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Wednesday, July 13, 2016

(रीवा) इटहा आंगनवाडी कार्यकर्ता की प्रताड़ना का सिलसिला जारी - प्रताड़ना के सहयोगियों में रीवा का महिला बाल विकास और महिला शसक्तीकरण विभाग भी

नमस्कार साथियों


विषय – इटहा आंगनवाडी कार्यकर्ता को प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी, कैथा पंचायत के वर्तमान सरपंच और 354क के आरोपी संत कुमार पटेल के साथ-साथ महिला बाल विकास के अधिकारी कर्मचारियों की भी मिली भगत. उल्टा आईपीसी की धारा 354क और भ्रष्ट्राचार के आरोपी के कहने पर चले आते हैं रोज़-रोज़ आंगनवाडी केंद्र की जांच पर जबकि उसी क्षेत्र की अन्य दर्ज़नों आंगनवाडीयों पर लटकता है ताला जिसको देखने वाला कोई नहीं.

(गंगेव, जिला रीवा), थाना गढ़ अंतर्गत आने वाले गढ़ सेक्टर में आंगनवाडी केंद्र इटहा की आंगनवाडी कार्यकर्ता श्रीमती राजकुमारी पटेल पति सुग्रीव निवासी इटहा को प्रताड़ित करने की दिशा में मात्र कैथा पंचायत का वर्तमान सरपंच संत कुमार पटेल और उसके साथी रुक्मणी पटेल और अन्य ही नहीं हैं बल्कि गंगेव परियोजना अंतर्गत गढ़ सेक्टर की पर्यवेक्षक श्रीमती सावित्री सिंह भी लगी हुए हैं ऐसा प्रतीत हो रहा है. प्राप्त जानकारी से पता चला की प्रति सप्ताह 354क  का सह-आरोपी संत कुमार पटेल और उसका साथी रुक्मणी पटेल सी.एम. हेल्पलाइन और और लिखित भी शिकायत करता रहता है इस पर गढ़ सेक्टर की आंगनवाडी पर्यवेक्षक श्रीमती सावित्री सिंह और उनके गंगेव परियोजना के अन्य कर्मचारी हर हफ्ते इटहा आंगनवाडी केंद्र में जांच करने के लिए दो-तीन बार बैठे रहते हैं. इस सबसे कोई फर्क तो कार्यकर्ता श्रीमती राजकुमारी पटेल को नही पड़ता पर मानशिक रूप से प्रताड़ित होती हैं कि जब पूरे गंगेव ब्लाक में कोई भी आनागंवादी केंद्र नहीं खुलती तो रोज़ रोज़ इटहा आंगनवाडी केद्र की ही जांच भर क्यों की जा रही है जबकि यह आंगनवाडी प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार नियमित खुलती है.
ऐसा लगता है की कैथा का वर्तमान सरपंच संत कुमार पटेल तो 354 का आरोपी है ही उसके इस कृत्या में कहीं न कहीं सम्पूर्ण महिला एवं बाल विकाश विभाग रीवा की भी मिली भगत है. क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो महिला शसक्तीकरण और अबला, बालिकायों, जरूरतमंदो की वकालत करने वाले महिला शसक्तीकरण विभाग और महिला बाल विकास विभाग के अधिकारी अनिल जैन, शसक्तीकरण आयुक्त श्री गुप्ता और जॉइंट डायरेक्टर सौरभ सिंह जैसे अन्य भी तो अधिकारी बैठे हैं इन सबने पिछले दो वर्षों से लगाई जा रही गुहार पर कोई कार्यवाही नहीं की. मात्र इन सबके सह से ही अपराधी प्रकृति के लोगों के इतने हौसले बुलंद हैं की जिनके ऊपर स्वयम हाईकोर्ट में महिला की इज्ज़त आबरू को तार-तार करने वाले प्रकरणों के साथ साथ पंचायती कार्योंमे भ्रष्ट्राचार के दर्ज़नों केस चल रहे हैं, महिला एवं बाल विकास रीवा रोज़-रोज़ कैसे उन्ही की शिकायतों पर जांच और कार्यवाही करने चला आ रहा है यह बात समझ के परे जा रही है.

