Tuesday, January 10, 2017

(Rewa, MP) “गायों की सुरक्षा मानवता की आवश्यकता - भारतीय स्वदेशी गाय का वैज्ञानिक महत्त्व”


Date: 10/01/2017,
Place: - Rewa (MP)

“गायों की सुरक्षा मानवता की आवश्यकता - भारतीय स्वदेशी गाय का वैज्ञानिक महत्त्व”

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) भारतीय गाय की सुरक्षा मानवता के लिए तो आवश्यक है ही साथ ही प्राकृतिक संतुलन हेतु भी जरुरी है. आज कई स्वदेशी गायों की नस्लें या तो समाप्त हो चुकी हैं अथवा समाप्त होने की कगार पर हैं. शायद कम लोगों को ही जानकारी होगी जी जर्सी नस्ल की गायें मूलतः गाय और सूअर के जेनेटिक कॉम्बिनेशन द्वारा उत्पन्न हुई हैं. यूरोपियन ठन्डे प्रदेशों और पश्चिमी सभ्यता के हिसाब से वहां के वातावरण अनुकूल जर्सी गायों की जरुरत है उन्ही सभ्यताओं मात्र को है. भारत जैसे गरम भौगोलिक क्षेत्र में स्वदेशी नश्ल की गायें ही उपयुक्त हैं.

स्वदेशी नश्ल के गौवंश भारतीय संस्कृति की पहचान

जहाँ तक प्रश्न भारतीय सभ्यता का है वहां पर यह कहना होगा की देशी नस्ल की गायें ही हमारी भारतीय सभ्यता की पहचान रही हैं. चाहे वह बालक श्रीकृष्ण जी के बचपन के दिनों में अपनी लीलाओं को लेकर हो अथवा हिन्दू संस्कृति में गोदान, तर्पण आदि से सम्बंधित रहा हो. हर एक भारतीय संस्कारों में गायों का अभूतपूर्व धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. बिना गौवंश के भारतीय मानव वंश की कोई पहचान नहीं है. हाँ यदि गौवंश नहीं रहेगा तो भारतीय संस्कृति किसी पश्चिमी संस्कृति में समाहित हो जाएगी और अपना स्वयं का वजूद खो देगी. और निश्चित तौर पर जहाँ तक सवाल अस्तित्व का है तो किसी भी लहजे से यह भारतीय मानव के लिए कोई उपलब्धि नहीं होगी बल्कि उसके अंत का सूचक जरूर हो सकता है. और ये कहें की भारतीय मानव ही नहीं सम्पूर्ण मानवीय सभ्यता के अंत का सूचक हो सकता है.

गायें ऑक्सीजन लेकर अपेक्षाकृत ज्यादा ऑक्सीजन ही छोड़ती है

शायद यह बात सब को ज्ञात न होगी पर यह सच्चाई वैज्ञानिक अभिलेखों से प्राप्त हुई है की गाय और गौवंश ही धरती के कुछ विरले प्राणी हैं जो स्वयं भी ऑक्सीजन अर्थात प्राणवायु लेता है और अपेक्षाकृत प्राणवायु ही अपनी सांसों से छोड़ता भी है. वैज्ञानिक कारण यह है कि गायों/गौवंशों के फेंफडे प्राकृतिक तौर से ऐसे बने होते हैं वह खींची गयी ज्यादा ऑक्सीजन को डाइजेस्ट नहीं कर पाते अतः काफी ऑक्सीजन श्वांस प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाल दी जाती है. आज जब वातावरण में अत्यधिक जहरीली गैसों और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घुलती जा रही है ऐसे में स्वार्थी किस्म के मानव के लिए ऐसे जीवों का महत्व तो और अधिक होना चाहिए जो स्वयं दूध, घी, दही, दुग्ध उत्पाद तो दे ही रहा है साथ ही अपने गोबर-मूत्र से भी औषधीय तत्त्व देकर अपनी हर एक साँस से भी जीवनदायनी प्राणवायु दे रहा है. क्या ऐसे में गौवंशों की महत्वा और अधिक नहीं होनी चाहिए? चलिए मानाकि आज अत्यधिक स्वार्थी हो चुके मानव के लिए हर वस्तु में फायदे नुकसान दीखते हैं तो भी क्या गौवंशों की सुरक्षा मानव के हित में नहीं है?

