Monday, April 16, 2018

वन समिति के मानसेवियों के मान का कोई नही सम्मान, इनकी सालों से नही मिली पेमेंट (मामला ज़िले की सिरमौर रेंज अंतर्गत आने वाली पनगड़ी, देउर, सर्रा, घुमा सहित ज़िले की सैकड़ों वन समितियों का)

दिनांक 16 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा मप्र - शिवानन्द द्विवेदी)

     ज़िले में एक बार फिर वन विभाग में कार्यरत मानसेवी कर्मचारियों के शोषण का मामला प्रकाश में आया है. अभी पिछले दिनों पनगड़ी ग्राम वन समिति के 25 सौ रुपये मात्र पाने वाले मानसेवी चौकीदारों रामसिया साकेत एवं राघुवेन्द्र पांडेय निवासी पनगड़ी द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी के समक्ष अपनी व्यथा रखी गई थी की उनकी पिछले 14 माह के पेमेंट लंबित है.

    अभी पुनः वही समस्या सर्रा ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार अयोध्या प्रसाद केवट द्वारा बताई गई है जिसमे बताया गया की अयोध्या को मई जून और जुलाई 2017 की पेमेंट अब तक लटका के रखा गया है. अयोध्या ने आगे बताया की साहब बताईये हमे रोज का 100 रुपये से भी कम मिलता है और हमारे बाल बच्चे भूखे मर रहे हैं. वन अधिकारी कहते हैं की काम करो. अब ऐसे में कैसे काम होगा. 

   इसी प्रकार एक अन्य मामले में देउर और घूमा वन समिति के भी मानसेवियों ने अपनी समस्या रखी है और बताया गया की उन्हें भी पिछले 2 साल से मात्र 25 सौ की दी जाने वाली पेमेंट नही दी गई है. देउर वन समिति के पिछले पंचवर्षीय में रह चुके अध्यक्ष दिलीप सिंह ने बताया की उनके समिति के कर्मचारी मथुरा सिंह को पिछले दो साल से पेमेंट नही दी गई है.

   बिना चुनाव ही चल रही  पनगड़ी और देउर वन समिति 

    प्राप्त जानकारी के अनुसार बताया गया की पनगड़ी और देउर वन समिति का चुनाव पिछले 15 वर्ष से नही हुआ है. जो पूर्व के समिति अध्यक्ष थे वही जबरन पद पर बने हुए हैं. इस संबंध में जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा वन विभाग के रेंजर और डीएफओ से जानकारी चाही गई और साथ ही सीएम हेल्पलाइन में भी कंप्लेन दर्ज करवाई गई तो उसके निराकरण में बड़ा ही अजीब जानकारी दी गई जिसमे कहा गया की वन विभाग ने तो अपनी प्रक्रिया पूर्ण कर दी है मात्र पंचायतें ही चुनाव नही करवा रही हैं. अब  इसी खेल में वन समिति का चुनाव पिछले 15 वर्षों से लटका पड़ा है. गौरतलब है की सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाली वन समितियों में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद के चलते पूरा वन एवं पर्यावरण समाप्ति की कगार पर है. जंगल की रखवाली का जिम्मा जिन महानुभावों के सर पर है वह मात्र 25 सौ रुपया पाने वाले ग्राम वन समिति के मानसेवी हैं अन्यथा जो नियमित चौकीदार मुंसी और डिप्टी आदि हैं वह तो बन्द वातानुकूलित कमरों और घरों में ऐश फर्मा रहे होते हैं.

लाल गांव उप वन परिक्षेत्र का डिप्टी रेंजर बृजभूषण रहता है अनुपस्थित, सिरमौर रेंजर बघेला ने काट दी उसकी तीन माह की पेमेंट-

    मात्र इसी भररेशाही के चलते अभी हाल ही में दौरे के दौरान सिरमौर रेंज अफसर बघेला ने लालगांव उप वन परिक्षेत्र के अधिकारी कर्मचारियों की पेमेंट काट दी और तीन महीने तक वंचित कर दिया. जिसकी की शिकायत रीवा की स्टाइल में यह सभी लोकल वन कर्मचारी अधिकारी नेताओं से करते घूम रहे हैं, प्राप्त जानकारी में बताया गया की यह सभी नियमित और सरकारी अधिकारी कर्मचारी जिनकी पेमेंन्ट काट दी गई है वह विधायक, सांसद और मंत्रियों से जोर जुगुत लगाने में लगे हैं और खूब सिफारिश करवा रहे हैं. लेकिन चूंकि बाघेला ने इन सबको अनुपस्थित पाया तो इन सबको लटका दिया और तीन महीने की इनकी पेमेंट को ही काट दिया. 

    यह बिल्कुल उचित भी है चूंकि जब सिरमौर वन रेंज में आग लगी थी तब भी यह सरकारी और नियमित अधिकारी कर्मचारी अपने काम में नही थे. जब आग ने पूरे जंगली क्षेत्र का पूरी तरह से सफाया कर दिया तब जाकर इनका रता पता चला. 

    इस प्रकार अनुशासनहीनता और अनुपस्थिति इनका पेशा है. कई मर्तबा तो कई बार डीएफओ और एस डी ओ आदि को इन्होंने गालियां तक दी है और कहा है की कर लें जिसको जो करना है हम तो ऐसे ही करेंगे.

   इस प्रकार समझा जा सकता है की वन विभाग की भररेशाही इतनी बढ़ गई है की इनके ऊपर किसी कार्यवाही का प्रभाव ही नही पड़ रहा है. 

    ऐसे में यदि मात्र 25 सौ रुपये पाने वाले मानसेवी वन चौकीदारों की पेमेंट भी सालों साल नही मिलेगी तो वन की सुरक्षा व्यवस्था मात्र भगवान भरोसे ही चलेगी.

संलग्न - 1) सिरमौर रेंज अंतर्गत आने वाले पनगड़ी वन समिति के दो मानसेवी चौकीदार रामसिया साकेत और रागावेंद्र पांडेय की फ़ोटो.

  2) सिरमौर रेंज में ही देउर वन समिति के अध्यक्ष दिलीप सिंह और मथुरा सिंह की फ़ोटो. मथुरा को 2 साल से पेमेंट नही मिली.