क्यों ऐसा है कि उक्त इटहा सम्बन्धी शिकायतें द्वेष भाव से हैं और
प्रताड़ित करने के उद्येश्य से हैं?

सबसे बड़ी बात तो यह है कि अभी हाल ही में यह पूरा का पूरा प्रकरण इटहा आंगनवाडी कार्यकर्ता श्रीमती राजकुमारी पटेल ने जिला और प्रदेश प्रशासन से व्यथित होकर हाईकोर्ट जबलपुर में प्रकरण क्रमांक WP: 2308/2016 लगाया था. तब जाकर हाईकोर्ट की नोटिस पर डीजीपी भोपाल और एसपी रीवा द्वारा गढ़ पुलिस ने मई 2016 के प्रथम सप्ताह में FIR क्र. 96/16 दर्ज किया गया जिसमे की आईपीसी की धाराएँ 354, 294, 506 और 34 लगाई गयीं थी .



यद्यपि किसी भी शासन-प्रशासन की व्यवस्था में शिकायतें तो होती ही हैं और उनमे कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, और यह लोकतंत्र में जनता के अधिकार के अंतर्गत भी आता है. जनता शिकायत करने के लिए स्वतंत्र है और यदि शिकायतें सही हैं तो कार्यवाही होनी चाहिए और यदि गलत हैं तो कूड़े में जाती हैं. बिलकुल वही चल रहा है. खैर भारत में तो सही शिकायतें भी ले दे कर कूड़े में ही जा रही हैं. पर यह भी देखना होगा की शिकायतें कहाँ से आ रही हैं और कौन कर रहा है? मसलन, यदि सामाजिक मुद्दों को लेकर शिकायतें आ रही हैं और जिनमे समग्रता है और तथ्य हैं तो ऐसी शिकायतें संज्ञान लेने योग्य होती हैं और तत्काल कार्यवाही होनी चाहिए और यदि कोई द्वेष भाव से और उस व्यक्ति अथवा एजेंसी से आ रही होती हैं जिसके ऊपर उच्च न्यायलय में प्रकरण चल रहे हों जो पहले से आरोपी हो और जिसके ऊपर पंचायतों में भी दर्ज़नों भ्रष्ट्राचार के प्रकरण चल रहे हैं जिनके पर्याप्त प्रमाण हों तो ऐसी शिकायतों की एक दो बार समीक्षा तो ठीक है और फिर इसके विषय में देखना होगा की यह जो किया जा रहा है वह द्वेष पूर्ण है. साथ ही जहाँ तक सवाल है इटहा आंगनवाडी तथा क्षेत्र के अन्य आंगनवाडी केन्द्रों का तो शिकायतें तो अन्य आंगनवाडी केन्द्रों की भी हैं. महिला एवं बाल विकास विभाग यह बताये की पूरे गंगेव परियोजना अथवा पूरे रीवा जिले में उनके द्वारा प्रतिमाह कहाँ कहाँ और कितनी जांचे की जा रही हैं क्योंकि मैं स्वयम भी इस प्रकरण को सामूहिक रूप से कई बार रख चुका हूँ और पूरे तथ्य के साथ की पूरे रीवा जिले और विशेषतौर पर गंगेव परियोजना में ही केन्द्रों की बड़ी दुर्दशा है पर क्या महिला बाल विकास रीवा के बैठे अधिकारियों ने इस पर कोई सुधारात्मक संज्ञान लिया? कोई संज्ञान नहीं लिया और स्थिति अभी भी यथावत बरकरार है.

