Sunday, September 27, 2026

Breaking:// आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 4 और व्यावहारिक चुनौतियों पर व्यापक मंथन: कानूनी प्रावधानों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर//

*Breaking:// आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 4 और व्यावहारिक चुनौतियों पर व्यापक मंथन: कानूनी प्रावधानों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर//*

विशेष रिपोर्ट दिनांक 27 सितंबर 2026 रीवा मप्र 
सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 की धारा 4 के कार्यान्वयन, पारदर्शी शासन और इसके क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक चुनौतियों को लेकर हाल ही में दिनांक 27 सितंबर 2026 को समय 11 बजे सुबह से लेकर 2 बजे दोपहर तक एक उच्चस्तरीय ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिभागियों ने आरटीआई कानून के प्रभावी इस्तेमाल, सार्वजनिक प्राधिकरणों की जवाबदेही तथा सूचना आयोगों की वर्तमान स्थिति पर गहन विचार-विमर्श किया।

बैठक में मुख्य वक्ता वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के तहत आने वाले 'सक्रिय प्रकटीकरण' (Proactive Disclosure) की आवश्यकताओं का बारीक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कानून की मंशा सरकारी विभागों द्वारा स्वतः सूचनाएं सार्वजनिक करने की थी, ताकि आम जनता को बार-बार आरटीआई न लगानी पड़े, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके ठीक उलट है।
*धारा 4 का कार्यान्वयन: कानूनी प्रावधान बनाम जमीनी हकीकत*

बैठक के दौरान कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) द्वारा अनुशंसित 25 विस्तारित प्रकटीकरण बिंदुओं और आरटीआई कानून में शामिल मूल 17 बिंदुओं के बीच के अंतर पर विस्तृत चर्चा हुई। जिसमें कमजोर अनुपालन और सीआईसी ऑडिट के विषय में वीरेंद्र कुमार ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के ऑडिट आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 838 सार्वजनिक प्राधिकरणों में से केवल 19 ही पारदर्शिता के निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं। वेबसाइटों की दुर्दशा के विषय में बताया गया कि अधिकांश सरकारी विभागों द्वारा दी गई जानकारी पुरानी होती है, संपर्क विवरण अपडेट नहीं होते और दस्तावेज़ खराब तरीके से स्कैन किए गए पीडीएफ प्रारूप में अपलोड किए जाते हैं, जिससे सूचना तक पहुँच बेहद कठिन हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विषय में बताया गया कि हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अनिवार्य 'थर्ड पार्टी ऑडिट' और सख्त प्रवर्तन तंत्र के स्पष्ट निर्देश दिए हैं, लेकिन सार्वजनिक प्राधिकरणों में उदासीनता और निष्पक्षता की भारी कमी बनी हुई है। संघीय ढांचा के विषय में प्रकाश डालते हुए बताया गया कि DoPT और कार्मिक मंत्रालय की 25 सूत्रीय विस्तारित सिफारिशों को लागू करने में राज्यों के संघीय ढांचे से जुड़ी कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं, जिसके कारण कई राज्य सरकारें इन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं कर रही हैं।

 *सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और संवैधानिक पहलू*

बैठक में सत्येंद्र सिंह, सुनील खंडेलवाल, जयपाल सिंह खींची, फतेह चंद्र गुलेरिया, देवेंद्र अग्रवाल, राज तिवारी एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी और अन्य प्रतिभागियों ने मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में सूचना आयोगों की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई। बताया गया कि नियुक्ति प्रक्रिया पर विवाद बना हुआ है। चर्चा के दौरान यह मुद्दा उठा कि मुख्यमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता की समिति द्वारा की जाने वाली सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का रुख महत्वपूर्ण रहा है और इस तरह के संवैधानिक मामलों पर विचार किया जा रहा है। वहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता पर प्रतिभागियों ने जोर देकर कहा कि आयोगों में आयुक्तों के पद खाली रहने या नियुक्तियों में देरी से आरटीआई अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। इसके लिए ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति और सरकार व सूचना आयोगों के बीच समान सहयोग आवश्यक है।
*विभिन्न राज्यों से जुड़े मामले और शिकायतें*