   3) सर्रा ग्राम वन समिति के मानसेवी चौकीदार अयोध्या केवट की फ़ोटो जिसे मई जून जुलाई महीने की पेमेंट नही मिली है।

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, 

मोबाइल - 07869992139, 09589152587

Sunday, April 15, 2018

चलिए नही बेधड़क, क्योंकि मैं हूँ बांस से हिरुडीह पी डब्लू डी सड़क (मामला गंगेव जनपद अंतर्गत आने वाली बांस से हिरुडीह वाया पुरवा 4 दशक पुरानी पी डब्लू डी सड़क का जिसमे मोरम तक नही पड़ी)

दिनांक 15 अप्रैल 2018, स्थान - गंगेव, रीवा मप्र

(कैथा, रीवा मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

     आज स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी भारत के ग्राम के नागरिकों का जीवन स्तर सुधरने का नाम नही ले रहा है और इसके पीछे मुख्य कारण हैं उन्हें मूलभूत मानवाधिकारों का उपलब्ध न हो पाना और मानवाधिकारों से आम जन मानस को वंचित किया जाना।

    बिजली, पानी, सड़क, आवास, स्वास्थ्य एवं अच्छी शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक सरकार द्वारा उसके सभी नागरिकों को उपलब्ध करवाना उस देश की सरकार के संवैधानिक कर्तव्य होते हैं परंतु भारत में व्यापक भष्ट्रचार और प्रशासनिक उदासीनता के चलते आज आम जनमानस इन मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित हैं. यद्यपि कुछ ग्रामों को जोड़ने के लिए पीएम सड़क के प्रावधान चल रहे हैं जिसमे ग्रामों के मुख्य मार्ग को जोड़ने का काम तो किया जा रहा है परन्तु समय के हिसाब से नाकाफी है।

  4 दशक पुरानी बांस से हिरुडीह वाया पुरवा पी डब्लू डी सड़क आज भी बनी है कच्ची, नही है कोई सुध लेने वाला, आम जनता हैरान परेशान

    मानवाधिकार के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा अभी पिछले दिनों सामाजिक समस्याओं और प्रशासनिक कार्यों का भौतिक सत्यापन करने और अवलोकन करने के उद्देश्य से बांस से हिरुडीह एवं पुरवा की तरफ रुख किया गया जिसमे आम जन से संपर्क स्थापित किया गया तो ग्राम पुरवा निवासी दिव्यांग रामायण सिंह, निरंजन सिंह, किसान अरुण सिंह एवं देवेंद्र प्रताप सिंह, अधिवक्ता बसंत प्रताप सिंह, छात्र आदित्य सिंह सहित कुछ माताओं बहनों के द्वारा जो जानकारी प्राप्त हुई वह भारतीय लोकतंत्र के बहुत पीछे होने या यूं कहें कि एक तरह से नाकाम होने की ही दास्तान बयां करती है. 

      पुरवा निवासी दिव्यांग रामायण सिंह के द्वारा बताया गया की उनकी यह सड़क वर्ष 1981 में पी डब्लू डी के द्वारा बनाई गई थी जिसमे थोड़ा सा मोरम का काम किया गया था लेकिन तब से इस सड़क मार्ग में न कोई मिट्टी और न ही मोरम का काम किया गया है. रामायण सिंह ने बताया की आज यदि थोड़ी भी बारिस हो जाए तो इस सड़क में स्थित गड्ढों में पानी भर जाता है जिससे आम जन को निकलना बड़ा ही मुश्किल पड़ जाता है. यदि किसी को इमरजेंसी मेडिकल फैसिलिटी की आवश्यकता पड़ जाए अथवा कोई महिला का डिलीवरी का केस आ जाए तो उसे खाट पर उठाकर ले जाना पड़ता है. पुरवा निवासी किसान निरंजन सिंह और अरुण प्रताप सिंह द्वारा बताया गया की आज 4 दशक के आसपास हो रहा है तो कैसे सम्भव है की पी डब्लू डी सड़क की यह स्थिति  बनी हुई है? क्या पी डब्लू डी सड़क के लिए इतने दशकों में कोई बजट नही आया होगा? वहीं छात्र आदित्य प्रताप सिंह द्वारा बताया गया की बरसात के मौसम में हमे स्कूल जाने में भारी दिक्कत का सामना करना पड़ता है. सड़क में 100 मीटर आगे इशारा करते हुए बताया की सड़क में अब मोरम भी नही है अतः कीचड़ होने से साईकल से लेकर सभी वाहन फस जाते हैं जिससे बरसात में पैदल तक चलना मुश्किल होता है.

    बांस से हिरुडीह वाया पुरवा सड़क को पीएम सड़क बनाये जाने की माग 

   ग्राम बांस, पुरवा और हिरुडीह की महिलाओं ने जानकारी दी की उन्हें विशेष तौर पर भारी तकलीफों का सामना करना पड़ता है अतः सभी चाहते हैं की आज जैसे सभी प्रधानमंत्री सड़कें बनाई जा रही हैं उसी प्रकार इसे भी पीएम सड़क कर दिया जाए जिससे इसका जल्द ही निर्माण हो जाए. सभी ने कहा की पी डब्लू डी की सड़कों में व्यापक अनियमितता होने के कारण ही उनकी यह सड़क आज 4 दशक बाद भी नही बन पायी है. 

   नईगढ़ी माइक्रो इरीगेशन नहर परियोजना का कार्य भी प्रगति पर 

    दौरे के दौरान पाया गया शासकीय माध्यमिक शाला बांस के आगे और पुरवा ग्राम के बीच में नहर का कार्य भी प्रगति पर है जिसमे खुदाई का काम प्रारम्भ किया गया है. जानकारी बाणसागर नहर मंडल संभाग रीवा के अधीक्षण यंत्री श्री शर्मा से जानकारी प्राप्त हुई की यह नहर आसपास के के पटवारी हल्कों जिसमे मनगवां का इटहा, सिरमौर का हिनौती और त्योंथर का जमुई एवं कटरा हल्का आदि सामिल है वर्ष 2020 तक नहर से जोड़ दिया जाएगा. पानी की ऊंचाई ज्यादा होने के कारण उद्वहन और दबाब पद्धति से पानी की सप्लाई किये जाने का प्रावधान है जिसमे माइक्रो इरीगेशन तकनीक द्वारा जमीन के अंदर से पाइप डालकर गांव गांव में पानी सप्लाई किये जाने का प्रावधान है. यह प्रयाश भी सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा पिछले वर्षों किया गया था जिसमे मानवाधिकार आयोग मप्र भोपाल के संज्ञान के चलते आज कार्य में तेजी आई है और किसान खुशहाल होगा. 

संलग्न - बांस के हिरुडीह वाया पुरवा पी डब्लू डी सड़क की स्थिति एवं इसकी दुर्दशा दिखाते ग्राम के नागरिकगण. मामला गंगेव ब्लॉक, रीवा मप्र का.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र,

मोबाइल - 7869992139, 9589152587

Friday, April 13, 2018

15 वर्ष से पानी की टंकियों में भरा है हवा (मामला गंगेव जनपद की कई पंचायतों में 80 फीसदी से अधिक बंद हैं हैंडपम्प, नलजल योजनाएं भष्ट्रचार की भेंट चढ़ी, वहीं बांस पंचायत की 50 हज़ार लीटर क्षमता की बंद पड़ी पानी की टंकी, और हिरुडीह पंचायत में बन्द पड़े नलजल योजना और 90 फीसदी बन्द पड़े हैंडपम्प की)

दिनांक 14 अप्रैल 2018, स्थान - गंगेव जनपद, रीवा मप्र

(कैथा, रीवा, शिवानन्द द्विवेदी

   आज भारतीय लोकतंत्र 70 वर्ष से अधिक का हो रहा है. हर वर्ष भारतीय लोकतंत्र की वर्षगांठ मनाई जाती है. याद दिलाया जाता है की हमे इतने सदियों की गुलामी के बाद आजाज़ी मिली. इस आजादी को प्राप्त करने में हमारे देश के वीर शहीदों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बलि वेदी में आहुति दी. 

