पन्न होती है. सिलिका की धूल सांस के साथ खिंचकर फेंफड़ों के अंदर जाने से फेंफड़ों में छोटे छोटे नोड्यूल बन जाते हैं. सिलिका एक यौगिक है जो सिलिका व ऑक्सीजन के योग से बनता है जो खनिजों में पाया जाता है. इसे पीसने पर उस पत्थर के अत्यंत बारीक कण धूल के रूप में सांस के साथ जाकर फेंफड़ों में जम जाते हैं व फेंफड़ों की कार्यक्षमता को कम कर देते हैं. ये धूल के कण फेंफड़ों के ऊपर परत बना देते हैं जिस कारण ऑक्सीजन फेंफड़ों में शोषित नही हो पाती है और बाद में यह सिलिकोसिस नामक बीमारी के रूप में बदल जाती है.
सिलिकोसिस और प्रदूषण की समस्याओं का कानूनी प्रावधान
वास्तव में देखा जाए तो व्यक्ति को जानबूझकर प्रदूषण में धकेल देना और खतरनाक बीमारियों का तोहफा देना व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन है.
फैक्ट्री मजदूरों के हित में शासन द्वारा कारखाना अधिनियम 1948, खनन अधिनियम 1952, अंतरराज्यीय पलायन मजदूर कानून 1979, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम, असंगठित कामगार व सामाजिक सुरक्षा कानून आदि के अन्तर्गत यह कंनूनी अपराध हैं. इसके अतिरिक्त भी मध्य प्रदेश असंगठित कामगार कल्याण अधिनियम 2003, मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 1982, मध्य प्रदेश स्लेट पेंसिल कर्मकार कल्याण मॉडल, मप्र भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल जैसे कानूनों के दिशा निर्देश भी लागू हैं.
मानव अधिकार संरक्षण कानून के अन्तर्गत है मुआबजे पुनर्वाश का प्रावधान
मॉनव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अन्तर्गत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी यह अनुसंसा की हुई है की यदि सिलकोसिस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु होती है तो यह माना जाएगा की उसके जीवन के अधिकार की अवहेलना हुई है जिसके लिए वह पीड़ित मुआबजा और पुनर्वाश का अधिकारी होगा.
नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का हो हस्तक्षेप
प्रदूषण के अमानक स्तर और निरंतर पर्यावरण की हो रही अपूरणीय क्षति के चलते पूरे मामले में नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का हस्तक्षेप होना चाहिए. सबसे बड़ी बिडम्बना यह है की राष्ट्रीय हरित ट्राइब्यूनल एक हज़ार के स्टाम्प और फीस के साथ ही प्रकरण पर कार्यवाही करता है और दुनिया भर के टेक्निकल प्रोब्लम्स रहते हैं. जबकि जनहित याचिका के कांसेप्ट की तरह ही नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में भी मात्र सीधे प्रकरण की एक दो फ़ोटो के साथ समस्या को लिखित रूप से भेजे जाने अथवा ईमेल कर दिए जाने के साथ ही स्वतः संज्ञान ले लेना चाहिए.
इसलिए जनता के व्यापक हित से जुड़े हुए मामलों पर स्वतः संज्ञान और सीधे हस्तक्षेप का प्रावधान होना चाहिए इसमे यह नही देखा जाना चाहिए कि कोई शिकायतकर्ता बने और जब शिकायत आये तभी कार्यवाही हो। आखिर त्योंथर से मनगवां वाया सोहागी से गुजरने वालों में क्या कलेक्टर, डीएम, जस्टिस, सीएम, और प्रिंसिपल सेक्रेटरी नही होते होंगे? क्या वर्ष भर में ऐसे उच्चाधिकारी इस सड़क मार्ग से नही गुजरते होंगे? मानाकि यह बन्द एसी गाड़ियों में गुजरते होंगे लेकिन क्या आम जनता के दुख दर्द और तकलीफों को नही समझ सकते? समस्या तो यह है कि जब कुछ करना ही नही चाहते और इक्षाशक्ति ही नही है तो कहां से कुछ होगा?