गंगेव परियोजना और जिला कार्यक्रम अधिकारी रीवा द्वारा इटहा आंगनवाडी कार्यकर्ता की पिछले नौ माह से रोकी गयी पेमेंट को हाईकोर्ट ने देने के निर्देश दिए –

अभी हाल ही में इटहा आंगनवाडी कार्यकर्ता ने हाई कोर्ट जबलपुर में एक अन्य याचिका दायर की थी जिसमे गंगेव परियोजना की पर्यवेक्षक श्रीमती सावित्री सिंह सहित, जिला कार्यक्रम के वर्तमान अधिकारी अनिल जैन आदि को पार्टी बनाया गया था और नियत बिन्दुओं के आधार पर अपील की गयी थी की उनकी कार्य पर उपस्थित होने के वावजूद रोकी गयी पेमेंट को दिया जाए. यह भी वास्तव में देखा जाए तो प्रताड़ना की ही एक कड़ी थी की कार्यकर्ता की गलती साबित करके पेमेंट रोक दो वह शांत पद जायेगी लेकिन जो सही है वह चुप तो नहीं बैठता और इस प्रकार आंगनवाडी कार्यकर्ता ने हाईकोर्ट जबलपुर का दरवाज़ा पुनः खटखटाना उचित समझा. इस याचिका पर कार्यवाही करते हुए हाईकोर्ट जज श्री सुजोय पॉल ने साठ दिवस के भीतर जिला कार्यक्रम अधिकारी अनिल जैन को याचिकाकर्ता श्रीमती राजकुमारी पटेल को कारण स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं की क्यों उसकी पेमेंट रोकी गयी है.   
ज्ञातव्य है की श्रीमती राजकुमारी पटेल की याचिका क्रमांक: 10866/2016 में यह बात कही गयी है और साठ दिवश के अन्दर जवाब मागा गया है. आजकल सभी न्यायालयीन प्रकरणों को ऑनलाइन भी देखा जा सकता है. कृपया हाई कोर्ट की वेबसाइट में जाकर देख सकते हैं.

३५४क (354A, 294, 506, एवं 34) के आरोपी एवं भ्रष्ट सरपंच संत कुमार पटेल को तत्काल हटाने की माग – 

महिला प्रताड़ना एवं महिला के इज्ज़त आबरू को तार-तार करने के प्रयाश का सह-आरोपी एवं वर्तमान कैथा पंचायत के सरपंच संत कुमार पटेल को तत्काल प्रभाव के साथ कैथा के सरपंच पद से हटाने की माग रीवा कलेक्टर राहुल जैन, आयुक्त मध्य प्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद् भोपाल, अपर मुख्य सचिव राधेश्याम जुलानिया पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग मध्य प्रदेश शासन भोपाल सहित अध्यक्ष महोदय मानवाधिकार आयोग भोपाल तथा प्रधानमंत्री महोदय भारत सरकार से भी की गयी है. प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी कार्यवाही चल रही है.



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शिवानन्द द्विवेदी
(सामजिक, एवं आर टी आई कार्यकर्ता)
ग्राम कैथा पोस्ट अमिलिया थाना गढ़
तहसील मनगवां जिला रीवा म. प्र.
मोबाइल – 7869992139

Tuesday, July 5, 2016

रीवा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनवाडी केन्द्रों की दुर्दशा - केन्द्रों में लटकते हैं ताले , न कोई निगरानी न कोई योजना, सब कुछ बस कागजों में

