Saturday, January 14, 2017

(Rewa, MP) लौरी-गढ़ से हिनौती वाया कैथा-इटहा प्रधानमंत्री सड़क का कार्य प्रारंभ (Gangev Block, Rewa)

Date: 15/01/20-17. 
Place - KAITHA (Rewa, MP)
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(गढ़/गंगेव, रीवा मप्र)

       बहु प्रतीक्षित प्रधानमंत्री सड़क योजना अंतर्गत बनने वाले लगभग नौ किमी लम्बे मार्ग का कार्य कैथा एवं आसपास के अन्य ग्रामों को जोड़ने वाली सडकों पर प्रराम्भ हो चुका है. 
       ज्ञातव्य हो की गढ़-लौरी से हिनौती वाया कैथा-इटहा का यह लगभग नौ किमी लम्बा मार्ग प्रधानमंत्री सड़क योजना अंतर्गत बनने वाला सबसे लम्बा मार्ग हो सकता है. मौगंज में प्रधानमंत्री सड़क योजना के लिए कार्य करने वाले एजीएम श्री गुप्ता का कहना है की सामान्यतया प्रधानमंत्री सड़क योजना अंतर्गत बनने वाला कोई भी मार्ग लगभग पांच किमी के आसपास होता है. जहाँ तक सवाल है  हिनौती से लौरी मोड़ तक का यह मार्ग जो कि कैथा, इटहा और अकलसी सहित कई ग्रामों से होकर गुजरता है लगभग सौ वर्ष पुराना है जिस पर शासन-प्रशासन का ध्यान न तो यहाँ के जन प्रतिनिधि आकृष्ट कर पाए और न ही कोई विधायक सांसद ही इस क्षेत्र पर मेहरबान हो सका. नतीजा यह हुआ की कैथा और उसके आसपास का विकाश कार्य हमेशा से ही ठप्प पड़ा रहा और एकदम बैकवर्ड क्षेत्र कहलाया. वर्ष 2012-13 तक यहाँ न तो उचित तरीके से बिजली मिल रही थी, न एक भी हैण्ड-पंप कार्य कर रहे थे और न ही सड़क की कोई उचित व्यवस्था थी. लौरी मोड़ से हिनौती-कैथा मोड़ वाया इतेहा-अकलसी तक की सड़क की कुल लम्बाई 12 किमी के आसपास है. इन सभी समस्याओं को देखते हुए जब देशव्यापी सार्वजनिक संस्था श्रीमद भगवद कथा धर्माथ समिति (भारत) का गठन वर्ष 2013 के जून महीने में किया गया उसी समय पानी विजली और सड़क जैसे मूलभूत अवश्यकतायों और मानवाधिकारों में से एक इन सभी मुद्दों को व्यापक पैमाने पर जिले से लेकर देश के उच्चतम विभागों जैसे प्रधानमंत्री कार्यालय नई दिल्ली तक रखा गया. नतीजा यह हुआ की जनहित के सभी प्रकरणों की सरकार द्वारा अनदेखी कर पाना संभव न था. और कहना पड़ेगा की तीनों ही मूलभूत आवश्यकताओं को सरकार ने सुना और आज यह हालात हैं सम्बंधित सभी विभाग भी इस क्षेत्र की समस्याओं को गंभीरता से ले रहे हैं. आज जब लौरी-गढ़ से हिनौती वाया कैथा-इटहा मार्ग का निर्माण कार्य प्रारंभ हो चुका है यह इस क्षेत्र के हजारों लोगों को पक्के सड़क मार्ग से जोड़ देगा जिससे पचासों ग्रामों को इससे सीधा लाभ मिलेगा. इससे पूर्व यदि कोई माताएं-बहन बीमार हो जाएँ, किसी का डिलीवरी का  केस आ जाए, किसी को कोई जहरीला सर्प डस दे, चाहे वह बच्चों को बरसात में स्कूल जाना रहा हो, अथवा कोई भी इमरजेंसी स्थिति निर्मित हो जाए, हर समय आम जनता से लेकर बड़े-बड़े जमीदारों-रसूखदारों तक को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ता था. सब पैसेवालों और रसूखदार लोगों के  पैसे-रुपये धरे के धरे रह जाते थे और कम से कम तीन से चार किमी तक का कच्चा और लंबा सफ़र पालकी में लेकर करना पड़ता था. तब न ही कोई नेता थे और न ही जन प्रतिनिधि जो इन समस्याओं का समाधान करवाते. क्योंकि नेताओं और तथाकथित जन प्रतिनिधियों को तो अपनी जेब भरने से मतलब था उन्हें आम जनता की समस्याओं से क्या लेना देना?