संलग्न - संलग्न तस्वीरों में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा धूल डस्ट और प्रदूषण से भरे सोहागी सड़क मार्ग में घंटे भर खड़ा होकर वीडियो क्लिपिंग बनाई गई और साथ ही फ़ोटोग्राफ लिए गए जिसको समाज और मीडिया के समक्ष रखा जा सके और इस पर कार्यवाही हो सके.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139
Wednesday, June 29, 2016
रीवा के सहकारिता विभाग का फर्जीवाडा - प्रधानमंत्रीजी भारत सरकार के नाम खुला पत्र
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रीवा (म.प्र.) के सहकारिता विभाग में अनगिनत समस्याएँ हैं. शासन द्वारा योजनायों में तो कोई कमी नहीं है परन्तु सबसे दुर्भाग्य की बात वही है की जब तक प्रशासन के कर्मचारियों की मानसिकता में सुधार नहीं होगा तब तक कोई भी योजनायों की सार्थकता संभव नहीं है. सब कुछ मात्र कागजों तक ही सीमित रह जाएगा. हमने पिछले कुछ सालों में वास्तविक धरातल पर रहकर, वहां किसानों ग्रामीणों के बीच में जाकर उनकी समस्याओं को देख पर पूंछ्कर समझकर एवं अच्छी तरह से अनुभव करके शोध कर के देखा की किसानों के किसान क्रेडिट कार्ड (के.सी.सी.) में भारी फर्जीवाडा है, कोई तय पैमाना नहीं है की किस किसान को कितना लोन दिया जाता है. सब कुछ पंहुच पकड़ और जुगाढ़ तथा समिति प्रबंधकों सहकारी बैंकों के प्रबंधकों के ऊपर है कि आपकी जमीन का रकबा चाहे एक एकड़ हो, दस एकड़ अथवा पचास एकड़ - एक एकड़ वाले को भी एक लाख मिल सकता है, दस एकड़ वाले को भी और पचास एकड़ वाले को भी उतना ही. यह सब आपके जुगाढ़ और पंहुच पर निर्भर है. के.सी.सी. बनाने में भी पनवार समिति, डभौरा बैंक सहित कई समितियों में भारी फर्जीवाडा सामने आया है. कई समितियों में मृतकों के नाम पर के.सी.सी. (KCC) बने हुए हैं और राशि की फर्जी तरीके से आहरण हुआ है. सबकी शिकायतें भी हुई हैं परन्तु कोई सार्थक कार्यवाही नहीं हुई है. पनवार का उदाहरण यहाँ पर प्रत्यक्ष है.
(जरूरतमंद किसानों को कभी भी समय पर खाद बीज का न मिलना) इसी प्रकार जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित शाखा गढ़, लालगांव, मनगवां, डभौरा सहित कई सहकारी बैंकों से सम्बद्ध सेवा सहकारी समितियों में समिति प्रबंधकों द्वारा किसानो को कभी भी समय पर खाद-बीज की व्यवस्था नहीं की जाती. हमेसा समय निकल जाने के बाद समितियों में खाद-बीज आती है ऐसा बताया जाता है. यह प्रकरण पूरे रीवा जिले की ही सहकारी समितियों में हैं. पूरे खाद बीज की कालाबाजारी कर ली जाती है और किसान को गलत सूचना दे दी जाती है कि कोई खाद-बीज अभी ऊपर से नहीं मिला है. इस संदर्भ में भी शासन द्वारा जो निगरानी समितियों का गठन किया गया है जिसमे उस समिति क्षेत्र के अध्यक्ष उपाध्यक्ष और सचिव आदि होते है अर्थात जो संचालक मंडल होता है कई बार ऐसा देखा गया है की संचालक मंडल को बिना कोई जानकारी दिए ही समिति प्रबंधक फर्जी तरीके से समिति के रजिस्टर और खरीदी, बेंची, खाद-बीज आदि की फिलिंग कर देते है. हिनौती सेवा सहकारी समिति जो कि जिला सहकारी बैंक गढ़ के अंतर्गत आती है इसमें कुछ ऐसे तथ्य सामने आये है जिसमे अवनीश तिवारी निवासी मदरी द्वारा ऐसी शिकायत की गयी है कि उनको बिना जानकारी दिए योजनायों के नाम पर सहकारी समितियों में फर्जीवाड़े चल रहे है. अवनीश तिवारी हिनौती जिला सहकारी समिति के संचालक मंडल के एक सदस्यों में से एक हैं.