    यह सब तो ठीक है पर क्या यह भी कभी गंभीरता से विचार किया गया की आज इतने दसकों के बाद भी आखिर मूलभूत मानवाधिकारों की समस्याओं को हल क्यों नही किया गया? क्या मूलभूत अधिकारों की समस्या से स्वतंत्रता प्राप्त हुई है? प्रकाश के लिए बिजली, पीने के लिए स्वच्छ जल, सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु, रहने के लिए उचित आवास, जीवित रहने के लिए भोजन यह प्रत्येक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए देश की आम जनमानस को हर हाल में उपलब्ध करवाना उस देश के संवैधानिक कर्तव्य होते हैं. 

     आज जब 21 वीं सदी का दौर चल रहा है और मानव अपने विकास गाथा का वर्चस्व धरती से लेकर अम्बर तक स्थापित करना चाह रहा है. वर्चस्व की लड़ाई के लिए महायुध्य हो रहे हैं. वैज्ञानिक अविष्कारों ने पुरानी सभी परिभाषाएं और मान्यताओं को बदल दिया हैं. भौतिक विज्ञान नित नए आयाम तलास रहा है. व्यक्ति धरती पर जीवन से थक हारकर अन्यत्र ग्रहों में जीवन पानी हवा की तलाश कर रहा है, ऐसे में यह सोचना पड़ेगा की यदि मॉनव इस धरती रूपी माता के गोद जिसमे पला बढ़ा और खेला खाया उसमे यदि जीवन सुचारू रूप से नही चला पाया तो बड़ी सर्मिन्दगी की बात होगी की दूसरे अजनबी ग्रहों जिनके की जीवन के पैमाने भी नही तय हुए हैं उनमे कैसे शांति और जीवन तलाश पायेगा. यह सब देखकर बड़ा ही अजीब लगता है की मृगतृष्ना के पीछे दौड़ने वाला यह मानव आज अपना ही अंत करने में तुला है. आज दुनिया कई मायनों में विनाश की कगार पर खड़ी है. अगले महायुध्य की ध्वनियां स्पष्ट सुनाई दे रही हैं.

धरती का पानी बर्वाद कर ढूँढ़ने चले मंगल और चंद्रमा पर 

   बड़ी अजीब दास्तान है की आज धरती पर जल प्रबंधन कर पाने में असफल सरकारें अपनी प्यासी मानवता के लिए मानवाधिकारों में से एक स्वच्छ पीने का पानी उपलब्ध करवा पाने में असफल हैं और अन्यत्र ग्रहों चंद्रमा, मंगल, आदि में पानी और जीवन की तलास के लिए अरबों खरबों बर्वाद कर रही हैं. यह किसी एक देश के हाल नही हैं बल्कि आज ज्यादातर विश्व के देशों में फैशन बन चुका है की चाहे उस देश में खाने के लिए दाने न हो लेकिन अपना वर्चस्व बताने के लिए न्यूक्लिअर और एटॉमिक प्रोग्राम में पानी की तरह पैसे और ह्यूमन रिसोर्स बहाने के लिए पर्याप्त समय और पैसा है. चाहे उस देश में भुखमरी चल रही हो, सब मर रहे हों लेकिन देश और विदेश से आयातित हथियार अवस्य होने चाहिए. विश्व के समस्त देशों के पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट पावर को जोड़ दिया जाए तो ये ऐसी ताकतें बन चुकी हैं की चाहें तो यह पूंजीपति एक एक देश को गोद लेकर सालों साल उनकी आम जनमानस को खिला पिला सकते हैं लेकिन ऐसा कुछ भी नही करेंगे जो भी करेंगे वह मात्र कुछ ऐसा करेंगे कि उस पैसे और संपदा एवं मैन पावर का ऐसा उपयोग करेंगे जिससे ज्यादातर ऐसे पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट पावर का वर्चस्व स्थापित हो. बिल गेट्स, ज़ुकेरबर्ग, टाटा और अजीम प्रेमजी जैसे कम ही लोग होंगे जो अपना पैसा चैरिटी और मॉनव की सेवा में लगाना चाहेंगे.

पूंजीपति और कॉर्पोरेट वर्ल्ड को मानवाधिकार संरक्षण में आगे आना चाहिए

     यद्यपि यह कहने और सुनने में बड़ा अटपटा सा लग सकता है लेकिन यदि विश्व के पूंजीपति और कॉर्पोरेट वर्ल्ड के लोग अपना थोड़ा थोड़ा भी योगदान चैरिटी के लिए देने लगे तो काफी हद तक विश्व की मूलभूत समस्याओं से निजात मिल जाएगा. सभी गरीब कमज़ोर और नीडी लोग अपनी मूलभूत अवश्यकताओं की पूर्ति कर पाने में सफल होंगे जिससे वह अपने जीवन को रोज़ की रोटी, कपड़ा, पानी, खाना, स्वास्थ की जद्दोजहद को छोड़कर अपने जीवन को सार्थक बनाने में लगा पाएंगे और इस जीवन को समझ पाएंगे. आज पूरे विश्व की 75 प्रतिसत से अधिक की आवादी अपने रोज़ की जीवन की जद्दोजहद में ही पड़ी हुई है, उसे अपने मॉनव होने का एहसास भी नही है. इन ज्यादातर लोगों के लिए अपने रोजमर्रा की अवश्यकताओं की पूर्ति ही इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य है.

   देश दुनिया की बातों को विराम देते हैं और आते हैं मप्र के रीवा में और देखते हैं की एक जिले के ग्रामों की समस्या कैसे इस पूरे देश और यहां तक की पूरे विश्व के लिए एक प्रोटोटाइप है.

    भारत में भष्ट्रचार का कोई अंत नही है. यहां तक कि लोग आज यह भी कहने लगे हैं की भारत की आबोहवा में भी अब भष्ट्रचार फैल चुका है. जो भी हो पर इसमे कोई दो राय वाली बात नही की मानवीय अवश्यकताओं के साथ ही समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं.

बांस पंचायत में 15 वर्ष से बनी पानी की टंकी में भरा है हवा, हैंडपम्प उगल रहे आग

     अभी पिछले दिनों पर्यावरण एवं मानवाधिकार के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी द्वारा ज़िले के गंगेव ब्लॉक अंतर्गत कई पंचायतों में भ्रमण किया गया और पानी संबंधी जमीनी हकीकत का व्योरा लिया गया. जो सच्चाई सामने आयी वह भारतीय परिवेश के हिसाब से ज्यादा चौकाने वाली नही थी. 

    ग्राम बांस के रोहित कुमार मिश्रा, शिवम मिश्रा, राजू तिवारी, अरुणेंद्र गौतम, सुमित्री सेन, जोधाबाई सेन, रविराज साकेत, अनुराग मिश्रा, आदि रहवाशियों ने बताया की ग्राम में 50 हज़ार क्षमता की पानी टंकी आज से 15 वर्ष पहले बनाई गई थी जिसमे मात्र 10 दिन के लिए ही पानी भरा गया था और उसके बाद कभी इस टंकी में पानी देखने को नही मिला. रोहित मिश्रा ने बताया की इस विशाल पानी टंकी को हमारे ग्राम में बनवाने के पीछे शासन प्रशासन की क्या मंशा रही होगी उन्हें आज तक समझ नही आया क्योंकि जब से पानी की टंकी बनाई गई है तब से लेकर आज तक न कहीं पाइप लाइन का पता है और न ही किसी रखरखाब करने वाले कर्मचारी का. शिवम मिश्रा और सुमित्री सेन द्वारा बताया गया की इस पानी की टंकी में जब एकबार पानी भरा गया था तब इसमे लीकेज था और पूरा पानी बह गया था. आज जब देखा गया तो लोगों ने पानी के टंकी के नीचे अपने अपने माल मवेशी बांध दिए थे. 