        वहरहाल जब एक पूर्णतया वैज्ञानिक और गणतीय दृष्टिकोण वाला यक्ति एक सामाजिक कार्यकर्ता का चोला पहनकर इस क्षेत्र में वर्ष 2012-13 में आया और आम जनता के दुःख-दर्द को देखा तो रहा न गया और जो अपने हाँथ में था उनमे से एक कार्य बड़े ही व्यापक पैमाने पर एक हस्ताक्षर अभियान चला कर किया गया जिसमे हजारों लोगों का हस्ताक्षर अंगूठा निसानी लेकर सभी समस्याओं को सम्बंधित विभागों तक सतत पहुचाया गया. निश्चित तौर पर मीडिया का योगदान किसी भी स्तर पर कम नहीं रहा है. मीडिया जनहित के विषयों को उठाने में जनता के सदैव साथ रही है. हाँ यह कहना पड़ेगा की मीडिया को सामाजिक मुद्दों और जनहित से जुड़े मुद्दों, गरीबों, असहायों, और पीडतों की आवाज़ को सतत उठाते रहना पड़ेगा. बदलाव तो हर स्थान पर दिख रहा है पर आवश्यकता भी उसी अनुरूप बढती जा रही है इसलिए कुछ लोगों को लग सकता है की परिवर्तन नहीं हो रहा है पर यह सच्चाई नहीं है. परिवर्तन हर एक क्षेत्र में काफी हद तक हो रहे हैं. 
        आज स्थिति यह है कि ग्राम क्षेत्र में उम्मीद के अनुरूप विकाश कार्य हो रहे हैं. जहाँ जिस ग्राम की जनता जितनी अधिक जागरूक है वहां विकास की गति उतनी अधिक देखी जा सकती है. मात्र आवश्यकता है जागरूकता की इसलिए आम जनता को सब भूलकर सामाजिक हितों के लिए एकजुट  होना पड़ेगा और मिल कर अपना सहयोग देना पड़ेगा तब जाकर सर्वांगीण विकास देखा जा सकेगा और फिर उस विकास का आनंद भी लिया जा सकेगा.

         अब देखना यह होगा की यह जो प्रधानमंत्री सड़क का कार्य कैथा और उसके आसपास के ग्रामों में चल रहा है वह गुणवत्ता पूर्ण किया जाए और ठेकेदारों की मनमानी न चलने पाए. वहरहाल तो गिट्टी के ऊपर डालने के लिए राखड/बालू पनगड़ी के के-स्टार नेचुरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड क्रेशर प्लांट से उठाया जा रहा है. ग्रामीणों जैसे शैलेन्द्र पटेल आदि द्वारा बताया गया कि यह निम्न दर्जे का बालू हरिजन और केवट बस्ती के पास सम्बंधित सड़क ठेकेदार द्वारा आरसीसी सड़क निर्माण के लिए डंप किया जा रहा है पर ठेकेदार और साथ ही मऊगंज एजीएम श्री गुप्ता से संपर्क किया गया तो बताया गया की यह बालू/राखड गिट्टी के ऊपर डालकर रोलर चलाये जाने के लिए लाया जा रहा है. अभी तो कार्य शुरु ही हुआ है पर यदि अनियमितता प्रकाश में आती है तो निश्चित रूप से शासन-प्रशासन और मडिया के समक्ष आ ही जायेगी.

         वहरहाल इस बहुप्रतीक्षित प्रधानमंत्री सड़क निर्माण से कैथा और उसके आपपास के ग्राम-क्षेत्र की जनता में काफी खुशी है और सबको लग रहा है की अब आम जनता की भी आवाजें सुनी जा रही हैं और गरीबों के लिए भी सरकारें ध्यान देना प्रारंभ कर दी हैं.

          
          संलग्न - गढ़-लौरी से हिनौती वाया कैथा-इटहा मार्ग के निर्माण कार्य का दृश्य. चौड़ी होती रोड और एक बगीचे में डंप किया हुआ रेत. 

मोबाइल नंबर जिनसे इस विषय में और जानकारी ली जा सकती है 
- 1) सहायक एजीएम श्री गुप्ता (मऊगंज प्रधानमंत्री सड़क) - 9893379918,
   2) जीएम प्रधानमंत्री सड़क मऊगंज खंड श्री यादव - 09425304105,
   3) जीएम प्रधानमंत्री सड़क रीवा खंड श्री दवे - 09407021465
  4) ठेकेदार प्रधानमंत्री सड़क लौरी-गढ़ से हिनौती वाया कैथा इटहा - 07566120474, 09109001021


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Shivanand Dwivedi
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Thursday, January 12, 2017

(Rewa, MP) जनहित के प्रयास को मिली सफलता - रीवा के सैकड़ों ग्रामों के लिए नहर परियोजना स्वीकृत, मानवाधिकार आयोग भोपाल एवं जल संसाधन विभाग रीवा का पत्र


