Friday, November 16, 2018

मऊगंज बिजली डिवीज़न में फैल हैं सैकड़ों ट्रांसफार्मर, उपभोक्ता परेशान (मामला ज़िले के मऊगंज बिजली डिवीज़न का जिंसमे संबल योजना के बाद भी फैल पड़े हैं सैकड़ों ट्रांसफार्मर, मऊगंज डिविज़नल इंजीनियर परस्ते एवं देवतालाब एई दिनेश पॉल की चल रही मनमानी, आम जनता परेशान फ़ोन तक रिसीव नही करते)

दिनाँक 16 नवंबर 2018, स्थान - मऊगंज रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

   यद्यपि मप्र सरकार की संबल योजना एवं बिजली बिल माफी स्कीम के तहत प्रदेश सरकार ने काफी हद तक आम जनता और उपभोक्ताओं को राहत देने का प्रयास किया लेकिन कई जगहों पर इन योनाओं को लेकर बिजली विभाग गंभीर नही है. 

मऊगंज डिवीज़न में फैल हैं सैकड़ों ट्रांसफार्मर

  सूत्रों से प्राप्त विभागीय जानकारी के अनुसार ज़िले के मऊगंज बिजली डिवीज़न में अभी भी सैकड़ों ट्रांसफार्मर ऐसे हैं जो महीनों से फैल हैं जिन्हें बदला नही जा सका है. देवतालाब विद्युत वितरण केंद्र अंतर्गत ही अभी दर्ज़नों ट्रांसफार्मर फैल जले पड़े हैं जिन्हें बदलना अनिवार्य है लेकिन विभागीय उदासीनता के चलते अब तक बदले नही गए जिससे आम जनता और उपभोक्ताओं सहित किसानों को काफी समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

अकाल में अन्नदाता की सबसे बड़ी दुर्दशा

   आम उपभोक्ताओं के साथ साथ सबसे अधिक समस्या किसानों को हो रही है. खरीफ वर्ष 2018 में धान की कटाई के बाद परती पड़ चुके खेतों को उठाने के लिए सिंचाई के लिए बिजली की आवश्यकता है, साथ ही जोत दिए गए खेतों में भी पलेवा लगाने वास्ते बिजली की जरूरत है लेकिन जले हुए ट्रांसफार्मर के कारण कुछ नही हो पा रहा जिससे एकबार फिर किसान के पास आत्महत्या के अतिरिक्त कोई दूसरा चारा नही बचेगा.

किसानों के वाहन खर्च में बुलाते हैं अधिकारी

   देवतालाब सहायक अभियंता अन्तर्गत मैरहा 875, तिवारीगवां-मनबोदसिंह  एवं पैकन गांव आदि ग्रामों के किसानों भूपति पटेल, रामस्वरूप पटेल, भाग्योदय सिंह आदि किसानों ने बताया की असिस्टेंट इंजीनियर देवतालाब दिनेश पॉल द्वारा कहा गया की ट्रांसफार्मर ले जाने के लिए वाहन नही है अतः अपने अपने ट्रेक्टर लेकर आओ तब ट्रांसफार्मर दिया जाएगा. जब कुछ किसान ट्रेक्टर लेकर बिजली कार्यालय गए तो सहायक अभियंता दिनेश पॉल अपना आधिकारिक मोबाइल स्विच ऑफ करके भाग गया. इसके बाद किसानों ने मऊगंज डिविजनल इंजीनियर परस्ते से भी संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन परस्ते ने मोबाइल कॉल ही रिसीव नही किया जिससे किसानों में आक्रोश व्याप्त है. किसानों का कहना था की हज़ारों रुपये का तेल खर्चा करके ट्रेक्टर लेकर बिजली कार्यालय ट्रांसफार्मर देने के लिए बुलाया लेकिन ट्रांसफार्मर नही दिया.

  मऊगंज बिजली विभाग के अधिकारी कर रहे मनमानी

   राष्ट्रीय किसान संगठन मऊगंज के पदाधिकारी भाग्योदय सिंह एवं अन्य ग्रामीणों द्वारा बताया गया की इसके पहले भी डिवीज़न में बिजली की समस्याओं को लेकर उनके संगठन द्वारा बिजली विभाग मऊगंज को ज्ञापन सौंपा गया था जिंसमे उन्होंने डिवीज़न में फैल पड़े ट्रांसफार्मर को बदलने से लेकर केबल बदलने, बिजली बिल ठीक करने, 4 हॉर्स पावर के कनेक्शन को तीन हॉर्स पावर कर ठीक करने और अन्य कई मामलों को लेकर सौंपे गए ज्ञापन में मऊगंज डिविज़नल इंजीनियर परस्ते द्वारा लिखित आश्वासन देने के बाद भी कोई कार्यवाही अब तक नही की गई है.

मउगंज बिजली अधिकारी काम के बदले चाहते हैं पैसा

   किसानों और मऊगंज के उपभोक्ताओं का कहना था की यह बिजली अधिकारी चाहते हैं की उन्हें कुछ चढ़ोत्तरी दिया जाए और इसी अपेक्षा में आवश्यक कार्य को भी लटका कर रखते हैं. सभी ग्रामीणों सहित राष्ट्रीय किसान संगठन के कार्यकर्ताओं ने मऊगंज डीई परस्ते एवं देवतालाब एई दिनेश पॉल पर असहयोग एवं घूंसखोरी का आरोप लगाते हुए इन्हें हटाये जाने की माग की है.

संलग्न - मऊगंज बिजली डिवीज़न अन्तर्गत देवतालाब एई और अन्य जगहों में फैल सैकड़ों ट्रांसफार्मर में से पैकन गांव में 63 केवीए का जला ट्रांसफार्मर और 10 पोल की जली केबल के पास एकत्रित किसान और अन्य ग्रामीण उपभोक्ता.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Thursday, November 15, 2018

बिजली विभाग की कार्यवाही, शिफ्ट हुआ करहिया स्कूल परिसर एवं मतदान केंद्र क्रमांक 135 का खुला बिजली तार, मीडिया में आई थी बात, खबर और सामाजिक प्रयाशों का हुआ सार्थक असर (मामला ज़िले के कटरा विद्युत वितरण केंद्र का जहाँ पर खुले सिर की ऊंचाई से झूलते तारों की वजह से ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार की कही थी बात)

दिनाँक 15 नवंबर 2018, स्थान- कटरा रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    त्योंथर विधानसभा क्षेत्र के मतदान केंद्र क्रमांक 135 में खुले खतरे के निशान से झूलते बिजली के तारों की बातें सामने आईं थी. मामला था शासकीय प्राथमिक पाठशाला करहिया के स्कूल परिसर में बनाये गए मतदान केंद्र क्रमांक 135 का जिंसमे खुले हुए बिजली के तार किसी भी समय अप्रिय घटना का आमंत्रण दे रहे थे. 

स्पार्किंग की वजह से फसल से लदा ट्रेक्टर हुआ था आग के हवाले

       इसके पूर्व भी पिछले जून मई-जून महीने में जब बिजली के खुले हुए तारों की वजह से डाढ़ पंचायत सरपंच सुरेंद्र मिश्रा का ट्रेक्टर देखते देखते स्पार्किंग की बजह से आग के हवाले हो गया था तब भी ग्रामों और स्कूल परिसर में खुले झूलते बिजली के तारों की बातें सामने आईं थी और लाइन को शिफ्ट करने की बात रखी गई थी लेकिन तब इस पर कोई  सार्थक कार्यवाही नही हुई थी. लेकिन अब जब शौभाग्य योजनान्तर्गत अरबों खरबों का बजट उपलब्ध है और चुनाव भी नजदीक है जब मामला सोशल मीडिया एवं प्रिंट मीडिया में रखा जाकर सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा संबंधित चीफ इंजीनियर के एल वर्मा एवं जबलपुर डिस्कोम सीएमडी को ट्विटर एकाउंट में सूचित किया गया तो कार्यवाही हुई. 

लाइन शिफ्ट न होने पर मतदान से करना था बहिष्कार

      सबसे बड़ी बात यह थी की ग्रामीणों ने लाइन शिफ्ट न करने पर मतदान से बहिष्कार की बात कही थी जिसका परिणाम यह हुआ की दिनाँक 15 नवंबर 2018 को तीन पोल खड़ा करके बिजली शिफ्ट कर दी गई. साथ ही ट्रांसफार्मर का टूटा हुआ पोल भी सपोर्ट लगाकर ठीक किये जाने का प्रयाश किया जा रहा है. उपस्थित ठेकेदार प्रतिनिधि बद्री प्रसाद पांडेय निवासी पनगड़ी-पताई द्वारा बताया गया की ट्रांसफार्मर में अतिरिक्त पोल लगाकर दो तीन दिनों में सही कर दिया जाएगा.

  स्कूली बच्चों और अभिभावकों में प्रसन्नता

    इस बीच करहिया प्राथमिक पाठशाला परिसर से खतरे के निशान से झूलते हुए बिजली के तारों को शिफ्ट किये जाने से आसपास के ग्रामों डाढ़, करहिया, बड़ोखर, हिनौती आदि ग्रामों के अभिभावकों और स्कूली बच्चों सहित शिक्षकों में प्रसन्नता है. सभी ने सामाजिक कार्यों की सराहना की और कहा की यह कार्य यहां के जन प्रतिनिधियों द्वारा कराए जाने चाहिए लेकिन जन प्रतिनिधि ग्रामीणों की समस्या पर ध्यान नही देते और चुनाव जीतकर फुरसत हो जाते हैं. इसके बाद आम जनता को पांच साल दर दर की ठोकर खाने को मजबूर होना पड़ता है. 

