Thursday, January 9, 2020

(MP breaking) हाइकोर्ट की नोटिस बेअसर, प्रदेश में बढ़ रही पशु क्रूरता ( मामला एक जनहित याचिका का एवं जिले के त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत आने वाले बसहट पंचायत का जहां पर पिछले दिनों भीषण पशु क्रूरता की वारदातों में सैकड़ों मवेशियों के मरने के बाद जीवित रेस्क्यू सभी 8 मवेशी भी पशु चिकित्सा विभाग और प्रशासन की वजह से मर गए)

दिनांक 09 जनवरी 2020, स्थान - रीवा मप्र

   देश प्रदेश में चल रही पशु क्रूरता रुकने का नाम नही ले रही है. मांस भक्षक एवं दुग्ध उत्पाद खाने वाले लोगों के चलते जहां पशुओं की तादाद बढ़ती जा रही है वहीं अब उन्हें संभालने का संकट उत्पन्न हो चुका है. आखिर सवाल यह है की मानव को दुग्ध उत्पाद भी चाहिए और मीट भी चाहिए फिर कैसे पशुओं की संख्या नियंत्रित हो. लिहाजा दोनो की चाह में बढ़ती पशुओं की संख्या के चलते अब उन्हें संभालने का देशव्यापी संकट उत्पन्न हो चुका है. जहां सरकारी व्यवस्थाएं थीं वहां भी रखरखाव और भ्रष्टाचार के चलते अव्यवस्था फैल चुकी है. जहां तक सवाल वैकल्पिक व्यवस्था की हैं वहां भी समाज हाँथ खड़ा कर चुका है. ऐसे में जाहिर है आज गोवंशों की दशा और दिशा क्या होगी बड़े ही चिंता का विषय है.
   बसहट गोहत्याकांड का जिम्मेदार शासन  प्रशासन 

   बता दें की त्योंथर ब्लॉक अन्तर्गत बसहट ग्राम पंचायत में अभी हाल ही में हुए भीषण गोहत्याकांड में रेस्क्यू किये गए 8 गोवंशों को भी प्रशासन और पशु चिकित्सा विभाग बचा नही पाया है. सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी ने बताया की जबकि देखा जाए तो इसमे पूरी गलती प्रशासनिक अमले की ही है. सवाल यह है की जब कड़ी मसक्कत के बाद 8 गोवंशों को जीवित बचाया गया तो उन्हें सही पोषण एवं इलाज क्यों नही दिया गया. सच्चाई यह है की 5 जनवरी को रेस्क्यू किये गए गोवंशों के प्रति न तो पुलिश की कोई संवेदना थी न ही पशु चिकित्सा विभाग की. जहां तक प्रश्न सीईओ जनपद का है तो वह व्यक्ति आज तक लापता हैं. एसडीएम भी बीमारी का बहाना बनाकर मात्र नायब तहसीलदार अंकित मौर्य को ही मौके पर भेज दिया था.
   रेस्क्यू 8 गोवंश भी मरे

   रेस्क्यू किये गए 8 गोवंशों को 5 जनवरी रात को बाहर ठंड में तड़पते हुए छोड़ दिया गया था जिसके चलते वह कमजोर पड़ गए और तीन रातोंरात मर गए. अगले दिन 6 जनवरी को 5 गोवंशों को झोटिया गोशाला पहुचाने का प्रयास किया गया लेकिन उनमे से 2 ट्रेक्टर का दच्चा खाकर मर गए. शेष बचे 3 गोवंश 8 जनवरी शुबह तक इलाज और पोषण के अभाव में मर गए. इस प्रकार तीन बसहट में ही मर गए थे. शेष 5 अगले दिन मर गए.
   पशु चिकित्सा विभाग ने नही किया इलाज

   झोटिया गोशाला प्रबंधक अरिमर्दन सिंह द्वारा जानकारी दी गई की तीन गोवंशों को 6 जनवरी को झोटिया गोशाला पहुचाने के बाद पशु चिकित्सा विभाग और प्रशासन अपना पल्ला झाड़ लिया. डॉक्टर न तो इलाज करने आये और न ही कोई पोषण की जानकारी दी. गोशाला प्रबंधक ने बताया की झोटिया प्राइवेट गोशाला में कोई भी वेटरनरी डॉक्टर उपलब्ध नही है जिससे वह इलाज नही करवा पाएं. बताया गया की 7 जनवरी को पशु चिकित्सा विभाग के कुछ कम्पाउण्डर आये थे जिनके पास न तो सामग्री थी और न ही दवा. मात्र औपचारिकता पूरी करने आये थे. इस प्रकार गोशाला प्रबंधन ने स्वयं ही 2000 रुपये से अधिक कीमत की दवा खरीद कर इलाज करवाया. पशु डॉक्टर के पास कोई दवा तक नही थी.
   बोतल चढ़ाते ही एक और गाय मृत
  
   बताया गया की गायों में कमजोरी और ठंड की वजह से शरीर का तापमान 22 डिग्री सेल्सियस हो चुका था जिसके कारण नौशिखिये डॉक्टरों ने जैसे ही बोतल चढ़ाया वैसे ही एक गाय तुरंत मर गई. बताया गया की पहले उनके पोषण के लिए कुछ करना था एवं अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाना था जिससे यह मरने वाली स्थिति निर्मित नही होती. इसके बाद 2 और भी बची गायें इलाज और पोषण के अभाव में मर गईं. वास्तव में रेस्क्यू किये गोवंशों को रीवा के पशु चिकित्सालय में भर्ती किया जाना था और ऐसा नहीं हुआ जिससे सभी रेस्क्यू मवेशी मर गए।
   गोहत्याकांड के लिए पुलिश भी जिम्मेदार

   वास्तव में यदि देखा जाय तो जो घृणित दिल दहलाने वाली वारदात बसहट में देखने को मिली इसमे शासन प्रशासन की पोल खोल दी है. आखिर सवाल यह भी उठता है की जब प्रत्येक थाने क्षेत्र में एक बीट प्रभारी होता है जिसका कार्य ही होता है की अपने सूत्रों और स्वयं भी जाकर हर 24 घंटे के भीतर अपने बीट की घटनाक्रम की जानकारी ले तो यह कैसे संभव हुआ की 15 दिन से अधिक समय से बिना चारे, पानी, छाया के भीषण ठंड में बन्द गोवंश मरे और कोई पुलिश वाले को भनक तक नही पहुंची? जबकि यदि देखा जाए तो आज गांव गाँव गांजा और शराब की तस्करी कोरेक्स नशीली दवायें बिक रहीं हैं जिसकी पुलिश वालों को भरपूर जानकारी होती है और सब इन्ही की सह से बिक रही हैं.
  राजस्व विभाग भी उतना ही जिम्मेदार

   बसहट पशु क्रूरता मामले में पुलिश के साथ राजस्व विभाग भी बराबर का जिम्मेदार है. ज्ञातव्य हो की हर गांव और हल्के में पटवारी और आरआई नियुक्त होते हैं जहां उन्हें नियमित दौरा करके गांव की गतिविधि की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों और प्रशासन को पहुचानी होती है. सवाल यहां भी वही है की क्या पूरे एक पखवाड़े से अधिक समय तक पटवारी गांव का दौरा नही किया था? क्या आरआई ने पटवारी से जानकारी नही माँगी थी की बसहट ग्राम में इस बीच क्या चल रहा है? क्या नायब तहसीलदार अंकित मौर्य अपनी साप्ताहिक मीटिंग में ग्रामों की गतिविधि की जानकारी नही मांगते?
   घटना दिनाँक एसडीएम ने बताया बीमार हूँ