दिनांक: 06/07/2016, रीवा (म.प्र.)
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रीवा जिले की ग्रामीण अंचल में संचालित आंगनवाडी केन्द्रों में नहीं दिया जाता कुपोषित बच्चों और महिलाओं का पोषण आहार, आंगनवाडी कार्यकर्ताओं के घरों में रख कर कर ली जाती है कालाबाजारी, और खिला दिया जाता है दुधारू पशुओं को. मंगल दिवस में अमंगल, और सबलाओं को बनाया जा रहा निर्बला.
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      (रीवा- हिनौती एवं गढ़ सेक्टर) राज्य और केंद्र सरकारों के अभी हाल ही में प्रसारित बजट में लगभग सभी शिक्षित वर्ग ने यह तो देखा होगा की किस तरह बजट आवंटन में महिला एवं बाल विकास या एकीकृत बाल विकास सेवा को लगभग सभी विभागों से ज्यादा बजट का आवंटन हुआ. यह आवंटन किसलिए हुआ? क्या इस आवंटन का लाभ उन बच्चों और कुपोषित बालिकाओं महिलाओं को मिल रहा है जिनके लिए सरकारें दावा करती हैं? इसकी निगरानी कौन करेगा? क्या बजट आवंटित कर देने मात्र से कार्य संपन्न हो गया? कौन कौन सी योजनायें है जो शहरी और ग्रामीण अंचल के बी.पी.एल, कुपोषित, असहाय, और ऐसे ही नीचे के आर्थिक और सामाजिक स्तर के समुदायों के लिए सरकार द्वारा चलाये जा रहे हैं? इसी प्रकार के दर्जनों प्रश्नों के उत्तर आज आम जनता को सरकारों से चाहिए. क्या सरकार इन सबके उत्तर देने के लिए तैयार है? निश्चित रूप से सरकार तो हमेशा ही तैयार है क्योंकि उसने तो पूरा का पूरा बजट ही आवंटित कर दिया है पर प्रश्न फिर वही घूमकर खड़ा हो जायेगा की इन सब बजट और योजनायों का सही तरीके से क्रियान्वयन कहाँ हो रहा है और कैसे हो रहा है?
      आइये इन सभी बिन्दुओं को लेकर एक बहुत छोटे स्तर से प्रारंभ करते है. और रीवा के गंगेव ब्लाक अंतर्गत हिनौती और गढ़ सेक्टर के लगभग साठ  पैंसठ केन्द्रों को आधार बनाकर फिर यही विश्लेषण और वस्तुस्थिति को पूरे जिले, पूरे प्रदेश और संभवतः पूरे देश में ज़ूम करके देखने का प्रयाश करते है.

जिला रीवा अंतर्गत हिनौती और गढ़ सेक्टर के पचासों आंगनवाडी केंद्र – मात्र लटकता मिलता है ताला, न कोई पोषण आहार, न कोई मध्यान भोजन, न कोई योजना का लाभ, आंगनवाडी कार्यकर्ता और बच्चे मिलते हैं नदारद –
वैसे तो सम्पूर्ण रीवा जिले के ग्रामीण अंचल के आंगनवाडी केन्द्रों की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं है. हम कहीं भी किसी भी आनागंवाडी केंद्र में जाएँ हमे तमाम ताले ही लटकते मिलेंगे पर जहाँ हमने लगभग अपनी आँखों से साल के तीन सौ पैसठ में से लगभग तीन सौ से अधिक दिनों में स्वयं भी देखा की गंगेव ब्लाक अंतर्गत आने वाली हिनौती एवं गढ़ सेक्टर की लगभग साठ (६०) से अधिक आंगनवाडी केन्द्रों में ज्यादातर ताला ही लटकता मिलता है, मात्र एक इटहा आंगनवाडी केंद्र को छोड़कर. ऐसे में क्या होगा महिलाओं का विकाश और क्या होगा बाल विकाश. शायद यह जानकारी कोई हमारे देश की महिला एवं बाल विकाश विभाग की केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी से भी साझा करले और उनके संज्ञान में रख दे तो अच्छा ही होगा. वैसे उनके कई कार्यों में से पशुओं के साथ क्रूरता को लेकर चलाये गए उनके अभियान और उनके योगदान के लिए वह बंधाई की पात्र हैं.
       जहाँ तक प्रश्न हैं आंगनवाडी सम्बन्धी इन अनियमितताओं की शिकायत का तो हम आपको बता दें की दर्जनों लिखित, दर्जनों सी.एम. हेल्पलाइन में और सैकड़ों बार मोबाइल और एस.एम.एस. से इन सभी जनहित वाले बिन्दुओं को लेकर आंगनवाडी सुपरवाइजर श्रीमती सावित्री सिंह (सेक्टर गढ़), श्रीमती निर्मला मिश्रा (सेक्टर हिनौती), गंगेव परियोजना अधिकारी, उस समय के रीवा जिला कार्यक्रम अधिकारी सौरभ सिंह, और अब के रीवा जिला कार्यक्रम अधिकारी अनिल जैन, रीवा महिला शसक्तीकरण के जिला आयुक्त नीलेश गुप्ता, कलेक्टर रीवा, सी.एम. हेल्पलाइन मध्य प्रदेश शासन, लिखित में श्रीमती पुष्पलता सिंह आयुक्त महिला एवं बाल विकास भोपाल म.प्र. शासन, श्रीमान प्रधानमंत्री महोदय भारत सरकार नई दिल्ली सहित मानवाधिकार आयोग भोपाल और पता नहीं कहाँ कहाँ इन सभी समस्याओं को लिखित और यहाँ तक की दस पांच रुपये का टिकेट/स्टाम्प भी लगा कर दिया गया लेकिन कुल टोटल परिणाम जीरो का जीरो. हमने अपनी ऊर्जा, समय, बुद्धि और पता नहीं क्या क्या बर्वाद किया पर समस्या जस की तस वहीँ पर बनी हुई है. जय हो शिनिंग इंडिया, जय हो देश बदल रहा है, जय हो उगता भारत, जय हो ग्रामोदय से भारतोदय.