   लालगांव डीसी अन्तर्गत अतरैला स्कूल में भी झूल रही मौत

   बता दें की पिछले वर्षों से उठाये जा रहे एक अन्य मामले में भी हालात करहिया स्कूल जैसे ही हैं. गंगेव ब्लॉक के पताई पंचायत अन्तर्गत शासकीय पूर्व माध्यमिक पाठशाला अतरैला में भी इससे भी अधिक खतरनाक हाई टेंशन लाइन के तार सिर की ऊंचाई से झूल रहे हैं लेकिन कई मर्तबा स्कूल प्रशासन एवं ग्रामीणों द्वारा मामले को लगातार संबंधित जिम्मेदारों के समक्ष रखे जाने के बाबजूद भी आज तक हाई टेंशन लाइन शिफ्ट नही की जा सकी है. अपना रोष व्यक्त करते हुए पताई पंचायत गंगेव ब्लॉक के ग्रामीणों एवं अभिभावकों ने बताया की यदि समस्या का समाधान किया जाकर स्कूल परिसर से हाई टेंशन लाइन शिफ्ट नही की गई तो वह भी चुनाव का बहिष्कार करेंगे क्योंकि बच्चों की जिंदगी उन्हें ज्यादा प्यारी है.

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में देखें कटरा डीसी अन्तर्गत शासकीय प्राथमिक पाठशाला करहिया जिसे मतदान केंद्र क्रमांक 135 बनाया गया है वहां पर दिनांक 15 नवंबर 2018 को खतरनाक स्तर पर खुले झूलते हुए बिजली के तारों को शिफ्ट कर दिया गया. कार्य करते बिजली विभाग के वर्कर.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587, 7869992139

MP - मप्र की विकाश गाथा का प्रतीक - मनगवां चाकघाट हाईवे में सोहागी पहाड़

दिनांक 15 नवंबर 2018, स्थान - सोहागी पहाड़, रीवा मप्र

( शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र)

    पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से बनाई जा रही रीवा ज़िले की बहुचर्चित मनगवां-चाकघाट हाईवे सड़क आज तक नही बन पायी है जबकि इसमे अब तक देश दुनिया की नामी गिरामी कंपनियों ने काम किया है. टॉपबर्थ, दिलीप बिल्डकॉम और बंसल जैसी कंपनियों ने इस सड़क कार्य में हाँथ आजमाया है और अब वर्तमान में बंसल कंपनी द्वारा ही कार्य किया जा रहा है. टॉपबर्थ कंपनी द्वारा कार्य का टेंडर लिया जाकर दिलीप बिल्डकॉम कंपनी को पेटी कॉन्ट्रैक्ट में दिया गया था जिंसमे बताया गया कि लेनदेन को लेकर आपसी विवाद और समय पर गुणवत्तापूर्ण तरीके से पूरा न कर पाने के कारण ठेका निरस्त हुआ. इसके बाद पुनर्निविदा के चलते बंसल कंपनी को कार्य सौंपा गया. बंसल द्वारा आज तक कार्य पूरा नही किया गया जिसका परिणाम है पिछले पांच से अधिक वर्षों से मनगवां और चाकघाट के बीच रहने वाले और यहां इस सड़क मार्ग से प्रतिदिन आवागमन करने वाले आम जन मानस से लेकर वीआईपी तक की फजीहत.

  सोहागी पहाड़ में स्थिति सबसे खतरनाक

    मनगवां से चाकघाट सड़क मार्ग में सोहागी नामक पहाड़ आता है जो किसी भी रोड निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. पिछले पांच से अधिक वर्षों से हो रहा यह सड़क निर्माण का कार्य आज मात्र सोहागी पहाड़ में ही आकर रुका हुआ है. टेढ़ा मेढ़ा और ऊंचाई गहराई से भरा यह पहाड़ काफी मुश्किल है. अब जो भी कपंनियां कार्य कर रही हैं उन सबका अंतिम और सबसे मुश्किल कार्य इसी पहाड़ को तोड़कर यहां से सड़क मार्ग निकलना है।

  ऐसा क्या है इस सड़क में की पांच साल से अधिक का समय लग गया

   अब प्रश्न यह है की आज भी क्या मॉनव 17 वीं सताब्दी में जीवन यापन कर रहा है जबकी मसीनी उपकरणों का अभाव रहता था और मॉनव ज्यादातर कार्य हाँथ से करता था. आज तो 21 वीं सदी का दौर है जबकि ऐसी मसीनों का ईजाद हो चुका है जहाँ पर कोई मुश्किल से मुश्किल कार्य भी कुछ दिनों अथवा महीनों में पूरा किया जा सकता है. तब प्रश्न यह उठता है की आखिर यह सरकारें क्या कर रही हैं. क्या सरकारों में बैठे सिविल कंस्ट्रक्शन के इंजीनियर और इनके नीति निर्धारक इन बातों का ध्यान नही रखते की जिस कंपनी को यह टेंडर देकर कार्य सौंप रहे हैं वह कार्य करने योग्य भी हैं की नही. आखिर टेंडर देते समय कोई तो समय निर्धारण हुआ होगा की इतने वर्षों में कार्य को पूरा किया जाकर सरकार के हवाले किया जाना है. वास्तव में बात यह है की कमीशन के खेल में पूरी सरकार और इनके सिपहसालार ही लिप्त हैं तो भला कार्यवाहि फिर कौन करेगा. कार्यवाही करने के लिए पाक साफ और मजबूत होना पड़ता है. कमीशन खोर थोड़े ही कार्यवाही करते हैं. 

  सोहागी पहाड़ में वर्षों से मानक स्तर से कई गुना अधिक प्रदूषण 

    सोहागी पहाड़ की स्थिति आज इतनी भयावह हो चुकी है की यहां पर दुर्घटनाएं तो बहुत आम बातें हैं और लगभग रोज ही कोई न कोई अप्रिय दुर्घटना हो रही है. मनगवां से चाकघाट वाया सोहागी पहाड़ से गुजरने वाले हर एक सख्स की हालात यह है की यदि उसका मेडिकल चेकअप कराया जाये तो खतरनाक बीमारियां मिलेंगी जिंसमे फेंफड़ों और सांस की बीमारियां जैसे सिलकोसिस, टीबी, और अन्य बीमारियां सम्मिलित हैं. 

    प्रदूषण चेक करने वाली संस्थाएं और उस पर कार्यवाही करने वाली संस्थाएं जैसे पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड आदि तो ऐसा लगता है जैसे अस्तित्व में हैं ही नही. रीवा संभाग और संभवतः पूरे मप्र में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाएं नाकाम और अक्षम साबित हुई हैं. क्रशर प्लांट से निकलने वाला डस्ट और फैलने वाला प्रदूषण, वाहनों से निकलने वाले धुंए और धूल का प्रदूषण, निर्माणाधीन सड़कों में अमानक स्तर पर उड़ने वाल धूल डस्ट का प्रदूषण, आखिर इन सब प्रदूषण की समस्याओं का समाधान कौन करेगा? कहां है प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य ऐसी संस्थाएं? कहां गई जनता के हित की बात करने वाली सरकारें?

   सिलिकोसिस एक जानलेवा बीमारी

          सिलिकोसिस फेंफड़ों से संबंधित एक ऐसी बीमारी है जो महीन धूल के कणों से उत्पन्न होती है. सिलिका की धूल सांस के साथ खिंचकर फेंफड़ों के अंदर जाने से फेंफड़ों में छोटे छोटे नोड्यूल बन जाते हैं. सिलिका एक यौगिक है जो सिलिका व ऑक्सीजन के योग से बनता है जो खनिजों में पाया जाता है. इसे पीसने पर उस पत्थर के अत्यंत बारीक कण धूल के रूप में सांस के साथ जाकर फेंफड़ों में जम जाते हैं व फेंफड़ों की कार्यक्षमता को कम कर देते हैं. ये धूल के कण फेंफड़ों के ऊपर परत बना देते हैं जिस कारण ऑक्सीजन फेंफड़ों में शोषित नही हो पाती है और बाद में यह सिलिकोसिस नामक बीमारी के रूप में बदल जाती है. 

  सिलिकोसिस और प्रदूषण की समस्याओं का कानूनी प्रावधान 

    वास्तव में देखा जाए तो व्यक्ति को जानबूझकर प्रदूषण में धकेल देना और खतरनाक बीमारियों का तोहफा देना व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन है. 

   फैक्ट्री मजदूरों के हित में शासन द्वारा कारखाना अधिनियम 1948, खनन अधिनियम 1952, अंतरराज्यीय पलायन मजदूर कानून 1979, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम, असंगठित कामगार व सामाजिक सुरक्षा कानून आदि के अन्तर्गत यह कंनूनी अपराध हैं. इसके अतिरिक्त भी मध्य प्रदेश असंगठित कामगार कल्याण अधिनियम 2003, मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 1982, मध्य प्रदेश स्लेट पेंसिल कर्मकार कल्याण मॉडल, मप्र भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल जैसे कानूनों के दिशा निर्देश भी लागू हैं.

   मानव अधिकार संरक्षण कानून के अन्तर्गत है मुआबजे पुनर्वाश का प्रावधान 

      मॉनव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के अन्तर्गत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी यह अनुसंसा की हुई है की यदि सिलकोसिस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु होती है तो यह माना जाएगा की उसके जीवन के अधिकार की अवहेलना हुई है जिसके लिए वह पीड़ित मुआबजा और पुनर्वाश का अधिकारी होगा. 

    नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का हो हस्तक्षेप 

   प्रदूषण के अमानक स्तर और निरंतर पर्यावरण की हो रही अपूरणीय क्षति के चलते पूरे मामले में नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का हस्तक्षेप होना चाहिए. सबसे बड़ी बिडम्बना यह है की राष्ट्रीय हरित ट्राइब्यूनल एक हज़ार के स्टाम्प और फीस के साथ ही प्रकरण पर कार्यवाही करता है और दुनिया भर के टेक्निकल प्रोब्लम्स रहते हैं. जबकि जनहित याचिका के कांसेप्ट की तरह ही नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में भी मात्र सीधे प्रकरण की एक दो फ़ोटो के साथ समस्या को लिखित रूप से भेजे जाने अथवा ईमेल कर दिए जाने के साथ ही स्वतः संज्ञान ले लेना चाहिए.