आयुर्वेद में गौमूत्र अमृत तुल्य – देता है सभी बीमारियों से निजात

गाय का मूत्र इस पृथ्वी में अमृत समान है. गाय के मूत्र में मिनिरल्स जैसे पोटैशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, कॉपर, क्लोराइड एवं यूरिक एसिड आदि अत्यधिक संतुलित मात्र में होते हैं जिन्हें सेवन से मानव शरीर में कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि सभी बीमारियो से मुक्ति मिलती है. गायों का वखान भारतीय संस्कृति के मूल ग्रन्थ वेदों से लेकर शास्त्रों और पुराणों तक मिल जायेगा. गाय को भारतीय संस्कृति में माता की उपमा देना कोई सामान्य बात नहीं है. जैसे माता अपने पुत्रों को दूध पिलाने से लेकर उसके बड़े होने तक उसका सब प्रकार से ख्याल रखती है वैसे यदि देखा जाए तो गौमाता भी मानव के लिए हर प्रकार से लाभकारी है. यदि दूध और दुग्ध उत्पाद के तौर पर लिया जाए तो भी गाय का दूध अन्य पशुओं की अपेक्षा प्रोटीन, विटामिन्स, मिनिरल्स और जीवनदायनी शक्ति से भरपूर तो हैं ही साथ ही गाय का गोबर और मूत्र भी कहीं दुग्ध उत्पाद से कम लाभकारी नहीं है. आयुर्वेद में हजारों वर्षों से गौमूत्र और गोबर से विभिन्न प्रकार की असाध्य और जानलेवा बीमारियों से लड़ने के लिए औषधियां बनाई जाती रही हैं. गाय का मूत्र आवश्यक मिनिरल्स का खज़ाना है, इसमें मुख्या रूप से पोटैशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, कॉपर, क्लोराइड एवं यूरिक एसिड होता है. आज हम गायत्री शक्तिपीठ द्वारा संचालित हरिद्वार फार्मेसी अथवा बाबा रामदेव आदि के द्वारा दिव्या फार्मेसी में गौ मूत्रों से बनाये जाने वाले उत्पाद और दवाइयां कहीं भी आयुर्वेदिक स्टोर में खरीद सकते हैं जिसमे सामान्य सर्दी-बुखार से लेकर टीबी, स्थमा, पेट की बीमारियाँ से लेकर कैंसर, एड्स, आदि भयानक जानलेवा बीमारियों का उपचार संयम और खानपान में नियंत्रण से किया जा सकता है. वैसे सामान्य तौर पर गौमूत्र से लगभग 108 बेमरियाओं का इलाज़ होना बताया गया है. गौमूत्र दर्द निवारक, चर्म रोग, पेट के रोग, आंत्रशोथ, पीलिया, मुख रोग, नेत्र रोग, अतिसार, मूत्राघात, कृमिरोग, मधुमेह, मिर्गी, माइग्रेन आदि बीमारियों में लाभप्रद है. गाय के मूत्र में त्रिफला चूर्ण, गाय का दूध मिक्स करके पीने से अनीमिया रोग दूर होकर खून साफ़ होता है. गाय के मूत्र से जिगर मजबूत होकर रक्त सुद्ध होता है. आयुर्वेद के अनुसार गाय के मूत्र के नियमित सेवन से त्रिदोष नष्ट होते हैं. त्रिदोष का तात्पर्य वाट, पित्त और कफ जनक बीमारियाँ हैं जो शरीर के विभिन्न बीमारियों का कारण बनती हैं. गाय के मूत्र के सेवन से मानशिक तनाव और अनिद्रा की बीमारी से निजात मिलती है. गौमूत्र के सेवन से दिल मजबूत होता है और मानव शतायु अर्थात सौ वर्षों तक बिना किसी बीमारी के जीवन जी सकता है. शास्त्रों के अनुसार गौमूत्र के सेवन से अधिदैविक, अध्यात्मिक और अधिभौतिक तापों अर्थात कष्टों से मुक्ति मिलती है और सभी प्रकार की बीमारियों से निजात मिलती है.
क्या आज के वर्तमान समय में जबकि मेडिकल साइंस इतना महगा हो चुका है लगभग बिना कुछ खर्च किये यदि गौ के मूत्र से इतने लाभ प्राप्त हों तो क्या यह इस स्वार्थी मानव के लिए कम है?  

सवाल है मात्र मानशिकता बदलने का. आज जो पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ में व्यक्ति अपनी मूल संस्कृति और जड़ें भूलता जा रहा है यह मानवता के लिए घातक सिद्ध होने वाली हैं. ऐसा नहीं है की गौवंशों की सुरक्षा करने से गौमाताओं पर मानव बहुत बड़ा उपकार कर देगा? वास्तव में देखा जाए तो यह उपकार मानव गौवंशों पर नहीं अपने ऊपर कर रहा है. क्योंकि यदि इस श्रृष्टि को चलते रहना है तो सभी जीव जंतुओं का इसमें अपना एक विशेष महत्त्व है और बारम्बार वही महत्व किसी न किसी माध्यम से इन लेखों द्वारा बताया जा रहा है.