Dated 13/01/2017,
Rewa Madhya Pradesh, INDIA.
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जनहित के प्रयास को मिली सफलता - रीवा के सैकड़ों ग्रामों के लिए नहर परियोजना स्वीकृत: मानवाधिकार आयोग भोपाल एवं जल संसाधन विभाग रीवा का पत्र


(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) वर्ष 2014-15 के दौरान जब देश में भीषण सूखा-अकाल की स्थिति बनी तो मानव से लेकर जीव जंतु तक त्राहि-त्राहि करने लगे. पेंड-पौधे खड़े-खड़े सूखने लगे. ऐसा लगा जैसे महाकाल इस कलयुग में जल्दी ही प्रलय लाना चाह रहे हैं. पर स्थिति सुधरी और अगले वर्ष ही 2016 में खरीफ के दौरान अच्छी बारिश हुई और यहाँ तक की कई जगहों में बारिश से तो पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड भी टूट गए.
वहरहाल जब अकाल पड़ा तो मात्र एक ही शब्द हर दिशा में गूंजमान था और वह था पानी-पानी. अब यह पानी कहाँ से आता क्योंकि जलवृष्टि तो नहीं ही हुई साथ ही नदी, नाले, हैंडपंप, बोरेवेल, तालाब, पोखार कूप सब सूखने लगे. ऐसे में रहीम दास जी का बस वह एक दोहा बहुत याद आ रहा होगा जिसमे कहते हैं – “रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून, पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून”. जी हाँ यदि पानी नहीं है तो कुछ नहीं है. चाहे वह मनुष्य का पानी (मान-सम्मान) हो, चाहे मोती की चमक बरक़रार रखने वाला पानी हो अथवा चूना में डाल कर उसे जगाने वाला पानी हो अथवा फिर जीवन रक्षक पानी हो. शब्द जलवायु में दो शब्द आते हैं एक जल और दूसरा वायु. यह वातावरण अर्थात जलवायु जल और वायु से ही मिलकर बना है. और यही जल और वायु सभी जीव जंतुओं, मानव, पेंड़-पौधों के जीवन के लिए आवश्यक है. आज जिस तरह से जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसका खामियाजा ही है की कहीं ज्यादा गर्मी कहीं ज्यादा ठंडी और कहीं सूखा तो कहीं अकाल. यह सब जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की वजह से ही हो रहा है पर आह! यह मानव है की समझने का नाम नहीं ले रहा है.

सामाजिक कार्यकर्ता का जनहित की दृष्टि से प्रयाश सैकड़ों ग्रामों को मिली नहर

सबसे पहले तो धन्यवाद के पात्र हैं मप्र मानवाधिकार आयोग भोपाल जिनके समक्ष रखे जनहित के प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए उन्होंने सतत रूप से जल संसाधन विभाग मप्र को नोटिस जारी की जिसके फलस्वरूप नहर परियोजना के कार्य में तेजी आई और अंततः अधीक्षण यंत्री श्री आर.एस. शर्मा के कार्यालय अधीक्षण यंत्री बाणसागर नहर मण्डल रीवा (मप्र ) का पत्र पृष्ठ क्र. 7493, एल.सी.सी./430/2016-17रीवा दिनांक 09/12/2016 प्राप्त हुआ जिसमे माननीय मानवाधिकार आयोग मप्र भोपाल के पत्र क्र. 30151/मा.आ.अ./रीवा-4199/16/2211/भोपाल दिनांक 16.11.2016 एवं पत्र क्र. 31441/मा.आ.अ./रीवा-4199/16/2012/भोपाल दिनांक 28.11.2016 का सन्दर्भ दिया गया और बताया गया की मनगवां तहसील के इटहा हल्का नं. 2, त्योंथर तहसील के जमुई हल्का नं. 31 और सिरमौर तहसील के हिनौती हल्का नं. 39 और इन हलकों के आसपास के अन्य कई हलकों के वास्ते आसपास के सैकड़ों ग्रामों के लिए वर्ष 2017-18तक उद्वहन या दबाब पद्धति द्वारा नहर पंहुच जाएगी और सरकार द्वारा इसकी स्वीकृति हो चुकी है (कृपया देखें संलग्न प्रपत्र की फोटो).

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता द्वारा मप्र मावाधिकार आयोग सहित जल संसाधन विभाग भोपाल, पीएमओ नई दिल्ली समेत कई फोरम में लगाई गई थी याचिका 