    इसलिए जनता के व्यापक हित से जुड़े हुए मामलों पर स्वतः संज्ञान और सीधे हस्तक्षेप का प्रावधान होना चाहिए इसमे यह नही देखा जाना चाहिए कि कोई शिकायतकर्ता बने और जब शिकायत आये तभी कार्यवाही हो। आखिर त्योंथर से मनगवां वाया सोहागी से गुजरने वालों में क्या कलेक्टर, डीएम, जस्टिस, सीएम, और प्रिंसिपल सेक्रेटरी नही होते होंगे? क्या वर्ष भर में ऐसे उच्चाधिकारी इस सड़क मार्ग से नही गुजरते होंगे? मानाकि यह बन्द एसी गाड़ियों में गुजरते होंगे लेकिन क्या आम जनता के दुख दर्द और तकलीफों को नही समझ सकते? समस्या तो यह है कि जब कुछ करना ही नही चाहते और इक्षाशक्ति ही नही है तो कहां से कुछ होगा? 

संलग्न - संलग्न तस्वीरों में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा धूल डस्ट और प्रदूषण से भरे सोहागी सड़क मार्ग में घंटे भर खड़ा होकर वीडियो क्लिपिंग बनाई गई और साथ ही फ़ोटोग्राफ लिए गए जिसको समाज और मीडिया के समक्ष रखा जा सके और इस पर कार्यवाही हो सके.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Sunday, November 11, 2018

रीवा मप्र - कशियारी स्कूल के पीछे थाना अतरैला में अवैध बाड़े में दर्ज़नों गायों की खौफनाक मौत (मामला ज़िला रीवा अन्तर्गत जवा ब्लॉक एवं अतरैला थाना का जहां पर कशियारी शासकीय प्राथमिक पाठशाला हरिजन बस्ती में मर रही बेजुबान गायें, सरपंच पति अखिलेश तिवारी एवं पंचायत द्वारा बनाया गया अवैध बाड़ा, न चारा न पानी और न ही किसी छाया की व्यवस्था, प्रशासन बना अनजान)


दिनाँक 12 नवंबर 2018, स्थान - अतरैला थाना, ब्लॉक जवा, रीवा मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, रीवा मप्र) 

    ज़िले में ठंड बढ़ते ही एक बार फिर पशु प्रताड़ना बढ़ने लगी है. आवारा पशुओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर ज़िले में बनाये जाने वाले अवैध बाड़ों में बिना किसी समुचित व्यवस्था के चलते एक बार फिर गोवंश मौत के घाट उतारे जा रहे हैं. जाहिर है इनमे दोषी वही हैं जिन्होंने मवेशियों को आवारा छोड़ा और वह जिन्होंने यह अवैध बाड़ा बनाये जाने में सहयोग दिया है. 

   जवा ब्लॉक अतरैला थाने का है मामला 

   यह मामला अतरैला थाना अन्तर्गत कशियारी ग्राम पंचायत का है जहां पर शासकीय प्राथमिक पाठशाला हरिजन बस्ती कशियारी के पीछे स्कूल की दीवाल से सटाकर यह अवैध बाड़ा बनाया गया है. ग्रामीणों और अन्य गोवंश प्रेमियों द्वारा बताया गया की इस बाड़े के निर्माण में ग्राम पंचायत कशियारी के सरपंच पति, सचिव, एवं उनके सहयोगियों का हाँथ है. बताया गया की स्कूल परिसर में मीटिंग बुलाकर सरपंच पति अखिलेश तिवारी द्वारा यह अवैध बाड़ा बनवाया गया था जिंसमे न तो चारा, न पानी और न ही किसी प्रकार के पशुसेड की व्यवस्था थी. आसपास के चश्मदीखों द्वारा बताया गया की कई दिनों तक पशु बाड़े में कैद रहते थे जिन्हें न तो चारा पानी मिलता था और न ही बीमार होने पर इलाज इसलिए भूंख प्यास से तड़प कर मर जाते थे.

11 नवंबर को मिलीं 5 मृत गायें

   जब यह जानकारी सोशल मीडिया और अन्य माध्यमो से सामने आई तो सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं पीएफए इंदौर यूनिट के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रयास किये गए जिंसमे दिनांक 11 नवंबर को सीधे जवा ब्लॉक अन्तर्गत थाना अतरैला में ग्राम पंचायत कशियारी पहुचा गया और फिर जो खौफनाक वाकया देखा गया वह किसी भी कमजोर दिल को दहला देने वाला था.

   11 नवंबर को सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं डाढ़ निवासी गोवंश प्रेमी पुष्पराज तिवारी ने पूरे वाकये का वीडियो बनाया और साथ में फ़ोटो प्रूफ भी इकट्ठा किये. उसी दौरान गांव के कुछ लोग भी इकठ्ठा हुए जिन्होंने अवैध बाड़े का समर्थन किया और बताया की फसल नुकसानी बचाने के लिए बाड़ा सभी के सहयोग से बनाया गया है. नाम पूंछने पर कोई व्यक्तिगत नाम नही बताया और कहा की 100 से 150 लोगों की सहमति से बाड़ा बनाया गया है.

मतलब गायों को बाड़े में बन्द कर मारने में पूरा गांव ही सहमत

   जिस प्रकार से कुछ व्यक्तियों द्वारा जानकारी दी गई उससे यही पता चला की आज गोवंश अथवा गाय की समाज में उपयोगिता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. आज भारतीय समाज का वह हिस्सा जो अपनी माँ को माँ कहने को तैयार नही और अपने बूढ़े मां बाप की रखवाली एवं देखभाल नही कर सकता वह भला पशुओं की क्या कद्र करेगा. मसीनों ट्रेक्टर आदि के ईजाद के पहले वह तो मानव का स्वार्थ था जिसके कारण वह गाय बैल पालता था जिससे हल में चलने, दूध घी खाने एवं गोबर का खाद कंडे आदि के रूप में इस्तेमाल करने में मदद मिले वरना गाय की क्या कद्र इस भारतीय समाज में. जबकि यदि देखा जाए तो जहां पर पशु प्रताड़ना बढ़ी है यह कोई मुस्लिम अथवा इशाई बाहुल्य क्षेत्र नही जबकि हिन्दू और वह भी उच्चवर्गीय हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र है. तो कहना यही पड़ेगा की गाय बड़ी न मैया सबसे बड़ा रुपैया.

 सरपंच पति अखिलेश तिवारी को दी गई जानकारी

   इस बीच समय निकालकर कशियारी ग्राम के सरपंच पति अखिलेश तिवारी को भी सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा अवगत कराया गया और जानकारी चाही गई की यह कार्य किसने किया. इस पर सरपंच ने कुछ जिम्मेदारी ली और पहले पहल बांकी ग्रामवासियों पर थोप दी. बता दें की कशियारी ग्राम पंचायत की सरपंच विमला तिवारी हैं. सरपंच का पति अखिलेश तिवारी पंचायत का पूरा काम धाम देखता है. बताया गया की अखिलेश तिवारी किसी कुष्ठ रोग विभाग में शासकीय कर्मचारी भी है लेकिन काम धाम छोड़कर मात्र नेतागिरी में ही लगा रहता है. अवैध बाड़ा इसी के द्वारा पंचायत के अन्य सदस्यों पर दबाब देकर बनवाया गया है. अखिलेश तिवारी द्वारा स्वयं भी बताया गया की उसके पास 200 एकड़ से अधिक की काश्त योग्य जमीन है साथ ही उसका पूरा परिवार वहां का जिमीदार परिवार है.

थाना अतरैला को भी लिखित की शिकायत

   इस बीच जब ग्राम पंचायत कशियारी में बनाये गए अवैध बाड़े में मरे हुए गायों के सबूत और प्रूफ इकठ्ठा कर लिए गए तब जाकर थाना अतरैला में लिखित तौर पर सूचित किया गया और दंडात्मक कार्यवाही की माग की गई. 

   शिवानंद द्विवेदी एवं पुष्पराज तिवारी द्वारा की गई लिखित शिकायत में पूरे वाकये को लिखा गया और भारतीय दंड संहिता की धारा 429 सहित पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1860 की धारा 11 एवं मप्र गोवंश वध प्रतिषेध अधिनियम अमेंडमेंट के अन्तर्गत कार्यवाही की माग की गई.

  थाना प्रभारी अतरैला द्वारा मामले पर लीपापोती

    इस बीच जब मोबाइल फ़ोन से अतरैला थाना प्रभारी को गोवंश प्रताड़ना के बारे में अवगत कराया गया तो थाना प्रभारी द्वारा बताया गया की डीएम कलेक्टर, एसडीएम एवं अन्य अधिकारियों को बता दें। ऐसी कोई बारदात नही है और कोई अवैध बाड़ा नही मिला है. जबकि थाना प्रभारी को पूरे मामले की फ़ोटो, लिखित शिकायत की प्रति, एवं बनाया गया वीडियो भी व्हाट्सएप्प के माध्यम से भी भेज दिया गया है.

दुर्गंध का रोजगार सहायक के विरोध करने पर जान से मारने और नौकरी से निकालने की धमकी

   ग्रामीणों द्वारा जो जानकारी सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमो से शेयर की गई थी उसमे कशियारी ग्राम पंचायत के रोजगार सहायक पर संदेह करते हुए सरपंच पति और उसके परिवार द्वारा रोजगार सहायक अंकित तिवारी को नौकरी से निकाले जाने एवं उनकी माँ को आंगनवाड़ी से निकाले जाने की धमकी दी गई है. स्वयं सरपंच पति अखिलेश तिवारी ने कहा की रोजगार सहायक अंकित तिवारी एवं उसकी माँ की आंगनवाड़ी की नौकरी मेरे हाँथ में है जब चाहूं तब निकाल सकता हूँ.

