Monday, February 13, 2017

(Rewa, MP) कटरा उप डाकघर में नहीं होता कोई कार्य - डाकपाल बताते हैं सर्वर डाउन


स्थान –  (रीवा, मप्र), दिनांक – 13/02/2017

        कटरा उप डाकघर में नहीं होता कोई कार्य - डाकपाल बताते हैं सर्वर डाउन

(त्योंथर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) त्योंथर तहसील एवं ब्लाक अंतर्गत आने वाले कटरा उप डाकघर में डाकपाल और वहां पदस्थ कर्मचारियों की मनमानी बराबर चल रही है. न तो इसे पोस्ट इंस्पेक्टर मऊगंज हल कर रहे हैं और न ही मुख्य डाकघर अधीक्षक रीवा संभाग.
अभी हाल ही में पिछले सप्ताह जब सोरहवा ग्राम निवासी राजबहोर पटेल पिता स्व. मंगल्दीन पटेल एवं अश्वनी पटेल पिता हरिबंस पटेल के डाक बीमा सम्बन्धी राशि जमा करने की गड़बड़ी की जांच हेतु उप डाकघर कटरा में जाया गया तब वहां पर पदस्थ उप डाकपाल श्री बंसल जिसे एसपीएम भी कहते हैं उनका कहना था की हमारा इन्टरनेट सर्वर डाउन रहता है इसलिए हम हितग्राहियों को कोई भी ऑनलाइन जानकारी नहीं दे सकते और न ही रजिस्ट्री स्पीड पोस्ट कर सकते. इस प्रकार जब पूंछा गया की क्या यह आज ही बस हो रहा है की रोज़ ही सर्वर डाउन रहता है तो जबाब मिला यह रोज़ का किस्सा है. इसी बीच यह भी बताना होगा की पिछले कई वर्षों से हिनौती शाखा डाकघर में पोस्ट ऑफिस का जिले का अब तक का सबसे बड़ा भ्रष्ट्राचार उजागर हुआ था जिसमे वहां के शाखा डाकपाल श्रीमती उमादेवी उपाध्याय और उनके कार्यकारी पति ब्रिजेश उपाध्याय द्वारा आम गरीब जनता की सामाजिक सुरक्षा पेंशन से लेकर दूसरे सैकड़ों हितग्राहियों के एसबी, चालू, टीडी, एफडी आदि विभिन्न प्रकार के खोले जाने वाले खातों की अच्छी खासी रकम जो की पचासों लाख हो सकती है हज़म कर ली गयी थी. जिस पर उस समय पदस्थ मऊगंज पोस्ट निरीक्षक नवीन कुमार द्वारा सतत रूप से जांचें करवाई गयी पर चूँकि पोस्ट इंस्पेक्टर की सांठ-गाँठ के कारण कोई निष्कर्ष न निकला तो उस समय श्री जैन सहायक पोस्ट अधीक्षक सतना द्वारा स्वयं आकर जांच की गयी जिसमे एक पूरी की पूरी टीम गठित कर जांच की गयी तो पूरा का पूरा भ्रस्ट्राचार उजागर हुआ. अब हिनौती शाखा पोस्ट मास्टर और पोस्टमैन उमा देवी उपाध्याय एवं ब्रिजेश उपाध्याय से लाखों की रिकवरी हो चुकी है और दोनों निलंबित होकर जेल जाने की कगार पर हैं.   
यह पूरा प्रकरण इस क्षेत्र की जनता के लिए आँख खोल देने वाला था. जिसमे पोस्ट ऑफिस के एक छोटे से कार्यालय में पंचायत और पोस्ट कर्मचारियों अधिकारियों की पूरी मिली भगत से गरीब जनता की सौ दो सौ रुपये मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन से लेकर पोस्ट ऑफिस के विभिन्न बैंक खातों में जमा लाखों रुपये तक हज़म कर लिए गए थे.
निश्चित तौर पर कहा जायेगा की कटरा उप डाकघर जिसमे की हिनौती ब्रांच पोस्ट ऑफिस और अन्य शाखा पोस्ट ऑफिस की अनियमितताओं की जानकारी निरंतर कंप्लेंट के रूप में प्रेषित होती रही है कटरा एसपीएम द्वारा कोई भी यथार्थ कार्यवाही नहीं की गयी. हमेशा ही हितग्राहियों को पल्ला झाड़कर रीवा मुख्य डाक घर भेज दिया जाता रहा है. इस प्रकार देखना यह होगा की अभी भी पोस्ट ऑफिस के कर्मचारिओं की आदत दुरुस्त नहीं हो पाई है. कटरा डाक कर्मचारियों का रवैया बिलकुल पहले जैसा ही बना हुआ है जिसमे सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए और इनके कार्यों का मूल्यांकन कर ऐसे अयोग्य और अप्रतिस्पर्धी कर्मचारियों की समय से पहले ही छुट्टी होनी चाहिए.
कृपया संलग्न यूट्यूब लिंक में देखें कटरा उप डाकघर के डाकपाल और अन्य हितग्राहियों का इंटरव्यू. https://www.youtube.com/watch?v=CFN1jl6JCHw
साथ में देखें कटरा पोस्ट ऑफिस के अन्दर बाहर के कुछ फोटोग्राफ.
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Shivanand Dwivedi
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Sunday, February 12, 2017