     रोहित और शिवम द्वारा जानकारी दी गई की उनके ग्राम में सैकड़ों नलकूप पंचायत, विधायक, और सांसद आदि निधियों से बनाये गए हैं लेकिन 90 प्रतिशत से अधिक हैंडपम्प आज हवा और आग उगल रहे हैं. हैंडपम्प मैकेनिक से लेकर पंचायत कर्मियों और सरपंच को जानकारी दी गई लेकिन समस्या का समाधान नही किया गया.

   सभी रहवाशियों द्वारा एक स्वर में बताया गया की लोग बहुत परेशान हैं और बूंद बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं और कोई सुनवाई नही हो रही है.

    शिवम और रोहित ने आगे बताया की उन्होंने यह जानकारी यहां से चुने गए जिला पंचायत सदस्य को भी दी थी लेकिन जिस दिन से चुनाव सम्पन्न हुआ है उस दिन से आज तक वोट और पद प्राप्त करने के बाद कोई भी जन प्रतिनिधि नही दिखा है जब वोट लेना होगा तो फिर मुह उठाये दौड़े चले आएंगे और बोलेंगे की हमे वोट की भीख के दो.

बांस ग्राम में ताला खुला पड़ा हुआ है पंप हाउस, स्टार्टर और इलेक्ट्रिक समान में लग गया जंग

    ग्राम बांस के राजू तिवारी, शिवम मिश्रा और रोहित मिश्रा ने पंप हाउस के अंदर घुसकर दिखाया जिसमे कोई ताला नही लगा हुआ था. एक खुला हुआ ताला वहीं पर लटक रहा था. रहवाशियों ने पंप हाउस के अंदर घुसकर दिखाया तो वहां का नजारा देखते ही बनता था जिसमे मोटर स्टार्टर, केबल, टूटे फूटे इलेक्ट्रिक के सामान आदि बिखरे पड़े थे जो स्पष्ट रूप से पंप हाउस के काम न करने और वहां की अव्यवस्था को दिखा रहे थे.

   बांस पानी की टंकी से संबंधित पंप हाउस के पीछे एक हैंडपम्प भी लगा हुआ मिला जो बनने के बाद कभी चला ही नही. हैंडपम्प चलाकर दिखाया तो उसका हैंडल जम्प कर रहा था.

रीवा पी एच ई कार्यपालन यंत्री शरद सिंह को जानकारी नही

  जब बांस की पानी की टंकी की दुर्दशा के विषय में ज़िले के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन यंत्री शरद सिंह से बात की गई तो उनका कहना था की इस पानी की टंकी के विषय में उन्हें कोई जानकारी नही है. कार्यपालन यंत्री द्वारा कहा गया की चूंकि जानकारी दी जा रही है तो अनुविभागीय अधिकारी एवं उपयंत्री को भेजकर दिखवाएंगे. 

    50 हज़ार से अधिक क्षमता वाली पानी की टंकी की जानकारी ज़िले के कार्यपालन यंत्री को न होना एक अचंभा ही है. हाँ यह माना जा सकता है कि छोटी नलजल योजना संबंधी पानी की टंकी और सामान्य नलकूप की जानकारी का न होना समझ आता है पर आज जब पिछले कई सप्ताह से ज़िले में निरंतर पानी की भीषण समस्या को अखबार और विभिन्न मीडिया स्रोतों और कंप्लेन के द्वारा बताया जा रहा है ऐसे में इन अधिकारियों को चाहिए की पूरे ज़िले के डेटा को इकठ्ठा कर उसमे युध्यस्तर पर कार्यवाही कराएं.

  हिरुडीह पंचायत में भी भीषण जल संकट, नलजल योजना में पानी के स्थान पर आम जनता को मिल रही है हवा और आग

    गंगेव ब्लॉक की हिरुडीह पंचायत का किस्सा भी बांस पंचायत से कुछ ज्यादा अलग नही. दिनाँक 13 मार्च को शुबह लगभग 9 बजे के आसपास सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा हिरुडीह पंचायत की समस्याओं के सिलसिले में दौरा किया गया तो वहां को स्थिति दिखी वह भी आज पंचायती राज व्यवस्था की दुर्दशा को ही बया करती है. 

   हिरुडीह के दो टोलों का दौरा किया गया और वहां से जानकारी प्राप्त की गई जिसमे हिरुडीह निवासी रामगोपाल पांडेय, रामायण प्रसाद पटेल, राजेश पटेल, भगवानदीन पटेल, रामनिवास दुबे, रामलाल विश्वकर्मा, राजमणि पांडेय, विष्णुकांत शुक्ला आदि द्वारा बताया गया की लगभग तीन सरपंची पहले अर्थात लगभग 10-12 साल पूर्व उनकी पंचायत में नलजल योजना के लिए चार पानी की कम और मध्यम क्षमता वाली पानी की टंकियां बनाई गईं थी और कुछ पाइप लाइन भी बिछाई गई थी लेकिन कभी कोई पानी सप्लाई नही की गई है. सभी चारों पानी की टंकियां मात्र शोपीस बनकर खड़ी हुई हैं और आम जनता बूंद बूंद पानी के लिए तरस रही है. 

   इन रहवाशियों द्वारा बताया गया की इन्होंने कई बार सरपंच, सचिव, विधायक, सांसद, ज़िला एवं जनपद सदस्यों और अधिकारी कर्मचारियों सहित लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को भी सूचित किया गुहार लगाई लेकिन कोई कार्यवाही नही हुई, हाँ जब भी बात की जाती है तो अधिकारियों द्वारा बताया जाता है की काम हो जाएगा. पर आज दसक भर बीत रहे हैं लेकिन कुछ हुआ नही है. रहवाशियों द्वारा बताया गया की उनके गांव में सभी हैंडपम्प खराब पड़े हैं, ज्यादातर में पाइप ही नही पर कोई सुनने देखने वाला नही. बताया गया की कुछ हैंडपम्प में जलस्तर भी काफी नीचे चला गया है.

   बताया गया की गंगेव जनपद अंतर्गत हिरुडीह पंचायत में 6 ग्राम आते हैं जिनमे हिरुडीह, जरहा, कोठार उन्मूलन, मड़फा, कोती, बगहिया सामिल हैं. इन सभी ग्रामों सहित पूरे पंचायती क्षेत्र की कुल आवादी लगभग 8 हज़ार से ऊपर है. और पूरे पंचायती क्षेत्र के 80 प्रतिशत से अधिक नलकूप खराब पड़े हैं. 