वर्ष 2014-15 का भीषण सूखा-अकाल देखते हुए पानी की भीषण समस्या को कई सरकारी फोरम/विभाग में रखा गया था जिसमे मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल, श्री राधेश्याम जुलानिया जल संसाधन विभाग भोपाल, पीएमओ नई दिल्ली, समेत सीजी नेट स्वर मुख्य थे. अन्य विभागों द्वारा क्या संज्ञान लिया गया यह तो स्पष्ट नहीं हो पाया क्योंकि याचिकाकर्ता  को अन्य विभागों द्वारा कोई जानकारी लिखित में उपलब्ध नहीं कराई गयी पर अभी हाल ही में पिछले वर्ष 2016 के दिसम्बर में एक संलग्न-प्रपत्र जल संसाधन विभाग के संभागीय कार्यालय रीवा से प्राप्त हुआ जिसमे मानवाधिकार कार्यकर्ता द्वारा मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल के समक्ष प्रेषित की गयी याचिका को आधार बनाकर श्रीमान अध्यक्ष महोदय मप्र राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल के कई पत्र जो की दिनांक 16.11.2016 एवं 28.11.2016को मानवाधिकार आयोग द्वारा जल संसाधन विभाग रीवा को संलग्न-पत्र में भेजा बताया गया है द्वारा सतत प्रयास किया गया जिसके फलस्वरूप व्यापक जनहित से सम्बंधित और मानवाधिकारों में से एक पानी की समस्या का निराकरण सैकड़ों ग्रामों के लिए कर दिया गया है. निश्चित रूप से इस कार्य के लिए बंधाई के पात्र तो सभी सम्बंधित विभाग हैं पर सबसे ज्यादा यदि कोई है तो वह हैं मप्र. राज्य मानवाधिकार आयोग भोपाल जिन्होंने इस प्रकरण की गंभीरता को लेते हुए सतत रूप से जल संसाधन विभाग को नोटिसें जारी कीं जिसके फलस्वरूप कार्य में अत्यधिक तेज़ी आयी.
इस प्रकार इस उद्वहन पद्धति की सिंचाई परियोजना से कैथा, पडुआ, इटहा, अमिलिया अकलसी, अगडाल, लौरी, बांस, करहिया, मिसिरा, हिनौती, सेदहा, बम्हनी, बड़ीयोर, डाढ, जमुई, दुवगमा, कांकर, नेवरिया, सर्रा, लोटनी, कठमना, मदरी, हीरूडीह, बरहट, देउर, कटरा, कलवारी, चियार, क्योटा, भठवा, पनगड़ी, पताई, सहित सैकड़ों ग्रामों को इससे लाभ मिलेगा. इस सिचाई परियोजना से निश्चित रूप से क्षेत्र में हरित क्रांति आ जायेगी और मानव से लेकर जीव-जंतु पेंड़-पौधे सभी को राहत मिलेगी और क्षेत्र का जलस्तर में भी सुधार होगा जिससे कम वृष्टि अथवा सूखा की स्थिति में जमीन का जलस्तर बना रखने में काफी मदद मिलेगी.                 

संलग्न – 1) अधीक्षण यंत्री श्री आर.एस. शर्मा के कार्यालय अधीक्षण यंत्री बाणसागर नहर मण्डल रीवा (मप्र ) का पत्र पृष्ठ क्र. 7493, एल.सी.सी./430/2016-17रीवा दिनांक 09/12/2016. 2) मानवाधिकार कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा श्रीमान अध्यक्ष महोदय समेत कई विभागों को भेजे गए पत्र की प्रतिलिपि भी संलग्न है.


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(Rewa, MP) रीवा में सैकड़ों अवैध बांडो में कैद गौवंश की हत्या – केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गाँधीजी और एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया के संज्ञान के बाद भी अब तक नहीं सुधरी स्थिति


दिनांक 12/01/2017, रीवा मप्र.

रीवा में अवैध बांडो में कैद गौवंश हत्या – केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी और एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया ने भी लिया संज्ञान


(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) रीवा जिले में जगह-जगह बनाये गए सैकड़ों अवैध बांडो में भूंख, प्यास और ठण्ड से मर रहे गौवंश और उनकी प्रताड़ना का किस्सा लगभग रोज़ ही रीवा जिले से लेकर प्रदेश के विभिन्न अख़बारों और मीडिया के अन्य माध्यमों सहित सोशल मीडिया में छाया हुआ है. सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा यूट्यूब में तो लगभग आधा दर्ज़न बांडो में पशु प्रताड़ना के पुरे दर्ज़नों विडियो ही अपलोड कर दिए गए हैं जिन्हें पूरा संसार सोशल मीडिया के माध्यम से देख सकता है.

अब संभवतः ऐसा प्रतीत होता है कि गोवंश की आत्माओं की आवाज़ अब जाकर धीरे-धीरे सुनी जाने लगी है वर्ना हालात तो यह थे की कितना भी चिल्लाओ कोई सुनने वाला नहीं था.