(Rewa, MP) करहिया से डाढ़ प्रधानमंत्री सड़क का घटिया निर्माण - निम्न दर्जे का बालू-गिट्टी उपयोग किया जा रहा


दिनांक – 12/02/2017
स्थान –  (रीवा, मप्र)

करहिया से डाढ़ प्रधानमंत्री सड़क का घटिया निर्माण - निम्न दर्जे का बालू-गिट्टी उपयोग किया जा रहा

(त्योंथर, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) त्योंथर तहसील एवं ब्लाक अंतर्गत बनने वाली करहिया से डाढ़ तक की प्रधानमंत्री सड़क का कार्य प्रारंभ होने से क्षेत्रीय जनता में काफी हर्ष था पर जैसे ही कार्य प्रारम्भ हुआ लोगों में चिंता की परछाई साफ़ झलकने लगी. लोगों को लगा कि यह भी उन्ही देशी कार्यों में से है जहाँ निम्न और दोयम दर्जे का कार्य कर अच्छी खासी मोटी रकम गरीब जनता से टैक्स के रूप में चूस ली जाती है.
जी हाँ प्रकरण कुछ ऐसा ही है. गंगेव ब्लाक अंतर्गत आने वाले हिनौती पंचायत के पास सेदहा अथवा कैथा मोड़ के नाम से पहचाने जाने वाले स्थान से प्रारंभ होता है करहिया और डाढ़ ग्राम का रास्ता. यह सड़क एक लम्बे अरसे से कच्ची पड़ी हुई थी जिसे देखने वाला कोई नहीं था. पर जब सामूहिक हस्ताक्षर अभियान चलाकर शासन-प्रशासन की नज़र में रखा गया तो इसके भी निर्माण कार्य की स्वीकृति हुई. अब जब यह निर्माण कार्य प्रारंभ हो चुका है तो यहाँ भी भ्रस्ट्राचार की बू आना स्वाभाविक है. देश का दुर्भाग्य है की जब तक किसी भी कार्य में प्रश्न न खड़े हों तब तक वह सही तरीके से हल ही नहीं सकता. क्योंकि नैतिकता, जिम्मेदारी और ईमानदारी पूर्ण कोई भी आवंटित कार्य कर देना तो अब इस देश के शासकीय विभागों की संस्कृति में ही लगता है नहीं बचा. क्योंकि विभाग और ठेकेदारों की मनमानियां तो कभी भला रुक ही नहीं सकती. विभागों को जहाँ ठेकेदारों से सीधे सांठ-गांठ पर शेयर मिल जाता है तो भला उन्हें क्या पड़ी हुई है की अपने सर्वेयर अथवा निरीक्षक दल भेजकर किसी भी आवंटित कार्य के गुणवत्ता की जांच करवाएं. जब जनता हो-हल्ला बोलती है तब जाकर सम्बंधित विभागों सहित ठेकेदारों के भी कान में जू रेगती है.
अभी हाल ही में हिनौती से कलवारी मोड़ जाते समय कैथा मोड़ के पास रुक कर करहिया से डाढ़ तक बन रही त्योंथर ब्लाक अंतर्गत आने वाली इस सड़क को देखा गया तो पाया गया की वहीँ पर क्रेशर प्लांट का थर्ड ग्रेड का राखड अथवा तथाकथित बालू उठाया जा रहा था और उसी विवादस्पद पनगड़ी के के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नामक किसी गिरीश सिंह अमहा के क्रेशर से निम्न दर्ज़े की गिट्टी उठायी जा रही थी. इसी गिट्टी का प्रयोग पुल जैसा संवेदनशील परिवहन मार्ग बनाने से लेकर अन्य रोड के कार्यों में किया जा रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि हाई वाटर फ्लो वाले इस क्षेत्र में यदि पुल मजबूत ढंग से न बन पायी तो अगले बरसात में ही दिलीप बिल्डकॉन की पुलों और रोडों की तरह यह रोड भी पानी में बह जाएगी. ऐसे में जो करोड़ों रुपये जनता की गाढ़ी कमाई से सरकार खर्च कर रही है वह सब ठेकेदारों और प्रधानमंत्री सड़क के अधिकारियों को भेंट में दे देने से ज्यादा कुछ और नहीं हो सकता. इससे तो बेहतर यही होता की सरकार यह प्रधानमंत्री सड़क का पैसा सीधे आरटीजीएस अथवा नेफ्ट अंतरण के माध्यम से ठेकेदारों और प्रधानमंत्री सड़क के अधिकारियों के खाते में डाल देती जिससे न तो काम की कोई चिंता ही होती और जनता को भी खबर नहीं लगती. क्योंकि लोकतंत्र में आने वाला एक-एक पैसा जनता की खून पसीने की कमाई होती है वह किसी की बपौती नहीं. अतः यदि कोई भी सरकारी अथवा सार्वजनिक कार्य करवाया जा रहा है तो उसके एक-एक पैसे का हिसाब कोई भी सरकार और शासन-प्रशासन देने के लिए वाध्य है. यही है लोकतंत्र वर्ना यूरोप में नाजियों का शासन भी था जहाँ मात्र तानाशाही ही चलती थी.     