भारत/राज्य सरकार की नौकरी ऊपरी कमाई का भी अच्छा जरिया:
      भारत में आप जुगाढ़ करके सरकारी नौकरी पा जाईये और फिर आप चैन आराम से बैठिये. कोई टेंशन नहीं. मासिक पगार तो पक्की है ही साथ में फर्जी टी.ए./डी.ए. बनाकर और बांकी की ऊपर की कमाई. चाहे वह महिला बाल विकास वाले केस में पोषण आहार बेंचकर, योजनायों में फर्जीवाड़ा करके, सबला योजना को निर्बला योजना में बदलकर, या फिर आंगनवाडी केन्द्रों को बंद रखने के एवज में पर्यवेक्षकों द्वारा आंगनवाडी कार्यकर्ताओं से पंद्रह सौ और दो हज़ार की घूस लेकर. सब चलता है. आप हज़ार दो हज़ार बस पर्यवेक्षकों को दे दो और वो अपने ऊपर बैठे आकाओं को भी शेयर पंहुचा देंगी बांकी  चाहे आप आंगनवाडी केन्द्रों को बंद रखो, खोल के रखो, केन्द्रों में माल-मवेशियों को बांधो, उसमे चारा भूसा रखो, या आपकी जो ईक्षा हो वो करो. कोई फर्क नही पड़ेगा. कुछ हमारे जैसे सरफिरे होंगे भी जिनको भ्रष्ट्राचार से लड़ने का भूत सवार होगा तो ज्यादा से ज्यादा दर्ज़न दो दर्ज़न शिकायतें करेंगे, हल्लागुल्ला करेंगें भी तो क्या फर्क पड़ता है. आखिर शिकायतों की जांच करने वाले तो ऊपर वाले ही अफसर न आयेंगे? ऐसे में जो पहले से ही उनको शेयर पंहुचा है उसका क्या? भारत में बस एक ही चीज़ तो कम से कम बहुत अच्छी है अधिकारी कर्मचारी कभी भी अपने विभाग के कर्मचारी अधिकारी से नमक हरामी नहीं करते. जिसका खाया है उसका अंत तक निर्वहन करते हैं. क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो भला कौन विकशित देश में ऐसा कानून होगा जहाँ सीधे सीधे आँख में पैर डालने (या आँख में धूल झोंकना) वाले काम होते होंगे? कम से भारत में तो यह संभव है? मेरा भारत महान! यहाँ पर पैसे के दम पर सब कुछ चल जाता है. बंद आंगनवाडी केंद्र कागजों में खुल जाते हैं. पंचायतों के जीरो स्तर के कार्य सौ प्रतिशन और पूर्ण गुणवत्तापूर्ण बन जाते हैं, यदि इरादतन किसी का मर्डर हुआ होगा तो वह एक्सीडेंटल बन जाता है. जहाँ एफ.आई.आर. लिखी जानी चाहिए वहां सादे कागज़ में भी रिपोर्ट नहीं ली जाती और जहाँ कुछ हुआ ही नहीं होता वहां कोर्ट केस बन जाता है, डॉक्टर बिना पढ़े और प्रेक्षा ट्रेनिंग के ही टॉप कर जाते हैं. पी.एस.सी. और आई ए एस मात्र गरीबों और मिदले क्लास वाले होनहार छात्रों के लिए हैं पैसे और पंहुच से सबल लोग तो बिना इन सबके ही प्रशासकीय अधिकारी बन जाते हैं.