दिनांक 09 जनवरी 2017 की रात भमरिया के अवैध बांडे में भूंख प्यास ठण्ड से कुछ और गायों का हुआ दुखद अंत

      दिनांक 09 जनवरी की रात थाना गढ़ अंतर्गत सेदहा पंचायत के भमरिया में बने अवैध बांडे में कुछ और गायों का दुखद अंत हो गया. दिनांक 09 जनवरी की रात क्षेत्र में कुछ बारिश भी हुई जिसकी वजह से बढ़ी ठण्ड में खुले आसमान के नीचे भूंखे प्यासे गौवंशों से ठंडी वर्दास्त नहीं हुई जिससे कुछ गायों का अंत हो गया. बहरहाल यह कोई नयी घटना नहीं है और थाना गढ़ अंतर्गत आने वाले कई अवैध बांडो में भूंख, प्यास, कड़ाके की ठण्ड में गौवंश रोज़ ही मृत्यु के घाट उतर रहे हैं. इन बेजुवान पशुओं के दुःख-दर्द को सुनने वाला कोई नहीं. सब के सब मूक दर्शक बने बैठे हैं और मात्र तमासा देख रहे हैं. सूत्रों से प्राप्त जानकारी से पता चला है की इसी प्रक्रार पिछले रातों कटरा के पास गंतीरा, लालगांव के पास सोनवर्षा और हरदी के बांडो में भी दर्ज़नों गौवंश फिर मृत पाए गए हैं जिन्हें वहां से न हटा पाने के कारण रात में कुत्ते और सियार आदि मांसाहारी जानवर नोच कर खा गए. कई ऐसे भी घटनाक्रम प्रकाश में आये हैं जिनमे बांडो के अन्दर कमज़ोर हो गए गौवंशों को जीवित अवस्था में ही कुत्ते-सियार शिकार कर खा गए जो अत्यधिक दुखद और दर्दनाक है.

घटना की जानकारी रीवा कलेक्टर से लेकर केंद्रीय मंत्रालय तक

रीवा जिले में गौवंशों के अवैध बांडे के विषय में मूक-बेजुबान पशुओं के भूंख, प्यास, ठण्ड से रोज घुट-घुट कर मरने की जानकारी मीडिया में तो छाई हुई है साथ ही कलेक्टर, एसपी, डीजीपी मप्र भोपाल से लेकर पशुपालन विभाग, पशु संवर्धन बोर्ड, एनिमल राइट्स ग्रुप्स से लेकर श्रीमती मेनका गाँधी जी के कार्यालय तक संप्रेषित की जा चुकी है. पर अब तक इन पशुओं की सुरक्षा के कोई भी सार्थक इंतज़ाम नहीं हुए हैं. मात्र अब तक जानकारियां ही एकत्रित की गयीं हैं. बल्कि अभी हाल ही में खतरा उठाकर सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा दबाब बनाकर पुलिश प्रशासन के सहयोग से एक-दो मर्तबा अवैध बांडो में रेड डलवाकर बांड़ा तोडवाया गया परन्तु पुनः स्थानीय सरहंगों द्वारा यथावत बनवा लिया गया है.     
      अब प्रश्न यह उठता है की पूरे देश भर में एनिमल राइट्स के नाम पर सरकार और जनता का पैसा हज़म करने वाले इतने विभाग बने हैं तो क्या किसी में इतनी कूबत नहीं की सरकार प्रशासन पर दबाब बनाकर इन पशुओं गौवंशों की जिंदगी को बचाया जा सके? आज यह बहुत बड़ा प्रश्न है जिसका उत्तर उन भूंख, प्यास, ठण्ड से तड़पती हुई गौवंशों की आत्माएं भी पूंछ रही हैं.
शायद कोई तो सुनने वाला हो?

संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.














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Shivanand Dwivedi
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Monday, January 9, 2017

(Rewa, MP) थाना गढ़ अंतर्गत भमरिया में गौ-हत्यारों द्वारा ठण्ड भूंख प्यास से तड़पा कर एक और गाय का हुआ अंत

 दिनांक – 09/01/2017
 स्थान –  (रीवा, मप्र)



थाना गढ़ अंतर्गत भमरिया में गौ-हत्यारों द्वारा ठण्ड भूंख प्यास से तड़पा कर एक और गाय का हुआ अंत

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) यदि आप हिनौती धान खरीदी केंद्र में अपनी धान बेचने जा रहे हैं तो थोडा सावधान होकर जाएँ. जी हाँ हम बात कर रहे हैं जनपद गंगेव अंतर्गत हिनौती धान खरीदी केंद्र और हिनौती समिति की. हिनौती धान खरीदी केंद्र दारुबाजों और गांजाखोरों का अड्डा बन चुका है जिसमे पूरी रात दारुबाजों और गांजाखोरों का जमावड़ा रहता है, और इसी के पास आपको मिलेगा दिल दहलाने वाला नज़ारा जहाँ वहीँ पर भमरिया नामक स्थान पर धान खरीदी केंद्र से पचास मीटर के दायरे में लगभग 500 गौवंशों के लिए बनाया गया अवैध कैदखाना जिसमे न तो पानी, न ही चारा-भूसे और न ही किसी छाया की व्यवस्था है.