(विक्रेता द्वारा खाद्यान कि चोरी बता देना) खाद बीज के अतिरिक्त समिति प्रबंधकों और उनसे सम्बंधित सेल्समैंन को खाद्य विभाग द्वारा सरकारी रासन की दूकान की भी जिम्मेदारी दी गयी है. यह जिम्मेदारी भी समिति प्रबंधक और उनके सेल्समेन सही तरीके से नहीं निभा रहे हैं. लगभग रीवा जिले के सभी सहकारी बैंकों से सम्बद्ध सरकारी राशन की दुकानों में समय समय पर अनियमितता एवं चोरी की शिकायत सामने आती रहती है. चोरी और ऊपर से सीनाजोरी यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी. बिलकुल इसी तर्ज़ पर जब आम नागरिक जिसका की रासन कार्ड अथवा पात्रता पर्ची बनी है जब सेल्समेन के पास जाता है और अपने खाद्यान की मांग करता है तो उसे यह कहकर भगा दिया जाता है की खाद्यान ऊपर खाद्य विभाग से ही नहीं मिला है. पिछले माह का चोरी बताकर हितग्राही के साथ बदसलूकी की जाती है. जब हितग्राही अपनी शिकायत कहीं करता भी है तो खाद्य विभाग से लेकर सहकारिता विभाग तक पूरे प्रकरण की लीपापोती कर देते हैं. कई प्रकरण तो सम्बंधित एस.डी.एम्. एवं कलेक्टर कार्यालय में लंबित भी हैं जिस पर कोई न जुर्माना और न ही कोई सजा. इस प्रकार यह आम बात हो गयी है कि खाद्यान की चोरी बता दें और पूरे रासन का गोल मॉल कर दें. नईगढ़ी में कशियरगाँव-सेंगरवार, गंगेव ब्लाक में बांस, पडुआ और त्योंथर ब्लाक में कांकर की सरकारी रासन की दुकानों में आज तक गरीब हितग्राहियों को फ़रवरी, मार्च और मई माह २०१६ का खाद्यान नहीं दिया गया है.
(ऑडिट रिपोर्ट समय पर उपलब्ध न होना - ऑडिट रिपोर्ट में फर्जीवाडा) खाद्यान के अतिरिक्त भी अन्य कई बहुत महत्व पूर्ण बिंदु हैं जहाँ पर समितियों का भ्रष्टाचार देखा जा सकता है. प्रधानमंत्री जी आप क्या जानते हैं कि समितियों की ऑडिट रिपोर्ट भी फर्जी तरीके से बनाई जाती हैं, जी हाँ. सामान्यतया आज यह प्रचलन में है की यदि किसी भी समिति अथवा अन्य सरकारी अथवा गैर सरकारी संसथान की ऑडिट बनवाना है और धारा २७ के अंतर्गत प्रत्येक वित्तीय वर्ष में जमा करना है तो मात्र चार्टर्ड अकाउंटेंट की रिपोर्ट भर लगती है समिति की ऑडिट रिपोर्ट हो गयी तैयार. सी.ए. को जो भी फीस लगे (और वह मागे) वह देकर ऑडिट रिपोर्ट तैयार. हम आपको आमंत्रित करते हैं रीवा जिले की सभी सहकारी समितियों में. आप आयें और देखें की जिस वर्ष की ऑडिट रिपोर्ट सबमिट की जा रही है क्या उस वित्तीय वर्ष का रजिस्टर मेन्टेन है. नहीं. ज्यादातर समितियों के कोई रजिस्टर मेन्टेन नहीं रहते हैं. निश्चित तौर पर ऐसा पाया गया है की तीन तीन साल और उससे अधिक समय से रजिस्टर और कागज़ मेन्टेन नहीं रहते फिर भी समितियों की ऑडिट रिपोर्ट जमा हो जाती है. यह सब कैसे होता है? कृपया आप एक विशेष टीम का गठन कर CAG द्वारा समितियों और अन्य रीवा की सरकारी संस्थायों का ऑडिट करवाएं. और निश्चित तौर पर एक बड़ा घपला समितियों की कार्य प्रणाली पर और ऑडिट में सामने आएगा.