हरिजन बस्ती हिरुडीह के लोग पानी के लिए परेशान, दोनो नलकूप खराब और नलजल योजना की टंकी में कभी नही पहुचा पानी, पाइप और र खरखाब का पैसा भी खा गए भष्ट्राचारी

   हिरुडीह ग्राम में आगे चलने पर पुरवा वाली सड़क मार्ग से जुड़ी हिरुडीह की हरिजन बस्ती आती है जहां पर लगभग 50 घर हरिजन निवास करते हैं जिनकी आवादी लगभग 200 के आसपास है. इनके घर के पास दो नलकूप खोदे गए थे जो बिल्कुल कार्य नही कर रहे हैं. दोनो नलकूप पानी नही दे रहे. एक नलकूप अभी पिछले वर्ष 2017 में ही बनाया गया है लेकिन उसका प्लेटफॉर्म भी उखड़ा मिला और जब से बनाया गया है तब से उसमे बूंद में पानी नही निकला. सभी हरिजन महिलाओं और पुरुषों ने सरपंच और पंचायत विभाग पर आरोप लगाया की उनकी समस्या की कोई सुनवाई नही की जा रही है. 

     वहीं पास स्थित बगीचे के पास 50 मीटर दूरी पर एक छोटी किश्म की पानी की टंकी भी दिखी जिसमे कभी पानी नही आया. हरिजनों ने बताया की इस पानी की टंकी में पाइप लाइन भी सप्लाई नही की गई. हरिजनों ने बगीचे के पास स्थित मेढ़ की तरफ इशारा करते हुए बताया की टंकी से 50 मीटर दूर तक कभी पाइप लाइन डाली गई थी लेकिन उनके पानी की टंकी में पाइप नही जोड़ी गई. हरिजनों ने आगे जानकारी दी की बाद में लगाई गई पाइप भी खोदकर बेंच ली गई है.

     हिरुडीह के हरिजनों ने आरोप लगाया की उनकी समस्याओं की कोई सुनवाई नही हो रही है. जब वोट माँगना होता है तो प्रत्यासी उनके घर में आएंगे और खाट के नीचे बैठ जाएंगे और उनका पैर दबाकर कहेंगे की हमे बस आप लोग एक बार मौका दे दो हम आपके जीवन को बदल देंगे. अब हाल यह हैं की हर पंचवर्षीय व्यतीत हो रही है लेकिन ग्रामीण परिवेश में जीवन यापन करने वाले हरिजन आदिवशियों के जीवन में आज तक कोई विशेष बदलाव देखने को नही मिले है.

     सभी लोगों ने एक स्वर में माग की है कि उनकी मूलभूत समस्याओं का और विशेष तौर पर गर्मी में पानी कि समस्या का समाधान किया जाए. उनकी पानी की टंकी को प्रारम्भ कर उसमे पाइप लाइन डाली जाए और घर घर नलजल योजना के माध्यम से पानी दिया जाए।

हिरुडीह हरिजन बस्ती में बिजली, आवास जैसी मानवाधिकार की भी हैं समस्याएं

    अमृत लाल साकेत एवं उनके आसपास बसे सैकड़ों हरिजन परिवारों ने बताया की उन्हें प्रधानमंत्री आवास का लाभ दिया गया था लेकिन सहायक सचिव और सरपंच द्वारा उन्हें पीएम आवास् की पूरी राशि नही दी गई है और मात्र 1 लाख 15 हज़ार ही दी गई है. उनकी मनरेगा की मजदूरी की राशि और शौचालय की राशि नही दी गई है.

    सभी हरिजनों ने बताया की उनके घरों में बिना बल्ब जलाए ही बिजली के अनियंत्रित बिल भेजे जा रहे हैं. हरिजनों ने बताया की उनके कुछ घरों में तो मीटर लगा है परंतु सभी के घर मीटर भी नही है. बताया गया की बिना मीटर रीडिंग ही बिजली के मनमुताबिक बिल भेजे जा रहे हैं. जिसकी की कई बार शिकायत भी मौखिक एवं सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से की गई है पर औसत और ज्यादा बिलिंग में कोई परिवर्तन नही हुआ है. सभी ने बताया की उनके घरों में उजाला योजना के 9 या 10 वाट के एक या दो तक बल्ब जलते हैं और कोई दूसरे इलेक्ट्रिक सामान नही हैं फिर भी इतना अधिक बिल क्यों भेजा जा रहा है.

   इन समस्याओं पर सभी ने एक स्वर में कार्यवाही की माग की है.

संलग्न - बांस और हिरुडीह पंचायत की बन्द पड़ी नलजल योजना की टंकियां, खराब पड़े पाइप की कमी के कारण पड़े हैंडपम्प और साथ ही बांस और हिरुडीह पंचायत के रहवासी और लोग जिनकी की समस्याओं का कोई समाधान नही किया जा रहा है. मामला गंगेव जनपद की पंचायतों का. 

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,रीवा मप्र,

मोबाइल - 7869992139, 9589152587,

अगडाल से कैथा प्रधानमंत्री सड़क में धांधली का दौर जारी, मात्र 21 दिन के भीतर बनी सड़क ने दे दिया जबाब, सड़क कई स्थानों से हुई छतिग्रस्त (मामला गंगेव ब्लॉक अंतर्गत आने वाली 9.4 किमी अगडाल-लौरी से कैथा प्रधानमंत्री सड़क का)

दिनांक 12 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा मप्र, शिवानन्द द्विवेदी) 

     ज़िले के गंगेव ब्लॉक और मऊगंज प्रधानमंत्री सड़क अंतर्गत आने वाली बहुचर्चित अगडाल-लौरी से कैथा 9.4 किमी पीएम सड़क जिसकी की कुल लॉगत 3 करोड़ 33 लाख 43 हज़ार रुपये के आसपास बतायी जा रही है में विभाग की उदासीनता और नकारात्मक रवैय्या के चलते मात्र 21 दिन के भीतर बनी 3 किमी सड़क के परखच्चे उड़ने सुरू हो चुके हैं. अभी तो इस सड़क पर 8 टन तक के भी कोई वाहन नही निकले होंगे और अब सड़क की दुर्दशा देखते ही बन रही है. 

    लौरी नंबर 3 के स्थानीय निवासी योगेंद्र शर्मा के घर के पास शिव जी के मंदिर के सामने और ट्रांसफार्मर के बीच में यह पीएम सड़क पूरी तरह से उखड़ चुकी है जिसकी जानकारी योगेंद्र शर्मा ने सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी को दी जिस पर पहुचकर सड़क का जायज़ा लिया गया और संबंधित ठेकेदार संदीप पांडेय सोनभद्र कंस्ट्रक्शन कंपनी एवं मऊगंज जीएम नरवरिया, उपयंत्री अमित गुप्ता को बताया गया. इस पर संबंधितों ने सड़क को ठीक किये जाने का पुराने स्टाइल में आश्वासन मात्र दिया. 

   सवाल यह है की यदि बिना भारी वाहन चले ही इन करोड़ों की बनने वाली पीएम सड़कों की यह स्थितियां है कि मात्र  कुछ सप्ताह के भीतर ही यह सड़कें  हवा हवाई हो रही हैं तो कुछ महीने और एकाध साल में इनकी कितनी दुर्दशा होगी यह बात विचारणीय है.