बैठक के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं और आरटीआई के उपयोग पर विशेषज्ञ की सलाह ली:

*नरेगा फंड का दुरुपयोग और पुलिस जांच*

डॉ. सिंह ने मनरेगा (नरेगा) निधि में हुए भ्रष्टाचार और शिकायत के बावजूद पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने का मुद्दा उठाया। वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने स्पष्ट किया कि जब पुलिस निष्पक्ष जांच नहीं करती, तो केवल सूचना आयोग के भरोसे रहने के बजाय संबंधित साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सीधे अपराधिक न्यायालय (मजिस्ट्रेट कोर्ट) में शिकायत दर्ज की जानी चाहिए, क्योंकि सूचना आयोग के पास आपराधिक मामलों जैसी शक्तियां नहीं होतीं।

*सुनील खंडेलवाल द्वारा प्रस्तुत झारखंड सूचना आयोग की स्थिति*

झारखंड में सूचना आयोग के निष्क्रयात्मक होने पर चर्चा हुई। विशेषज्ञ ने सलाह दी कि सबसे पहले आयोग के कामकाज और मुख्य सूचना आयुक्त की कार्यप्रणाली को सत्यापित किया जाए। यदि आयोग पूरी तरह ठप है, तो इस स्थिति को चुनौती देने के लिए उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का रुख किया जा सकता है।

*निर्माण कार्य की सामग्री और भौतिक सत्यापन*

नगर परिषद की नाली निर्माण परियोजना में इस्तेमाल घटिया सामग्री की जांच के संबंध में पूछे गए सवाल पर बताया गया कि आरटीआई के तहत रिकॉर्ड का निरीक्षण (Inspection) कोई भी नागरिक कर सकता है, लेकिन निजी सामग्री या बिना सक्षम आदेश के किसी परिसर से भौतिक नमूने लेने के लिए उचित कानूनी अधिकार की आवश्यकता होती है। इसके लिए किसी अन्य विभाग से स्वतंत्र इंजीनियर द्वारा निरीक्षण की मांग की जा सकती है।

*फसल बीमा और मुआवजे का दावा*

फसल बीमा पॉलिसियों की जानकारी देने से इनकार करने पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने तथा सूचना मिलने में हुई अनावश्यक देरी के कारण हुए वित्तीय नुकसान के सबूत के साथ सूचना आयोग में मुआवजा मांगने की रणनीति पर चर्चा की गई।

*भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता*

सरकारी भर्तियों (अनुच्छेद 309 के तहत शक्तियों) में पारदर्शिता पर चर्चा करते हुए सलाह दी गई कि सभी आवेदन पत्रों और भर्ती विज्ञापनों का रिकॉर्ड आरटीआई से मांगा जा सकता है। डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने के लिए ऑनलाइन विज्ञापनों के स्क्रीनशॉट या फोटो ले लेना चाहिए।

बैठक के अंत में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि आरटीआई कानून को प्रभावी बनाने के लिए तीसरे पक्ष के नियमित ऑडिट, लोक सूचना अधिकारियों (PIOs) के प्रशिक्षण, नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी और कड़े प्रशासनिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। यदि सरकारी विभाग धारा 4 का ईमानदारी से पालन करते हुए स्वतः जानकारी सार्वजनिक करें, तो आम नागरिकों को आरटीआई आवेदनों और लंबी अपीलों के चक्रव्यूह से राहत मिल सकती है। इस महत्वपूर्ण विषय पर आगे की रणनीति और प्रगति की समीक्षा अगले रविवार आयोजित होने वाली बैठक में की जाएगी।

*स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट रीवा मप्र*

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