   त्योंथर एसडीएम ने घटना दिनांक 5 जनवरी को कहा की वह बीमार हैं और घटना स्थल पर नायब तहसीलदार को भेज दिया. क्या इसके लिए एसडीएम त्योंथर बराबर के जिम्मेदार नही हैं? आखिर त्योंथर एसडीएम और तहसीलदार के विरुद्ध भी कार्यवाही क्यों न की जाए इस पर भी शासन को विचार करना चाहिए क्योंकि अनुभाग के सभी उच्चाधिकारी इसके बराबर के जिम्मेदार हैं.
  एसडीओपी त्योंथर का होगा दायित्व 

    अपने थाना क्षेत्र के थाना प्रभारियों की नियमित बैठक बुलाकर अथवा दूरभाष से जानकारी लेना क्या एसडीओपी का दायित्व नही होता? यदि बीट प्रभारी और सिपाही जिम्मेदारी का निर्वहन नही कर रहे तो क्या एसडीओपी इसका जायज़ा नही लेता की उसके अनुभाग में क्या कुछ चल रहा है. अथवा एसडीओपी और अधीक्षक को मात्र इस बात पर ही रुचि है की कहाँ से माल फंसाया जाय और कैसे घृणित कार्य करते हुए फर्जी मुकदमे लगाए जाएं? कैसे फर्जी मामलों में फंसाकर मनगढ़ंत आरोप लगवाकर फिर समाजसेवियों को टॉर्चर किया जाय? कैसे दारू, गांजा, कोरेक्स और नशीली दवाओं, रेत का भंडारण और उत्खनन करवाया जाए? कैसे ओवरलोडिंग से उगाही की जाय? क्या यही सब कार्य पुलिश कर सकती है अथवा कुछ अच्छा भी करते हुए अपनी जिम्मेदारी भी समझ सकती है?
   आखिर सीईओ जनपद और जिला पंचायत ने क्या किया?

    सवाल यह भी है की आज मप्र की वर्तमान कांग्रेस सरकार द्वारा जो जिले में 30 स्थानों पर सरकारी गोशालाओं को खोले जाने की कवायद और कार्य चल रहा है उसके प्रति पंचायत विभाग की क्या जिम्मेदारी है? क्या मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद एवं जिला पंचायत द्वारा कार्यों में तेजी लाकर बेसहारा गोवंशों और किसानों के हित के लिए प्रारम्भ हुई इन योजनाओं का जल्दी क्रियान्वयन हो ऐसा नही करना चाहिए? क्या सीईओ जनपद पंचायत त्योंथर संजय सिंह यह बता पाएंगे की आखिर उनके पंचायती क्षेत्र बसहट में जब उन्ही के सरपंच सचिव और रोजगार सहायक के अधीन रहे सरकारी काजी हाउस में महीनों से गोवंशों को बिना समुचित व्यवस्था, बिना चारा बिना भूषा अथवा पानी के बांधा जा रहा था तो क्या उनके विभाग को यह जानकारी नही थी? क्या जिस चौराहे और जिस भुरतिया परिवार के मकान के पीछे खुलेआम काजी हाउस बना था तो क्या उन्हें इसकी जानकारी नही थी? क्या जिस चौराहे पर सैकड़ों लोग रोज इकठ्ठा हो रहे हों ऐसे में कोई ग्राम प्रधान, सचिव अथवा सीईओ गोहत्या की अपनी जिम्मेदारियों से बच पायेगा?
  कलेक्टर कमिश्नर के फरमान से क्या होगा?

     आईये अब एक नजर डालते हैं संभाग और जिले के उच्चाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर. पिछले दशक भर से गोवंशों और पशुओं के अधिकारों संरक्षण संवर्धन और किसानों के हितों की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी ने सीधे कलेक्टर और कमिश्नर पर निशाना साधते हुए इन्हें ही सबसे बड़ा जिम्मेदार बताया है. द्विवेदी ने कहा है की उन्होंने पिछले कई वर्षों से निरंतर गोवंशों के प्रति सम्पूर्ण जिले एवं प्रदेश में हो रही क्रूरता पर आवाज बुलंद की है जिसे मीडिया और शिकायतों के माध्यमों से निरंतर उच्च से उच्च अधिकारियों और मंत्रियों मिनिस्टर और पशु अधिकारों के लिए कार्य करने वाले लोगों एवं संस्थाओं के पास तक बातें रखी गयी हैं. लेकिन इसके बाबजूद भी जिला संभाग और प्रदेश के शासन प्रशासन ने मात्र समस्या को निरंतर नजरअंदाज किया है और उपेक्षा की है जिसका नतीजा है की आज पशु क्रूरता प्रदेश और संभाग में अपने चरम पर है.
  हाइकोर्ट में शिवानन्द द्विवेदी ने लगा दी जनहित याचिका

    एक्टिविस्ट दविवेदी द्वारा बताया गया की उन्होंने अभी पिछले वर्ष 2018 में जनहित याचिका उच्च न्यायालय जबलपुर में दायर की है जिसमे जिले संभाग और प्रदेश में गोवंशों की दयनीय स्थिति पर कार्यवाही की माग की है. इन गोवंशों के संरक्षण संवर्धन, अधिनियमों के अन्तर्गत पशु क्रूरता करने वालों पर सख्त कार्यवाही, एवं किसानों का संरक्षण होकर ज्यादा से ज्यादा गोशालाएं और गो अभ्यारण्य बने इसके लिए माग की गई है. 
   शासन प्रशासन ने नही दिया हाई कोर्ट की नोटिस का जबाब

   द्विवेदी ने बताया की अब तक हाई कोर्ट जबलपुर से इस विषय में कई बार संबंधितों पुलिश एसपी, डीजीपी, चीफ सेक्रेटरी, वेटरनरी विभाग, पंचायत और कलेक्टर को नोटिस भी जारी हो चुकी है लेकिन अब तक इनमे से किसी ने हाई कोर्ट को जबाब नही दिया है और सभी अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाह रहे हैं. बात जबाब देने तक ही नही है बल्कि हालात इतने बुरे हो चुके हैं लग रहा है प्रशासन की अनदेखी के चलते पशु क्रूरता निरंतर बढ़ती जा रही है जबकि कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इसे कम होना चाहिए था.
  क्या होगा गोवंशों का भविष्य मंथन का समय

   इस बीच समाजिक कार्यकर्ता ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है की गोवंशों का भविष्य अब प्रश्न के दायरे में आ चुका है. आज समाज इन गोवंशों को पूरी तरह से बहिष्कृत कर चुका है. ऐसा लगता है जैसे गोवंशों को किसी को जरूरत ही नही बची है. मसीनों और ट्रेक्टर के ईजाद होने के बाद कृषि क्षेत्र में पशुओं और गोवंशों की उपयोगिता पूर्णतया शून्य के तुल्य हो चुकी है. जहां कभी बैलों को हल दमरी मिजाई गहाई, कोल्हू गोबर कंडे खाद के लिए प्रयोग किया जाता था आज वह सब बन्द होकर गॉयों को मात्र दुग्ध उत्पाद तक ही सीमित कर दिया गया है. सवाल यह है दुग्ध उत्पाद तो सभी को चाहिए लेकिन मवेशी कोई फूटी आंख देखना नही चाह रहा है. ऐसे में किसान भी इनको बेशहारा छोड़ देते हैं जिससे फसलों को नुकसान करने पर इन्हें क्रूरता का शिकार होना पड़ रहा है. 
   दुग्ध उत्पाद खाने वाले भी बराबर के जिम्मेदार