सरपंच पति ने कहा हम बाड़ा नही हटाएँगे

   इस बीच चर्चा के दौरान कशियारी सरपंच पति एवं कुष्ठरोग विभाग में कार्य करने वाले अखिलेश तिवारी ने कहा की बाड़ा हम नही हटाएँगे चाहे कुछ भी हो जाए. उसने आगे कहा की इन आवारा पशुओं से हमारी फसलों को नुकसान होता है इसलिए हमने बाड़ा बनवाया है. यदि स्कूल के पास से हटवा भी दिया गया तो अन्य जगहों पर बनाया जाएगा.

    अखिलेश तिवारी द्वारा यह भी कहा गया की अंकित तिवारी रोजगार सहायक का घर स्कूल और बाड़े के पास है अतः हमने जानबूझकर बाड़ा वहीं पर बनवाया है जिससे जब मवेशी मरें तो उसकी दुर्गंध से यह परेशान हों क्योंकि इन्होंने अपनी मा को हमारे विरुद्ध चुनाव में खड़ा किया था और हमारे विरोधी है. वहरहाल सरपंच पति और अन्य गोवंश प्रताड़ना में संलिप्त लोगों की वॉइस रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर मौजूद हैं.

यदि बाड़ा नही हटा तो मरेंगे सभी गोवंश

   अब देखना यह है की यदि अगले कुछ दिनों में स्कूल के पीछे से बाड़ा नही हटाया गया तो शेष बचे हुए गोवंश भी ठंड और भूंख प्यास से काल के गाल में समाहित हो जायँगे. अतः प्रशासन के लिए यह अति आवश्यक है की या की विधिवत पशुओं के सुरक्षा और रहने के इंतज़ामात किये जाएं नही तो वहां से इस अवैध बाड़े को जितना जल्दी संभव  हो हटवाया जाए.

प्रशासन निष्क्रिय मात्र एक्टिविस्टों के दम पर है गोवंशों की सुरक्षा

   निश्चित तौर पर पुलिश प्रशासन और जिला प्रशासन का नजरिया तो पशुओं के लिए बिल्कुल पशु जैसा ही है लेकिन पशु आधिकारों के लिए लड़ने और कार्य करने वाले संगठनों के लिए आगामी ठंड ऋतु एक बार फिर चुनौतियां लेकर आ रही है जिंसमे जगह जगह गांव गांव अवैध अनाधिकृत पशु बाड़े बनाये जाएंगे और पिछले वर्षों की ही भांति एकबार फिर गोवंश जिनमे बहुतायत में गायें होंगी भूंख प्यास और ठंड से तड़प तड़प कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देंगी.

संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखें रीवा जिला एवं थाना अतरैला स्थित ग्राम पंचायत कशियारी शासकीय प्राथमिक पाठशाला एवं हरिजन बस्ती के पीछे बनाये गए अवैध बाड़े में मृत पड़ी गायें एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी एवं सहयोगियों दवारा थाना अतरैला को लिखित दी गई शिकायत की प्रति.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 786992139

Friday, November 2, 2018

रीवा मप्र - फ्री का बीज किसानों को हज़ारों में, सब्सिडी वाले बीजों में जमकर चल रही धांधली, किसान अब जाए कहाँ, गंगेव कृषि विभाग से खाली हाँथ लौटाए जा रहे किसान (मामला ज़िले के गंगेव कृषि विभाग का जहां पर एकबार फिर रवी 2018-19 में भी बीज की कालाबाजारी और बन्दरबाट की चल रही तैयारी, किसान त्रस्त परेशान, कहीं कोई सुनवाई नही, सरकार के सभी दावे हवा हवाई)

 दिनांक 03 नवंबर 2018, स्थान - गढ़/गंगेव रीवा मप्र

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा)

     पिछले खरीफ 2018 में जुलाई अगस्त महीने में गंगेव किसान कल्याण एवं कृषि विकाश विभाग में खरीफ फसल के बीज की कालाबाजारी बता कर पूरा बीज निपटा दिया गया. किसान बेचारा जब भी कृषि विभाग आया उसे मायूस होकर खाली हाँथ ही लौटना पड़ा. किसानों को पुराना पहाड़ा पढ़ा दिया गया की खरीफ़ सीजन का बीज चोरी हो गया. चोरी गए बीज में लाखों रुपये के महत्वपूर्ण बीज थे जिनमे अरहर, उडद, मूग आदि के बीज सम्मिलित थे.

   रवी 2018-19 के बीज की भी कालाबाजारी की चल रही तैयारी

    इस बीच गाहे बगाहे खरीफ तो बीत गया और आ गया रवी 2018-19 का समय जब इस भीषण सूखे अकाल में किसान की पहले ही बुरी तरह से कमर टूट चुकी है ऐसे में यदि कोई किसान हिम्मत करके किसी तरह खेती किसानी करने और स्वयं के बोर के पानी से खेती करने की सोचा और बीज लेने के लिए यदि गंगेव कृषि विभाग का रास्ता अख्तियार भी किया तो उसे बता दिया गया की अभी बीज आया ही नही और जो आया था वह आरएईओ को अलॉट कर दिया गया.

    गंगेव कृषि विभाग में कितना बीज आया कोई जानकारी नही

   सबसे बड़ी बात पारदर्शिता के अभाव की है. गंगेव किसान कल्याण एवं कृषि विभाग में पारदर्शिता का भारी अभाव रहता है. यहां पर इसकी कोई जानकारी नही रहती की किस स्कीम के तहत कब और कितना बीज आया है और किस किस किसान को दिया गया. न तो कोई नोटिस बोर्ड में जानकारी और न ही किसी प्रकार की जबाबदेही. बस मौखिक फरमान जारी कर दिया जाता है. जब कभी भी किसान कोई भी बीज अथवा उर्वरक लेने कृषि विकाश विभाग जाता है और कोई बीज लेने का प्रयास करता है तो उसे फालतू के टेक्निकल और कागज़ी कचरे में फंसा दिया जाता है. पहुच वाले और दबंग किसानों से तो कोई कागज़ नही मागा जाएगा और ऐसे ही उन्हें कई क्विंटल बीज दे दिए जाएँगे लेकिन जब कोई एक से 2 अथवा 3 हेक्टेयर तक का छोटा किसान जाएगा तो उसे पचास प्रकार की कागज़ी उलझने बतायी जाएंगी जिससे वह परेशान होकर भाग जाए. आधार कार्ड, समग्र आई डी, ऋणपुस्तिका, बी  वन, बैंक खाता और पता नही क्या. जब किसान यह सब लेकर भी जाएगा तो उसे फिर कई कैटेगरी के बीज बता दिए जाएंगे जिंसमे कुछ 18 सौ रुपये क्विंटल, कुछ 64 सौ रुपये क्विंटल और कुछ अन्य प्रकार के. किसान इनमे से जो भी बीज खरीदता है उसकी कोई भी रशीद गंगेव कृषि विभाग में नही दी जाती है. किसान कितना भी रशीद की माग करे लेकिन कोई रसीद नही दी जाएगी. यह हाल हैं ब्लॉक लेवल के कृषि कार्यालयों के जहां दावे तो बड़े बड़े किये जाते हैं लेकिन धरातल पर बिल्कुल इसका उल्टा ही देखने को मिलता है.

  चने और गेहूं के बीज के ले लिए पैसे पर नही दिए रसीद

    गंगेव कृषि विभाग में दिनांक 02 नवंबर को दर्ज़न भर किसानों को बुलाया गया था और बताया गया था की आपको वृहस्पतिवार को बीज वितरित किये जाएंगे. हिनौती, बांस, पताई, गोंदरी आदि ग्रामों से कई किसान बीज मिलने की लालसा लिए गंगेव पहुचे लेकिन जब शुबह 11 बजे कार्यालय वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी किसान कल्याण एवं कृषि विकाश विभाग गंगेव पहुचे तो बताया गया की अभी एसएडीओ वीरेंद्र सिंह चौहान नही हैं अतः अभी बीज नही मिलेगा. इस बीच किसानों ने घंटों इंतज़ार किया तब एसएडीओ पहुचे और किसानों ने अपनी माग रखी तब एसएडीओ ने बताया की अभी हमारी 4 बजे तक मीटिंग चलेगी और 4 बजे के बाद ही देखा जाएगा की किसे बीज देना है किसे नही.

  मीटिंग के बहाने कालाबाजारी के बनते हैं प्लान

   वास्तव में देखा जाए तो मीटिंग का तो कोई औचित्य ही नही बनता. क्योंकि जब दर्ज़नों किसानों को बृहस्पतिवार के दिन कृषि विभाग में बुलाया जाता है तो सीधे उनकी समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए. पूरे सपताह भर में मात्र बृहस्पतिवार ही एक ऐसा दिन होता है जब सभी कृषि विस्तार अधिकारी अर्थात आरएईओ या ग्राम सेवक गंगेव कृषि विभाग में मिलेंगे नही तो इन ग्राम सेवकों न तो कृषि विभाग में और न ही ग्रामों में दर्शन होते हैं. ग्राम सेवकों के स्थान पर कार्य करने के लिए आजकल किसान मित्र भी बनाये गए हैं लेकिन इन किसान मित्रों का भी कोई रता पता नही रहता. सभी मात्र अपना हित साधने में रुचि रखते हैं. अपना लाभ देखते हैं. जिन किसान मित्रों और आरएईओ से अधिकारियों को ज्यादा माल मिलता है उन किसान मित्रों और आरएईओ को ज्यादा बीज दे दिया जाएगा. यह किसान मित्र और आरएईओ उस बीज को उन्ही किसानों को बेंचकर उसका पैसा कुछ स्वयं डाइजेस्ट कर जायेगे और शेष अधिकारियों को दे देंगे इस प्रकार की बातें अक्सर किसानों और अन्य ग्रामीणों द्वारा बताए जाते हैं.