दिनांक 08 जनवरी 2017 को रात ठण्ड भूंख प्यास से मर गयी एक और गाय

भमरिया में अभी प्राप्त हुई जानकारी के अनुसार घटनास्थल पर जाया गया और एक और गाय मृत पाई गयी. पता चला की यह गाय ठण्ड भूंख प्यास की वजह से तड़प कर मर गयी जिसके चास्म्दीख गवाह वहां पर हिनौती धान खरीदी केंद्र में इकठ्ठा दर्ज़नों लोग थे जिहोने पूरा वाकया सुनाया. इस प्रकार रोज़ ही कोई न कोई मवेशी खुले आसमान में ठण्ड भूंख प्यास से तड़प तड़प कर मर रहे हैं जिसके विषय में सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा कई विडियो और फोटो मीडिया और साथ ही संवंधित विभागों को कार्यवाही के लिए भेजे जा चुके हैं और समय समय पर लगातार भेजे भी जा रहे हैं.
अब सवाल यह उठता है की पूरे रीवा जिले में जो भी अवैध बांडे बनाये गए हैं उनकी संख्या सैकड़ों में है पर अब तक शासन-प्रशासन मौन क्यों है? यदि गौवंश बिना किसी उचित व्यवस्था के अवैध बने बांडो में भूंख प्यास ठंढ से तड़प-तड़प कर जान दे रहे हैं तो उनके लिए सरकार प्रशासन द्वारा कोई उचित व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है जबकि देखा जाय तो लगभग रोज़ गौवंशों के ऊपर हो रहे अत्याचार का मामला पूरे जिले और प्रदेश की मीडिया में छाया हुआ है. 

-देश प्रदेश के किसानों से गौवंशों के प्रति दया और मानवीयता की अपील-

      गौवंशों के ऊपर निरन्तर हो रहे अत्याचार को लेकर एनजीओ श्रीमद भगवद कथा धर्मार्थ समिति (भारत) द्वारा देश-प्रदेश के किसानों और अन्य नागरिकों से अपील की जाती है की भारतीय संस्कृति में विशेष दर्ज़ा प्राप्त गौवंशों के ऊपर अत्याचार न किये जाएँ. उन्हें चारा, पानी भूसा, बिना अवैध बांडो में कैद करके तड़पा-तड़पा कर न मारा जाए. उन्हें मुक्त किया जाए और उसके स्थान पर अपने-अपने खेतों की रखवाली किया जाए. अवैध बांडो के स्थान पर शासन-प्रशासन पर दबाब डालकर वैध तरीके से पंचायती गौशालाएं संचालित की जाएँ जिससे उनकी गोबर की जो खाद, दुधारू पशु से प्राप्त दूध और साथ ही आज वैज्ञानिक तरीके से गौमूत्र, गोबर से अगरवत्ती आयुर्वेदिक दवाईयां आदि का निर्माण सीखकर लोगों को तो रोजगार में लगाया ही जाए साथ ही गौवंशों की उपयोगिता भी बनी रहे और उनकी सुरक्षा भी हो सके.
      गौवंशों के प्रति अमानवीय और हिंसात्मक रास्ता अपनाने से कोई लाभ नहीं बल्कि पशु क्रूरता अधिनियम, मप्र गौवंश वध प्रतिषेध (अमेंडमेंट) बिल 2010/12, आईपीसी की धारा 428/429  आदि द्वारा दंडात्मक कार्यवाही हो सकती है और उल्टा जेल जाने की नौवत आ सकती है. इस कारण आज किसानों और अन्य नागरिकों को अपनी सोच बदलकर वैज्ञानिक दृष्टिकोंड़ अपनाने की आवश्यकता है और गौवंशों और अन्य पशुओं से वैज्ञानिक तरीके से लाभ लेकर उनके भी जीवन रक्षा के विषय में सोचकर उनकी भी उपयोगिता बढ़ाने की आवश्यकता है.