   एक्टिविस्ट द्विवेदी ने कहा की चाहे भले ही हम मानव अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से खूब भागने का प्रयास करें,  तर्क दें, बहाने बनाये कुछ भी कहें लेकिन सबसे कड़वी सच्चाई यह भी है की गोवंशों के प्रति बढ़ रही क्रूरता, इनकी हत्या, बीफ उद्योग के पीछे कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार हैं. हम यह अवश्य कह सकते हैं की हम अपने हाथों से पशु क्रूरता नही कर रहे अतः हम सीधे जिम्मेदार नही हैं लेकिन सच्चाई यह है अपरोक्ष रूप से तो हम भी इसमे भागीदार हैं. मानाकि हम अपने पैसों के दम पर सब कुछ खरीद सकते हैं और हमे दुग्ध उत्पाद के लिए पशु पालना न पड़ता हो लेकिन फिर भी हम भी कहीं न कहीं किसी पशु का ही दुग्ध उत्पाद खा रहे हैं. तो सवाल यह है जब कल वह पशु कष्ट में होगा तो जिम्मेदारी तो हमारी भी तय होगी की यदि उस गोमाता का दूध हमने भी खाया तो उसकी रक्षा सुरक्षा में आगे आएं.
   नसबंदी होकर दुग्ध उत्पाद का हो परित्याग

    मानाकि यह काफी विवादास्पद बयान हो सकता है लेकिन देश प्रदेश में बढ़ती पशु क्रूरता और हिंसा के चलते सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी का कहना है की आज बुद्धिजीवी और विशुद्ध शाकाहारी समाज दुग्ध उत्पादों का परित्याग करते हुए वेगन बनता जा रहा है. वेगन वह सामाजिक समूह कहलाता है जो अपना नैतिक दायित्व मानता है की यदि वह दुग्ध और दुध से बनी हुई वस्तुएं खाता है तो इसका मतलब यह है की वह कहीं न कहीं पशुओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा में भी जिम्मेदार है क्योंकि दूध पीने में सबसे पहला आधिकार गाय के बछड़े का होता है, बच्चे का अपनी मा पर होता है. अतः आज वेगन समूह यह मानता है की यदि दुग्ध उत्पाद को त्याग दिया जाय तो पशुओं की संख्या नियंत्रित हो जाएगी और हमारी आवश्यकताएं कम होने से पशु भी अत्याचार से बचेंगे साथ में मीट उद्योग पर भी प्रभाव पड़ेगा और कहीं न कहीं पशुओं के प्रति हिंसा काफी हद तक कम होगी.
   संलग्न - कृपया संलग्न तस्वीरें देखें जहां जगह जगह पशु पीड़ित परेशान हैं लेकिन कोई देखने वाला नही है.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक कार्यकर्ता 
जिला रीवा मप्र
मोबाइल 9589152587

Thursday, January 2, 2020

(MP breaking) भारतीय डाक खस्ताहाल, निजीकरण की सख्त जरूरत

दिनांक 02 जनवरी 2019, स्थान - रीवा मप्र

  मप्र में भारतीय डाक की स्थिति काफी चिंताजनक बनी हुई है. जहाँ एक तरफ सरकार डाक विभाग को जनता के लिए बैंकिंग मोर्चों और एटीएम आदि मामलों सहित आधार कार्ड बनवाने, पासपोर्ट की सुविधा देने आदि के लिए खोलना चाहती है वहीं डाक विभाग सरकार की अपेक्षाओं और नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है. जानिए पूरा मामला इस तरह. 
  मप्र में डाक विभाग की कार्यप्रणाली ठप्प

   मप्र में डाक विभाग प्रश्न के दायरे में आ चुका है. यहां आम जनता की मामूली सी अपेक्षाएं जो की अपेक्षा तो कम कही जा सकती हैं जनता के अधिकार ज्यादा वह तक आज डाक विभाग पूरा करने में अक्षम साबित हो रहा है. यदि आम नागरिक को एक रजिस्ट्री अथवा स्पीड पोस्ट करना है तो उसे पता नही कहां जाना पड़ेगा यह उसे भी नही पता रहता. बांकी की अन्य सेवाएं जैसे की पासपोर्ट सुविधा, आधार रजिस्ट्रेशन, पैसे के लेनदेन तो दूर की बातें हैं.
 क्या समस्याएं हैं डाक विभाग की

   बता दें की डाक विभाग की मुख्य समस्या इनकी जनता के प्रति जबाबदेही का न होना है जो ज्यादातर सरकारी विभागों में होता है. आज सरकारी कर्मचारी नौकरी पाकर पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाते हैं की हमे तनख्वाह तो मिलनी ही है चाहे जनता का काम हो की न हो.
   डाक विभाग में रीवा का पुख्ता उदाहरण लेते हैं तो पाएंगे की यहां शायद ही कोई ऐसा एसओ हो जहां आप रजिस्ट्री करके कंप्यूटराइज्ड रसीद प्राप्त कर सकते हों. ज्यादातर डाक एसओ में आपको कंप्यूटर इंटरनेट ठप मिलेंगे और बिजली गुल मिलेगी. कारण पूंछेगे तो पता चलेगा की यह आम समस्या है जिसका की कोई सार्थक समाधान नही है. 
   अब सवाल यह उठता है की यदि प्रिंटर और नेटवर्क कार्य नही करेगा तो भला रेजिस्ट्री और स्पीड पोस्ट कैसे हो पाएगी.
  रीवा जीपीओ में एक किलोमीटर लंबी कतार

   अब बात कर लेते हैं रीवा जीपीओ की. शायद ही इन छोटी दिखने वाली समस्या पर किसी का ध्यान जाता हो जबकि हममें से अधिकतर लोग आये दिन इन समस्याओं से दो चार होते रहते हैं. लेकिन मजाल क्या है की आम जनता अथवा खास लोग इसके विरुद्ध कुछ बोल दें. ऐसा लगता है जैसे जलील होकर लाइन में लगकर ठोकर खाकर जीने की हम सबकी आदत सी हो गई है जिसे हम सबने अंदर ही अंदर स्वीकार कर लिया है.
    
  आईपीओ लेने के लिए 2 घंटे का इंतजार

   यदि आपको रीवा हेड पोस्ट आफिस से आरटीआई अथवा किसी अन्य उपयोग के लिए इंडियन पोस्टल आर्डर की जरूरत महसूस होती है तो आपको 2 घंटे से अधिक का इंतजार करना पड़ सकता है. कारण यह नही है की डाक विभाग को आईपीओ सतना से मंगवाना पड़ेगा बल्कि कारण यह है की डाक विभाग को इससे कोई फर्क नही पड़ता की आप कौन हैं आपको क्या चाहिए. उन्हें सिर्फ इस बात से मतलब है की वह आफिस में बैठकर मजे कर रहे हैं और आप परेशान हो रहे हैं. जीपीओ के 8 में से मात्र एक काउंटर कार्य करता है जहां आप चाहें तो आईपीओ खरीदें, लेटर पोस्ट करें, रजिस्ट्री करें, स्पीड पोस्ट करें अथवा अन्य कोई बैंकिंग का कार्य करें सब आपको उंसि एक काउंटर पर ही करना है. यह स्थिति है रीवा जीपीओ की. तो फिर सोचिए की आम एसओ की क्या स्थिति होगी जहां न तो सही तरीके से इंटरनेट कार्य करता न ही बिजली अथवा अथवा कंप्यूटर प्रिंटर.
  कटरा एसओ सहित कहीं भी कुछ भी ठीक नही