ज़िले की सभी प्रधानमंत्री सड़कों के हाल बेहाल -

   ऐसा नही है की मात्र अगडाल-लौरी से कैथा पीएम सड़क भर के यह हालात हैं. जबकि देखा जाए तो प्रधानमंत्री सड़क विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के चलते पूरे ज़िले की पीएम सड़कों की दुर्दशा हो चुकी हैं. कई परियोजनाएं आज कई साल पहले सम्पन्न हो जानी चाहिए थी जिनमे आज आधा भी कार्य नही हुआ है. पनगड़ी से भठवा इनमे से एक ऐसी ही परियोजना है जिसे आज से पांच साल पहले सम्पन्न होना था परंतु आज इस सड़क में आधा भी कार्य नही हुआ है. इसी प्रकार गुणवत्ता और समय की दृष्टि से देखा जाए तो बांस से माल और रक्सा माजन एवं क्योटी और गढ़ के असपास बनने वाली प्रधानमंत्री सड़कों में भी यही मनमानी चल रही है. ऐसे किसे दोषी ठहराया जाए?विभाग को अथवा ठेकेदार को? यदि कहें की ठेकेदार मनमानी पर उतारू है तो फिर विभाग किस लिए बैठा हुआ है? अतः यही बात समझ आती है की विभाग और ठेकेदारों की मिलीभगत से पूरे सड़कों का सत्यानाश कर पूरा माल हजम कर जाने की स्थिति है.

संलग्न - अगडाल-लौरी से कैथा प्रधानमंत्री सड़क 9.4 किमी में लौरी नंबर 3 में योगेंद्र शर्मा के घर के पास मात्र बनाने के 21 दिन के भीतर बुरी तरह से उखड़ी हुई पीएम सड़क की तस्वीर.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587,

ज़िले में बेमौसम बारिश ने बढ़ा दी किसानों की मुश्किलें, गहाई हुई हफ्ते भर लेट, बाहर पड़ी सब कच्ची ईंटें पानी में बही

दिनांक 12 अप्रैल 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

(कैथा, रीवा, मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   देश के उत्तरी क्षेत्र में कई दिनों से खराब चल रहा मौसम का कहर पिछली रात रीवा में भी बरपा. दिनांक 12 अप्रैल की रात को लगभग एक बजे के बाद से गरज लपक एवं तेज़ आँधी के साथ बूंदा बांदी प्रारम्भ हुई. देखते ही देखते पिछली रात किसानों के लिए दुःस्वप्न बन गई. शायद जब रात में लोग सोये होंगे तो इस बात का अंदाज़ा न लगा पाए होंगे की अर्धरात्रि से ही उनकी नीद उड़ने वाली है. 

    कैथा ग्राम के आसपास बसे हुए किसानों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया की बेमौसम बारिश ने उनकी फसल की नुकसानी तो की ही साथ ही ईंट के कच्चे लगे छल्लों को भी नुकसान पहुचाया. बता दें की आजकल ग्राम क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास की भरमार होने से काफी लोग पक्के मकान के लिए ईंट पारने का काम कर रहे हैं. इस बीच जिन ग्रामीणों ने ईंट की पराई पूरी करके भठ्ठे अभी नही लगाए हैं उनके लिए यह बेमौसम बारिश काफी नुकसानी के तौर पर देखी जा रही है. 

   कैथा ग्राम के अरुण केवट, दसरथ केवट, दिलीप केवट, गोकुल केवट, सोमधर मिश्रा, अरुणेंद्र पटेल एवं अन्य लोगों ने बताया की उनकी बाहर पड़ी कच्ची ईंट तेज़ बारिश की वजह से नष्ट हो गयी है और काफी नुकसानी उठानी पड़ी है. शिव शंकर द्विवेदी, सिद्धमुनि द्विवेदी, संतोष केवट, सतानंद केवट, रोहित मिश्रा, हरिबंश पटेल सहित दर्जनों किसानों ने बताया की उनकी बाहर पड़ी गेंहूँ की फसल पूरी तरह से प्रभावित हुई है. जिसमे अभी भी गहाई में काफी वक्त लगेगा क्योंकि फसल पूरी तरह से भींग चुकी है. जब तक फसल सूखेगी नही तब तक उसकी गहाई किया जाना संभव नही है. गांव के कई किसानों ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए बताया की तेज़ हवा और आँधी की वजह से भी उनकी खेतों में कटी पड़ी फसल उड़ गई है. जिन किसानों ने ज्यादा सावधानी नही बरती थी और फसल को बोझा बनाये बिना ही खेतों में जेंटा के रूप में छोंड़ दिया था ऐसे सभी किसानों की फसल पूरे खेत में इधर उधर फैली मिली और आधे से अधिक तो कहां उड़ गई इसका पता तक नही चल पाया. इस प्रकार सभी किसानों ने मांग भी की सरकार को इस ओर भी ध्यान देने चाहिए और इस प्रकार की प्राकृतिक आपदा की वजह के हुए नुकसान की भरपाई की जानी चाहिए.

संलग्न - कैथा ग्राम और उसके आसपास स्थित किसानों की फसल की फ़ोटो, और साथ ही कुछ किसानों के ईंट के भठ्ठे और खराब हुई कच्ची ईंटें.

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता,रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587,

वन समितियों की हिटलरशाही - वन विभाग ने मानसेवियों को 14 माह से नही दिया पेमेंट

दिनांक 13 अप्रैल 2018, स्थान - सिरमौर वन परिक्षेत्र, रीवा मप्र,

(कैथा, रीवा मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

   आजकल प्रदेश के ज्यादातर जंगली क्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा ग्राम वन समितियों के मात्र 25 सौ रुपये प्राप्त करने वाले मानसेवी चौकीदारों के हवाले है. वन विभाग के नियमित अधिकारी कर्मचारी वातानुकूलित कमरों और बंद ए सी कारों में घूमते हैं.

      अब यदि इतने में भी उन बेचारे वन समितियों के मानसेवियों को 25 सौ रुपये तक नही दिए गए तो बड़े ही दुर्भाग्य की बात है. और इससे बड़ी सर्मिन्दगी और क्या होगी. वहरहाल, वनों में बढ़ते वन अपराध और शिकार की घटनाएं तो दिन प्रतिदिन समाचार पत्रों में उजागर हो ही रही हैं अभी हाल ही में पनगड़ी में जंगल में आग लगने की भी घटना प्रकाश में आयी थी जिसमे जंगल का एक विस्तृत भूभाग जलकर खाक हुआ था तब दौरे के समय जो सच्चाई सामने आयी थी वह काफी भयावह और चौकाने वाली थी. घटनास्थल में मात्र कुछ मानसेवी चौकीदार ही मिले थे और कोई भी नियमित अधिकारी कर्मचारी नही दिखा था. अभी भलघटी पनगड़ी गोहत्या कांड में भी यही देखने को मिला जिसमे पूरा इतना विस्तृत वन परिक्षेत्र मात्र एक रामसिया साकेत और राघुवेन्द्र पांडेय नामक दो मानसेवी चौकीदारों की सुरक्षा के हवाले था. 

रामसिया साकेत और राघुवेन्द्र पांडेय को 14 माह से नही मिला वेतन 

      ग्राम वन समिति पनगड़ी के मानसेवी चौकीदारों रामसिया साकेत और राघुवेन्द्र पांडेय द्वारा बताया गया की उन्हें पिछले 14 माह अर्थात जनवरी 2017 के बाद से 25 सौ रुपये मासिक मात्र दी जाने वाली वेतन नही दी गई है जिसकी की जानकारी अनुविभागीय अधिकारी वन और संबंधित वन परिक्षेत्र अधिकारी से लेकर डीएफओ और सीसीएफ को भी होनी चाहिए.