रीवा कलेक्टर से लेकर श्रीमती मेनका गाँधी जी तक रखा गया प्रकरण

गौवंश प्रताड़ना और अवैध बने बांडो में हो रही उनकी हत्या की जानकारी प्रथमतः सम्बंधित थाना गढ़ में दी गयी थी. अपेक्षित होने पर भी जब कार्यवाही न हुई तो अग्रिम जानकारी एसपी और कलेक्टर रीवा को प्रेषित हुई. वहां से भी हीलाहवाली होती रही तो सम्बंधित एनिमल राइट्स ग्रुप्स ऑफ़ इंडिया सहित केन्द्रीय मंत्रालय में श्रीमती मेनका गाँधी जी को भी प्रेषित की गयी. पशु क्रूरता और पशु सम्बन्धी अधिकारों के लिए काम करने वाला शायद ही भारत का कोई ऐसा विभाग रहा हो जहाँ यह जानकारी न दी गयी हो. सबसे अहम् रोल मीडिया का भी रहा जिन्होंने इस लोकहित के मुद्दे को लगातार अपनी न्यूज़ में रखे रहे.

एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया और श्रीमती मेनका गाँधी जी द्वारा कलेक्टर रीवा सहित एसपी, डीजीपी आदि से तलब की गयी जानकारी


अवैध बांडो में कैद गौवंशों का भूंख प्यास और ठण्ड से खुले आसमान में तड़प कर जान देने और उनके साथ निरंतर हो रहे क्रूरता के किस्से और लाइव रिपोर्ट रीवा के निचले स्तर से लेकर यूनियन मंत्रालय श्रीमती मेनका गाँधी तक भेजे जाने से गौवंशों पर हो रहे क्रूरता की जानकारी और उसको रोके जाने विषयक प्रयास की जानकारी श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय ने कलेक्टर रीवा से मांगी है जिसका ईमेल सामाजिक कार्यकर्ता और इस मुद्दे को व्यापक तौर पर उठाने वाले गौसेवक को भी भेजी है. दिनांक 10 जनवरी 2017 को 3:28 बजे शाम श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय से अगला ईमेल सामाजिक कार्यकर्ता को प्राप्त हुआ और साथ ही फ़ोन कर जानकारी भी बताई गयी जिसमे यह कहा गया की जिले में अवैध बांडो में कैद गौवंश हत्या और प्रताड़ना विषयक जानकारी तत्काल कलेक्टर रीवा से मागी गयी है और सामाजिक कार्यकर्ता से कहा गया की वह इस घटना पर नजर रखें और गौवंश/पशु प्रताड़ना सम्बन्धी कोई भी घटना तत्काल सूचित करते रहें. इसी प्रकार एक ईमेल एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया चेन्नई से भी प्राप्त हुआ है जिसे एसपी, कलेक्टर, डीजीपी, समेत अन्य विभागों को संबंधितों द्वारा संलग्न करके भेजा गया है और यह बताया गया है की सम्बंधित जिला प्रशासन तत्काल गौवंशों की प्रताड़ना विषयक मामले में कार्यवाही कर संबंधितों को सूचित करें.

भारतीय संस्कृति के एकेश्वरवाद से ही है अहिंसा का सिद्धांत

इस प्रकार यह जो अभियान गौवंश की सुरक्षा सम्बन्धी चलाया जा रहा है इसमें काफी हद तक सफलता मिल रही है पर देखना यह होगा यह समाज का भी उतना ही दायित्व है की इस महायज्ञ में सहयोगी बने. जीव की रक्षा ही वास्तविक धर्म है. जैनियों और बौद्ध ने भारतीय संस्कृति के अहिंसा के सिद्धांत पर जो इतना अधिक ध्यान केन्द्रित किया और अपना मूल सिद्धांत ही अहिंसा पर रखा उसके पीछे भारतीय सनातन संस्कृति का वही सिद्धांत है जिसमे एक ही परमेश्वर सभी जीवों में विराजमान है अतः किसी जीव को प्रताड़ित करना, कष्ट पंहुचाना और उसकी हत्या करना ईश्वर के नियमों का उल्लंघन है और अमानवीयता और ईश्वर विरोध की श्रेणी में आता है. भारतीय संस्कृति के छः दर्शन शास्त्रों मे से एक उत्तर मीमांसा अथवा वेदांत दर्शन में तो यहाँ तक कहा गया की जीवन संकट उत्पन्न होने की स्थिति में ही मानव मांसभक्षी बन सकता है परन्तु उसका भी प्रायश्चित तो करना ही पड़ेगा. अर्थात तात्पर्य  यह है की भारतीय संस्कृति में जीव हत्या निश्चित ही ईश्वरीय नियमों के पूर्णतः विपरीत है क्योंकि यह संस्कृति एकेश्वरवाद पर आधारित है और सबमे एक ही परमेश्वर के दर्शन करती है.