  सूचना के अधिकार के तहत जानकारी छुपाने का प्रयाश 

   बात इतने तक ही सीमित नही रहती है बल्कि यदि कोई सज्ञान देशवासी इन कार्यालयों में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत कुछ जानकारी भी मांगता है वह भी छुपाने का प्रयाश किया जाता है और पारदर्शिता के अभाव में पूरा काला व्यापार अंदर ही अंदर चलता रहता है. जबकि कई बार किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा यह माग निरंतर की जाती रही है की बताएं कौन कौन सा बीज और उर्वरक अथवा अन्य योजना सम्बन्धी सामग्री किसानों के लिए आई है और किस किस रेट में अथवा कितनी सब्सिडी में सब उपलब्ध है, किसे किसे वितरित की गई इसकी सीजनवार समस्त जानकारी नोटिस बोर्ड में चस्पा की जाए जिससे यह पता चल सके की कौन कौन से किसानों क्या क्या बीज मिला है और किसे नही मिला है. लेकिन ऐसा कुछ भी नही किया जाता है और किसानों को मजबूर किया जाता है की या की वह मायूस होकर थक हारकर कृषि विभाग के चक्कर लगाकर वापस लौट जाएं अथवा हंगामा करें और तब जाकर उन्हें शांत करने के उद्देश्य से ऊंट के मुँह में जीरा डाल दिया जाए. यह सब तमाशा मात्र रवी अथवा खरीफ 2018 में ही नही देखने को मिला है बल्कि वर्षों से यही सब चल रहा है. सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा यह बातें गंगेव कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के समक्ष कई वर्षों से उठाई जाती रही हैं लेकिन इसे कभी भी गंभीरता से नही लिया जाता. हर बार की यही स्थिति है की जब दर्ज़नों किसान कार्यालय में इकट्ठा होते हैं और जब जमकर अपने हक की मग करते हैं तब जाकर इनके कानो में जूं रेंगती है. 

  ग्राम सेवक बिना कार्य के ही उठा रहे पेमेंट 

   केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा किसानों के हित में जो भी थोड़े बहुत कदम समय समय पर उठाये जाते हैं उनका सही तरीके से क्रियान्वयन नही हो पाने की वजह से ज्यादातर किसान सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित होकर अपने जीवन स्तर को ऊपर नही उठा पा रहे हैं जिससे उनके पीढ़ी दर पीढ़ी उसी गरीबी और उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं. किसान और भी गरीब और उपेक्षित होता जा रहा है और इन सबके पीछे का कारण है सरकारी कर्मचारियों और नेताओं द्वारा किसानों का शोषण. कहने को हर एक ग्राम के लिए दो तीन पंचायतों के बीच में एक ग्राम सेवकों एवं आरएईओ नियुक्त किये गए हैं साथ ही दो तीन गांव के बीच में किसान मित्र भी बना दिए गए हैं. ग्राम सेवकों की पेमेंट आज 50 हज़ार के आसपास है इसी प्रकार प्राइवेट किश्म के किसान मित्रों को भी एक हज़ार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से दिए जा रहे हैं लेकिन किसान मित्रों की तो बात छोड़िए, यहां 50 हज़ार रुपये प्रतिमाह पाने वाला ग्राम सेवक स्वयं किसान सेवक न होकर उसका मालिक बन चुका है. आज किसी भी ग्राम में जाकर पता लगाया जा सकता है और यह बहुत ही मुश्किल होगा की पता चल जाए की उस ग्राम का ग्राम सेवक कौन है. आज ग्राम सेवकों की भर्ती न होने की वजह से भी कई आरएईओ  पद खाली पड़े हैं जिनमे अन्य ग्राम सेवकों को प्रभार देकर एक ग्राम सेवक की ड्यूटी 2 से तीन आरएईओ में लगा दी गई है. फिर भी यदि देखा जाए तो कम से कम सप्ताह में एकबार हर किसी ग्राम में जाकर किसानों को सूचित किया जाकर किसी समुचित सार्वजनिक जगह पर ग्राम सेवक किसानों की मीटिंग ले सकता है और जानकारी दे सकता है की किसानों के लिए उस समय सरकार क्या क्या योजना लेकर आई है और कैसे किसान उसका लाभ ले सकते हैं. लेकिन इसके उलट जो भी योजनाएं आती हैं ग्राम सेवक किसानों से छुपाते हैं. कोई जागरूक किसान जब जाकर जानकारी कहीं से प्राप्त करते हैं तब जाकर उन्हें मिल पाती है. ग्राम सेवकों का कोई पता नही रहता की कहां हैं और कैसे मिलेंगे. ये किसी भूमि सम्बन्धी अथवा जल क्षमता का कोई प्रमाण पत्र बनवाना है तो भी ग्राम सेवकों को सीधा पिसान लेकर ढूंढना पड़ता है.

  इन इन  किसानों को लौटना पड़ा खाली हाँथ

   गंगेव कृषि विभाग में उपस्थित हुए किसानों ने जब जमकर हंगामा किया तो कुछ किसानों को तो चने और गेहूं का बीज दे दिया गया लेकिन दर्ज़नों किसान ऐसे थे जिन्हें मायूस होकर वापस ही लौटना पड़ा. 

   कैथा से शैलेन्द्र पटेल, राजेश पटेल, नरेंद्र पटेल, जगदीश पटेल, जगदीश पांडेय, भैयालाल पांडेय, दसरथ केवट, संपूर्णानंद द्विवेदी, सिद्धमुनि द्विवेदी, बड़ियोर से पुष्पराज सिंह, सुमंत सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, काशी सिंह, बड़ोखर से सुरसरी सिंह, मुनेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह, बीरेंद्र सिंह, दंगल सिंह, तेजप्रताप सिंह, मणिराज पटेल, सोरहवा से रामनरेश पटेल, हरीबन्स पटेल, राजबहोर पटेल, गणेश पटेल, सहित अन्य कई किसान ऐसे थे जिन्हें कागजों के मकड़जाल में उलझा दिया गया और बताया गया की उनकी जमीन एक जगह नही है और दूर दूर है इसलिए उन्हें बीज नही दिया जा सकता जबकि सभी उपस्थित किसान बीज के लिए बिलबिलाते रहे.

 आंख से सामने आया दो गाड़ी सैकड़ों बोरी बीज 

    इस बीच दिनाँक 01 नवंबर को जब शुबह से ही किसान गंगेव कृषि विभाग में उपस्थित थे तो दो डग्गा बीज आंख के सामने ही आया जिंसमे चने और गेहूं के सैकड़ों बोरिया प्रत्येक डग्गा सम्मिलित थीं. बोलेरो का पिक अप वाहन को गांव में डग्गा बोला जाता है.

    अब प्रश्न यह उठता है की गंगेव कृषि विभाग में पहले से ही काफी बीज भरा पड़ा है जिंसमे पूरा स्टोर हाउस फुल है और उसपर बैठने वाले कार्यालय में भी बीज भरा है ऐसे में जब दो गाड़ी पिकअप चना और गेंहू फिर आया है तो उसे क्या किया जाएगा. आखिर उपस्थित किसानों को क्यों नही दिया जा रहा था.

   एक ही बीज को क्लस्टर एवं बीज ग्राम योजना का बताया

    गंगेव कृषि विभाग में एक बात जो देखने को मिली उसमे एक ही प्रकार के बीज को अलग अलग योजना के नाम पर दिया गया. जिन किसानों के पास एक हेक्टेयर और उससे अधिक की जमीन थी उन्हें क्लस्टर प्रदर्शन बताकर चना का बीज 250 रुपये प्रति 75 किलो एवं गेहूं 150 रुपये प्रति क्विंटल बताकर दिया गया. और जिन किसानों की जमीन एक हेक्टेयर से थोड़ा कम थी उन्हें बीज ग्राम योजना बताकर वही चने का बीज 3150 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से एवं गेहूं का वही बीज 1800 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से दिया गया. इस पर उपस्थित कुछ किसानों ने इसका विरोध किया और दिए जा रहे बीज की रशीद भी मांगी लेकिन किसानों को कोई रशीद नही दी गई.

  संलग्न -  गंगेव किसान कल्याण एवं कृषि विकाश विभाग कार्यालय में उपस्थित किसानों की तस्वीरें. अपने अधिकारों की माग कर रहे किसान. बीजों से भरी गाड़ी और खाली हाँथ लौटते किसान.

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शिवानन्द द्विवेदी 

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

ज़िला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587,

7869992139

Thursday, November 1, 2018

रीवा - गंगेव कृषि विभाग में बीजों की कालाबाजारी का दौर (मामला ज़िले के गंगेव ब्लॉक का जहां पर किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग में बीजों की हो रही कालाबाजारी, चोरी होना बताया जाकर पूरे बीज का हो रहा बंदरबाट)


दिनांक 2 नवंबर, 2018, स्थान - गढ़/गंगेव, रीवा

  (शिवानन्द द्विवेदी, रीवा)

     ज़िला रीवा अन्तर्गत गंगेव किसान कल्याण एवं कृषि विभाग में किसानों को सब्सिडी एवं क्लस्टर प्रदर्शन में दिए जा रहे बीजों की कालाबाजारी का दौर चल रहा है. 