आप कंप्यूटर गेम के शौक़ीन हैं तो 181 सी.एम. हेल्पलाइन में कॉल करें:-
यदि आप घर में अकेले पड़े पड़े अवसाद ग्रस्त महसूस कर रहे हैं और आपको लगता है की किसी से बात कर लेनी चाहिए तो एक शिकायत अपने गाँव, पंचायत या क़स्बा की ले लें और सी.एम. हेल्पलाइन में १८१ पर कॉल कर दें. आपका अच्छा एंटरटेनमेंट होगा. साथ ही आप कंप्यूटर गेम की तरह इसमें भी नंबर गेम खेल सकते हैं. जी हाँ क्या आपको पता नहीं है? आपकी सी.एम.हेल्पलाइन में दर्ज शिकायत पहले से चौथे लेवल तक जा सकती है. अब देखना है की चौथे लेवल तक पंहुचते पंहुचते आपकी जीत होती है या हार. ध्यान रखियेगा सी.एम. हेल्पलाइन को गंभीरतापूर्वक कभी मत लीजियेगा बस यह एक गेम है जो आपको पहले से चौथे लेवल तक पंहुचाएगा. आप जीत जाएँ तो उन लोगों का भला होगा जिनके लिए आपने यह शिकायत दर्ज करवायी थी नहीं तो कंप्यूटर गेम समझ कर भूल जाईयेगा. वहारहाल मैं यह कह रहा था की खाली टाइम में डिप्रेशन कम करने का तरीका है सी.एम. हेल्पलाइन, पर यदि आप गंभीर किस्म के व्यक्ति हैं तो थोडा सावधान रहिएगा क्योंकि म.प्र. शासन की सी.एम. हेल्पलाइन आपका डिप्रेशन बढ़ा भी सकती है क्योंकि क्या पता की आप चौथे लेवल में पंहुचकर इस गेम में हारें तो डिप्रेशन तो बढ़ सकता है ना?