(किसानों की पासबुक और चैकबुक का समिति प्रबंधकों द्वारा जबरन अपने पास रखना और फर्जी एंट्री चढ़ा देना) ऑडिट के अलावा समितियों द्वारा सबसे ज्यादा गाँव के गरीब किसान की हत्या की जाती है. जी यह हत्या हंथियार से तो नहीं पर किसी प्रकार से हंथियार वाली हत्या से कम भी नहीं है. किसानों की पासबुक और चैकबुक समिति प्रबंधकों द्वारा अपने कार्यालय में रख ली जाती है. कई बार ऐसे प्रकरण जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित शाखा गढ़, लालगांव एवं डभौरा में आये हैं जहां किसानों की पासबुक रखकर उनके चैकबुक में मनमानी ढंग से एंट्री कर राशि का आहरण हो जाता है और किसान अशिक्षित एवं गरीब हितग्राहियों को इसका पता ही नहीं चलता. यह सब पारदर्शिता के आभाव के कारण होता है. किसानों एवं ग्रामीणों की पासबुक एवं चैकबुक समिति प्रबंधकों द्वारा क्यों रखी जाती हैं? इसी प्रकार किसी किसान हितग्राही को उसके के.सी.सी. (अंग्रेजी में बोलें तो KCC) अथवा सामान्य समिति के बैंक अकाउंट में कुल कितना व्याज लगा, कुल कितना प्रीमियम कटा, कुल कितनी सब्सिडी आयी, फसल बीमा की राशि आयी कि नहीं आयी - उसका क्या हुआ. तथा और भी इसी तरह के जो भी जमा और कटौती की जानकारी समिति प्रबंधक किसान एवं के.सी.सी. हितग्राहियों से साझा नहीं करते. समिति प्रबंधक हितग्राहियों को पूरी तरह से अँधेरे में रखता है. यह उक्त जानकारी पूंछने पर भी किसानों को साझा नहीं किया जाता. जबकि इन सबकी जानकारी किसानों को उनके पासबुक में एंट्री करके बैंक स्टेटमेंट के साथ समिति प्रबंधकों को देनी चाहिए. यहाँ तक की सूचना के अधिकार २००५ की धारा ६(१) और ६(३) के माध्यम से भी यदि जानकारी माँगी जाये तो भी समिति प्रबंधक और बैंक प्रबंधक देने से मना कर देते हैं. वह भामक तथ्यों का हवाला देकर कह देते हैं की समितियों और बैंकों में सूचना का अधिकार लागू नहीं होता. जबकि यह सत्य नहीं है. सूचना का अधिकार जनहित एवं सार्वजनिक किये जाने वाले सभी प्रकरणों में लगता है, समितियों और फसल बीमा वाली ऐसी कोई भी जानकारी ऐसी नहीं है जिससे किसी देश की सुरक्षा को खतरा हो अथवा कोई समस्या पैदा हो तो भला क्यों ऐसी जानकारी को साझा नहीं किया जाता?
(किसान फसल बीमा के राशि की जानकारी साझा न करना- किसान को पूरी तरह से अँधेरे में रखना) ऋणी और अरिणी किसानों के लिए फसल बीमा की जानकारी समिति प्रबंधक किसानों और हितग्राहियों से साझा नहीं करते. यह हाल पूरे रीवा जिले का है. जबकि नियमानुसार जब फसल बीमा की राशि आती है तो यह सभी समिति प्रबंधकों द्वारा सम्बंधित किसान के पासबुक में एंट्री करके दिया जाना चाहिए और सम्बंधित समितियों के नोटिस बोर्ड में भी यह सूचना चस्पा की जानी चाहिए जिससे सभी किसान हितग्राहियों को यह बात अच्छी तरह पता चले की उनको फसल बीमा की कितनी राशि मिली है. जिस प्रकार ओला-पाला और सूखा अकाल के हितग्राहियों की मुआबजा वितरण की सूची सार्वजनिक की जाती है वैसे ही फसल बीमा की भी सूची सभी संस्थायों द्वारा सूचना पटल पर साझा की जानी चाहिए.