समाज और सरकारें गौवंशों की उपयोगिता पर विचार कर उनकी रक्षा करें

यदि आज गौवंशों और नाकाम हो चुके पशुओं की यह वर्तमान दुर्दशा है तो कहीं न कहीं कारण इनकी उपयोगिता का भी कम होना है. आज सरकार और विभिन्न सरकारी/गैर-सरकारी संगठनों को जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है. मानाकि आज वैज्ञानिक उपकरणों और कृषि यंत्रों से किसान और आम नागरिक का जीवन ज्यादा विलाशी और सुलभ हो गया है पर इसका तात्पर्य यह बिलकुल भी नहीं की इस जीवन का सारा कार्य विज्ञान और मशीनें ही कर लेंगी उसमे किसी पशु की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी. सच्चाई बिलकुल उसके विपरीत है और भले ही आज तात्कालिक रूप से किसानों और नागरिकों को यह लग रहा है गौवंश और पशु उनके लिए बोझ बन गए हैं पर यदि दूरदृष्टि लगाईं जाए तो समझ आएगा यदि पशु, मवेशी, जीव जंतु नहीं होंगे तो यह प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह से विगड़ जायेगा. आज विज्ञान बार-बार इस बात को कह रहा है की गोबर की खाद, बायो-खाद, बायो-उत्पाद की बेहद आवश्यकता है. आज जो हमारी दिनचर्या में इतनी अधिक बीमारियाँ और स्वास्थ्य सम्बन्धी तकलीफें बढ़ रही हैं तो उसका कारण आज का वातावरण ही है जो कहीं न कहीं पूरी तरह से केमिकल उत्पादों, केमिकल खादों, जहरीली दवाओं आदि पर निर्भर होता जा रहा है.

      आज आवश्यकता है एकबार पुनः सोचने की और अपनी पूर्व की जीवनचर्या अपनाने की. प्रकृति के नजदीक ही पंहुच कर हमे शांति भी मेलेगी, सुख भी और स्वास्थ भी. मात्र आवश्यकता है परम्पराओं में थोड़ी सी वैज्ञानिक सोच की जो की दाल में नमक का कार्य करेगा और हमारे जीवन के सस्वाद को अत्यधिक बढ़ा देगा.


पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर स्थानीय पुलिश द्वारा दर्ज किये जाने चाहिए अपराधिक प्रकरण

      अब यदि किसान कास्तकार यह चाहें की बेजुवां पशुओं को अवैध तरीके से बिना चारा, पानी, भूसा, और छत्रछाया के कड़ाके की ठण्ड में तड़प कर मरने के लिए छोंड दिया जायेगा और कोई कुछ नहीं करेगा तो यह बहुत बड़ी भ्रान्ति है. क्योंकि हर व्यक्ति आज यह जान ले की जितने कड़े कानून मानव की सुरक्षा के लिए बने हैं वैसे ही कानून घरेलु पशुओं और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए भी बने हैं. समस्या यह है की शासन प्रशासन इन कानून को कड़ाई से नहीं लगा पा रहा है अन्यथा कम से कम छः माह की जेल और एक हज़ार रुपये का जुर्माना तो तय है, और दोषी पाए जाने पर यह सजा पांच हज़ार के जुर्माना के साथ यह सात साल तक हो सकती है.  

संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.














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Friday, January 6, 2017

(Rewa, MP) कटरा के पास गंतीरा गाँव के अवैध काजी हाउस में खुले आसमान में चारा-पानी बिना तड़प कर मर रहे गौवंश



(थाना-गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) अवैध रूप से पशुओं के लिए बनाये गए काजी हाउस या पशु कैदखाना का सिलसिला मात्र सेदहा के भमरिया पर आकर ही नहीं रुकता है. यहाँ तो पूरा सैकड़ों की सूची बन जाए यदि सबको एकत्रित किया जाय.
वहरहाल हम यहाँ पर बात कर रहे हैं थाना गढ़ अंतर्गत कटरा के पास गंतीरा गाँव की जिसमे अवैध रूप से लगभग ढाई सौ से अधिक मवेशिओं के लिए बड़ा कैदखाना बनाया गया है जहाँ पर खुले ठण्ड में मवेशी चारा, पानी बिना ठण्ड से तड़प कर मर रहे हैं.
यह सब प्रशासन की निगाह तले हो रहा है और सब अंजान बने बैठे हैं. कहने को तो गौवंश संरक्षण और संवर्धन से सम्बंधित इतने विभाग और समितियां हैं की याद रखना कठिन पड़ जाए पर वास्तविक धरातल पर कहीं कुछ नहीं. जगह जगह अवैध बाड़ों में बेजुबान पशुओं और गौ माताओं को यह कुछ समाज के ठेकेदार और दबंग बिना चारा, पानी, भूसा के खुले असमान के नीचे बर्फ की तरह जमाने वाली ठण्ड में तड़पा तड़पा कर मार रहे हैं जिसे देखने वाला कोई नहीं है.