   अब बात कर लेते हैं एक उपडाकघर अर्थात एसओ की. जी हाँ आप कोई भी एक उपडाकघर ले सकते हैं लेकिन हम यहां बात कर रहे हैं कटरा उपडाकघर की जहां पर आप स्पीड पोस्ट रजिस्ट्री अथवा अन्य कंप्यूटर इंटरनेट रिलेटेड कार्य कर सकते हैं. लेकिन यहाँ पर कार्यरत एसपीएम वंशगोपाल का कहना है की कटरा एसओ में न तो बिजली ठीक रहती, न बैटरी बैकअप है न इंटरनेट है न ही प्रिंटर कार्य करता है. वंशगोपाल ने बताया की यद्यपि इसकी शिकायत कई मर्तबा विभागीय उच्चाधिकारियों को की जा चुकी है लेकिन इससे किसी को कोई फर्क नही पड़ता हमे जनता की भी सुननी पड़ती है और विभाग के उच्चाधिकारियों की भी. बताया की वह कुछ कर पाने में अक्षम हैं.
  क्या होगा भारतीय डाक का

  अब सवाल यह है आज वर्ष 2020 लग चुका है और जब हर जगह डिजिटल हो गया है और रोज इसी डिजिटलीकरण की बात की जा रही है तो फिर भारतीय डाक विभाग किस दिशा और दशा की तरफ अग्रसर है? क्या भारतीय डाक भी बीएसएनएल, इंडियन एयरवेज, इंडियन रेलवेज की तरह ही तो नही हो चुका है जिसके कर्मचारियों अधिकारियों को यह बताना पड़ेगा की जनता की सेवा के लिए बैठे हैं और यदि सेवा नही दे सकते तो इनका भी क्यों न जल्दी से जल्दी निजीकरण कर दिया जाय.
 ट्विटर पर संदेश का यह रहता है जबाब

  यद्यपि भारतीय डाक विभाग की घटिया कार्यप्रणाली की बात बार बार सामाजिक कार्यकर्ता शिवानन्द द्विवेदी द्वारा ट्विटर और अन्य माध्यमों से इंडिया पोस्ट की पब्लिक ग्रेविन्सेस रिड्रेसल सेल को भेजी गई है जिसका समय समय पर जबाब भी दिया गया है लेकिन वह मात्र जबाब तक ही सीमित रहता है क्योंकि उनके जबाब में जो बताया जा रहा है उसका समाधान किया नही जा रहा है. यहाँ रीवा से लोकल अधिकारी जो झूँठी भ्रामक जानकारी ऊपर दे देते हैं वही हमे बता दी जाती है. जैसे रीवा और कटरा के विषय में देखें कुछ संलग्न ट्विटर के भी संदेश जिसमे विभाग कैसे कैसे निराकरण देकर स्वयं अपने आप को भी संतुष्ट नही कर पॉय रहा है.
संलग्न -  संलग्न कुछ तस्वीरों में देखने का कष्ट करें जीपीओ रीवा और कटरा एसओ की फ़ोटो एवं साथ ही आप देखें ट्विटर पर रीवा जीपीओ के विषय में क्या कुछ निराकरण इंडिया पोस्ट द्वारा भेजा गया है.
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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Wednesday, January 1, 2020

(MP News) जैविक खेती से लौटेगा गोवंशों का सम्मान - पद्मश्री बाबूलाल दाहिया (पद्मश्री बाबूलाल दाहिया द्वारा प्रश्नोत्तरी के रूप में लिखे गए जैविक खेती पर लेख का अंश)

दिनांक 01 जनवरी 2020, स्थान - रीवा मप्र

   बाबूलाल दाहिया आज एक ऐसा नाम है जिसे पूरा देश भलीभांति जानता है। 
   बाबूलाल दाहिया को उनके कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए और जैविक खेती के प्रोत्साहन और रिसर्च के लिए पद्मश्री अवार्ड से नवाजा जा चुका है। बाबूलाल दाहिया समय समय पर अपने लेख लिखते और प्रकाशित करते रहते हैं, स्टेज पर दाहिया जी को आमंत्रित किया जाता है जहाँ पर उनके कार्यक्रम होते हैं। 

     अभी हाल ही में उन्होंने जैविक खेती और किसानों गोवंसो की स्थिति पर प्रश्नोत्तरी के रूप में एक लेख लिखा है जिसे यहाँ पर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। 

प्रश्न न  1-  क्या जैविक खेती में कमाई के सुनहले  अवसर उपलब्ध है?

  उत्तर 1 - जैविक खेती में कमाई के अवसर नही है। वह मात्र आजीविका का साधन हो सकता है। क्यो कि उसका मूल्य जहर युक्त अनाज से मात्र दूना तिगुना हो सकता है। किंतु अनाज का मूल्य पहले से ही अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के मुकाबले 10 गुना घटा हुआ है।
   आइये हम 70 के दशक से आज की तुलना करते है जब हरित क्रांति शुरू हुई थी।
   अन्तरराष्ट्रीय मूल्य का मापदण्ड सोना है जो सत्तर के दशक में 200 रुपये का दश ग्राम था। 
       उन दिनों गाँव के एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी को बेतन भी  200 रुपये ही मिलता था। यानी कि उसे 10 ग्राम सोना प्रतिमाह पहले भी मिलता था और आज यदि 40 हजार रुपये उसका बेतन है तो आज भी 10 ग्राम सोना उसे  मिल रहा है।
     किन्तु किसान का कितना घट गया देखे?

    मेरे बड़े भाई ने 70 के दशक में अपना 5 मन यानी 2 क्विंटल चावल बेचा और एक तोला यानी की लगभग दश ग्राम सोना खरीद लिया। किन्तु यदि  आज मैं 10 ग्राम सोना खरीदना चाहू तो मुझे अपना 20 क्विंटल चावल और 25 क्विंटल गेंहू बेचना पड़े गा। यानी कि अनाज का रेट 10 गुना घट गया। जिसका आशय यह हुआ कि 70 के दशक के 1 रुपए की क्रय शक्ति घट कर 10 पैसे रह गई।
हरित क्रांति आने पर उत्पादन तिगुना बढ़ गया यानी 10 पैसा 30 पैसा हो गया ।
       पर किसान 70 के दशक के मुकाबले फिर भी 70 पैसे प्रति रुपया घाटे में है।
 अगर उसे जैविक खेती में दूना मूल्य मिला तो उसका 10 पैसा 20 पैसे के बराबर होगा और तिगुना हो गया तो 30 पैसे के बराबर ही। इससे अधिक लाभ आम किसान नही पाएगा।
       हाँ यह लाभ अवश्य होगा कि वह कर्ज के बोझ से मुक्त रहेगा। बाकी जो जैविक खेती को लाभ का धंधा बता रहे है वह भी वे ब्यापारी टाइप के लोग हैै जो अब रासायनिक खाद के स्थान पर अपना जैविक खाद बाजार में उतार किसानों को लूटना चाहते है।

हाँ यदि किसान के अनाज को जैविक प्रमाणीकरण के बाद विदेश भेजा जाए तो अवश्य उसमे अच्छा मूल्य मिलता है।
किन्तु सर्टीफिकेशन में इतना झाम है कि आम किसान उसे कर ही नही सकता।