    किसानों को अनुदान और सब्सिडी में आने वाला धान, सोयाबीन, राई, अरहर, उड़द, मसूर आदि खरीफ के बीज की कालाबाजारी कर दी गई और जब किसान बीज लेने ब्लॉक में पहुचा तो उसे बता दिया गया की पचासों क्विंटल उड़द, मूग, अरहर आदि के बीज चोरी हो गए.

 रीवा कृषि डायरेक्टर सिंगाड़िया एवं भोपाल निदेशालय तक भेजी जानकारी 

   गंगेव कृषि विकाश विभाग एवं किसान कल्याण विभाग में खरीफ वर्ष 2018 में बतायी गई पचासों क्विंटल महत्वपूर्ण और अत्यंत कीमती कई लाख रुपये के बीजों की चोरी का मामला न केवल रीवा कृषि विभाग के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अधिकारियों जैसे एससी सिंगाड़िया और डीडीए एवं एसडीओ त्योंथर मनीष मिश्रा को दी गई बल्कि मामला उच्चस्तर तक भोपाल निदेशालय तक भेजा जा चुका है. कृषि विभाग के मप्र शासन के सबसे बड़े अधिकारी एवं उससे नंबर दो अधिकारी तक पूरी बात सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा मोबाइल फ़ोन और ट्विटर आदि के मॉध्यम से पहुचा दी गई है और किसानों के अधिकारों में डाले जा रहे है डाके की जांच कर कठोर कार्यवाही की माग की गई है.

सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कर कार्यवाही की माग 

   बीजों की निरन्तर हो रही कालाबाजारी की शिकायत सीएम हेल्पलाइन 181 मप्र शासन में भी की गई है जिंसमे शिकायत क्रमांक के मॉध्यम से सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा गंगेव कृषि विभाग के एसएडीओ एवं त्योंथर एसडीओ एवं डीडीए मनीष मिश्रा जो की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वाले पदों पर बैठे हैं इन्हें तत्काल हटाये जाने एवं कार्यवाही की माग की गई है.

नही दर्ज है कोई एफआईआर

   कृषि अधिकारियों द्वारा बीज चोरी होना तो बता दिया गया लेकिन जब इस संबंध में जानकारी चाही गई की क्या इस संदर्भ में गंगेव कृषि विभाग द्वारा कोई प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है तो गंगेव के प्रभारी एसएडीओ बीरेंद्र सिंह चौहान और बसंत गौतम एवं  अरोरा द्वारा बताया गया की हमने लिखित कंप्लेन मनगवां थाना और गंगेव चौकी में दी लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नही की गई.

गंगेव चौकी प्रभारी ने बताया संदिग्ध

   गंगेव कृषि विभाग में खरीफ 2018 के पचासों क्विंटल कई लाखों रुपये के बीज की चोरी सम्बन्धी घटना की जब जानकारी चाही गई तो चौकी प्रभारी गंगेव द्वारा बताया गया की पूरा मामला संदिग्ध है. चौकी प्रभारी ने आगे बताया की कुछ लोगों द्वारा जानकारी दी गई है की बीजों की चोरी ऐसे संभव नही है अतः इस बात को भी ध्यान में रखते हुए गंगेव कृषि विभाग में कार्यरत सभी अधिकारी कर्मचारियों के मोबाइल फ़ोन ले लिए गए हैं एवं साइबर सेल में दे दिए गए हैं जिससे यह पता किया जा सके की जिस रात और उसके पहले और बाद के दिनों में उन कर्मचारियों की किस किस से बात हुई है और जब चाभी कृषि कर्मचारियों के पास थी तो कैसे संभव हुआ की इतनी व्यापक पैमाने पर चोरी हो गई और भरे बाजार में किसी को पता तक नही चला, इन सभी बिंदुओं की जांच की जाएगी.

  यद्यपि चौकी प्रभारी ने अभी तक साइबर सेल में भेजे गए मोबाइल डिटेल के विषय में हुई अब तक की कार्यवाही के विषय में कोई स्पष्ट जानकारी नही दी है. बताया गया की भी जांच चल रही है.

  6 माह होने को हैं और नही पूरी हुई जांच

   अब सबसे बड़ी बात यह है की गंगेव कृषि विभाग में पचासों क्विटल कई लाखों रुपये के बीजों की चोरी होना खरीफ 2018 के प्रारंभिक जुलाई में बताया गया लेकिन आज रवी सीजन 2018-19 आने को है और अगले छमाही की फसल का सीजन आ चुका है लेकिंन मनगवां पुलिश विभाग द्वारा आजतक न तो इस विषय में कोई प्रॉपर एफआईआर दर्ज की गई है और न ही कोई सार्थक जांचकर रिपोर्ट सौंपी गई है जिससे मामला और भी संदिग्ध बताया जा रहा है और विभागीय सहभागिता की बू आ रही है. 

  संलग्न- किसान कल्याण एवं कृषि विकाश विभाग के समक्ष उपस्थित किसान.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक कार्यकर्ता

ज़िला रीवा, मप्र, मोब 9589152587, 7869992139

Monday, October 29, 2018

मप्र- बकिया बराज नहर में धकेली सैकड़ों गायों पर हो रहीं राजनीति, क्रेडिट लेने का चल पड़ा दौर (मामला सतना जिले में रामपुर थाना अन्तर्गत बकिया बराज नहर में धकेले गए गोवंशों का जहां पर वास्तविक समस्या और उसके समाधान के स्थान पर हो रही राजनीति)

दिनांक 30 अक्टूबर 2018, स्थान - सतना-रीवा बॉर्डर बकिया बराज से करहिया चचाई गेट, मप्र

(शिवानन्द द्विवेदी, ग्राउंड जीरो से)

   पिछले दो कई दिनों से सतना ज़िला एवं रामपुर थाना क्षेत्र अन्तर्गत आने वाले बकिया बराज नहर के अंदर सैकड़ों गोवंशों को धकेल दिए जाने का जो मामला प्रकाश में आया था उसमे कर कराकर कार्यवाही तो हुई और गोवंशों को काफी मसक्कत के बाद निकाला भी गया लेकिन चुनाव को देखते हुए कुछ राजनीतिक किश्म के लोग उन्ही गोवंशों पर अब राजनीतिक रोटी सेंकना भी प्रारम्भ कर दिए हैं. गोवंशों को सुरक्षित निकालने में किसका कितना योगदान रहा और कैसे निकाले गए इन बातों से हटकर गौ संवर्धन बोर्ड रीवा के सदस्य और उपाध्यक्ष और कुछ अन्य संगठन अपना नाम चमकाने के उद्देश्य से जमकर क्रेडिट लेने के प्रयाश कर रहे हैं.

   तटस्थता के उद्देश्य और समाज के सामने वास्तविक सच्चाई लाने के लिए आइए प्रकाश डालते हैं इस पूरे प्रकरण पर. जानते हैं क्या है सच्चाई और हंगामा है क्यों बरपा.

गोवंशों को सुरक्षित निकलने में मदद क्या है कोई एहसान? गौसंवर्धन बोर्ड का काम ही हैं गायों की सुरक्षा

  वास्तव में देखा जाए तो मप्र में विशेष तौर पर गौसंवर्धन बोर्ड का गठन कर उसके अध्यक्ष को एक राज्यमंत्री का दर्जा और एवन क्लास की सुविधा प्रदान किये जाने के पीछे का यही उद्देश्य है की मप्र में निरंतर कई वर्षों से गोवंशों के साथ हो रही प्रताड़ना को कम किया जाकर इनके पोषण एवं पुनर्वाश हेतु सार्थक और दूरगामी प्रयास किये जाएं और इन गोवंशों की सुरक्षा की जाए लेकिन इसके उलट पिछले कई वर्षों से यह देखा गया है मप्र गोसंवर्धन बोर्ड अपने कार्य में पूरी तरह से असफल रहा है. मप्र सरकार ने गायों की सुरक्षा को राजनीतिक आधार बनाकर चुनाव आते ही गो मंत्रालय तक बनाये जाने की घोषणा तो कर डाली है लेकिन इसके वाबजूद भी पूरे प्रदेश में गोवंशों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नही हुआ है.

मीडिया में खबर आते ही प्रशासन की टूटी निद्रा

   पिछले कई दिनों से लोकल पब्लिक द्वारा बकिया बराज नहर में असमाजिक आपराधिक तत्वों द्वारा डम्पर और ट्रेक्टर के माध्यम से सैकड़ों गोवंशों को सूखी नहर में डंप किये जाने का मामला चल रहा था. गांववालों ने यह जानकारी संबंधित थाना रामपुर में भी पहुचाई थी लेकिन आम आदमी की इस वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में न तो कोई सुनवाई है और न ही को कीमत इसलिए कोई कार्यवाही नही हो रही थी. इस बीच जब खबर व्हाट्सएप्प एवं सोशल मीडिया के मॉध्यम से दिनाँक 26 एवं 27 अक्टूबर को प्रकाश में आई तो सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं पशुओं के अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों द्वारा भी प्रयाश प्रारम्भ किये गए. 

फंसी गायों की जानकारी उच्चस्तर तक भेजी गई 

  इस बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट द्वारा बकिया बराज नहर की घटना की जानकारी सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया आदि के माध्यम से होते हुए गौ संवर्धन बोर्ड मप्र के अध्यक्ष अखिलेश्वरानंद, एनिमल वेलफेयर बोर्ड के अध्यक्ष एसपी गुप्ता, मप्र से एनिमल वेलफेयर बोर्ड के सदस्य राम रघुवंशी, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया के समिति में जुड़े हुए दर्जनों सदस्यों जिंसमे मोहन सिंह अहलूवालिया सहित पशुओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली विभिन्न संस्थाएं जैसे पीपल फ़ॉर एनिमल्स, ध्यान फाउंडेशन के सुदर्शन कौशिक, ज़िला सतना के एसपी एवं रामपुर थाना टी आई, ट्विटर के माध्यम से मुख्यमंत्री मप्र शासन, प्रधानमंत्री भारत सरकार सहित अन्य संबंधित जिम्मेदारों के समक्ष रखी गई जिस पर लगभग हर स्थान से प्रेशर लगाया गया और जितनी प्रशासनिक स्तर की मशीनरी सतना एवं रीवा जिले में पशुओं के लिए उपलब्ध थी सभी एक्टिव हुए जिंसमे पशु चिकित्सा विभाग का ज़िला एवं संभागीय दस्ता, नगर निगम रीवा का पशुओं को पकड़ने वाला दस्ता, बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के प्रबंधक सहित अन्य कई स्वयंसेवी संगठन और उनके लोगों ने भी अपना अपना योगदान दिया. 