02 जनवरी को गढ़ पुलिश का गंतीरा गाँव के अवैध बांडे में रेड 

    अवैध रूप से बने कैदखाने जो पशुओं के लिए कब्रगाह साबित हो रहे हैं वह आज जगह-जगह बनाये गए हैं. यदि देखा  जाए तो जिले की लगभग हर 4-5 पंचायतों के बीच एक न एक अवैध पशु बांड़ा बना मिल ही जायेगा जहाँ पर पशुओं को क्रूरता से समूह में इकठ्ठा करके रखा जाता है और न तो उनके लिए उचित चारे-पानी की व्यवस्था होती है और न ही वहां पर ठण्ड से बचने वास्ते छज्जा होता है. अब ऐसे में स्वाभाविक है कि कडाके की ठण्ड में सभी गौवंश तड़प-तड़प कर भूंख प्यास से मर रहे हैं. दिनांक 02 जनवरी वर्ष 2017 को पुलिश महानिदेशक मप्र भोपाल के आदेश पर जब रीवा एसपी एवं गढ़ थाना प्रभारी द्वारा कार्यवाही की गयी तो मौके वारदात पर पंहुच कर दो पशुओं को तडपता हुआ पाया गया जो या तो मृत हो चुके थे अथवा मृत होने की कगार पर थे. जी हाँ यह वाकया था कटरा के पास गंतीरा नामक स्थान का जहाँ पर लगभग 100 के आसपास गौवंश वहीँ सड़क के किनारे बांडे में कैद मिले. वहीँ पर एक व्यक्ति से प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ मिश्रा परिवार और अन्य तथाकथित किसानों के द्वारा यह अवैध बांड़ा फसल नुकसानी से बचाने के लिए बनाया गया था.
अब यह बात ठीक है कि हर स्थान पर ही किसानों के फसल का नुक्सान आवारा घूम रहे पशु कर रहे हैं पर क्या अवैध तरीके से बिना किसी व्यवस्था के पशुओं को मरने के लिए कैद कर देने मात्र से समस्या का समाधान हो पायेगा? क्या यह अतिशय क्रूरता भारतीय संविधान के कानून कायदों का उल्लंघन नहीं है? आखिर पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, और गौवंश वध प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम 2010/12 क्या कहते हैं? पशुओं सम्बन्धी समस्या का समाधान मानवीय तौर पर कानून तथा भारतीय संस्कृति की मर्यादा के दायरे में किया जाये न कि कानून को धता बताकर.  


मानव की ही तरह सभी जीवों को जीने का है अधिकार

ऐसा नहीं है की इस धरती में मात्र मानव भर का ही अस्तित्व बना रहेगा. संसार को भूल जाईये और बात करते हैं भारतीय संविधान की तो यहाँ भी पशुओं के सुरक्षा के व्यापक अधिनियम बने हैं और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए. ऐसे सभी दोषियों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए. यदि किसानों के फसल की नुकसानी होती भी है तो वह जाकर सरकार से मुआबजे की माग कर सकते हैं. किसान सरकार के ऊपर दबाब बना सकते हैं की वह आवारा पशुओं से फसल की सुरक्षा के लिए समुचित व्यवस्था बनाये. यह तो बिलकुल ही उचित नहीं होगा की बेजुबान मूक पशुओं को अवैध बांडो में ठण्ड भूख, प्यास से तड़पने के लिए छोड़ दिया जाए. क्या यह पशु किसी से कुछ बोल सकते हैं? क्या यह गौवंश कोई कंप्लेंट कर सकते हैं? क्या इस समाज और मानव के अतिरिक्त इस बहुतिक संसार में इन बेजुबानों की आवाज़ को सुनने वाला कोई है? जाहिर है मानव ही है जो मानवता दिखाकर पशुओं के खिलाफ क्रूरता के विरुद्ध आवाज़ उठा सकता है और पशुओं के अधिकार के लिए लड़ सकता है. पर यदि आज वही मानव इतना निर्दयी हो गया है तो हमारे भारतीय संस्कृति के लिए यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है.


संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.



























Thursday, January 5, 2017

(Rewa, MP) गौ हत्याओं और पशु प्रताड़ना पर रीवा जिला प्रशासन नहीं लगा पा रहा रोक



गौ हत्याओं और पशु प्रताड़ना पर रीवा जिला प्रशासन नहीं लगा पा रहा रोक

(गढ़, रीवा मप्र – शिवानन्द द्विवेदी) कहने को तो पशुओं और गौवंशों की सुरक्षा के लिए इतने कानून बने हैं पर देखना होगा की उन नियमों का पालन क्या कहीं भी पूरे मप्र में सही तरीके से हो पा रहा है. मप्र में विशेष तौर पर गौवंश प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक वर्ष 2010/12 में पारित किया गया जिसमे गौवंशों के वध पर और प्रताड़ना पर पांच हज़ार तक का जुर्माना और अधिकतम सात साल के कैद का प्रावधान है और यह अपराध संज्ञेय भी है साथ ही आरोपी को अपने आप को दोषमुक्त सिद्ध करना पड़ेगा ऐसा प्रावधान है. इसी प्रकार पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत भी कई प्रावधान हैं जिन्हें यदि कड़ाई से लगाया जाये तो पशुओं और गौवंशों के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता काफी हद तक बंद की जा सकती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 428 एवं 429 के अंतर्गत भी पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही करने का प्रावधान है.