पश्न न 2 - आप किस तरह जैविक खेती से जुड़े है।


उत्तर क्रमांक 2   - खेती हमारे परिवार का पैतृक धंधा था जो कई पीढ़ियो से जुड़ा था। और किसान बालक होने के नाते बहुत सारा खेती के जुताई कटाई गहाई ,मड़ाई, का ज्ञान उन दिनों किसान बालको को पढ़ाई के समय भी करने पड़ते थे इसलिए सारी जानकारी  यू ही हो जाती है।
       क्योंकि पचास साठ के दशक में दशहरे से दीपावली तक उन दिनों बकायदे फसली छुट्टी होती थी तब हम धान की गहाई ज्वार की तकाई आदि कार्यो में परिवार की मदद करते थे।

   जैविक खेती विरासत में मिली, जहरीली हुई हरित क्रांति के बाद

  रही बात जैविक की तो जो खेती हमे बिरासत में मिली वह पहले पूर्णतः जैविक ही थी। क्योकि जहरीली तो वह हरित क्रांति आने के बाद हुई।
      उन दिनों  गाय बैल हमारे परिवार के अंग थे। उनसे हमारा मूक समझौता सा था कि हम गायो को घास खिलाते वे हमें दूध देती। हमारे घास से वे तंदुरस्त होती उनके दूध से हम।
  गाय ने बछड़ा जना हमने उसे हल में चलाया। किन्तु जो उत्पादन हुआ उसमे अनाज हमारा और भूसा पुआल चुनी चोकर गाय बैल का।
   गाय बैल ने गोबर किया किसान ने कम्पोष्ट बनाया और गाड़ी में भरा जिसे खेत तक बैल ही खींच कर ले गए किन्तु अपने अपने हिस्से की वस्तु पाने के बराबर के अधिकारी।
और जीवन पर्यंत किसान से सेवा लेने के हकदार।
    किन्तु यह जैविक अजैविक की बात तो 1965-66 के आस पास तब शुरू हुई जब देश मे हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ।
     पर उसका कारण यह था कि आजादी के बाद हमारी स्वास्थ सेवाए बढ़ गई जिससे हैजा चेचक प्लेग जैसी तमाम जानलेवा बीमारी समाप्त हो गई उसके कारण जनसंख्या बढ़ी। पर उस अनुपात में हमारा अनाज का उत्पादन नही बढ़ा। फलस्वरूप नारा लगने लगा कि

रोटी कपड़ा और मकान।
मांग रहा है हिंदुस्तान।।

उसे तत्कालीन सरकार ने चुनौती के रूप में लिया और देश मे हरित क्रांति आई। किन्तु वह पहले तीन चीजो पर ही टिकी थी।
1 - उन्नत किस्म का बीज।
2-  रसायनिक उर्वरक।
3-  सिचाई के साधन।
 और फिर वही से  जैविक अजैविक खेती का विभाजन हुआ।

पश्न न 3 - किसानों को क्या सुझाव देना चाहते है ?

उत्तर 3 -  किसानों को मैं यह कहना चाहता हूं कि आप जितना  बाहरी बीज मंगाते जाएंगे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के रसायनिक कीटनासी नीदानासी आदि के चक्कर मे पड़ते जाएंगे। देखने मे आप का खेत खूब हरा भरा दिखेगा उपज भी होगी पर वह आप के लिए नही सेठो के लिए किसान को उसमे उतना ही मिलेगा जैसे भैस 10-12 लीटर दूध देती है किंतु उसके बच्चे के हिस्से में एक लीटर भी नही आता।
    इसलिए वह यहां के परम्परागत किस्मो को अपनाए जो यहां की परिस्थितिकी में हजारों साल से रचे बसे है।

  जैविक खेती से लौटेगा गोमाता का सम्मान

  वे कम वर्षा में पक जाते है, ओस में पक जाते है। आगे पीछे के बोये साथ साथ पक जाते है।इसलिये वर्तमान आसन्न संकट जलवायु परिवर्तन और भूमण्डलीय ऊष्मता रोकने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। वे रोग और बीमारी सहन करने में सक्षम तना बड़ा होने के कारण घास उन्हें नही दबा पाती अस्तु नींदानाशक कीटनाशक डालने की जरूरत नही पड़ती। उत्पादन कम होगा किन्तु किसान कर्ज के बोझ से मुक्त रहेगा।
   साथ ही घर से बाहर की गई गाय का महत्व भी बढ़ेगा।
  साभार - बाबूलाल दाहिया, पद्मश्री की कलम से। विशेष आग्रह पर प्राप्त।

संलग्न - बाबूलाल दाहिया जी की फ़ोटो आदि।

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Tuesday, December 31, 2019

(Rewa, MP) पूर्वा 310 में ठंड में ही बांध दिए गए गोवंश (मामला जिला रीवा के गंगेव जनपद अन्तर्गत आने वाले पूर्वा 310 ग्राम पंचायत का जिंसमे की सरपंच अजय गुप्ता के द्वारा पिछले वर्षों की भांति मवेशियों को खुले में बांधकर छोड़ दिया गया, यद्यपि यदाकदा पैरा डाला जाता है लेकिन पानी और छाया की व्यवस्था का बना है अभाव, मवेशी ठंड में दे रहे जान)

दिनांक 31 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

  जैसे ही आप नए ईसवी वर्ष 2020 के आगोश में समा रहे होंगे शायद ही आपको पता होगा की मांसाहारी समाज के लिए कितनो जीवों को इस जश्न के लिए बलि चढ़ाया जा रहा होगा. विश्व की 8 अरब को छूती आबादी में से मात्र 5 प्रतिशत से भी कम आबादी शुद्ध शाकाहारी हो सकती है इसमें से यद्यपि अन्य 10 प्रतिशत के आसपास की आबादी शायद बीफ यानी गोवंश और भैंस -भैसों की मांस न खाती हो फिर भी विश्व की 85 प्रतिशत के आसपास की आवादी अभी भी ऐसी हो सकती है जो बीफ का सेवन करती है.

एशिया समेत यूरोप अमेरिका अफ्रीका और अरब देश बीफ पर आश्रित

  बताते चलें की एशिया समेत विश्व के बड़े महाद्वीपों जैसे ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, अरब देश और अफ्रीका यह सब देश ऐसे हैं जहां हिन्दू अथवा अन्य शाकाहारी भोजन को मान्यता देने वाले सम्प्रदाय के लोग कम ही रहते हैं. ऐसे में यहां पाए जाने वाले बहुतायत लोग बीफ अर्थात गोवंशों के मांस, बहिंसों के मांस और पोर्क अर्थात सुअर के मांस को खाना प्रेफर करते हैं. कारण यह अपनी संस्कृति बताते हैं और साथ में ठंडा क्लाइमेट का होना बताते हैं. लेकिंन सच्चाई यह है की इनकी संस्कृति ही पूरी इस प्रकार से मांसाहारी किश्म की है जो शायद ही पुराने सनातन धर्म को मानने वाले और जैन धर्म को मानने वालों को राश आये.