दिनांक 12 जनवरी 2017 तक नहीं सुधरी है रीवा के अवैध बांडो की स्थिति

      यद्यपि वर्तमान समय तक इतने प्रयासों के वावजूद भी तत्कालित तौर पर गौवंशों की सुरक्षा विषयक कोई विशेष सुधार जिले के अवैध बांडो में नहीं हुए हैं. अब तक मात्र लिखा-पढ़ी और आश्वासन ही बस दिए गए हैं.
      वास्तविक तौर पर देखा जाए तो लिखा-पढ़ी और आश्वासन की यहाँ पर कम आवश्यकता है और युद्धस्तर पर रेस्क्यू अभियान चलाने की ज्यादा. क्योंकि जिस प्रकार घाटी में हुई वर्फबारी से पुनः ठंड बढ़ी है इससे पहले से ही भूंख, प्यास, और छाया बिना कमजोर पड़ चुके सैकड़ों गौवंशों के लिए अगले एक सप्ताह तक की ठंडी झेल पाना नामुमकिन हो सकता है. वहरहाल जो जानकारी गढ़ थाना अंतर्गत सेदहा के भमरिया, लोटनी के क्योटा, लालगांव के सोनवर्षा, और हरदी तथा कटरा के गंतीरा के आधा दर्जन बांडो की मिली है उससे पता चला है की बीती रात लगभग आधा दर्ज़न अन्य गौवंशों की और मृत्यु हो चुकी है.
  


संलग्न – 1) विभिन्न विभागों जैसे - केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया, पशुपालन विभाग, पेटा- पोपेल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ़ एनिमल्स इंडिया आदि को भेजे गए ईमेल की प्रतिलिपि 2) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 3) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.













  

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Tuesday, January 10, 2017

(Rewa, MP) “गायों की सुरक्षा मानवता की आवश्यकता - भारतीय स्वदेशी गाय का वैज्ञानिक महत्त्व”


Date: 10/01/2017,
Place: - Rewa (MP)

“गायों की सुरक्षा मानवता की आवश्यकता - भारतीय स्वदेशी गाय का वैज्ञानिक महत्त्व”

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) भारतीय गाय की सुरक्षा मानवता के लिए तो आवश्यक है ही साथ ही प्राकृतिक संतुलन हेतु भी जरुरी है. आज कई स्वदेशी गायों की नस्लें या तो समाप्त हो चुकी हैं अथवा समाप्त होने की कगार पर हैं. शायद कम लोगों को ही जानकारी होगी जी जर्सी नस्ल की गायें मूलतः गाय और सूअर के जेनेटिक कॉम्बिनेशन द्वारा उत्पन्न हुई हैं. यूरोपियन ठन्डे प्रदेशों और पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वहां के वातावरण अनुकूल जर्सी गायों की जरुरत है उन्ही सभ्यताओं मात्र को है. भारत जैसे गरम भौगोलिक क्षेत्र में स्वदेशी नश्ल की गायें ही उपयुक्त हैं.

स्वदेशी नश्ल के गौवंश भारतीय संस्कृति की पहचान

जहाँ तक प्रश्न भारतीय सभ्यता का है वहां पर यह कहना होगा की देशी नस्ल की गायें ही हमारी भारतीय सभ्यता की पहचान रही हैं. चाहे वह बालक श्रीकृष्ण जी के बचपन के दिनों में अपनी लीलाओं को लेकर हो अथवा हिन्दू संस्कृति में गोदान, तर्पण आदि से सम्बंधित रहा हो. हर एक भारतीय संस्कारों में गायों का अभूतपूर्व धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. बिना गौवंश के भारतीय मानव वंश की कोई पहचान नहीं है. हाँ यदि गौवंश नहीं रहेगा तो भारतीय संस्कृति किसी पश्चिमी संस्कृति में समाहित हो जाएगी और अपना स्वयं का वजूद खो देगी. और निश्चित तौर पर जहाँ तक सवाल अस्तित्व का है तो किसी भी लहजे से यह भारतीय मानव के लिए कोई उपलब्धि नहीं होगी बल्कि उसके अंत का सूचक जरूर हो सकता है. और ये कहें की भारतीय मानव ही नहीं सम्पूर्ण मानवीय सभ्यता के अंत का सूचक हो सकता है.