      वहरहाल संलग्न फोटो में देखें की किस तरह से करहिया से डाढ़ मार्ग का घटिया निर्माण निम्न दर्जे के निर्माण सामग्री के साथ किया जा रहा है. इसकी सख्त जांच कर कार्यवाही होनी चाहिए और साथ ही पहले से बन चुके घटिया पुल को तोड़कर उच्च दर्जे का गुणवत्ता पूर्ण पुल का निर्माण किया जाना चाहिए.

संलग्न – त्योंथर ब्लाक अंतर्गत करहिया से डाढ़ प्रधानमंत्री सड़क निर्माण का दृश्य

मोबाइल नंबर जिनसे इस विषय में और जानकारी ली जा सकती है

   1) जीएम प्रधानमंत्री सड़क मऊगंज खंड श्री यादव - 09425304105,
   2) जीएम प्रधानमंत्री सड़क रीवा/त्योंथर खंड श्री दवे - 09407021465
 

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Thursday, February 9, 2017

(Rewa, MP) कांकर-डाढ़ पंचायती क्षेत्र में तार से गायों का बाँध दिया जाता है मुह, चारा पानी बिना तड़प कर मरते गौवंश


कांकर-डाढ़ पंचायती क्षेत्र में तार से गायों का बाँध दिया जाता है मुह,
चारा पानी बिना तड़प कर मरते गौवंश


(गढ़/कांकर/गंगेव, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) गौवंशों के प्रति क्रूरता किसी भी हद तक कम होने का नाम नहीं ले रही है. दिनांक 07 फरवरी की सुबह लगभग नौ बजे एक और ह्रदय विदारक वाकया सामने आया जिसमे एक भूरे-लाल रंग की गाय के मुख में तार बांधकर उसे छोंड दिया गया था. स्वाभाविक है की इस स्थिति में गाय न तो कुछ खा सकती थी और न ही पी सकती थी. मामला था रीवा के त्योंथर तहसील अंतर्गत कांकर पंचायत और डाढ़ पंचायत के आसपास का. भमरिया में अवैध बाड़े में पशुओं के मरने और उनके ऊपर क्रूरता का प्रकरण रिकॉर्ड करने के बाद जैसे ही आगे जाया गया तो पाया गया की कांकर में वन चौकी के पास एक गाय का मुख बुरी तरह से तार से बाँध दिया गया है. वह इधर उधर घूम रही थी पर कुछ भी खाने पीने में असमर्थ थी.
 वन चौकी कांकर के पास उपस्थित चौकी गार्ड को मामला बताया गया तो चौकी गार्ड ने गाय का तार निकालने का प्रयास किया. परन्तु गाय अकेले पकड़ में नहीं आ पाई. इस प्रकार मामले को डाढ़ पंचायत के निवासी पुष्पराज तिवारी, इन्द्रलाल साकेत आदि को बताया गया. तब जाकर चार-पांच लोगों के सहयोग से गाय को किसी तरह पकड़कर उसके मुख में बांधा हुआ तार निकाला गया. सम्पूर्ण घटना की फोटो एवं विडियो रिकॉर्डिंग भी कर ली गयी है जो की यूट्यूब में भी अपलोड कर दी गयी है जिसे पूरी दुनिया देख सकती है
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घटना का स्थल पंचनामा बनाकर गढ़ पुलिश को सूचित किया गया
     
गाय के मुख में बंधे तार और उसे निकालने के सम्पूर्ण प्रकरण का स्थल पंचनामा भी बनाया गया. जिसमे वहां पर उपस्थित सभी लोगों ने अपना हस्ताक्षर किया जो की यहाँ पर संलग्न भी है. पूछताछ करने पर भी यह जानकारी नहीं हो पायी की वह कौन से असमाजिक क्रूर व्यक्ति थे जिन्होंने ऐसा घोर कृत्य किया. सम्पूर्ण घटना की जानकारी गढ़ थाना प्रभारी बी आर सिंह को भी मोबाइल फ़ोन के माध्यम से दे दी गयी. लेकिन दुर्भाग्य यह है की गौवंन्शों और पशुओ के साथ निरंतर हो रही क्रूरता और अत्याचार पर अब तक रीवा जिले में रोक नहीं लग पा रही है.