  गंगेव के पूर्वा 310 में भी सड़क के किनारे बांधा है गोवंशों को

   गंगेव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता धीरेंद्र शेखर पांडेय द्वारा प्राप्त जानकारी से पता चला की गंगेव से पूर्व की तरफ देवतालाब की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पुरवा 310 ग्राम पंचायत सरपंच द्वारा पूर्व की भांति इस वर्ष भी बिना किसी समुचित व्यवस्था के ही सड़क के किनारे रस्सी में बांधकर पशुओं को छोड़ दिया गया है. किसी प्रकार की छाया की व्यवस्था न होने से हाड़ गला देने वाली ठंड में पशु तड़प कर जान दे रहे हैं. यद्यपि लोगों ने बताया की पशुओं को खाने के लिए धान के पैरे की व्यवस्था समय समय पर की जाती है जिससे उनको खाने के लिए कुछ मिल पा रहा है. लोगों ने माग की है की इन्हों ठंड से बचाव के लिए भी शेड की व्यवस्था की जाए साथ में इनको समय समय पर पीने के पानी की भी व्यवस्था की जाय. लोगों ने माग की है की जल्द से जल्द गोशालाओं का कार्य समाप्त कर इसमे पशुओं के लिए व्यवस्था की जाय.

  गोशालाओं का कार्य अभी भी अधूरा

  बता दें की मप्र शासन की तरफ से प्रदेश में बनाई जाने वाली 900 गोशालाओं का कार्य अभी भी पूरा नही होने के चलते जगह जगह पशु क्रूरता का शिकार हो रहे हैं.
   इस विषय में बता दें की किसानों और पशु पलकों द्वारा बेसहारा छोड़ दिए गए गोवंशों को कोई ठिकाना नही मिलने से यह बेसहारा पशु जब भ्रमण करते हुए चारा पानी की तलास में खेतों में पहुचते हैं तो किसानों की खड़ी फसल को नुकासन पहुचा देते हैं जिससे क्रोधित होकर यह किसान न आव देखते न ताव बस झुंड के झुंड मवेशियों को पकड़कर तार की बाड़ियों में कैद कर देते हैं जिंसमे न तो समुचित छाया की व्यवस्था होती है और न ही चारा पैरा और पानी की व्यवस्था जिससे पशु तड़प कर जान दे देते हैं. 
  किसानों और गोवंशों दोनो का जीवन संकट

    इस प्रकार की पशु क्रूरता की घटनाएं आमतौर पर फसल के सीजन में ज्यादा देखने को मिल रही है. अब जब इस समय किसानों ने गेहूं और अन्य फसलों की बोवनी की हुई है वह उसको रात रात भर ठंड में सींचकर उगा रहे हैं ऐसे में स्वाभाविक है की जब यह बेसहारा गोवंश खेतों को नुकसान पहुचाते हैं तो किसान को गुस्सा आ जाता है. गुस्से में किसान अनर्थ कर डालते हैं. आज इसके लिए यदि कोई सबसे अधिक जिम्मेदार है तो वह हैं पशुपालक. क्योंकि पशुपालक गॉयों को तब तक रखते हैं जब तक वह दूध दे रही होती हैं और जैसे ही गायें दूध देना बन्द कीं अथवा उनके बछड़े पैदा हुए वैसे ही वह उन्हें छोड़कर फुरसत हो जाते हैं जिसका खामियाजा किसानों को बेसहारा पशुओं को भुगतना पड़ रहा है.

 हर जनपदों में बनेगी अतिरिक्त 12 गोशालाएं

   बता दें की मध्य प्रदेश के हर जनपद में इन 900 गोशालाओं के अतिरिक्त भी अन्य 12 नयी गोशालाओं को बनाये जाने का प्रावधान बन चुका है जिसके सिलसिले में पशु चिकित्सा विभाग से प्राप्त जानकारी अनुसार सभी ऐसी ग्राम पंचायतों को चिन्हित कर उनसे जानकारी माँगी जा रही है. इस जानकारी में ग्राम सभा का प्रस्ताव, सरकारी 6 एकड़ की खाली पड़ी जमीन प्रमुख है. यह जानकारी संबंधित ब्लॉक सीईओ के माध्यम से पशु चिकित्सा विभाग को प्रेषित किया जाना है जहां इसका निर्धारण होगा की किन 12 पंचायतों का चयन किया जाय. यद्यपि पशु चिकित्सा विभाग द्वारा यह भी जानकारी मिली है की अब सरकार हर ग्राम पंचायत से यह जानकारी माग रही है जिससे भविष्य में ऐसी समस्त ग्राम पंचायतों को इन कार्ययोजना में सम्मिलित किया जा सके. अब देखना यह होगा की पहले प्रथम चरण में निर्माणाधीन 900 गोशालाएं कब तक पूर्ण हो पाती हैं.
  संलग्न  - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें खुले में रखे हुए मवेशी जो बिना किसी समुचित व्यवस्था के ही हैं.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता 
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Monday, December 30, 2019

(MP News) काल बनकर आई ठंड ले रही गोवंशों की जान (मामला जिले और प्रदेश में गोवंशों की स्थिति पर जहाँ भीषण ठंड में अवैध बाड़ो में कैद मवेशी मर रहे बेमौत, किसान और गोवंश दोनो की स्थिति हुई दयनीय, 1000 गोशालाओं का सपना अभी भी अधूरा)

दिनांक 30 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

   प्रदेश में निर्माणाधीन 900 सरकारी गोशालाओं का कार्य पूरा न होने से गोवंशों की स्थिति दयनीय बनी हुई है.
   जगह जगह बेसहारा मवेशी दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं, अवैध बाड़ो में चारा पानी, छाया बिना दम तोड़ रहे हैं तो कहीं नहरों घाटियों और जलप्रपातों में जीवित ही झुंडों में फेंके जा रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे घोर कलयुग आ चुका है जब गोवंशों को पूरी तरह से समाज से बहिष्कृत किया जा चुका है. 

  खा रहे लाठी डंडे, कुल्हाड़ी से हो रहा स्वागत

   गोवंशों को यत्रतत्र क्रूरता का शिकार होना पड़ रहा है. अवैध बांडे तो आज आम बात हो चुके हैं, इसके साथ साथ गोवंशों को धारदार हथियारों से नुकसान पहुचाया जा रहा है. उनके पैरों और मुह जीभ को भी निर्दयी लोग तार से बांध देते हैं जिससे खानापानी न ले पाने के चलते मर जाते हैं. घाव में कीड़े पड़ जाते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है. लाठी डंडे कुल्हाड़ी से पैर और शरीर में घाव कर दिया जाता है. यह वाकया आजकल आम हो चला है. ऐसा लगता है जैसे मानवता समाप्त हो चुकी है.

 जगह जगह हो रहे दुर्घटना का शिकार 

  मवेशी सड़कों में भी झुंड लगाकर बैठ जाते हैं जिससे आने जाने वाले वाहनों से टकराकर भी दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं. यह एक बड़ी समस्या है. अमूमन वाहनों की गर्मी और प्रकाश के चलते मवेशी सड़कों पर आ जाते हैं जिससे दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं.

  अवैध बाड़ो का लग गया अंबार

   फसल नुकसानी को बचाने के लिए किसान अवैध तरीके से बाड़ो का निर्माण करते हैं जहां न तो समुचित छाया की व्यवस्था होती है और न ही पानी भूषा की व्यवस्था, जिसके चलते मवेशी अवैध बाड़ो में मरने लगते हैं. यह एक बड़ी समस्या है जिसको देखने वाला कोई नही है. इन बाड़ो में ठंड के मौसम में सबसे अधिक तकलीफ का सामना करना पड़ता है क्योंकि न तो इनके खाने के लिए कुछ होता है और न ही छाया होती है.