लालगांव पंचायत में हर्दी-अटरिया के बीच बनाया गया है गौवंशों का अवैध बांड़ा

अवैध बांडे एक जो सबसे भयावह दृश्य था वह है लालगांव पंचायत में हर्दी-अटरिया के बीच बनाया गया अवैध बांड़ा जो की वहीँ आसपास के लोग जैसे विजय सिंह, मुन्ना राजा, काशी सिंह, रावेन्द्र मिश्रा द्वारा कानून को धता बताकर बनाया गया है. चश्मदीखों के अनुसार यहाँ पर पिछले कई महीनों से गौवंशों को कैद करके रखा गया है जिसमे न तो चारे, भूसे की व्यवस्था है और न ही किसी पशुशेड की. ठण्ड में पांच डिग्री के नीचे के तापमान पर आज गौवंश भूंख, प्यास, छाया बिना तड़प-तड़प कर जान दे रहे हैं जिन्हें देखने वाला न तो कोई कलेक्टर है और न ही कोई मंत्री मिनिस्टर. खैर गाँव वालों का क्या कहना यह बाड़े तो उन्ही के द्वारा बनाये गए हैं. हर्दी-अटरिया स्थित यह अवैध पशु-कैदखाना लालगांव के किसी गुप्ता की खाली पड़ी हुई जमीन में बनाया गया है. परन्तु चश्मदीखों के अनुसार यह अवैध बांड़ा बनवाया वहीँ हर्दी, बर्रेही, लालगांव और अटरिया के तथाकथित कृषकों द्वारा हैं.



भाजपा मंडल अध्यक्ष शंकर सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा बनवाया गया सोनवर्षा डांडी का अवैध बांड़ा

      इसी क्षेत्र में दूसरा अवैध बांड़ा लालगांव पंचायत के सोनवर्षा डांडी नामक स्थान पर बनाया गया है जो वहीँ के यादव समुदाय की जमीन पर बना हुआ है. दो जनवरी 2017 की रात गढ़ पुलिश के सहयोग से यह अवैध बांड़ा हटाये जाने के बाद अगले दिन इसी क्षेत्र के भाजपा मंडल अध्यक्ष शंकर सिंह स्वयं जिला पंचायत प्रत्यासी राकेश शर्मा उपाध्याय के साथ थाना गढ़ पहुचे और उन्होंने स्वीकार किया की सोनवर्षा का यादवों की जमीन पर बनाया गया बाड़ा उनके और सहयोगियों की माध्यम से बनाया गया था. यह हाल हैं गौवंश के लिए समर्पित और हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए कार्य कर रहे भाजपा के कार्यकर्ताओं के. यदि ऐसा है तो वह लोग ज्यादा बेहतर हैं जो गौवंशों को अपने आहार के लिए प्रयोग कर रहे हैं. कम से कम गौवंशों को प्रताड़ना देकर घुट-घुट कर अवैध बांडो में चारे, पानी, छाया बिना कड़ाके की ठण्ड में मारने से तो अच्छा है उन्हें एक बार में मौत के घाट उतार दिया जाना?

गौवंशों और बेजुबान पशुओं के साथ क्रूरता मानवीय संवेदनाओं के अंत का द्योतक

      यह भारतीय संस्कृति का दुर्भाग्य है की आज मात्र गौवंशों और पशुओं की सुरक्षा के लिए भी राजनीति की जा रही है. अब कम से कम आम जनता के समक्ष यह बात भली-भांति स्पष्ट हो जाएगी की क्या यह राजनीतिक पार्टियाँ मात्र मानवीय संवेदनायों को आधार बनाकर ही तो राजनीतिक लाभ ले रही हैं. न ही इन्हें गौवंशों की सुरक्षा से कोई लेना देना है और न ही आम किसान और आम जनता से.
      यह बात सत्य है की आवारा पशुओं से आज हर एक किसान और कास्तकार त्रस्त है परेशान है पर प्रश्न यह भी है की क्या आवारा पशुओं और गौवंशों को अवैध रूप से बनाये गए बिना किसी उचित व्यवस्था के बांडो में चारा, पानी, भूसा, छत बिना कड़ाके की ठण्ड में तड़पने मरने के लिए छोंड देने से किसानों की समस्या का समाधान हो जायेगा? किसान यह कैसे भूल सकता है की यही गौवंश हैं जिनके दूध, दही, घी, और दुग्ध उत्पाद खा पीकर वह पला बढ़ा है और उसके बाल बच्चे इन्ही गौवंशों के दुग्ध उत्पाद से पल बढ़ रहे हैं. क्या हर सुबह जब हम एक कप चाय पीते हैं तो इस बात का एहसास नहीं करते की इस चाय में डाला गया दूध किसी
 दुधारू पशु से ही प्राप्त हुआ होगा?
    