(किसानों को उनके आहरण की रशीद न मिलना) कई मर्तबा यह भी देखा गया है की किसानों और अन्य अशिक्षित ग्रामीण हितग्राहियों को ग्रामीण क्षेत्र के समिति प्रबंधकों के द्वारा किसानों को उनके आहरण की कोई रसीद नहीं दी जाती है. यह कहकर टाल दिया जाता है कि तुम तो अपने गाँव के पास के ही हो कभी भी रसीद मिल जाएगी और रसीद की आवस्यकता ही क्या है. इस प्रकार कुछ प्रकरण ऐसे आये हैं जिसमे कुछ किसानों ने जो ऋण/क़र्ज़ समितियों से लिया था उसका प्रूफ अथवा रसीद न होने से वह दो का चार वसूल लिया गया और किसान ठगा का ठगा रह गया. यदि समय पर रसीद अथवा प्रूफ दिया जाता तो यह स्थिति निर्मित नही होती. यह किसान की कमजोरी और उसकी अशिक्षा की वजह से भी होता है क्योंकि अशिक्षा और संकोच बस वह समिति प्रबंधकों पर दबाब भी नही बना पाते. परन्तु प्रश्न यह उठता है की किसान अथवा ग्रामीण तो मानाकि अशिक्षित है परन्तु समिति प्रबंधक तो पढ़ा लिखा है. समिति प्रबंधक को तो पता है कि संवैधानिक नियम क्या है और क्या कहते है, ऐसे सभी समिति प्रबंधकों को सख्त निर्देश दिए जाने चाहिए कि वह सभी किसानों और हितग्राहियों की रसीद, चेकबुक, और पासबुक वह तुरंत किसान को देवें. ऐसे दोषी समिति प्रबंधकों और सहकारी समितियों के कर्मचारियों के ऊपर कठोर से कठोर दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए. ऋणी अथवा अऋणी किसानों की फसल बीमा की जो भी राशि आये उसे छमाहीवार नोटिस बोर्ड में चस्पा की जानी चाहिए. सभी कृषकों को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए तथा यह जानकारी सभी समितियों के संचालक मंडल से भी साझा की जानी चाहिये.
इस प्रकार मैं भारत के प्रधानमंत्रीजी एवं मध्य प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्रीजी को उपरोक्त सभी विन्दुओं पर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा और आग्रह एवं मांग करूंगा की उक्त सभी बिन्दुओं को गंभीरता से लें और हमारे रीवा क्षेत्र सहित अन्य क्षेत्रों के किसानों और हितग्राहियों की समस्याओं का समुचित निराकरण करवाएं. यह उक्त समस्याएँ मात्र रीवा जिला के किसानों की नहीं हैं बल्कि सामान्यतया हर कम विकशित जिले में मिल सकती हैं. हमारा अनुरोध है की समस्या के समाधान की दिशा में आप सार्थक एवं दूरगामी प्रयास करें, मात्र आश्वासन एवं कागज़ी कार्यवाही करके फुर्सत न हो जाएँ.
नोट/टीप - इसके अतिरिक्त निम्नलिखित प्रपत्र सहकारिता विभाग म.प्र. शासन भोपाल बल्लभ भवन, श्रीमान अध्यक्ष मध्य प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल, PMO PG Portal में ऑनलाइन तथा PMO नई दिल्ली के नाम भी हार्ड कॉपी में भेजा जा चुका है जिसकी की कार्यवाही की जानकारी अभी तक प्राप्त नहीं हुई है. कृपया देखें नीचे भेजे गए पत्र/शिकायत/आवेदन की प्रतिलिपि -
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