  नहरों में फेंक रहे जीवित गोवंशों को

   बकिया बराज नहर और उसके आसपास के ग्रामों से लगे क्षेत्र में निर्दयी तत्व मवेशियों को लाकर नहरों में धकेल देते हैं जिसके कारण 40 से 50 फीट गहरी नहर से बाहर न आ पाने के कारण यह मवेशी झुंड में वहीं नहर के बीचोंबीच ठंड और भूंख से तड़प कर मर जाते हैं. रीवा के टीएचपी और चचाई पावर प्लांट में लगे छन्ने में प्रतिदिन ऐसे दर्जनों मृत मवेशियों को देखा जा सकता है.
  सरकार तो बस वादा करती है

   जहां तक गोवंशों के प्रति दया की बात है तो सरकार से दया की अपेक्षा करना ही बेमानी है क्योंकि आज दया होती तो शायद भारत विश्व के सबसे अग्रणी बीफ या गोमांश उत्पादक देशों की श्रेणी में नही होता. पर फिर भी यदि सरकार के वादे की बात करें तो कम से कम मप्र सरकार को तो 1000 गोशालाओं को पूर्ण कर ही देना चाहिए था मगर अब तक गोशालाओं का निर्माण कार्य अधर में लटके रहने के कारण हालात यह हैं की न तो किसान खुश है और न ही गोवंशों को राहत है. दोनो का ही जीवन संकट बरकरार है.
  गांव गांव बने गोशालाएं

   वास्तव में देखा जाए तो आज एक ब्लॉक में मात्र 3 या 4 गोशालाएं बनाने से कुछ खास नही होने वाला है क्योंकि जिस तरह से गोवंशों का झुंड बेसहारा गांव गांव घूम रहा है इससे साफ जाहिर है की यहाँ गांव गांव गोशालाएं बनाये जाने की आवश्यकता है.
  हर ब्लॉक में 12 अन्य गोशालाएं बनेगी

  अभी हाल ही में मप्र सरकार द्वारा पुनः एकबार हर एक ब्लॉक में 12 अन्य गोशालाएं खोले जाने सम्बन्धी प्रपोजल लांच किया गया है जिसमे संबंधित पंचायतों से जानकारी माँगी जा रही है. जिसके तहत हर एक ऐसी पंचायतों से ग्राम सभा का प्रस्ताव मंगवाया गया है और साथ में उन सभी पंचायतों से जमीन के कागजात भी चाहे गए हैं. बताया गया है की जिन पंचायतों को गोशालाएं चाहिए उन्हें कम से से 6 एकड़ जमीन देनी पड़ेगी.
  हिनौती गोशाला का काम अधूरा

   गंगेव ब्लॉक की हिनौती ग्राम पंचायत अन्तर्गत आने वाली गदही ग्राम की निर्माणाधीन 27 लाख और 62 हजार की लागत से बनाई जा रही गोशाला का कार्य अभी भी अधूरा है. दिनांक 30 दिसंबर 2019 की स्थिति में हिनौती गोशाला मात्र दीवाल स्तर तक ही पूर्ण हो पायी है. वहां पर उपस्थित रोजगार सहायक प्रकाश उपाध्याय ने बताया की 5 जनवरी 2020 को गोशाला का लोकार्पण किया जाना है इसके संबंध में अभी हाल ही में जिला पंचायत सीईओ अर्पित वर्मा द्वारा नईगढ़ी ब्लॉक में विजिट के दौरान सभी जनपद सीईओ को कारण बताओं नोटिस भी जारी की जा चुकी है. अब देखना यह होगा की कारण बताओ नोटिस का कोई प्रभाव पड़ता है की नही. ज्ञातव्य है कि पूरे जिले में प्रथम फेज में 33 गोशालाए बनाई जानी हैं जबकि पूरे प्रदेश में इनकी संख्या 900 के पार जानी है।
  संलग्न -  सड़कों और बाड़ो में अपनी मौत की बारी का इंतजार करते गोवंश.

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शिवानन्द द्विवेदी
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता
जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587

Sunday, December 29, 2019

(MP news) खरीदी केंद्र बने भ्रष्टाचार के केंद्र, खरीदी केंद्रों में मची है लूट, 42 किलो तक हो रही तुलाई, किसानों ने किया कार्यवाही की मांग, कार्यवाही नहीं हुई तो होगा आंदोलन (मामला जिले के धान खरीदी का जहाँ आर्द्रता और अन्य चार्ज के नामपर चल रही है लुटाई, हिनौती, गंगेव, देवास, त्योंथर, जवा आदि खरीदी केंद्रों भी शामिल)

दिनांक 29 दिसंबर 2019, स्थान - रीवा मप्र

    जिले के खरीदी केंद्रों में किसानों की लुटाई अनवरत जारी है. शिकायतों और मीडिया के बाबजूद भी खरीदी केंद्र प्रबंधकों और उनके दलालों पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ रहा है.

   एक तो पूरे जिले और संभाग में खरीदी लेट प्रारम्भ हुई वहीं ऊपर से किसानों पर ठंडी का भी सितम जारी है. ऐसे में अन्नदाता अपनी धान ट्रेक्टर में लादकर जगह जगह की ठोकर खाने पर मजबूर है जिसको देखने वाला कोई शासन प्रशासन नही है.


   वजन से अधिक हो रही तुलाई

   बता दें की जिले अथवा संभाग का शायद ही कोई ऐसा खरीदी केंद्र हो जहाँ प्रति बोरी धान की तुलाई वास्तविक वजन से अधिक न हो रही हो. आमतौर पर खाली बोरी का वजन 500 से 600 ग्राम माना जाता है ऐसे में प्रति बोरी सहित धान का वजन 40 किलो 600 ग्राम तक होता है लेकिन खरीदी केंद्रों में बैठे दलाल और प्रबंधक किसानों से 41 से 45 किलो तक वजन की धान ले रहे हैं. जो किसान इसका विरोध करते हैं उनकी तुलाई ही नही की जाती और वापस कर दिया जाता है.


आर्द्रता के नाम पर मची है लूट

  किसानों से आर्द्रता के नाम पर लूट की जा रही है. वैसे सामान्यतौर पर धान की आर्द्रता 17 पॉइंट तक होती है और यदि 17 से अधिक की आर्द्रता हुई तो धान नही ली जाती. लेकिन जिन किसानों की आर्द्रता 17 से अधिक होती है उनसे अतिरिक्त धान तुलाई की जाती है साथ ही उनसे पैसे भी लिए जाते हैं. 17 से अधिक आर्द्रता वाले किसानों से 42 किलो तक धान ली जाती है.


धान भराई और तुलाई के नाम पर लुटाई

  इसी प्रकार सभी समितियों और खरीदी केंद्रों में धान भराई और तुलाई के नाम पर भी लूट मची हुई है. बता दें की यह नागरिक आपूर्ति निगम खाद्य विभाग और सहकारिता विभाग की जिम्मेदारी होती है वह अपने लेबरों और तुलावटी को खरीदी केंद्रों पर रखे क्योंकि शासन इसके वास्ते प्रबंधकों को अलग से पैसे देती है लेकिन समस्या बताकर किसानों से प्रति बोरी 5 से 10 रुपये तक लिया जाता है. आमतौर पर यह सभी खरीदी केंद्रों में देखा जा सकता है।


प्रासंगिक व्यय की राशि में भी धांधली

  इसी प्रकार सभी समितियों के खरीदी केंद्रों में शासन द्वारा तुलाई, भराई, बोरे की सिलाई, उठाई, लदाई के नाम पर, किसानों के लिए खरीदी केंद्रों पर व्यवस्था के लिए एवं खरीदी गयी धान की सुरक्षा के लिए अमूमन 5 से 10 लाख के बीच की राशि दी जाती जो सीधे समितियों से सम्बद्ध रहती है लेकिन चूंकि यह देखा जा सकता है की किसी भी खरीदी केंद्र में न तो उचित छाया टेंट की व्यवस्था होती है और न ही अन्य किसी प्रकार की सुविधा होती है. जहाँ तक सवाल धान का है तो वह खुले आसमान के नीचे पड़ी सड़ती रहती है तो साफ जाहिर है की यह प्रासंगिक व्यय राशि का सीधा सीधा घालमेल कर दिया जाता है और संबंधित समिति खरीदी केंद्रों के मालिक मिलकर इसको भी चट कर जाते हैं.