लालगांव के हर्दी-अटरिया में बने अवैध बाड़े में दिनांक 09 फरवरी
को कुछ और गायों का हुआ दुखद अंत

     इसी बीच दिनांक 09 फरवरी दिन वृहस्पतिवार को लालगांव पंचायत स्थित हर्दी-अटरिया नामक स्थान पर जाया गया तो वहां का नज़ारा देखकर होश उड़ गए. जिस हर्दी-अटरिया के अवैध बाड़े को पुलिश बंद बता रही थी वहां पर पुनः वही बाड़ा बना हुआ पाया गाय. इतना ही नहीं जाब बाड़े की व्यवस्था देखा गया तो पता चला की सी ई ओ जनपद पंचायत गंगेव के माध्यम से प्राप्त हुआ कटीला तार अभी भी बाड़मे लगाया हुआ है. इस बात से साफ़ जाहिर होता है की पूरे ब्लाक गंगेव में बने अवैध बाड़ों में कहीं न कहीं शासन प्रशासन की सः है अन्यथा आम आदमी में इतनी जुर्रत कहाँ की वह कानून को इतनी आसानी से हाँथ में ले सके.  
घटना स्थल पर कटीले तारों के अन्दर बनाये गए बाड़ों में तीन चार गायें दयनीय स्थिति में नज़र आयें जो बहुत जल्दी मरने वाली थीं और एक गाय तो मृत बाड़े में ही पड़ी हुई थी जिसके शरीर से बदबू भी आ रही थी जो की बाड़े में महामारी फ़ैलाने का साफ़ साफ़ इशारा कर रही थी. इस प्रकार देखा जा सकता था की जिन असामाजिक तत्वों और गौ हत्यारों ने अवैध तरीके से बाड़ा बनाया हुआ था उन्होंने न तो कोई उचित चारे पानी की व्यवस्था की हुई थी और न ही मृत पड़े सड़ांध लिए मवेशी को उठाने की ही कोई व्यवस्था थी. आज गौवंशों के प्रति क्रूरता दिन पर दिन बढती जा रही है. कहीं न कहीं यह स्वर्हती मानव आज गौवंशों की वश्यकता कम हो जाने के कारण बैलों को आवारा छोंड दे रहा है जिससे वह तथाकथित किसानों की फसलों को नुकसान पंहुचा रहे हैं और जिसके कारण लोग कानून को धता बताकर गौवंशों के ऊपर निरंतर अत्याचार कर रहे हैं.

बैलों और पशुओं की देशव्यापी सीमित नसबंदी समाधान का एक पहलू

   यद्यपि सुनने में तो थोडा अटपटा लग सकता है पर कहना पड़ेगा की यदि आज बैलों और गौवंशों की आवश्यकता इस समाज को कम है तो क्यों न पशुपालन और पशु चिकत्सा विभाग के सहयोग से सरकारें इन पशुओं की नसबंदी करवा दें. इससे कम से कम यह तो होगा की एक जनरेशन के बाद दूसरी जनरेशन सीमित हो जाएगी जिससे इन बेजुबान एवं मूक गौवंशों और पशुओं के ऊपर अत्याचार होने से बचाया जा सकता है. अब जहाँ तक सवाल है मानव की उपयोगिता का तो यदि आज इस कलयुगी मानव को गौवंश और गायें बूढ़े माँ बाप की तरह भार बन गयी हैं तो इस मानव को दुग्ध उत्पाद खाने पीने का भी कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. राईट टू मिल्क प्रोडक्ट यानि दुग्ध उत्पाद काधिकार के अंतर्गत सरकारें ऐसा संवैधानिक नियम कानून लायें जिसमे हर वह व्यक्ति जो दुग्ध उत्पाद का सेवन करे उसे गौवंशों की सुरक्षा और एनिमल वेलफेयर के लिए एक निश्चित टैक्स देना पड़े तब जाकर गौवंसों की स्थिति में सुधार हो सकता है और उनके पालन और सुरक्षा के लिए देश व्यापी बजट का आवंटन कर कार्य किया जा पायेगा. शासन-प्रशासन के साथ समाज की भी जिम्मेदारी गौवंशों की सुरक्षा के लिए तय होनी चाहिए और जो भी जिम्मेदारी से भागे उसके ऊपर ऐसे बनाये गए राईट टू मिल्क प्रोडक्ट अधिनियम के तहत दुग्ध उत्पाद से वंचित किया जाना चाहिए.  

जिले में पशु सुरक्षा और पशु क्रूरता सम्बन्धी सभी अधिनियम निष्क्रिय

कहने को तो पशुओं और गौवंशों की सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हैं पर देखना होगा की उन नियमों का पालन क्या कहीं भी पूरे मप्र में सही तरीके से हो पा रहा है. मप्र में विशेष तौर पर गौवंश प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक वर्ष 2010/12 में पारित किया गया जिसमे गौवंशों के वध पर और प्रताड़ना पर पांच हज़ार तक का जुर्माना और अधिकतम सात साल के कैद का प्रावधान है और यह अपराध संज्ञेय भी है साथ ही आरोपी को अपने आप को दोषमुक्त सिद्ध करना पड़ेगा ऐसा प्रावधान है. इसी प्रकार पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत भी कई प्रावधान हैं जिन्हें यदि कड़ाई से लगाया जाये तो पशुओं और गौवंशों के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता काफी हद तक बंद की जा सकती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के अंतर्गत भी पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही करने का प्रावधान है.