गायें ऑक्सीजन लेकर अपेक्षाकृत ज्यादा ऑक्सीजन ही छोड़ती है

शायद यह बात सब को ज्ञात न होगी पर यह सच्चाई वैज्ञानिक अभिलेखों से प्राप्त हुई है की गाय और गौवंश ही धरती के कुछ विरले प्राणी हैं जो स्वयं भी ऑक्सीजन अर्थात प्राणवायु लेता है और अपेक्षाकृत प्राणवायु ही अपनी सांसों से छोड़ता भी है. वैज्ञानिक कारण यह है कि गायों/गौवंशों के फेंफडे प्राकृतिक तौर से ऐसे बने होते हैं वह खींची गयी ज्यादा ऑक्सीजन को डाइजेस्ट नहीं कर पाते अतः काफी ऑक्सीजन श्वांस प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाल दी जाती है. आज जब वातावरण में अत्यधिक जहरीली गैसों और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घुलती जा रही है ऐसे में स्वार्थी किस्म के मानव के लिए ऐसे जीवों का महत्व तो और अधिक होना चाहिए जो स्वयं दूध, घी, दही, दुग्ध उत्पाद तो दे ही रहा है साथ ही अपने गोबर-मूत्र से भी औषधीय तत्त्व देकर अपनी हर एक साँस से भी जीवनदायनी प्राणवायु दे रहा है. क्या ऐसे में गौवंशों की महत्वा और अधिक नहीं होनी चाहिए? चलिए मानाकि आज अत्यधिक स्वार्थी हो चुके मानव के लिए हर वस्तु में फायदे नुकसान दीखते हैं तो भी क्या गौवंशों की सुरक्षा मानव के हित में नहीं है?

आयुर्वेद में गौमूत्र अमृत तुल्य – देता है सभी बीमारियों से निजात

गाय का मूत्र इस पृथ्वी में अमृत समान है. गाय के मूत्र में मिनिरल्स जैसे पोटैशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, कॉपर, क्लोराइड एवं यूरिक एसिड आदि अत्यधिक संतुलित मात्र में होते हैं जिन्हें सेवन से मानव शरीर में कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि सभी बीमारियो से मुक्ति मिलती है. गायों का वखान भारतीय संस्कृति के मूल ग्रन्थ वेदों से लेकर शास्त्रों और पुराणों तक मिल जायेगा. गाय को भारतीय संस्कृति में माता की उपमा देना कोई सामान्य बात नहीं है. जैसे माता अपने पुत्रों को दूध पिलाने से लेकर उसके बड़े होने तक उसका सब प्रकार से ख्याल रखती है वैसे यदि देखा जाए तो गौमाता भी मानव के लिए हर प्रकार से लाभकारी है. यदि दूध और दुग्ध उत्पाद के तौर पर लिया जाए तो भी गाय का दूध अन्य पशुओं की अपेक्षा प्रोटीन, विटामिन्स, मिनिरल्स और जीवनदायनी शक्ति से भरपूर तो हैं ही साथ ही गाय का गोबर और मूत्र भी कहीं दुग्ध उत्पाद से कम लाभकारी नहीं है. आयुर्वेद में हजारों वर्षों से गौमूत्र और गोबर से विभिन्न प्रकार की असाध्य और जानलेवा बीमारियों से लड़ने के लिए औषधियां बनाई जाती रही हैं. गाय का मूत्र आवश्यक मिनिरल्स का खज़ाना है, इसमें मुख्या रूप से पोटैशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, कॉपर, क्लोराइड एवं यूरिक एसिड होता है. आज हम गायत्री शक्तिपीठ द्वारा संचालित हरिद्वार फार्मेसी अथवा बाबा रामदेव आदि के द्वारा दिव्या फार्मेसी में गौ मूत्रों से बनाये जाने वाले उत्पाद और दवाइयां कहीं भी आयुर्वेदिक स्टोर में खरीद सकते हैं जिसमे सामान्य सर्दी-बुखार से लेकर टीबी, स्थमा, पेट की बीमारियाँ से लेकर कैंसर, एड्स, आदि भयानक जानलेवा बीमारियों का उपचार संयम और खानपान में नियंत्रण से किया जा सकता है. वैसे सामान्य तौर पर गौमूत्र से लगभग 108 बेमरियाओं का इलाज़ होना बताया गया है. गौमूत्र दर्द निवारक, चर्म रोग, पेट के रोग, आंत्रशोथ, पीलिया, मुख रोग, नेत्र रोग, अतिसार, मूत्राघात, कृमिरोग, मधुमेह, मिर्गी, माइग्रेन आदि बीमारियों में लाभप्रद है. गाय के मूत्र में त्रिफला चूर्ण, गाय का दूध मिक्स करके पीने से अनीमिया रोग दूर होकर खून साफ़ होता है. गाय के मूत्र से जिगर मजबूत होकर रक्त सुद्ध होता है. आयुर्वेद के अनुसार गाय के मूत्र के नियमित सेवन से त्रिदोष नष्ट होते हैं. त्रिदोष का तात्पर्य वाट, पित्त और कफ जनक बीमारियाँ हैं जो शरीर के विभिन्न बीमारियों का कारण बनती हैं. गाय के मूत्र के सेवन से मानशिक तनाव और अनिद्रा की बीमारी से निजात मिलती है. गौमूत्र के सेवन से दिल मजबूत होता है और मानव शतायु अर्थात सौ वर्षों तक बिना किसी बीमारी के जीवन जी सकता है. शास्त्रों के अनुसार गौमूत्र के सेवन से अधिदैविक, अध्यात्मिक और अधिभौतिक तापों अर्थात कष्टों से मुक्ति मिलती है और सभी प्रकार की बीमारियों से निजात मिलती है.
क्या आज के वर्तमान समय में जबकि मेडिकल साइंस इतना महगा हो चुका है लगभग बिना कुछ खर्च किये यदि गौ के मूत्र से इतने लाभ प्राप्त हों तो क्या यह इस स्वार्थी मानव के लिए कम है?  