खरीदी में ऐसे चलता है करोड़ो के भ्रष्टाचार का खेल

  अब आइए समझते हैं की खरीदी केंद्रों में धान गेहूं तुलाई का खेल किस कदर करोड़ो के भ्रष्टाचार का रूप ले लेता है. मानाकि हिनौती खरीदी केंद्र का उदाहरण लेते हैं पर यह सिस्टम सभी खरीदी केंद्रों में लागू होता है. हिनौती ए एवं बी खरीदी केंद्रों के नाम से चल रहे भमरिया और भठवा खरीदी केंद्रों में कुल मिलाकर 80 हजार क्विंटल धान खरीदी की लिमिट का प्रावधान है. 

   ऐसे में यदि ऊपर के सिस्टम से देखा जाय तो यदि 80 हज़ार क्विंटल का दुगुना किया जाए तो 160 हज़ार बोरियां से अधिक खरीदी होना पाया जाता है. ऐसे में यदि प्रति बोरी आर्द्रता के नाम पर एक किलो धान भी बचाई जाती है तो यह 160 हज़ार किलो धान अर्थात 1600 क्विटल धान की अतिरिक्त खरीदी होगी जो रिकॉर्ड में खरीदी गई धान में नही है. अब 1815 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से देखा जाय तो यह राशि 29 लाख 4 हज़ार रुपये बनती हैं. मतलब 29 लाख रुपये सीधे समिति प्रबंधक मात्र एक बार की धान की खरीदी में बचा रहा है. इसमे से 4 से 5 लाख रुपये तक शिकायतों पर जांच के नाम पर और कमीसन के नाम पर सहकारिता, फ़ूड विभाग और नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों को चली जाएगी. क्योंकि यह तो समझिए ही कि जब आम खरीदी केंद्रों की शिकायतें करेंगे तो जांच होगी फिर जांच के नाम पर हीलाहवाली के लिए ऊपर वालों को खिलाना पिलाना पड़ेगा. इस प्रकार का यह खेल आर्द्रता और अतिरिक्त खरीदी का हुआ. इसके अतिरिक्त लेबरों के लिए प्रति बोरी कम से कम 2 रुपये रखा जाए तो 160 हज़ार बोरी धान मतलब 3 लाख 20 हज़ार रुपये कम से कम हुआ. इससे साफ जाहिर है की लेबरों के लिए तो मजदूरी से भी अधिक तो 2 रुपये प्रति बोरी वाले मामले से ही निकल आया. शेष देखें की यह 5 लाख कम से कम प्रासंगिक व्यय वाली राशि का क्या होता है. यह राशि किसी भी प्रासंगिक व्यय में खर्च नही होती है यह सीधे समिति प्रबंधक और उनसे जुड़े खा जाते हैं. 


अभी खेल खत्म नही हुआ, धान को खुले में क्यों रखते हैं?

   अभी भ्रष्टाचार का खेल खत्म थोड़ी हुआ है. अभी भी कई सीन बांकी हैं. अब समझिए की धान को ट्रांसपोर्ट करने में देरी और खुले में रखने से क्या फायदा होता है? 

   यदि धान को जल्दी ट्रांसपोर्ट कर दिया जाता है अथवा खुले में न रखकर उसे ढककर अथवा गोदामो में रखा जाता है तो कोहरे, शीत और पानी की वजह से खरीदी गयी धान का वजन आटोमेटिक रूप से बढ़ जाता है जिससे जो धान 42 किलो प्रति बोरी के हिसाब से खरीदी गयी है वह बढ़कर 45 किलो तक हो जाती है क्योंकि पानी खाकर धान की वजन बढ़ जाती है. अब यह धान समिति प्रबंधक और खरीदी केंद्र प्रबंधक सीधे निकालकर बोरियों को खाली करके उन्ही से अन्य कई बोरियां बना डालते हैं यह उस 29 लाख में दुगुने से भी अधिक का कार्य करता है और भ्रष्टाचार की कमाई सीधे 29 लाख से बढ़कर करोड़ तक पहुच जाती है.

  तो समझ आया पूरा मामला. कैसे बिना किसी मेहनत के मात्र खरीदी केंद्रों के प्रबंधक बनकर एक ही वर्ष में करोड़पति बन सकते हैं. कौन इसे देखेगा? कौन इसकी जांच करेगा? सबसे बड़ी बात कौन स्वार्थी किसान इसकी आवाज उठाएगा?


  कुछ खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार के पुख्ता उदाहरण

  रीवा जिले के जिन जिन खरीदी केंद्रों में यह शोध किया गया और समस्या विशेष तौर पर किसानों से बातकर पूँछी गयी जिनके की काफी फ़ोटो और वीडियो उपलब्ध हैं उनमे से गंगेव ब्लॉक के हिनौती ए और बी, देवास ए और बी, भठवा, भमरिया, घुमा-कटरा, भीर-कोट, खर्रा-लौरी-गढ़ आदि प्रमुख हैं. यहां तो जमकर लूट मची है. अब सवाल यह है कि इसे कौन देखेगा। इस पर जांच कौन करेगा?


  हज़ारों क्विंटल की परमिट वाले किसानों के भी काले कारनामे देखते चलें

   जिन जिन समितियों और खरीदी केंद्रों की बातें की गईं हैं उनमे से सभी में ऐसे भी किसान हैं जिनकी सैकड़ों हेक्टेयर की जमीनें हैं. इसमे से काफी जमीन परती भी पड़ी हुई है जिसमे की कुछ बोया ही नही जाता लेकिन यह रसूखदार किसान पटवारी तहसीलदार से मिल बैठकर उस जमीन का हज़ारों क्विंटल की परमिट बनवा डालते हैं और बनिकों और व्यापारी वर्ग से संपर्क कर कमीसन पर वह धान भी अपने एकाउंट में डलवा लेते हैं. पूरे जिले और प्रदेश में देखा जाय तो हज़ारों ऐसे किसान हैं जो की व्यापारियों से मिलकर यह अवैध धंधा चला रहे हैं. यह सब सहकारिता, खाद्य विभाग और नागरिक आपूर्ति निगम की समिति प्रबंधकों से मिली भगत के चलते होता है. अब बताएं कौन इस संगठित अपराध और माफिया पर कार्यवाही करेगा?


संलग्न - कृपया संलग्न देखने का कष्ट करें खरीदी केंद्रों पर डंप पड़ी हुई शीत पानी खा रही धान और किसानों का समूहआदि की फ़ोटो शॉट.

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शिवानन्द द्विवेदी

सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता

जिला रीवा मप्र, मोबाइल 9589152587.