संलग्न – त्योंथर ब्लाक के कांकर पंचायत में वन चौकी कांकर के पास गौ के मुख में बंधे तार को निकलने का विडियो और कुछ फोटो.
https://www.youtube.com/watch?v=SgOqXzwNb38&t=4s

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Wednesday, February 8, 2017

(Rewa, MP) हिनौती के पास बने अवैध बाड़े में एकसाथ फिर मरीं दर्ज़न भर गायें



हिनौती के पास बने अवैध बाड़े में एकसाथ फिर मरीं दर्ज़न भर गायें

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) सुबह यूँ तो सैर के लिए कई लोग जाते हैं पर कभी कुछ उद्येश्य लेकर चलने में दोनों कार्य सफल हो सकते हैं. एक तो सैर का आनन्द मिलता है दूसरा अन्य कार्य भी लगे हाथ हो जाता है. पर कुछ कार्य ऐसे होते हैं जहाँ आनंद तो कम और दुःख-दर्द ज्यादा महसूस होता है.

मामला है गंगेव ब्लाक अंतर्गत आने वाली हिनौती ग्राम पंचायत का जहाँ ग्राम हिनौती के पास कैथा मोड़ में पाण्डेय ढाबा के पास बनाये गए अवैध बाड़े में दिनांक 07 फरवरी की सुबह लगभग सात बजे बाड़े में एकसाथ दर्जन भर गौवंश मृत पाए गए जिसका की घटना स्थल पर पहुच कर विडियो और फोटो भी लिया गया जो की संलग्न है. मामला पूरा दिल दहला देने वाला था जिसमे चार छोटे बछड़े तो एकसाथ मौत के घाट उतर गए. यह स्पस्ट नहीं हो पाया की बछड़ों की मौत किस कारण से हुई. क्योंकि एकसाथ इतने अधिक गौवंशों का मरना स्वाभाविक रूप से संदेह प्रकट कर्ता है. कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है की इन्हें यूरिया अथवा दूसरे पेस्टिसाइड देकर मारा जा रहा है.

घटना की जानकारी गढ़ थाना प्रभारी बी आर सिंह सहित डायल 100 को

 उक्त गौवंशों के मरने की जानकारी पुनः एक बार गढ़ थाना प्रभारी बी आर सिंह को दे दी गयी. साथ ही घटना को मध्य प्रदेश शासन की डायल 100 सेवा एवं आपातकाल पुलिश व्यवस्था को भी दे दी गयी परन्तु दोनों ही जगहों से आश्वाशन के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ. गौवंश प्रताड़ना सम्बन्धी घटना की डायल 100 में सूचना क्र. P17038001580 है जो की दिनांक 07 फरवरी को सुबह 07:32:30 बजे दर्ज कराई गयी है. थाने वालों के लिए तो यह आम बात हो गयी है. चाहे कोई कितना भी डायल 100 में कंप्लेंट करे कोई फर्क नहीं पड़ता साथ ही गढ़ थाना प्रभारी भी गौवंशों वाले मामले में अपना हाँथ सकेलते ही नज़र आये. क्योंकि अब तक जितने भी पशु क्रूरता के प्रकरण सामने आये हैं उन सबमे कोई विशेष कार्यवाही दोषिओं के ऊपर नहीं हो पाई है. जबकि देखा जाए तो आवेदक एवं सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा स्वयं ही इस प्रकरण में कई लिखित आवेदन प्रस्तुत किये जा चुके हैं. यद्यपि इनमे क्या कार्यवाही हुई इस पर आर टी आई लगाना बांकी है.   

मप्र एवं भारत के पशु सुरक्षा और पशु क्रूरता सम्बन्धी सभी अधिनियम धराशायी

कहने को तो पशुओं और गौवंशों की सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हैं पर देखना होगा की उन नियमों का पालन क्या कहीं भी पूरे मप्र में सही तरीके से हो पा रहा है. मप्र में विशेष तौर पर गौवंश प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक वर्ष 2010/12 में पारित किया गया जिसमे गौवंशों के वध पर और प्रताड़ना पर पांच हज़ार तक का जुर्माना और अधिकतम सात साल के कैद का प्रावधान है और यह अपराध संज्ञेय भी है साथ ही आरोपी को अपने आप को दोषमुक्त सिद्ध करना पड़ेगा ऐसा प्रावधान है. इसी प्रकार पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत भी कई प्रावधान हैं जिन्हें यदि कड़ाई से लगाया जाये तो पशुओं और गौवंशों के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता काफी हद तक बंद की जा सकती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के अंतर्गत भी पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही करने का प्रावधान है.