सवाल है मात्र मानशिकता बदलने का. आज जो पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ में व्यक्ति अपनी मूल संस्कृति और जड़ें भूलता जा रहा है यह मानवता के लिए घातक सिद्ध होने वाली हैं. ऐसा नहीं है की गौवंशों की सुरक्षा करने से गौमाताओं पर मानव बहुत बड़ा उपकार कर देगा? वास्तव में देखा जाए तो यह उपकार मानव गौवंशों पर नहीं अपने ऊपर कर रहा है. क्योंकि यदि इस श्रृष्टि को चलते रहना है तो सभी जीव जंतुओं का इसमें अपना एक विशेष महत्त्व है और बारम्बार वही महत्व किसी न किसी माध्यम से इन लेखों द्वारा बताया जा रहा है.

दिनांक 09 जनवरी 2017 की रात भमरिया के अवैध बांडे में भूंख प्यास ठण्ड से कुछ और गायों का हुआ दुखद अंत

      दिनांक 09 जनवरी की रात थाना गढ़ अंतर्गत सेदहा पंचायत के भमरिया में बने अवैध बांडे में कुछ और गायों का दुखद अंत हो गया. दिनांक 09 जनवरी की रात क्षेत्र में कुछ बारिश भी हुई जिसकी वजह से बढ़ी ठण्ड में खुले आसमान के नीचे भूंखे प्यासे गौवंशों से ठंडी वर्दास्त नहीं हुई जिससे कुछ गायों का अंत हो गया. बहरहाल यह कोई नयी घटना नहीं है और थाना गढ़ अंतर्गत आने वाले कई अवैध बांडो में भूंख, प्यास, कड़ाके की ठण्ड में गौवंश रोज़ ही मृत्यु के घाट उतर रहे हैं. इन बेजुवान पशुओं के दुःख-दर्द को सुनने वाला कोई नहीं. सब के सब मूक दर्शक बने बैठे हैं और मात्र तमासा देख रहे हैं. सूत्रों से प्राप्त जानकारी से पता चला है की इसी प्रक्रार पिछले रातों कटरा के पास गंतीरा, लालगांव के पास सोनवर्षा और हरदी के बांडो में भी दर्ज़नों गौवंश फिर मृत पाए गए हैं जिन्हें वहां से न हटा पाने के कारण रात में कुत्ते और सियार आदि मांसाहारी जानवर नोच कर खा गए. कई ऐसे भी घटनाक्रम प्रकाश में आये हैं जिनमे बांडो के अन्दर कमज़ोर हो गए गौवंशों को जीवित अवस्था में ही कुत्ते-सियार शिकार कर खा गए जो अत्यधिक दुखद और दर्दनाक है.

घटना की जानकारी रीवा कलेक्टर से लेकर केंद्रीय मंत्रालय तक

रीवा जिले में गौवंशों के अवैध बांडे के विषय में मूक-बेजुबान पशुओं के भूंख, प्यास, ठण्ड से रोज घुट-घुट कर मरने की जानकारी मीडिया में तो छाई हुई है साथ ही कलेक्टर, एसपी, डीजीपी मप्र भोपाल से लेकर पशुपालन विभाग, पशु संवर्धन बोर्ड, एनिमल राइट्स ग्रुप्स से लेकर श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय तक संप्रेषित की जा चुकी है. पर अब तक इन पशुओं की सुरक्षा के कोई भी सार्थक इंतज़ाम नहीं हुए हैं. मात्र अब तक जानकारियां ही एकत्रित की गयीं हैं. बल्कि अभी हाल ही में खतरा उठाकर सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा दबाब बनाकर पुलिश प्रशासन के सहयोग से एक-दो मर्तबा अवैध बांडो में रेड डलवाकर बांड़ा तोडवाया गया परन्तु पुनः स्थानीय सरहंगों द्वारा यथावत बनवा लिया गया है.     
      अब प्रश्न यह उठता है की पूरे देश भर में एनिमल राइट्स के नाम पर सरकार और जनता का पैसा हज़म करने वाले इतने विभाग बने हैं तो क्या किसी में इतनी कूबत नहीं की सरकार प्रशासन पर दबाब बनाकर इन पशुओं गौवंशों की जिंदगी को बचाया जा सके? आज यह बहुत बड़ा प्रश्न है जिसका उत्तर उन भूंख, प्यास, ठण्ड से तड़पती हुई गौवंशों की आत्माएं भी पूंछ रही हैं.
शायद कोई तो सुनने वाला हो?

संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.














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Shivanand Dwivedi
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