  किन लोगों ने नहर से गोवंशों को चलकर सुरक्षित निकाला

    इस सम्पूर्ण अभियान में बकिया बराज नहर से लेकर करहिया चचाई गेट तक का लगभग 14 किमी के आसपास का सफर जिन लोगों ने पूरा किया और गोवंशों को चलाकर नहर के बीचोंबीच से चचाई गेट तक पहुचाया उनमे से नगर निगम के ड्राइवर, बैकुंठपुर से गोरक्षक  नितिन गौतम एवं विनीत गौतम, खुलासा न्यूज़ लाइव से ज़िला ब्यूरो आनंद द्विवेदी, कैथा से कार्यकर्ता संतोष केवट, एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी सहित एक दो अन्य गोवंश प्रेमी नहर के बीचोंबीच पूरे 14 किमी पैदल सफर तय करते हुए चचाई गेट के पास तक पहुचे जहां पर चचाई नहर के पास स्थित गेट को खोला गया और लगभग साढ़े तीन सौ की संख्या में गोवंशों की निकाला गया.

गो संवर्धन बोर्ड का पूरी रेस्क्यू प्रकिया में कितना रहा रोल

   सही मायनों में यदि देखा जाए तो मात्र चुनाव कहें की आचार संहिता का डंडा जिसकी वजह से कुछ हद तक इस बार गो संवर्धन बोर्ड के सदस्य कुछ रुचि लिए वरना आज पिछले कई वर्षों से पूरे रीवा में गोवंशों के साथ निरंतर हो रही अतिशय क्रूरता को रोकने में गोसंवर्धन बोर्ड का न तो कोई पता था और न ही कोई किसी प्रकार का योगदान. 

    चूंकि इस मर्तबा अगले कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और आदर्श आचार संहिता भी लगाए हुई है अतः जब कोई भी घटना जो की संवेदनशीलता की दृष्टि से इतनी व्यापक हो उस पर मीडिया और तमाम उछलने पर स्वाभाविक तौर पर इनको कार्यवाही करने मजबूर होना पड़ा. वरना जब थाना गढ़ क्षेत्र में पनगड़ी-भलघटी, लौंगा, क्योटी, रेहवा एवं नांदघाट के जंगली क्षेत्रों एवं हज़ारों फीट गहरी घाटी के नीचे ज़रीन गोवंशों को जीवित धकेल दिया गया था तब यह गौसंवर्धन बोर्ड और गायों के नाम पर माल ऐंठेने वाले संगठन सब कहां थे? तब तो दिल्ली और चेन्नई से टीमें आईं और गोवंशों की सुरक्षा की तब रीवा प्रशासन और मप्र में गौसंवर्धन बोर्ड और गोरक्षक दलों का कोई रता पता नही था. पर चूंकि अब जाना की चुनाव भी नजदीक है तो मामले को भुनाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी.

गोसंवर्धन बोर्ड के नाम पर कुछ सदस्यों ने गाय पर किया राजनीति

   अभी हाल ही में बकिया बराज नहर से लेकर चचाई गेट तक नहर के बीचोंबीच से गोवंशों को निकाले जाने का जो सार्थक प्रयाश सभी के सहयोग से हुआ उसमे अब गौसंवर्धन बोर्ड के कुछ सदस्य और उपाध्यक्ष मात्र अपने नाम से क्रेडिट लेने का प्रयास कर हैं.

 यदि गौसंवर्धन बोर्ड ने थोड़ा बहुत योगदान कर ही दिया तो कौन सा बहुत बड़ा कमाल कर दिया. गौसंवर्धन बोर्ड का तो काम ही है गायों की सुरक्षा करना. लेकिन वास्तव में देखा जाए तो बकिया बराज नहर की घटना के अतिरिक्त गौसंवर्धन बोर्ड का कोई रता पता कभी नही चला. गौसंवर्धन बोर्ड ने गायों के नाम पर रीवा में क्या किया यह कभी समझ नही आया जबकि सभी प्रताड़ना की वारदातें हमेशा से ही गौसंवर्धन बोर्ड के पास तक पहुचाई जाती रही हैं. पोषण की दृष्टि से देखा जाए तो लक्षमनबाग गोशाला में गायों की दुर्दशा किसी से छुपी नही है जबकि हर वर्ष लाखों करोड़ों का बजट दिया जाता है. 

    पर आज जब चुनाव नजदीक है और बोर्ड के कुछ सदस्य जो राजनीतिक दृश्टि से लाभ लेना चाह रहे हैं बकिया बराज नहर की घटना को राजनीतिक रंग देकर अपना स्वयं का महिमा मंडन कर रहे हैं, गलत भ्रामक प्रेस रिलीज के माध्यम से अपने नाम की बड़ाई बता रहे हैं. टीवी में इंटरव्यू और प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर बता रहे हैं की मात्र इन्होंने ने ही इतना सब कार्य किया है बांकी सारे ग्राउंड पर नहर के अंदर मेहनत करने वाले समाजसेवी और वास्तविक गोभक्तों का जैसे कोई योगदान ही नही रहा. यह काफी दुखद तो है ही साथ ही गोवंशों के अधिकार के लिए स्वतंत्र तौर पर कार्य करने वाले गोसेवकों के भी मनोबल को गिराने का प्रयाश है.

सूचना पर 27 अक्टूबर को क्या कहा सतना एसपी ने

    जब सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी की सतना एसपी से मोबाइल फ़ोन पर बात हुई तो उन्होंने घटना की जानकारी न होने की बात स्वीकारी पर उन्होंने बताया की वह हर संभव मदद करेंगे और आवश्यकता पड़ी तो क्रेन भी भेजकर गोवंशों को निकलवाने का प्रयाश करेंगे. आखिर जब गोसंवर्धन बोर्ड और अन्य संगठन एक्टिव बता रहे हैं तो एसपी को ऐसी भीषण वारदात को सूचना इसके पहले क्यों नही थी?

क्या कहा रामपुर थाना प्रभारी टी आई द्विवेदी ने

   जब कोई भी आपराधिक घटना जो की लॉ एंड आर्डर से सम्बन्धित हो घटित होती है तो उसमे सबसे पहले जानकारी पुलिश विभाग और संबंधित थाने को ही दी जाती है. इस पर जब रामपुर थाना प्रभारी श्री द्विवेदी से पूंछा गया तो उन्होंने घटना घटित होने की बात स्वीकारी और यह भी बताया की पिछले दो तीन दिन से बकिया बराज नहर में गोवंशों के धकेले जाने और उनके फंसे होने की खबर उन्हें कुछ नजदीकी गांववालों से मिली है. थानेदार ने आगे बताया की बीतेकल राजस्व तहसीलदार, पटवारी, आर आई, और नहर मंडल का दस्ता घटना का मौका मुआयना करने गए थे जिंसमे उनके थाने से भी कर्मचारी मौजूद थे. थाना प्रभारी रामपुर ने लगभग ढाई सौ गोवंशों के फंसे होने की वारदात स्वीकारी और बताया था की इन्हें नहर के अदंर ही चचाई गेट की तरफ से निकाले जाने का प्रयास चल रहा था लेकिन कहीं मजदूरों के साथ आसपास के ग्राम के किसानों ने मारपीट कर दी जिसके कारण गोवंशों को निकाला नही जा सका था.

क्या बकिया बराज नहर में यह गोवंशों को धकेलने की एकमात्र घटना है?

    बकिया बराज नहर में घटित हुई यह गोवंश प्रताड़ना की घटना कोई एकमात्र नही है. जब ग्राउंड जीरो पर जाकर वहां के आसपास के राहवाशियों और ग्रामीणों से समाजिक कार्यकर्ता द्वारा जानकारी लेने का प्रयाश किया गया तो वहीं बीड़ा, सेमरिया, बकिया और आसपास के अन्य ग्रामों के लोगों ने बताया की यहां नहर के अंदर इस प्रकार की वारदातें अक्सर ही होती रहती हैं जब कुछ ऐसे ही असमाजिक और आपराधिक तत्व जीवित गोवंशों को डम्पर और ट्रेक्टर ट्राली में भरकर नहर में डंप कर देते हैं. जिससे अत्यंत फिसलन भरी और गहरी नहर से अपने आप निकल पाने में असमर्थ यह गोवंश फंसे रहकर भूंख प्यास से अपनी जान गवां बैठते हैं और न तो इन्हें कोई देखने वाला होता और न ही बचाने वाला. ग्रामीणों द्वारा बताया की इसके पहले भी कई मर्तबा ऐसी वारदातें होती रही हैं जिंसमे शाशन प्रशासन का कोई रता पता नही रहता था. लेकिन इस बार खबर सोशल मीडिया, मीडिया और उच्चस्तर के अधिकारी और गोसेवकों के बीच पहुचने के कारण इस स्तर की कार्यवाही हुई.