गौवंशों और बेजुबान पशुओं के साथ क्रूरता मानवीय संवेदनाओं के अंत का द्योतक

      यह भारतीय संस्कृति का दुर्भाग्य है की आज मात्र गौवंशों और पशुओं की सुरक्षा के लिए भी राजनीति की जा रही है. अब कम से कम आम जनता के समक्ष यह बात भली-भांति स्पष्ट हो जाएगी की क्या यह राजनीतिक पार्टियाँ मात्र मानवीय संवेदनायों को आधार बनाकर ही तो राजनीतिक लाभ ले रही हैं. न ही इन्हें गौवंशों की सुरक्षा से कोई लेना देना है और न ही आम किसान और आम जनता से.
      यह बात सत्य है की आवारा पशुओं से आज हर एक किसान और कास्तकार त्रस्त है परेशान है पर प्रश्न यह भी है की क्या आवारा पशुओं और गौवंशों को अवैध रूप से बनाये गए बिना किसी उचित व्यवस्था के बांडो में चारा, पानी, भूसा, छत बिना कड़ाके की ठण्ड में तड़पने मरने के लिए छोंड देने से किसानों की समस्या का समाधान हो जायेगा? किसान यह कैसे भूल सकता है की यही गौवंश हैं जिनके दूध, दही, घी, और दुग्ध उत्पाद खा पीकर वह पला बढ़ा है और उसके बाल बच्चे इन्ही गौवंशों के दुग्ध उत्पाद से पल बढ़ रहे हैं. क्या हर सुबह जब हम एक कप चाय पीते हैं तो इस बात का एहसास नहीं करते की इस चाय में डाला गया दूध किसी
 दुधारू पशु से ही प्राप्त हुआ होगा?
    
      आखिर इन गौधनों की इतनी बड़ी दुर्दशा क्यों? क्या यही हमारे ग्रामीण किसान भाई हर एक ग्राम पंचायत में स्वयमेव ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकते कि एक-दो पशु सभी लोग अपने घरों में बाँध लें और अन्य पशुओं की तरह ही इनकी भी व्यवस्था बना लें?

पशु और गौवंश न होने पर प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ेगा प्रतिकूल असर
    
      आज अज्ञानता अथवा हेकड़ी बस भले ही किसानों और भारतीयों को यह बात समझ न आ रही हो पर यह बात तय है की यदि गौवंश और पशुधन न रहेंगे तो पूरी भूमि बंजर हो जाएगी. प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जायेगा. उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. शांस लेने के लिए हवा न मिलेगी और पीने के लिये पानी नहीं होगा. ऐसा समय आयेगा की मानवता एक-एक दाने के लिए तरस जाएगी. क्योंकि आज विज्ञान भी इस बात को मान रहा है की रासायनिक खादों के हो रहे निरंतर प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति कमजोर पड़ रही है जिससे हर वर्ष भूमि में पिछले वर्षों की तुलना में अधिक उर्वरक और रासायनिक तत्वों का प्रयोग करना पड़ रहा है. आज कृषि विज्ञान जो गोबर अथवा बायो-खाद और बायो-उत्पाद की निरंतर बात कर रहा है वह इसी वजह से कर रहा है कि लगातार बढ़ रही मानवीय आवादी के पालन-पोषण के लिए निरंतर बंजर हो रही भूमि की उर्वरा शक्ति कैसे बढ़ाई जाए.
     
प्रदेश के हर जिले में कलेक्टर के संज्ञान में है पशुपालन एवं पशु संवर्धन समिति
     
      जिला स्तरीय समितियों की यदि बात किया जाए तो गौधन और पशुधन के पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के हर जिले में विशेष निगरानी समितियों का गठन होता है जो सदैव जिला कलेक्टर के संज्ञान में रहता है. जिला कलेक्टर यदि चाहे तो या की मनरेगा की उप योजना अंतर्गत अथवा पशुपालन विभाग द्वारा तीन-चार पंचायतों के बीच में आवारा गौवंशों की सुरक्षा और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए बजट का आवंटन करवा कर इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान कर सकता है. परन्तु यह सब इच्छाशक्ति और योजनायों के सही क्रियान्वयन पर निर्भर करता है. आज यह जिले में भली भांति विदित है की पशु चिकित्सा विभाग की मदद से कई पंचायतों में गौ संवर्धन केंद्र बनाने बाबत बजट दिया गया था परन्तु वह सब भ्रष्ट्राचार की बलि चढ़ गया. क्या यह सब देखने वाला कोई नहीं है? आखिर क्या जिला कलेक्टर के संज्ञान में यह बातें नहीं हैं? क्या किसानों की आवारा पशुओं सम्बन्धी समस्या जो किसी न किसी माध्यम से रोज ही मीडिया में छाई रहती है जिला प्रशासन अथवा प्रदेश स्तर पर ज्ञात नहीं है? सबको सब कुछ ज्ञात है, मात्र आवश्यकता है उसके सही क्रियान्वयन की और समस्या के उचित निराकरण की. 


संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.


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Sunday, February 5, 2017

(Rewa, MP) कैथा पंचायत में 14.92 लाख रुपये के खेत-सड़क प्रोजेक्ट में लीपापोती



कैथा पंचायत में 14.92 लाख रुपये के खेत-सड़क प्रोजेक्ट में लीपापोती

(थाना-गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) पंचायतों में किस हद तक भ्रष्ट्राचार व्याप्त है इसका पता इसी बात से चल जाता है की सीएम हेल्पलाइन, सीजी नेट स्वर में प्रकरण रखने के बाद जब श्री राधेश्याम जुलानिया पंचायत अपर मुख्य सचिव एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा कैथा पंचायत में जांच दल भेजा गया तो वहीँ से लीपापोती प्रारंभ हो गयी. रीवा से जो जांच दल आया उसके दो सदस्यों ने मात्र कुछ एक-दो आवेदकों का कथन लिया और सब कुछ लीपापोती करके चले गए.
जिन मनरेगा आवेदकों ने मनरेगा में काम न मिलने और जेसीबी अथवा मशीन से कार्य किये जाकर मजदूरों का हक़ मारे जाने की शिकायत सीजीनेट स्वरcgnetswara.org में सामाजिक कार्यकर्ता के माध्यम से रखी थी उन मजदूरों को आज जांच के लगभग तीन महीने उपरांत भी कोई कार्य नहीं दिया गया. सभी मजदूर पुनः काम की माग कर रहे हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है.
अभी हाल ही में पुनः लगभग दर्ज़नभर आवेदकों ने सीजीनेट में प्रकरण रखा है और रोजगार सहित कार्यवाही की माग की है.
जिन आवेदकों को मनरेगा अधिनियम 2005 के अंतर्गत काम के लिए आवेदन देने के वाबजूद भी कार्य नहीं दिया गया है उनके नाम हैं – विहारी लाल साकेत, बतसिया साकेत, बुद्धसेन साकेत, देवकली साकेत, भूअर साकेत, छाठीलाल साकेत, संतोष केवट, तेजेश्वरी केवट, रावेन्द्र केवट, कैलाश केवट, सतानंद केवट, बुद्धसेन केवट, उग्रभान केवट, राजेश केवट, दिनेश केवट, प्रसंनलाल केवट, नन्दलाल केवट, सुमित्री केवट, गायत्री चतुर्वेदी, वैजनाथ केवट आदि. परन्तु महीनों भर सम्बंधित पंचायत सचिव अच्छेलाल पटेल के पास आवेदन जमा किये जाने के उपरांत भी आज तक इन हितग्राहियों को पंचायत में मनरेगा के अंतर्गत कार्य नहीं दिए गए हैं.

मनरेगा में खेत-सड़क योजना अंतर्गत 14.92 लाख रुपये के कार्य को जेसीबी और मशीन से करवाया गया – गुणवत्ता निम्न दर्जे की: कार्य एक लाख से भी कम का परन्तु निकाले जा रहे पूरे लाखों-

कैथा पंचायत जनपद पंचायत गंगेव अंतर्गत संपत्ति पटेल के घर से पंचायत भवन तक का बंद पड़ा हुआ खेत सड़क योजना का निर्माण कार्य होना बताया जा रहा है. यह कार्य 14.92 लाख रुपये का स्वीकृत बताया गया है. सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी में पता चला है की यह एक किमी लम्बा मार्ग उच्च गुणवत्ता पूर्ण बनाकर ग्रेवल रोड बनाई जानी थी परन्तु यहाँ भी लीपापोती का पूरा प्रयास चल रहा है और बिना काम के ही पैसे निकाले जा रहे हैं. अभी जून 2016 में निम्न गुणवत्ता और भ्रस्ट्राचार की शिकायत पर कार्य बंद करवा दिया गया था परन्तु अभी पुनः कार्य प्रारंभ हो चुका है और मजदूरों को कोई जानकारी नहीं दी गयी. मनरेगा के जो भी मजदूरों ने कार्य के लिए आवेदन दिया था उन्हें पूंछा तक नहीं गया और सभी मजदूर बेचारे काम की आस लगाये बैठे रह गए. जब पुनः मशीनों और जेसीबी से काम प्ररम्भ किया गया और रोड पर मशीनें और जेसीबी दिखीं तो मजदूरों के होस उड़ गए. जिस पर पुनः सभी मजदूरों ने एकत्र होकर सचिव, सीइओ और कलेक्टर को पुनः ज्ञापन सौंपा है अपने अधिकारों के हनन पर कार्यवाही की मांग की है.