ग्रामीण अंचलों में महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्य प्रणाली को सुधारना होगा, नहीं तो सब दावे खोखले हैं- सभी विभागों के कार्यों के गुणवत्ता की जांच के लिए गठित की जाएँ स्पेशल और स्वतंत्र  समितियां-
      तो आपने देखा की समस्या काफी व्यापक है, जिसका की समाधान अकेले किसी देश के प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री के बस की बात नहीं हो सकती. और इतने भी इमानदार मुख्यमंत्री और प्रधानमन्त्री नहीं मिल सकते की किसी भी समस्या को उतनी गंभीरता से ले सकें. ऊपर स्तर की उनकी कार्य प्रणालियाँ तो जग जाहिर ही हैं. भला कौन नहीं जानता कौन कितना दूध का धुला है. पर फिर भी सरकार को यदि भारत में वास्तव में बदलाव लाना ही है तो सबसे पहले यह देखना पड़ेगा की सबसे नीचे के स्तर पर जो व्यक्ति/हितग्राही खड़ा है क्या उसको सरकार द्वारा प्रदत्त योजनायों का सही सही लाभ मिल पा रहा है? अब प्रश्न उठता है की यह ऑब्जरवेशन/पर्यवेक्षण करेगा कौन? तो यह पर्यवेक्षण सरकारी मुलाजिमों के तो बस की बात नहीं. क्योंकि वह तो अधिकतर इतने भ्रष्ट हो चुके हैं की किसी भी समस्या के उचित और सही निराकरण की जिम्मेदारी इनको देनी ही नहीं चाहिए. क्योंकि कुछ होने वाला नहीं है. मानाकि कुछ मुट्ठीभर कर्मचारी/अधिकारी अच्छी सोच वाले हो सकते हैं पर उनकी कोई वैल्यू भी नहीं है. क्योंकि मुट्ठीभर हर स्थान तक पंहुच भी नहीं सकते. जांच सम्बन्धी कार्य तो लोकपाल और स्वतंत्र निगरानी टीम का ही हो सकता है. जब तक लोकपाल की व्यवस्था नहीं है तब तक हर विभाग के जांच की कोई ऐसी टीम गठित की जानी चाहिए जिसमे उस विभाग से हटकर अन्य विभागों और अन्य प्रदेशों के कर्मचारी/अधिकारी सम्मिलित हों (और किसी भी प्रकार से रिश्ते नाते में न आते हों). ऐसी कोई भी टीम कम से आधा दर्ज़न कर्मियों की होनी चाहिए जिसमे अच्छे रिकॉर्ड वाले रिटायर्ड अधिकारी, अच्छे रेटेड एन.जी.ओ. सदस्य, वरिष्ठ रिटायर्ड जज, वरिष्ठ समाजसेवी, वरिष्ठ अच्छे रिकॉर्ड वाले पुलिस अधिकारी और इसी प्रकार से अच्छे चुने हुए सदस्य जांच दलों में हों और हम यह मानकर चलें की इस प्रकार से गठित जाँच दलों पर कोई प्रशासनिक दवाब अथवा नेतागिरी नहीं होगी तब जाकर काफी हद तक समस्या का सही सही आंकलन हो पायेगा. नहीं तो वर्तमान भारत की जो दुर्दशा है वह इतनी निराशावादी है की जितनी योजनायें पास हो रही हैं उसी हिसाब से दिन दूनी रात चौगुने भ्रष्ट्राचार भी हो रहे हैं. कम से कम मैं यह पूरे विश्वास और पूरे अनुभव के साथ कह रहा हूँ.
नोट/टीप – महिला एवं बाल विकास विभाग का यह प्रकरण पूर्णतया सत्य घटनाओं पर आधारित है और मेरे पास पर्याप्त सबूत भी हैं. यहाँ पर जैसा की पहले भी प्रारंभ में कहा गया है की रीवा जिले के गंगेव ब्लाक की समस्या तो मात्र एक प्रोटोटाइप समस्या है. इसी समस्या को यदि बड़े लेंस में रखकर फोकस करें तो पूरे रीवा जिले नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में विशेषतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित आंगनवाडी केन्द्रों की दुर्दशा ठीक ऐसी ही है अथवा इससे भी निम्नस्तर की है. यदि वास्तव में उगता भारत, बढ़ता भारत और ग्रामोदय से भारतोदय जैसे मुहावरों को यथार्थ होते सच में देखना है तो सरकारों को गंभीर और सार्थक प्रयास करने पड़ेंगे नहीं तो “मेरा देश बदल रहा है” मात्र मोबाइल की रिंगटोन, गानों और कागजों तक ही सीमित रह जाएगा और वास्तव में कहीं कुछ नहीं बदला होगा सब कुछ यथावत ही रहेगा...हाँ सरकारें जरूर बदलती रहेंगी.

!!!जय हिन्द जय भारत!!!
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शिवानन्द द्विवेदी
(सामजिक, एवं आर टी आई कार्यकर्ता)
ग्राम कैथा पोस्ट अमिलिया थाना गढ़
तहसील मनगवां जिला रीवा म. प्र.

मोबाइल – 7869992139