खतरनाक स्तर से खुली है नहर, नही है कोई फेंसिंग

   जब ग्राउंड जीरो में जाकर स्थिति का शोध किया गया तो पाया गया की ऐसे आपराधिक तत्वों के लिए यह कार्य और भी आसान था क्योंकि नहर के फैलाव के दोनो तरफ कोई भी फेंसिंग और प्रोटेक्शन वाल नही होने से न केवल मवेशियों के लिए जबकि आम नागरिक और चलते फिरते लोगों के लिए भी नहर के दोनो छोरों में खतरा बना हुआ था. यह भी जानकारी ग्रामीणों द्वारा दी गई की भले ही आपराधिक तत्व रोज मवेशियों को भरकर नहर में न फेंकते हों लेकिन यहां आमतौर कुछ मवेशी और व्यक्ति भी स्वयं भी नहर के दोनो तरफ के छोरों में फिसल कर गिर जाते हैं जिसकी वजह से अपनी जान गवां बैठते हैं अथवा शरीर के अंग टूट कर अपाहिज हो जाते हैं.

    सबसे बड़ी बात यह है जब 35 से 40 फीट वर्टिकल गहरी नहर बनाई गई थी तो क्या इस नहर के दोनो छोरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग की व्यवस्था के लिए जल संसाधन विभाग ने बजट नही दिया था? मानाकि हर नहर के दोनो छोरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग लगाना थोड़ा मंहगा पड़ सकता है लेकिन जब बात इतनी गहरी और खतरनाक नहर की हो जहां पर एक बार फिसलने के बाद नहर से सुरक्षित निकल पाना आसान न हो तो ऐसे में क्या शासन स्तर से ऐसी खुली हुई समस्त नहरों में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग क्यों न लगायी जानी चाहिए थी?

यदि नहर फेंसिंग होती तो ऐसी वारदातें रोकी जा सकती थी

   सबसे बड़ा प्रश्न यही है जब इतनी गहरी और चौड़ी नहर ग्रामों के बीचोंबीच है तो उसमे प्रोटेक्शन और सुरक्षा की दृष्टि से व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण थीं. खुली नहर छोड़ने का कोई औचित्य नही समझ आता. आज यदि इस नहर के दोनो छोरो में प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग जाली लगाई हुई होती तो संभवतः ऐसे आपराधिक एवं असमाजिक तत्वों के लिए बकिया बराज नहर में गोवंश प्रताड़ना जैसे घृणित कारनामे करने में इतनी आसानी नही होती. 4 से 5 फीट ऊंची प्रोटेक्शन वाल अथवा फेंसिंग निश्चित तौर पर ऐसी वारदात करने वालों के पीछे एक बार आड़े आ जाती और इतना आसान नही होता नहर के बीचोंबीच इन मवेशियों को ऐसे डंप किया जाना.

बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र बताया गया ओवरलोडेड 

   अभी इसी बकिया बराज गोवंश प्रताड़ना वाली घटना के समय ही जब बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के प्रबंधक अरुण गौतम से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया की वर्तमान में उनके केंद्र में 1750 की संख्या में गोवंश दाखिल हैं और इन लगभग साढ़े तीन सौ गोवंशों के साथ संख्या 2 हज़ार के पार चली जाएगी. जब गोवंश विहार केंद्र की क्षमता के विषय में जानकारी चाही गई तो उन्होंने कोई स्पष्ट जानकारी नही दी और बताया की वैसे वर्तमान में ही गोवंश विहार केंद्र ओवरलोडेड चल रहा है तात्पर्य यह हुआ की जितने गोवंश बसामन मामा में रखे गए हैं उनकी देखरेख पर भी एक तरह से प्रश्नचिन्ह ही है क्योंकि जब क्षमता ही नही है तो उनकी व्यवस्था कैसे होगी.

    वैसे अभी कुछ समय से बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र के विषय में नकारात्मक समाचार आती रही हैं जिंसमे कुछ सूत्रों द्वारा बताया जाता रहा है की बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र तो बना दिया गया है लेकिन व्यवस्था के तौर पर स्थिति चिंताजनक है. सोशल मीडिया में तो कुछ लोगों ने वहां भी गोवंशों के मरने की बातें कहीं है. वहरहाल सच्चाई क्या है वह तो बसामन मामा गोवंश विहार केंद्र सेमरिया में जाकर ही पता लगाया जा सकता है.

मप्र सहित पूरे भारतवर्ष में गोवंशों की स्थित चिंताजनक

   वाकया मात्र मप्र अथवा रीवा जिला तक ही सीमित नही रह गया है. यहां तो पूरे देश में ही गोवंशों को लेकर घमासान मचा हुआ है. आज समाज इतना अधिक स्वार्थी हो चुका है की उसे गोवंशों की जरूरत नही बची है. उसका एक सबसे बड़ा कारण है कृषि उपकरणों और मसीनों का ईजाद और दुग्ध उत्पाद प्राप्ति के अन्य साधन. कभी भारत कृषि प्रधान देश कहलाता था और कृषि को सबसे उत्तम माना जाता था और नौकरी पेशा आदि को कृषि के बाद रखा जाता था. लेकिन अब समय पूरी तरह से बदल चुका है. कृषि सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है और नौकरी पेशा सबसे ऊपर. जहां कभी बैलों को हलों में चलाकर खेती की जाकर गोबर और जैविक खादों का उपयोग होता था आज वहां पर मसीनों ट्रेक्टर, थ्रेसर से खेती होकर रासायनिक उर्वरक का प्रयोग चल पड़ा है. कभी ग्रामीण क्षेत्रों में जहां गोबर के कंडों और लकड़ी से भोजन बनाये जाने का प्रचलन था आज वहां पर गैस सिलिंडर की बहुतायत होने से गोबर के कंडों की भी उपयोगिता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. अब देखा जाए तो गोवंशों का उपयोग मात्र दुग्ध उत्पाद तक ही सीमित रह चुका है और वहां भी अब दूसरे विकल्प सामने आ रहे हैं जिंसमे सोयाबीन, गेहूं और अन्य जैविक माध्यमो से भी दूध और दुग्ध उत्पाद बनाये जाने की तकनीकी प्रक्रिया निकल चुकी है अतः रही सही गोवंशों की उपयोगिता भी अब पूरी तरह से समाप्ति की कगार पर है. अतः जब तक गायें दूध देती हैं तब तक तो लोग  किसी कदर अपने घरों में रखते हैं लेकिन जैसे ही दूध देना बन्द कर देेती हैं अथवा बूढ़ी हो चलती हैं उन्हें घर से बाहर कर दिया जाता है. बछड़ों और बैलों की तो और भी अधिक दुर्दशा हो रही है. आज शहर एवं ग्राम तमाम जाएं तो सड़कों गलियों के किनारों पर घूमते लाठी खाते हुए बैलों का झुंड दिख जाएगा. कहीं कूड़े करकट के ढेर से कचरा खाते हुए तो कहीं जहरीली पॉलिथीन खाते हुए. इस प्रकार हमेशा ही इनके जीवन को संकट बना रहता है. कई बार शहरों की गलियों में आवारा घूमते हुए पशुओं के पेट में मरने के बाद कई किलो पन्नियां निकाली जाती हैं. आज शिवजी का नंदी इस भारतीय समाज के लिए बोझ और गोमाता माता न रहकर मात्र उपभोग की सामग्री बन कर रह गई है जब तक दूध दिया तो ठीक नही दिया तो छोड़ दिया.

गोवंश प्रताड़ना और अवहेलना आज एक राष्ट्रव्यापी समस्या

    अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है जब कोई समस्या समाज तक सीमित रहे घर गांव शहर तक सीमित रहे तो ठीक है लेकिन जब वह यहां से निकलकर प्रदेश और देश स्तर की बन जाए तो आखिर उसका क्या समाधान है? क्या इसमे अकेले समाज कुछ कर पायेगा अथवा अकेले सरकार कुछ कर पाएगी? समाज की स्थिति तो पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है और समाज ने तो गोवंशों को अब लगभग पूरी तरह से ही बहिष्कृत कर दिया है लेकिन जब समस्या इस लेवल की हो जाए तो शासन स्तर से क्या कुछ व्यापक और सार्थक प्रयास किये जाने चाहिए. आज मप्र में इसी समस्या को देखते हुए शासन स्तर से चुनाव को देखते हुए और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से वर्तमान सत्ताधारी सरकार ने तो गोसंवर्धन बोर्ड के बाद गो मंत्रालय तक बनाये जाने की घोषणा कर दी लेकिन क्या घोषणा मात्र करने से कुछ हो पायेगा? आखिर क्या है भारतीय समाज में इन गोवंशों का भावी स्थान? क्या भारतीय समाज में गोवंशों का अस्तित्व बना रहेगा अथवा पश्चिमी सभ्यता की तरह ही भारत में भी आगे चलकर मवेशियों को आहार ही समझा जाएगा और आने वाले समय क्या इन्हें मात्र बूचड़खानों का ही रास्ता दिखाया जाएगा अथवा कोई ऐसा प्रयाश किया जाएगा जिससे भारतीय संस्कृति का अस्तित्व और साथ ही गोवंशों का भी अस्तित्व बना रहे? 

  यह सब अनुत्तरित प्रश्न आज हम सबसे जबाब माग रहे हैं जिनका समाधान करना आज हर एक भारतवाशी का दायित्व है. - (शिवानन्द द्विवेदी की कलाम से)

  संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरों में देखने का कष्ट करें, बकिया बराज नहर से करहिया चचाई नहर गेट की तरफ लगभग 14 किमी का सफर नहर के बीचोंबीच तय करते हुए लगभग साढ़े तीन सौ गोवंशों को सुरक्षित निकाले जाने की प्रक्रिया में सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा स्वयं उपस्थित रहकर अपने मोबाइल कैमरे से तस्वीरें.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक कार्यकर्ता एवं गोवंश राइट्स एक्टिविस्ट

ज़िला रीवा मप्र, मोब 9589152587, 7869992139