संलग्न- (फोटोग्राफ) पंचायत भवन से संपत्ति पटेल के घर तरफ खेत सड़क योजना का14.92 लाख रुपये का कार्य जिसमे पुनः बिना मिटटी डाले ही निम्न गुणवत्ता की थोड़ी बहुत मोरम डाली जा रही है.

(Video- कैथा निवासी शैलेन्द्र पटेल द्वारा मोबाइल से बनाया गया विडियो जिसमे जेसीबी खेत सड़क प्रोजेक्ट में चल रही है.)





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Saturday, January 28, 2017

(Rewa, MP) कैथा पंचायत भवन में गणतंत्र दिवस पर नहीं फहराया गया तिरंगा झंडा



दिनांक - 27/01/2017
स्थान कैथा रीवा मप्र.

   (गढ़, रीवा, शिवानन्द द्विवेदी) तथ्य तो यह कहते हैं की भारत देश को एक लम्बे ऐतिहासिक आन्दोलन के बाद विदेशी अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता सन 1947 में प्राप्त हुई. इसके बाद 26 जनवरी सन 1950 में हमारा विखरा हुआ भारत देश एकत्रित होकर गणतंत्र कहलाया. सभी देशों की तरह भारत के भी विभिन्न राष्ट्रीय चिन्ह रखे गए जिनमे से अशोक चक्र सहित केसरिया-श्वेत-हरित रंग का तिरंगा झंडा हमारा राष्ट्रीय ध्वज भी है. 
   राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को लेकर समय समय पर विभिन्न बातें सुनने को मीडिया के माध्यम से मिलती रहती हैं. अभी हाल ही में पिछले दिनों रीवा के गंगेव जनपद स्थित कैथा पंचायत में तथाकथित क्षतिग्रस्त बताये जा रहे पंचायत भवन में न तो ग्राम सभा की मीटिंग ही रखी गयी और न ही 26 जनवरी 2017 को गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा ही फहराया गया. इस बात को लेकर ग्रामीण जनमानस में काफी आक्रोश व्याप्त था. मौका देखकर ग्रामीणों ने तो घटना का मौका पंचनामा भी बना डाला और कलेक्टर रीवा के नाम ज्ञापन पत्रक भी तैयार कर दिया जिसमे गणतंत्र दिवस जैसे विशेष मौके पर पंचायत भवन कैथा में झंडा न फहराने के लिए सम्बंधित कैथा सरपंच संत कुमार पटेल और सचिव अच्छेलाल पटेल के विरुद्ध कार्यवाही की भी माग की है.  गणतंत्र दिवस के मौके पर कैथा पंचायत भवन परिसर में तिरंगा झंडा न फहराए जाने के विरोध में हस्ताक्षर करने वालों में कैथा ग्राम निवासी एवं पूर्व सरपंच प्रत्याशी श्री बुद्धसेन पटेल, श्री शैलेन्द्र पटेल, श्री उग्रभान पटेल, श्री  यज्ञभान पटेल, श्री संतोष केवट आदि सभी निवासी ग्राम पंचायत कैथा हैं जिन्होंने तिरंगे झंडे के अपमान और पंचायत के अपमान पर वर्तमान पंचायत को भंग कर वैकल्पिक व्यवस्था की माग की है.
       निश्चित तौर पर यदि देखा जाय तो गणतंत्र दिवस का भारतीय इतिहास में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. अंग्रेजों से वर्तमान समय में स्वतंत्रता प्राप्ति उपरांत 26 जनवरी वर्ष 1950 को जो भारतीय संविधान लिखा गया उसमे टुकड़ों में विभाजित भारतीय गणराज्य को एक कर नियम कायदों में बाँध कुछ विशेष राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह बनाये गए जो समय समय पर पूरे राष्ट्र को एक करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान देते आये हैं. पर यह भी देखना होगा की कुछ आपस की फूट और क्षेत्रीय राजनीति के वसीभूत होकर यह तथाकथित जन प्रतिनिधि अथवा संवंधित शासकीय पदों पर बैठे कर्मचारी भारतीय गंणतंत्र को क्षत-विक्षत करने का प्रयास कर रहे हैं अतः आज आवश्यकता हैं की शासन-प्रशासन इन मुद्दों पर सख्ती बरते और दोषिओं को कठोर दंड दे.

 संलग्न - 1) कैथा पंचायत भवन परिसर में सरपंच सचिव द्वारा गणतंत्र दिवस पर झंडारोहण न करने और ग्राम सभा की मीटिंग न लेने विषयक कलेक्टर रीवा को तैयार ज्ञापन पत्रक की फोटो प्रति. 2) कैथा ग्राम निवासी पूर्व पूर्व सरपंच प्रत्याशी श्री बुद्धसेन पटेल, श्री शैलेन्द्र पटेल, श्री उग्रभान पटेल, श्री  यज्ञ भान पटेल, श्री संतोष केवट सभी निवासी कैथा की संलग्न फोटो ग्राफ एवं हाँथ में लिए हुए संलग्न ज्ञापन पत्रक.

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