      आखिर इन गौधनों की इतनी बड़ी दुर्दशा क्यों? क्या यही हमारे ग्रामीण किसान भाई हर एक ग्राम पंचायत में स्वयमेव ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकते कि एक-दो पशु सभी लोग अपने घरों में बाँध लें और अन्य पशुओं की तरह ही इनकी भी व्यवस्था बना लें?

पशु और गौवंश न होने पर प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ेगा प्रतिकूल असर
    
      आज अज्ञानता अथवा हेकड़ी बस भले ही किसानों और भारतीयों को यह बात समझ न आ रही हो पर यह बात तय है की यदि गौवंश और पशुधन न रहेंगे तो पूरी भूमि बंजर हो जाएगी. प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जायेगा. उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. शांस लेने के लिए हवा न मिलेगी और पीने के लिये पानी नहीं होगा. ऐसा समय आयेगा की मानवता एक-एक दाने के लिए तरस जाएगी. क्योंकि आज विज्ञान भी इस बात को मान रहा है की रासायनिक खादों के हो रहे निरंतर प्रयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति कमजोर पड़ रही है जिससे हर वर्ष भूमि में पिछले वर्षों की तुलना में अधिक उर्वरक और रासायनिक तत्वों का प्रयोग करना पड़ रहा है. आज कृषि विज्ञान जो गोबर अथवा बायो-खाद और बायो-उत्पाद की निरंतर बात कर रहा है वह इसी वजह से कर रहा है कि लगातार बढ़ रही मानवीय आवादी के पालन-पोषण के लिए निरंतर बंजर हो रही भूमि की उर्वरा शक्ति कैसे बढ़ाई जाए.

     
प्रदेश के हर जिले में कलेक्टर के संज्ञान में है पशुपालन एवं पशु संवर्धन समिति
     
      जिला स्तरीय समितियों की यदि बात किया जाए तो गौधन और पशुधन के पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के हर जिले में विशेष निगरानी समितियों का गठन होता है जो सदैव जिला कलेक्टर के संज्ञान में रहता है. जिला कलेक्टर यदि चाहे तो या की मनरेगा की उप योजना अंतर्गत अथवा पशुपालन विभाग द्वारा तीन-चार पंचायतों के बीच में आवारा गौवंशों की सुरक्षा और किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए बजट का आवंटन करवा कर इस समस्या का दीर्घकालीन समाधान कर सकता है. परन्तु यह सब इच्छाशक्ति और योजनायों के सही क्रियान्वयन पर निर्भर करता है. आज यह जिले में भली भांति विदित है की पशु चिकित्सा विभाग की मदद से कई पंचायतों में गौ संवर्धन केंद्र बनाने बाबत बजट दिया गया था परन्तु वह सब भ्रष्ट्राचार की बलि चढ़ गया. क्या यह सब देखने वाला कोई नहीं है? आखिर क्या जिला कलेक्टर के संज्ञान में यह बातें नहीं हैं? क्या किसानों की आवारा पशुओं सम्बन्धी समस्या जो किसी न किसी माध्यम से रोज ही मीडिया में छाई रहती है जिला प्रशासन अथवा प्रदेश स्तर पर ज्ञात नहीं है? सबको सब कुछ ज्ञात है, मात्र आवश्यकता है उसके सही क्रियान्वयन की और समस्या के उचित निराकरण की. 

पशुओं के विरुद्ध क्रूरता पर स्थानीय पुलिश द्वारा दर्ज किये जाने चाहिए अपराधिक प्रकरण

      अब यदि किसान कास्तकार यह चाहें की बेजुवां पशुओं को अवैध तरीके से बिना चारा, पानी, भूसा, और छत्रछाया के कड़ाके की ठण्ड में तड़प कर मरने के लिए छोंड दिया जायेगा और कोई कुछ नहीं करेगा तो यह बहुत बड़ी भ्रान्ति है. क्योंकि हर व्यक्ति आज यह जान ले की जितने कड़े कानून मानव की सुरक्षा के लिए बने हैं वैसे ही कानून घरेलु पशुओं और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए भी बने हैं. समस्या यह है की शासन प्रशासन इन कानून को कड़ाई से नहीं लगा पा रहा है अन्यथा कम से कम छः माह की जेल और एक हज़ार रुपये का जुर्माना तो तय है, और दोषी पाए जाने पर यह सजा पांच हज़ार के जुर्माना के साथ यह सात साल तक हो सकती है.  

संलग्न – 1) नीचे अवैध बांडो में कैद पशुओं के देखें संलग्न यूट्यूब विडियो जो की पशुओं के विरुद्ध अत्याचार और क्रूरता को दर्शाते हैं. 2) इसी विषय में अवैध बांडो के लिए गए फोटोग्राफ जिनमे कुछ पशु मृत पड़े हैं तो कुछ मरने की कगार पर खड़े हैं.
  
























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