   इस पर दोनो पीड़ितों द्वारा बताया गया की ऐसे में वह वन की सुरक्षा कैसे देख पाएंगे. उन्होंने इसकी शिकायत सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी के समक्ष की और बताया की यदि वह इसकी शिकायत सीधे विभाग में करेंगे तो रेंजर और अनुविभागीय अधिकारी उनको नौकरी से निकाल देंगे. इस प्रकार उन्होंने शिकायत की बात न करने तक की बात कही. 

    जिस प्रकार से दोनो मानसेवी कर्मचारियों द्वारा विभाग के अंदर की स्थिति बताई गई इससे लगता है की विभाग के अधिकारी ही नीचे वाले छोटे कर्मचारियों का भरपूर शोषण कर रहे हैं जो की मानवाधिकार और लेबर के भी अधिकार का हनन है और ऐसे में विभागीय जिम्मेदारों के ऊपर भी कार्यवाही होनी चाहिए.

मानसेवी चौकीदारों की पेमेंट रोकना मानवाधिकार और लेबर के अधिकार का हनन

    आखिर क्या कारण है की आज 14 माह से मजदुरी कर रहे मानसेवी चौकीदारों की मात्र 25 सौ रुपये दी जाने वाली पेमेंट को रोक कर रखा गया है? यह मामला मात्र पनगड़ी के मानसेवी चौकीदारों तक ही सीमित नही है जानकारी एकत्रित करने पर बताया गया की सर्रा, देउर, घूमा, सरई, क्योटी आदि वन समिति के चौकीदारों की भी पेमेंट रोक करके रखी गई है जो सभी सिरमौर वन परिक्षेत्र के ही अंतर्गत आते हैं. अब यदि सिरमौर वन परिक्षेत्र के यह हालात हैं तो बांकी वन परिक्षेत्रों के कैसे होंगे यह विचारणीय विंदु है. अब प्रश्न यह भी उठता है की 50 हज़ार से अधिक पेमेंट पाने वाले शासकीय और नियमित अधिकारियों और कर्मचारियों की यदि एक या दो माह की पेमेंट रोक दी जाए तो इनकी क्या स्थिति होगी? क्या यह आंदोलन पर उतारू नही हो जाएंगे? तो प्रश्न यह उठता है की मात्र 25 सौ रुपये पेमेंट पाने वाले छोटे मानसेवी चौकीदारों के ऊपर यह वन विभाग इतना बड़ा जुर्म क्यों कर रहा है? यदि इनके ऊपर किसी अनुशासनात्मक कार्यवाही के तौर पर ऐसा किया जा रहा हो अथवा इन्हें किसी वन अपराध में दोषी पाया गया हो और कार्यवाही के तौर पर दंडित किया जा रहा हो तो उसका भी जबाब वन विभाग को देना चाहिए, कोई तो सूचना इन्हें दी जानी चाहिए. अब बिना किसी कारण के पेमेंट रोकना कहां तक जायज़ है? क्या मानसेवी कर्मचारियों के घर परिवार बाल बच्चे नही है?

संलग्न - रीवा के सिरमौर वन परिक्षेत्र अंतर्गत आने वाले पनगड़ी बीट एरिया के पीड़ित दो मानसेवी चौकीदारों रामसिया साकेत और राघुवेन्द्र पांडेय की तस्वीर,

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शिवानन्द द्विवेदी, सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र, मोबाइल 7869992139, 9589152587

Tuesday, April 10, 2018

शिक्षा के मंदिर में हादसों का भय, पानी के मानवाधिकार की जद्दोजहद में शिक्षा का अधिकार पड़ा बौना ( मामला सिरमौर तहसील अंतर्गत पनगड़ी एवं पताई पंचायत में शासकीय माध्यमिक शाला का, साल भर से बन्द पड़ा है नलकूप जबकि खुली हाई टेंशन लाइन दे रही मौत को आमंत्रण)

दिनांक 11 अप्रैल 2018, स्थान - भठवा/गढ़ रीवा मप्र

(कैथा, रीवा मप्र, शिवानन्द द्विवेदी)

    राइट टू एजुकेशन अर्थात शिक्षा का अधिकार अधिनियम तो प्रारम्भ हो गया लेकिन विद्यार्थी इस शिक्षा के अधिकार का कितना लाभ ले पा रहे हैं इसका पता किसी भी ग्रामीण स्तर पर संचालित स्कूल में जाकर देखा जा सकता है.

   ग्रामीण स्तर पर संचालित सरकारी स्कूलों में न कोई सुविधा होती है और न ही शिक्षा का कोई स्तर. ग्रामीण सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र बमुश्किल प्रमाण पत्र तो ले लेते हैं पर इसके अतिरिक्त कुछ सीख नही पाते. 100 में से कुछ दो चार विरले ही ऐसे छात्र होंगे जिन्हें उनके क्लास के स्तर का कुछ विशेष  ज्ञान हो. आज शिक्षा की दुर्दशा हो चुकी है. जिस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों की शासकीय विद्यालयों की शिक्षा बद से बदतर होती जा रही है भविष्य में युवाओं का नाकाम होकर बेरोजगार घूमना लगभग तय है. 

   ग्रामीण क्षेत्र की शासकीय स्कूलों में ज्यादातर ऐसे विद्यार्थी होते हैं जो गरीब परिवार से आते हैं जैसे किसान अथवा मजदूर वर्ग. ऐसे छात्रों के लिए किसी अच्छी स्कूल में और खासकर प्राइवेट अंग्रेज़ी माध्यमों की स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर पाना एक सपना ही होता है. विरले ही गरीब छात्र होते हैं जो अच्छी शिक्षा दीक्षा प्राप्त कर पाते हैं.

कैसे पढ़ेंगे जब स्कूल के समय भरेंगे पानी  - पनगड़ी शासकीय स्कूल में साल भर से बन्द पड़ा है नलकूप

   शिक्षा की बात चल रही थी तो ग्रामीण स्तर पर इसको भी बता दिया जाए की मूलभूत फैसिलिटी की कमी के चलते भी शिक्षक और छात्र ज्यादातर उनकी पूर्ति करने में परेशान रहते हैं तो ऐसे में छात्र कब पढ़ पायेगा और शिक्षक कब पढ़ा पाएंगे.

    सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी सहित पत्रकार प्रमोद सिंह और पनगड़ी निवासी सोनू सुक्ला द्वारा विजिट के दौरान स्कूल में उपस्थित प्रधानाध्यापक और शिक्षकों और छात्रों से संपर्क किया गया तो जो जानकारी प्राप्त हुई वह किसी भी ग्रामीण स्तर में संचालित शासकीय शिक्षा केंद्रों की स्थिति को भलीभांति बया करती है. बताया गया की स्कूल परिसर में जो नलकूप पंचायत विभाग अथवा पी एक ई द्वारा लगाया गया था वह काम लायक नही बचा है, उसकी सभी पाइप काम लायक नही बची है. बताया गया की यहीं 500 मीटर की दूरी पर स्थित किसी ग्रामवासी के व्यक्तिगत बोरवेल से छात्र पानी भरकर लाते हैं. पूरा समय मात्र पानी भरने में ही व्यतीत हो जाया करता है. ऐसे में छात्र क्या पढ़ पाएँगे. प्रधानाध्यापक द्वारा आगे बताया गया की हमने इसकी शिकायत कई बार की है लेकिन न तो लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग सुध ले रहा है और  न ही पंचायत विभाग लिहाज़ा हमारे स्कूल में मध्यान भोजन से लेकर बर्तन धोने तक सभी में तकलीफ होती है. कभी कभी इसी कारण मध्यान भोजन भी नही बन पाता है.

 पानी की समस्या तो है ही यहां बीच प्राँगण में लगा दिया ट्रांसफार्मर भी, किसी भी वक्त हो सकता है कोई भीषण हादसा 

  पानी की समस्या तो अपने स्थान पर है ही साथ ही स्कूल के बाहर बाउंड्री के बीचोंबीच एक ट्रांसफार्मर भी लगा हुआ है जो एकदम खुले में है. अमूमन यदि किसी कारण बस ट्रांसफार्मर लगाया हुआ है तो भी ट्रांसफार्मर को चारों तरफ से बन्द किया जा सकता है और एंगल गाड़कर तार की जाली लगायी जानी चाहिए जिससे प्राइमरी कक्षा के छोटे बच्चे खेलते समय सीधे ट्रांसफार्मर और खुले तारों के संपर्क में न आ पाएं लेकिन इसकी किसी को फिकर ही नही. न इस संबंध में स्कूल प्रबंधन ने ही कुछ किया और न ही पंचायत अथवा बिजली विभाग ने. आलम यह है की हर ग्राम की स्कूलों में इसी प्रकार या की बिजली के खुले तार झूल रहे हैं अथवा ट्रांसफार्मर लगा दिया गया है. सब की नीद तब खुलेगी जब कोई भीषण हदशा हो जाएगा और कोई बच्चा फसकर झुलस जाएगा.

  ज़िले की सभी सकूलों का सर्वे किया जाकर अभियान चलाकर खुले बिजली के तार खंभे और ट्रांसफार्मर स्कूल परिसर से तत्काल हटाये जाने चाहिए

    जब इस संदर्भ में ग्रामीण लोगों और बच्चों के अभिभावकों सहित शिक्षकों समाजसेवियों से चर्चा की गई तो सभी का एक स्वर में कहना था की मात्र पनगड़ी स्कूल ही नही बल्कि जिले की सभी स्कूलों में अभियान चलाकर स्कूल परिसर के अंदर से बिजली सप्लाई को हटाया जाना चाहिए. बिजली के खंभे और खुले बिजली के तार स्कूल परिसर के अंदर रखे जाने का कोई औचित्य ही नही है. स्कूल परिसर में बच्चे मध्याह्न छुट्टी होने पर खेलते कूदते रहते हैं तो स्वाभाविक तौर पर खुले तारों और ट्रांसफार्मर के संपर्क में आ सकते हैं ऐसे में किसी भी समय कोई भी दुखद हादसा हो सकता है.

  लालगांव विद्युत वितरण केंद्र के अतरैला शासकीय स्कूल में भी खतरे के निशान के ऊपर है हाई टेंशन लाइन के खुले तार

   भठवा निवासी और पत्रकारिता के साथ जुड़े प्रमोद सिंह ने बताया की उन्होंने ग्रामीण जनों के सहयोग के साथ पिछले कई वर्षों से उनके क्षेत्र अतरैला में शासकीय स्कूल परिसर में हाई टेंशन लाइन के खुले झूलते तारों को हटाने के लिए जद्दोजहद की है लेकिन अब तक उसका कोई स्थायी समाधान नही निकल पाया है. जब इस संबंध में कटरा विद्युत केंद्र के कनिष्ठ यंत्री अभिषेक सोनी से बात की गई तो उनका यह कहना था की हमारे पास कोई विशेष प्रावधान नही होता जिससे इन तारों को पोल सहित शिफ्ट किया जा सके. उन्होंने आगे बताया की स्कूल शिक्षा विभाग और संबंधित स्कूल प्रसाशन से लिखित तौर पर विद्युत विभाग के नाम पत्र जारी कर हमारे पास पहुचाया जाना चाहिए. आगे की प्रक्रिया में विद्युत विभाग लाइन शिफ्टिंग के लिए जरूरी खर्च का एस्टीमेट बनाकर संबंधित स्कूल प्रसाशन को भेज देता है और आगे स्कूल प्रसाशन जब रमसा के माध्यम से वह राशि विजली विभाग के खाते में ट्रांसफर कर देगा तो हम अपने कर्मचारी भेज कर लाइन शिफ्टिंग करवा देते हैं. कटरा जे ई सोनी ने बताया की इसके पहले जब वह गोविंदगढ़ क्षेत्र में पदस्थ थे तब भी इस प्रकार के कई घटनाक्रम आये थे जिनमे स्कूल शिक्षा विभाग के फण्ड से स्कूलों के अंदर से लाइन शिफ्टिंग की गई थी. इसके अतिरिक्त कोई अन्य प्रक्रिया नही है जिससे इस लाइन को स्कूल परिसर के बाहर शिफ्ट किया जाय.

    उक्त प्रक्रिया को फॉलो भी किया गया और प्रमोद सिंह द्वारा अतरैला स्कूल के प्रधानाध्यापक से कहकर लाइन शिफ्टिंग के बाबत आवेदन लालगांव कनिष्ठ यंत्री को भेजा जा चुका है. अब देखना यह होगा इस पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है. क्योंकि यदि सही समय पर कार्य नही हुआ तो किसी भी समय कोई भी हादसा हो सकता है. इस बीच अतरैला स्कूल के प्रधानाध्यापक द्वारा बताया गया की स्कूल परिसर स्थित झूलते हाई टेंशन लाइन के तारों की वजह से कई बार हादसे हो चुके हैं जिससे आग का लुकाड़ा जमीन पर स्पार्किंग की वजह के गिरा था लेकिन शौभाग्य से बच्चे लाइन के नीचे नही थे अतः कोई अप्रिय दुर्घटना नही हुई है. नवीन स्कूल भवन हाई टेंशन लाइन के बिल्कुल 2 फ़ीट ऊंचाई से गया है जिससे यदि कोई बच्चा कभी धोखे से छत पर चढ़ जाता है तो उसकी जान जा सकती है. इस पर प्रधानाध्यापक का कहना था की उन्होंने बच्चों को शख्त हिदायत दे रखी है की कोई भी छात्र भूलकर भी नवीन स्कूल भवन की छत पर न जाए.

संलग्न - सिरमौर तहसील एवं गंगेव जनपद अंतर्गत पनगड़ी पंचायत की पनगड़ी स्कूल एवं पताई पंचायत अंतर्गत अतरैला स्कूल परिसर में खतरनाक स्तर पर हाई टेंशन लाइन के तार और ट्रांसफॉमर, साथ ही पनगड़ी स्कूल में सालों से बन्द पड़ा नलकूप.

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शिवानन्द द्विवेदी सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता, रीवा मप्र.

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